Archives 2023

31. अपक्षय एवं अपरदन (Weathering and Erosion)

अपक्षय एवं अपरदन

Weathering and Erosion

अपक्षय एवं अपरदन

         अपक्षय के अन्तर्गत चट्टानों के अपने स्थान पर टूटने-फूटने की क्रिया तथा उससे उस चट्टान विशेष या स्थान विशेष के अनावरण की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है। इसमें चट्टान-चूर्ण के परिवहन को सम्मिलित नहीं किया जाता है।

        अपरदन की क्रिया में टूटे हुए चट्टानों के टुकड़ों के परिवहन (नदी, हिमानी, वायु, भूमिगत जल तथा सागरीय लहर द्वारा) तथा टुकड़ों द्वारा आपस में रगड़ एवं उनके द्वारा कटाव की क्रिया को सम्मिलित किया जाता है।

        अनाच्छादन (Denudation) में अपक्षय तथा अपरदन दोनों क्रियाओ का समावेश किया जाता है। इस प्रकार अपक्षय में केवल स्थैतिक क्रिया तथा अपरदन में गतिशील क्रिया होती है। अनाच्छादन स्थैतिक तथा गतिशील दोनों क्रियाओं का योग है।           

         पृथ्वी का भूपटल दृढ़ भूखण्डों से निर्मित है जिसे प्लेट कहते है। पृथ्वी के भूपटल पर आंतरिक एवं बाह्य दो प्रकार की शक्तियाँ सतत कार्यरत रहती है। आंतरिक शक्तियों में ज्वालामुखी, भूकम्प एवं भूपटल को विरूपित करने वाले अन्य शक्ति (जैसे- संवहन तरंग) को शामिल करते है। जबकि बाह्य शक्तियों में जलवायु, बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग, इत्यादि को शामिल करते है। 
         आंतरिक शक्तियाँ भूपटल में विषमता (उत्थान, धंसान, वलन) उत्पन्न करती है। जबकि बाह्य शक्तियां भूपटल में उतपन्न विषमता को समाप्त कर समतल मैदान के रूप में बदलने का प्रयास करती है अर्थात बाह्य शक्तियां  प्राकृतिक कैंची के समान है जो अपरदन के माध्यम से धरातल को अपरदित कर समतल करते रहती है।

          समतल स्थापन का कार्य दो रूपों में होता है:

(i) बाह्य शक्तियां उच्च भागों को काट-छांटकर कर समतल बनाने का कार्य करती है, जिसे निम्नीकरण (Degradation) की क्रिया कहा जाता है।

(ii) जब बाह्य शक्तियां कटे छंटे पदार्थों का निक्षेपण निम्न भागों में करती हैं एवं इस प्रकार समतल स्थापन का कार्य करती हैं, तो यह क्रिया अधिवृद्धिकरण (Aggradation) कहलाती है। बाह्य शक्तियों द्वारा धरातल की ऊंचाई एवं गहराई समाप्त कर समतल स्थापन की प्रक्रिया को अनावृतीकरण कहा जाता है। अनावृत्तीकरण के अंतर्गत तीन क्रियाएं सम्मिलित हैं:

1. अपक्षयण (Weathering):

    भौतिक अथवा रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का अपने ही स्थान पर टूटना-फूटना या सड़ना गलना अपक्षयण कहलाता है।

2. शिलाखंडों का सरकना (Mass Wasting):

      यह वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत गुरुत्व के सीधे प्रभाव से टूटी हुई चट्टानें नीचे की ओर सरकती हैं या गिर पड़ती हैं, जैसे- भू-स्खलन।

3. अपरदन (Erosion):

         अपरदन वह क्रिया है जिसमें गतिशील अभिकरणों (Mobile Agencies) द्वारा शिलाखंडों का स्थानांतरण होता है। अपरदन के अंतर्गत तीन क्रियाएं सन्निहित हैं।

(क) परिवहन या अपनयन (Transportation):-

        इसमें ऋतुक्षरित चट्टानें कमजोर होकर अपरदन के दूतों के द्वारा बहाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जाता है और निम्न भागों में निक्षेपण का कार्य किया जाता है। स्रोत क्षेत्र से चट्टानों को उठाकर दूसरे स्थान पर पहुंचा देने वाले कारकों को अपरदन का दूत (बहता हुआ जल, भूमिगत जल, हिमानी, शुष्क वायु, समुद्री तरंग) कहा जाता है।    

(ख) अपघर्षण (Corrasion):-

     जब चट्टानों के टुकड़े अपरदन की शक्तियों (बहता जल, हिमानी, पवन आदि) द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाये जाते हैं तो वे धरातल की सतह को घिसते एवं काटते रहते हैं, इसे ही अपघर्षण कहा जाता है।

(ग) निक्षेपण (Deposition):-

        अपरदन के विभिन्न कारक परिवहन कार्य करने के बाद अपने साथ लाये गये मलबे को अपनी वाहन शक्ति के अनुसार जगह-जगह छोड़ते जाते हैं, जिसे निक्षेपण कहते हैं। निक्षेपण क्रिया से धरातल ऊंचा-नीचा हो जाता है। इस कार्य को बहता हुआ नदी, भूमिगत जल, हिमानी, वायु तथा सागरीय लहरें सम्पन्न करती हैं। निक्षेपण की इस अवस्था में धरातल पर विभिन्न भू-आकृतियों का जन्म एवं विकास होता है। 

        इस प्रकार जहां अपक्षयण में स्थैतिक (Static) क्रिया होती है, वहीं अपरदन में गतिशील (Dynamic) क्रिया होती है। हालांकि अपक्षयण में विखंडित चट्टानों का परिवहन नहीं होता है, परंतु गुरुत्व द्वारा विखंडित चट्टानों का सामूहिक रूप से नीचे की ओर सरकना (Mass Wasting) इसमें सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार भू-स्खलन को अपक्षयण के अंतर्गत रखा जा सकता है।

       अपक्षयण की क्रिया पर जलवायु के तत्वों (धूप, तापमान, वर्षा आदि) के अलावा चट्टानों की विशेषता (गठन, संरचना आदि) का भी प्रभाव पड़ता है।

अपरदन के प्रकार

    अपरदन के विभिन्न रूप अपरदन की भिन्न-भिन्न क्रियाओं में सम्पन्न होते हैं, जिसका विवरण निम्नलिखित है:-

