8. Law of Primate City / प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना

Law of Primate City

(प्रमुख नगर के नियम या प्रमुख शहर एवं श्रेणी आकार प्रणाली की संकल्पना)

           Law of Primate City

    प्राइमेट नगर की संकल्पना का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता माइक जैफरसन को जाता है। किसी भी भौगोलिक प्रदेश में मिलने वाला सबसे बड़ा नगर या प्रथम पदानुक्रम वाले नगर को ‘प्राथमिक नगर/ प्रमुख नगर/ प्राइमेट नगर’ कहते हैं।

       जैफरसन ने अपने नगरों के अध्ययन में पाया कि किसी देश का प्राइमेट सिटी उस देश के द्वितीयक पदानुक्रम वाला नगर के तुलना में दो या तीन गुणा अधिक बड़ा होता है।

       जैफरसन ने देखा कि 28 प्रमुख देशों में मिलने वाला प्राइमेट सिटी द्वितीयक नगर की तुलना में दो गुगा बड़ा था। जबकि 18 देशों में द्वितीयक नगर के तुलना में तीन गुणा बड़ा था। जैफरसन बताया कि प्राइमेट नगर अन्य नगरों की तुलना में अधिक कार्य को सम्पादित करते हैं। पुनः जैफरसन के प्राइमेट सिटी के संबंध में व्यक्त सिद्धांत में तीन तत्व प्रमुख हैं:-

(1) प्राइमेट सिटी का आकार द्वितीय नगर से अधिक बड़ा होता है।
(2) प्राइमेट सिटी किसी राष्ट्र के विकास के प्रवृति और प्रभाव का धोतक होता है।
(3) प्राइमेट सिटी एक बार जब बड़ा हो जाता है तो भविष्य में भी उसका आकार और प्रभाव में वृद्धि होते रहती है।
             
          जैफरसन महोदय ने इस नियम के सहारे 1939 ई० के नगरों के वितरण की व्याख्या काने हेतु प्रतिपादित किया। इस नियम के प्रतिपादन का सैद्धांतिक आधार यह है कि किसी भी वृहद भौगोलिक प्रदेश में वितरित नगर के बीच आकार का तुलनात्मक परीक्षण किया जाय। जैफरसन का यह सिद्धांत निम्नलिखित परिकल्पना पर आधारित है-
(1) किसी भी नगर का पदानुक्रम उस नगर में विकसित संगठन, आकार, प्रभाव और शक्ति को बताता है।
(2) नगर की शक्ति और प्रभाव नगर के आकार से सूचित होता है।
(3) विभिन्न जनसंख्या आकार नगरों के आकार में विभिन्नता को सुनिश्चित करता है। कुछ नगर में तीव्र गति से वृद्धि होने की प्रवृत्ति होती है।
             
        जैफरसन ने प्राथमिक नगरों की पहचान हेतु एक ‘प्राथमिक सूचकांक का विकास किया है। जैसे-
     
        दो नगरों का प्राथमिक सूचकांक = वृहद नगर की जनसंख्या / दूसरे बड़े नगर की जनसंख्या
                       
         जैफरसन का यह सिद्धांत अनुमानित पयर्वेक्षण पर आधारित था जिसके कारण उनके विचारों में कई विसंगतियाँ भी पायी जाती हैं और उन विसंगतियों को दूर करने के लिए कई नवीन विचार भी प्रस्तुत किये गए हैं। 1967 ई० में क्लार्क महोदय ने नगरों के वितरण की व्याख्या हेतु तथा प्राथमिक नगर के संबंध में एक अलग विचार प्रस्तुत किया।
         क्लार्क के अनुसार एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगर को ही प्राथमिक नगर कहा जाना चाहिए। क्लार्क के विचार इस संदर्भ में अल्पतंत्रीय वितरण के विचार से प्रसिद्ध है।
      क्लार्क का विचार जापान, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील जैसे देशों में पाये जाते हैं। पुनः नगरीय वितरण को व्याख्या करने हेतु कोटि-आकार सह-संबंध नियम भी प्रस्तुत किया गया है। इस नियम के अनुसार नगरों के आकार और उसके पदानुक्रम में गहरा संबंध होता है।
         इसके अनुसार किसी आदर्श भौगोलिक परिस्थिति में निम्न पदानुक्रम के नगर एक निश्चित कोटि-आकार नियम के अनुरूप विकसित होते हैं। अगर यह विकास इस नियम के अनुरूप नहीं है तो उस प्रदेश में अस्वस्थ नगरीकरण की प्रवृत्ति है।
        कोटि आकार का नियम स्पीयर्समैन के कोटि आकार सह संबंध नियम पर आधारित है। इस नियम का सहारा लेते हुए अमेरिकी भूगोलवेता जिप्स ने निम्न सूत्र विकसित किया है:-
Pr = P1 / r
जहाँ,
Pr = निश्चित कोटि के नगर की अनुमानित जनसंख्या
P1 = प्राथमिक नगर की जनसंख्या
r = निश्चित किये गये कोटि या पदानुक्रम
                     
         1949 ई० में जी. के. जिफ महोदय ने अपने सूत्र का प्रयोग करते हुए निम्नलिखित सांख्यिकीय मान निर्धारित किये। जैसे 1, 0.500, 0.333, 0.250, 0.200 । जिफ के अनुसार अगर पाँच प्रथम क्रम तक कोटि आकार नियम के पालन होता है तो आगे नगरों पर अपने आप यह नियम लागू हो जाता है। लेकिन जिफ ने यह नहीं बताया कि नगरों के कितने कोटि या पदानुक्रम हो सकते हैं।
           1959 ई० में स्टीवर्ट महोदय ने विश्व के 72 देशों में कार्य करने के बाद यह बताया कि निम्न स्तर के नगर के लिए कोटि आकार नियम का पालन करना आवश्यक नहीं है जितना कि प्रथम पाँच कोटि आकार नियमों के पालन के लिए आवश्यक है। क्योंकि किसी की भौगोलिक प्रदेश में विकसित प्रथम पाँच पदानुक्रम के नगर ही द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों के प्रमुख केन्द्र होते हैं।
        स्टीवर्ट महोदय ने यह भी बताया कि विकसित देशों में कोटि आकार का नियम पूर्णतः लागू होता है लेकिन लेटिन अमेरिका में यह देखने को मिलता है कि वहाँ की अधिकत्तर जनसंख्या उसके राजधानी नगर या प्राथमिक नगर में ही केन्द्रित हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ प्राथमिक नगर ही चुम्बकीय आकर्षण का कार्य करते हैं।
          लेटिन अमेरिका, USA और जिप्स के द्वारा दिया गया औसत आकार का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है।-       
पदानुक्रम जिप्स का मान  USA का मान ब्राजील के पदानुक्रम का मान
1 1 1 1
2 0.500 0.435 0.210
3 0.333  0.310 0.210
4 0.250  0.200 0.105
5 0.200  0.169 0.079
               
