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21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत


मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

      मानसून अपनी अनिश्चितताओं के लिए प्रसिद्ध है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रस्तुत किये गये हैं। लेकिन कोई भी सिद्धांत इसकी उत्पत्ति एवं विशेषताओं का पूर्ण व्याख्या करने में सक्षम नहीं हैं। फिर भी मानसून की उत्पत्ति के संबंध में निम्नलिखित चार सिद्धांतों पर विचार करते हैं:-

(1) तापीय सिद्धांत- एडमंड हैली, बेकर और डडले स्टाम्प

(2) विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत- फ्लोन

(3) जेट स्ट्रीम सिद्धांत- रॉक्सबी, एम.टी. यीन, कोटेश्वरम

(4) अलनीनो सिद्धांत- गिल्बर्ट वाकर

(1) तापीय सिद्धांत 

        तापीय सिद्धांत का प्रतिपादन ब्रिटिश मौसम वैज्ञानिकों के द्वारा किया गया था। यह सिद्धांत पृथ्वी की वार्षिक गति या सूर्य के उतरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। वस्तुतः पृथ्वी की वार्षिक गति के प्रभाव से सूर्य की किरणें जून महीने में कर्क रेखा पर लम्बवत चमकती है। अर्थात सूर्य के उतरायण होने से भारतीय उपमहाद्वीप पर ग्रीष्म ऋतु की स्थिति होती है। सूर्य के लम्बवत किरण के कारण भारतीय उपमहाद्वीप का सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र गर्म होने लगती है।

        धरातल के गर्म होने से वायु भी गर्म होकर ऊपर उठने लगती है जिससे सम्पूर्ण मैदानी क्षेत्र निम्न वायुदाब क्षेत्र में बदल जाती है दूसरी ओर हिन्द महासागर में सूर्य की तिरछी किरण पड़ने के कारण वायु ठण्डी ही रह जाती है। जिससे समुद्र के ऊपर उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। फलतः वायु H.P. से L.P. की ओर अग्रसारित होने लगती है। लेकिन फेरल के नियमानुसार अग्रसारित होने वाली वायु दायीं ओर मुड़कर द०-प० मानसून को जन्म देती है। यही मानसून भारतीय उपमहाद्वीप में अधिकांश वर्षा करने के लिए जिम्मेदार है।

मानसून उत्पत्ति

       तापीय सिद्धांत को मौसम वैज्ञानिकों ने थोड़ा परिमार्जित करते हुए प्रस्तुत किया है। जैसे सूर्य का उत्तरायण होते ही उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र LP में बदल जाती है जिससे उतरी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक नहीं पहुँच पाती है जिसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर अंतर उष्ण अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) का निर्माण नहीं कर पाती है। लेकिन दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली वाणिज्यिक हवा विषुवत रेखा तक पहुँचने की प्रवृति रखती है।

         दक्षिणी गोलार्द्ध की वाणिज्यिक हवा को विषुवतीय क्षेत्र में जब कोई अवरोध नहीं मिलता है तो उत्तरी गोलार्द्ध में यह प्रविष्ट कर जाती है। पुन: इस हवा पर फेरल का नियम लागू होने लगता है जिसके कारण यह द०-प० से उ०-पू० की ओर चलने लगती है। इसे ही द०-पश्चिम मानसून की संज्ञा देते हैं।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

      शीत ऋतु में स्थितियाँ भिन्न होती है। जैसे सूर्य दक्षिणायण हो जाती है तथा उसकी किरण मकर रेखा पर लम्बत गिरने लगती है। भारतीय उपमहाद्वीप की तुलना में समुद्र गर्म होकर L.P. का निर्माण करती है जबकि स्थल तिरछी किरण प्राप्त करने के कारण H.P. में बदल जाती है। फलत: वायु स्थल से समुद्र की ओर प्रवाहित होते लगती है। इस पर फेरल का नियम लागू होने के कारण यह उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर चलने लगती है। इसकी एक शाखा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

चित्र: तापीय सिद्धांत के अनुसार उ०-पू० मानसून की उत्पत्ति

नोट:-

⇒ तापीय सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उतरायण होने से द०-प० मानसून और दक्षिणायण होने से उ०-पूर्वी मानसून की उत्पत्ति होती है। 

⇒ ग्रीष्म ऋतु में सूर्य के उत्तरायण से उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र LP और हिन्द महासागर में HP का निर्माण होता है। फलत: वायु HP से LP की ओर चलने लगती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पति होती है।

⇒ जाड़े के दिनों में सूर्य के दक्षिणायण से भारतीय उपमहाद्वीप पर HP और हिन्द महासागर में LP का निर्माण होता है। फलत: वायु H.P. से L.P. की ओर चलकर फेरल के नियम का अनुसरण करते हुए उ०-पूर्वी मानसून को जन्म देती है।

आलोचना 

      तापीय सिद्धांत के विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायण होने पर आधारित है। सूर्य का उतरायण एवं दक्षिणायण होना नियत है। जबकि मानसून आने और जाने की तिथि अनियमित है। यह इस सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना है। पुन: यह सिद्धांत भारत में अतिवृष्टि और अनावृष्टि की व्याख्या करने में सक्षम नहीं है। फिर भी मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या का सैद्धांतिकरण करने में एक सफल प्रयास था।

(2) विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत

       इस सिद्धांत का प्रतिपादक फ्लोन महोदय हैं। इनके अनुसार द०-प० मानसून मूलत: विषुवतीय पछुवा हवा का एक विकसित रूप है। उनके अनुसार विषुवतीय पछुआ हवा की उत्पत्ति ITCZ  से जुड़ी हुई है।