(i) सन्नीघर्षण (Attrition):-

        एक ही प्रकार के चट्टानों का आपस में टकराना और टूटना सन्नीघर्षण कहलाता है।

(ii) अपघर्षण (Abrasion or corrasion):-

       जब दो विभिन्न प्रकार के चट्टान आपस में टकराकर टूटते हैं तो अपघर्षण कहलाता है।

(iii) उत्पाटन (Plucking):-

      अपरदन के दूतों के द्वारा चट्टानों को उखाड़ कर फेंकना उत्पाटन कहलाता है।

(iv) अपवाहन (Deflation):-

         वायु के द्वारा चट्टानों का उड़ा कर ले जाना अपवाहन कहलाता है।   यह क्रिया शुष्क मरुस्थलीय भागों में अधिक होती है। 

(v) स्थानांतरण या भूस्खलन (Landslide):-

          गुरुत्वाकर्षण बल के कारण चट्टानों का ऊपर से नीचे गिरना या खिसकना स्थानांतरण कहलाता है। 

(vi) अपक्षालन (Leaching):-

        अपरदन के दूतों के द्वारा छोटे एवं महीन चट्टानी कणों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुंचाना अपक्षालन कहलाता है।

(vii) संक्षारण (corrosion):-

       रासायनिक प्रतिक्रिया के द्वारा चट्टानों का टूटना और दूसरे स्थान पर जमा करना संक्षारण कहलाता है। इस प्रकार संक्षारण रासायनिक क्षरण की एक प्रक्रिया है।

(viii) जलगति क्रिया (Hydraulic Action):-

            यह एक यान्त्रिक क्रिया है। इसमें बहता हुआ जल अपने वेग तथा दबाव के कारण मार्ग में स्थित चट्टानी कणों को अपने साथ बहाकर ले जाता है।      

अपक्षयण के प्रकार

(Types of Weathering)

1. भौतिक अपक्षयण (Physical or Mechanical Weathering):-

     बिना किसी रासायनिक परिवर्तन के चट्टानों के टूट-फूट कर टुकड़े-टुकड़े होने की प्रक्रिया को भौतिक या यांत्रिक ऋतुक्षरण कहा जाता है।

⇒ भौतिक ऋतुक्षरण, मरुस्थलों में अधिक दैनिक तापांतर के कारण एवं ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों में पाले (Frost) के कारण होता है।

⇒ गर्म मरुस्थलों में स्वच्छ आकाश एवं वायु की शुष्कता के कारण दिन एवं रात के तापमान में काफी अंतर पाया जाता है। दिन के समय तेज धूप के कारण चट्टानों का ऊपरी आवरण तप्त होकर फैल जाता है। किन्तु रात के समय प्रायः तापमान गिरकर हिमांक (Freezing Point) तक पहुंच जाता है एवं चट्टानें सिकुड़ जाती हैं। इन क्रियाओं की पुनरावृति के कारण चट्टानों में दरार पड़ने लगता है एवं चट्टानें बड़े बड़े खंडों में टूट जाती हैं। इस प्रक्रिया को खंड विच्छेदन (Block Disintegration) कहा जाता है।

⇒ उष्ण मरुस्थलीय, अर्द्ध मरुस्थलीय एवं मानसूनी जलवायु प्रदेशों में अधिक तापांतर के कारण कभी-कभी चट्टानों की ऊपरी सतह गर्म होकर अन्दर की अपेक्षाकृत ठंडी सतह से अलग हो जाती है एवं ऊपर का भाग प्याज के छिलके की तरह अलग हो जाता है। इसे अपदलन, अपशल्कन या अपपत्रण (Exfoliation) कहा जाता है। यह क्रिया मुख्यतः ग्रेनाइट जैसी रवेदार चट्टानों में होती है।

⇒ चट्टानें विभिन्न खनिजों का समुच्चय होती हैं एवं विभिन्न खनिजों के फैलाव एवं सिकुड़ने की दर अलग-अलग होती हैं। इसके कारण चट्टानों के विभिन्न खनिज कण टूट-टूटकर अनेक खनिज कणों में विभाजित हो जाते हैं। चट्टानों का इस प्रकार खनिज कणों में टूटना कणिकामय विखंडन (Granular Disintegration) कहलाता है। खंड विखंडन एवं कणिकामय विखंडन के कारण ही गर्म मरुस्थलों में विस्तृत क्षेत्रों में बालू पाये जाते हैं।

⇒ शीत कटिबंधीय क्षेत्रों एवं उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में चट्टानों की छिद्रों एवं दरारों में जल के जमने एवं पिघलने की क्रिया क्रमिक रूप से होती है। इससे चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं बड़े-बड़े खंडों में टूटने लगती हैं अर्थात् खंड-विखंडन (Block Disintegration) होने लगता है। यह क्रिया तुषार क्रिया (Frost Action) कहलाती है।

          खड़ी पहाड़ी ढालों पर इस प्रकार का विघटन अधिक देखने को मिलता है। विघटित चट्टानें गुरुत्व बल के कारण नीचे की ओर सरककर जमा होने लगती हैं। ये विखंडित चट्टानें खुरदरी एवं नुकीली होती हैं। इस प्रकार के कोणीय चट्टानी खंडों (Angular Rock Fragments) के ढेर को भग्नाश्म राशि (Scree) अथवा टैलस (Talus) कहा जाता है। इस प्रकार स्क्री या टैलस का निर्माण मुख्यतः तुषार क्रिया एवं गुरुत्वाकर्षण का परिणाम है।

2. रासायनिक अपक्षयण (Chemical weathering):-

    जब रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा चट्टानों का विखंडन (Disintegration) होता है तो उसे रासायनिक अपक्षयण कहा जाता है। जब विभिन्न कारणों से चट्टानों के अवयवों में रासायनिक परिवर्तन होता है तो उनका बंधन ढीला हो जाता है तो रासायनिक अपक्षयण की क्रिया होती है।

       तापमान एवं आर्द्रता अधिक रहने पर रासायनिक अपक्षयण की क्रिया तीव्र गति से होती है। यही कारण है कि विश्व के उष्ण एवं आर्द्र प्रदेशों में यह क्रिया अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। शुष्क अवस्था में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाईऑक्साइड का चट्टानों पर कोई रासायनिक प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु नमी की उपस्थिति में ये सक्रिय रासायनिक कारक (Active chemical Agent) बन जाते हैं।

(i) विलयन (Solution):-

      चट्टानों में उपस्थित विभिन्न खनिजों के जल में घुलने की क्रिया को विलयन कहा जाता है। उदाहरण के लिए सेंधा नमक (Rock Salt) एवं जिप्सम वर्षा के जल में आसानी से घुल जाते हैं।

(ii) ऑक्सीकरण (Oxidation):-

     ऑक्सीकरण की क्रिया विशेष रूप से लौह युक्त चट्टानों पर होती है। आर्द्रता बढ़ने पर लौह खनिज ऑक्सीजन से मिलकर ऑक्साइड में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसके कारण चट्टान अथवा खनिज कमजोर हो जाते हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है। वर्षा ऋतु में लोहे में जंग लगना ऑक्सीकरण का ही परिणाम है।

