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11. गंगा का मैदान

11. गंगा का मैदान


गंगा का मैदान

          गंगा भारत की सबसे प्रमुख नदी है जो गंगोत्री हिमानी से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गंगा हरिद्वार के पास मैदानी क्षेत्र में प्रविष्ट करती है। और उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और बांगलादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। गंगा नदी की कई सहायक नदियाँ हैं जो हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से आकर गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा का मैदान मूलतः जलोढ़ मिट्टी के निक्षेपण से बना है। इस मैदान में जलोढ़ मिट्टी की गहराई 20oo m है।

          बुर्राड के अनुसार इस मैदान का निर्माण रिफ्ट घाटी में मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर यह मैदान कई भागों में बँटा है। जैसे:-

उत्तरी गंगा का मैदान

(1) रोहिल खण्ड का मैदान

(2) अवध का मैदान

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान

(4) मिथलांचल के मैदान के रूप में विभक्त है।

         जबकि दक्षिणी गंगा का मैदान–

(1) बुंदेलखण्ड

(2) इलाहाबाद

(3) भोजपुर

(4) मगध और

(5) अंग के मैदान के रूप विभक्त है।

            भूगोलवेताओं ने गंगा के मैदान को प्रादेशिक स्तर पर तीन भागों में वर्गीकृत करके अध्ययन करने का प्रयास किया है।:-
(1) ऊपरी गंगा का मैदान

(2) मध्य गंगा का मैदान

(3) निम्न गंगा का मैदानगंगा का मैदान(1) ऊपरी गंगा का मैदान

          इसका विस्तार पश्चिम में अरावली पर्वत से लेकर पूरब में इलाहाबाद तक हुआ है। इस मैदान में उत्तर से दक्षिण की ओर गंगा और यमुना नदी प्रवाहित होती है जबकि दक्षिण से उत्तर की ओर और पुनः पश्चिम से पूरब की ओर चम्बल नदी प्रवाहित होती है। इस मैदान के उत्तर में भावर, बाँगर, तराई जैसी संरचनाएँ मिलती है। जबकि दक्षिणी भाग में उत्खात भूमि का निर्माण करता है। यह क्षेत्र पश्चिम उत्तर प्रदेश का भाग है। उपजाऊ मिट्टी का क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र अन्न भण्डार के रूप में प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख आर्थिक गतिविधि कृषि कार्य हैं। गंगा और यमुना के दोआब क्षेत्र सदियों से कृषि के लिए प्रसिद्ध रही है।

(2) मध्य गंगा का मैदान

         इसका विस्तार इलाहाबाद से राजमहल की पहाड़ी तक हुई है। पूर्वी उतर प्रदेश और संपूर्ण बिहार मध्य गंगा के मैदान में स्थित है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 50-100 m तक है। इस क्षेत्र में नदियाँ मोड़ लेकर प्रवाहित होती है जिसके कारण नदियों के किनारे पर गोखुर झील का निर्माण होती है। जगह-2 पर दियारा क्षेत्र का विकास हुआ है। मध्य गंगा के मैदान में पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र का विकास हुआ है। पुन: बाढ़ से मोकामा के बीच में टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। 

        कोशी, बागमती, गण्डक जैसी नदियाँ हमेशा मार्ग बदलने के लिए प्रसिद्ध है। इन नदियों के पुराने मार्गों को चौर कहा जाता है। उत्तर बिहार के लोग मछली पालन, तालमखाना की खेती करते हैं।

           मध्य गंगा का मैदान कृषि के लिए प्रसिद्ध है। नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। तराई वाले क्षेत्र में गन्ना की खेती की जाती है। गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर केला, परबल, तरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की खेती की जाती है। पुन: चौर क्षेत्र में मछली और तालमखाना की खेती होती है। पुर्णिया, कटिहार, किशनगंज के क्षेत्र जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मध्यवर्ती गंगा के मैदान का दक्षिणी भाग चावल, गेहूँ, दलहन, तेलहन, सब्जी इत्यादि के उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में बरौनी एक मात्र औद्योगिक नगर