           दिये गये तालिका से स्पष्ट होता है कि ब्राजील में सभी प्रकार की जनसंख्या के लिए प्राथमिक नगर ही आकर्षण का कार्य करते हैं। हैगेट के अनुसार किसी भी नगर के कार्यों की गहनता से प्राथमिक नगरों की पहचान की जाती है।
       पुन: प्राथमिक नगर के संबंध में दिये गए कोटि आकार का निगम भारत जैसे देश में भी प्राथमिक स्तर पर लागू होता है। जैसे:- भारत को गंगा के मैदान है लिए प्राथमिक नगर अलग होगा और पूर्व तटीय मैदान के लिए अलग होगी।
 
        पीटर हैगेट ने कहा कि बड़े देशों में प्रादेशिक नगरों के कोटि- आकार का निर्धारण किया जाना चाहिए। N.B.K. रेड्डी ने गोदावरी और कृष्णा के मैदानी क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए बताया है कि यहाँ हैदराबाद जैसे विशाल नगर के बाद विजयवाड़ा जैसे छोटे नगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख है इसका परिणाम यह है कि प्रादेशिक स्तर पर पिछड़ेपन के कारण महानगर जनसंख्या के जमघट बन चुके हैं।
          कुछ प्रदेशों में एक ही आकार के दो नगर पाये जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्राथमिक नगरों का निर्धारण काफी मुश्किल हो जाता है। जैसे ब्राजील के द०-पूर्वी भाग में स्थित साओ पोली & रियो द जेनरियो नगर। यहाँ साओ-पोलो की जनसंख्या अधिक है जबकि कार्यिक विभिन्नता रियो द जेनरियो में अधिक मिलती है।
          वस्तुतः स्वस्थ कोटि नियम का पालन तभी संभव है जब संपूर्ण प्रदेश में वातावरणीय समरूपता पायी जाती हो साथ ही आर्थिक सामाजिक विकास की प्रक्रिया संतुलित रूप से चल रही हो। यदि ऐसा नहीं होता है तो उन प्रदेशों में प्राथमिक नगर के संबंध में प्रतिपादित नियम लागू नहीं होगा।

7. Internal Structure of Cities / नगरों की आन्तरिक संरचना

7. Internal Structure of Cities

(नगरों की आन्तरिक संरचना)


             Internal Structure of Cities
     
          नगरों की आन्तरिक संरचना का तात्पर्य नगर के आन्तरिक भागों में विकसित भौतिक तथा सांस्कृति स्वरूप से है। भूगोल यह मानता है कि नगर एक जीवित प्राणी के समान है, जो सदैव विकास तथा विस्तार की प्रवृति रखता है। इसी प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप नगरों के आन्तरिक संरचना का विकास होता है। इसी संदर्भ में कुछ भूगोलवेताओं का मानना है कि नगरों की आन्तरिक संरचना की संकल्पना एक गत्यात्मक पहलू है जो मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है:-
(1) भौतिक कारक
(2) मानवीय / सांस्कृतिक कारक
(3) नियोजन और प्रशासनिक पहलू
          नगरों के आन्तरिक संरचना नगर के अन्दर भूमि के उपयोग किये जाने के प्रतिरूप से है। भूगोलवेताओं ने कहा है कि नगरों का विकास केन्द्रीय स्थल पर होता है और सभी नगर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न करते हैं। लेकिन सभी नगर एक समान द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों को सम्पन्न नहीं करते हैं। ये असमानता ही नगरों के आन्तरिक संरचना में विषमता उत्पन्न करते हैं। नगरों के आन्तरिक संरचना में उत्पन्न असमानता के सैद्धांतीकरण का कार्य किया है। इसके लिए चार निम्नलिखित सिद्धांत प्रतिपादित किये गये हैं:-
(1) सकेन्द्रीय वलय पेटी का सिद्धत (Concentric Zone Theory)- बर्गेस (1927 ई0)
(2) खण्ड सिद्धांत- हॉयट (1939 ई0)
(3) बहुनाभिक सिद्धांत- हैरिस तथा उल्मैन (1945 ई0)
(4) संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत- गैरिसन (1962 ई0)
 
(1) सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत
         सकेन्द्रीय वलय सिद्धांत का प्रतिपादन अमेरिकी समाजशास्त्री बर्गेस ने (1927 ई0) में शिकागो नगर का अध्ययन करने के बाद प्रस्तुत किया था। उन्होंने अपने सिद्धांत में कहा था कि नगरों की आन्तरिक संरचना सकेन्द्रीय वलय पेटी के समान होते हैं, जिसे नीचे के मॉडल में देखा जा सकता है।
 
INDEX
1 = केन्द्रीय बाजार क्षेत्र Central Business District (CBD) – केंद्रीय व्यापार जिला
2 = संक्रमण पेटी – अधिवास & व्यापार का कार्य साथ-साथ
3 = श्रमिकों के अधिवासीय क्षेत्र पेटी
4 = मध्यम एवं उच्च आय वर्ग के अधिवासीच पेटी
5 = अभिगमन के क्षेत्र
               
           बर्गेस ने दिये गये मॉडल के अनुसार ही नगरों के आन्तरिक संरचना विकसित होने की संभावना विकसित की है। उन्होंने प्रत्येक पेटी की विशेषता निम्नलिखित प्रकार से बताया है।
(1) CBD (Central Business District)⇒
          इसे केन्द्रीय बाजार या केन्द्रीय व्यापार जिला से सम्बोधित करते है। CBD शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मरफी महोदय ने किया था। GBD वह क्षेत्र है जो नगर के केन्द्र में होता है। जमीन और मकान का किराया अधिक होता है। भूमि के चप्पे-चप्पे प्रयोग व्पायार के रूप में किया जाता है। मकानें बहुमंजिले होते हैं। दिन में भीड़-भाड़ू लेकिन रात में शुन्य -शान का क्षेत्र होता है। रात में स्ट्रीट लाईट चौकीदार कुछ विश्विप्त लोग (पागल) और नगर निगम की सफाई की गाड़ियाँ दिखाई देती हैं। इस क्षेत्र को शिकागो में Loop, न्यूयॉर्क में Up and down Town तथा पीटरसबर्ग में ‘गोल्डेन टेम्पल’ के नाम से जानते हैं।
(2) संक्रमण पेटी⇒ 
              यह पेटी CBD के चारों ओर विकसित होता है। यह वह क्षेत्र है जहाँ पर व्यापार एवं अधिवास का कार्य साथ-साथ किया जाता है। अनियोजन इसकी एक सामान्य विशेषता है।
(3) श्रमिक या निम्न आय वर्ग की पेटी⇒ 
         यह तीसरी पेटी है जो संक्रमण पेटी के चारों ओर विकसित होती है। श्रमिक वर्ग के लोग तीसरी पेटी में निवास करते हैं क्योंकि यहाँ पर एक ओर अधिवासीय खर्च कम पड़ता है और दूसरी तरफ केन्द्रीय बस्ती तक पहुँचने में भाड़ा और समय कम लगता है।
(4) मध्यम और उच्च आय वर्ग की पेटी⇒ 
              इसका विकास चौथी पेटी के रूप में होता है क्योंकि यहाँ पर बसाव के लिए अधिक भूमि उपलब्ध होता है स्वच्छ और खुला वातावरण होता है। इनके पास परिवहन क्षमता अधिक होता है। इसलिए वे सार्वजनिक और निजी परिवहन का सफलतापूर्वक उपयोग कर लेते हैं।
(5) अभिगमन की पेटी⇒ 
           यह पाँचवाँ और अंतिम पेटी है। यहाँ दैनिक अभिगमन करने वाले लोग रहते हैं। कहीं-2 पर उच्च श्रेणी के रिहायसी मकान दिखाई देते हैं। सर्वत्र निर्माण का कार्य दिखाई देता है। बीच-बीच में दुग्ध व्यवसाय या सब्जी व्यवसाय का व्यापार करने वाले लोग दिखाई देते है।
           