(iii) जलयोजन (Hydration):-

     जलयोजन की प्रक्रिया में चट्टानों में उपस्थित खनिज जल को सोख लेता है। इसके कारण उनमें रासायनिक परिवर्तन होने लगता है एवं नये खनिजों का निर्माण होता है। इन नये खनिजों में जल का कुछ अंश रह जाता है। ये नये खनिज पुराने खनिजों की अपेक्षा मुलायम होते हैं। उदाहरण के लिए जलयोजन के फलस्वरूप ग्रेनाइट चट्टानों का फेल्डस्पार खनिज कायोलिन (Kaolin) मिट्टी में परिवर्तित हो जाता है।

(iv) कार्बोनेटीकरण (Carbonation):-

     जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड मिलकर हल्का कार्बोनिक अम्ल बनाते हैं। इस अम्ल का प्रभाव विशेष रूप से उन चट्टानों पर पड़ता है, जिनमें कैल्सियम, मैग्नेशियम, सोडियम, पोटेशियम एवं लोहे जैसे तत्त्व पाये जाते हैं। ये तत्त्व कार्बोनिक अम्ल में घुल जाते हैं, फलस्वरूप इन खनिजों से निर्मित चट्टानें कमजोर हो जाती हैं एवं उनका विखंडन होने लगता है।

        बलुआ पत्थरों (Sand Stone) में सामान्यतः कैल्सियम कार्बोनेट (Lime) ही संयोजक पदार्थ (Cementing Material) का कार्य करता है, जो कार्बोनिक अम्ल में शीघ्रता से घुल जाता है, फलस्वरूप बलुआ पत्थर का विखंडन होने लगता है।

⇒ कभी-कभी जलयोजन के कारण चट्टानों की ऊपरी सतह फूलकर निचली सतह से अलग हो जाती है। इसे गोलाभ अपक्षय (Spheroidal Weathering) कहा जाता है। इस प्रकार रासायनिक अपक्षयण की यह क्रिया अपदलन से काफी मिलती-जुलती है।

3. जैविक अपक्षय (Biological Weathering):-

    जैविक अपक्षय वह प्रक्रिया है, जिसमें पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों के कारण चट्टानों का विघटन एवं अपघटन होता है। यह अपक्षय की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ने तथा उनकी संरचना में परिवर्तन लाने में सहायक होती है।

    पेड़ों की जड़ें चट्टानों की दरारों में प्रवेश करके धीरे-धीरे मोटी होती हैं, जिससे दरारें चौड़ी हो जाती हैं और चट्टानें टूटने लगती हैं। इसी प्रकार, बिल बनाने वाले जीव-जंतु मिट्टी और चट्टानों को ढीला करते हैं। लाइकेन, काई तथा अन्य सूक्ष्मजीव चट्टानों की सतह पर बढ़कर जैविक अम्ल उत्पन्न कर सकते हैं, जो खनिजों के रासायनिक अपघटन में सहायता करते हैं।

    जैविक अपक्षय विशेष रूप से वन क्षेत्रों, आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों तथा वनस्पति से ढके भूभागों में महत्वपूर्ण होता है। यह मृदा निर्माण, पोषक तत्त्वों के चक्रण तथा स्थलरूपों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अपक्षयण पर जलवायु का प्रभाव

⇒ उष्ण एवं शुष्क जलवायु क्षेत्रों (जैसे- गर्म मरुस्थलों में) दैनिक तापांतर अधिक मिलने के कारण भौतिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ उष्ण एवं आर्द्र जलवायु क्षेत्र (जैसे- विषुवतीय क्षेत्र) एवं चूना पत्थर वाले क्षेत्र में रासायनिक अपक्षय महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ शीत एवं शीतोष्ण जलवायु क्षेत्रों में भौतिक अपक्षय अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।

⇒ ध्रुवीय क्षेत्रों में स्थायी हिमाच्छादन के कारण अपक्षयण की क्रिया नहीं होती है।

⇒ मानसूनी जलवायु वाले क्षेत्रों (जैसे भारत) में रासायनिक एवं भौतिक दोनों ही प्रकार का अपक्षयण पाया जाता है।

नोट: अपक्षयण एवं अपरदन दो अलग-अलग क्रियाएं हैं। बिना अपक्षयण के भी अपरदन हो सकता है। अपक्षयण के पश्चात् अपरदन हो ही, यह आवश्यक नहीं है। अपरदन की प्रक्रिया में अपक्षयण सहायक होता है, परंतु यह अपरदन का अंग नहीं है।



Read More:

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत / Conventional Signs and Symbols

रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)

रूढ़ चिन्ह और संकेत

         स्थलाकृतिक मानचित्र पर विभिन्न भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को प्रदर्शित करने के लिए निश्चित एवं मानकीकृत चिन्हों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे निश्चित चिन्हों को रूढ़ चिन्ह कहा जाता है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन चिन्हों का मानकीकरण किया गया है, जिससे स्थलाकृतिक मानचित्रों में विभिन्न विशेषताओं को एक समान तरीके से प्रदर्शित किया जा सके। भारतीय स्थलाकृतिक मानचित्रों में प्रयुक्त अनेक रूढ़ चिन्हों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त है।

    सामान्यतः 1:50,000 तथा 1:25,000 मापनी वाले स्थलाकृतिक पत्रकों में रूढ़ चिन्हों का प्रयोग समरूप रूप से किया जाता है। इन चिन्हों की सहायता से मानचित्र पर सड़क, नदी, रेलमार्ग, बस्ती, पुल, वन, विद्यालय आदि लक्षणों को आसानी से पहचाना जा सकता है। मुख्यतः रूढ़ चिन्हों को निम्नलिखित दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है-

     यह मुख्यत: दो प्रकार के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

CONVENTIONAL SIGNS

AND

SYMBOLS

रूढ़ चिन्ह और संकेत

Read More:

23. एलनीनो सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत


एलनीनो सिद्धांत

         मानसून की उत्पत्ति के संबंध में “एलनीनो सिद्धांत” को एक नवीन सिद्धांत के रूप में मान्यता प्राप्त है। एलनीनो के बारे में विश्व को पहली जानकारी तब मिली जब गिल्बर्ट वाकर महोदय 1924 में मध्य प्रशान्त महासागर में बनने वाला “निम्न वायुदाब क्षेत्र” का अध्ययन कर रहे थे। मध्य प्रशान्त महासागर में निम्न वायुदाब क्षेत्र का कारण उन्होंने अलनीनो जलधारा को बताया। पुन: 1987 ई० में भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न हुई तो अलनीनो का संबंध भारतीय मानसून से जोड़ा गया।

