3. Type of Rural Settlement (ग्रामीण बस्ती के प्रकार)

3.  ग्रामीण बस्ती के प्रकार

(Type of Rural Settlement)



Type of Rural Settlement

बस्ती (Settlement)

     पृथ्वी के धरातल का वह स्थान जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है, उस स्थान को बस्ती कहते हैं। 

      बस्ती दो प्रकार के होते हैं:-

(1) नगरीय बस्ती (Urban settlement) और

(2) ग्रामीण बस्ती (Rural settlement)

              ग्रामीण बस्ती वह है जहाँ की अधिकांश जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं। जहाँ की जनसंख्या का आकार छोटी होती है तथा जनसंख्या में घनत्व कम होता है। विश्व की लगभग 50% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं। वहीं भारत की लगभग 69% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती हैं।   

भौगोलिक कारक:-

            ग्रामीण बस्तियों की उत्पत्ति एवं विकास को प्रभावित करने वाले कारक: 

(A) प्राकृतिक कारक (Natural factors):

(i) जलवायु (Climate)

(ii) उच्चावच (Relief)

(iii) जल की उपलब्ध (Availability of water)

(iv) मिट्टियां (Soils)

(v) सूर्य प्रकाश (Sunlight)

(Vi) वनस्पति (Vegetation)

(B) आर्थिक एवं सामाजिक कारक (Economic and social factors):-

(i) आर्थिक व्यवसाय (Economic Business)

(ii) कृषि व्यवस्था (Agricultural system)

(iii) फसल प्रतिरूप (Cropping pattern)

(iv) परिवहन व्यवस्था (Transportation)

(v) सुरक्षा (Security)

(C) ऐतिहासिक एवं राजनितिक कारक (Historical and political factors):-

(i) जाति व्यवस्था (Caste system)

(ii) जनसंख्या (Population)

(iii) सामाजिक एवं रूढ़ियाँ (Social and conventions)। 

ग्रामीण बस्तियों के प्रकार (Types of rural settlements)

     ग्रामीण बस्तियों का प्रकार किसी बस्ती में मकानों की संख्या एवं मकानों के बीच की पारस्परिक दूरी के आधार पर निश्चित किया जाता है। मोटे तौर पर ग्रामीण बस्तियाँ दो प्रकार की होती हैं, जो निम्नवत है :-

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement) 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (scattered settlements)

(1) गुच्छित ग्रामीण बस्ती/सघन ग्रामीण बस्ती (Compact Settlement)

        अमेरिकी भूगोलवेत्ता प्रेसी ने गुच्छित ग्रामीण बस्ती को “Compact Anglomeration” से सम्बोधित किया है। वैसी ग्रामीण बस्ती जिसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से बिल्कुल सटे-2 हो, वैसी ग्रामीण बस्ती को ही गुच्छित ग्रामीण बस्ती कहते हैं। गुच्छित ग्रामीण बस्ती की मुख्य विशेषता निम्नलिखित है –

(i) मकानों के बीच की दूरी बहुत कम होती है। 

(ii) कम स्थान पर अधिक से अधिक लोग निवास करते हैं।

(iii) सड़‌क एवं गलियाँ पूर्णरूपेण विकसित नहीं होती है। 

(iv) ऐसी बस्तियाँ प्रायः (मानसूनी जलवायु क्षेत्रों) में पायी जाती है। 

गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के कारण

(Reasons for the development of clustered rural settlements)                 

        गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के विकास के पीछे निम्नलिखित कारण सक्रिय होते हैं-  

(i) बाढ़ के मैदान में अधिवास करने योग्य भूमि का अभाव होता है। इसलिए उन क्षेत्रों में मिलने वाला प्राकृतिक बाँध तथा ऊँचे-2 स्थानों पर गुच्छित बस्तियाँ विकसित हो जाती है।