       बर्गेस महोदय ने बताया है कि अगर नगरों का तेजी से बिस्तार हो रहा हो तो चार अन्य पेटियाँ भी मिल सकती है। पुन: 5वाँ पेटी (अभिगमन की पेटी), 9वाँ पेटी में चला जाता है। चार सांभावित पेटी को शामिल कर लिये जाने के बाद क्रमश: निम्नलिखित 9 पेटियों का विकास होता है:-
(1) CBD
(2) संक्रमण पेटी
(3) श्रमिकों की पेटी
(4) मध्यम और उच्च वर्ग की पेटी
(5) भारी उद्योग की पेटी
(6) अधिवासीय पेटी
(7) सीमान्त बाजार
(8) औद्योगिक उपनगरीय क्षेत्र
(9) अभिगमन की पेटी
                  उपरोक्त 9वीं पेटियों का विकास शिकागो नगर के अन्दर हुआ है।
आलोचना
(1) बर्गेस ने जिस ज्यामितीय नियम के आधार पर संकेन्द्रीय वलय पेटी के विकास की संभवना व्यक्त किया है वह संभव नहीं है क्योंकि नगर के अन्दर से गुजरने वाला सड़‌क नदी, पुल इत्यादि नगर की आन्तरिक संरचना को प्रभावित कर देते हैं।
(2) नगरों की आन्तरिक संरचना पर भौतिक कारकों का भी प्रभाव पड़ता है जिसकी चर्चा बर्गेस ने नहीं किया है।
(3) एक ही नगर को आधार मानकर पूरे विश्व के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन किसी भी दृष्टिकोण में औचित्य दिखाई नहीं पड़ता।
(4) विकासशील देशों के CBD में अधिवास का कार्य बड़े पैमाने पर किया जाता है, पुनः पूर्वी यूरोप के नगर के केन्द्र सांस्कृतिक जमघट के केन्द्र होते हैं।
(5) इस सिद्धांत के सबसे बड़े आलोचक हॉयट महोदय हुए जिन्होंने बताया कि नगरों की आन्तरिक संरचना का विकास सकेन्द्रीय पेटी के रूप में न होकर खण्डीय होता है।
(6) डिक्सन महोदय में पेरिस का अध्ययन करते हुए बताया कि उसकी संरचना संकेन्द्रीय नहीं हैं बल्कि तारा द्वारा प्रतिरूप में हुआ है।
निष्कर्ष-
       उपरोक्त आलोचनाओं के बावजूद यह सिद्धांत नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन एवं सैद्धान्तीकरण करने का प्रथम प्रयास था जिसकी सराहना मुक्त्त रूप से सभी भूगोलवेताओं ने किया है।
 
2. खण्ड सिद्धान्त (Sector Theory):
               
             इसका प्रतिपादित अमेरिकी समाजशास्त्री होयट महोदय द्वारा 1939 ई. में किया गया था। इसका अध्ययन 142 अमेरिकी नगरों पर आधारित था।
मान्यताएँ : 
     
      होयट का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि-
(i) नगरों की संरचनात्मक फैलाव में केन्द्रीय बाजार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(ii) सभी कार्यों की प्रकृति होती है कि वे केन्द्रीय बाजार तक सहज पहुँच रखते हो। अतः केन्द्रीय बाजार से निकलने वाले मुख्य पथ के किनारे विभिन्न प्रकार के कार्यों का फैलाव होने लगता है।
(iii) नगर के मध्य वाणिज्य तथा व्यापार के कार्य होते है और यह वृत्ताकार प्रवृत्ति में होता है।
(iv) नगरों का विकास एक वृत्त के रूप में होता है जिसके आन्तरिक भाग संकेन्द्रीय पेटी के रूप में नहीं बल्कि कई खण्डों में विकसित होते है।
               
         होयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड देखने को मिलते हैं।
1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र
2. थोक पैमाने पर हल्के विनिर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
               
             होयट के अनुसार सड़क मार्ग के किनारे उच्च आय वर्ग की बस्ती होता है। इसके किनारे मध्यम आय वर्ग की बस्ती विकसित होती है और दो मध्यम आय वर्ग के बीच एक उच्च आय वर्ग की खण्ड विकसित होती है। होयट के अनुसार उच्च आय वर्ग के बस्ती का विकास निम्नलिखित तीन प्रवृत्तियों के अनुसार होती है:-
(i) नगर लम्बवत् रूप (Vertical Expansion) से बढ़ सकता है। एक परिवार वाले मकान एक से अधिक परिवार वाले मकानों में परिवर्तित हो जाते हैं।
(ii) मकान खाली पड़े प्लाटों पर भी बनने लगते हैं। इस प्रकार बस्तियों के बीच में खाली हुआ भाग मकानों से घिर जाता है।
(iii) जब नगर पर जनसंख्या का दबाव पड़ता है तब मकान नगरीय सीमा को धक्का देकर बाहर की ओर बढ़ जाते हैं। इस प्रकार का विस्तार अपकेन्द्रीय विस्तार कहलाता है। अपकेन्द्रीय विस्तार के भी तीन रूप होते हैं-
(a) ध्रुवीय विकास
(b) एकाकी बस्तियां और
(c) एकाकी बस्तियों का मिलाप।
          होयट महोदय ने हल्के उद्योगों की स्थापना करें। पुन: होयट कहा है कि सभी पेटियों का बाहर फैलाव भी होता है। अर्थात् जनसंख्या जैसे-जैसे बढ़ेगी पेटी भी बाहर की ओर फैलता जाएगा। इतना ही नहीं नवीन खण्डों का भी निर्माण होता है। जैसे- यदि किसी नगर में बृहद् उद्योग की स्थापना होगी तो उसके लिए एक खण्ड विकसित होंगे जो दूसरे या तीस खण्ड के ऊपर होगी। चौथे खण्ड के ऊपर अधिवासीय उपनगर विकसित होगा जिसमें मध्य व उच्च वर्ग के लोग होंगे। पांचवे खण्ड के ऊपर अधिवासित खण्ड, स्वास्थ्य, शिक्षा खण्ड विकसित होंगे।
आलोचनाएँ
(i) यह सिद्धांत महानगरों के लिए उपयोगी नहीं हैं बल्कि छोटे एवं मध्यम आकार के औद्योगिक नगरों पर लागु होता है।
(ii) वर्तमान नगर नियोजन में उच्चवर्गीय अधिवासीय क्षेत्र को उच्च वर्ग से दूर रखा जाता है।
(iii) इस सिद्धान्त के विश्लेषण से स्पष्ट है कि नगर का मुख्य कार्य अधिवास है जबकि ऐसा नहीं है।
               