         अलनीनो एक गर्म उपसतही जलधारा है जिसकी उत्पत्ति पेरू के तट पर 3ºS से 33ºS अक्षांश के मध्य होती है। यह वह क्षेत्र है जहाँ दोनों गोलार्द्धों की वाणिज्यिक हवाएं अपने नियत मार्ग से होकर प्रवाहित होती है। पुनः पृथ्वी की घूर्णन गति के विरुद्ध यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा में विषुवत रेखा के समान्तर प्रवाहित होने लगती है। यह जलधारा मध्य प्रशान्त महासागर में बिना कोई अवरोध के प्रवाहित होती है। पुन: मलाया प्रायद्वीप और आस्ट्रेलिया के मध्यवर्ती भाग से गुजरकर यह जलधारा हिन्द महासागर में प्रविष्ट कर जाती है और धीरे-2 इसका फैलावा पूर्वी अफ्रीका के तट तक हो जाता है।

        अलनीनो जलधारा के कारण समुद्री जल का तापमान 3º-10ºC तक बढ़ जाती है। पुनः सामान्य नियम के अनुसार भारत में मानसून सक्रिय होने के लिए यह यावश्यक है कि ग्रीष्म ऋतु में समुद्री सतह पर HP और स्थल पर LP का निर्माण हो। लेकिन अलनीनो का प्रभाव समुद्री क्षेत्र में होते ही समुद्र के ऊपर ग्रीष्म ऋतु में LP का निर्माण हो जाता है और उसके तुलना में स्थल पर HP का निर्माण होता है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर चलने की प्रवृति रखती है। जिससे भारत में मानसून सक्रिय हो ही नहीं पाता है।

      अलनीनों का प्रभाव सभी वर्ष एक समान नहीं देखा गया है। अत: इसके प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए (SOS) ‘साउथ ओसीलेशन स्केल” (दक्षिणी दोलन पैमाना) का विकास किया गया है। इन पैमान में दो तरह के सूचकांक (इंडेक्स) विकासत किये गये हैं। जैसे-

(i) अप्रैल महीने में मध्य प्रशान्त महासागर में स्थित टेहिटी (Tahiti) द्वीप पर HP का निर्माण होता है, और ऑस्ट्रेलिया के डार्विन नगर में LP का निर्माण होता है तो यह सकारात्मक मानसून का सूचक है। और

(ii) जब अप्रैल महीने में टेहिटी द्वीप पर LP और डार्विन नगर पर HP का निर्माण हो तो यह नकारात्मक मानसून का सूचक है।

एलनीनो सिद्धांत

चित्र: एलनीनो सिद्धांत के अनुसार मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

       यद्यपि अलनीनो के प्रभाव से सूखे की प्रभाव की व्याख्या होती है। लेकिन मानसून की उत्पत्ति के संबंध में यह कोई भी तर्क प्रस्तुत नहीं करता है। पुन: अलनीनो सिद्धांत सूर्य की उत्पत्ति के संबंध में तापीय सिद्धांत के समान ही सरल तर्क प्रस्तुत करता है। अत: अनेक मौसम वैज्ञानिकों ने इस सिद्धांत को सूखे की उत्पत्ति का सिद्धांत मानते हैं न कि मानूसून की उत्पत्ति का सिद्धांत। यह सिद्धांत सूखे की उत्पत्ति की व्याख्या करने में भी पूर्णरूपेण सक्षम नहीं हैं।

       1875 ई० – 1985 ई० के बीच एलनीनो से संबंधित सूचना एकत्रित किये गये हैं। इन 110 वर्षों में 43 वर्ष मानसून औसत से कम सक्रिय रहा। इन 43 वर्षो में मात्र 19 वर्ष मानसून असफल होने का कारण अलनीनो का प्रभाव था। कई ऐसे वर्ष भी थे जब हिन्द महासागर में अलनीनो का प्रभाव था फिर भी भारत में मानसून से पर्याप्त वर्षा हुई। ये तथ्य अलनीनो सिद्धांत की सीमा/आलोचना को रेखांकित करते हैं।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति के संबंध में कोई भी सिद्धांत पूर्ण व्यख्या करने में सक्षम नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि उपरोक्त चारों सिद्धांतों को मिलाकर एक संश्लेषित सिद्धांत प्रस्तुत किया जाए। अगर संभव हो सके तो आधुनिक उपग्रह और GIS के माध्यम से मानसून को प्रभावित करने वाले अन्य चरों/कारकों को पहचान कर इसके विश्लेषण में शामिल किया जाय।

नोट: एलनीनो सिद्धांत- एलनीनो का प्रभाव रहने पर ग्रीष्म ऋतु में हिन्द महासागर पर LP तथा भारतीय महाद्वीप पर HP बनता है। फलत: वायु स्थल (HP) से समुद्र (LP) की ओर चल पड़ती है जिससे भारत में मानसून सक्रिय नहीं हो पाती।

प्रश्न प्रारूप

2 एलनिनो क्या है? भारतीय मानसून में एलनिनो प्रभाव पर प्रकाश डालिए।

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत     

        मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या करने वाले सिद्धांतों में जेट स्ट्रीम सिद्धांत को सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है। इस सिद्धांत का विकास तब हुआ जब द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जेट स्ट्रीम वायु की खोज की गई। जेट स्ट्रीम वायु की खोज करने का श्रेय अमेरिकी सैनिकों को जाता है। लेकिन जेट स्ट्रीम का वैज्ञानिक अध्ययन करने का श्रेय रॉक्सबी महोदय को जाता है।

       सर्वप्रथम एम.टी. यीन महोदय ने जेट स्ट्रीम को भारतीय मानसून से जोड़‌कर मानसून उत्पत्ति की व्याख्या करने का प्रयास किया। पुन: कोटेश्वरम् महोदय ने उनके सिद्धांत में संशोधन प्रस्तुत करते हुए इसको प्रस्तुत किया। पुन: 1973 ई० में पूर्व सोवियत संघ के वैज्ञानिक और भारतीय वैज्ञानिकों ने ‘MONEX’ अनुसंधान के द्वारा जेट स्ट्रीम सिद्धांत को पुष्ट करने का प्रयास किया। वर्तमान समय में भारतीय एवं अमेरिकी उपग्रह प्रणाली भी इसी सिद्धांत का समर्थन करते हैं।

‘जेट स्ट्रीम’ क्या है?