       इस सिद्धांत के अनुसार सूर्य के उत्तरायण होते ही ITCZ उत्तर की तरफ खिसक जाती है। यहाँ तक कि ITCZ भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से होकर गुजरने लगती है। ऐसी स्थिति में भारतीय उपमहाद्वीप के सामने विषुवत रेखा पर ITCZ का निर्माण नहीं होता है लेकिन अरब सागर और अफ्रीका महाद्वीप के ऊपर ITCZ का निर्माण होता है। ITCZ में दोनों गोलार्द्ध की मिलने वाली वाणिज्यिक हवा पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकर पश्चिम से पूरब की ओर चलने लगती है जिसे “विषुवतीय पछुवा हवा” कहते हैं। इसी हवा को भारतीय उपमहाद्वीप पर निर्मित निम्न वायुदाब क्षेत्र चुम्बक की तरह अपनी ओर खींचने की प्रवृत्ति रखती है जिससे द०-प० मानसून की उत्पत्ति होती है।

      विषुवतीय पछुवा हवा का सिद्धांत एक प्रकार का तापीय सिद्धांत ही है लेकिन कुछ मायने में यह सिद्धांत भिन्न भी है। जैसे- विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप पर निम्न वायुदाब के निर्माण का दो कारण उत्तरदायी माने जाते है:

(i) सूर्य का उत्तरायण होना

(ii) ITCZ का उत्तर की ओर खिसकना

      यह सिद्धांत भारत में होने वाले अनावृष्टि और अतिवृष्टि की व्याख्या का भी प्रयास करती है। जैसे अगर ITCZ का विस्तार उत्तर में शिवालिक पर्वत तक हो जाता है तो उत्तर भारत में तीव्र वर्षा होने के कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। लेकिन जब ITCZ प्रायद्वीपीय भारत तक ही सीमित रहता है तो उत्तर भारत में सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       यह सिद्धांत मानसून की अनिश्चितता को भी स्पष्ट करने का प्रयास करता है। जैसे- इस सिद्धांत के अनुसार ज्यों-2 ITCZ उत्तर की ओर अग्रसारित होता है त्यों-2 मानसून का आगमन होता है। जब किसी कारणवश ITCZ के खिसकाव में बाधा उत्पन्न होती है तब ही मानसून के आने में देरी होती है।

चित्र: विषुवतीय पछुवा हवा सिद्धांत के अनुसार द०-प० मानसून की उत्पत्ति

आलोचना

(i) इस सिद्धांत को तापीय सिद्धांत का ही प्रतिलिपि माना जाता है।

(ii) यह सिद्धांत विषुवतीय रेखा या तापीय रेखा तथा ITCZ के निर्माण पर कोई प्रकाश नहीं डालता है।

(iii) चूंकि इन दोनों का निर्माण सूर्य की स्थिति पर निर्भर करती है और सूर्य की स्थिति (उतरायण या दक्षिणायण होना) नियत है। ऐसे में ITCZ का खिसकाव नियत होना चाहिए।

     अत: इस प्रकार इस सिद्धांत को भी अमान्य घोषित कर दिया गया है।


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20. मानसून क्या है?

20. मानसून क्या है?


मानसून क्या है?

      मानसून अनिश्चितताओं से भरा एक मौसमी हवा है जिसका प्रभाव सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों पर सदियों से देखा जा सकता है। यूनानी भूगोलवेता हिप्पार्कस ने सबसे पहले मानसूनी हवा के संदर्भ में अनुमान लगाया था। लेकिन मानसून की खोज करने का श्रेय अरब भूगोलवेत्ता अलमसूदी को जाता है। मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के मौसिम से हुआ है जिसका तात्पर्य है मौसम के अनुसार चलने वाली हवा।

    अनेक भूगोलवेत्ताओं ने मानसून को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनमें सर्वमान्य परिभाषा ब्रिटिश भूगोलवेता हेली के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इनके अनुसार “यह एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है।” जैसे:-

मानसून क्या है

(नोट: हैली– मानसून एक वृहत समुद्री स्थलीय समीर है, जो 6 माह सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 माह स्थल से सागर की ओर चलती है।

अरब भुगोलवेत्ताओं द्वारा- ऋतुवत वायु  की  दिशा में परिवर्तन को मानसून पवन कहा जाता है।)

मानसून का प्रकार

      भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए बताया है कि मानसून दो प्रकार के होते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण कटिबंधीय मानसून- इसका विस्तार भारत उप महाद्वीप, उ०-पू० ऑस्ट्रेलिया, द०-पू० ब्राजील, पूर्वी अफ्रीका इत्यादि में हुआ है।

(2) शीतोष्ण प्रदेश की मानसून – इसका विस्तार जापान, कोरिया, पूर्वी चीन इत्यादि में हुआ है।

     स्पष्ट है कि भारत का मानसून उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे पुन: दो भागों में बाँटा गया है:-

(1) दक्षिण-पश्चिम मानसून

(2) उत्तरी-पूर्वी मानसून

     दक्षिण-पश्चिम मानसून और उत्तर-पूर्वी मानसून में अन्तर

(i) द०-पश्चिम मानसून को ‘ग्रीष्मकालीन मानसून’ तथा उ०-पूर्वी मानसून को ‘शीतकालीन मानसून’ कहा जाता है। 

(ii) द०-प० मानसून ही भारत का प्रमुख मानसून है जबकि उ०-पूर्वी मानसून को गौण मानसून कहते हैं।

(iii) द०-प० मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर वर्षा करती है।

(iv) द०-प० मानसून के कारण भारत में लगभग 80% वर्षा होती है जबकि शेष वर्षा उ०-पूर्वी० मानसून और पछुआ विक्षोभ के कारण होती है।

(v) द०-प० मानसून भारत के अधिकांश क्षेत्रों की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है जबकि उत्तरी-पूर्वी मानसून पूर्वी तटीय क्षेत्र एवं तमिलनाडु के सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है।

(vi) द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से की जा सकती है जबकि उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

(vii) द०-प० मानसून की उत्पत्ति में उष्ण-पूर्वा जेट हवा का जबकि उ०-पू० मानसून की उत्पति में उपोष्ण पछुवा जेट हवा का योगदान है।

