Archives September 2023

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



      राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

      बाढ़ के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है जिसकी चर्चा नीचे के शीर्षक में किया जा रहा है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

          मानसून अपने अनिश्चिता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अति अनुकूल मानसून के स्थिति में भारी वर्षा होती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। मानसून के अनिश्चितता की व्याख्या करने के लिए तापीय सिद्धांत, पछुआ हवा सिद्धांत, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और एल-नीनो सिद्धांत दिया गया है। लेकिन अंतिम दो सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।

(ii) वनों का विनाश और मृदाक्षरण-

        वनों के विनाश से सतह की मिट्टी कमजोर होती है और कमजोर होने की स्थिति में वर्षा के बाद मिट्टी का तेजी से अपरदन होता है जिससे चट्टानें नग्न अवस्था में आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप नग्न चट्टानों में ग्राहय क्षमता निम्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब पुनः वर्षा होती है तो बहाव तेज हो जाता है और बेसिन क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। शिवालिक प्रदेश में और मुख्यतः हिमाचल प्रदेश में जलस्तर का गिरना और पंजाब में बाढ़ आने की समस्या इससे जुड़ी हुई है।

       उत्तर-पूरब भारत और गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। हाल के वर्षों में राजस्थान और गुजरात आदि जैसे राज्यों में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है। यह निम्न वर्ष का क्षेत्र है लेकिन जब आकस्मिक तीव्र वर्षा होती है तो नग्न चट्टानों पर जल का बहाव तेजी से होता है और आकस्मिक बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न करता है।

(iii) नदी के ताली में मालवों का जमाव-

          खास करके मैदानी भारत में नदियों का ढाल अत्यंत ही निम्न है। ऐसी स्थिति में चौड़ी घाटी के तली पर मलवे का जमा हो जाता है और मानसून ऋतु में जलस्तर तेजी से ऊपर उठ जाता है और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले बाढ़ इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

(iv) नदियों के स्रोत क्षेत्र में भारी वर्षा का होना-

      हिमालय का दक्षिणी ढाल पर वर्षा अत्यधिक होती है। इसका परिणाम यह है कि मैदानी क्षेत्र में कम वर्षा के बावजूद बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे वर्षा नेपाल में होने के कारण उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(v) नदियों के मोड़दार प्रवाह-

       मोड़दार नदियों के प्रवाह से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। यह स्थिति मुख्यत: पूर्वी गंगा के मैदान में देखने को मिलती है। पश्चिमी पंजाब और हरियाणा में समानांतर बहने वाली नदियों का जल वृहत क्षेत्र में नहीं फैलता है जबकि पूर्वी भारत की मोड़दार नदियां जल को बहुत क्षेत्र में फैला देती है।

(vi) उच्च ज्वार-

      तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवात के साथ आने वाले उच्च ज्वार भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी स्थिति में नदी का मुहाना बंद हो जाता है और नदी का जल पीछे धकेला जाने लगता है जिससे नदियों के जलस्तर में उछाल आता है। उठता हुआ जल वृहत क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। इसी प्रक्रिया से गोदावरी, महानदी, कृष्ण, कावेरी आदि के बेसिन क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(vii) भूस्खलन-

       उत्तरी-पूर्वी भारत के हिमाचल प्रदेश में भू-स्खलन से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े भूस्खलित होकर नदियों में चली जाती है और मार्गों को अवरुद्ध कर देती है जिससे नदियों के ऊपरी भाग में पानी फैल कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। हिमाचल प्रदेश में तिब्बत की ओर से आने वाली पारछु नदी के कारण कुछ वर्ष पहले ही गंभीर बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई थीपरिछु नदी

(viii) नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन-

          पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव के कारण मैदानी भारत की नदियां मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उत्तर भारत की नदियां प्राय: उत्तर से दक्षिण की तरफ बहती है लेकिन घूर्णन गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। ऐसी स्थिति में बड़ी नदियों के जाल में घूर्णन के विपरीत दिशा में प्रवाह की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिसे नदियों के पश्चिमी तट का अपरदन अधिक होता है। ऐसी स्थिति में नदी में स्थानांतरण की प्रवृत्ति होती है जिससे कई नदियों के द्वारा पुराना मार्ग का निर्माण हो जाता है। वहां वर्षा के दिनों में जल जमाव की स्थिति होती है जो की बाढ़ की स्थिति का दो तक द्योतक है।

(ix) पठारीय स्थित-

        पठारीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों में भी बाढ़ आती है। यहां धरातल पर अगम्य चट्टानों की उपस्थिति तथा तीव्र वर्षा के कारण बार की स्थिति उत्पन्न होती है। लेकिन बाढ़ की अवधि लंबी नहीं होती है। नदियों के ढाल तीव्र होते हैं, इसलिए पानी तुरंत बह जाती है।

(x) गंगा द्वारा सहायक नदी के जल स्रोतों में अवरोध-

         गंगा मैदानी भारत की रीढ़ के समान एक विशाल नदी है जिसमें उत्तर एवं दक्षिण दिशा से आकर अनेक नदियां मिलती है। जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर रहा होता है, ठीक उसी समय अगर सहायक नदियों का भी जलस्तर ऊपर उठने लगता है तो सहायक नदी के जल को गंगा ग्रहण नहीं कर पाती है जिसके परिणामस्वरुप सहायक नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी तरह नदियों के संगम वाले स्थान पर सहायक नदी गंगा के स्वतंत्र जल के प्रवाह को बाधित करती है, जिसके कारण ऊपरी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(xi) उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र की बनावट-

         उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के बीच कभी टेथिस सागर का गर्त रहा है। इसी में मालवा के जमाव से मैदानी क्षेत्र का यहाँ निर्माण हुआ है। यह क्षेत्र आज भी टेथिस सागर के छाड़न क्षेत्र के रूप में जो वर्षा ऋतु में अस्थाई समुद्र में बदलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(xii) मानवीय कारण-

         मानव निर्मित बड़े-बड़े बांधों का जलस्तर जब ऊपर उठने लगता है तो अचानक जल को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। फरक्का बांध के कारण बांग्लादेश में बाढ़ आती है। मैटूर डैम के कारण कावेरी के डेल्टाई क्षेत्रों में बाढ़ आती है। टिहरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बाढ़ आने की संभावना रहती है।

         आधुनिक युग में नगरीय बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है जो पूर्ण रूपेण मानवीय कर्ण के कारण उत्पन्न होती है। जैसे नगरों में मकानों के जंगल कंक्रीट के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। जल रिचार्ज वाले क्षेत्रों पर मकान बना दिए गए हैं। नालियों में पॉलिथीन के जमाव के कारण प्रवाह रुक जाने से आकस्मिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

बाढ़ वाले क्षेत्रों का वितरण

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार भारत में 342 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी भारत में स्थित है। गहनता के दृष्टि से असम सर्वाधिक प्रतिकूल क्षेत्र है लेकिन वास्तविक हानी के दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य प्रमुख है।

     राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ आते हैं। कुल हानि का दो-तिहाई भाग उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में होता है। 60% बाढ़ प्रभावित क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में स्थित है और बाढ़ के विभिषका के लिए कभी कोसी, दामोदर, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां प्रसिद्ध थी। कभी कोसी बिहार का शोक तो दामोदर को बंगाल का शोक कहा जाता था लेकिन वर्तमान समय में कुछ नवीन नदियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को विस्तार दिए हैं जिसमें महानदी और तीस्ता नदी प्रमुख है।

          बाढ़ के प्रभाव का समय सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं होता है। सबसे लंबी अवधि ब्रह्मपुत्र के मैदान में होती है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रभाव 6 सप्ताह तक या अधिक रहता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इसका प्रभाव 4 से 6 सप्ताह होते होता है।

       पूर्वी तटवर्ती मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में इसका प्रभाव 1 से 3 सप्ताह तक रहता है तथा पंजाब, नर्मदा और ताप्ती के घाटियों में सामान्यत: इसका प्रभाव एक सप्ताह होता है और आकस्मिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव एक सप्ताह से कम होता है। लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ के बारंबारता अधिक होने के कारण कुल प्रभाव का समय 4 सप्ताह से अधिक हो जाता है। बाढ़ प्रणव क्षेत्र को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।-

भारत में

समाधान हेतु किया गया प्रयास-

           आजादी के पूर्व इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था। जो भी प्रयास हुए हैं वह आजादी के बाद के हैं। इन प्रयासों में नदी घाटी प्रदेश के विकास की एकीकृत योजना सबसे प्रमुख है। इसके अंतर्गत बहुउद्देशीय नदी घाटी योजना सबसे प्रमुख है। यह ऐसी योजना है जो बाढ़ और सुखे दोनों ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। दामोदर पर डीवीसी और कोसी पर हनुमान नगर में, गंडक पर भैंसा लोटन में बांध बनाकर बाढ़ की समस्या एवं प्रभाव को कम किया गया है।

         इस योजना के साथ वनों का विकास, वृक्षारोपण तथा मृदा संरक्षण जैसी भी एकत्रित योजनाएं चल रही है। सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम संपूर्ण भारत में चलाया जा रहा है। वन रोपण कार्यक्रम में नदी के स्रोत क्षेत्र में प्रमुख रूप से वृक्ष लगाए जा रहे हैं ताकि मृदा कटाव को रोककर बार की समस्या को कम कर सके।

      बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक विशिष्ट कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में मृदा संरक्षण हेतु बेडिंग तथा कंटूर कृषि का विकास किया जा रहा है। बेडिंग के तहत छोटी-छोटी सरिताओं के प्रवाह को बाधित करने का प्रयास किया जाता है जबकि कन्टूर कृषि के तहत पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च रेखा के सहारे जुताई का कार्य किया जाता है ताकि मृदा का अपरदन न हो सके।

      भारत में पर्वतीय क्षेत्रों एवं वन्य क्षेत्रों में झूम कृषि के द्वारा वनों का विनाश हो रहा है। अतः इसे रोकने के लिए 1976 ई० में ही “झूम प्रीवेंशन फार्मिंग एक्ट” का निर्माण किया गया था। इससे वनों का संरक्षण होगा और बंजर भूमि का विकास नहीं होगा इससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

       बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए बाढ़ के पूर्व सूचना देने का भी प्रयास किया जा रहा है और इस दिशा में विशेष कार्य भारतीय बाढ़ आयोग और भारतीय मौसम विज्ञान ने किया है। वर्तमान समय में कृत्रिम उपग्रहों का सहारा लेकर सात केन्द्रों पर बड़े और 147 स्थानों पर छोटे भविष्यवाणी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनका 57% भविष्यवाणी सही रहता है। बड़े केंद्र के रूप में है- भुवनेश्वर में महानदी पर, दिल्ली में यमुना नदी पर, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर, जलपाईगुड़ी में तीस्ता नदी पर, लखनऊ में गोमती नदी पर, पटना में गंगा पर और सूरत में ताप्ती नदी पर स्थापित किया गया है।

          बाँध, तटबंध, विशिष्ट प्रकार के खुले पूल और जल निकासी का विकास कार्य भी वृहत स्तर पर किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा है। इन बचाव कार्यक्रम के तहत 1954 से 1987 के बीच 14511 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया था। 2838 किलोमीटर जल निकासी का विकास किया गया था।

          नदी के तली से मलवों को निकालने का कार्यक्रम बहुत खर्चीला है। सामान्यत: यह कार्य उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहाँ नदी का उपयोग नावों के लिए किया जाता है।

        ऊपर वर्णित कार्यक्रमों के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में बाढ़ हेतु विशिष्ट राशियों का आवंटन होता है। जैसे प्रथम पंचवर्षीय योजना में 13.77 करोड रुपए आवंटित किए गए थे। जबकि आठवीं में 1623 करोड रुपए जारी किए गए थे।

        बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई तात्कालिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इसके लिए पैसों का आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवीं वित्त आयोग के अनुसार हानि की समीक्षा का कार्य केंद्र सरकार का होगा। केंद्र द्वारा समीक्षा कर केंद्रीय सहयोग शुरू किया जाएगा। सरकार बाढ़ संभावित वाले क्षेत्र से बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है।

        बाढ़ आ जाने पर बाढ़ राहत कार्यक्रम चलती है। हेलीकॉप्टर, गोताखोरों, प्लास्टिक बोट का सहारा लेती है। भोजन के पैकेट का वितरण करती है। पेयजल हेतु जलापूर्ति किया जाता है। मवेशियों हेतु चारा उपलब्ध कराए जाते हैं। बाढ़ समाप्त होने पर अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव हेतु टीका, दवा का प्रबंध करती है। जल निकासी, संचार व्यवस्था और परिवहन आदि का प्रबंध किया जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावे स्वंय सेवी संस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।

सुझाव-

        यद्यपि बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई प्रयास किया जा रहा है फिर भी समस्या लगभग यथावत है। अतः इस समस्या से निपटने हेतु और अधिक पेनिट्रेटिव योजनाओं की जरूरत है। पुनः टिकाऊ विकास नीति के अंतर्गत ऐसी योजनाओं की जरूरत है जिसमें पर्यावरण के असंतुलन किए बगैर इन समस्याओं का समाधान किया जा सके।

      बाढ़ एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में ऐसी कृषि का विकास किया जाए जो बाढ़ के स्थिति में भी उग सके। जैसे चावल के ऐसे किस्म विकसित किए जाए जो 15 से 20 दिन तक चल मग्न रहने पर भी स्वस्थ रहें। द्वितीय जल कृषि का विकास किया जाए। इसके लिए मखाने, सिंघाड़े की खेती किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर मछली का पालन किया जा सकता है।

        बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण तकनीक को विकसित किया जाए। बाढ़ वाले क्षेत्रों में सीमेंट एवं ईट से मकान निर्माण की गतिविधि को प्रोत्साहित किया जाए।