(3) निम्नगंगा का मैदान

          इसका विस्तार राजमहल की पहाड़ी से गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह मूलत: पश्चिम बंगाल और बांगलादेश में विस्तृत है। इस मैदान का ऊपरी भाग ‘बारिन्द क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है। जबकि इसका दक्षिण भाग डेल्टा के लिए प्रसिद्ध है। इसी मैदान में विश्व का सबसे बड़ा गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा स्थित है। इसका निर्माण खादर मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इस क्षेत्र में नदियाँ कई वितरिकाओं (शाखाओं) में बँटकर प्रवाहित होती है। समुद्री ज्वार के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में दलदली भूमि का भी विकास हुआ है।

        निम्नगंगा के मैदान आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। जैसे डेल्टाई क्षेत्र मैंग्रोव/ सुन्दरवन / ज्वारीय वनस्पति के लिए प्रसिद्ध है। इसमें सुंदरी, बेंत इत्यादि वृक्ष बड़े पैमाने पर मिलते हैं। हुगली नदी घाटी के किनारे वाला भाग जूट उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध है जबकि शेष भाग चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पुन: इस मैदान का ऊपरी क्षेत्र (दार्जलिंग वाला क्षेत्र) उत्तम किस्म के चाय बाँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के उत्तर में अवस्थित गंगा का मैदान अपने विशिष्ट भौतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास



हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास 

        कई पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन के कारण प्राचीन टेथिस सागर में नदियों के द्वारा लाकर मलवा जमा किये जाने तथा उनमें पड़े वलन की क्रिया से हिमालय जैसे पर्वत का निर्माण हुआ है। भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय पर्वत का निर्माण केनोजोइक महाकल्प के तृतीयक काल में हुए अल्पाइन भूसंचलन से हुआ है। पुन: भूवैज्ञानिकों के अनुसार ओलीगोसीन में महान हिमालय, मायोसीन में मध्य हिमालय तया प्लायोसीन एवं प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

       हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के उत्पान और विकास का स्पष्ट प्रभाव नदी के प्रतिरूप पर पड़ा है। जैसे:-   

    कई प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों का मत है कि तृतीयक काल में लघु हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर एक विशालकाय नदी थी जो पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती थी। यह नदी उत्तर-पश्चिम भारत में जाकर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती थी। पैस्को और पिल्ग्रीम जैसे भूगोलवेताओं ने इस प्राचीन नदी का नाम शिवालिक नदी या ‘इण्डो ब्रह्मा नदी’ दिया है।

       जब इस नदी में हिमालय के नदियों द्वारा मलवा का लगातार निक्षेपण होता रहा तो इसकी तली में दबाव की क्रिया के कारण इस मलवा में पुन: उत्थान की क्रिया सम्पन्न हुई। इस उत्थान से शिवालिक नदी का जल ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने से कई अनुवर्ती नदियों का जन्म हुआ। ये नदियाँ काफी छोटी-2 हैं और मे उत्तर भारत की मुख्य नदियों की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

       सिन्धु, सतलज, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ पूर्ववर्ती नदी के उदाहरण है। पूर्ववर्ती नदी तात्पर्य वैसे नदी से है जिसका निर्माण किसी भी प्रदेश के उत्थान के पूर्व से ही नदी की प्रवाह जारी है। उपरोक्त पूर्ववर्ती नदी के बारे में भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय के उत्थान का दर नदी के अपरदन के दर से कम था जिसके कारण उपरोक्त पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय पर्वत को जगह-2 पर अपरदित करके गहरे गॉर्ज और दर्रों का निर्माण की हैं।

         जैसे- सिन्धु नदी नंगा पर्वत के पास काटकर विश्व का सबसे गहरा गॉर्ज सिन्धु गॉर्ज 5200 मी० गहरा का निर्माण करती है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरबा के पास गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है। सतलज नदी महान हिमालय को काटकर शिपकीला दर्रा का निर्माण करती है।

        शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में ‘बोल्डर क्ले’ के जमाव से भावर प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण की प्रक्रिया भी हिमालय के विकास से जुड़ा हुआ है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब भावर प्रदेश से गुजरती हैं तो मे विलुप्त हो जाती है जिससे ‘खण्डित अपवाह तंत्र’ का निर्माण करती है। पुनः ये नदियाँ मैदानी क्षेत्र में दृष्टिगत होने लगती है और ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने की प्रवृति रखती हैं जिसके कारण “समानान्तर प्रतिरूप” का विकास करती हैं। पुनः हिमालय से निकलने वाली नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं में विभक्त हो जाती है जिससे गुंफिट या जालीदार प्रतिरूप का विकास होता है।

         हिमालय पर्वत का अक्ष एक चाप के समान है जो पूरब से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है। हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढाल तीव्र और उत्तरी ढाल मंद है। वलन की क्रिया से हिमालय पर्वत में कई अनुप्रस्थ एवं अनुद्धैर्य घाटियों का विकास हुआ है। अनुद्धैर्य घाटियों से होते हुए नदियाँ प्रवाहित होती थीं लेकिन जब हिमालय का विकास या उत्थान होने लगा तो अनुद्धैर्य घाटियों में प्रवाहित होने वाली जल प्रवाह बाधित हो गई, जिसके कारण इन अनुद्धैर्य घाटियों में कई बड़े-2 झीलों का निर्माण हुआ।

          इन झीलों में जब जल की मात्रा अधिक हो गई तो पहाड़ों के ऊपर से प्रवाहित होने लगी। जिसके फलस्वरूप बहते हुए जल से कई स्थानों पर हिमालय पर्वत को काटकर अनुप्रस्थ घाटियों का निर्माण कर ली। इन संपूर्ण परिघटना से हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में समान आयताकार अपवाह तंत्र का विकास हुआ है। जैसे- कोसी नदी अपने उद्‌गम क्षेत्र में आयताकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

        हिमालय के उत्थान के पूर्व कई ऐसी नदियाँ थी जो भिन्न-2 दिशाओं से आकर टेथिस सागर में आकर गिरती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के बाद बड़ी-बड़ी नदियों ने छोटी-2 नदियों के जल को अपहरण कर लिया जिससे क्रमहीन अपवाह तंत्र का विकास हुआ। जैसे- ब्रह्मपुत्र नदी ने लोहित एवं दिवांग नदी के जल को अपहृत कर ‘क्रमहीन अपवाह तंत्र’ का विकास किया है।

       भूगर्भशास्त्रियों का अनुमान है कि प्राचीन काल में सतलज और यमुनी नदी राजस्थान से होकर बहती थी। पुन: सरस्वती नामक पौराणिक नदी प्रयागराज के पास आकर गंगा से मिलती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के दौरान उ०-प० भारत में हुए उत्थान से सतलज नदी का अपवाह क्षेत्र खिसक कर उ०-प० की तरफ चला गया और सरस्वती एवं यमुना नदी आपस में मिलकर एक नदी के रूप में प्रवाहित होकर मिलने लगी। इस तरह हिमालय के उत्थान एवं विकास से उ०-प० भारत के नदी तंत्र में कई परिवर्तन हुए।

निष्कर्ष

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊपर हिमालय के उत्थान एवं विकास का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। यही कारण है कि हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नदी के अनेक प्रतिरूप दिखाई देते है।

हिमालय के विकास के संदर्भ

चित्र: हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास की विवेचना करें।

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य



प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

        दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार हुआ है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी. है। इसका आकार एक त्रिभुज के समान है। यह 1600 किमी० हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750 मी० मानी गयी है।

          प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल, गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करती हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे “पठारों का पठार” भी कहा जाता है। प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेन्जिया के समकालीन चट्टानें पायी जाती हैं।

        प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच और भूदृश्य का अध्ययन नीचे के दो शीर्षकों में किया जा रहा है। 

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

(2) प्रायद्वीपीय भारत के पठार

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

         प्रायद्वीपीय भारत में छोटी-बड़ी कई पर्वतीय श्रंखलाएँ मिलती है। जैसे-

(i) पश्चिमी घाट-

       यह प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित है। यह अरब सागर के समानान्तर लेकिन तट से दूर स्थित है। लेकिन कर्नाटक में यह श्रृंखला समुद्र के नजदीक आ जाती है। इसका विस्तार उत्तर में ताप्ती नदी के मुहाना से दक्षिण में कन्याकुमारी तक हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इसकी औसत ऊँचाई 915 मी० है। पश्चिमी घाट को कई छोटे-2 भागों में विभक्त कर उसके भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