       जेट स्ट्रीम हवा ऊपरी वायुमण्डल में तीव्र गति से चलने वाली हवा है। इन हवाओं का संबंध पृथ्वी के धरातल पर बनने वाले वायुदाब परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों ने जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल के माध्यम से करने का प्रयास किया है।

          मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार जेट हवा चार प्रकार की होती है:-

(1) ध्रुवीय रात्रि जेट हवा- इनका प्रभाव समताप मण्डल में होता है।

(2) ध्रुवीय सीमाग्र जेट हवा- इनका विस्तार 45º से 65º अक्षांशों के बीच होता है 

(3) उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा- इनका विस्तार 20º से 40º अक्षांशों के बीच होता है। यह भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं।

(4) उष्ण कटिबंधीय पूर्वी जेट हवा- यह एक अस्थाई जेट स्ट्रीम है जो ग्रीष्म काल में दक्षिण एशिया के ऊपर बहती है। भारत में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के उद्भव में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

        उपरोक्त चार जेट हवाओं में से अंतिम दो जेट हवाओं का संबंध मानसून उत्पत्ति से है। एम. टी. यीन महोदय ने बताया कि उपोष्ण पछुवा जेट हवा जाड़े की ऋतु में भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से गुजरती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर होती है। इसलिए इसे ‘पछुवा जेट हवा’ भी कहते हैं।

मानसून उत्पत्ति का जेट

चित्र: पछुवा और पूर्वा जेट हवा

      पछुवा जेट हवा का तापमान कम होता है। ऐसी स्थिति में यह हवा नीचे की ओर बैठने की प्रवृति रखती है। नीचे बैठने की प्रवृति के कारण भारतीय उपमहाद्वीप उच्च भार / उच्च वायुदाब के क्षेत्र में बदल जाता है। फलतः धरातल पर हवाएं स्थल से समुद्र की ओर चलने लगती है। ये हवाएँ ही “उत्तरी-पूर्वी मानसून” कहलाता है।

          ग्रीष्म ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है, क्योंकि एम. टी. यीन महोदय के अनुसार 15 मार्च के बाद से ही भारत के दक्षिणी भाग और श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप के ऊपर एक नवीन जेट स्ट्रीम वायु का जन्म होता है जिसे “उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा” कहते है। जैसे-2 सूर्य का उतरायण होता जाता है, वैसे-2 इस जेट हवा का विस्तार उत्तर की ओर होने लगता है। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है।

         पूर्वा जेट हवा के विकास होते ही उपोष्ण जेट हवा उत्तर की ओर खिसक कर चीन के तारिम बेसिन के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। पूर्वा जेट हवा के गर्म होने के कारण भारतीय उपमहाद्वीप की हवा को ऊपर की ओर खींचने लगता है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर LP का निर्माण होता है। इसी LP को भरने के लिए अरब सागर से हवाएँ दौड़ती है और “दक्षिणी-पश्चिमी मानसून” को जन्म देती है।

       कोटेश्वरम महोदय ने इस सिद्धांत की व्याख्या त्रि-कोशिकीय मॉडल से किया है। जैसे- उनके अनुसार 15 मार्च के बाद ही तिब्बत का पठार दो कारणों से गर्म होने लगती है-

चित्र: त्रि-कोशिकीय मॉडल

(i) 5000 m समुद्र तल से तिब्बत के पठार का ऊँचा होना। और

(ii) बर्फ के पिघलने से बड़ी मात्रा में गुप्त ऊष्मा का परित्याग।

       इन दो कारणों के चलते तिब्बत के पठार की धरातलीय हवाएँ लम्बवत रूप से ऊपर उठने लगती है और तिब्बत के पठार के ऊपर HP का निर्माण कर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न करती है। इस प्रतिचक्रवातीय केन्द्र से हवाएँ मूलतः उत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ अग्रसारित होती है। उत्तर की ओर चलने वाली हवा चीन की जलवायु को प्रभावित करती है जबकि दक्षिण की ओर चलने वाली हवा भारत की जलवायु को प्रभावित करती है।

      दक्षिण की ओर चलने वाली हवा फेरल के नियमानुसार उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलना चाहिए। लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप पर इसकी दिशा पूर्णतः पूरब से पश्चिम की ओर होती है। इसे ही उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा या पूर्वा जेट हवा कहते हैं। इस हवा की प्रवृति गर्म होती है। जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ठण्डी धरातलीय हवा को ऊपर की ओर खींच लेती है जिसके कारण छोटे-2 चक्रवातों का आगमन होता है। पूर्वा जेट हवा अरब सागर के ऊपर ठण्डी होकर बैठने की प्रवृति रखती है, जिसके कारण समुद्री क्षेत्र HP में बदल जाते हैं और अरब सागर से हवाएँ भारतीय उपमहाद्वीप की ओर चलकर दक्षिणी-पश्चिमी मानसून को जन्म देते हैं।

चित्र : पूर्वा जेट हवा से दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति

      पुन: कोटेश्वरम महोदय ने बताया कि ग्रीष्म ऋतु के बाद सूर्य ज्यों ही दक्षिणायन होने लगता है त्यों ही तिब्बत के पठार के ऊपर बनने वाला निम्न वायुदाब पेटी का विस्तार प्रायद्वीपीय भारत और हिन्द महासागर तक हो जाता है, जिसके कारण समुद्र और प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर प्रतिचक्रवात की स्थिति उत्पन्न होती है।

       इस प्रतिचक्रवात से पुन: हवाएं दो दिशाओं में चलती है जो हवाएँ उत्तर की ओर अग्रसारित होती है वही वायु फेरल का नियम अनुसरण करते हुए पछुवा जेट हवा को जन्म देती है। यही पछुवा जेट हवा ठण्डी होकर भारतीय उपमहाद्वीप पर बैठने लगती है जिससे घरातल पर HP का निर्माण होता है। पुन: हवा स्थल से समुद्र की ओर चलने से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है।

चित्र: पछुआ जेट हवा से उत्तरी-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति

         MONEX अनुसंधान तथा उपग्रह से लिए गए मानचित्रों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत में मानसून की अनिश्चितता तथा बाढ़ और सूखाड़ के लिए “पूर्वा जेट हवा” उत्तरदायी है। इसमें कहा गया है कि पूर्वा जेट हवा का विस्तार जब प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाता है तब भारत में मानसून सामान्य रहता है और जब इसका विस्तार शिवालिक पर्वत और मैदानी क्षेत्र तक ही रह जाता है तो भारत में अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न होती है।

आलोचना

       मानसून की उत्पत्ति का व्याख्या करने वाला यह सबसे आधुनिक एवं वैज्ञानिक सिद्धांत है। लेकिन इसकी उत्पत्ति के संबंध में अभी भी प्रश्नचिह्न उठाये जाते हैं। इस पर प्रश्नचिह्न लगाया जाता है कि इसका विस्तार कभी प्रायद्वीपीय भारत तक हो जाती है और कभी इसका विस्तार शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र तक ही रह जाता है। ऐसा क्यों? अतः इन दिशा में और भी वैज्ञानिक अनुसंसाधन किए जाने की आवश्यकता है।

