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24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी

(Monsoon of Mechanism)



भारतीय मानसून की प्रक्रिया

      भारत में मानसून की उत्पत्ति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायु-संचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ द०-प० मानसून से लगभग 80% होती है जबकि 20% वर्षा उ०-पू० मानसून और पछुवा विक्षोभ से होती है।

         ग्रीष्म ऋतु के बाद दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। भारत में सबसे पहले द०-प० मानसून 29 मई को अण्डमान & निकोबार द्वीप समूह में 1 जून को केरल के तट पर पहुँचती है।

          केरल के तट पर पहुंचकर द०-प० मानसून पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है और संघनित होकर अचानक मूसलाधार वर्षा करती है जिसे “मानसून विस्फोट” कहा जाता है। 15 जून तक द.-प. मानसून मध्य भारत के आन्तरिक भागों में पहुँच जाती है जिससे 5° से 8°C तापमान में गिरावट दर्ज की जाती है। द०-प० मानसून की दो प्रमुख शाखा है।

(1) अरब सागर की मानसूनी पवन

(2) बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवन

          अरब सागर के मानसून की उत्पत्ति अरब सागर में होती है। जब यह भारत के तट पर पहुंचती है तो यह तीन शाखाओं में बंट जाती है।

(i) पहली शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान में 250 cm वर्षा करती है। पश्चिमी घाट से टकराने के बाद‌ यह हवा पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती है। लेकिन पूर्वी ढाल के सहारे उतरने वाली इस हवा के कारण वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टिछाया प्रदेश का निर्माण होता है।

(ii) अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के सहारे भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटी क्षेत्र पर्याप्त मात्रा वर्षा प्राप्त करते हैं।

(iii) तीसरी शाखा अरावली पर्वत के समानान्तर राजस्थान में प्रवेश करती है। रास्ते में कोई रुकावट नहीं मिलने के कारण यह राजस्थान के ऊपर से गुजर जाती है जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती है। यह शाखा राजस्थान से होते हुए कूल्लू और मनाली के पास जाकर यह हिमालय से टकराती है और वर्षा करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी हवा भी कई छोटे-छोटे शाखाओं में बंट जाती है। इनमें से दो शाखा प्रमुख है-

(i) पहली शाखा बंगलादेश से होते हुए उ०-पूर्वी भारत में प्रवेश करती है।

⇒ इसकी एक शाखा बराक और सूरमा नदी घाटी से गुजरती है जिससे मिजोरम, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है।

⇒ एक शाखा गारो, खासी, जयंतिया पर्वत से टकराकर विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम ग्राम  का निर्माण करती है।

(ii) बंगाल की खाड़ी की दूसरी सबसे प्रमुख शाखा उड़ीसा और प. बंगाल के सहारे भारत में सीधे प्रविष्ट करती है। यह शाखा कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जाकर असम से आने वाली मानसूनी हवा से मिलकर अत्याधिक वर्षण का कार्य करती है।

         धीरे-2 ये दोनों शाखाएँ सम्मिलित रूप से पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होने लगती है जिससे गंगा के उतरी मैदानी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा प्राप्त करती है। यह शाखा कुल्लू के पास जाकर अरेबियन शाखा से मिलती है जिसके कारण यहाँ “बादल फटने की घटना” होती है।

          ग्रीष्म ऋतु में गया से प्रयागराज के बीच ITCZ या तीव्र निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाने के कारण बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी अक्ष के सहारे धीरे-2 मानसूनी हवा दक्षिण गंगा के मैदान में पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होती है। ज्यों-2 पूरब से पश्चिम की ओर जाती है त्यों-2 आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी देखी जाती है।

      पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के आँख का विकास होता है जिसके चारों ओर तीव्र गति से हवाएँ चक्र के रूप में घुमकर पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षण कार्य करती है।

मानसून का लौटना

        15 अक्टूबर के बाद भारत से मानसून के लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है। मानसून लौटने के दौरान वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है। इसे उत्तर-पूरब मानसून की संज्ञा देते हैं। इस शाखा की एक भाग बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

निकर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की यांत्रिकी काफी जटिल है। इसे नीचे के मानचित्र से भी समझा जा सकता है।

भारतीय मानसून की प्रक्रि

चित्र: द०-प० मानसून की क्रियाविधि

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना



भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

          भारत एक मानसूनी प्रदेश है। यहाँ ही जलवायु मानसूनी है। मानसून एक मौसमी हवा है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ (Mausim) अथवा मलायन भाषा के मोनसिन (Monsin) शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है- मौसम के अनुसार हवाओं का उलट-फेर।