नोट:-  सघन बस्ती (Compact Settlement) को संकेन्द्रित (Concentrated), पुंजित (Clustered), नाभिकीय (Nucleated) एवं एकत्रित/ गुच्छित (Agglomerated) बस्तियों के नाम से भी जाना जाता है।

(ii) मरुस्थलीय क्षेत्रों में गुच्छित बस्तियों का विकास होता है क्योंकि सभी घर के लोग जल स्रोतों से जुड़े हुए रहना चाहते हैं।

(iii) पर्वतीय कटकों के सहारे भी गुच्छित बस्तियां विकसित होती है। जैसे- नागा जनजाति के लोग जानवरों एवं कुकी जनजातियों की भय से पहाड़ों की चोटियों पर निवास करते हैं। चोटियों पर कम भूमि उपलब्ध होने के कारण बस्तियाँ गुच्छित हो जाती है।

(iv) बाढ़ के मैदान में उपजाऊ एवं उर्वर भूमि का महत्त्व अधिक होता है। किसान चप्पे-2 भूमि का प्रयोग कर उसका सदुपयोग करना चाहता है, जिसके कारण अधिवास जैसे अनुत्पादक कार्य के लिए भूमि कम बच जाती है। फलतः गुच्छित बस्तियों का विकास हो जाता है। 

(v) मानसूनी प्रदेशों में और बाढ़ वाले क्षेत्रों में श्रम प्रधान चावल की खेती की जाती है। अत: श्रम की पूर्ति बनाये रखने के लिए गुच्छित ग्रामीण बस्तियों का विकास होता है।

(vi) एक सांस्कृतिक विशेषता रखने वाले लोगों के बीच विशेष भावनात्मक लगाव होता है। अतः एक ही धर्म, भाषा, जाति, प्रजाति के लोग गुच्छित अधिवास करने की प्रवृति रखते हैं। आज भी भारत गाँवों में जातीय टोले मिलते हैं।

(vii) लुटेरों की भय, सामाजिक तनाव, जंगली जानवरों का आक्रमण इत्यादि कुछ ऐसे अन्य कारण है जो गुच्छित ग्रामीण बस्ती के विकास को प्रेरित करती हैं। 

 गुच्छित ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ

(Advantages and Disadvantages of Clustered Rural Settlements)

         गुच्छित बस्तियों के कुछ लाभ और कुछ हानियाँ दोनों हैं। जैसे:-

गुच्छि बस्ती के लाभ (Benefits of cluster settlement)

(i) सामुदायिक भावना का विकास होता है। 

(ii) लोग सुख-दुःख में एक-दूसरे के सहभागी बनते हैं। 

(iii) श्रम आधारित सघन कृषि का विकास होता है।

गुच्छित बस्ती के हानि (Disadvantages of clustered settlement)

(i) गुच्छित बस्तियों में किसी भी व्यक्ति का जीवन निजी नहीं रह जाता है। जब निजी जीवन प्रभावित होता है तब संपूर्ण ग्रामीण बस्ती में अशान्ति का वातावरण उत्पन्न हो जाता है।

(ii) गुच्छित बस्तियों में अधिवासीय जमीन का अभाव होता है जिसके कारण भूमि की माँग बढ़ जाती है जिससे लोग दूसरे की जमीन हड़पने लगते हैं। फलतः ग्रामीण लोग कानूनी जटिलताओं में फँसकर अपना जीवन व्यर्थ गवाँ देते हैं।

 नोट :- गुच्छित = पूँजित = सघन

(iii) गुच्छित बस्तियाँ आलसी लोगों की बस्तियाँ कहलाती है। आलस्यपन का कारण मकानों का नजदीक होना है। इससे लोगों के कार्मिक क्षमता में कमी आती है।

गुच्छित ग्रामीण बस्ती के प्रकार (Types of clustered rural settlement)