नोट: जेट स्टीम सिद्धांत के अनुसार, उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा से उ०-पूर्वी मानसून और उष्णकटिबंधीय पूर्वा जेट हवा से द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

⇒ सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर उपोष्ण कटिबंधीय पछुवा जेट हवा (ठण्डी) का आगमन होता है एवं HP का निर्माण करता है और उतरायण से उष्ण कटिबंधीय पूर्वा जेट हवा (गर्म) का आगमन होता है तथा LP का निर्माण करता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर क्रमश: उ०-पूर्वी मानसून तथा द०-प० मानसून को जन्म देती है।

जेट स्ट्रीम की विशेषताएँ-

⇒ जेट स्ट्रीम का संचरण ऊपरी क्षोभमंडल में 7.5 से 14 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक संकरी पट्टी के रूप में पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर होता है।

⇒ ये त्रिकोणीय पवनें होती हैं, जिनकी लंबाई कई हजार किलोमीटर, चौड़ाई सैकड़ों किलोमीटर तथा गहराई कुछ किलोमीटर तक होती है।

⇒ इनका विकास 20º अक्षांश से ध्रुवों तक होता है। जेट स्ट्रीम मौसम में परिवर्तन से प्रभावित होते हैं शीतकाल में इनका वेग तथा विस्तार अपेक्षाकृत अधिक होता है।

⇒ ग्रीष्मकाल में उत्तर की ओर खिसकने से इनके विस्तार में कमी आ जाती है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि की व्याख्या हेतु प्रस्तावित अभिनव सिद्धांत की विवेचना करें।

2. मानसून की उत्पत्ति से संबंधित नवीन सिद्धांत की विवेचना करें।

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

 5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास


भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास           

             भूवैज्ञानिक संरचना का तात्पर्य चट्टानों के भूगर्भिक इतिहास से है। भूगर्भिक इतिहास के अंतर्गत समय के संदर्भ में चट्टानों के विकास तथा आन्तरिक एवं बाह्य भौगोलिक कारकों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। किसी भी भौगोलिक भूखण्ड के इतिहास का अध्ययन चट्टानों के आधार पर किया जाता है। जेम्स हटन ने यहाँ तक कहा था कि ”चट्टान पृथ्वी के इतिहास के पन्ने हैं।”

       भूवैज्ञानिकों ने अलग-2 विधियों का उपयोग कर भूगर्भिक संरचना का अध्ययन करने का प्रयास किया है। भारत के संदर्भ में सर्वप्रथम टी०एच० हॉलैण्ड महोदय ने अध्ययन करने का प्रयास किया। इन्होंने भारतीय भूगर्भिक चट्टानों का अध्ययन कर “इम्पीरियल गजेटियर ऑफ इण्डिया” (1904) नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। इन्होंने भारतीय चट्टानों को निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकृत किया:-

(1) पुराण समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (जीवाश्म नहीं)।

(2) द्रविड़ समूह की चट्टान- पठारी क्षेत्र (परन्तु परतदार/रूपांतरित)।

(3) आर्यन समूह की चट्टान- हिमालय, उत्तर भारत के मैदान ।

(4) नवीन समूह की चट्टान- डेल्टाई, तराई, नदी के किनारे।

         पुराण समूह की चट्टान में वैसे चट्टानों को रखा जिसमें किसी भी प्रकार का जीवाश्म नहीं मिलता है। इस प्रकार का चट्टान भारत के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। प्रो. कृष्णन महोदय ने इस प्रकार के चट्टानों को “आर्कियन समूह की चट्टान” से संबोधित किया है। टी० एच० हलैण्ड ने द्रविड़ समूह की चट्टान में वैसे चट्टान को रखा है जो पठारीय भारत में ही मिलते हैं लेकिन वे परतदार प्रकार के हैं। ये चट्टानें परतदार होने के बावजूद इस पर बाह्य एवं आन्तरिक कारकों का इतना जब‌दस्त प्रभाव पड़ा है कि यह पूर्णतः रूपान्तरित हो चुके हैं।

        टी० एच० हालैण्ड ने आर्यन समूह के चट्टानों में हिमालय पर्वतीय क्षेत्र एवं उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है। जबकि नवीन समूह की चट्टानों में डेल्टाई, तटीय और नदियों के किनारों पर मिलने वाले चट्टानों को शामिल किया है।

आलोचना

        टी० एच० हॉलैण्ड के द्वारा प्रस्तुत भूगर्भिक संरचना के वर्गीकरण से कई आधारों पर आलोचना की जाती है। जैसे-

(1) इनके वर्गीकरण में कोई निश्चित समय सीमा का निर्धारण नहीं किया गया है।

(2) कुछ विद्वानों ने नामाकरण पर ही आपति उठायी है क्योंकि उनके वर्गीकरण से औपनिवेशिक शासन की गन्ध आती है।

(3) टी० एच० हॉलैण्ड ने कहा है कि हमारा वर्गीकरण कार्बन डेटिंग पर आधारित है लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से यह साबित हो चुकी है कि कार्बन डेटिंग के द्वारा मात्र 5700+ 50 वर्ष तक के ही चट्टानों का उम्र ज्ञात किया जा सकता है। लेकिन भारत में इससे भी पुराने चट्टानों का प्रमाण मिलता है।

     उपरोक्त आलोचनाओं के परिपेक्ष्य में भारतीय एवं यूरोपीय भूगर्भशास्त्रियों ने इस बात पर बल दिया है कि भारतीय चट्टानों के संरचनात्मक अध्ययन अन्तरर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित किये गये पैमान के आधार पर किया जाना चाहिए। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उसी पैमाना को स्वीकार किया गया है जो यूरोपीय वैज्ञानिकों के द्वारा विकसित किया गया है। इस पैमाने के अनुसार भूगर्भिक काल को चार महाकल्प (Era) में बाँटा गया है। पुन: महाकल्प को काल/कल्प (Period) और काल को युग (Epoch) में बाँटा गया है।

      अन्तर्राष्ट्रीय पैमाना के अनुसार चारो महाकल्प इस प्रकार है:-

(1) आर्कियोजोइक

(2) पैलियोजोइक

(3) मीसोजोइक

(4) केनोजोइक

         आर्कियोजोइक को पूर्व प्राथमिक काल में, पैलियोजोइक को प्राथमिक काल में, मीसोजोइक को द्वितीयक काल में रखा गया है। लेकिन केनोजोइक को तृतीयक एवं चतुर्थक काल में बाँटा गया है। कुछ भूगर्भशास्त्री चतुर्थक काल नियोजोइक महाकल्प के रूप में स्वीकार करते हैं।