       बाढ़ वाले क्षेत्रों में ऐसे पुल निर्माण तकनीक पर बल दिया जाए जिससे जल ऊपर एवं नीचे दोनों से आसानी से बह सके। इसके लिए खुला पुल का निर्माण सर्वाधिक उपयोगी होगा। इसके साथ ही वानिकी कार्यक्रम और अन्य विकास कार्यक्रम को भी तीव्रता से लागू करने की आवश्यकता है।

         भारत में बाढ़ नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा नेपाल से आने वाली नदियों के जल को रोका जाना है। अतः इस कार्य के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून को पालन करना पड़ता है। ऐसे में भारत सरकार एवं राज्य सरकारें नेपाल से आने वाली नदियों को अनेक चैनलों में विभाजित कर गंगा नदी में जल को गिराकर समाधान का प्रयास करना चाहिए।

      बाढ़ प्रणव वाले क्षेत्रों में कृत्रिम उपग्रह के माध्यम से सूचना तंत्र को और प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।

       भूमि जल रिचार्ज करने वाले तकनीक को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके लिए जोहार, आहरा, कच्चे कुआं एवं तालाब, पाइन इत्यादि को पुर्नोद्धार किया जाए।

        बाढ़ राहत कार्यक्रम को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सही तरीके से चलाया जाए। अंततः क्रांति के तहत नदी जोड़ो कार्यक्रम को अतितीव्र गति से कार्य रूप दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां पर बड़े बांध और छोटे बांधों का निर्माण किया जाए। नगरों में “वाटर हार्वेस्टिंग” को अनिवार्य गतिविधि के रूप में शामिल किया जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र, समाधान के दिशा में किया गया प्रयास एवं सुझाव की चर्चा करें।

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



परिभाषा- 

          भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

कारण-

       सूखे की स्थिति के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

        इसे फ्लोन का विषुवतीय पछुआ सिद्धांत, जेट स्ट्रीम व एल-नीनो से स्पष्ट किया जा सकता है।

(ii) वनों की कटाई व मृदा का अपरदन-

        वनों की कटाई से वायुमंडलीय आर्द्रता में कमी और तापमान में वृद्धि होती है, जिससे बादल निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है और वर्षा के अभाव में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

       मृदा अपरदन से मिट्टी का ऊपरी सतह अपरदित हो जाता है और नग्न चट्टाने दृष्टिगत होने लगती है। नग्न चट्टानों की जल ग्राहय क्षमता कम होती है। इससे प्रदेश का भूमिगत जलस्तर नीचे चला जाता है और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       पुन: मिट्टी के नमी में कमी आने से फसल मारी जाती है। ऐसी समस्या झारखंड के चतरा और पलामू बिहार के भभुआ और नवादा आदि जिलों में पाई जाती है। ऐसी ही समस्या चंबल, बेतबा और केन नदी के बेसिनों में भी मिलती है।

(iii) तापमान में वृद्धि-

        यह कारक मूलत: जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। इससे वायुमंडलीय तापमान में लगातार वृद्धि की स्थिति है। नग्न चट्टानें सूर्याताप के प्रभाव में आ जाती है और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया तेजी से होने लगती है और अधिक ताप के ही वाष्प संघनित नहीं हो पाते हैं, जिससे वर्षा नहीं हो पाती है। उत्तर भारत के पठारीय क्षेत्रों में सूखे के स्थिति का प्रमुख कारण यही है। साथ ही चंबल घाटी से लेकर झारखंड के चतरा जिला के बीच सूखा के लिए यही कारण प्रमुख है।

(iv) असमान वर्षा का वितरण-

          संपूर्ण भारत में वर्षा का वितरण असमान होने के कारण भी सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। न्यून वर्षा क्षेत्रों में इसकी प्रबलता तत्काल दृष्टिगोचर होती है।

सूखा जनित समस्याएँ

⇒ कृषि कार्य हेतु जलजमाव की समस्या

⇒ तापमान वृद्धि की समस्या

⇒ वन ह्रास व मृदा अपरदन की समस्या

⇒ पेय जल की समस्या

⇒ जलस्तर में गिरावट व भू-आर्द्रता में कमी

⇒ संक्रमण व बिमारियों के प्रकोप में वृद्धि

⇒ सरकारी व निजी कार्यों के संचालन में बाधा

वितरण-

       भारत में सुखा प्रभावित क्षेत्र मुख्यत: पश्चिम भारत में स्थित है। IMO के अनुसार 13 राज्यों के 67 जिलों में लगभग स्थायी तौर पर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। भारत का मध्यवर्ती राज्य व पठारीय भाग इसके अंतर्गत आते है। लेकिन भौगोलिक वितरण के दृष्टि से अगर देखा जाए तो 50 सेमी० वार्षिक वर्षा से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक वर्ष सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत के सिंचाई अयोजनानुसार यह दायरा 75 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्र तक है। 75 सेमी० वर्षा रेखा भारत को सुखा व आर्द्र दो भागों में बांटता है। सूखा आगमन की बारंबारता के दृष्टिगत 100 सेमी० से कम वर्षा वाला क्षेत्र सूखे की सबसे अधिक संभावित क्षेत्र है।

भारत में सूखा के कारण

चित्र: भारत में वर्षा का सामान्य वितरण

         100 सेमी० से 150 सेमी० के बीच वाले क्षेत्रों में एक विशिष्ट स्थिति होती है। यहां कभी बाढ़, कभी सुखाड़ या बाढ़ एवं सुखाड़ की वैकल्पिक स्थिति देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का उल्लेख किया जा सकता है। प्राय: 150 सेमी० से अधिक वर्षा वाला क्षेत्र अधिक वर्षा के बाद जद में क्षेत्र की लहलहाती फसलों को डूबो देती है और अंतत: सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए किए गए विकास कार्य:-

     इस दिशा में पहली योजना भारत में 1863 ई० में बनी थी जो आकाल आयोग के रिपोर्ट पर आधारित थी। इसके अंतर्गत नदियों से कुछ प्रत्यक्ष नहर निकले गए जिसमें सरहिंद नहर प्रमुख था। पंजाब राज्य में संप्रति नहर। परंतु, सुख से निजात हेतु वास्तविक प्रयास स्वतंत्रता के बाद किए गए। जिसके तहत दो महत्वपूर्ण स्वीकृत प्रयास थे- 

1. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना

2. वानिकी व बंजर भूमि सुधार योजना

      बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना में कावेरी जल कमान एरिया और भाखड़ा नांगल परियोजना प्रमुख था। कावेरी जल कमान एरिया तमिलनाडु के तंजौर जिला में स्थित है। पहले यह जिला सूखाग्रस्त था लेकिन आज हरित क्रांति का क्षेत्र बन चुका है। इस प्रकार भाखड़ा नांगल परियोजना से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कृषि कार्य में तेजी आई।

        वानिकी एवं बंजर भूमि की योजना द्वारा तापीय प्रभाव को कम किया गया है जिससे आर्द्रता में वृद्धि हुई। वानिकी एवं बंजर भूमि विकास योजना के द्वारा मिट्टी के नमी क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया जा रहा है। 1967 ई० के सूखे के बाद सिंचाई संदर्भ को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। 