        ब्रिटिश भूगोलवेता हैली महोदय ने बताया कि मानसून एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है। इन्हें चित्रों से समझा जा सकता है:

भारतीय मानसून

मानसून का प्रकार

     भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए इसे दो भागों में बाँटा है:- उष्ण कटिबंधीय मानसून और शीतोष्ण प्रदेश की मानसून।

        भारत में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे भी दो भागों में बाँटा गया है :-

(i) द०-प० मानसून,

(ii) उ०-पू० मानसून

             द०-प० मानसून को ग्रीष्मकालीन मानसून तथा उ०-पू० मानसून को शीतकालीन मानसून कहा जाता है। द०-प० मानसून ही भारत की प्रमुख मानसून है। भारत की 80% वर्षा इसी द०-प० मानसून से होती है। यह मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है। जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है। द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से और उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

भारतीय मानसून की विशेषताएँ

        भारतीय मानसून की कई विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) भारतीय मानसून अपने अनिश्चितताओं के लिए विश्व विख्यात है। अर्थात इनकी आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

(2) भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट निर्माता है।

(3) मानसून मौसम विशेष की हवा है।

(4) मानसून के कारण भारत में मुख्यत: प्रकार की वर्षा होती है-

(i) पर्वतीय वर्षा

(ii) चक्रवातीय वर्षा।

(5) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यन्त अनियमित है।

(6) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। 

(7) मानसून की विश्वसनीयता संदिग्ध है।

(8) मानसून की वर्षा निरंतर नहीं होती, बल्कि कुछ दिनों के अन्तराल पर रुक-रुक कर होती है।

(9) मानसूनी वर्षा मूल रूप से धरातलीय वर्षा है।

(10) मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान में कमी लाती है।

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त हैं।

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक:-

       भारतीय मानसून को अनेक कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार:-

        भारत मोटे तौर पर 8°4’N से 37°6’N अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है। विषुवत रेखा के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान रहता है। दूसरी उतरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है।

       अत: यहाँ विशेषकर शीतकाल में निम्न तापमान रहता है। इसके कारण स्थल और समुद्र पर मिलने वाले वायुदाब में अन्तर आ जाता है। फलत: मध्य मई से मध्य नवम्बर तक द०-प० मानसून सागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर और मध्य नवम्बर से मध्य मई तक उ०-पूर्वी मानसून भारतीय उपमहाद्वीप से सागर की ओर अग्रसारित होती है और वे वर्षा करते है।

(2) समुद्र से दूरी:-

        प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आन्तरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है। समुद्र से निकटवर्ती क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा अधिक और जैसे-2 इससे दूरी बढ़ती जाती है वैसे- वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।

(3) उत्तरी पर्वतीय श्रेणियाँ:-

       हिमालय तथा उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उ०-प० में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं। ये भारत को शेष एशिया से अलग करते हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्याधिक ठण्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी द०-पश्चिम मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनाती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार ये श्रेणियाँ उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती है।

(4) स्थलाकृति:-

          देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहाँ के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत नमीयुक्त मानसून पवनों को रोककर समूचे उत्तरी भारत में वर्षा का कारण बनता है। मेघालय पठार में पहाड़ियों की कीपनुमा आकृति से मानसून पवनों द्वारा विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों की दिशा के समानान्तर है।

       अत: यह मानसूनी पवनों को रोकने में असफल होता है। फलस्वरूप वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और लगभग सम्पूर्ण राजस्थान एक विस्तृत मरूस्थल में बदल गया है। पश्चिमी घाट द०-प० मानसून पवनों के मार्ग में दीवार की भाँति खड़ा है जिसके कारण इस पर्वत के पश्चिमी ढालों तथा पश्चिमी तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है। इसके पूर्व में पवनें नीचे उत्तरती है और ठण्डी व शुष्य हो जाती है। अतः इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है और यह “वृष्टि छाया क्षेत्र” कहलाता है।

(5) मानसूनी पवनें:-

        द०-प० पश्चिमी ग्रीष्मकालीन पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती है और समस्त देश को प्रचुर वर्षा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत शीतकालीन उ०-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती है और वर्षा करने में असमर्थ होती है। बंगाल की खाड़ी से कुछ जलवाष्प प्राप्त करने के पश्चात ये पवनें तमिलनाडु के तट पर थोड़ी सी वर्षा करती है।