       ताप्ती नदी से लेकर 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट को सह्याद्री पर्वत कहते है जिसकी सबसे ऊँची चोटी कालसुबाई (1646 मी०) है। 

    16º उतरी अक्षांश के दक्षिण वाले भाग की सबसे ऊँची चोटी कुद्रेमुख (1892 मी०) है। पश्चिमी घाट के तीसरी शाखा का प्रारंभ नीलगिरि से होता है क्योंकि यहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी घाट आपस में आकर मिल जाती है।

     ताप्ती से 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट पर्वत के ऊपर बैसाल्ट चट्टान या लावा उदगार का प्रमाण मिलता है। इसमें थालघाट और भोरघाट दो प्रसिद्ध दर्रे है। गोदावरी और कृष्णा नदी का क्षेत्र में उद्‌गम स्थल पाया जाता है। इस क्षेत्र में स्थित पहाड़ का एक भाग धँसकर भ्रंशोत्थ/ब्लाँक पर्वत का निर्माण करता हैं।

      16º उत्तरी अक्षांश से नीलगिरि पहाड़ी तक अवस्थित पश्चिमी घाट की ऊँचाई बहुत अधिक है। लेकिन इसका पश्चिमी ढाल अधिक तीव्र है जबकि पूर्वी ढाल मंद है।

       पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के मिलने से एक गाँठ का निर्माण होता है जिसे नीलगिरी कहते हैं। नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी दोदाबेटा (2636 मी०) है। इसी पहाड़ी पर ऊपर बहुत ही प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ऊँटी (उटकमण्डलम्) है।

       नीलगिरि के दक्षिण में क्रमश: अन्नामल्लई, कार्डमम, नागर कोयल और स्वामी विवेकानन्द रॉक अवस्थित है। इसे सम्मिलित रूप से दक्षिण की पहाड़ी के रूप में सम्बोधित करते हैं। अन्नामलाई की सबसे ऊँची चोटी अन्नाईमुडी (2695 मी०) है। अन्नामलाई के उत्तर-पूर्व में पालिनी पर्वत श्रृंखला है जिस पर कोडाईकनाल नामक पर्वतीय नगर अवस्थित है।

         नीलगिरि और अन्नामलाई के बीच में पाल नायक दर्रा स्थित है जो किसी प्राचीन नदी के अपरदन द्वारा निर्मित है। इसी तरह अन्नामलई और कार्डमम पहाड़ी के बीच में शेनकोटा दर्रा अवस्थित है। शेनकोट दर्रा के दक्षिण में पहाड़ियों की ऊँचाई बहुत कम हो जाती है और अन्ततः हिन्द महासागर में प्रक्षेपित हो जाती है। इसका अन्तिम बिन्दु स्वामी विवेकानन्द रॉक कहलाता है।

(ii) पूर्वीघाट

        पूर्वी घाट प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी तट के समानान्तर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर फैला है। यह तट से 200-400 किमी० अन्दर अवस्थित है। इस पर्वत का निर्माण कुडप्पा संरचना से हुआ है। इसमें डोलोमाइट, खोंडोलाइट, चर्कोनाइट जैसे खनिजों से निर्मित चट्टान पाए जाते हैं।

       यह एक विखण्डित श्रृंखला है क्योंकि इसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा जैसी नदियों ने जगह-2 पर काट डाला है। पूर्वी घाट की औसत ऊँचाई 900 मी० मानी जाती है। पूर्वी घाट को मूलतः तीन भागों में बाँटकर भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(a) धुर उत्तरी भाग-