        गुच्छित बस्तियाँ पाँच प्रकार के होती हैं-

(a) मानसूनी गुच्छित बस्ती (Monsoon clustered settlement):-

       यह मानसूनी जलवायु प्रदेश में बाढ़ के मैदानों में दिखाई देती है। ब्रह्मपुत्र का मैदान, निचली गंगा का मैदान, संपूर्ण बांग्लादेश, पूर्वी चीन के मैदान, ईरावदी का मैदान, मेकांग का मैदान, नील नदी के डेल्टा पर गुच्छित बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(b) लगभग गुच्छित बस्ती (Almost clustered settlements):-

      ऐसी बस्तियाँ वैसे मानसूनी क्षेत्रों से विकसित होती है जहाँ पर बाढ़ की समस्या नहीं है। ये वैसी बस्तियाँ है जहाँ एक से अधिक गुच्छित बस्ती एक ही भौगोलिक क्षेत्र में विकसित होते हैं। ऐसे बस्तियों में यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन बस्ती पुराना है और कौन बस्ती नवीन है तथा किस बस्ती के प्रति आकर्षण सर्वाधिक है?

         ऐसी बस्ती उत्तर-पश्चिम भारत, सिन्धु के मैदान, उत्तरी चीन & नील नदी के ऊपरी भाग में ये बस्तियाँ मिलती हैं।

(c) रेखीय गुच्छित बस्ती (Linear clustered settlement):-

     रेखीय गुच्छित बस्तियों का विकास राजमार्गो, नहरों, प्राकृतिक बाँधों के ऊपर होता है क्योंकि ग्रामीण बस्ती के प्रत्येक लोग राजमार्गों और नहरों की सुविधा समान रूप से लेना चाहते हैं। इन्दिरा गांधी नहर, सरहिन्द नहर, पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र और उत्तरी चीन में नहरों के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं। बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँध के ऊपर विकसित गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं जबकि भारत के तटीय मैदानी क्षेत्रों में राजमार्गो के किनारे गुच्छित बस्तियाँ मिलती हैं।

(d) गुच्छित सह पुरवा बस्ती (Clustered cum hamlet settlement):-

      वैसी बस्ती जिसमें एक केन्द्रीय बस्ती सर्वाधिक अनुकूलन वाले स्थान पर विकसित होती है और उसके ईर्द-गिर्द छोटी बस्तियों का विकास हो जाता है। छोटी बस्ती को ही पुरवा बस्ती कहते हैं। छोटी ब‌स्तियाँ और केन्द्रीय बस्ती एक-दूसरे से सांस्कृतिक कार्यों के लिए जुड़े हुए होते हैं। मानसूनी भारत में पुरवा बस्ती श्रमिकों की बस्ती होती है।

नोट- पुरवा = छोटी बस्ती या श्रमिकों की बस्ती

(e) गुच्छित सह पुरवा सह बिखरी बस्ती (Clustered cum hamlet cum scattered settlement):-

      ऐसी बस्तियाँ मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में दिखाई देती है। पहला शोषण मूलक कृषि अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में, जैसे – बिहार, बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बांग्लादेश, इत्यादि में। दूसरा वैसे क्षेत्रों में जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूलित वातावरण सर्वत्र रूप से मौजूद है। 

(2) प्रकीर्ण ग्रामीण बस्ती/बिखरी बस्तियाँ (Scattered rural settlement/scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्ती को बिखरी हुई बस्ती भी कहते हैं, क्योंकि इसमें अधिवासीय मकान एक-दूसरे से दूर-2 बने होते हैं। 

प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के कारण (Reasons for the development of scattered settlements)

       प्रकीर्ण बस्तियों के विकास के निम्नलिखित कारण हैं।

(i) अधिवास की सुविधा सर्वत्र एक समान मौजूद होना। जैसे:- प० यूरोप

(ii) पर्याप्त समतल भूमि उपलब्ध न होना। 

(iii) समाज में किसी भी प्रकार का भय, आतंक या तनाव का अभाव होना।

(iv) कभी-2 गाँवों में कुछ विशेष लोगों को रहने की इजाजद न किया जाना।

(v) नवीन आर्थिक गतिविधियों का विकास होना। 

 प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ और हानियाँ (Advantages and Disadvantages of Scattered Rural Settlements)