            जहाँ तक भारत का प्रश्न है भारतीय नगरों में पूर्णरूपेण खण्डीय विकास की प्रवृत्ति नहीं है लेकिन औपनिवेशिक काल में कुछ नगरों में खण्डीय प्रवृत्ति भी ऐसा इसलिए कि वे लोग भारतीयों के साथ मिश्रित नहीं होना चाहते थे। वाराणसी में खण्डीय प्रवृत्ति विकसित हुई थी। इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान में इस सिद्धांत की उपयोगिता नहीं के बराबर है।
 
3. बहुनाभिक सिद्धान्त (Muittiple Nuclei Theory) :
             
            इस सिद्धान्त का प्रतिपादन 1945 ई. में हैरिस तथा उल्मैन महोदय ने किया है। ये दोनों भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने भौगोलिक सन्दर्भ में नगरों के आन्तरिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इसके निर्धारण में नगर के अधिवासीय कार्यों के अलावे उसके आर्थिक कार्य और परिवहन मार्गों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। बहुनाभिक सिद्धांत के अनुसार, किसी नगर का विकास केवल एक ही केन्द्र पर नहीं बल्कि कई केन्द्रों पर होता है।
मान्यताएँ :
         
        हैरिस तथा उल्मैन द्वारा विकसित मॉडल निम्नलिखित मान्यताओं पर आधारित है-
(1) यह सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि नगर के प्रत्येक कार्यों का विकास निजी स्थानीय गुणां के कारण निकसित होती है। वह दूसरे पर आधारित नहीं होता है। चूंकि प्रत्येक कार्य के अपने आगे बढ़ने की शक्ति होती है, इसलिए प्रत्येक कार्य एक नाभिक केन्द्र का निर्माण करता है और इसी आधार पर उसे बहुनाभिक सिद्धांत कहा गया है।
(2) कुछ नगरीय क्षेत्रों का विकास विशिष्ट सुविधाओं के आधार पर होता है। जैसे- भारी उद्योग का विकास रेल परिवहन सुविधा के कारण होता है।
(3) कई कार्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। अत: उसका विकास एक-दुसरे के अगल-बगल में होता है। जैसे-अधिकांश वाणिज्यिक बैंक,का विकास CBD में होता है।
(4) कई नगरीय कार्य एक दूसरे के कार्य से विलगाव रखते है अर्थात् एक-दूसरे के अगल-बगल विकसित नहीं होते। जैसे- उच्च आय वर्ग की बस्ती और औद्योगिक बस्ती, उच्च आय वर्गीय बस्ती और गन्दी बस्ती अगल-बगल में विकसित नहीं होते हैं।
(5) कुछ ऐसे भी कार्य होते है जो अधिक आर्थिक लगान नहीं दे सकते है: अतः उनका विकास नगर के बाह्य क्षेत्रों में कम किराए के मकान पर होता है। जैसे – विश्वविद्यालय, हॉस्पीटल, प्रशासनिक।
       
            उपरोक्त मान्यताओं के आधार पर निम्न मानचित्र दिया गया है-
1. केन्द्रीय व्यापारिक केन्द्र
2. थोक पैमाने पर हल्के निर्माण उद्योग
3. निम्न श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
4. मध्यम श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
5. उच्च श्रेणी रिहाइशी क्षेत्र
6. भारी निर्माण उद्योग
7. भारी व्यापारिक पेटी
8. रिहाइशी उपनगर
9. औद्योगिक उपनगर
10. अभिगमनकर्ताओं की पेटी
आलोचनाएँ:
(i) यह सिद्धान्त सिर्फ महानगरों पर ही लागू होता है, छोटे नगरों के लिए उपयोगी नहीं है।
(ii) यह सिद्धान फैलाव के नियमों पर आधारित नहीं है। बल्कि वस्तुस्थिति का अधिक विश्लेषण करता है।
नोट: रिहाइशी = आवास
(iii) यह मूलतः पश्चिमी देशों के लिए उपयोगी है।
(iv) सिद्धान्त सभी प्रकार के कार्यों के मध्य नाभीय चरित्र की अपेक्षा रखता है जो यथार्थ में सभी क्षेत्र में संभव नहीं है।
(v) भारत जैसे देशों में बहुनाभिक सिद्धांत में वृद्धि की प्रवृत्ति तो है फिर भी यहां सकेन्द्रीय वलय प्रवृत्ति अधिक सशक्त है। नियोजित दिल्ली तथा स्वतंत्रता के बाद विकसित कलकत्ता में बहुनाभिक प्रवृति देखने को मिलता है।
(vi) हैरिस तथा उल्मेन ने यह भी बताया कि नगरीय कार्यिक केन्द्रों में परिवर्तन भी होता है। जैसे –
(1) पुराने उपांत अधिवासीय क्षेत्र का परिवर्तन उपनगरीय बस्ती में होता है।
(2) पुराने औद्योगिक बस्ती का परिवर्तन निम्न आय वर्ग औद्योगिक श्रमिकों के अधिवास क्षेत्र में हो जाता है।
(3) पुराने कम आय वर्ग के क्षेत्र या तो गंदी बस्ती में बदल जाते हैं या हल्के उद्योग वाले क्षेत्र हो जाते हैं।
4. संयुक्त वृद्धि सिद्धान्त (Fused Growth Theory):
           इसका प्रतिपादन अमेरिकी भूगोलवेत्ता गैरिसन में 1962 ई. में कलकत्ता महानगर के सन्दर्भ में किया। गैरिसन के अनुसार ‘विकासशील देशों के महानगरों की तुलना में विकसित देशों की संरचनात्मक प्रवृत्ति भिन्न होती है। विकासशील देशों में प्रारम्भिक नगरीय विकास संकेन्द्रीय था, औपनिवेशिक युग में यह खण्डीय हो गया तथा 1900 के बाद अर्थात् नगरीय विस्फोट के बाद बहुनाभिक हो गया है।
मान्यताएँ :
     गैरिसन का मत है कि नगरों के विकास में संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप खण्ड प्रतिरूप और बहुनाभिक प्रतिरूप तीनों एक दूसरे से नितान्त पृथक नहीं होते हैं बल्कि प्रत्येक मॉडल में शेष दो मंडलों का रूप भी कुछ-न-कुछ अंशों में देखने को मिलता है। इस प्रकार कोई भी एक नगर तीनों प्रकार का मिश्रित प्रतिरूप रखता है तथा उसमें उद्योगों और रिहाइशी केन्द्रों के पृथक-पृथक सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी खण्ड स्थापित हो जाते हैं।
आलोचना:-
(1) यह सिद्धान्त पूर्व के तीन सिद्धान्तों की उपयोगिता को लागू करते हैं।
(2) इसका संरचनात्मक स्वरूप जनसंख्या दबाव का परिणाम है। इससे स्पष्ट है कि अगर ये दबाव न होते तो इस प्रकार की संरचना का निकास नहीं हो।
(3) यह सिद्धांत नगर के अनियोजित चरित्र को स्पष्ट करता है। इसमें विकास की वैज्ञानिकता का अभाव है।
(4) यह छोटे नगरों की संरचना को स्पष्ट नहीं करता है फिर भी विकासशील देशों के महानगरों की आन्तरिक संरचना की अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता जवत (करांची आदि शहरों के लिए अत्यंत ही उपयोगी व्याख्या करता है।
निष्कर्ष:- 

        ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि कोई भी सिद्धांत पूर्णरूप से मान्यता नहीं रखता है। प्रत्येक सिद्धांतो की कुछ सीमाएं हैं तथा प्रत्येक सिद्धांत कुछ विशेष परिस्थितियों में ही उपयोगी प्रतीत होता है। वस्तुतः सभी सिद्धान्तों के अनुरूप उदाहरण मिलते है। यही कारण है कि नगरों की आन्तरिक संरचना के लिए कोई भी सर्वमान्य सिद्धान्त विकसित नहीं जा सकता है फिर भी विकसित देशों के नियोजित नगरों पर प्रथम दो सिद्धांत बहुत हद तक लागू होते है। विकसित देशों के महानगरों पर तीसरे सिद्धांत की भी उपयोगिता है जबकि विकासशील देशों के महानगरों में चौथे सिद्धांत की उपयोगिता प्रतीत होती है।


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6. Internal Structure of Indian Cities / भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना

6. Internal Structure of Indian Cities 

(भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना)


प्रश्न प्रारूप

Q.भारत के प्राचीन, मध्ययुगीन तथा ब्रिटिश नगरों से विशिष्ट उदाहरण देते हुए उसके आंतरिक संरचना के विकास का परीक्षण कीजिए। 

Q. भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है?

Q. नगरों की आन्तरिक संरचना से आप क्या समझते है? Internal Structure of Indian Cities

        नगरों की आंतरिक संरचना का तात्पर्य नगर की उस व्यवस्था से है जिसमें नगरों की विन्यास प्रणाली और नगरों के कार्यिक प्रारूप का अध्ययन किया जाता है। किसी भी नगर का विकास किसी न किसी केन्द्रीय(चौराहा) स्थल पर होता है तथा नगरों के आन्तरिक संरचना की एक निश्चित प्रवृत्ति होती है। इन्हीं प्रवृतियों को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया है। इनमें बर्गेस, हायड, उल्मान, हेरीस तथा गैरीसन जैसे भूगोलवेताओं का नाम उल्लेखनीय है। इन भूगोलवेताओं ने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर विकसित देशों के नगरों की आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर सैद्धांतीकरण करने का प्रयास किया था।

भारतीय नगरों के आंतरिक संरचना को प्रभावित करने वाले कारक

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर निम्नलिखित कारकों का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

(1) धार्मिक कार्य-

       धार्मिक कार्यों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- वाराणसी, गया, मथुरा, मदुरई इत्यादि। धार्मिक स्थल से प्रत्येक लोग जुड़े रहना चाहते हैं। इसलिए ऐसे नगरों में संकरी और अनियोजित सड़क प्रणाली विकास हुआ है। भारत के अधिकांश प्राचीनकालीन नगर इसी प्रकार के उदा० प्रस्तुत करते हैं।

(2) धर्म तथा प्रशासन-

      मध्यकाल में नगरों की आंतरिक संरचना पर धर्म एवं प्रशासन दोनों का प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- फतेरपुर सिकरी, आगरा का किला, दिल्ली का लाल किला, जौनपुर, विजयनगर, इत्यादि नगरों पर प्रशासनिक प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

(3) औपनिवेशिक संस्कृति-
      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर औपनिवेशिक संस्कृति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। औपनिवेशिक काल मे नियोजित एवं अनियोजित दोनों प्रकार के नगरों का विकास हुआ।इस काल में प्रत्येक अनियोजित नगर के पास नियोजित नजर देखने को मिलती है। अंग्रेजों ने अनियोजित नगर के पास ब्रिटिश अधिकारियों को रहने हेतु, सैनिक छावनी एवं प्रशासनिक कार्य हेतु नियोजित नगरों का विकास किया।

(4) ग्रामीण-नगरीय स्थानान्तरण- 

         भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर ग्रामीण नगरीण जनसंख्या स्थानान्तरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इसके चलते नगरों में जनसंख्या विस्फोट हुआ है जिसके चलते गंदी बस्ती का विकास तेजी से हो रहा है।

(5) राजनीतिक व प्रशासनिक निर्णय-

     भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर राजनैतिक एवं प्रशासनिक निर्णय का भी प्रभाव देखा जा सकता है। जैसे- स्वतंत्रता के बाद नगरों के विकास के लिए “मास्टर प्लान बनाये गये। इसके लागू होने के कारण ही नगरों के बाहरी क्षेत्रों में नियोजित संरचना दिखाई देती है।

(6) सामाजिक एवं सांस्कृकृतिक कारक- 

      भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना पर सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों का भी प्रभाव देखा जाता है। इन कारकों के कारण सामाजिक विलगाव पर आधारित अधिवासीय क्षेत्र देखने को मिलता है। जैसे- उत्तर भारत के प्रत्येक नगर में बंगालियों का एक अलग मुहल्ला मिलता है।

(7) द्वितीयक व तृतीयक आर्थिक गतिविधियाँ-

      भारतीय नगरों पर द्वितीय एवं तृतीयक आर्थिक गतिविधियों का भी स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। आजादी के बाद भारत में तेजी से हो रहे औद्योगिक विकास के कारण औद्योगिक नगरों का विकास  हुआ है। जैसे- बोकारो, गांधीनगर, ईटानगर, भुवनेश्वर, राउरकेला, दिसपुर इत्यादि।

(8) ग्रामीण संस्कृति का प्रभाव- 

       भारतीय नगरों का विकास प्राय: ग्रामीण क्षेत्रों के लिए हुआ है और ग्रामीण क्षेत्र नगरों का सेवा किया करते है। ग्रामीण लोग नगरों में आकर ग्रामीण परिवेश के आधार पर ही आन्तरिक संरचना विकसित करते हैं।

भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना की विशेषता

      उपरोक्त कारकों के प्रभाव से भारतीय नगरों में निम्नलिखित विशेषताएं दिखाई देती है:-

(1) विकसित देशों में प्रत्येक नगर के मध्य CBD (Central Business District) दिखाई देता है और यह क्षेत्र अट्टालिकाओं का क्षेत्र होता है। यहाँ वाणिज्य, व्यापार थोक मूल्य, खुदरा मूल्य पर आधारित दुकानें होती हैं। रात में CBD खाली हो जाता है। यद्यपि भारत में CBD का विकास हुआ है। तथापि यह अट्टालिकाओं का क्षेत्र नहीं होता है तथा निचले तल्ले पर व्यापार और ऊपरी मंजिल पर अधिवास के रूप में प्रयोग किया जाता है। 

(2) विकसित देशों के नगर में नगर के केन्द्र से ज्यों-2 बाहर की ओर निकलते हैं त्यों-2 मकानों की ऊँचाई में कमी आते जाती है। लेकिन भारतीय नगरों में ऐसी कोई प्रकृति नहीं पायी जाती है।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र सामान्यत: मिश्रित रूप में पायी जाती है। अर्थात यहाँ सभी आय वर्ग के लोग साथ-2 अधिवासित होते हैं। 

(5) यहाँ के नगरों में अधिक आयु वाले मकान देखने को मिलते  और उनमें भी मकान निम्न स्तरीय होता।