      यह महानदी के उत्तर में अवस्थित है। उड़ीसा के मयूरभंज में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इस भाग में कई पर्वतीय चोटी मिलती है। जैसे- मलयगिरि (1187 मी०), मेघासनी (1165 मी०), गन्धमार्तन (1160 मी०) इत्यादि। उड़ीसा में अवस्थित सम्मिलित पर्वतीय श्रृंखला को ‘मलयास्क’ के नाम से जानते हैं।

      उड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश में पूर्वी समुद्रतट के समानांतर पूर्वी घाट उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इन क्षेत्र में पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरि (1501 मी०) अवस्थित है। गोदावरी नदी पूर्वी घाट को काटकर गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है।

(b) मध्यवर्ती श्रृंखला- 

       कृष्णा नदी से लेकर पेलार नदी के बीच स्थित पूर्वीघाट श्रृंखला को मध्यवर्ती श्रृंखला कहते हैं। इनमें नालामाला, पालकोंडा, वेलीकोंडा श्रृंखला प्रमुख हैं। पालकोंडा और वेलीकोंडा पहाड़ी के मध्य भाग से पनेरू नदी प्रवाहित होती है।

(c) तमिलनाडु श्रृंखला-

        पूर्वीघाट को तमिलनाडु में जावदी, गिंजी, शिवराय पहाड़ी के नाम से जानते हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से पृथक-2 हैं।

      पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट बीच-2 में आपस में जुड़े हुए हैं। जैसे- मुम्बई और हैदराबाद के बीच हरिचन्द्र पर्वत और बालाघाट पर्वत स्थित है और बंगलोर के पास बाबाबुदन तथा श्रीसैलम पहाड़ी से जुड़ी हैं।

अरावली पर्वत

       अरावली पर्वत राजस्थान में द०-प० से उ०-पू० दिशा में अवस्थित है। इसका विस्तार गुजरात के सीमा से लेकर दिल्ली तक हुआ है। दिल्ली में अरावली पर्वत को ‘दिल्ली कटक’ के नाम से जानते हैं। हिमालय और अरावली पर्वत के बीच में एक गैप है जिसे अम्बाला गैप कहते हैं। अरावली न सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे पुरानी पर्वत है। यह कभी विश्व का सबसे लम्बा वलित पर्वत हुआ करता था लेकिन अब अवशिष्ट पहाड़ी के रूप में बदल चुका है। इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर (1722 मी०) है जो राजस्थान के सिरोही जिला में माउण्ट आबू के पास स्थित है।

         अरावली की लम्बाई 800 किमी० और औरत ऊँचाई 700-900 मी० मानी जाती है। अरावली में कई दर्रे भी मिलते हैं जिसमें पिपलीघाट, देवारी, बेसूर दर्रा सबसे प्रमुख हैं। इसके गर्भ में कई खनिज पाये जाते हैं। इसलिए इसे राजस्थान के ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के कारण कई स्थानों पर यह विखण्डित हो चुकी है। लेकिन दक्षिण-पश्चिम अरावली पर्वतीय भाग की ऊँचाई आज भी पर्याप्त है।

सतपुड़ा पर्वत

      सतपुड़ा एक ब्लॉक पर्वत है जो नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटी के बीच अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 900-1100 मी० है। सतपुड़ा श्रृंखला के पूरब में महादेव, मैकाल, रामगढ़ और गढ़‌जात की पहाड़ी अवस्थित है। सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी धूपगढ़ (1350 मी०) है। जबकि मैकाल की सबसे ऊँची चोटी अमरकंटक (1127 मी०) है। मैकाल पर ही पंचमढ़ी नामक पर्वतीय पर्यटक नगर अवस्थित है। सतपुड़ा पर्वत के समान्तर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिला में अजन्ता की पहाड़ी और नागपुर में गाविलगढ़ की पहाड़ी स्थित है।

विन्ध्यन पर्वत

        विन्ध्यन पर्वत प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी सीमा का निर्माण करती है। यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-700 मी० है। इस पर्वत का उत्तरी ढाल भ्रंशन  क्रिया से बना है जिसके कारण उत्तरी भाग का ढाल तीव्र है जबकि दक्षिणी भाग का ढाल मंद है। इसका विस्तार गुजरात की सीमा से लेकर बिहार के गंगा नदी तक हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर इसे क्रमश: विन्ध्यन पर्वत, भारनेर पर्वत, कैमूर की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी और खड़‌गपुर की पहाड़ी के नाम जानते हैं।