(6) ऊपरी वायु परिसंचरण:-

        भारत में मानसून के अचानक विस्फोट का एक अन्य कारण भारतीय भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। ऊपरी वायुतंत्र में बहने वाली जेट वायुधरायें भारतीय जलवायु को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है। जैसे:-

(i) पश्चिमी जेट वायुधारा-

       शीतकाल में, समुद्र तल से लगभग 8Km की ऊँचाई पर पश्चिमी जेट वायुधारा अधिक तीव्र गति से समशीतोष्ण कटिबंध के ऊपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणियों द्वारा दो भागों में विभाजित हो जाती है। इस जेट वायुधारा की उत्तरी शाखा इस अवरोध के उत्तरी सिरे के सहारे चलती है। दक्षिणी शाखा हिमालय श्रेणियों के दक्षिण में 25°N अक्षांश के ऊपर पूर्व की ओर चलती है।

       मौसम वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि यह शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जेट वायुधारा भूमध्य सागरीय प्रदेशों से पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने के लिए उत्तरदायी है। उत्तर पश्चिम मैदानों में होने वाली शीतकालीन व ओलावृष्टि तथा पहाड़ी प्रदेशों में कभी-2 होने वाली भारी हिमपात इन्हीं विक्षाओं का परिणाम है। इसके बाद सम्पूर्ण उतरी मैदानों में शीत लहरें चलती है।

(ii) पूर्वी जेट वायुधारा-

        ग्रीष्मकाल में, उतरी गोलार्द्ध में सूर्य के उत्तरायण के कारण ऊपरी वायु परिसंचरण में परिवर्तन हो जाता है। पश्चिमी जेट वायुधारा के स्थान पर पूर्वी जेट वायुधारा चलने लगती है, जो तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी गर्म जेट वायुधारा विकसित होती है जो 15°N अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर चलती है। यह द०-पश्चिमी मानसून पवनों के अचानक आने में सहायता करती है।

(7) एलनीनो प्रभाव:-

        भारत में मौसमी दशाएँ एलनीनो से भी प्रभावित होती है, जो संसार के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिए उत्तरदायी है। एलनीनो एक सतही उप गर्म जलधारा है। यह कभी-2 द० अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। कई बार पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर अस्थायी धर्म धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-2 अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10ºC तक बढ़ा देती है।

         उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-2 हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 ई. में भारत में भयंकर सूखा एलनीनो का ही परिणाम था।

(8) दक्षिणी दोलन:-

        दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाली परिवर्तन का प्रतिरूप है, जो हिन्द व प्रशांत महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायुदाब की स्थिति एक-दूसरे के उलटा होती है। जब वायुदाब प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर  अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक शक्तिशाली होती है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के कमजोर होने की संभावना अधिक होती है।

     उपरोक्त कारकों के अलावे पश्चिमी विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब का खिसकाव इत्यादि भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

निष्कर्ष

        उपरोक्त तथ्यों विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मानसून एक मौसमी हवा है। इसकी कई विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

19. भारतीय जल विभाजक रेखा


भारतीय जल विभाजक रेखा

             जल विभाजक दो भौगोलिक प्रदेश के बीच वह उत्थित स्थलाकृति है, जो दो अपवाह प्रदेशों को अलग-अलग विभाजित करती है। अर्थात् यह दो विपरित ढाल वाले प्रदेश के मध्य उच्च भूमि है।

      भारत में प्रमुख चार जल विभाजक रेखाएँ है। उसके आधार पर भारत को चार अपवाह प्रदेशों में विभाजित किया गया है। भारतीय जल विभाजक रेखा को मानचित्र में देखा जा सकता है-

भारतीय जल(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा।

(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा-

        उत्तर भारत में उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। इसका विस्तार काराकोरम हिमालय से मणिपुर मिजो पहाड़ी तक है। काराकोरम हिमालय व पूर्वांचल हिमालय के श्रृंखलाओं में अवस्थित हिमयुक्त शिखर जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। जिसकी औसत ऊँचाई काराकोरम से नामचा बरबा तक 6000 मी० है।