मानसून की विशेषताएँ 

(i) भारतीय मानसून अपने अनिश्चिताओं के लिए विश्व विख्यात है, तभी तो इसे औपनिवेशिक काल में यह कहा जाता था कि भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलता है क्योंकि भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रवेश 15 मई से मानी जाती है और 15 नवम्बर तक वह लौट जाती है। अगर किसी कारणवश इसके आने और जाने की तिथि में गड़बड़ी होती है या इस काल में लगातार 15 दिन वर्षा नहीं होती है तो भारतीय किसानों के फसल बर्बाद हो जाते हैं।

      पुनः इस काल में कहीं अतिवृष्टि की समस्या उत्पन्न होती है तो बाढ़ के कारण फसलें बर्बाद हो जाती हैं। अगर मानसून सामान्य रहा तो भारतीय किसानों के घर अन्न से भर जाते है। यही कारण है कि यह कहा जाता है कि “भारतीय किसान मानसून के साथ जुआ खेलता है”

      औपनिवेशिक काल में यह भी कहा जाता था कि “भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट का निर्माता है।” क्योंकि जिस वर्ष मानसून सामान्य रहती है उस वर्ष केन्द्र सरकार के द्वारा भारतीय लोगों को अनेक प्रकार की रियायतें दी जाती है।

      दूसरी ओर जिस वर्ष मानसून असफल रहता है उस वर्ष भारत की जनता रियायतों से वंचित रह जाती है। वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगती है।

(ii) मौसम विशेष की हवा- मानसून मौसम विशेष की हवा है, क्योंकि द०-प० मानसून ग्रीष्म ऋतु में समुद्र से स्थल की ओर चलती है जबकि उ०-पू० मानसून शीत ऋतु में स्थल से समुद्र की ओर चलती है। ऐसा सूर्य के उत्तरायण एवं दक्षिणायण होने के कारण होता है।

(iii) मानसून के कारण भारत में मुख्यतः दो प्रकार की वर्षा होती हैं।-

(a) पर्वतीय वर्षा और

(b) चक्रवातीय वर्षा

       भारत में पर्वतीय वर्षा मुख्यतः हिमालय के दक्षिणी भाग, उ०-पूर्वी भारत, तराई क्षेत्र, प० घाट के पश्चिमी ढाल के सहारे होती है जबकि शेष भारत में उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के कारण वर्षण का कार्य होती है।

      भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात का आगमन तीन बार होती है।

       प्रथम- मानसून आगमन के पूर्व (अप्रैल-मई) में पहली बार चक्रवात का आगमन होता है। इस चक्रवात को प० बंगाल में कालवैशाखी, असम में नार्वेस्टर, बिहार में अंधड़, पंजाब-हरियाणा में तूफान कहा जाता है। दक्षिण भारत में इस चक्रवात के कारण हल्की वर्षा रिकॉर्ड की जाती है जिसे ‘आम्रवृष्टि’ या ‘फूलों की वर्षा’ कहते हैं।

      दूसरा- चक्रवात का आगमन मानसून के दौरान होता है। यही चक्रवात मानसूनी हवा को समुद्रतटीय क्षेत्र से खींचकर आन्तरिक भागों में ले जाती है।

     तीसरा- चक्रवात का आगमन मानसून के समापन के दौरान होता है, इसके कारण पूर्वी तटीय क्षेत्र एवं तमिलनाडु में वर्षण का कार्य होती है।

(iv) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यंत ही अनियमित है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में औसतन 85 cm वर्षा होती है। जबकि वर्षा के वितरण का अगर अध्ययन किया जाय तो पाते हैं कि मासिनराम में लगभग 1100 cm वर्षा होती है जबकि जम्मू और कश्मीर के लेह एवं लदाख क्षेत्र तथा राजस्थान के रामगढ़ नामक क्षेत्र पर 25 cm जल से भी कम वर्षा होती है।

(v) मानसून के आने और जाने की तिथि अनिश्चित है। जैसे 15 मई के बाद ही मानसून को सक्रिय हो जाना चाहिए। पुन: 1 जून को पहली बारिश केरल के तट पर करते हुए 12-13 जुलाई के बीच भारतीय सीमा को लांघकर पाकिस्तान में प्रवेश कर जाना चाहिए लेकिन इस निर्धारित तिथि के अनुसार शायद ही मानसून का आगमन होता है।

      इसी तरह 15 अक्टूबर के बाद से इसमें लौटने की प्रवृति विकसित होनी चाहिए। लेकिन कभी-2 बहुत पहले ही या निर्धारित तिथि के बाद पीछे की ओर हटती है।

(vi) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। जैसे- कभी-2 एक ही महीना में अत्याधिक वर्षा दर्ज की जाती है जिससे बाढ़ की समस्या उत्पन्न होती है। पुन: कई महीनों तक शुष्कता की स्थिति बनी रहती है जिससे सुखाड़ की समस्या उत्पन्न होती है।

(vii) मानसून की विश्वसनीयता काफी संदिग्ध है क्योंकि जिन क्षेत्रों में वर्षा 200 cm से अधिक होती है। उन क्षेत्रों में प्रतिवर्ष 90% मानसून की सक्रिय होने की संभावना होती है। जबकि जिन क्षेत्रों में 50 cm से कम वर्षा होती है उन क्षेत्रों में 80% मानसून न आने की संभावना होती है।

निष्कर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त है। यही विशेषतायें भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों को व्यापक तौर पर (रूप में) प्रभावित करती है।


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31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

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15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

         भारत दक्षिण एशिया में अवस्थित एक विशालकाय देश है जिसका क्षेत्रफल 32,87,263 km है। इसका अक्षांशीय विस्तार 8°4’N से 37°6’N के बीच एवं देशान्तरीय विस्तार 68°7′ से 97°25′ के मध्य है। भारत एक उत्तरी गोलार्द्ध का देश है जो प्राचीन काल के गोंडवाना भूखण्ड के ऊपर अवस्थित है। भूगोलवेताओं ने भारत को भौगोलिक संरचना एवं उच्चावच के आधार पर मुख्यतः चार भौतिक इकाइयों में बांटा है। जैसे-