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के लाभ (Advantages of scattered rural settlements)-

         प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के निम्नलिखित लाभ है- 

(i) प्रत्येक व्यक्ति का निजी जीवन सुरक्षित रहता है।

(ii) आर्थिक क्षमता अधिक होने के कारण ऐसे बस्ती के लोग अधिक सम्पन्न होते हैं।

प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों के हानि (Disadvantages of scattered rural settlements)-

      प्रकीर्ण ग्रामीण बस्तियों का कुछ नाकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिलता है। जैसे –

⇒ लोग एकाकी जीवन जीते-2 एकाकी हो जाते हैं।

⇒ लोग एक-दूसरे के सुख-दु:ख में सहभागी नहीं बन पाते हैं।

⇒ आकस्मिक संकट आ जाने पर लोगों की स्थिति दयनीय हो जाती है।

⇒ लोगों को सभी प्रकार के कार्य स्वयं करने पड़ते हैं।

प्रकीर्ण बस्तियों के प्रकार (Types of Scattered settlements)

           प्रकीर्ण बस्तियाँ भी पाँच प्रकार के होती हैं-

(i) एकाकी प्रकीर्ण बस्ती (Isolated scattered settlement):- 

       इसमें एक स्थान पर एक ही मकान स्थित होता है। यह विकसित देशों के गाँवों की विशेषता है। न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, USA, यूरोप में ऐसी बस्तियाँ मिलती हैं। उतर-पश्चिम भारत में भी ऐसी बस्ती विकास की प्रक्रिया से गुजर रही है।

(ii) बिखरी प्रकीर्ण बस्ती (Dispersed scattered settlement):- इसमें एक स्थान पर‌ एक से अधिक मकान होते हैं लेकिन एक-दूसरे से काफी दूर होते हैं। पर्वतीय एवं पठारी क्षेत्रों में इस प्रकार के बस्तियों का उदाहरण मिलता है। उ०-पूर्वी भारत के जनजातीय बस्तियाँ, मध्य अफ्रीका, मोजाम्बिक, आमेजन प्रदेश, केरल के पर्वतीय क्षेत्र, राजस्थान के द०-पूर्वी पठारी क्षेत्रों में बिखरी प्रकीर्ण बस्तियाँ दिखाई देती है।

(iii) पुरवा प्रकीर्ण बस्ती (Purva scattered settlement):-

     वैसे प्रकीर्ण बस्ती जिसमें कई मकान एक स्थान पर होते हैं लेकिन मकानों के बीच की दूरी अधिक होती है। इसमें बस्ती का कुल आकार छोटा होता है। ऐसी बस्तियों का विकास पठारी क्षेत्रों में प्रकीर्ण वस्ती वहाँ पर होता है जहाँ पर पेयजल और कृषि की संभनाएँ मौजूद है। ढक्कन का पठार, मेघालय के पठार पर ऐसी बस्ती मिलती है।

(iv) रेखीय प्रकीर्ण बस्ती (Linear scattered Settlement):-

     रेखीय प्रकीर्ण बस्ती में अधिवासीय मकान एक ही रेखा में दूर-2 पर अवस्थित होते हैं। ऐसी बस्ती प्राकृतिक बांध, राजमार्ग, नहर, वनीय सड़क के किनारे पायी जाती है। इसका उदा० उन सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है जहाँ पर उपरोक्त भौगोलिक कारक मौजूद है।

(v) सीढ़ीनुमा प्रकीर्ण बस्ती (Terraced Scattered Settlement):-

     ऐसी बस्तियाँ पर्वतीय ढालों पर सीढ़ीनुमा स्थलाकृति के सहारे विकसित होती है। अरुणाचल प्रदेश या हिमालय के ढालों पर, आल्पस एवं किलीमंजारो पर्वत के ढालों पर इस तरह के अनेक बस्ति‌याँ मिलती है। 