    ब्रह्मपुत्र गार्ज के पास पर्वतीय श्रृंखला दक्षिण कि ओर मुड जाती है जिसकी औसत ऊँचाई 2600 मी० से 3000 मी० तक हैं। इसमें पटकोई बुम, नागा हिल, मणिपुर एवं मिजो पहाड़ियाँ शामिल हैं। मूलत: पूर्वांचल हिमालय, म्यानमार और पूर्वोत्तर भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। जबकि हिमालय पर्वत चीन एवं भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करता है।

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा-

        इस जल विभाजक रेखा का विस्तार गुजरात के “इन आफ कच्छ” से लेकर अम्बाला सिटी तक हुआ है। इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर हैं। जिसकी औसत लम्बाई 600 मी० से 1000 मी० तक है। यह सिंधु नदी तंत्र एवं गंगा यमुना नदी तंत्र के बीच जल विभाजक का कार्य करती है। यह एक प्राचीनतम श्रृंखला है। जो कि एक अवशिष्ट पहाड़ी का रूप धारण कर लिया है। इसका भौगोलिक विस्तार गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली जैसे राज्यों तक हुआ है।

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा-

         इसका विस्तार मध्य भारत में हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इस जल विभाजक रेखा का निर्माण विन्ध्यन, सतपुड़ा, महादेव, मैकाल आदि पर्वत श्रृंखलाओं के मिलने से हुआ है। यह जल विभाजक रेखा प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में बहने वाली नदी अपवाह तंत्र के बीच में जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर बिहार व बंगाल की सीमा पर राजमहल छोटी जल विभाजक रेखा का निर्माण हुआ है, जिसका विस्तार उत्तर से दक्षिण कि ओर हैं।

           इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर गारो, खासी, जयन्तिया जल विभाजक रेखा का भी निर्माण हुआ है। यह जब विभाजक रेखा के दक्षिण से निकलने वाली नदियां बांग्लादेश में नई अपवाह तंत्र को जन्म देती हैं, जबकि उत्तर की ओर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का निर्माण करती हैं।

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा-

          इसकी औसत लम्बाई 1600 किमी० है, इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा में है। इसकी औसत ऊँचाई 910 मी० हैं। पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट परस्पर नीलगिरी के पास मिलकर एक गाठ का निर्माण करते हैं। और एक सम्मिलित श्रृंखला के रूप में मिलकर क्रमश: अनामलाई, कोर्डेमम, पालनी नागर कोयल, श्रृंखला के रूप मे उत्तर से दक्षिण दिशा ने प्रक्षेपित हो गई हैं।

       चुकिं यह जल विभाजक रेखा पश्चिमी समुद्र स्तर से काफी नजदीक है, साथ ही इसका पश्चिमी किनारा एक भ्रन्शोथ पर्वत के समान हैं। इसलिए अरब सागर में गिरने वाली नदियों की लम्बाई कम हो जाती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ लम्बी दूरी को तय करने के बाद सागर में गिरती है।

महत्व:

           चूंकि जल विभाजक रेखाएं दो भौगोलिक अपवाह प्रदेशों के बीच की उत्थित भूमि है, जिसके कारण नदी मार्ग मे ढाल तीव्र हो जाता है, जिसके कारण वर्षा का जल तेजी से बहते हुए समुद्र में चला जाता है। लेकिन जल विभाजक रेखा को प्राकृतिक सीमा मानते हुए “जल संभर प्रबंधन (WSM)” के माध्यम से जल संसाधन का उपयोग, संरक्षण एवं उचित संवर्धन किया जा सकता है। इससे कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, सामाजिक वानिकी सिंचाई, विद्युत उत्पादन एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कई आर्थिक समस्याओं से निपटा जा सकता है। 

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार


प्रायद्वीपीय भारत के पठार

               प्रायद्वीपीय भारत का बाहरी किनारा विन्ध्यन, अरावली, गारो, खाँसी, जयन्तिया, पूर्वीघाट और पश्चिमी घाट से निर्मित है। ये श्रृंखलाएँ प्रायद्वीपीय भारत को एक पठार के समय में बदल देती है। पुन: सतपुड़ा, हरिश्चंद्र, बालाघाट, बाबाबूदन, श्रीशैलम जैसी छोटी-2 पहाड़ियाँ इस पठार को कई छोटे-2 पठारों में बाँट देती हैं। इसलिए प्रायद्वीपीय भारत को “पठारों का पठार” कहा जाता है। प्रायद्वीपीय भारत में निम्नलिखित पठार पाये जाते हैं-