       पांचवीं पंचवर्षीय योजना में “कमांड क्षेत्र विकास योजना” और “सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास योजना” (DPADP) प्रारंभ की गई। प्रथम के तहत 97 कमांड क्षेत्र चिह्नित किए गए जैसे चंबल कमांड क्षेत्र, सोन कमांड क्षेत्र, इंदिरा कमांड क्षेत्र आदि। इसके अंतर्गत 189 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचाई की व्यवस्था है।     

        DPADR संपूर्ण भारत में चलाए जा रहे हैं। शुष्क कृषि विकास, स्थानीय जल संसाधन का उचित प्रबंध, वैज्ञानिक भू-उपयोग पद्धति का विकास, ग्रामीण स्तर पर वानिकी व पशुपालन को प्रोत्साहन इस योजना के प्रमुख लक्ष्य है। सूखे की स्थिति में भी फसल कम से कम प्रभावित हो इसके लिए विशेष किस्म के बीज तैयार किया जा रहे हैं। जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उगाने हेतु कपास के PRS72, PRS73, PRS74 नमक बीज विकसित किया गया है। राजस्थान के लिए 100 दिन में उपजा लिए जाने वाले चावल के बीच तैयार किए गए हैं। इस क्षेत्र में नित नए शोध कार्य जारी है।

       सूखे से निजात हेतु आपातकालीन कार्यक्रम भी चलाए गए हैं। जिसका आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवें वित्त आयोग के अनुसार सूखाग्रस्त क्षेत्र में हुए हानि का जायजा व सहायतार्थ कार्य केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

सुझाव-

     यद्यपि सूखाग्रस्त की समस्या के समाधान हेतु कई स्तरों पर प्रयास किए गए हैं, लेकिन यह समस्याएं आज राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। आज अधिक पेनेट्रेटिव योजनाओं, पर्यावरण हितैषी टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आंकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी जोड़ योजना कार्य में तेजी लाने की आवश्यकता है।

⇒ बड़ी परियोजनाओं पर पुनः विचार करने की जरूरत है क्योंकि गहन आंकलन के बाद जयपुर पर्यावरण अध्ययन केंद्र ने संकेत दिया था की बड़ी परियोजनाएं मानसूनी जलवायु को बदल सकती है।

⇒ सूखाग्रस्त इलाकों में पशुपालन कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि चारा उत्पादन हेतु अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। यह कार्यक्रम राजस्थान में सफल भी हो रहे हैं। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संरक्षण पर विशेष ध्यान व जागरूकता लाने की जरूरत है।

⇒ बिहार राज्य पर विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि यहां नहर के बदले ट्यूबवेल सिंचाई अधिक समीचीन है।

          अंततः सुखा का सामना सामूहिक प्रयास से ही संभव है। 

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात



भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात  

         जब किसी निम्न वायुदाब केंद्र के चारों ओर तीव्र गति से हवा घुमने की प्रवृति रखती है तो उसे चक्रवात कहते है। फेरल के नियम के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में यह परिसंचरण घड़ी की सुई के उल्टी दिशा में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा में होती है।

      उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 8º से 20º अक्षांश के बीच होती है। यह उष्ण कटिबंधीय प्रदेश की चक्रवात है। इसकी उत्पत्ति एक निम्न वायु दाब केंद्र के बनने से प्रारंभ होता है जिसे आँख या आवर्त (Vertex) कहा जाता है।

              उष्ण चक्रवात के उत्पत्ति के लिए दो प्रकार के वायु राशि की आवश्यकता पड़ती है। ये दोनों वायु राशि अलग-अलग विशेषताओं के होते है लेकिन तापीय प्रभाव अधिक होने के कारण वायु तेजी से गर्म हो जाती है और अंततः प्रारंभिक गुणों को छोड़ तेजी से ऊपर उठने लगती है और निम्न वायुदाब केंद्र का निर्माण करती है। इस निम्न वायुदाब केंद्र को ठंडी वायु चारों ओर से भरने के लिए दौड़ती है लेकिन पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव में वायु घुमने लगती है और चक्रवात को जन्म देती है।

     भारतीय  उपमहाद्वीप पर आने वाले चक्रवात को पश्चिम बंगाल में नार्वेस्टर, बिहार में आंधी, पंजाब एवं हरियाणा में तूफान कहते है। इसका केंद्र सामान्यत: बंगाल की खाड़ी या उसके तटवर्ती क्षेत्र में होता है। प० तट पर चक्रवातीय प्रभाव सिर्फ गुजरात में देखने को मिलता है। भारत में आनेवाले उष्ण चक्रवात को समय के दृष्टि से तीन भागों भागों में बांटते है-

(1) मानसून पूर्व चक्रवात 

(2) मानसून काल के दौरान आने वाला चक्रवात

(3) मानसून के बाद का चक्रवात

         मानसून पूर्व चक्रवात का आगमन मुख्यत: 15 अप्रैल से जून के प्रथम सप्ताह के बीच आता है। इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यत: गोदावरी नदी के उत्तरी भाग में होता है। इसका प्रारंभिक केंद्र (15 अप्रैल से 15 मई के बीच) महाद्वीप या स्थलखंड के ऊपर होता है लेकिन 15 मई के बाद यह तट के किनारे अवस्थित होते है।

           प्रारम्भिक चक्रवात कम विनाशकारी होते है जबकि तटीय चक्रवात अधिक विनाशकारी होते है। प्रारंभिक चक्रवात का केंद्र प० बंगाल के ऊपरी मैदान (सामान्यत: मालदा से दिनाजपुर के बीच) में होती है। इसकी उत्पत्ति का प्रमुख कारण मैदान की तुलना में आस-पास के क्षेत्र का उच्च भार क्षेत्र है उच्च भार का क्षेत्र मेघालय का पठार, छोटानागपुर का पठार, उपरी गंगा का मैदान, बंगाल की खाड़ी व हिमालय के ऊपर होता है। इसी चक्रवात को नार्वेस्टर या कालबैशाखी कहते है। इसकी प्रमुख विशेषता है पहले शुष्क तेज वायु चलती है फिर वर्षा होती है। 

           लेकिन मई के उतरार्द्ध में परिस्थितियाँ बदलने लगती है। सम्पूर्ण महाद्वीप क्षेत्र एक गर्म वायु राशि क्षेत्र में बदल जाता है जबकि बंगाल की खाड़ी दूसरी गर्म महासागरीय वायु राशि का निर्माण करती है।

         तापीय प्रभाव के अनिश्चितता के कारण तटवर्ती क्षेत्र में और मुख्यत: दो वायु राशि के बीच मध्य तटवर्ती क्षेत्र में निम्न भार केंद्र का विकास होता है और दो वायु राशियाँ इसी केंद्र के चारों तरफ घुमने लगती है। बंगाल की खाड़ी की वायुराशि बाधा रहित होती है अत: तेजी से महाद्वीपीय क्षेत्र के ऊपर प्रहार करती जो भारी वर्षा और विनाश को जन्म देता है। यह सही अर्थों में प्राकृतिक विपदा के समान होता है। 