निष्कर्ष-

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बस्तियों के प्रकार पूर्णत: भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. ग्रामीण बस्तियाँ कितने प्रकार की होती हैं। भारत के संदर्भ में उन बस्तियों की विशेषता और वितरण प्रारूप की चर्चा करें।

Q. ग्रामीण बस्तियाँ नगरीय बस्तियों से किस प्रकार भिन्न है? ग्रामीण बस्तियों के प्रकार तथा प्रतिरूप की विशेषता भारत के सन्दर्भ में विशेष रूप से करें।



2. Pattern of rural settlements (ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)

2. Pattern of rural settlements

(ग्रामीण बस्तियों का प्रतिरूप)



              Pattern of rural settlements

       ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप का तात्पर्य गाँवों के बसाव की आकृति से है अर्थात एक गाँव को अगर बाहर से देखा जाय तो मानव के स्मृति पटल पर किस प्रकार की आकृति उभरकर सामने आती है। इसी ग्रामीण बस्ती के बाह्य आकृति का अध्ययन ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप कहलाता है। ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप पर दो भौगोलिक कारकों  का प्रभाव पड़ता है।:-

(1) भौतिक कारक और

(ii) सांस्कृतिक कारक।

     भौतिक कारक के अन्तर्गत कुंआ, तालाब, पोखर, (कच्चा मिट्टी) टीले, भूमि का ढाल, सीढ़ीनुमा, ढाल की आकृति, भूमिगत जलस्तर, दलदली भूमि इत्यादि प्रमुख हैं। 

    जबकि सांस्कृतिक कारक के अन्तर्गत ऐतिहासिक घटना क्रम, सड़क एवं गलियों का नियोजित एवं अनियोजित प्रारूप, खेतों का प्रतिरूप, ग्रामीण धार्मिक संस्थाएँ, जातीय संरचना इत्यादि को शामिल करते है। 

       ग्रामीण क्षेत्रों में गाँव से गुजरने वाली सड़के एवं गलियाँ ग्रामीण बस्तियों के आतंरिक विन्यास के ढाँचे को सुनिश्चित करते है। भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक प्रकार के प्रतिरूप का विकास हुआ है जिनमें मुख्य निम्नवत है।:- 

(1) रेखीय प्रतिरूप⇒

     इसे रिबन प्रतिरूप या लम्बाकार प्रतिरूप या डोरी प्रतिरूप भी कहा जाता है। जब ग्रामीण बस्तियाँ किसी सड़‌क या नहर या पर्वतीय कटक या बाढ़ वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक बाँधों के सहारे विकसित होती हैं तो उसे रेखीय प्रतिरूप कहा जाता है।

      उदा०- उत्तरी-पूर्वी भारत में नागा जनजाति के लोग पर्वतीय कटक के सहारे घर बनाते हैं। प्रायद्वीपीय भारत में पूर्वी तटीय मैदान के सहारे रेखीय प्रतिरूप का घर मिलता है। निम्न गंगा के मैदानी क्षेत्र में, चीन के मैदानी क्षेत्रों में, पश्चिम एशिया में नहरों के सहारे रेखीय प्रतिरूप बस्तियाँ मिलते हैं। 

(2) L- प्रतिरूप⇒

     जब कोई मुख्य सड़क आगे बढ़‌कर अचानक समकोण पर मुड़ जाती है तथा उसके किनारे जब ग्रामीण अधिवासों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूपों को है L- प्रतिरूप कहा जाता है। जैसे- पटना का दनियावां गाँव, मुजफ्फरपुर का नवगढ़ी गाँव इसका सर्वोत्तम उदहारण है।