       प्रत्येक महाकल्प में विकसित भारतीय चट्टानों की संरचनात्मक विशेषता इस प्रकार से है-

(1) आर्कियोजोइक

            इसे पूर्व प्राथमिक काल में रखा गया है। इस काल को पुन: दो कल्प में बाँटा गया है-

(I) आर्कियन कल्प और

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

(I) आर्कियन कल्प को अजैविक कल्प भी कहा जाता है।  इसमें पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 2500 मिलियन वर्ष पूर्व तक के निर्मित चट्टानों को शामिल किया जाता है। ये वे चट्टानें हैं जो भारतीय उपमहाद्वीय के आधारशीला का निर्माण करते हैं। इसे “पैंजिया परिवार का चट्टान” भी कहा जाता है।

         यह वह चट्टान है जो कभी भी समुद्र के नीचे नहीं गया है। लम्बी अवधि तक स्थलखण्ड के रूप में रहने के कारण मे चट्टानें अपरदित एवं विलुपित हो चुकी है। भारत में यह चट्टान धरातल पर कहीं दिखाई नहीं देता है बल्कि इसी चट्टान के ऊपर अन्य चट्टानों के विकास हुआ है।

भारत की भूगर्भिक

चित्र: आर्कियन क्रम की चट्टानें

(II) प्री-कैम्बियन कल्प

        प्री-कैम्बियन कल्प की चट्टानों की आयु 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 60 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है। इस कल्प को पुनः दो भाग में बाँटते है।

(A) अजैविक क्रम की चट्टानें-धारवाड़ चट्टान 

(B) जैविक क्रम की चट्टानें- कुप्पा, विन्ध्य

       अजैविक क्रम की चट्टानों में वैसे चट्टानों को शामिल करते हैं जो जीवाश्म रहित है। इसे भारत का सबसे प्राचीनतम परतदार चट्टान मानते हैं। इसे ‘धारवाड़ चट्टान’ के नाम से भी जानते हैं। इस प्रकार के चट्टान 2500 मिलियन वर्ष पूर्व से 1500 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच बना है। यह धात्विक खनिजों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसमें लोहा, मैंगनीज, यूरेनियम, सोना, जैसे, धात्विक खनिज मिलते हैं। इस प्रकार की चट्टानें कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, झारखण्ड एवं उड़ीसा के सीमावर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है।

           जबलपुर से नागपुर के बीच में स्थित सॉसर श्रेणी की चट्टान, गुजरात के चम्पानेर श्रेणी के चट्टान और हिमालय पर्वत के गर्भ में मिलने वाले कुमायूँ & लद्दाख श्रेणी की चट्टान इसी काम के माने जाते हैं।

चित्र: धारवाड़ क्रम की चट्टानें

           जैविक प्री-कैम्ब्रियन चट्टानों को पुन: दो भागों में बाँटा जाता है-

(i) कुडप्पा समूह चट्टान और

(1) विन्ध्यन समूह की चट्टान।

          कुडप्पा समूह की चट्टान का निर्माण 1500-1000 मिलियन वर्ष पूर्व हुआ है। जबकि विन्ध्ययन समूह की चट्टान का निर्माण 1000 मिलियन वर्ष पूर्व से 600 मिलियन वर्ष पूर्व। ये दोनों समूह की चट्टानें चूना पत्थर चट्टान के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रकार के चट्टानों से सूक्ष्म एक कोशीय प्राणियों के जीवाश्म के प्रमाण मिलता है। पुन: विन्ध्यन प्रकार के चट्टानों के क्षेत्र में ज्वालामुखी क्रिया के कारण चट्टानों में रूपान्तरण देखा जा सकता है। कहीं-2 पर वलन (मोड़) का भी प्रमाण मिलता है।

चित्र : विन्ध्यन क्रम की चट्टानें

             ज्वालामुखी क्रिया और वलन क्रिया के कारण ही विन्ध्यन समूह के चट्टानों से नीलम, पन्ना, हीरा, टोपाज जैसे- रंगीन पत्थर मिलते हैं। कुडप्पा समूह की चट्टान भारत के पूर्वी घाट के समान्तर उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिलते है। भारत में कुडप्पा समूह की चट्टानों में पापाघानी श्रेणी की चट्टान, चेयार श्रेणी की चट्टान, कृष्णा घाटी श्रेणी की चट्टान और नल्लामलई श्रेणी के चट्टानों को शामिल करते हैं। जबकि विन्ध्यन समूह के चट्टानों का विकास विन्ध्याचल पर्वत के अनुरूप हुआ है। इसका विस्तार प० M.P. से बिहार के रोहतास  जिला तक हुआ है।

चित्र: कुडप्पा क्रम की चट्टानें

(2) पैलियोजोइक

      पैलियोजोइक का काल 600 मिलियन वर्ष पूर्व से 225 मिलियन वर्ष पूर्व माना जाता है। इसे प्राथमिक काल के अन्तर्गत रखा गया है। इसे पुन: छ: कल्प में बाँटते हैं। जैसे :-

(i) कैम्ब्रियन

(ii) आर्डोविसियन

(iii) सिल्यूरियन 

(iv) डिवोनियन

(v) कार्बोनीफेरस

(vi) पर्मियन।

        कैम्ब्रियन कल्प की चट्टानें भारत में नहीं पायी जाती हैं। इसका प्रमुख कारण अपरदन माने जाते हैं। पुन: पाकिस्तान के सॉल्ट रॉक पर्वत कैम्ब्रियन कल्प का ही माना जाता है। पुन: आर्डोविसियन, सिल्यूरियन और डिवोनियन कल्प की चट्टानें भी प्रायद्वीपीय भारत तथा मैदानी भारत में नहीं पाये जाते हैं। लेकिन भूगर्भशास्त्रियों का मानना है कि उपरोक्त तीनों कल्प की चट्टानें हिमालय के गर्भ में मिल सकते हैं।

       कार्बोनीफेरस कल्प की चट्टानें भारत में कई क्षेत्रों में मिलते हैं। जैसे- दामोदर, सोन, वर्द्धा, महानदी और गोदावरी नदी घाटी  में मिलने वाले कोयला इसके सर्वोत्तम उदा० है।

चित्र: गोंडवाना क्रम की चट्टानें

          वस्तुतः कार्बोनीफेरस कल्प तक विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे पैन्जिया कहा जाता था। पैन्जिया का अधिकांश भाग ग्लोपोप्टेरिस नामक वनस्पति से ढका हुआ था। लेकिन इस कल्प में हुए भूसंचलन क्रिया के कारण कई क्षेत्रों में वलन एवं भ्रंशन की घटना हुई। इसी क्रम में प्राकृतिक वनस्पतियाँ धरातल के अन्दर दब गये। उस पर अत्याधिक दबाव एवं ताप के कारण ये रूपान्तरित होकर कोयला में तब्दील हो गये। जिन क्षेत्रों में चुना पत्थर युक्त चट्टान और वनस्पति एक साथ दब गए उन क्षेत्रों में खनिज तेल का निर्माण हुआ है।