(6) भारतीय नगरों में सघन जनसंख्या देखने को मिलती है।

(7) भारतीय नगरों में कार्यों की विशिष्टता के आधार पर नगरीय बस्तियाँ कम ही दिखाई देती है।

भारतीय नगरों की आंतरिक संरचना का भूगोलवेताओ द्वारा अध्ययन

        भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का कई भूगोलवेताओं ने अध्ययन किया है जिनमें तीन का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है:-

(1) गैरीसन का अध्ययन

(2) अशोकदत्ता का अध्ययन 

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन

(1) गैरीसन का अध्ययन 

        गैरीसन एक अमेरिकी भूगोलवेता थे जिन्होंने 1962ई० में कोलकाता नगर के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया और उन्होंने “संयुक्त वृद्धि का सिद्धांत” प्रतिपादित किया। उन्होंने बताया कि एक ही नगर में सकेन्द्रीय वलय पेटी या संकेन्द्रीय वलय प्रतिरूप, खण्डीय प्रतिरूप देखने को मिलता है। गैरीसन ने कहा कि वैसा नगर जिसका विकास लम्बी अवधि से हो रहा हो वहाँ तीनों प्रकार के प्रतिरूप मिलते हैं। उन्हेंने कहा कि कोलकाता महानगर में सबसे पहले सकेंद्रीय पेटियों का विकास हुआ और अंत में बहुनाभिक पेटी का विकास हुआ।

      गैरीसन ने बताया कोलकाता में 1887ई० तक सकेन्द्रीय विकास की प्रवृति थी। 1887ई०-1947ई० के बीच सकेन्द्रीय वलय पेटी और खण्डीय प्रतिरूप के विकास की प्रवृति थी और स्वतंत्रता के बाद बहुनाभिक विकास की प्रवृति है।

      गैरीसन के अध्ययन को आधार मानते हुए कानपुर, वाराणसी, बंगलौर एवं नगरीय जनसंख्या विस्फोट वाले नगरों का जब अध्ययन किया गया तो पाया गया कि उपरोक्त सभी नगरों का विकास गैरीसन के सिद्धांत के अनुरूप हुआ है। लेकिन गैरीसन का मॉडल भारत के छोटे नगरों पर लागू नहीं होता है, इसलिए अन्य अध्ययन आवश्यक था।

(2) अशोकदता का अध्ययन

          A.K. एक्रोन विश्वविद्यालय, USA में प्रो० थे। उन्होंने भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन कर 1974ई० में शोध-पत्र प्रस्तुत किया। उनके अनुसार भारतीय नगरों की आन्तरिक संरचना का निम्नलिखित प्रतिरूप दिखाई देता है।

(1) कोलकाता, मुम्बई, चेन्नई जैसे ब्रिटिशकालीन महानगरों में पश्चिमी देशों के समान ही नगर के केन्द्र में CBD का विकास हुआ है। लेकिन साथ-2 अधिवासीय क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(2) भारत में ब्रिटिशकाल के पूर्व जितने भी नगर विकसित हुए हैं वे सभी अनियोजित प्रकार के हैं।

(3) भारतीय नगरों में अधिवासीय क्षेत्र विलगाव पर आधारित है। भारतीय नगरों में यह विलगाव भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर देखा जा सकता है।

(3) डॉ. कुसुमलता का अध्ययन 

           डॉ. कुसुमलता ने 1968ई० में ही भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि भारतीय नगरों के आन्तरिक संरचना का तीन प्रतिरूप देखने को मिलता है।

(i) अनियोजित प्रतिरूप

(ii) अनियोजित सह नियोजित प्रतिरूप

(iii) नियोजित प्रतिरूप

(i) अनियोजित प्रतिरूप वाले नगर-

        डॉ० कुसुमलता के अनुसार संरचनात्मक विकास के आधार पर अनियोजित नगर दो प्रकार के हैं। प्रथम प्रकार में वैसे नगरों को शामिल करते हैं, जो अति प्राचीन है लेकिन, वर्तमान समय में विकसित होकर बहुत बड़े हो चुके हैं। जैसे- वाराणसी नगर इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यहाँ पर नगर का विकास मंदिर के चारों ओर सबसे पहले अनियोजित तरीके से हुआ और आज भी उसका विकास अनियोजित क्रम में जारी है।

          भारत में दूसरे प्रकार के अनियोजित नगर वह है जो हाल के वर्षों में जनसंख्या विस्फोट और कार्यिक संरचना में आये परिवर्तन से हुआ है। उपरोक्त दोनों प्रकार के अनियोजित नगर के केन्द्र में सघन जनसंख्या देखी जा सकती है और वहाँ मिश्रित कार्यों की प्रवृति होती है।

(ii) अनियोजित सह नियोजित नगर-

        इस प्रतिरूप का विकास औपनिवेशिक काल में हुआ जैसे-पुरानी नगरीय बस्ती पहले से ही अनियोजित बस्ती थी। लेकिन उसके सटे ब्रिटिश प्रशासकों ने नियोजित बस्ती का विकास किया। ऐसे बस्ती आयताकार विन्यास प्रणाली पर आधारित थीं। ऐसे नियोजित नगरों में सिविल लाइन, सैनिक छावनी  तथा प्रशासनिक क्षेत्र का विकास किया गया। पुराने नगरों के नजदीक नियोजित नगर बसाने का प्रमुख कारण अनुकूल बसाव स्थान था। उदा०-(पटना और दानापुर, राँची और बामकुम्प, कैट, दिल्ली और दिल्ली कैंट, आगरा और आगरा कैंट आदि।   

(iii) नियोजित प्रतिरूप-

      भारत में पूर्ण नियोजित नगर का अभाव है। फिर भी कई ऐसे नगर हैं जिनका विकास नियोजित तरीक से किया जाता है। जैसे – जमशेदपुर, चण्डीगढ़, गाँधी नगर, भुवनेश्वर, ईटानगर, येहलांका, बंगलोर, दिसपुर इत्यादि।

       चण्डीगढ़ आयताकार विन्यासप्रणाली पर आधारित एक नियोजित नगर है जिसके केन्द्र में सेक्टर-17 है जिसमें CBD विकास हुआ है। अधिवासीय क्षेत्रों का विकास आय के आधार पर किया गया है। आजादी के पूर्व ब्रिटिश काल में मकड़े जाली प्रतिरूप पर नई दिल्ली को नियोजित नगर के रूप में विकसित किया गया था। जिसके केन्द्र में कनॉट पैलेस है। ब्रिटिश काल के पूर्व जयपुर को राजा जयसिंह ने नियोजित नगर के रूप में विकसित किया था।

  निष्कर्ष:- 

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में अनियोजित, नियोजित तथा अनियोजित सह नियोजित आन्तरिक संरचना नगरों में देखी जाती है।


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5. Hierarchy of Urban Settlements / नगरीय बस्तियों का पदानुक्रम

 5. Hierarchy of Urban Settlements

(नगरीय बस्तियों का पदानुक्रम)