(3) T- प्रतिरूप-

       जब किसी मुख्य सड़‌क मार्ग पर किसी सहायक सड़‌क का मिलन होता है तो उस पर विकसित ग्रामीण अधिवास T प्रतिरूप का कहलाता है। इसका उदा० नदी घाटी क्षेत्रों में अधिक देखने को मिलती है।

       उदा० पटना का बख्तियारपुर, हजारीबाग का बरही।

(4) वर्गाकार और आयताकार प्रतिरूप:-

       ये दोनों प्रतिरूप एक-दूसरे के पूरक है। जब किसी ग्रामीण बस्ती का विकास नियोजित तरीके से किया जाता है तो वहाँ सड़‌कें एवं गलियाँ समकोण पर विभाजित करती है। अगर ग्रामीण बस्तियाँ बसकर एक वर्ग के रूप में उभरकर सामने आती हैं तो उसे वर्गाकार प्रतिरूप कहते है और जब आयत के रूप में सामने उभरकर आती हैं तो उसे आयताकार प्रतिरूप कहते है।

     वर्गाकार प्रतिरूप का उदा०- भागलपुर का माफला गाँव, सारण का कात्सा सांथी गाँव।

      आयताकार प्रतिरूप का उदा०- शाहाबाद का ऐरे गॉंव, भागलपुर का घोघली गाँव, सारण का सारथा गाँव।

(5) चौकोर प्रतिरूप:-

   वैसे ग्रामीण बस्ती जिसके बाहर में चाहार दीवारियाँ होती हैं और मध्य भाग में खुली आयताकार भूमि छोड़ दी जाती है। ऐसे प्रतिरूप को चौकोर प्रतिरूप कहते हैं। जैसे- पश्चिम राजस्थान में विकसित होने वाले मरूस्थलीय गाँव इसके उदा० है।

(6) चौकपट्टी प्रतिरूप:-

      इसकी तुलना शतरंज  के गोट से की जा सकती है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में समान महत्व वाले गली या सड़‌क सम‌कोण पर कटती हैं उसके बाद बस्तियों का विकास हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को चौकपट्टी प्रतिरूप कहते है। गंगा यमुना के दोआब क्षेत्र में, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश में चौकपट्टी प्रतिरूप की बस्तियाँ दिखाई देती हैं।

(7) दोहरा प्रतिरूप:-

     नदी पर पुल या फेरी के दोनों तरफ इन बस्तियों का विस्तार होता है।

(8) सीढ़ीनुमा प्रतिरूप:-

      इनायत अहमद ने सीढ़ीनुमा प्रतिरूप को सर्वोच्च रेखीय प्रतिरूप कहा है। इस प्रकार के गाँव पर्वतीय ढालों पर बसे मिलते है। हिमालय, रॉकी, एण्डीज, आल्प्स पर्वत इत्यादि पर सीढ़ीनुमा गाँव मिलते हैं।

(9) त्रिभुजाकार प्रतिरूप:-

        जब  कोई परिवहन मार्ग या नहर दूसरी नहर या परिवहन मार्ग से मिलती है परन्तु उसको पार नहीं करती है तो वहाँ त्रिभुजाकार प्रतिरूप का विकास होता है। इसका उदा० पंजाब, हरियाणा में अधिक मिलते हैं।

(10) तीर प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण अधिवास का विकास किसी केप/नुकीले मोड़ के सहारे होता है तो ऐसी स्थिति में तीर प्रतिरूप का विकास होता है। जैसे- दक्षिण भारत के कन्याकुमारी के पास, द० अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के पास, बिहार में बुढ़ी गंडक और बागमती नदी के संगम पर इस तरह के बस्तियाँ का विकास हुआ है। 

(11) वृताकार प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियों का विकास किसी झील, कुँआ, जमीनदार का किला, चर्च, मस्जिद या मंदिर के किनारे विकसित होता है और उसका आकार एक वृत के समान हो जाता है तो वैसे प्रतिरूप को वृताकार प्रतिरूप कहते हैं। प्राचीन काल से ही इस तरह के बस्तियों का विकास होता रहा है। भारत में वृताकार बस्तियों का प्रतिरूप सर्वाधिक मिलता है। वृताकार प्रतिरूप वाले ग्रामीण बस्ती के केन्द्र में कुआँ या तालाब होता है तो उसे खोखला वृताकार प्रतिरूप कहते हैं और जब केन्द्र में कोई धार्मिक संस्थान, पंचायत भवन या जमीनदार का घर मौजूद होता है तो उसे निहारिका प्रतिरूप कहते हैं।

(12) तारा प्रतिरूप:-

      किसी स्थान पर कई दिशाओं से आकर परिवहन मार्ग एक बिन्दु पर मिल जाती है और सड़कों के किनारे ग्रामीण बस्तियाँ विकसित हो जाती है तो वैसे प्रतिरूप को तारा प्रतिरूप कहते हैं।

       मेरठ और गाजियाबाद का अधिकांश गाँव तारा प्रतिरूप के ही है।

(13) पंखा प्रतिरूप:-

       जब ग्रामीण बस्तियाँ विकसित होकर एक पंखे के रूप में तब्दील हो जाते हैं, तो उसे पंखा प्रतिरूप कहते है।

       डेल्टाई और पर्वतीय क्षेत्रों में पंखा प्रतिरूपों का विकास देखा जा सकता है। गंगा, कृष्णा, के डेल्टा पर तथा हिमालय के जलोढ़ पंखों पर इस प्रकार के ग्रामीण प्रतिरूपों  का विकास हुआ।

       उपरोक्त प्रतिरूप के अलावे कई अन्य प्रतिरूप भी देखने मिलता है। जैसे- बहुभुजीय प्रतिरूप, अर्द्धवृताकार प्रतिरूप, अनाकार प्रतिरूप इत्यादि हैं। 

निष्कर्ष-

        इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि पूरे विश्व में अलग-2 क्षेत्रों में भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों के कारण अलग-2 प्रतिरूपों का विकास हुआ है।

1. Concept of Rural and Urban Settlement / ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना

1. Concept of Rural and Urban Settlement



(ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना or ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल की संकल्पना)

             ग्रामीण एवं नगरीय भूगोल बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। बस्ती भूगोल के अन्तर्गत मानवीय अधिवास, प्रतिरूप, उनके प्रकार, उनका वर्गीकरण, समस्याएँ, अंतर प्रादेशिक और अन्तः प्रादेशिक तत्वों, बस्ती से जुड़े पर्यावणीय मुद्दों एवं उससे संबंधित समस्त पक्षों का अध्ययन किया जाता है।

          बस्ती का तात्पर्य वैसे भौगोलिक क्षेत्र से हैं जहाँ पर मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है। रोमन भूगोलवेता स्ट्रैबो ने सामूहिक अधिवास वाले स्थानों के लिए ‘Okument’ शब्द का प्रयोग किया। जबकि जर्मन भूगोलवेता रेटजेल ने ‘Ekumen’ शब्द पर प्रयोग किया। हालांकि भूगोल में बस्ती भूगोल की शुरुआत करने का श्रेय जर्मन भूगोलवेता कार्ल रीटर को जाता है क्योंकि इन्होंनें सबसे पहले बस्ती भूगोल शब्द का प्रयोग किया था। 

Concept of Rural and Urban Settlement

ग्रामीण बस्ती

बस्ती के प्रकार

      कार्यों के आधार पर बस्ती दो प्रकार के होते हैं।:-

(1) ग्रामीण बस्ती

(2) नगरीय बस्ती

            अगर इन दोनों बस्तियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाय तो उससे इनकी संकल्पना स्वत: स्पष्ट हो जाती है। जैसे:-