राजमहल की पहाड़ी

      राजमहल की पहाड़ी बिहार और झारखण्ड की सीमा पर भागलपुर के पास अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-7oo मी० है। यह उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला हुआ है। राजमहल पहाड़ी के कारण गंगा नदी को भागलपुर के पास उत्तरायण होना पड़ता है। राजमहल की पहाड़ी पर जूरासिक काल में हुए लावा का प्रमाण मिलता है।

गारो, खांसी और जयंतिया की पहाड़ी

      ये मेघालय राज्य में पश्चिम से पूरब की ओर क्रमशः फैला हुआ है। गारो एक अलग पहाड़ी के रूप में अवस्थित है जबकि खाँसी और जयन्तिया आपस में जुड़े हुए हैं। जयन्तिया पहाड़ी से एक भाग पृथक होकर काफी पूरब की ओर चला गया है जिसे मिकिर की पहाड़ी कहते हैं जो असम में अवस्थित है। गारो, खाँसी जयन्तियाँ की सबसे ऊँची चोटी नॉरकेक है जो गारो पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन औसत ऊँचाई के दृष्टिकोण से जयन्तिया की पहाड़ी सबसे ऊँची है। जबकि गारो पहाड़ी सबसे नीची है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य की विशेषता का चर्चा करें।

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र



गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र  

          गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत की सबसे प्रमुख नदी हैं। ये नदियाँ लम्बी है तथा अनेक छोटी एवं बड़ी महत्त्वपूर्ण नदियाँ इनमें आकर मिलती हैं। इनके सम्मिलित रूप को गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र कहते हैं। इनकी चर्चा हम दो अलग-2 नदी तंत्र में कर रहे हैं।

(1) गंगा नदी तंत्र

    गंगा भारत के सबसे बड़े भाग की नदी तंत्र है। इसका विस्तार लगभग 18 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर है जिसका 8.6 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र भारतीय सीमा के अन्तर्गत है। यह हिमालय के पर्वतीय भाग से लेकर मैदान तथा दक्षिण के पठारी भाग तक विस्तृत है। गंगा नदी तंत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हैं। इसका विकास हिमालय के उत्थान के बाद हुआ लेकिन इसको विकसित करने में पूर्ववर्ती का भी योगदान रहा है। इस नदी तंत्र में गंगा मुख्य नदी है।

     गंगा नदी महान हिमालय में गंगोत्री के पास गोमुख हिमानी से निकलती है। इसकी आरंभिक धारा को ‘भागीरथी’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड के देवप्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा धारा आकर मिलती है। दोनों की सम्मिलित धारा को ‘गंगा’ कहते हैं। हरिद्वार तक गंगा पर्वतीय भाग से गुजरती है। इसके बाद यह मैदान में प्रवेश करती है। इलाहाबाद के निकट गंगा में यमुना नदी मिलती है। यमुना नदी महान हिमालय में यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। यमुना की सहायक नदी चम्बल, कालीसिन्ध, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं। बिहार के चौसा (बक्सर) नामक स्थान पर गंगा बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार तथा भागलपुर जिले के बाद झारखण्ड होते हुए गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

      गंगा के दाहिने किनारे पर यमुना, टोंस, सोन, पुनपुन, किऊल इत्यादि नदियाँ आकर मिलती हैं। इसमें यमुना को छोड़कर में सभी नदियाँ प्रायद्वीपीय उच्चभूमि से निकलती हैं। गंगा के बाएँ किनारे पर हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ जैसे- रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, बुढी गण्डक, कोसी, महानन्दा इत्यादि आकर मिलती हैं।

     दाहिने एवं बाएँ किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूरब दिशा में पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। फरक्का गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी भाग है। यहाँ गंगा नदी दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा हुगली के नाम से दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

      गंगा की मुख्य धारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। यहाँ गंगा नदी को “पदमा” कहा जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिलती है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की सम्मिलित धारा को “मेघना” कहा जाता है। अन्ततः यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इन नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को “सुन्दरवन का डेल्टा” कहते हैं।