(1) उत्तर भारत का पर्वतीय क्षेत्र

(2) उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र

(3) दक्षिण भारत का पठारी क्षेत्र

(4) तटीय मैदानी क्षेत्र एवं द्वीपीय क्षेत्र

भारत का तटीय

चित्र: भारत की भौतिक इकाई

      भारत के दक्षिणी भाग 1600 km समुद्र के अंदर प्रक्षेपित है जिसके तीन ओर जलीय विस्तार हैं जिसके कारण प्रायद्वीप का निर्माण हुआ है। भारत की मुख्य भूमि समुद्र के साथ 6100 km समुद्री सीमा का निर्माण करती है। अगर द्वीपों के सीमा को जोड़ दिया जाय तो भारत की कुल समुद्री सीमा की लम्बाई 7516.6 km हो जाता है। भारत के तटीय क्षेत्र को मोटे तौर पर इसे दो भागों में बाँट कर अध्ययन करते हैं:-
(A) पश्चिमी तटीय मैदान

(B) पूर्वी तटीय मैदान

(A) पश्चिमी तटीय मैदान

       इसका विस्तार गुजरात से कन्याकुमारी तक हुआ है। इसके पश्चिम में अरब सागर और पूरब में पश्चिमी घाट पर्वत है। इसकी औसत चौड़ाई 64kn है। कहीं-2 पर पश्चिमी घाट पर्वत के कारण काफी संकीर्ण हो चुका है। मुम्बई के पास इसकी चौडाई मात्र 10 km रह जाती है जबकि नर्मदा एवं ताप्ती के मध्य इसकी चौड़ाई 80km हो जाती है। इस मैदान को पुन: कई उपभागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते हैं।

जैसे :-

(i) गुजरात का मैदान

(ii) कोंकण तट / मैदान

(iii) कन्नड़ का मैदान

(iv) मालावार का मैदान

        गुजरात के तटीय मैदान को पुनः दो भागों में बाँटते हैं।

(a) कच्छ का मैदान

(b) काठियावाड़ का मैदान
        कच्छ का मैदान पुनः दो भागों में वर्गीकृत है:-

(i) छोटा रण ऑफ कच्छ

(ii) बड़ा रण ऑफ कच्छ

       यह क्षेत्र 6 माह तक जल प्लावित रहता है। समुद्री जल से नमक का निर्माण किया जाता है। यह क्षेत्र भूकम्प प्रभावित क्षेत्र है। जगह-2 पर भूकम्प से निर्मित वलन का प्रमाण मिलता है।

      काठियावाड़ का मैदान गुजरात के दक्षिणी भाग में स्थित है। इस मैदान के मध्य में गिर की पहाड़ी अवस्थित है। इस मैदान में लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है।

       कोंकण तट का विस्तार उत्तर में दमन से गोवा तक हुआ है। यह काफी संकीर्ण तटीय मैदान है। मुम्बई कोंकण तट के किनारे ही अवस्थित है। कोंकण रेलवे का विकास इसी तट के सहारे किया गया है। मरमागाँव, न्वाशेवा जैसे प्रमुख वंदरगाह का विकास यहाँ किया गया है।

      कनन्नड़ का तट मुख्यतः कर्नाटक में अवस्थित है। पश्चिमी घाट के कारण यह अति संकीर्ण तटीय मैदान बन चुका है। इसी मैदान के पूरब में गरसोप्पा जलप्रपात अवस्थित है।

     मालाबार तट का विस्तार केरल राज्य में हुआ है। इसका उत्तरी सीमा मंगलोर से प्रारंभ होता है और अंत दक्षिण में कन्याकुमारी के पास होता है। यहाँ विशेष स्थलाकृति कयाल (पश्चजल स्थलाकृति) का विकास हुआ है।

     पश्चिमी तटीय मैदान की कुछ सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार से है। जैसे:-

(1) यह मैदान सीधा है।

(2) इस मैदान में जगह-2 पर बालू के टीले मिलते है।

(3) इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है।

(4) तेज गति से नदी के जल प्रवाह होने के कारण डेल्टा का अभाव मिलता है लेकिन नदियों का मुहाना ज्वार नद‌मुख का निर्माण करती है।

(5) यह मैदान पर्याप्त वर्षा ग्रहण करने के कारण सालों भर आर्द्र बनी रहती है।

(6) पश्चिमी तट पर कई प्राकृतिक पोताश्रय(बंदरगाह) का निर्माण हुआ है। जैसे- मुम्बई।

(7) गुजरात के तट पर उत्थान का प्रमाण मिलता है लेकिन कोंकण तट पर निमज्जन (धंसान) का प्रमाण मिलता है।

(B) पूर्वी तटीय मैदान

     यह मैदान पूर्वी घाट से लेकर बंगाल की खाड़ी के मध्य है। इसका दक्षिणी विस्तार कन्याकुमारी तक और उत्तरी विस्तार गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इसे उतरी सरकार और कोरोमंडल तट में बांटते हैं।

(नोट: कोरोमण्डल तट का विस्तार- तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश, उत्तरी सरकार का विस्तार- उड़ीसा)

       उत्तरी सरकार तट के मैदान को ‘उत्कल तट का मैदान’ भी कहते हैं।

पूर्वी तटीय मैदान की सम्मान्य विशेष‌ताएँ निम्नलिखित है।:-

(1) पश्चिमी तटीय मैदान की तुलना में यह काफी चौड़ा है।

(2) यह मैदान वक्राकार है।
(3) इस मैदान में नदियाँ बड़े-बड़े डेल्टा का निर्माण करती है।

(4) इस भाग में चिल्का, पुलीकट, कोलेरू जैसी झील मिलती है।

(5) कोरोमण्डल तट के पर निमज्जन का प्रमाण मिलता है।

(6) कोरोमण्डल तट के कावेरी डेल्टाई क्षेत्र अपनी उर्वरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