(1) दक्कन का पठार-

       दक्कन के पठार का विस्तार महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश और तमिलनाडु में हुआ है। महाराष्ट्र के पश्चिमी भाग में इसे ‘महाराष्ट्र का पठार’ जबकि पूर्वी भाग में पूर्वी ‘विदर्भ का पठार’ कहते हैं। इसी तरह से आन्ध्र प्रदेश में उत्तर वाला भाग को तेलंगाना का पठार जबकि दक्षिण वाला भाग रॉयल सीमा का पठार कहलाता है। तमिलनाडु में इसे कोयम्बटूर का पठार कहते हैं जबकि कर्नाटक में इसे मैसूर और बंगलोर का पठार कहते हैं।

         महाराष्ट्र के पठार का औसत ऊँचाई 300-900 m है। इसी पठार पर अजन्ता की पहाड़ी स्थित है। विदर्भ के पठार की औसत ऊंचाई 700 9am है। यहाँ पर पतली लावा की परत पायी जाती है। आन्ध्र प्रदेश में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 300-900 m है। और इसकी ढाल बंगाल की खाड़ी की ओर है। कर्नाटक में स्थित पठारों की औसत ऊँचाई 600-900 m है।

        सम्पूर्ण दक्कत के पठार का निर्माण क्रिटेशियस कल्प में हुए दरारी लावा उद्‌गार से हुआ है। इस पठार पर क्षारीय लावा के निक्षेपण से बैसाल्टिक चट्टानों का निर्माण हुआ है। कहीं-2 केन्द्रीय उद्‌गार होने से शंकु पहाड़ियों अनेक क्रेटर एवं कोल्डेरा का निर्माण हुआ है।

(2) कठियाबाड़ का पठार-

         गुजरात के काठियाबाड़ क्षेत्र में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 200-400 m है। इस पठार पर चूनापत्थर और लावा निक्षेपण का प्रमाण मिलता है। इसी पठार पर एक शंकुनुमा गिर की पहाड़ी स्थित है।

(3) उत्तर का पठार- 

               प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में कई छोटे-2 पठार स्थित है। जैसे:

(i) मारवाड़ का पठार-

         यह राजस्थान के जैसलमेर, बीकानेर, बाड़मेर जिला में स्थित है। यह शुष्क मरुस्थलीय प्रदेश के भूदृश्य प्रस्तुत करता है। इनकी औसत ऊँचाई 250-500 m है।

(ii) मेवाड़ का पठार-

           यह राजस्थान के चितौड़, उदयपुर और बाँसवाड़ा जिला में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 250-500 m है। यह पठार काफी उबड़-खाबड़ है। इसी पठार पर हल्दी घाटी का मैदान अवस्थित है।

(iii) मालवा का पठार-

          यह राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है। इसे ढक्कन के पठार का ‘उत्तरी विस्तार’ माना जाता है। मलबा पठार की औसत ऊँचाई 500-600 m मानी जाती है।

(iv) बुंदेलखण्ड के पठार-

          इसका विस्तार दक्षिण-पश्चिम उत्तर प्रदेश और उतरी मध्य प्रदेश के सीमा पर हुआ है। ललितपुर, झाँसी, गुना, विदिशा, ग्वालियर इत्यादि जिले इसी पठार पर अवस्थित है। चम्बल नदी इस पर प्रवाहित होकर उत्खात भूमि का निर्माण करती है। इसकी औसत ऊँचाई 500-600 m है।

(v) बस्तर का पठार और बघेलखण्ड का पठार-

         बस्तर का पठार छतीसगढ़ के दक्षिण में और बघेलखंड का पठार छत्तीसगढ़ के उत्तर में स्थित है। इन दोनों के बीच महानदी के सहायक नदी शिओनाथ (शिवनाथ) सीमा निर्माण करती है। बखेलखण्ड के पठार की औसत ऊँचाई 700-900 m है। जबकि बस्तर के पठार की औसत ऊँचाई 500-700 m है। बस्तर के पठार पर ही दण्डकारण्य क्षेत्र अवस्थित है जो भारत का सबसे अधिक उबड़-खाबड़ वाला क्षेत्र है।