          Hierarchy of Urban Settlements

          नगरीय बस्तियों का विकास केन्द्रीय स्थल से प्रारंभ होता है। लेकिन सभी भौगोलिक प्रदेश में विकसित होने वाले केन्द्रीय बस्ती या स्थल समान रूप से केन्द्रीयता नहीं रखता है। अत: केन्द्रीय स्थलों की कार्य और जनसंख्या आकार में भिन्नता होती है। इन्हीं विभिन्नताओं के आधार पर कई भूगोलवेताओ ने नगरों के पदानुक्रम को निर्धारित करने का प्रयास किया है। कार्य के दृष्टिकोण से नगरीय पदानुक्रम के निर्धारण का कार्य 1933 ई० में क्रिस्टॉलर महोदय ने किया था। उन्होंने षष्टकोणीय मॉडल के आधार पर नगरों का सात पदानुक्रम निर्धारित किया था। उन्होंने एक ही पदानुक्रम के दो नगरों के बीच की समान दूरी भी निर्धारित किया था। जैसे:-

पदानुक्रम   नाम दूरी (km)
1. कस्बा बाजार 7
2. शहर  12
3. काउन्टी केन्द्र  21
4. जिला नगर  36
5. राज्यों की राजधानी  62
6. प्रान्तीय नगर 108
7. प्रादेशिक राजधानी नगर 186

          क्रिस्टॉलर ने प्रथम पदानुक्रम में सबसे छोटे नगर को शामिल किया और अंतिम पदानुक्रम में सबसे बड़े नगर को रखा है। बाद में लॉश, फिलब्रिक, बेरी, गैरीसन जैसे- भूगोलवेत्ताओं ने क्रिस्टॉलर के विधितंत्र की आलोचना की लेकिन नगरों को पदानुक्रमिक विकास पर सहमति जताया।

        पेरॉक्स & बोडोविले ने प्रादेशिक नियोजन के अन्तर्गत कार्यों के आधार पर केन्द्रीय स्थल की विकसित होने की चार पदानुक्रम निर्धारित किये हैं-

(1) विकास ध्रुव

(2) विकास केन्द्र

(3) विकास बिन्दु 

(4) सेवा केन्द्र

          बोडोबिले के अनुसार विकास ध्रुव वह नगर है जहाँ पर सर्वाधिक सेवा कार्य किये जाते हैं। जबकि सेवा केन्द्र वैसा नगर है जहाँ पर सबसे कम सेवा का कार्य होता है।

     विभिन्न देशों के जनगणना विभाग भी नगरों के पदानुक्रम का निर्धारण करने का प्रयास करती है। ब्रिटिश औपनिवेशिक देशों में जनसंख्या के आधार पर नगरों का 6 पदानुक्रम निर्धारित किया गया है-

पदमुक्रम जनसंख्या
1. 1 लाख या उससे अधिक
2. 50,000 – 99,999
3. 20000 – 49 999
4. 10000 – 19999 
5. 5000 – 9999
6. 5000 से कम 

         एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर को सामान्य तौर पर महानगर कहा जाता है। लेकिन वर्तमान समय में 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या रखने वाले नगर महानगर और 50 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर को मेगा सिटी कहा जाता है। 

           कई भूगोलवेताओं ने सांख्यिकी विधि के द्वारा कोटि आकार नियम विकसित किया है। इस संदर्भ में जेफर्सन, जिप्स, स्टीवर्ट, रेड्डी इत्यादि का कार्य विशेष महत्व है।

         अधिकतर विद्वानों ने बताया है कि नगर की आकार और उसके कोटि (पदानुक्रम) के बीच व्युत्क्रमानुपाती संबंध पाया जाता है। जिप्स ने नगरों का कोटि-आकार का संबंध स्थापित करने के लिए कुछ सांख्यिकीय मान निर्धारित की। जैसे-

            1, 0.5, 0.333, 0.250 तथा 0.200 उपयुक्त सांख्यिकी मान जिन नगरों के कोटि-आकार पर लागू होता है, वहाँ पर इससे ज्ञात होता है कि स्वस्थ्य नगरीय पदानुक्रम का विकास हो रहा है।

       कई भारतीय भूगोलवेताओं ने भी नगरीय पदानुक्रम को निर्धारित करने का प्रयास किया है। जैसे- 1955 ई० में राम लोचन सिंह बनारस प्रदेश के नगरीय पदानुक्रम का निर्धारण किया। उन्होंने बताया कि यहाँ पर नगरों का विकास चार पदानुक्रम में हुआ है।

(1) नगर

(2) उपनगर

(3) बड़ा कस्बा 

(4) छोटा कस्बा

            राम लोचन सिंह के द्वारा निर्धारित पदानुक्रम कार्यों के आधार पर किया गया था। पुन: 1951 ई० की जनगणना को मानते हुए 1969 ई० में डॉ० काशीनाथ सिंह ने मध्य गंगा के मैदानी भाग के नगरों का पदानुक्रम निर्धारित किया। उन्होंने मध्य गंगा के मैदानों के नगरों को 6 पदानुक्रम विभाजित किया है :-

(1) प्रादेशिक राजधानी नगर

(2) प्रादेशिक नगर

(3) मध्य आकार के नगर

(4) स्थानीय नगर

(5) ग्रामीण सह नगरीय केन्द्र-

(6) ग्रामीण बाजार

          प्रो० R. P. मिश्रा ने नियोजन कार्यों के संबंध में बोडोविले का सहारा लेते हुए नगरों का पाँच पदानुक्रम निर्धारित किया।  इसी तरह कोटि-आकार नियम का सहारा लेते हुए N.B. रेड्‌डी आन्ध्रप्रदेश के, S.R. पाटिल कर्नाटक के, ओम प्रकाश सिंह उत्तर प्रदेश के नगरों का पदानुक्रम निर्धारित किया। भारत के जनगणना विभाग काशीनाथ सिंह के द्वारा निर्धारित 6 पदानुक्रम को मान्यता प्रदान करती है।

       नगरीय बस्तियों का पदानुक्रमिक अध्ययन प्रदेशिक नियोजन के संदर्भ में अति आवश्यक है। इस अध्ययन से उन नगरों की पहचान की जा सकती है जो कार्य और जनसंख्या के दबाव में है। अत: ऐसे नगरों में प्रादेशिक संसाधन और भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अनुकूल पदानुक्रम विकसित करने का प्रयास किया जा सकता है।


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4. Environmental Issues in Rural Settlements (ग्रामीण बस्तियों में पर्यावरणीय मुद्दे) 

4. Environmental Issues in Rural Settlements 

(ग्रामीण बस्तियों में पर्यावरणीय मुद्दे)



                Environmental Issues

         वह भौगोलिक स्थान जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है, उस स्थान को बस्ती कहते हैं। सार्वभौमिक परिभाषा अनुसार जिस अधिवासीय बस्ती की 2/3 जनसंख्या प्राथमिक कार्य में संलग्न हो, उस अधिवासीय बस्ती को ग्रामीण बस्ती कहते हैं। किसी भी प्रकार के बस्ती के विकास पर भौतिक एवं सांस्कृतिक कारकों का स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि भौतिक पर्यावरण ही ग्रामीण बस्ती के प्रकार, प्रतिरूप तथा उसके आन्तरिक संरचना एवं अन्य विशेषताओं को प्रभावित करती हैं। लेकिन बदलते पर्यावरण के कारण आज की ग्रामीण-बस्तियाँ भी किसी भी प्रकार के बदलाव से अछूते नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में नगरों के भाँति ही अनेक प्रकार के पर्यावरणीय समस्याओं को देखा जा सकता है। जैसे:- 