द्वीपीय समूह

      भारत के तटीय क्षेत्रों/मैदानों के नजदीक और उनसे दूर कई द्वीपों का विकास हुआ है। द्वीप एक ऐसी स्थलाकृति है जो जल के बीच में स्थित स्थल होता है। भारतीय द्वीपों का अध्ययन दो समूहों में बाँटकर करते है

(1) बंगाल की खाड़ी के द्वीप 

(2) अरब सागर के द्वीप

बंगाल की खाड़ी के द्वीप

      इसमें मुख्य द्वीप गंगा सागर द्वीप (गंगा नदी के मुहाना पर), न्यू मूर द्वीप (भारत), व्हीलर द्वीप (उड़ीसा), क्रोकोडाई द्वीप (मन्नार की खाड़ी में), हेयर द्वीप (तमिलनाडु), पम्बन द्वीप (तमिलनाडु) और अण्डमान निकोबार द्वीप समूह है।

     बंगाल की खाड़ी में लगभग 572 द्वीप है। इनमें से अण्डमान निकोबार द्वीप समूह सबसे प्रमुख है। इसमें द्वीपों की संख्या लगभग 300 है। इसका विस्तार लगभग 350 km तक हुआ है। केवल निकोबार में 19 द्वीप है। अण्डमान निकोबार द्वीप समूह असंगठित कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

       इसका निर्माण हिमालय पर्वत के निर्माण के दौरान संरक्षी सीमा के सहारे हुआ है।

    यहाँ बैरन और नारकोंडम जैसे ज्वालामुखी का भी प्रमाण मिलता है। इनमें से नारकोंडम मृत ज्वालामुखी का उदा० है जबकि बैरन प्रसुप्त ज्वालामुखी का उदाहरण है। यहाँ का इन्टरव्यू द्वीप और इंडरसन द्वीप चूना पत्थर से निर्मित है। अण्डमान द्वीप का सर्वोच्च चोटी माउण्ट सैडल (734m) और निकोबार की सर्वोच्च चोटी माउण्ट थुलीयर (642m) है। दक्षिण अण्डमान और लिटिल अंडमान के बीच में डंकन पैसेज अवस्थित है। भारत का सबसे दक्षिणी बिन्दु इंदिरा प्वाइंट निकोबार द्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है।

अरब सागर के द्वीप

     अरब सागर में तट से नजदीक और तट से दूर कई द्वीप मिलते हैं। जैसे- मूल द्वारिका (गुजरात), दीव (गुजरात), एलीफेण्टा द्वीप (महाराष्ट्र), अलियावेट, खलियाबेट द्वीप (नर्मदा नदी के मुहाना पर), जंजीरा द्वीप (महाराष्ट्र), हेनरी द्वीप, कैनेरी द्वीप, बुचर द्वीप (सभी महाराष्ट्र में), लक्ष्य द्वीप।

      अरब सागर में मिलने वाले द्वीपों में सबसे प्रमुख द्वीप लक्षद्वीप है। यह केरल से 280 km दूर पश्चिम में अवस्थित है। लक्षद्वीप प्रवाल भीति से निर्मित है। इसमें कुल 36 द्वीप है जिनमें से 11 द्वीप ही मानव बसाव के योग्य हैं। 11° चैनल लक्षद्वीप को दो भागों में बाँट देती है- उत्तर में अमिनी द्वीप और दक्षिण में कलानोरे द्वीप कहलाता है। मिनीकाय द्वीप लक्षद्वीप का सबसे दक्षिणी द्वीप है। एण्ड्रायट द्वीप लक्षद्वीप का सबसे बड़ा द्वीप है। लक्षद्वीप की औसत ऊँचाई 9-11 मी० है।

निष्कर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत अपने भौतिक विशेषताओं एवं विविधताओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

प्रश्न प्रारूप 

1. भारत की भौतिक इकाइयों का नाम लिखिए तथा तटीय मैदान तथा भारतीय द्वीपों का वर्णन कीजिए।

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

         दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी० है। इसका आकार एक  त्रिभुज के समान है। यह 1600 km हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750मी० मानी गयी है।

           प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल तथा गारो, खाँसी और जयन्तिया पर्वत सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करते हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे पठारों का पठार भी कहा जाता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषताएँ                

     प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेंजिया के चट्टानें पायी जाती है। प्रायद्वीपीय भारत की संरचनात्मक विशेषता का अध्ययन नीचे किया जा रहा है।

(i) दक्षिण भारत को जिसके चतुर्दिक मैदानी भूभाग है। भूगर्भवेताओं ने इसे प्रायद्वीपीय भारत से संबोधित किया है। जबकि इसके बाहर वाले क्षेत्र को अतिरिक्त प्रायद्वीपीय भारत (Extra peninsular India, प्रायद्वीपेत्तर भारत) से संबोधित किया है।

(ii) प्रायद्वीपीय भारत प्राचीनतम दृढ भूखण्डों से निर्मित है। इसका निर्माण मूलतः पृथ्वी की गैसीय अवस्था से ठोस अवस्था में परिणत होने की प्रक्रिया से जुड़ा है।

(iv) सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत समप्राय सतह का उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस सतह पर मोनैडनॉक, शंकु पहाड़ी, वलित पर्वत, ब्लॉक पर्वत, अवशिष्ट पहाड़ी, भ्रंश घाटी, ज्वालामुखी उदगार, उबड़-खाबड़ भूमि इत्यादि का प्रमाण मिलता है।

(v) दक्षिण भारत प्रायद्वीप के रूप में क्रिटेशियस कल्प में बना क्योंकि गोंडवाना लैण्ड में भ्रंशन की क्रिया से अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अण्टार्कटिका महाद्वीप विलग हो गये।