अरब सागर में उत्पन्न होने वाले चक्रवात

            अरब सागर भी एक गर्म महासागरीय उष्ण वायु राशि का निर्माण करते है लेकिन यहाँ चक्रवातीय परिस्थितियाँ नहीं बनती है क्योंकि चक्रवातीय परिस्थिति के लिए दो अलग-अलग विशेषताओं की वायु राशि का निर्माण होना आवश्यक है। भारत का पश्चिमी तट अत्यंत ही संकरा एवं रेखीय है जो स्थलीय और समुद्री समीर के लिए तो अनुकूल है लेकिन समान विशेषता की वायु राशि के निर्माण के लिए अनुकूल नहीं है।

           इस संकरे प्रदेश पर पर्वतीय और महासागरीय वायु की विशेषताओं का प्रभाव पड़ जाता है और वे वायु राशि के रूप में काम नहीं कर पाते है। यही कारण है कि भारत के पश्चिमी तट पर चक्रवात की उत्पत्ति नहीं होती है लेकिन गुजरात के काठियावाड़ का प्रायद्वीप एक अपवाद है जहाँ चक्रवातीय प्रभाव पड़ते है लेकिन चक्रवातीय बारंबारता कम होती है।

         गुजरात का क्षेत्र लगभग मैदानी या सपाट है। अत: यह महाद्वीपीय उष्ण गर्म वायु राशि बनाते है। जब भी ये दो गर्म वायु राशियाँ एक-दूसरे के ऊपर दबाव उत्पन्न करती है तो चक्रवात का आगमन होता है लेकिन चक्रवात की कम दबाव बारम्बारता का मूल कारण इस प्रदेश में चलने वाली सन्मार्गी वायु है। सन्मार्ग्री वायु दोनों वायु की दिशा एक तरफ कर देती है। विश्व के सभी उष्ण मरुस्थल सन्मार्ग्री वायु के स्रोत होते है।

        राजस्थान मरुस्थल से चलने वाली वायु का प्रभाव गुजरात प्रदेश पर भी पड़ता है। यही कारण है कि चक्रवातीय प्रवाह तब तक उत्पन्न नहीं होते जब तक कि गुजरात के तटवर्ती क्षेत्र में तापीय प्रभाव अत्यधिक गहन नहीं हो जाता है।

          अधिक तापीय प्रभाव से जब संवहनीक क्रिया होती है तो गुजरात प्रदेश की वायु गर्म होकर विषुवतीय निम्न भार की तरफ न जाकर लम्बवत रूप से ऊपर उठ जाती है। इससे सन्मार्ग्री वायु का प्रवाह बाधित होता है। इसके बाद प्रवाह के मध्य निम्न भार केंद्र उभर जाते है और वायु अपनी दिशा बदल लेती है और चक्रवात को जन्म देती है।

भारत में उष्णकटिबंधीय

            मानसून के समय भी उष्ण चक्रवात उत्पन्न होती है जिसके कारण चक्रवातीय वर्षा होती है। प्रारंभ में यह अवधारणा थी कि मानसूनी वर्षा पर्वतीय वर्षा है लेकिन 1977 के MONEX Expedition के समय से ही यह निश्चित हो चूका है कि भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में मानसूनी वर्षा चक्रवातीय होती है।

          पर्वतीय वर्षा का क्षेत्र पूर्वोत्तर भारत, हिमालय  और उत्तर का मैदानी क्षेत्र है लेकिन उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा महाराष्ट्र के आंतरिक भागों में अधिकत्तर वर्षा चक्रवातीय होती है।

        सामान्यत: यह देखा जाता है कि उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से लेकर शिमला तक तथा उड़ीसा के तटीय क्षेत्र से प० राजस्थान तक ऐसे अक्ष का निर्माण होता है, जिसके अनुरूप निम्न वायुदाब का क्षेत्र स्थानान्तरित होता है और इसी स्थानांतरण के साथ गर्म वायु उठ कर संतृप्त होती है और इन प्रदेशों में वर्षा लाती है।

         मानसून के बाद चक्रवात का आगमन मुख्यत: गोदावरी नदी के द० में देखने को मिलती है। ये चक्रवात 15 अक्टूबर से दिसम्बर के प्रथम सप्ताह के बीच आते है। इसका प्रभाव मुख्यतः दक्षिण आंध्रप्रदेश तथा तमिलनाडू में देखने को मिलता है। इसकी उत्पत्ति का मूल कारण दो गर्म वायु का एक-दूसरे के विपरीत दिशा में अपवाहित होना है। इनसे गर्म वायु राशियों का निर्माण द०-प० मानसूनी वायु तथा उ०-पू० मानसूनी वायु द्वारा होता है।

        प्रायद्वीपीय भारत के द०-पू० तट पर जब ये दो वायु राशि मिलते है तो चक्रवातीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है लेकिन नवम्बर के अंत आते-आते द०-प० मानसून वायु पूर्णत: पीछे हट जाती है और ऐसी स्थिति में उ०-पू० मानसूनी वायु ही सम्पूर्ण महाद्वीपीय क्षेत्र पर अपवाहित होने लगते है। इससे तमिलनाडु में पर्वतीय वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। यही कारण है कि दिसंबर में चक्रवात नहीं आते है।        

भारत में उष्णकटिबंधीय

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

       34.भारत की प्राकृतिक वनस्पति



भारत की प्राकृतिक वनस्पति

           प्रकृति में स्वतंत्र रूप से उगने वाले वनस्पतियों के समुच्य को “प्राकृतिक वनस्पति” कहते हैं। दूसरी ओर वैसी वनस्पति जो मानवीय हस्तक्षेप से विकसित होती हैं उन्हें “मानव जनित वनस्पति” कहते हैं। जैसे- बाग-बगीचा, उद्यान आदि।

       प्राकृतिक वनस्पतियों के ऊपर जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। कोपेन के अनुसार उपरोक्त तीनों कारकों में सर्वाधिक प्रभाव जलवायु का पड़ता है। उन्होंने बताया कि- “वनस्पति जलवायु का सूचकांक होता है।”

     प्राकृतिक वनस्पति में पुनर्नवीनीकरण का गुण पाया जाता है। इसका तात्पर्य है कि यदि पृथ्वी को 25 वर्षों तक स्वतंत्र छोड़ दिया जाय तो यह पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों से भर जायेगी। पुनः प्राकृतिक वनस्पतियों में अनुकूलन की क्षमता भी पायी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

     भारत की प्राकृतिक वनस्पति प्राकृतिक वातावरण में रहते हुए विविध रूपों में रूपान्तरित हो चुकी है। भारत में लगभग 30 हजार से अधिक प्रकार के वनस्पति पाये जाते हैं। इन वनस्पत्तियों को वर्षा और तापीय स्थिति के आधार पर छ: भागों में बाँटकर अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

(4) ज्वारीय वनस्पति

(5) उपोषण पर्वतीय वनस्पति

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

(1) उष्ण-आर्द्र सदाबहार वनस्पति-

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति की तुलना ‘विषुवतीय वनस्पति’ से की जाती है। इसकी सामान्य विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