कार्यों के आधार पर 

         ग्रामीण बस्ती का तात्पर्य किसी स्थान पर निवास करने वाला उस सामूहिक अधिवास से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप में संलग्न रहती है। यहाँ पर प्राथमिक आर्थिक क्रियाकलाप का तात्पर्य कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, शिकार, खाद्य संग्रहण, खनन इत्यादि से है।

     जबकि नगरीय बस्ती का तात्पर्य उस सामूहिक अधिवासीय स्थल से है जहाँ की दो-तिहाई जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  में संलग्न रहती है। यहाँ पर द्वितीय एवं तृतीय कार्यों का तात्पर्य उद्योग, निर्माण, विनिर्माण, परिवहन, वाणिज्य व व्यापार एवं सेवा क्षेत्र से है।

➡ कार्यों के आधार पर ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को ही भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

➡ ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती की संकल्पना को निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर और स्पष्ट किया जा सकता है :- 

जनसंख्या के आकार के आधार पर 

     अगर जनसंख्या के आधार पर इनका विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होता है कि ग्रामीण बस्तियों की जनसंख्या का आकार छोटा होता है जबकि नगरीय बस्तियों की जनसंख्या का आकार बड़ा होता है। अलग-अलग  देशों में नगरीय बस्ती होने के लिए अलग आकार सुनिश्चित किये गये है। जैसे- भारत में 5000 जनसंख्या अधिवासीय क्षेत्र को नगर, न्यूजीलैण्ड और स्वीडेन में 200, अमेरिका में 500 सामूहिक अधिवासीय क्षेत्र को नगर के रूप में मान्यता दी जाती है। दूसरी ओर भारत में कई ऐसे गाँव हैं जिनकी जनसंख्या 10 हजार से भी अधिक है फिर भी उन्हें नगर के श्रेणी में नहीं रखा जाता है। 

जनसंख्या के घनत्व के आधार पर

         जनसंख्या घनत्व को आधार मानते हुए भी ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती में अन्तर स्थापित किया जाता है। जैसे- जिस स्थान पर 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर जनसंख्या अधिवास करती है, वैसे स्थान को नगरीय बस्ती और उससे कम जनघनत्व वाले क्षेत्र को ग्रामीण बस्ती के श्रेणी में रखा जाता है।

सामाजिक जीवन / बंधन 

           ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक जीवन काफी सुदृढ़ होता है। परिवार, विवाह, नातेदारी जैसे सामाजिक संस्थाएँ जीवंत होती है। लेकिन नगरीय बस्तियों में सामाजिक बंधन का तत्व कमजोर होता है। यहाँ पर प्राथमिक सामाजिक संस्थाओं का कार्य स्कूल, कॉलेज, हॉस्पीटल, क्लब इत्यादि के द्वारा किया जाता है।

आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण

              ग्रामीण बस्ती में आर्थिक गतिविधियों का विशिष्टीकरण नहीं होता है जबकि नगरीय बस्तियों के आर्थिक गतिविधियों का न केवल विशिष्टीकरण होता है बल्कि केन्द्रीयकरण भी होता है। 

आधारभूत संरचनाओं का स्तर 

                  ग्रामीण बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। अगर होता भी है तो उनका स्तर निम्न होता है। जबकि नगरीय बस्तियों में आधारभूत संरचनाओं के विकास का स्तर उच्च होता है।

नियोजित एवं अनियोजित बस्ती

                  ग्रामीण बस्तियाँ प्राय: जैविक एवं अनियोजित तरीके से विकसित होती है। जबकि नगरीय बस्तियाँ नियोजित एवं अनियोजित देनों प्रकार के हो सकती है।

निष्कर्ष

         इस तरह उपर के तथ्यों से  स्पष्ट है कि ग्रामीण एवं नगरीय बस्ती दो अलग-2 संकल्पनाएँ हैं। इन दोनों अधिवासीय क्षेत्र निर्धारण करने का सबसे उचित तरीक कार्यिक आधार को माना जाता है।


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