          परमियन कल्प की संरचना भी कोयले के लिए प्रसिद्ध है। इसका प्रमाण उड़ीसा के तालचेर क्षेत्र से मिलता है। इस कल्प में हिमयुग का भी आगमन हुआ था। इस हिमयुग का प्रभाव महानदी और दामोदर नदी घाटी तक देखा जा सकता है क्योंकि हिमानी के अपरदन से निर्मित बोल्डर का प्रमाण इन क्षेत्रों में उपलब्ध है।

(3) मीसोजोइक

          मीसोजोइक की आयु 225 मिलियन वर्ष पूर्व से 70 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच निर्धारित किया गया है। इसे द्वितीयक काल के अंतर्गत रखा गया है। इसे पुन: तीन कल्प में बाँटते हैं:-

(i) ट्रायसिक

(ii) जुरासिक

(iii) क्रिटेशियस

         ट्रायसिक कल्प में भी चुना पत्थर चट्टानों का विकास हुआ है। इसका प्रमाण मध्य प्रदेश  तथा महाराष्ट्र के सीमा पर स्थित महादेव की पहाड़ी और पंचेत की पहाड़ी में मिलता है।

      जुरासिक कल्प में भारत में कई संरचनाओं का विकास हुआ है। जैसे- बिहार और झारखण्ड की सीमा पर स्थित राजमहल की पहाड़ी, मध्य प्रदेश में जबलपुर के पास संगमरमर चट्टान राजस्थान के मकराना क्षेत्र की संगमरमर की चट्टान जुरासिक कल्प में विकसित हुए हैं।

       किटेशियस कल्प की चट्टान भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी कल्प में हुए दरारी ज्वालामुखी क्रिया के कारण होने वाले लावा उद्गार से दक्कन के पठार का निर्माण हुआ है। लावा के ऋतुक्षरण से ही भारत में काली मिट्टी का विकास हुआ है। महाराष्ट्र का पठार, विदर्भ का पठार, तेलंगाना का पठार, गिर की पहाड़ी, कर्नाटक का पठार  तथा बंगलोर का पठार क्रिस्टेशियस कल्प में ही बना है। क्रिटेशियस कल्प में नर्मदा और ताप्ती की भ्रंश घाटी और ब्रह्मपुत्र रैम्प घाटी का निर्माण हुआ है। 

चित्र: दक्कन ट्रैप निक्षेप

(4) केनोजोइक

        केनोजोइक की आयु 70 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। इसे दो काल में वर्गीकृत करते हैं:-

(क) तृतीयक काल (Tertiary Period)

(ख) चतुर्थक काल (Quartanary Period)

         तृतीयक काल को पुन: पाँच कल्प में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(i) पैलियोसीन

(ii) इयोसीन,

(iii) ओलीगोसीन

(iv) मायोसीन और

(V) प्लायोसीन

          जबकि चतुर्थक काल को पुन: दो कल्प में बाँटते है:-

(i) प्लीस्टोसीन और

(ii) होलोसीन

         तृतीयक काल का समय 70 मिलियन वर्ष पूर्व से 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित किया गया है। इसे हिमालय निर्माण का काल भी कहा जाता है। इस काल में गोंडवाना भूमि के उत्तर की ओर खिसकने के कारण टेथिस सागर के मलवा के उत्थान से हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई है। हिमालय की तीन प्रमुख श्रेणियाँ है:-

(i) महान हिमालय- जिसका निर्माण ओलिगोसीन से मायोसीन कल्प के बीच हुआ है।

(ii) मध्य हिमालय-  इसका निर्माण मायोसीन और प्लायोसीन कल्प के बीच हुआ।

(iii) शिवालिक पर्वत- इसका निर्माण  प्लायोसीन के अंतिम काल और प्लीस्टोसीन कल्प के बीच हुआ है।

        तृतीयक काल की चट्टानें गुजरात के रण और कच्छ में, असम के बैरल की पहाड़ी में मिलते हैं। ये मूलत: पैलियोसीन कल्प के चट्टानें हैं।

चित्र: तृतीय/टर्शियरी चट्टानें

           स्फीति, लाहुली, नारीक्रम, गजक्रम की चट्टानें ओलिगोसीन कल्प की मानी जाती है। असम के सूरमा घाटी और उत्तराखण्ड के कसौली घाटी की चट्टानों मायोसीन कल्प के मिलते हैं। जबकि दिहांग नदी घाटी (A.P.) तमिलनाडु में रामेश्वरम के पास पाण्डिचेरी, केरल के कोबलम जिला, आन्ध्र प्रदेश के नेल्लूर और गोदावरी में प्लायोसीन कल्प की चट्टानें पायी जाती हैं।

भारत की भूगर्भिक संरचना

चित्र: चतुर्थक काल की चट्टानें

        चतुर्थक काल की आयु 2.5 मिलियन वर्ष पूर्व से अब तक निर्धारित किया गया है। प्लीस्टोसीन कल्प की आयु 2.5 मिलियन से 10 हजार वर्ष के पूर्व के बीच निर्धारित की गई है। होलोसीन की शुरुआत 10 हजार वर्ष पहले हुआ था और वर्तमान समय में चल रहा है।

 

      प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक पर्वत का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा मेघालय का पठार, राजमहल की पहाड़ी से टूटकर उ०-पूर्व की ओर चला गया। जिससे राजमहल गैप का निर्माण हुआ। प्लीस्टोसीन कल्प में चार बार (गुंज, मिंडल, रिस और वुर्म) हिमयुग का आगमन हुआ। इस कल्प में अरब सागर के उत्तरी भाग के उत्थान से थार मरुस्थल का निर्माण हुआ तथा उड़ीसा का चिल्का झील बना।

            होलोसीन कल्प की चट्टानों के निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। उत्तर-भारत के मैदानी क्षेत्रों में खादर मिट्टी का निर्माण, नदियों के मुहानों पर डेल्टा का निर्माण और तटीय क्षेत्रों में पुलिन का निर्माण आज भी जारी है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में लगभग सभी कल्प की चट्टानें पायी जाती है, जिसका प्रमाण भारत के अलग-2 क्षेत्रों में मिलती है। इस भूगर्भिक काल का प्रभाव भारत के संरचना, उच्चावच इत्यादि पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भूगर्भिक चट्टानों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

error: