23. Christoller’s Central Place Theory (क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)

23. Christoller’s Central Place Theory

(क्रिस्टॉलर का केन्द्रीय स्थल सिद्धांत)



         केन्द्रीय स्थल सिद्धांत मूलत: नगरीय भूगोल से संबंधित है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन क्रिस्टॉलर महोदय ने दक्षिण जर्मनी के नगरों के स्थानीयकरण के प्रतिरूप का अध्ययन कर (1933 ई०) में प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार केन्द्रीय स्थलों का वितरण षष्टकोणीय और पदानुक्रमिक तरीके से होता है।

    क्रिस्टॉलर ने केन्द्रीय स्थल की परिभाषा देते हुए बताया कि वैसा नगर जो किसी भौगोलिक क्षेत्र में कई बस्तियों के बीच में होता है तथा अन्य बस्तियों को सेवा प्रदान करती है एवं द्वितीयक तथा तृतीयक कार्यों का केन्द्र बिन्दु होती है।

   क्रिस्टॉलर के अनुसार केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उन्हीं क्षेत्रों में लागू होती है जहाँ निम्नलिखित मान्यताएँ काम करती है।

मान्यताएँ

(1) भौगोलिक दृष्टि से वह क्षेत्र समरूपता रखता हो। सम्पूर्ण प्रदेश में संसाधन, जनसंख्या, उत्पादक एवं उपभोक्ताओं का वितरण लगभग समान रूप से हो।

(2) दूसरी मान्यता यह है कि केंद्रीय स्थल से किसी भी दिशा में जाने पर परिवहन मूल्य में दूरी और भार के अनुसार वास्तविक वृद्धि होती है। 

     ऊपर वर्णित शर्तों को पूर्ण करने वाले प्रदेश में ही यह सिद्धांत लागू होता है।

    क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत तीन परिकल्पनाओं पर आधारित है:

(1) बस्तियों का वितरण षष्टकोणीय होता है और षष्टकोणीय बस्ती के बीच में केन्द्रीय बस्ती अवस्थित होती है। इसे नीचे के चित्र में देखा जा सकता है।Christoller
   क्रिस्टॉलर के पूर्व यह मान्यता कार्य करता था कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश के बीच में केन्द्रीय स्थल होता है और उसके प्रभाव क्षेत्र की बस्ती वृत के आकार में विकसित होते हैं।

    चित्र से स्पष्ट है कि पूर्व की मान्यता में छाया प्रदेश का विकास होता है। लेकिन किस्टॉलर के षष्टकोणीय परिकल्पना में छाया प्रदेश के विकास की कोई संभवना नहीं हैं।

(2) क्रिस्टॉलर की दूसरी परिकल्पना यह है कि षष्टकोणीय वितरण प्रारूप पदानुक्रमिक होता है अर्थात् इसे स्पष्ट करते हुए क्रिस्टॉलर ने कहा है कि केन्द्रीय बस्ती एक छोटे बाजार से लेकर एक वृहद बाजार (बड़े-2 महानगर) तक हो सकते हैं। हर हाल में केन्द्रीय स्थान षष्टकोणीय बस्तियों के बीच में होता है। इसे नीचे के मानचित्र से समझा जा सकता है।

          क्रिस्टॉलर के अनुसार बस्तियों का सात पदानुक्रम में विकास होता है।

पदानुक्रम बस्ती का नाम केंद्रीय स्थल की जनसंख्या दो केंद्रीय स्थल के बीच की दूरी प्रभाव क्षेत्र का क्षेत्रफल प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या
1. मार्केट (M)

(बाजार-कस्बा)

1000 7 KM. 45 KM2 2700
2. टाउनशीप सेंटर (A) 2000 12 KM. 135 KM2 8100
3. काउंटी सिटी(K) 4000 21 KM. 400 KM2 24000
4. जिला नगर (B) 10,000 36 KM. 1200 KM2 75000
5. स्टेट कैपिटल सिटी (G) 30,000 62 KM. 3600 KM2 225000
6. प्रोविन्सियल सिटी (P) 1,00000 108 KM. 10800 KM2 675000
7. रिजनल कैप्टल सिटी (L) 5,000 182 KM. 32400 KM2 22025000

(3) क्रिस्टॉलर का तीसरा महत्वपूर्ण परिकल्पना यह है कि केन्द्रीय स्थान के प्रभाव में आने वाले बस्तियों की संख्या का विश्लेषण तीन मान्यताओं आधार पर किया जाता है। जैसे :-

(i) बाजार सिद्धांत या K=3 सिद्धांत

(ii) परिवहन सिद्धांत या K=4 सिद्धांत

(iii) प्रशासन सिद्धांत या K=7 सिद्धांत

    K=3 सिद्धांत का तात्पर्य यह है कि सबसे छोटी केन्द्रीय बस्ती (बाजार केन्द्र) औसतन तीन गाँवों को बाजार की सुविधा प्रदान करती है। पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होती है। वैसे-2 उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वाली बस्तियों का क्रमिक वृद्धि 3 के गुणनफल में होता है। जैसे- 3, 9, 27, 81 ……..।

     K=4 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर केन्द्रीय बस्ती परिवहन के कारण विकसित हुआ हो तो वहाँ की सबसे छोटी परिवहन आधारित केन्द्रीय बस्ती 9 गाँव को सेवा प्रदान करेगी।

    पुन: जैसे-2 केन्द्रीय बस्ती के आकार में क्रमिक वृद्धि होगी। वैसे-2 बस्तियों की संख्या में 4 के गुणनफल में वृद्धि होगी।

   K=7 सिद्धांत का तात्पर्य है कि अगर कोई केन्द्रीय बस्ती प्रशासनिक दृष्टिकोण से विकसित हुआ हो तो सबसे छोटी प्रशासन पर आधारित केन्द्रीय बस्ती न्यूनतम 7 गाँवों को सेवा प्रदान करेगी। इसी तरह से ज्यों-2 केन्द्रीय बस्ती के पदानुक्रम में वृद्धि होते जायेगी। त्यों-त्यों 7 के गुणनफल में बस्तियों की संख्या में वृद्धि होते जायेगी।

K=3 सिद्धांत का विश्लेषण

    K=3 सिद्धांत अर्थात बाजार सिद्धांत का मूलभूत संकल्पना यह है कि षष्टकोण पर स्थित कोई भी बस्ती दो भुजाओं के मिलन केन्द्र पर होगी और कोई भी बस्ती तीन केन्द्रीय बस्ती से समान दूरी पर होगी। चूँकि षष्टकोण में छ: बस्तियाँ होती है और उनके तीन केन्द्रीय बस्तियों में सेवा वितरित होने की पूरी संभावनाएँ हैं। इसलिए एक केन्द्रीय बस्ती षष्टकोण की 6 बस्तियों में से दो बस्तियों की सेवा करेगा। इसके अलावे केन्द्रीय बस्ती स्वयं भी सेवा ग्रहण करेंगे। इस प्रकार से कुल तीन बस्तियों को केन्द्रीय बस्ती से सेवा मिलेगी। इसी के आधार पर K=3 सिद्धांत प्रतिपादित किया गया।

 

K=4 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=4 सिद्धांत के अन्तर्गत यह माना गया है कि बस्तियाँ षष्टकोण के भुजाओं के मिलन केन्द्र पर न होकर भुजाओं के मध्य में स्थित होते हैं। ऐसी स्थिति में प्रत्येक बस्ती के लिए दो केन्द्रीय बस्ती समान दूरी पर होते हैं अर्थात् षष्टकोण छः बस्तियों में से प्रत्येक बस्ती का प्रभाव दो केन्द्रीय बस्ती में विभाजित हो जाती है और ऐसी स्थिति में 4 केन्द्रीय बस्ती से सेवा ग्रहण करते लगती है।

K=7 सिद्धांत का विश्लेषण

   K=7 सिद्धांत के अन्तर्गत माना गया है कि कोई भी बस्ती भुजा के मिलन बिन्दु या मध्य भुजा पर विकसित नहीं होती है बल्कि षष्टकोण के अन्दर विकसित होती है। चूंकि प्रशासनिक कार्य दो षष्ट कोण में विभाजित नहीं हो सकती है। इसलिए प्रशासन की सुविधा के हेतु एक षष्टकोण के अन्तर्गत कुल 7 बस्तियों प्रशासनिक क्षेत्र के अन्तर्गत आती हैं।

क्रिस्टॉलर सिद्धांत का परीक्षण

     क्रिस्टॉलर महोदय ने स्वयं यह बताया कि केन्द्रीय स्थल का सिद्धांत उसी क्षेत्र में लागू होगा जहाँ पर ऊपर में बताये गये मान्यताएँ कार्य करेंगी। अर्थात् उन्होंने स्वयं स्पष्ट कर दिया था कि उन‌का K-3, K-4 और K-7 का सिद्धांत विश्व व्यापी नहीं हो सकता क्योंकि इस सिद्धांत में बताये गये मान्यताएं पूर्ण रूप से लागू नहीं होती है।

   क्रिस्ट्रॉलर का सिद्धांत दक्षिणी जर्मनी में पूर्णतः लागू होती है क्योंकि वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनसंख्या वितरण में समरूपता पाई जाती है। भारत के UP और उत्तरी-पश्चिमी बिहार में यह सिद्धांत कुछ हद तक लागू होती है क्योंकि इस प्रदेश में भौगोलिक समरूपता एवं जनसंख्या का समान वितरण पाया जाता है।

लॉश का संशोधन

     क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की जटिलताओं को समझते हुए लॉश महोदय ने बताया कि केन्द्रीय स्थल और बस्तियों का वितरण समान षष्टकोण में न होकर जालीनु‌मा षष्टकोण में वितरित होने की अधिक संभावनाएँ हैं।

   लॉश के अनुसार प्रत्येक केन्द्रीय स्थान के द्वारा किये जाने वाले प्रत्येक कार्य का प्रभाव समान रूप से सभी बस्तियों पर नहीं पड़ती है। लॉश ने यह भी स्पष्ट किया कि केन्द्रीय स्थल के ईर्द-गिर्द बस्तियों पर केन्द्रीय स्थल का प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि उसके द्वारा किये जा रहे कार्यों का प्रभाव पड़ता है। इसका परिणाम यह होता है कि एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द कई षष्टकोण का विकास हो जाता है जो देखने में जालीनुमा षष्टकोण लगता है।

आलोचना:-

(1) बेरी और गैरीसन ने केन्द्रीय स्थल का आलोचना करते हुए कहा है कि नगरीय बस्तियों का षष्टकोण के रूप में वितरण होना अत्यन्त ही कठिन है क्योंकि उनके वितरण पर निम्नलिखित दो कारकों का प्रभाव पड़ता है-

(1) उपभोक्ताओं के आचारपरकता (व्यवहार) का

(2) उपभोक्ताओं के खरीद बिक्री करने की क्षमताओं का।

        ये दोनों कारक भौगोलिक दूरियों को संशोधित कर देती है। इसीलिए केन्द्रीय स्थल के इर्द-गिर्द बस्तियों का वितरण षष्टकोण के रूप में हो भी नहीं सकता।

(2) बेरी ने यहाँ तक कहा है कि जीवन-निर्वाह अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्र में भी यह संभव नहीं है।

(3) हाँलाकि क्रिस्टॉलर ने यह स्वीकार किया है कि उनका सिद्धांत वहीं पर लागू होगा जहाँ पर उनके द्वारा बताये गए शर्त लागू होंगे। लेकिन कहीं भी व्यवहारिक रूप में ये उनकी मान्यताएँ लागू होती ही नहीं है। वैसी स्थिति में उनका सिद्धांत उपयोगी नहीं रह पाता है।

(4) क्रिस्टॉलर के सिद्धांत की आलोचना इस आधार पर भी की जाती है कि किसी भी भौगोलिक प्रदेश में केन्द्रीय स्थल का विकास 7 पदानुक्रम में नहीं हो सकता।

निष्कर्ष:

      क्रिस्टॉलर के केन्द्रीय स्थल सिद्धांत की कुछ सीमाएँ अवश्य है। इसके बावजूद इस सिद्धांत की व्यापक मान्यता प्राप्त है क्योंकि इस सिद्धांत के आधार पर ही कई देश के सरकारों ने प्रादेशिक नियोजन का कार्य किया है तथा बोडोविले जैसे भूगोलवेता ने विकास ध्रुव का सिद्धांत प्रतिपादित किया। इसके अलावे केन्द्रीय बाजार का वितरण पदानुक्रमिक होता है। यह भी एक उपयोगी संकल्पना है। इस तरह इनके सिद्धांतों को अव्यवहारिक घोषित नहीं किया जा सकता है।


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22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नगर के केन्द्र से दूरी के अनुसार निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक कारण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान पर हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

20. Concentric Zone Theory (सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)

20.  Concentric Zone Theory

(सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)


        Concentric Zone Theory

        नगरों की सामान्य संरचना अथवा आकारिकी के सम्बन्ध में सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ई. डब्ल्यू. बर्गेस ने 1927 में किया, जिसे संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि एक नगर का विकास केन्द्र से बाहर की ओर संकेन्द्रित क्षेत्रों (पेटियों) की शृंखला बनाते हुए होता है। ये पेटियाँ नगर की वृद्धि के साथ-साथ बाहर की ओर खिसकती जाती है।

        यह सिद्धान्त आदर्श दशाओं में ही लागू होता है अन्यथा प्रतिक्रियात्मक कारकों जैसे, यातायात मार्गों और धरातलीय अवरोध (नदी, झील, समुद्र, हिमनद, खाइयां) के उपस्थित होने पर अपने मूल रूप में लागू नहीं होता है। इस प्रकार बर्गेस का यह सिद्धान्त एक आदर्श संकल्पना है। बर्गेस ने शिकागो का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नगर के संरचनात्मक विकास को निम्नलिखित पांच संकेन्द्रित क्षेत्र (पेटियों) द्वारा समझाया है।

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र (Zone of Workingmen’s Homes)

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र (Zone of Better Residences)

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र (Commuter’s Zone)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

         नगर के केन्द्र में प्रथम पेटी के रूप में केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र स्थित होता है। यह नगर का हृदय क्षेत्र होता है। यह नगर के वाणिज्य, व्यापार और यातायात का केन्द्र होता है। गगनचुम्बी इमारतें, प्रमुख शोरूम, एम्पोरियम, थिएटर, होटल, नाचघर, क्लब एवं वाणिज्यिक संस्थानों के कार्यालय इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसका अधिकांश भाग गैर-आवासीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है।

      शिकागो में इस भाग को लूप (Loop), न्यूयार्क में डाउन टाउन (Down Town) तथा पिट्सबर्ग में गोल्डन टेम्पल (Golden Temple) कहते हैं। बर्गेस ने केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र को भी दो भागों में बांटा है- पहला क्षेत्र केन्द्र में स्थित खुदरा व्यापार क्षेत्र है जो कि वृत्ताकार होता है, दूसरा इसके चारों ओर बाहर की ओर स्थित थोक व्यापार क्षेत्र होता है।

2. संक्रमण क्षेत्र:-

        यह क्षेत्र केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। इसमें व्यापारिक, औद्योगिक और आवासीय उपयोग के क्षेत्र पाए जाते हैं अतः इसे संक्रमण क्षेत्र कहते हैं। इसके आन्तरिक भाग में व्यापारिक संस्थान एवं हल्के विनिर्माण उद्योग का क्षेत्र होता है, तो बाहर की ओर आवासीय क्षेत्र होता है। इसमें अधिकांश भवन पुराने, छोटे एवं गन्दे होते हैं तथा कुछ भागों में गन्दी बस्तियां (Slum) भी होती हैं।

      इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश लोगों का सामाजिक स्तर निम्न होता है। यह क्षेत्र अधिकांशतः आप्रवासियों द्वारा आवासित होता है।

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र:-

          संक्रमण क्षेत्र को घेरे हुए कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र होता है। इसमें औद्योगिक श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। ये लोग संक्रमण क्षेत्र में तो रहना पसन्द नहीं करते हैं, लेकिन अपने कार्यस्थल की समीपता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में रहते हैं अर्थात् इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग संक्रमण क्षेत्र से ही इस क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में दूसरी पीढ़ी के आप्रवासी लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है। शिकागो में यह क्षेत्र दो मंजिलें भवनों वाला है।

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र:-

       बेहतर आवासीय भवनों अथवा मध्यम या उच्च-मध्यम श्रेणी के लोगों का यह निवास क्षेत्र कार्यशील लोगों के घरों के क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। यह एक उपनगरीय क्षेत्र जैसा होता है। अधिकांश व्यक्ति व्यावसायिक कार्यों में संलग्न होते हैं। इस क्षेत्र में होटल, एक परिवार वाले आवासीय भवन तथा उच्च श्रेणी के फ्लेट वाले भवन मिलते हैं। सभी भवनों में पर्याप्त खुला क्षेत्र होता है।

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र:-

       नगर की बाह्य सीमा पर तीव्र यातायात सुविधाओं के कारण उपनगरीय क्षेत्रों तथा अनुषंगी नगरों का एक क्षेत्र बन जाता है। इसमें उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र नियमित न होकर बिखरे हुए रूप में होते हैं। यह क्षेत्र नगर के आवासीय क्षेत्रों से हरित पट्टी (Green Belt) द्वारा पृथक् होता है। यह पूर्ववर्ती गाँवों का ही क्षेत्र होता है जो कार्यात्मक दृष्टि से नगरीय विशेषताओं से युक्त होता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन में काम करने के लिए केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र में जाते हैं तथा रात्रि में पुनः यहां लौट आते हैं अतः इन्हें शयन नगर (Bed-Room Town) भी कहते हैं।

आलोचना

        बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की कुछ सामान्य विशेषताएं शिकागो तथा कुछ अन्य नगरों (भारतीय नगरों में मुजफ्फरपुर का नगर संकेन्द्रित सिद्धान्त के अनुरूप है) में पाई गईं जो कि सिद्धान्त को पुष्ट करती हैं, किन्तु कई विद्वानों ने अधिकांश नगरों पर सिद्धान्त लागू न होने के कारण इसकी आलोचना की है। सिद्धान्त में रही कमियों को आलोचना के रूप में स्पष्ट किया गया है। ये कमियां निम्नलिखित हैं :

(i) एक मात्र संक्रमण क्षेत्र में स्थित कुछ हल्के उद्योगों के अतिरिक्त संकेन्द्रित सिद्धान्त में किसी भी क्षेत्र में उद्योगों एवं औद्योगिक पेटी की स्थिति नहीं बताई गई है। आशय यह है कि औद्योगिक क्रियाकलाप किसी भी पेटी में मिल सकते हैं।

(ii) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र गोलाकार न होकर प्रायः अनियमित या आयताकार अधिक होता है। आर. ई. डिकिन्सन ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पेरिस, आदि नगर वृत्ताकार प्रतिरूप नहीं रखते हैं। इसी प्रकार थोक व्यापार क्षेत्र कुछ मात्रा में ही केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के किनारे पर मिलते हैं। अधिकांशतः इनकी स्थिति रेलमार्गों के निकट होती है।

(iii) नगर में खुदरा व्यापार का एकमात्र क्षेत्र ही नहीं होता है बल्कि नगर के विस्तार एवं तीव्र परिवहन साधनों के कारण अन्यत्र भी छोटे-छोटे व्यापारिक केन्द्र विकसित हो जाते हैं।

(iv) निम्न आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र एवं गन्दी बस्तियां भी मात्र संक्रमण क्षेत्र में केन्द्रित न होकर नगर के विभिन्न भागों जैसे- औद्योगिक इकाइयों एवं रेलमार्गों के निकट अधिक पाई जाती हैं।

(v) भूमि उपयोग स्वरूप के निर्धारण में परिवहन मार्गों की भूमिका की सिद्धान्त में उपेक्षा की गई है। नगर से निकलने वाली मुख्य सड़कों के किनारे विकसित हुए व्यापार तथा उसके साथ बढ़ते हुए भूमि मूल्यों को बर्गेस ने अपने सिद्धान्त में कोई स्थान नहीं दिया है।

(vi) नगर के बहिवर्ती भाग में जनसंख्या का जमाव प्रमुख मार्गों के सहारे होता है फलतः नगर का आकार संकेन्द्रित न होकर तारानुमा होता है।

(vii) धरातलीय अवरोधों के कारण संकेन्द्रित क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। बर्गेस का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की दशाओं पर आधारित है तथा आदर्श दशाओं के अन्तर्गत ही लागू होता है।

         अतः इस सिद्धान्त को अत्यधिक सामान्यीकृत रूप में ही देखा जाना चाहिए। तीव्र परिवहन साधनों का विकास एवं नगरों में पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण भी नगरों के भूमि उपयोग स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन आया है। अत्यधिक आलोचना के उपरान्त भी नगरों की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में प्रथम सिद्धान्त होने के कारण इसका अपना महत्व है।

प्रश्न प्रारूप 

1. नगर की आकारिकी अथवा सामान्य संरचना के संबंध में प्रतिपादित सकेंद्रित क्षेत्र/पेटी सिद्धांत (Concentric Zone Theory) की विवेचना कीजिये।

10. नगरीय वर्गीकरण

10. नगरीय वर्गीकरण


नगरीय वर्गीकरण⇒नगरीय वर्गीकरण

            नगरों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है:-

1. उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर

2. स्थानीयकरण अथवा बसाव स्थान एवं बसाव स्थिति के आधार पर

3. कार्यों के आधार पर

2. जनसंख्या आकार के आधार पर

उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर नगरों का वर्गीकरण 

          नगरों के उत्पत्ति और विकास के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण अनेक विद्वानों के द्वारा किया गया है। इस दृष्टि से पैट्रिक गेडिस, ममफोर्ड एवं ग्रिफिथ टेलर के कार्य अधिक महत्व के है। 

          पैट्रिक गेडिस के अनुसार नगरों का विकास व पत्तन की छः अवस्थाएँ जाती है जिन्हें मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।

1. पैलियोटेकनीक वाले नगर में पुरानी अर्थव्यवस्था वाले नगर और

2. नियोटेकनीक नगर में नई अर्थव्यवस्था वाले नगर आते है।

                 टेलर ने नगरों के उत्पत्ति एवं विकास के आधार पर मानव जीवन चक्र से तुलना करते हुए सात अवस्थाओं की चर्चा की गई है-

1. पूर्व शैशवावस्था (Sub-infantile stage)⇒ इस अवस्था में मकानों के अंदर की दुकान फिर गली अथवा सड़क के दोनों ओर मकान तथा दुकान बनने लगते हैं।

2. शैश्वावस्था (Infantile stage)⇒ इस अवस्था में गलियों व सड़कों का कुछ सुधरा रूप दिखाई देने लगता है तथा बस्ती बढ़ने लगती है।

3. बाल्यवस्था (Juvenile stage)⇒ इस अवस्था में मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर गलियों का निर्माण होना शुरू हो जाता है।

4. किशोरावस्था (Adolescent Stage)⇒ नगर में विभिन्न प्रकार के मकान दिखलाई देने शुरू हो जाते है। नगर अपना व्यापार-क्षेत्र अलग से बना लेते हैं।

5. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर की प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्नता आ जाती है। रिहाइशी क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, व्यापारिक क्षेत्रों का पृथक्कीकरण स्पष्ट दिखाई देने लगता है। मकानों की ऊंचाई बढ़ने लगती है।

6. उत्तर प्रौढावस्था (Late Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर का विकास योजना के अनुसार होने लगता है।

7. वृद्धावस्था (Sensile Stage)- यह नगर की अंतिम अवस्था है जिसमें नगर उजड़ने लगता है। चित्तौड़, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इस्फान (ईरान) इसी के उदाहरण हैं।

मैगापोलिस

               ममफोर्ड ने सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखकर नगरों की छ: अवस्थाएँ बतायी हैं-

1. इओपोलिस

2. पोलिस

3. पट्रोपोलिस

4. मैगापोलिस

5. टायरेनोपोलिय

6. मेक्रोपोलिस

1. Eopolis- इस अवस्था में केंद्रीय स्थान पर नगर का विकास अपने शैशवकाल में होता है लेकिन नगर के आकार की पहचान नहीं हो पाती है।

2. Polis- इस अवस्था में जनसंख्या आकार बड़े हो जाते हैं तथा नगरीय आकार की पहचान संभव है। बड़े गाँव कस्बे का रूप धारण कर लेते है।

3. Metropolis- मुख्य नगर के आकार में पुनः वृद्धि होती है तथा इस पर निर्भर रहने वाले कई छोटी-छोटी नगरीय बस्तियाँ भी विकसित हो जाती है।

4. Megapolis- यह अवस्था नगर की चरम सीमा को बताती हैं। इसमें प्रादेशिक नगरीकरण की प्रवृत्ति होती है। आस-पास की ग्रामीण बस्तियों में भी नगरीय कार्यों की प्रधानता हो जाती है। अमेरिकन मेगापोलिस का विस्तार बोस्टन से लेकर बाल्टीकमोर तक हैं। रोर्टरडम-एम्सटर्डम मेगापोलिस। टोक्यो-योकोहामा-कवासाकी-कोबे मेगापोलिस इसके उदाहरण है।

5. Trynopolis- इस अवस्था में नगर की जनसंख्या में ह्रास प्रारंभ हो जाता है। नगरीय आकर्षण पर्याप्त नहीं रह जाता। इसे Diging Stage of City कहते है। लंदन और पेरिस इसके उदाहरण है।

6. Nekropolis- इस अवस्था में नगर का पूर्ण पत्तन हो जाता है।उजड़े हुए नगर की इस अवस्था में चारों ओर  भग्नावशेष दिखाई देने लगते है। हड़प्पा, कन्नौज, तक्षशिला इसके उदाहरण है।

बसाव-स्थान (Site) व बसाव-स्थिति (Situation) में अंतर व संबंध  

             बसाव-स्थान (Site) वास्तव में बसाव-स्थिति (Situation) का एक छोटा अंग है। ये दोनों मिलकर नगर की उत्पत्ति व विकास पर प्रभाव डालते हैं। नगर एवं गाँव दोनों प्रकार के बस्ती के लिए Site और Situation महत्व रखता। इनके बीच निम्नलिखित अंतर है-

(i) बसाव-स्थान व बसाव-स्थिति में सबसे पहले अंतर रैटजेल ने किया। उसने बर्लिन नगर का अध्ययन कर यह बताया कि यह नगर ऐसे बसाव-स्थान पर है जहाँ कि उसके बड़ा नगर बनने की संभावना नहीं थी, परंतु जर्मनी के उपजाऊ मैदान में इसकी बसाव-स्थिति ही इसके विकास का कारण बनी और यह एक बड़ा नगर बन गया।

(ii) बसाव स्थान भौतिक विशेषताओं पर अधिक बल देता है, जबकि बसाव-स्थिति में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाता है।

(iii) बसाव-स्थान विशिष्टता रखने वाला होता है लेकिन बसाव-स्थिति व्यापक होती है।

(iv) नगर व गाँव दोनों प्रकार की बस्ती के लिए बसाव-स्थान का महत्व होता है लेकिन बसाव-स्थिति ही होती है, जो गाँव के आकार को वृद्धि प्रदान करके उसको नगर में परिवर्तित कर देती हैं।

(v) गंगा-यमुना नदियों का संगम तथा गंगा के अर्द्ध-वृत्ताकार मोड़ बसाव-स्थान की विशेषता है। जिन्होंने नगर को वर्तमान आकृति प्रदान की है। इन नदियों के बीच की भूमि बाढ़ से सुरक्षित होने के कारण बसाव-स्थिति की दृष्टि से उपयुक्त थी। बसाव-स्थिति की दृष्टि से नगर अपने चारों और विस्तृत उपजाऊ भूमि, अतिरिक्त कृषि उत्पादन, रेल व सड़क मार्गों का जंक्शन आदि सुविधाएँ रखता है।

            बसाव स्थान वह भू-भाग है जहाँ पर नगर बसा होता है। किसी नगर का विकास किस दिशा में होगा यह उसके बसाव स्थान पर निर्भर करता है। जैसे-यदि नगर किसी सड़क या नदी के किनारे बसा है तो उसकी आकृति लंबी होगी। बसाव स्थान के अंतर्गत उस स्थान को धरातलीय दशा, भूगर्भिक दशा, जलप्राप्ति आदि का अध्ययन करते हैं।

           नगर प्रारंभ में बसाव स्थान की आकृति के अनुरूप ही फैलना शुरू करता है। बाद में समय के साथ-साथ अपने आकार में वृद्धि कर लेता है। उन दिशाओं में फैलता है, जहाँ पर भूमि नगरीय विकास के लिए उपयुक्त होती है और यातायात मार्गों के सहारे बढ़ता है लेकिन यदि किसी नगर का बसाव-स्थान कुछ भौतिक असुविधाओं से युक्त है तो भी वहाँ पर नगर का विस्तार होता है ऐसा तब होता है, जब नगर स्थिति बसाव स्थिति को तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे स्थान पर भूमि की कीमत ऊँची होती हैं। इस प्रकार बसाव स्थान का तात्पर्य उस जगह से है जहाँ नगरीय आकारिकी का विकास होता है जबकि बसाव स्थिति का संबंध बसाव स्थल के चारों तरफ पाये जाने वाले प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण से है, जो नगर के विकास में सहायक होता है। दोनों ही कारक मिलकर नगरीय बस्ती का स्थानीयकरण करते हैं। इस कारण बसाव स्थान और बसाव स्थिति के आधार पर किया गया वर्गीकरण स्थानीयकरण के आधार पर किया गया वर्गीकरण माना जाता है।

भौगोलिक स्थानीयकरण के आधार पर नगरों का वर्गीकरण अथवा बसाव-स्थान तथा बसाव-स्थिति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

         भौगोलिक स्थानीय करण अर्थात बसाव-स्थल तथा बसाव स्थिति के अनुसार नगरों को दो प्रमुख भागों में बाँटते है-

(A) जलीय सुविधा के किनारें बसे नगर और

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर

(A) जलीय सुविधा के किनारे बसे नगर- इसे पुन: तीन भागों में बाँटते है:-

(a) नदी के किनारे बसे नगर- इसे पुन: छ: भागों में बाँटते है:- 

(i) जलप्रपात नगर-  जलप्रपात के सुविधा के कारण पर्यटन स्थल बन गया है। उदाहरण सागर (कर्नाटक), भेड़ाघाट, नियाग्रा।

(ii) मोड़ लेते हुए बसाव-स्थलीय नगर- यह बाढ़ से मुक्त नगर होता है।  जैसे -आगरा, जायरे का लिविंग स्टोन नगर।

(iii) संगम स्थल पर बसा नगर- जहाँ दो नदियों का संगम होता है वहाँ बसे नगर इसके तहत आते है। जैसे प्रयाग, अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर वसा देवप्रयाग, स्वर्णरेखा और खरकई के संगम पर बसा जमशेदपुर।

(iv) ब्रिजटाउन या नदियों के  दोनों किनारों पर बसे नगर। जैसे लंदन (टेम्स) बुडापेस्ट (डेन्यूब), श्रीनगर (झेलम)  

(v) ज्वारीय नगर – ज्वारभाटा के जल से नदियों के मुहानो पर बंदरगाह बन जाते हैं जिससे समुद्र से दूर आंतरिक भाग में नगर बन जाते हैं। जैसे हुगली के किनारे कलकत्ता।

(vi) प्राकृतिक बाँध नगर- बाढ़ के मलबे से धरातलीय ऊंचाई में वृद्धि होती है तो प्राकृतिक बाँध बन जाता है।

उसी पर नगर बस जाते हैं। जैसे पटना, बुहांग वियना।

(b) झील के किनारे बसे नगर:- प्रायः झील के किनारे भी नगरों का विकास हो जाता है। इसके कई कारण है।

जैसे-

(i) पर्यटन के चलते- पुष्कर झील के किनारे पुष्कर नगर, इसी तरह नैनीताल को भी लिया जा सकता है।

(ii) औद्योगिक गतिविधि के चलते- कर्लोस (झील के किनारे), ग्रेटसाल्ट लेक (USA)।

(iii) नौकागम्य के कारण- महान झील के किनारे- क्लीवलैंड, बफैलो, कम्पाला (युगांडा), डलुथ आदि अस्थावान (कैस्पीयन पर), बोल्गा नदी के मुहाना पर बने झील पर बसे नगर।

(c) समुद्री प्रभाव से भी कई प्रकार के नगर विकसित होते हैं। जैसे-

(i) पुलीन नगर- यहाँ पर पर्यटन का विकास हो जाता है। जैसे मियामी बीच सिटी, कोयलम, दीघा (WB) आदि।

(ii) ज्वारनद-मुख नगर- ज्वारनद्मुख नगर प्राकृतिक बंदरगाह के कारण जैसे सूरत (ताप्ती के किनारे) नावें और स्वीडेन के सभी।

बंदरगाह- जैसे डंवर फिस्ट, गोटेंवर्ग (नार्वे)

(iii) लैगुन के किनारे बसे लैगुन नगर- जैसे आस्ट्रेलिया के टाउंसविले, भारत में कोचीन का विकास।

(iv) द्वीपीय नगर- द्वीपों पर संचार या जहाजरानी के कारण जैसे पोर्टब्लेयर।

(v) बंदरगाह नगर या जलमार्ग नगर- समुद्री जलमार्ग के सुविधाओं के कारण तट के किनारे प्राकृतिक बंदरगाह के अलावे कृत्रिम बंदरगाह भी विकसित किए जाते है। जैसे मद्रास।

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर- इसके भी छः प्रमुख वर्ग आते है। जैसे-

(1) सीमावर्ती नगर- सीमा के किनारे सामरिक महत्त्व के कारण जैसे राजौरी एवं पिथौरागढ़ आदि।

(ii) परिवहन मार्ग पर विकास  नगर- काठगोदाम (नैनीताल) परिवर्तन से बने नगर और योगेन्द्र नगर (HP)। 

(iii) धर्मिक नगर-  धार्मिक कारण से बने नगर  जैसे- अजमेर, वाराणसी। 

(iv) शैक्षणिक नगर- जैसे पिलानी, रुढ़की।

(v) क्रोड नगर- परिवहन मार्गों के संगम स्थल पर बसा नगर है। जैसे लंदन, पेरिस, शिकागो, पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर। 

(vi) सेवा केंद्र नगरीय बस्ती- मूलत: ग्रामीण क्षेत्रों की केन्द्रीय बस्ती होती है और आसपास के लोगों के बाजार सुविधा के लिए ग्रामीण बाजार बस्तियाँ विकसित होती है जैसे प्राय: हर देश के ग्रामीण क्षेत्र में। 

नगरों का कार्यिक वर्गीकरण

          यद्यपि नगरों का कार्य द्वितीयक और तृतीयक प्रकार का होता है लेकिन नगरों में कार्यिक विशेषता की प्रवृत्ति होती है। इसी विशेषता के आधार पर नगरों का कार्यिक वर्गीकरण किया जाता है। यह विशेषता उसकी भौगालिक वातावरण का परिणाम होता है। 

       कई भूगोलवेत्ताओं ने कार्यिक विशेषीकरण के आधार पर नगरों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों का वर्गीकरण इस प्रकार से है-

1. मेकेंजी का वर्गीकरण- मेकेंजी ने कार्यिक विशेषता को आधार मानते हुए नगरों को दो भागों में बाँटा है-

(A) सक्रीय नगर (Active Town or Basic Town)- वैसे नगर जो उत्पादन कार्यों में संलग्न है अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक लाभ दे रहें हो।

(B) अक्रीय नगर (Passive or Non-Basic Town)- वैसे नगर जहाँ उत्पादन कार्य ठप्प पड़ गया हो अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान न के बराबर दे रहें हों इसके तहत अधिवासी नगर, शिक्षा नगर, धार्मिक नगर आदि आते हैं।

2. जेलसन का वर्गीकरण-

(i) औधोगिक नगर-जैसे ऐसेन, बर्मिधम आदि।

(ii) खनन नगर- जैसे जोहान्सबर्ग, चुकियामाता, कालगुर्ली, टैक्सास आदि।

(iii) परिवहन एवं संचार नगर- जैसे शिकागों, कोवे, वेनिस, डुजोन मारसर्ली आदि। 

(iv) प्रशासनिक नगर- जैसे कैनबेरा, इस्लामाबाद, मास्को, पैकिंग, वाशिंगटन, हेग आदि।

(v) व्यवसायिक नगर

(vi) वित्त एवं बीमा नगर

(vii) मुद्रा व्यापार नगर

(vi) थोक व्यापार का केंद्रीय नगर

(ix) सेवा केंद्र वाला नगर

(x) विविध कार्यों का नगर- सैनिक  महत्व, स्वास्थ्य केंद्र, क्रीडा केंद्र, धार्मिक केंद्र आदि।