(i) इसकी वृक्ष की लम्बाई 30-60 मी० तक होती है।

(ii) इसकी जड़े बहुत गहराई तक नहीं पहुँच पाते हैं क्योंकि धरातल पर ही उन्हें पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो जाती है।

(iii) पौधों में शाखाएँ कम पायी जाती हैं जिसके कारण इसका बितान कम चौड़ा होता है।

(iv) इसका तना काफी कठोर होता है।

(v) पत्तियाँ चौड़ी होती हैं क्योंकि सूर्य की रोशनी प्राप्त करने के लिए पौधों में प्रतिस्पर्धा चलती है।

         उष्णार्द्र सदाबहार वनस्पति में विविध प्रकार के वृक्ष एक साथ मिलते हैं। वृक्षों के ऊपर बड़े पैमाने पर अधिपादप (Ekiphyte) पाये जाते हैं। वृक्ष सालोंभर हरे-भरे रहते हैं। ये एक ही बार में सभी पत्तियों को नहीं गिराते, इसीलिए इसे “चिरहरित सदाबहार वनस्पति” कहते हैं। प्रमुख वृक्षों में महोगनी, बालनट, आबनूस, कब्रेका, सिनकोना, गाटापार्चा, एबोनी, रबड़, तेलताड़, सीडर, रोजवुड, आयरन वुड आदि हैं।

       उष्णार्द्र सदावहार वनस्पति सामान्यतः वैसे क्षेत्र में विकसित होती है, जहाँ वर्षा सालों भर होती है। तापमान अति उच्च रहता है। वर्षा 130-250 cm के बीच होती है। औसत तापमान 22°- 27°C, वायुमण्डलीय आर्द्रता 70% तथा तापान्तर 10°C से कम रहता है।

        भारत में विषुवतीय वनस्पति के तीन प्रमुख क्षेत्र है-

(i) अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह,

(i) मालाबार और कोंकण तट,

(iii) उ.-पू. भारत

(2) उष्ण-आर्द्र मानसूनी वनस्पति

         भारत के मानसूनी जलवायु क्षेत्रों में उगने वाले वनस्पति को मानसूनी वनस्पति कहते हैं। मानसून क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दो शुष्क एवं आर्द्र जलवायु पायी जाती है। उष्णार्द्र मानसूनी वनस्पति शुष्क मौसम में पत्तियाँ गिरा देती है जिसे “पतझड़ मानसूनी वन” कहते हैं। जैसे- शीशम, पीपल, सागवान, इमली, अमलतास, एक्सल, सेमल आदि। मानसूनी प्रदेश में कुछ ऐसे भी वृक्ष मिलते हैं जो एक ही बार पत्तियों को नहीं गिराते हैं। जैसे- आम, अमरूद, बरगद इत्यादि। मानसूनी वनस्पति की जड़े विषुवतीय वनस्पति की तुलना में लम्बी होती है। तना मोटा होता है। बितान चौड़ा होता है। पतियों की चौड़ाई सामान्य होती है। वृक्षों के छाल काफी मोटे होते हैं। शुष्कता से बचने के लिए ही पौधे पत्तियों को गिराती है।

       मानसूनी वनस्पति मानसूनी जलवायु के प्रभाव में उगने वाली वनस्पति है। यहाँ न्यूनतम तापमान 18ºC अधिकतम तापमान 35°C, वर्षा ऋतु में वर्षा की मात्रा 60-130 cm नवम्बर से मई महीने तक मौसम शुष्क पायी जाती है।

        मानसूनी वनस्पति का विस्तार गंगा के मैदानी क्षेत्र, शिवालिक पर्वत, असम के मैदान, कोयम्बटूर के पठार, मध्यवर्ती भारत में हुआ है। भारत में मानसूनी वनस्पति का विस्तार सबसे अधिक क्षेत्र पर हुआ है।

(3) उष्ण शुष्क वनस्पति

          शुष्क जलवायु प्रदेशों में उगने वाले वनस्पति को “शुष्क और अर्द्धशुष्क वनस्पति” कहते हैं। सामान्यतः ऐसे वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं-

(i) अर्द्ध शुष्क वनस्पति

(i) पूर्ण शुष्क वनस्पति

           अर्द्ध शुष्क वनस्पति में घासभूमि और झाड़ियाँ बड़े पैमाने पर मिलती है। झाड़ियों की ऊँचाई 6-9 मी० तक होती है। जबकि पूर्ण शुष्क वनस्पति में कंटीले या कैक्टस वनस्पति का विकास बड़े पैमाने पर होता है। खेजड़ी अर्द्धशुष्क प्रदेश की प्रमुख वृक्ष हैं। जबकि पूर्ण शुष्क प्रदेश में नागफनी, बबूली, खजूर जैसे वृक्ष मिलते हैं। शुष्क वातावरण होने के कारण पौधों की जड़ें जलग्रहण करने हेतु काफी लम्बी हो जाती है। पत्तियाँ काँटों में रूपान्तरित हो जाती है। पति और तना के ऊपर मोम जैसे परत विकसित हो जाते हैं। कीटों को आकर्षित करने हेतु फूलों के रंग काफी चटकदार हो जाते हैं।

       50-100 cm वर्षा वाले क्षेत्रों में अर्द्धशुष्क वनस्पति का विकास होता है। जबकि 50 cm ये कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पूर्ण शुष्क वनस्पति का विकास होता है। शुष्क मानसूनी वनस्पति का विकास वहीं होता है जहाँ 8-11 माह तक शुष्क मौसम रहती है। तापमान और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया अधिक होती है।

        अरावली पर्वत के पूर्वी भाग में, द. भारत के वृष्टिछाया प्रदेश में तथा लेह लद्दाख क्षेत्र में ‘अर्द्धशुष्क वनस्पत्ति’ पायी जाती है। जबकि थार मरुस्थलीय क्षेत्र में “पूर्ण शुष्क वनस्पति” पायी जाती है।

(4) ज्वारीय वनस्पति

        इसे ‘गरान’ या ‘मैंग्रोव वनस्पति’ भी कहा जाता है। इसका विकास तटीय क्षेत्रों में हुआ है। चूँकि तटीय क्षेत्रों में लवण की मात्रा अधिक पायी जाती है। इसलिए लवणीय वातावरण के साथ इनका अनुकूलन हुआ है। ज्वारीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते हैं-

(i) ज्वारीय प्रवाह क्षेत्र के वन-

        इसे सुन्दर वन के नाम से भी जाना जाता है। इसमें सुन्दरी, केन और बेंत नामक वृक्ष मिलते हैं। इन वृक्षों की ऊँचाई 30 मी० तक होती है। लकड़ियाँ काफी नाजुक होती है।

(ii) ज्वारीज प्रवाह से मुक्त प्रदेश की वनस्पति-

         यहाँ ताड़ और नारियल जैसे वृक्ष प्रमुख हैं। इनकी लम्बाई बहुत अधिक होती है। तना में रेशम पायी जाती है जिसके कारण लकड़ियाँ काफी मजबूत होती है।

     ज्वारीय वनस्पति मुख्य रूप से विषुवतीय वातावरण में उगने वाली वनस्पति है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में अधिक लवण पाये जाने के कारण अनुकूलन की क्षमता पायी जाती है। जैसे- धरातल के ऊपर आ जाते हैं ताकि श्वसन की क्रिया आसानी से हो सके।