(vi) प्रायद्वीपीय भारत के मूल या मौलिक चट्टानों का निर्माण आर्कियोजोइक महाकल्प में हुआ था। इस महाकल्प के चट्टानों में ग्रेनाइट और नीस प्रकार के चट्टान मिलते हैं। इन चट्टानों के रूपान्तरण से शिष्ट एवं चारकोनाइट चट्टानों का निर्माण हुआ है।

(vii) प्रायद्वीपीय भारत अधिकांश क्षेत्र कभी भी समुद्र के अन्दर नहीं गया है। प्रायद्वीपीय भारत को ‘भूकम्प रहित क्षेत्र’ माना जाता है। इस पर दीर्घकालिक अपरदन के कारण चट्टानों के जब‌ड़दस्त अपरदन हुआ है।

(viii) कर्नाटक, उड़ीसा, तमिलनाडु इत्यादि में धाड़वाड़ की चट्टानें मिलती है जो प्राचीनतम परतदार चट्टानों का उदाहरण है। यह धात्विक ‘खनिजों’ के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(ix) प्रायद्वीपीय भारत में कुडप्पा एवं विन्ध्यन क्रम की कई चट्टानें मिलती है। इस क्रम की चट्टानों में चुना पत्थर और  बलुआ पत्थर की चट्टानें सबसे प्रमुख है।

(x) कार्बोनीफेरस कल्प में आये हिमयुग का प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इनका प्रमाण भी दक्षिण भारत में मिलता है। इसका प्रमाण दामोदरी, महानदी, गोदावरी नदी घाटी में देखा जा सकता है।

(xi) प्रायद्वीपीय भारत का दक्षिणी भूभाग दक्कन का पठार कहलाता है। इसका निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए ज्वालामुखी उद्‌गार से हुआ है। क्रिटेशियस कल्प में दरारी ज्वालामुखी उद्भेदन की क्रिया होने के कारण भूगर्भ से क्षारीय प्रकार की लावा बड़े पैमाने पर बाहर की ओर निकला जो फैलकर एवं ठण्डा होकर दक्कन के पठार का निर्माण किया। आज इसी लावा के ऋतुक्षरण से दक्कन के पठार पर काली मिट्टी का प्रमाण मिलता है।

        क्रिटेशियस कल्प में कुछ केन्द्रीय उद्‌गार भी हुए थे जिससे छोटे-2 शंकु पहाड़ियों का भी निर्माण हुआ है। इनके मुख से जब लावा निकलना बंद हो गया तो अनेक क्रेटर और कॉल्डेरा का निर्माण हुआ है। इसी क्रेटर और कोल्डेरा में जल के जमाव से दक्षिण भारत में अनेक तालाबों का विकास हुआ है।

(xii) प्रायद्वीपीय भारत की संरचना पर भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। जैसे- भूसंचलन के ही कारण नर्मदा, ताप्ती और दामोदर नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है। सतपुड़ा जैसे ब्लॉक पर्वत का निर्माण हुआ है। यहाँ तक की पश्चिमी घाट का पश्चिमी ढाल धँसकर तीव्र ढाल का निर्माण करती है।

(xiii) कार्बोनिफेरस कल्प में हुए भूसंचलन के कारण सतह पर स्थित वनस्पति भूगर्भ के अंदर दब गये जिसके कारण कोयला जैसे संरचना का निर्माण हुआ है।

(xiv) विगत 20 करोड़ वर्ष से पठारीय भारत में कोई नवीन भूगर्भिक संरचना का विकास नहीं हुआ है। केवल 7 करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के निर्माण हो रहा था तो उस वक्त प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में केवल उत्थान का प्रमाण  मिलता है।

प्रायद्वीपीय भारत की संर

चित्र: प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

        इस तरह स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत जटिल भूगर्भिक संरचना रखने वाला एक भूखण्ड है।

प्रश्न प्रारूप 

1. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना का संक्षिप्त रूप में चर्चा करें।

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

       10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र


उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

              प्रायद्वीपीय पठार और हिमालय के बीच ‘उत्तर भारत का विशाल मैदान’ अवस्थित है जिसका क्षेत्रफल 7.5 लाख वर्ग किमी० है। उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र मूलत: उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल पर्वत, पश्चिम में किर्थर और सुलेमान तथा पूरब में पूर्वांचल हिमालय से घिरा हुआ है। भारतीय क्षेत्र में इसकी लम्बाई 2400 km है। पश्चिम में इसकी चौ० लगभग 500Km और पूरब में 150km है।

उत्तर भारत का विशाल

चित्र: उत्तर भारत का विशाल मैदान

        यह मैदान मूलत: सिन्धु, गंगा, यमुना और ब्रह्मपुत्र नदी और उनके सहायक नदियों द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से बना है। उत्तर के मैदानी क्षेत्र को कई भौगोलिक इकाई में वर्गीकृत कर अध्ययन किया जा सकता है। जैसे-

(A) सिन्धु सतलज का मैदान

(B) थार मरुस्थलीय क्षेत्र

(C) गंगा-यमुना का मैदान

(D) ब्रह्मपुत्र का मैदान

(A) सिन्धु-सतलज का मैदान

          इसे “पंजाब का मैदान” भी कहते हैं। इसका निर्माण सिन्धु और उसके पाँच सहायक नदी जैसे- सतलज, व्यास, चिनाब, रावी, झेलम नदी के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से बना है।

       पंजाब के मैदान का विस्तार भारत के पंजाब, हरियाणा और उत्तरी राजस्थान में हुआ है। इस क्षेत्र की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 200m से भी कम है। इसका निर्माण प्लोस्टोसीन कल्प में हुआ है। इस क्षेत्र में कहीं-कहीं शुष्क नदियाँ और शुष्क क्षारीय झील पायी जाती हैं जिसे स्थानीय लोग “धांड़” के नाम से जानते हैं। कहीं-2 पुराने नदियों के सँकरे घाटी का प्रमाण मिलता है जिसे स्थानीय लोग ‘घोरोस’ या ‘तल्ली’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदानी क्षेत्र में कई नदी-दोआब का विकास हुआ है। यहाँ दोआब का तात्पर्य दो नदियों के बीच वाला क्षेत्र से है। कुछ दोआब के उदाहरण निम्नलिखित है:-