(2) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

       इस नदी तंत्र की ब्रह्मपुत्र सबसे प्रमुख नदी है। बह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व 80 किमी० की दूरी पर स्थित हिमानी से निकलती है। इसकी लम्बाई 2900 किमी० है। यह नदी तिब्बत में सांग्पो ने नाम से हिमालय के समानान्तर पूरब की ओर बहती है। पूरब में नामचा बरबा पर्वत को काटकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में बह्मपुत्र नदी को ‘दिहांग’ कहा जाता है। इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। असम के डुबरी जिले के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से प्रवेश करती है। यहाँ गंगा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

       ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में दिवांग, लुहित, स्वर्णसिरी, धनसीरी, भाद्री, बण्डी, बुढ़ी दिहंग, मानस, सकोंश, तिस्ता, दिसांग, दिखो, कुलसी, कपिली, कोपिती इत्यादि हैं।

     प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में यह नदी अपने किनारों से ऊपर बहने लगती है एवं बाढ़ के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में अधिक क्षति पहुँचती है।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

गंगा ब्रह्मपुत्र नदी

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय) / Drainage System

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय)

(Drainage System)



अपवाह तंत्र

           भारत एक विशाल देश है। हिमालय पर्वत, अरावली पर्वत, विन्ध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत और पश्चिमी घाट मिलकर महान जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। उद्गम क्षेत्र के आधार पर भारतीय नदियों को दो प्रमुख वर्ग में बाँटा जाता है।:-

(1) हिमालय से निकालने वाली नदियाँ
(2) प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ

       उपरोक्त दोनों स्रोतों से निकलने वाली नदियों की अलग-2 विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन नीचे किया जा रहा है:-

(i) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ सदावाहिनी/सदानीरा होती हैं और पठारीय नदियाँ सदावाहिनी नहीं होती है। क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियों का स्रोत ग्लेशियर/ हिमानी होता है। जबकि पठारी क्षेत्र की नदियों का स्रोत क्षेत्र हिमानी नहीं हैं। फिर पठारी भारत के सभी बड़ी नदियों में सालोंभर जल का प्रवाह होता है जिसका प्रमुख कारण उनके उद्गम क्षेत्र में झील या जलप्रपात का मिलना है।

(ii) हिमालय स्रोत की नदियाँ लम्बी होती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटी होती है। इसका प्रमुख कारण हिमालय की महाद्वीपीय स्थिति और दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय का होना है। हिमालय एक महाद्वीपीय पर्वत होने के कारण निकलने वाली नदियों के उद्‌गम एवं मुहाना क्षेत्र काफी पूर्व हो जाता है। इसलिए हिमालय क्षेत्र की नदियाँ लम्बी होती है। पुन: हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे पूर्ववर्ती नदी मिलते हैं जो हिमालय के उत्थान से पूर्व से ही प्रवाहित होते आ रहे हैं। जैसे- ब्रह्मपुत्र की लम्बाई 2960 किमी०, सिन्धु की लम्बाई 2880 किमी०, गंगा नदी की लम्बाई 2525 किमी० तक पायी जाती है।

       इसके विपरीत पठारीय भारत के अधिकांश नदियों का उद्गम क्षेत्र प० घाट के पूर्वी ढाल और पश्चिमी ढाल पर पायी जाती है। पश्चिमी ढाल से निकलने वाली नदियाँ तुरंत (समुद्र) में जाकर मिल जाती है। पश्चिमी घाट के पश्चिम में बहने वाली सबसे लम्बी नदी पेरियार (80 किमी०) है। पुनः पश्चिमी घाट पूर्वी ढाल से निकलने वाली नदियों में गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 1465 किमी० है।”

अपवाह तंत्र

(iii) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ वृहद् नदी बेसिन का निर्माण करती है जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटे बेसित का निर्माण करती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र नदियों का मार्ग लम्बा होता है तथा समतलीय मैदान से होकर गुजरती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ तीव्र ढाल से होकर गुजरने के कारण एवं प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण नदी बेसिन का आकार छोटा हो जाता है।