(vi) छोटानागपुर का पठार-

        इसका विस्तार झारखण्ड, द०-पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और छतीसगढ़ में हुआ है। इसकी औसत ऊँचाई 700-900 m है। इस पठार का पश्चिमी भाग सबसे ज्यादा ऊँचा है जिसे पाट (PAT) का पठार कहते हैं। इस पर नेतरहाट नामक पहाड़ी मोनेडनॉक का उदाहरण प्रस्तुत करती है। पाट के पठार के पूरब में में राँची का पठार और हजारीबाग का पठार स्थित है। इन दोनों के बीच में दामोदर नदी सीमा बनाते हुए भ्रंश घाटी में प्रवाहित होती है।

       हजारीबाग पठार पर पारसनाथ के पहाड़ी अवस्थित है। जिसके सबसे अधिक ऊँचाई 1365 m छोटानागपुर पठार के सबसे पूर्वी एवं उतरी भाग को कोडरमा के पठार से सम्बोधित करते हैं। हाजारीबाग और कोडरमा पठार के बीच में कोडरमा की घाटी और चतरा की घाटी स्थित है।

(vii) मेघालय का पठार-

         यह मेघालय राज्य में स्थित है। इसे प्रायद्वीपीय भारत का ही एक भाग माना जाता है। राजमहल गैप के द्वारा यह प्रायद्वीपीय भारत से पृथक है। इस पठार पर गारो, खाँसी और जयन्तिया तीन शंकु पहाड़ी स्थित है।इस प्रकार की औसत ऊँचाई 700-900 m है।

निष्कर्ष

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रायद्वीपीय भारत अनेक पर्वतों और अनेक पठारों से निर्मित है। इसके भूदृश्य पर वाह्य एवं आन्तरिक कारकों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

32. चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार (Rocks and its Types)

चट्टानें एवं चट्टानों का प्रकार

(Rocks and its Types)


चट्टानें

           भू-पटल निर्माण करने वाले पदार्थों को चट्टान कहते है अर्थात भू-पटल का निर्माण चट्टानों से हुआ है। चट्टानें मुख्यतः खनिजों के संयोग से बनती हैं, अर्थात् चट्टानें खनिजों का समुच्चय हैं। पृथ्वी पर लगभग 200 प्रकार के खनिज पाये जाते हैं। इनमें 24 ऐसे हैं, जो मुख्यतः भू-पृष्ठ की चट्टानों का निर्माण करते हैं।

     अत: इन्हें चट्टान निर्माणक खनिज कहा जाता है। ये खनिज मुख्यतः सिलिकेट, ऑक्साइड एवं कार्बोनेट के रूप में पाये जाते हैं। इन चट्टान निर्माणकारी खनिजों में सिलिकेट सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है एवं इसके बाद ऑक्साइड का स्थान आता है। जैव पदार्थों से निर्मित चट्टानों में खनिज नहीं मिलता है, जैसे- कोयला। चट्टानें पत्थर की तरह कड़ी एवं पंक की तरह मुलायम हो सकती हैं।

चट्टानों के प्रकार (Types of Rocks)

       उत्पत्ति के आधार पर चट्टानों को तीन भागों में बांटा गया है-

1. आग्नेय (Igneous) 

2. अवसादी (Sedimentary) 

3. कायांतरित (Metamorphic)

1. आग्नेय चट्टानें (Igneous Rocks):-

        आग्नेय चट्टानों का निर्माण मैग्मा के ठंडा होकर जमने एवं ठोस होने से होता है। चूंकि सर्वप्रथम इसी चट्टान का निर्माण हुआ, अतः इसे प्राथमिक चट्टान (Primary Rock) भी कहा जाता है। ये आधारभूत चट्टानें हैं, जिनसे परतदार एवं रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है।

⇒ ये चट्टानें रवेदार (Crystalline) होती हैं। जब मैग्मा धरातल पर आकर ठंडा होता है, तब तीव्र गति से ठंडा होने के कारण चट्टानों के रवे बहुत बारीक होते हैं, जैसे- बेसाल्ट। इसके विपरीत जब मैग्मा धरातल के नीचे ठंडा होता है, तब धीरे-धीरे जमने के कारण रवे बड़े-बड़े होते हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

⇒ ये चट्टानें तुलनात्मक रूप से कठोर होती हैं, इनमें जल काफी कठिनाई से जोड़ों के सहारे ही अंदर प्रविष्ट हो पाता है।

⇒ इनमें परत का अभाव होता है, परंतु जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ आग्नेय चट्टानों में जीवों के अवशेष (Fossils) का अभाव होता है।

⇒ ज्वालामुखी चट्टानों में रवों का विकास नहीं होने पर उनका गठन कांच की तरह (Glassy) होता है, जैसे ऑब्सीडियन।