(1) भूमिगत जलस्तर का ह्रास–

            ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल एवं सिंचाई का सबसे बड़ा जलस्रोत भूमिगत जल रहा है। आज हरित क्रांति, सघन कृषि इत्यादि के कारण भूमिगत जलस्रोत का दोहन किसानों के द्वारा बड़े पैमाने पर किया जा रहा है जिसका परिणाम है कि भूमिगत जलस्तर का ह्रास हो रहा है। मरुस्थलीय क्षेत्र एवं पठारी क्षेत्र के ग्रामीण बस्तियों में यह समस्या अति गंभीर रूप धारण कर चुका है।

         ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर के ह्रास में कमी का प्रमुख कारण भूमिगत जल का रिचार्ज करने वाले जलस्रोत का समाप्त हो जाना है। इसके अलावे वनों के तीव्र कटाव के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई है। वनीय कटाव के कारण वर्षा में अनियमितता उत्पन्न होता है अर्थात कभी अतिवृद्धि तो कभी अनावृष्टि की समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पन्न होती है। अनावृष्टि के दौरान जल का अभाव  हो जाता है, वहीं अतिवृष्टि के दौरान सभी जलस्रोत प्रदूषित हो जाते हैं जिसके कारण पेयजल की गंभीर समस्या उत्पन्न होती है।

(2) मृदा लवणीकरण की समस्या- 

          ग्रामीण क्षेत्रों में सतही सिंचाई के कारण मिट्टी के B स्तर के लवण जल के साथ घुलकर मिट्टी के ऊपरी भाग में आने की प्रवृति रखते हैं, जिसके कारण मृदा लवणीकरण की गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। विश्व के शुष्क एवं उपार्द्र क्षेत्रों में यह एक गंभीर समस्या उभरकर सामने आयी है।

(3) प्रदूषण की समस्या- 

           प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं। जैसे – वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, और आण्विक प्रदूषण इत्यादि। ग्रामीण लोग आज भी अधिकांश ऊर्जा की जरूरत जीवाश्म ऊर्जा से प्राप्त करते हैं जिससे बड़े पैमाने पर धुआं और प्रदूषक पदार्थ वलुमण्डल में मिलते रहते है, जिसके कारण वायु का प्रदूषण तेजी से हो रहा है।

         ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रैक्टर, मोटरसाइकिल जैसे नवीन परिवहन साधन के आगमन से ग्रामीण वायु भी स्वच्छ नहीं रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में घूँआ से युक्त प्रदूषित वायु को शीत ऋतु में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वर्षा ऋतु में ग्रामीण बस्तियाँ नरक का रूप धारण कर लेती है क्योंकि ग्रामीण लोग घर से निकलने वाले कचड़े को घर के पास ही जमा रखते हैं।

         शौच इत्यादि के लिए शौचालय का प्रयोग न कर खुले स्थानों का प्रयोग करते है। मृत जानवरों को गाँव के खुले स्थानों पर ही फेंक आते हैं। ग्रामीण गलियाँ एवं सड़‌क कच्चे होने के कारण और उसमें जानवरों के मल-मूत्र मिल जाने के कारण दुर्गन्ध उत्पन्न होने लगती है। उपरोक्त कारणों के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में वायु एवं जल दोनों के प्रदूषित होते हुए देखा जा सकता है।

(4) ध्वनि प्रदूषण- 

         आधुनिक ग्रामीण बस्तियाँ भी सूचना क्रांति के दौर से पीछे नहीं है। रात-दिन सिंचाई के लिए चलने वाले फिटर, थ्रेसर मशीन, क्रेसर मशीन, सुबह-शाम मंदिरों के ऊपर बजने वाले लाउड्सपीकर, मस्जिदों के ऊपर लगे लाउड्सपीकर, ग्रामीण क्षेत्र का सांस्कृतिक वातावरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में ध्वनि प्रदूषण होता रहता है। 

(5) नाभिकीय प्रदूषण-

          आधुनिक युग  में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने हेतु नाभिकीय ऊर्जा पर विशेष रूप से ध्यान दिया जा रहा है, जिन-2 स्थानों पर नाभिकीय संयंत्र स्थापित है उन संयंत्रों के पास स्थित ग्रामीण बस्तियों में नाभिकीय प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(6) जल प्रदूषण- 

           ग्रामीण बस्तियाँ जल के लिए मुख रूप से दो श्रोतों पर निर्भर करती है। पहला भूमिगत जलस्रोत दूसरा सतही जलस्रोत।  भूमिगत जल स्रोत की चर्चा ऊपर की जा चुकी है। यहाँ सतही जलस्रोत की चर्चा की जा रही है।

           पोखर, तालाब, नदी, झील, बड़े-2 प्राकृतिक और कृत्रिम रूप से निर्मित गर्त में जमा पानी सतही जलस्रोत का कार्य करती है। खेतों में रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशकों का प्रयोग, जल स्रोत के पास मल त्याग का प्रयास, जलस्रोत में ही स्नान करने के दौरान डिटर्जेन्ट का प्रयोग, पशुओं को जलाशय में ले जाकर स्नान कराना इत्यादि आम बात है। इसके चलते सतही जलस्रोत प्रदूषित हो चुके हैं। ऐसे प्रदूषित जल ग्रामीण क्षेत्रों में जल जनित बीमारी, महामारी इत्यादि को जन्म देते हैं। 

(7) वन हाल की समस्या-

          ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन, विभिन्न प्रकार के कृषि कार्य, गृह निर्माण एवं अन्य कार्यों में बड़े पैमाने पर वृक्ष की आवश्यकता पड़ती है। इस आवश्यकता की पूर्ति करने हेतु ग्रामीण लोग अपने गाँव के इर्द-गिर्द उपस्थित वृक्ष को काट‌कर तात्कालिक रूप से प्रयोग में लाने का कार्य करते हैं। वृक्ष को पर्यावरण “लंगस्” कहा जाता है। इतना ही नहीं बल्कि वनस्पति जलवायु का निर्धारक होता है। आज वनीय हास के कारण जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापन इत्यादि की समस्या उत्पन्न हो रही है। इसी तरह ग्रामीण क्षेत्रों में ओजोन क्षरण के प्रभाव को वनस्पति एवं पशुओं के ऊपर देखा जा सकता है। समय-2 पर अम्ल वर्षा, बादल फटना, अत्याधिक तड़ित झंझा का गिरना इत्यादि पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।

निष्कर्ष

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि आज ग्रामीण क्षेत्र के पर्यावरण भी अछूते नहीं रहे हैं जिसका परिणाम यह हो रहा है, कि आज विश्व की ग्रामीण बस्तियाँ न केवल परम्परागत समस्याओं को झेल रही है बल्कि उन्हें आधुनिक पर्यावरणीय समस्याओं से भी झेलना पड़‌ रहा है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते संपोषणीय ग्रामीण विकास की योजनाओं का निर्माण कर ग्रामीण क्षेत्रों में लागू किया जाए और ग्रामीण वातावरण को सुरक्षित रखा जाय।


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