3. एस्कार्ट एंड मोसर का वर्गीकरण- भूगोलवेत्ता एस्कोट एवं मोसर ने बहुचरक विधि का प्रयोग करते हुए  ब्रिटिश नगरों को चौदह भागों में बाँटा है। इसके लिए उन्होंने 67 चरों का प्रयोग किया। इस आधार पर निम्नलिखित वर्गीकरण है-

(1) समुद्रतटीय स्वास्थ्य

(ii) वाणिज्यिक प्रशासनिक नगर 

(iii) रेलवे जंक्शन वाला नगर

(iv) वृहत बंदरगाह नगर

(v) सूती वस्त्र वाला नगर

(vi) औद्योगिक नगर

(vii) औद्योगिक सह वाणिज्यिक नगर

(viii) उपनगर

(ix) मिश्रित अधिवासी नगर

(x) नवीन मिश्रित अधिवासी नगर

(xi) हल्के उद्योग का नगर

(xii) पुराने औद्योगिक नगर

(xiii) नवीन औद्योगिक नगर

(xiv) नवीन औद्योगिक उपनगरनगरीय वर्गीकरण

          बहुचरक विधि के एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सभी देशों के लिए समान चर और समान वर्गीकरण नहीं हो सकते है। जैसे ब्रिटेन में अनेक नगर सूती वस्त्रों के कारण बसे हैं। इस प्रकार की संभावनाएँ थाइलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों में नहीं हो सकता। अतः एस्कोट एवं मोसर ने यह बताया है कि सभी देशों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपने चरों का निर्धारण करना होगा। इसी आधार पर कार्यिक वर्गीकरण संभव है।

4. अशोक मित्रा का वर्गीकरण- भारतीय नगरों के कार्यिक वर्गीकरण हेतु अशोक मित्रा का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कार्यिक विशेषता के आधार पर भारतीय नगरों को निम्नलिखित सात वर्गों में रखा है-

(i) उत्पादन नगर⇒

औद्योगिक नगर- बोकारो, टाटा, भिलाई, सिंदरी, हावड़ा

खनन केंद्र- धनबाद

तेल निकालने वाला नगर- डिगबोई

(ii) वाणिज्यिक और व्यापारिक नगर⇒ हापुड़, काठगोदाम, रक्सोल आदि।

(iii) प्रशासनिक नगर⇒ गांधी नगर, चण्डीगढ़, ईटानगर, भोपाल, भुवनेश्वर।

(iv) परिवहन नगर⇒ पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर, कालीकट, विशाखापट्नम।

(v) सांस्कृतिक नगर⇒ अजमेर, पुष्कर, काशी, मथुरा, गया, अमृतसर, मदुरई।

(vi) पर्यटन तथा स्वास्थ्यवर्धक नगर⇒ श्रीनगर, नैनीताल, शिमला, मसूरी, ऊँटी आदि।

(vii) विविध कार्यों का नगर⇒ भारत के सभी महानगर इसमें आएँगे जैसे- दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई आदि।

छावनियाँ- अंबाला, मेरठ, लैंसडॉन आदि

शिक्षा का केंद्र- शांति निकेतन, उज्जैन, सागर

विस्थापितों का नगर⇒ द० हस्तिनापुर

            इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नगरीय वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिली है।

जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

          जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिलती है।

 जनसंख्या के आधार पर भी नगरों का वर्गीकरण का प्रयास किया गया है। इसके लिए विभिन्न देशों में अलग-अलग मानदंड अपनाये गये है। भारत, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में नगरीय मान्यता के लिए 5000 जनसंख्या का होना आवश्यक है लेकिन नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देशों में मात्र 200 जनसंख्या उसका आधार है। पुन: नगरीय जनसंख्या को आधार माना जाए तो USA में वह कोई भी नगर महानगर है जिसकी जनसंख्या करीब 54 हजार है और उसके कई सहयोगी नगरीय बस्तियों का विकास हुआ है। भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ पर महानगरीय मान्यता के लिए सहायक नगरीय बस्तियों का होना आवश्यक नहीं लेकिन महानगर की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो सकती है। 

        अगर सभी देशों की सामान्य मान्यता को देखा जाए तो जनसंख्या आकार के आधार पर नगरीय बस्तियाँ निम्न प्रकार की होती है-

1. छोटे आकार के सेवा केंद्र- वह छोटी से-छोटी बस्ती जो गैर प्राथमिक कार्यों से जुड़ा हो। ऐसे केंद्रों के लिए आवश्यक नहीं कि वह मान्यता प्राप्त नगरीय बस्ती हों।

2. शहर- जिसकी जनसंख्या एक लाख से कम हो।

3. नगर- जिसकी जनसंख्या एक लाख एवं उससे अधिक हो।

4. महानगर- भारत में कोई भी नगरीय बस्ती महानगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक हैं लेकिन USA तथा जापान में कोई भी नगरीय बस्ती तब तक महानगर नहीं हो सकता जब तक कि उसका सहयोगी नगर न हो। वहाँ वस्तुतः सबसे बड़ी नगर के लिए 50,000 जनसंख्या जरूरी है।


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