(1) बिस्त दोआब (व्यास और सतलज)

(2) बारी दोआब (व्यास और रावी)

(3) रचना दोआब (रावी और चिनाव)

(4) चाझ दोअब (चिनाव और झेलम)

(5) सिन्धु सागर दोअब (सिन्धु, चिनाव और झेलम)

       सिन्धु की सहायक नदियाँ जब शिवालिक पर्वत को पार करती है तो उसे कई जगह अपरदन कर काट डालती है। इस कटे हुए भूभाग को स्थानीय लोग ‘चो’ कहते हैं। इस मैदान में नदियाँ जब आगे की ओर बहती हैं तो अपने किनारे को काटकर ‘ब्लफ’ का निर्माण करती है। स्थानीय लोग ब्लफ को ‘धाया’ से सम्बोधित करते हैं। इस मैदान का ढाल मूलत: उत्तर-पूरब से दक्षिण-पश्चिम की ओर है। इस तरह स्पष्ट है कि सिन्धु सतलज का मैदान की एक अलग पहचान है। इसकी पहचान का दूसरा कारण उर्वर भूमि पर बड़े पैमाने पर कृषि कार्य किया जाना है। इस मैदान को ‘अन्न  के भण्डार’ नाम से सम्बोधित करते हैं।

(B) थार मरुस्थल

         यह भारत के उत्तर के मैदान का ही एक भाग है। थार मरुस्थल का विस्तार भारत और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसकी लम्बाई 640 km और चौड़ाई 160 km है। अरावली पर्वत के दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर की ओर स्थित होने के कारण यह प्रदेश शुष्क क्षेत्र में बदल चुका है। इस क्षेत्र में सरस्वती नदी कभी मुख नदी के रूप में प्रवाहित होती थी। लेकिन, अब मरुस्थलीय वातावरण के कारण यह विलुप्त हो चुकी है। इस क्षेत्र का ढाल दक्षिण-पक्षिम की ओर है।

         थार मरुस्थलीय क्षेत्र मिसोजोइक कल्प तक अरब सागर में डूबा हुआ था। होलोसीन कल्प के प्रारंभ में हुए भूसंचलन के कारण अरब सागर का उत्तरी भाग ऊपर की ओर उठ गया और दक्षिण वाला भाग धँस गया जिसके कारण उत्तर का जल दक्षिण की ओर प्रवाहित हो जाने से समुद्री भूखण्ड ऊपर की ओर आ गये। आज भी इस क्षेत्र में खारे पानी की कई झीलों का प्रमाण मिलता है। जैसे- साँभर झील, डीडवाना झील, पिछौला झील (उदयपुर)।

         शुष्क प्रदेश के कारण चट्टानों के ऋतुक्षरण से बालू का विकास बड़े पैमाने पर हुआ है। इस क्षेत्र में बरखान, गारा, बालुका स्तूप जैसे कई मरुस्थलीय स्थलाकृति मिलते हैं। छोटी-2 नदियों के द्वारा लायी गई मलवा के निक्षेपण से निर्मित मैदान को स्थानीय लोग ‘रोही’ के नाम से सम्बोधित करते हैं।

(C) ब्रह्मपुत्र का मैदान

          इसका विस्तार भारत के उत्तरी-पूर्वी भाग में हुआ है। इसका विस्तार उत्तर में हिमालय, दक्षिण में गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी, पूरब में पटकोईबुम की पहाड़ी तथा पश्चिम में तिस्ता नदी के मध्य हुआ है।

          यह मैदान असम के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। यह मैदान मूलत: ब्रह्मपुत्र और उसके सहायक नदी जैसे दिहांग, बराक, धनश्री, सुवर्णश्री और तिस्ता नदी के द्वारा लायी मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान मूलत: रैम्प घाटी में अवस्थित है। इसका निर्माण कार्य आज भी चल रहा है। भारत का आज भी यह बाढ़ प्रभावित इलाका है। इसका ढाल पूरब से पश्चिम की ओर है। बंगलादेश में इसकी ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। समुद्रतल से इसकी ऊँचाई 50m से 200m हो जाती है।

         कम ऊँचाई होने के कारण जगह-2 दलदली भूमि का विकास हुआ है। ब्रह्मपुत्र नदी अपने मार्ग में विश्व की सबसे बड़ी नदी द्वीप माजुली का निर्माण करती है।

(D) गंगा-यमुना का मैदान

             गंगा-यमुना के मैदान का विस्तार भारत के उत्तरी भाग में हुआ है। इसके उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूरब में राजमहल की पहाड़ी और पश्चिम में अरावली की पहाड़ी है। इस मैदान में गंगा नदी रीढ़ की हड्‌डी के समान प्रवाहित होती है। हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियाँ गंगा नदी में ही आकर मिलती है। इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूर्व की ओर है। यह समुद्रतल से 0-300m ऊँचा है। गंगा नदी इस मैदान को दो भागों में बाँट डालती है।- प्रथम उत्तरी गंगा का मैदान और द्वितीय दक्षिणी गंगा का मैदान।

           उत्तरी गंगा के मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है जबकि दक्षिणी गंगा के मैदान का ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है। उत्तरी गंगा का मैदान स्थानीय आधार पर कई उपविभागों में विभक्त है। जैसे:-