⇒ आग्नेय चट्टानों के उदाहरण- ग्रेनाइट, रायोलाइट, बेसाल्ट, पेग्माटाइट (Pegmatite), साइनाइट (Syenite), डायोराइट (Diorite), एण्डेसाइट (Andesite), गैब्रो (Gabro), डोलेराइट (Dolerite), पेरिडोटाइट (Peridotite) आदि हैं।

चट्टानें

 

आग्नेय चट्टान के प्रकार

     स्थिति एवं संरचना के अनुसार आग्नेय चट्टानें दो प्रकार की होती हैं-

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igneous Rocks)

(i) बहिर्भेदी आग्नेय चट्टान (Extrusive Igneous Rocks)-

           वह आग्नेय चट्टानें जिनका निर्माण सतह के ऊपर लावा के ठंडा होने और जमने से होता है, बहिर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं। इनमें क्रिस्टल बहुत छोटे होते हैं क्योंकि लावा तेजी से जम जाता है। बेसाल्ट एवं रायोलाइट इसका अच्छा उदाहरण है। इस चट्टान की क्षरण से ही काली मिट्टी का निर्माण होता है जिसे रेगुड़ (Regur) कहते हैं।

(ii) अंतर्भेदी आग्नेय चट्टान (Intrusive Igneous Rocks)-

         वह आग्नेय चट्टानें जो सतह के नीचे लावा के ठंडे और ठोस होने से निर्मित होती है, अंतर्भेदी आग्नेय चट्टानें कहलाती है।

      इसके दो पुन: उपवर्ग हैं-

(a) पातालीय चट्टान (Plutonic Rock)

            इसका निर्माण पृथ्वी के अंदर काफी अधिक गहराई पर होता है। इसका नामकरण प्लूटो (यूनानी देवता) के नाम पर किया गया है। जो पाताल के देवता माने जाते हैं। अत्यधिक धीमी गति से ठंडा होने के कारण इसके क्रिस्टल बड़े बड़े होते हैं। ग्रेनाइट चट्टान इसका उदाहरण है।

(b) मध्यवर्ती चट्टान (Hypobyssal Rock)

        ज्वालामुखी के उदगार के समय धरातलीय अवरोध के कारण लावा दरारों, छिद्रों एवं नली में ही जमकर ठोस रूप धारण कर लेता है, बाद में अपरदन की क्रिया के बाद यह चट्टाने धरातल पर नजर आने लगती है। डोलेराइट, मैग्नेटाइट इन चट्टानों के महत्वपूर्ण उदाहरण है।

मध्यवर्ती आग्नेय चट्टानों के विभिन्न रूप/ Different Forms of Intermediate Igneous Rocks:

       जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है। तब आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–Volcano

⇒ जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तो लैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथ स्थलाकृति का निर्माण होता है।

     इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।

⇒ रासायनिक संरचना की दृष्टि से आग्नेय चट्टानों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-

(i) अम्लीय चट्टानें (Acid Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इनका रंग हल्का होता है। ये चट्टानें अपेक्षाकृत हल्की होती हैं, जैसे- ग्रेनाइट।

(ii) क्षारीय चट्टानें (Basic Rocks)-

        इनमें सिलिका की मात्रा कम होती है। इनमें फेरो-मैग्नेशियम की प्रधानता होती है। लोहे की अधिकता के कारण इन चट्टानों का रंग गहरा होता है। इनका घनत्व भी अधिक होता है, जैसे- गैब्रो, बेसाल्ट, रायोलाइट आदि।

⇒ पूर्व की चट्टानों के ऊपर स्थित बेसाल्ट चट्टान टोपी (Caps) के समान दिखाई पड़ता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को ‘मेसा’ (Mesa) कहा जाता है।

⇒ अपरदन के कारण मेसा का अधिकांश भाग कट जाता है एवं उसका आकार छोटा होने लगता है। अत्यंत छोटी आकार वाली मेसा को ‘बुटी’ (Butte) कहा जाता है।

⇒ धरातल के नीचे परतदार चट्टानों के बीच स्थित लावा गुम्बद (जैसे बैथोलिथ) के ऊपर की मुलायम चट्टानें अपरदन द्वारा नष्ट होती जाती हैं। इस प्रकार लावा गुम्बद धरातल पर दिखने लगता है एवं यह अवरोधक (Resistant) चट्टान संकरी एवं लंबी कटक में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रकार की स्थलाकृति को “होगबैक’ (Hogback) कहा जाता है।