(iv) हिमालय प्रदेश के नदियों की अपरदनात्मक क्षमता तीव्र होती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियाँ युवा अवस्था से होकर गुजर रही है। इसके विपरीत द० भारत की नदियाँ वृद्धा अवस्था से होकर गुजर रही है जिसके कारण उनके अपरदनात्मक क्षमता में जबड़स्त कमी आयी है। हिमालय क्षेत्र की नदियाँ प्राय: V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। वहीं प्रायद्वीपीय भारत नदियाँ खुली हुई V-आकार के घाटी का निर्माण करती है।

(v) हिमालय प्रदेश की नदियाँ कई प्रकार के अपवाह विशेषताओं को विकसित करती है। जैसे- पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्षाकार अपवाह प्रणाली, मैदानी क्षेत्र में समामान्तर और मोड़ लेती हुई अपवाही प्रणाली और मुहाना पर जालीनुमा अपवाह प्रणाली का विकास करती है। यद्यपि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ प्रायः वृक्षाकार अपवाह प्रणाली विकास करती है।

         पुनः प्रायद्वीपीय भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अलग-2 प्रतिरूप का निर्माण करती है। जैसे अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समानान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है क्योंकि तीव्र ढाल से प्रवाहित होने के कारण मलवा का निक्षेपण नहीं हो पाता है जबकि बंगाल की खाड़ी की ओर गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ लम्बी दूरी तय करती है और तुलनात्मक दृष्टिकोण से मंद ढाल से प्रवाहित होती है। इसलिए वृक्षाकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

(vi) हिमालय प्रदेश की नदियाँ मुहाना पर डेल्टा का निर्माण करती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की वे नदियाँ जो अरब सागर में गिरती है वे डेल्टा के स्थान पर एश्चुरी का निर्माण करती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी डेल्टा का निर्माण करती है।

(vii) हिमालय प्रदेश की नदियों में दो बार जलस्तर ऊपर उठता है। प्रथमत: वर्षा ऋतु में और द्वितीय ग्रीष्म ऋतु में हिम पिघलने के कारण होती। पठारीय भारत की अधिकांश नदियों में केवल एक बार जलस्तर ऊपर उठती है। लेकिन तमिलनाडु को नदियों में द०-प० मानसून और  उ०-पू० मानसून के कारण जल दो बार उठती है।

(viii) हिमालय क्षेत्र की नदी मार्ग में जलप्रपात और उच्छालिका या क्षिप्रिका केवल पर्वतीय क्षेत्रों में बनती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में इसका प्रमाण सम्पूर्ण मार्ग में देखने को मिलता है।

(ix) हिमालय स्रोत से निकलने वाली कोई भी नदी किसी भी पठारीय नदी की सहायक नदी नहीं है। जबकि पठारीय भाग से निकलने वाली नदियाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों का सहायक नदी है। जैसे- सोन, दामोदर, किऊल, किर्मनाशा, पुनपुन, इत्यादि नदियाँ पठारीय नदी है। गंगा की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

(x) हिमालय स्रोत से निकलने वाली नदियाँ केवल दो मुहाना का निर्माण करती है। प्रथम सिन्धु नदी का मुहाना और द्वितीय गंगा-ब्रह्मपुत्र का मुहाना। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ अनेक मुहानों का निर्माण करती है। जैसे स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती इत्यादि ये सभी के सभी स्वतंत्र मुहानों निर्माण करती है।

(xi) हिमालय प्रदेश की कोई भी ऐसी नदी नहीं है जो भ्रंश घाटी से प्रवाहित होती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नर्मदा, ताप्ती और दामोदर ऐसी नदी है जो भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है।

निष्कर्ष

      इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियों के बीच कई मौलिक अन्तर है। यह अन्तर धरातलीय विशेषताओं के कारण उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के जल प्रवाह तंत्र में प्रकृति-जन्य विभिन्नता बतलाइये।

2. प्रायद्वीपीय भारत की अपवाह संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

3. हिमालय क्षेत्र के अपवाह तंत्र के उत्पत्ति एवं प्रवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।

4. हिमालय और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

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