      भारत में ज्वारीय वनस्पति का विकास तटवर्ती क्षेत्रों में स्थित ज्वारनदमुख, नदियों के मुहानों, संकरी खाड़ियों या निवेशिकाओं में हुआ है। गंगा ब्रह्मपुत्र का डेल्टा विश्व का सबसे बड़ा मैन्ग्रोव वनस्पति का क्षेत्र है।

(5) उपोष्ण पर्वतीय वनस्पत्ति

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति का विकास वैसे क्षेत्रों में हुआ है जहाँ की जलवायु उष्णकटिबंधीय है। लेकिन, ऊँचाई के कारण जलवायु में परिवर्तन हुई है और यह उपोष्ण जलवायु में बदल चुकी है। उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति को भी दो भागों में बाँटते है। जैसे-

(i) आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति और

(ii) आर्द्र शीतोष्ण पहाड़ी वनस्पति

      आर्द्र उपोष्ण पहाड़ी वनस्पति 1070-1525 मी० की ऊँचाई पर मिलती है। जबकि आर्द्र शीतोष्ण वनस्पति 1525 से भी अधिक ऊँचाई पर मिलती है। ऐसे वनस्पति को ‘सोलास वन या शोला वन के नाम से भी जानते हैं। उपरोक्त दोनों प्रकार के वनों में मिलने वाले वृक्ष सदाबहार प्रकार के होते हैं। ज्यों-2 ऊँचाई बढ़ती जाती है त्यों-2 लकड़ी गुलायम तथा पते की चौड़ाई कम होते जाती हैं। चेस्टनट, रोजवुड, यूकेलिप्टस, देवदार, पाइन इत्यादि वृत मिलती हैं।

        उपोष्ण पर्वतीय वनस्पति उपोष्ण जलवायु क्षेत्र में पायी जाती हैं। यह प्रायद्वीपीय भारत की वनस्पति है। जो अरावली, विन्ध्यन, सतपुड़ा, अजन्ता, पूर्वी घाट, प० धाट, नीलगिरि, अन्नामलाई की पहाड़ियों पर 1070 मी० से अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों में मिलते हैं।

(6) हिमालय प्रदेश की वनस्पति

         इसे अल्पाइन वनस्पति भी कहते हैं। हिमालय प्रदेश की प्राकृतिक वनस्पति पर निम्न कारकों का प्रभाव पड़ा है। उच्चावच, पवन, वर्षा की मात्रा, ऊँचाई के साथ तापीय परिवर्तन, अक्षांश और ढाल का।

     हिमालय का उत्तरी ढाल मंद और द० ढाल तीव्र है जिसके कारण उत्तरी ढालों पर वनों का विस्तार अधिक तथा दक्षिणी ढालों पर वनों का विस्तार कम हुआ है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर कश्मीर हिमालय में मिलने वाले घास को ‘गुलमर्ग’ और ‘सोनमर्ग’ तथा कुमायूँ हिमालय में बुग्याल और ‘प्यायर’ कहते हैं। यह एक शीतोष्ण प्रकार के मुलायम घास है जिसका प्रयोग पशुचारे के रूप में किया जाता है।

       अक्षांशीय प्रभाव के आधार पर भी हिमालय के वनस्पति को दो भागों में बाँटते हैं।

 (i) पूर्वी हिमालय की वनस्पति और

(ii) पश्चिमी हिमालन की वनस्पति।

        पूर्वी हिमालय निम्न अक्षांश पर है। अतः यहाँ आर्द्रता अधिक, वर्षा 200 cm तक और सूर्य की लम्बवत किरणें मिलती है। जबकि पश्चिम हिमालय अपेक्षाकृत उच्च अक्षांश पर स्थित है जिसके कारण आर्द्रता कम, वार्षिक वर्षा 75 से कम और सूर्य की लम्बवत किरणों का प्रभाव कम पड़ता है। पूर्वी हिमालय में पतझड़ वन मिलते है जबकि प० हिमालय में नहीं। इसी तरह प० हिमालय में शीतोष्ण शुष्क वनस्पति मिलती है जबकि पूर्वी हिमालय में नहीं।

        हिमालय प्रदेश की वनस्पति पर उच्च्वाच का व्यापक प्रभाव पड़ा है। ऊँचाई के अनुसार ताप में परिवर्तन होते है और उसी के अनुरूप वनस्पति बदलते हैं जिसे नीचे के चित्र में दिखाया गया है।

भारत की प्राकृतिक

चित्र: भारत के प्राकृतिक वनस्पति

            इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनेक प्रकार के प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती हैं। इन वनस्पतियों पर जलवायु, उच्चावच, ढाल, मिट्टी, सूर्याताप, समुद्र से दूरी इत्यादि भौगोलिक कारकों का प्रभाव पड़ा है। इन कारकों में सबसे ज्यादा प्रभाव जलवायु का पड़ा है। इसलिए कोपेन का कथन सत्य प्रतीत होता है कि “भारतीय वनस्पतियाँ जलवायु के सूचकांक होती हैं।”

प्रश्न प्रारूप

1. “भारतीय प्राकृतिक वनस्पतियाँ जलवायु के सूचक हैं।” विवेचना करें।

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?



पश्चिमी विक्षोभ

     पश्चिमी विक्षोभ जाड़े की ऋतु में भूमध्यसागरीय भाग में उत्पन्न होने वाली एक शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात है जो पछुआ हवा के द्वारा पूरब की ओर ढकेल दिया जाता है। यह मार्ग में वर्षा कराते चलती है। यही हवा भारत के पंजाब, हरियाणा और गंगा घाटी क्षेत्र में प्रवेश कर वर्षा करती है जिससे इसमें बची-खुची नमी समाप्त हो जाती है।

         वर्षा के पश्चात् जब शुष्क हवा हिमालय के तलहट्टियों से पूरब की ओर बहती है तो वहाँ भीषण हिमपात होती है। परंतु, जब यह हवा मैदानी भाग में पुरब की ओर बढ़ती है तो राजस्थान के रेगिस्तानी प्रदेश की शीतलता को अपने साथ लेकर चलती है जिससे मैदान का तापमान काफी कम हो जाता है। इसे स्थानीय भाषा में “शीतलहर” कहा जाता है।

         चूँकि भूमध्यसागर की अक्षांशीय स्थिति 37°N अक्षांश है और भारत का अक्षांशीय विस्तार 8°4′ से 37°6’N अक्षांश है। उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटी 30°N से 35°N अक्षांश के बीच स्थित है। चूँकि पछुवा हवा 35°N से 60°N अक्षांश के बीच द०-प० से उ०-पू० की सोर चलती है।