⇒ हौगबैक से मिलती-जुलती एक स्थलाकृति, जिसका ढाल एवं डिप (Dip) झुका हुआ हो ‘कवेस्टा’ (Questa) कहलाती है।

2. अवसादी या तलछटी या परतदार चट्टानें (Sedimentary or Stratified Rocks):-

      ये वे चट्टानें हैं जिनका निर्माण विखण्डित ठोस पदार्थों, जीव-जन्तुओं एवं पेड़-पौधों के जमाव से होता है।

⇒ इन चट्टानों में अवसादों की विभिन्न परतें पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जीवावशेष (Fossils) पाये जाते हैं।

⇒ धरातल का 75% भाग अवसादी चट्टानों से ढका हुआ है एवं शेष 25% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से आवृत्त है।

⇒ यद्यपि अवसादी चट्टानें धरातल का अधिकांश भाग आवृत्त किये हुए हैं, फिर भी भूपटल के निर्माण में इनका योगदान 5% ही है, शेष 95% भाग आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों से निर्मित है। इस प्रकार परतदार चट्टानों का महत्त्व क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से है, भू-पृष्ठ में गहराई की दृष्टि से नहीं।

⇒ ये चट्टानें रवेदार नहीं होती हैं।

⇒ ये चट्टानें क्षैतिज रूप में बहुत कम पाई जाती हैं। पार्श्ववर्ती दबाव के कारण परतों में मोड़ पड़ जाता है, अतएव ये चट्टानें सामूहिक रूप से अपनति एवं अभिनति के रूप में पायी जाती हैं।

⇒ इन चट्टानों में जोड़ (Joints) पाये जाते हैं।

⇒ ये चट्टानें प्रायः मुलायम होती हैं (जैसे- चीका मिट्टी, पंक आदि), परन्तु ये कड़ी भी हो सकती हैं (जैसे- बलुआ पत्थर)।

⇒ ये शैलें अधिकांशतः प्रवेश्य (Porous) होती हैं, परंतु चीका मिट्टी जैसी परतदार चट्टानें अप्रवेश्य भी हो सकती हैं।

⇒ इनका निर्माण अधिकांशतः जल में होता है। परंतु लोएस जैसी परतदार चट्टानों का निर्माण पवन द्वारा जल के बाहर भी होता है। बोल्डर क्ले (Boulder Clay) या टिल (Till) हिमानी द्वारा निक्षेपित परतदार चट्टानों के उदाहरण हैं, जिसमें विभिन्न आकार के चट्टानी टुकड़े मौजूद रहते हैं।

3. रूपांतरित या कायांतरित चट्टानें (Metamorphic Rocks):-

     जब ताप, दबाव, रासायनिक क्रियाओं आदि के प्रभाव से आग्नेय एवं परतदार चट्टानों का रूप परिवर्तित हो जाता है, तो रूपांतरित चट्टानों का निर्माण होता है। कभी-कभी रूपांतरित चट्टानों का भी रूपांतरण हो जाता है।

    इस क्रिया को पुनः रूपान्तरण कहा जाता है। रूपांतरण के फलस्वरूप चट्टानों की मूलभूत विशेषताएं जैसे- घनत्व, रंग, कठोरता, बनावट, खनिजों का संघटन आदि आंशिक या पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती हैं।

    कायांतरित चट्टानों के उदाहरण

⇒ आग्नेय से कायांतरित चट्टान-

ग्रेनाइट- नीस,

बेसाल्ट- एम्फी बोलाइट

ग्रेबो- सर्पेन्टइन

⇒ अवसादी से कायांतरित चट्टानें-

बालुवा पत्थर- क्वार्टजाइट,

चूना पत्थर– संगमरमर,

शेल- स्लेट,

कोयला-  ग्रेफाइट, हीरा,

⇒ रूपांतरित चट्टान से पुन: रूपांतरित चट्टान

स्लेट- शिष्ट

शिष्ट- फायलाइट

✍️ Migmatite (मिग्माटाइट) का निर्माण मुख्यतः Gneiss (नाइस) के आंशिक पिघलने (Partial Melting / Anatexis) से होता है।

✍️ Hornfels (हॉर्नफेल्स) मुख्यतः शेल (Shale) के तापीय/संपर्क कायांतरण (Contact Metamorphism) से बनता है।

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