(1) रोहिलखण्ड का मैदान,

(2) अवध का मैदान,

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान,

(4) मिथलांचल का मैदान

         इसी तरह दक्षिणी गंगा के मैदान भी स्थानीय आधार पर निम्न भागों में विभक्त हैं:-

(1) बुंदेलखण्ड का मैदान

(2) इलाहाबाद का मैदान

(3) भोजपुर का मैदान

(4) मगध का मैदान

(5 ) अंग का मैदान

गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति

         गंगा-यमुना मैदान की उत्पत्ति के संबंध में कई विचार प्रकट किये गये हैं। जैसे:-

(1) ओल्डहम:- “संरचनात्मक दृष्टिकोण से यह मैदान हिमालय के आगे का गर्त (Fore Deep) है, जिसमें नदियों के द्वारा लाये गये अवसाद का औसतन 500m गहरा निक्षेपण से बना है।”

(2) एडवर्ड स्वेस:- “हिमालय निर्माण के समय यहाँ पर एक गर्त था जिसे भूसन्नति (Geo-syncline) कहा जाता था। इसी भूसन्नति में हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत की नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा के निक्षेपण से इस मैदान का निर्माण हुआ है।”

(3) बुरार्ड:- “इसका निर्माण हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार के बीच में स्थित रिफ्ट घाटी में नदियों के द्वारा लायी मलवा के विक्षेपण से हुआ है। इन मैदान के निर्माण पर प्लीस्टोसीन काल हुए भूसंचलन का भी प्रभाव पड़ा है। आज भी हिमालय से निकलने वाली नदियाँ मलवा का निक्षेपण कर रही हैं जिससे इसका निर्माण कार्य जारी है।” यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

        संरचनात्मक दृष्टिकोण से गंगा-यमुना के मैदान को चार भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे-

(1) भावर प्रदेश

           भावर का विस्तार शिवालिक पर्वत के दक्षिण में हुआ है। यह पश्चिम में पोटवार के पठार से लेकर पूरब में तिस्ता नदी तक विस्तृत है। इसकी चौड़ाई 8 से 16km है। इसकी औसत ऊँचाई समुद्रतल से 150-250m है।

भावर की उत्पत्ति

         इसका निर्माण हिमालय से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गई बोल्डर क्ले के निक्षेपण से हुआ है।

चित्र: गंगा-यमुना मैदान की संरचना

भावर की विशेषता

(1) यह बोल्डर क्ले नामक कंकड़-पत्थर से निर्मित है।

(2) इसका निर्माण शिवालिक पर्वत के पदस्थली में हुआ है क्योंकि मंद ढाल के कारण बड़े-2 और मोटे चट्टानों का निक्षेपण सबसे पहले होता है।

(3) हिमालय से निकलने वाली नदियाँ इस क्षेत्र में आकर विलुप्त हो जाती है जिससे खण्डित नदी प्रवाह का विकास होता है।

(4) कहीं -2 जल जमाव वाले क्षेत्रों में द‌लदली भूमि का विकास हुआ है।

(5) भावर क्षेत्र में कई जलोढ़ पंख और जलोढ़ शंकु का भी प्रमाण मिलता है।

(6) भावर प्रदेश पर्वत और मैदान के बीच संक्रमण पेटी का क्षेत्र है।

(2) तराई प्रदेश

         भाँवर के दक्षिण में तराई प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण नमी युक्त चिपचिपी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 150-200m और चौड़ाई 15-30Km है। यह अत्याधिक नमीयुक्त वाला क्षेत्र है। जहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती है। यह घने जंगलों से ढका हुआ है। कहीं-2 दलदली भूमि का भी विकास हुआ है। भावर क्षेत्र में जो नदियाँ विलुप्त हो गयी थी वे इस प्रदेश (तराई प्रदेश) में दिखाई देने लगती है।

          उष्णार्द्र वातावरण के कारण तराई क्षेत्र मलेरिया के लिए प्रसिद्ध है। इसी प्रदेश में थारू जनजाति के लोग सदियों से निवास करते आ रहे हैं। लेकिन, भारत विभाजन के बाद तराई प्रदेश में सिखों के बसाए जाने के कारण थारूओं की भूमि को हड़प लिया है। तराई प्रदेश में ही मुजफ्फरपुर से मुजफ्फर नगर तक विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(3) बाँगर प्रदेश

       इसे पुरानी जलोढ़ मिट्टी के नाम से जानते हैं। यहाँ बाढ़ की समस्या उत्पन्न नहीं होती है। इसकी औसत ऊँचाई 100-15om है। बाँगर का विस्तार ऊपरी गंगा के मैदान और दक्षिणी गंगा के मैदान में हुआ है। मुरादाबाद के पास बागर क्षेत्र में बालू के बड़े-2 टीले मिलते हैं। जिसे भूर कहते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में बांगर के साथ लैटेराइट मिट्टी से युक्त मैदान मिलता है जिसे बारिन्द्र कहते हैं। बांगर प्रदेश भारत में ‘खाद्यान्न फसल पेटी’ के रूप में प्रसिद्ध है।

(4) खादर प्रदेश

         इसे नवीन जलोढ़ मिट्टी कहते हैं। पंजाब के लोग इसे “बेट भूमि” से सम्बोधित करते हैं। इसका निर्माण नदियों के द्वारा लायी गयी महीन और चिकनी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। ये आज भी बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र हैं। नदियों के मुहानों पर खादर के निक्षेपण से ही डेल्टा का निर्माण हुआ है।

निष्कर्ष

         उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के लिए प्रसिद्ध है। इसकी संरचनात्मक विशेषताएँ और विस्तार ही इसे विश्व का सबसे बड़ा जलोढ़ का मैदान के रूप में मान्यता दिलवाता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत के मुख्य भू–आकृति विभाग के नाम लिखे। सिंधु–गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान का वर्णन करे।

2. भावर तथा तराई से आप क्या समझते हैं? संक्षिप्त में उनकी विशेषता बताये।

3.  भावर क्या है? शिवालिक की पदस्थली के बराबर इसका विकास क्यों हुआ?

4. भारत का उत्तरी मैदान हिमालय और प्रायद्वीपीय पठार से नदियों के द्वारा लायी उत्कृष्ट जलोढ़ का उदाहरण है। इस तथ्य की सत्यता की जाँच करें।

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