        जब पछुआ हवा उपोष्ण उच्च वायुदाब पेटी से चलती है तो वह भूमध्य सागर से नमी ग्रहण करते हुए उ०-पू० दिशा की ओर प्रवाहित होती हैं लेकिन उसके मार्ग में अवरोधक के रूप में भूमध्यसागर के उत्तर में आल्प्स पर्वत से लेकर पूरब में हिमालय पर्वत तक पर्वतों की लगातार लम्बी श्रृंखला मिलती है। फलस्वरूप पछुआ हवा इन पर्वतों के दक्षिणी ढाल के सहारे पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होने लगती है जिसे “पछुआ विक्षोभ” कहते हैं। इसी पछुआ विक्षोभ से भारत के उत्तर एवं उत्तर-पश्चिमी भागों में जाड़े के दिनों में वर्षा होती है।

पछुआ विक्षोभ का आर्थिक प्रभाव

         भारत के आर्थिक जीवन में पछुआ विक्षोभ का प्रभाव कई क्षेत्रों पर पड़ता है। जैसे-

(1) कृषि पर प्रभाव⇒

          पछुआ विक्षोभ के कारण जाड़े की ऋतु में वर्षा होती है। यह वर्षा गेहूँ की फसल के लिए काफी फायदेमंद होती है। पंजाब में यह वर्षा जनवरी तथा फरवरी महीने में होती है। वहाँ की कृषि के लिए इस वर्षा का काफी महत्व है क्योंकि रबी फसल की सफलता इसी वर्षा पर निर्भर करती है।

     चूँकि पछुआ हवा जब राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों की शीतलता को अपने साथ लेकर मैदानी भागों में प्रवेश करती है तो यहाँ के तापमान में गिरावट आती है। फलतः यहाँ के जायद फसल एवं मसूर के फसलों में पाला लग जाती है और वे बर्बाद होने लगते हैं।

(2) पशुपालन पर प्रभाव⇒

        पछुवा हवा के कारण जाड़े की ऋतु में उत्तर भारत में शीतलहरी पड़ने लगती है जिसके कारण कई पशुओं को ठण्डा लग जाता है और उनकी मृत्यु भी हो जाती हैं। फलत: पशुपालकों को इससे हानि हो जाती हैं।

(3) उद्योगों पर प्रभाव⇒

      पछुआ विक्षोभ के प्रवेश करने से उत्तर भारत में काफी ठण्ड पड़ने लगती है। फलत: ठण्ड से बचने के लिए लोग ऊनी वस्त्रों का इस्तेमाल करते हैं। इसी के निर्माण के लिए पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि में ऊनी वस्त्र उद्योगों का विकास किया गया है।

        पंजाब, हरियाणा में गेहूँ का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है जिसमें पछुआ विक्षोभ का फाफी योगदान होता है। फलतः उत्तर भारत में गेहूँ, दलहन, तेलहन आदि की मीलों का विकास काफी संख्या में की गई है।

(4) पर्यटन उद्योग पर प्रभाव⇒

       जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण बड़े पैमाने पर बर्फ-बारी होती है। इसी का आनन्द उठाने के लिए यहाँ काफी संख्या में पर्यटक लोग आते हैं। इन पर्यटकों से जम्मू और कश्मीर को काफी आमदनी होती है। यहाँ पर्यटन पर आधारित कई उद्योगों का विकास किया गया है। जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था मुख्यतः पर्यटन उद्योग पर ही आधारित है।

(5) परिवहन पर प्रभाव⇒

        जम्मू और कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ के कारण जब काफी मात्रा में कई दिनों तक बर्फ-बारी होने लगती है तो सड़कें बर्फ से ढक जाते हैं। फलस्वरूप परिवहन मार्गों में बाधा उत्पन्न हो जाती है।

(6) शादी-विवाह पर प्रभाव⇒

        जब पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली वर्षा के कारण पंजाब, हरियाणा में रबी फसल का उत्पादन काफी मात्रा में होती है तो किसानों की आमदनी बढ़ जाती है। फलत: जवान बेटा-बेटियों की विवाह काफी धूम-धड़ाके से की जाती है। इस अवसर पर आरकेस्ट्रा, नर्तकी, गायक, बैण्ड बाजा, भोज-भण्डार आदि का बड़े पैमाने पर आयोजन होता है। ‘तिलक’ में वृद्धि हो जाती है। हालाँकि तिलक लेना बहुत बड़ा पाप और अपराध है। मैं ऐसा कभी नहीं करूँगा।

(7) प्रबंधन पर प्रभाव⇒

         जब किसानों को फसलों के उत्पादन से काफी आमदनी होने लगती है तो वे अपने बच्चों को MCA, BCA, MBA मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में नामांकन करवाते है जिसके कारण प्रबंधकों की आय में वृद्धि होती है।

(8) शिक्षण संस्थानों पर प्रभाव⇒

       जब पछुआ विक्षोभ के कारण होने वाली वर्षा से किसानों की फसलों की पैदावार काफी अच्छी होती है। तब वे अपने बच्चों को उच्च स्तर की पढ़ाई के लिए बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों में नामांकन दर्ज करवाते हैं जिसके कारण शिक्षण संस्थानों की आमदनी बढ़ जाती है।

(9) बैंकिंग पर प्रभाव⇒

       जब अच्छी पैदावार के कारण किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे अनाज को बेचकर बैंक में रुपये जमा करते हैं। यदि पछुवा विक्षोभ के कारण उनकी फसल बर्बाद होती है तब उन्हें पूँजी एवं अन्य कार्य के लिए बैंकों से ऋण लेनी पड़ती है। इससे बैंकों को ब्याज के रूप में आमदनी होती है।

(10) शेयर बाजार पर प्रभाव⇒

       जब किसान एवं व्यवसायियों की आमदनी काफी बढ़ने लगती है तो वे अपना पैसा शेयर बाजार में लगाते है, जिसके कारण शेयर बाजार के सूचकांक में उत्तर एवं चढ़ाव आता है।

(11) स्वास्थ्य पर प्रभाव⇒

        जाड़े की ऋतु में पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तर भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है जिसके कारण कई लोग सर्दी-जुकाम से पीड़ित हो जाते हैं। कई बुढ़ा-बुढ़ी इसके शिकार भी हो जाते हैं।

(12) बाजार पर प्रभाव⇒

          जब पछुआ विक्षोभ के कारण उत्तरी भारत में कड़ाके की ठण्ड पड़ने लगती है तो लोग इससे बचने के लिए ऊनी वस्त्र, कम्बल, रजाई, हीटर आदि का प्रयोग करते हैं। ये सभी वस्तुएँ बाजार से ही खरीदी जाती हैं। दूसरी तरफ जब फसलों के उत्पादन से किसानों की आमदनी बढ़ती है तो वे बाजार से अन्य कई उपयोगी वस्तुएँ खरीदतें हैं। फलत: बाजार में चहल-पहल का महौल बना रहता है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त आर्थिक गतिविधियों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि पछुआ विक्षोभ खासकर उत्तर भारत के कई आर्थिक क्रियाकलापों को सकारात्मक एवं नाकारात्मक दोनों रूपों से प्रभावित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. पश्चिमी जेट प्रवाह जाड़े के दिनों में किस प्रकार पश्चिमी विक्षोभ को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने में मदद करता है? भारत के आर्थिक जीवन पर पछुआ विक्षोभ का क्या प्रभाव पड़ता है?

error: