9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण / Functional Classification of Cities

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

(Functional Classification of Cities)


नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

           

       वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है उस स्थान को बस्ती से सम्बोधित करते हैं। अगर किसी भी बस्ती की 2/3 जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में संलग्न हो तो वैसे बस्ती को नगरीय बस्ती से सम्बोधित करते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक कार्य भी कई प्रकार होते हैं। उन कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण करना एक जटिल कार्य है। किस नगर में किस कार्य की महता अधिक है? इसके लिए अनुभावाश्रित विधि या सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाता है।

      अशोक मिश्रा ने कार्यों के आधार पर भारतीय नगरों को सात वर्गों में बाँटा है। जैसे:-

(1) उत्पादन नगर

(2) व्यापारिक नगर

(3) राजनीतिक या प्रशानिक नगर

(4) सांस्कृतिक नगर

(5) मनोरंजनात्मक नगर

(6) परिवहन नगर  

(7) मिश्रित नगर

(1) उत्पादन नगर⇒ वैसे नगर जहाँ पर मुख्य रूप से उत्पादन का कार्य किया जाता है। उत्पादन के ये कार्य भी दो प्रकार के हो सकते हैं:-

(A) प्राथमिक उत्पादन के कार्य

(B) औद्योगिक उत्पादन के कार्य

     (A) प्राथमिक उत्पादन का कार्य करने वाले नगरों को पुनः 6 भागों में बाँटा जा सकता है:-

(a) खनन पर आधारित नगर⇒ जैसे- झरिया (कोयला), खेतरी (ताम्बा), जादूगोडा (यूरेनियम) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

(b) खनिज तेल उत्पादन करने वाले नगर ⇒ जैसे- असम का डिग्बोई, नूनमाटी, नरकटियागंज

(c) लकड़ी का कारोबार करने वाले नगर⇒ जैसे- काठ गोदाम, सहारनपुर (UP)

(d) मत्स्यन कार्य करने वाले नगर⇒ जैसे- तमिलनाडु का धनुषकोटी और रामेश्वरम्

(e) पशुपालन आधारित नगर ⇒ सोनपुर

(f) कृषि आधारित नगर⇒ भारत के अधिकांश कस्बाई नगर।

     (B) औद्योगिक उत्पादन करने वाले नगरों में कच्चे माल लाकर तैयार किया जाता है उसके बाद तैयार माल को बेचने का कार्य किया जाता है। भिलाई, दुर्गापुर, कुल्टी, बर्नपुर, सतना (MP), जमशेदपुर।

        औद्योगिक उत्पादन हेतु विभिन्न प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अतः ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग-2 ऊर्जा स्रोत पर अलग-2 संयंत्रों का विकास किया गया है और संयंत्रों के आस-पास नगरीय विकास को देखा जा सकता है। जैसे:

(a) नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाले नगर⇒ रावतभाटा (राजस्थान), नरौरा, कलपक्कम

(b) तापीय ऊर्जा पर आधारित नगर⇒ तालचर, संथालडीह (W.B), चन्द्रपुरा (बोकारों के पास), रामगढ़

(c) जलविद्युत पर आधारित नगर⇒ तिलैया, कुमारडुब्बी, मैथन, शिवसमुद्रम, इडुक्की

(d) खनिज तेल शोधन शाला पर आधारित नगर⇒ बरौनी, मथुरा, हल्दिया, जामनगर नगर, कोयली

(2) व्यापारिक नगर

                ऐसे नगर जहाँ पर व्यापारिक कार्य प्रमुख रूप से किये जाते हैं। इस तरह के नगरों का विकास दो स्थानों पर हुआ है।

(i) दो विभिन्न प्रकार के भौगोलिक विशेषता रखने वाले मिलन बिन्दु पर। जैसे: पर्वत तथा मैदान के मिलन बिन्दु पर हरिद्वार, कोंटासाहिब (उत्तराखंड)।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

नगरों का कार्यात्मक वर्ग

         भारत में सभी नदियों के संगम स्थल पर धार्मिक नगर बसा हुआ है। जैसे- इलाहाबाद, वाराणसी, राजरप्पा।

मरुस्थल एवं उपजाऊ मैदान की मिलन बिन्दु पर : हनुमानगढ़, गंगानगर, जयपुर।

(ii) दो विभिन्न प्रकार के परिवहन साधनों के मिलन स्थान पर। जैसे:

(a) सड़‌क और रेलवे के मिलन बिंदु पर जैसे- बाजाल्दा (कश्मीर में उधमपुर जिला में)

(b) रेलवे मार्गो के जंक्शन पर जैसे- पंडित दीनदयाल उपाध्याय, कटनी, इटारसी।

(c) सड़‌कों के मिलन बिन्दु पर जैसे- झाँसी।

(3) राजनीतिक या प्रशासनिक नगर 

       वैसे नगर जहाँ पर मुख रूप से राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं। जैसे- भारत के सभी राजधानी नगर। राजनीतिक एवं प्रशासनिक नगर को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) किला नगर- जयपुर, उदयपुर, चितौड़‌गढ़, दरभंगा, जोधपुर।

(b) विशुद्ध रूप ने प्रशासनिक कार्य करने वाले नगर- दिसपुर, गाँधी नगर।

(4) सांस्कृतिक नगर

           प्राचीन काल से ही भारत में मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर इत्यादि के इर्द-गिर्द नगरों का विकास होता रहा है सांस्कृतिक नगर को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) धार्मिक नगर⇒ गया, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, देवघर।

(i) शैक्षणिक नगर⇒ नालंदा, विक्रमशीला, पिलानी, नेतरहाट, पटना, कोटा।

(iii) धार्मिक सह शैक्षणिक नगर⇒ प्रयागराज, वाराणसी, पटना।

(5) मनोरंजनात्मक नगर

      वैसे  नगर जहाँ प्राथमिक रूप से मनोरंजन के कार्य सम्पादित किये जाते हैं जो कई प्रकार के होते हैं। जैसे-

(i) पर्वतीय पर्यटक नगर ⇒ श्रीनगर, शिमला, मासुरी, दार्जलिंग, माऊण्ट आबू।

(ii) लैगून नगर ⇒ कोबलम, कुमारगम (केरल)

(iii) पुलिन नगर⇒ चेन्नई, पुरी, मुम्बई का जुहू बिच इत्यादि।

(6) परिवहन नगर

       ऐसे नगरों में परिवहन का कार्य मुख्य रूप से किया जाता है। जैसे:- डायमण्ड हार्बर, काल्का, पोर्ट द्वार (उतराखण्ड)

(7) मिश्रित नगर

       ऐसे नगरों में कई कार्य संपादित किये जाते हैं। कार्यों के आधार पर उन नगरों का पहचान कठिन हैं। वैसे नगर को मिश्रित नगर कहते है। उदा०- भारत के सभी महानगर इसके सर्वोत्तम उदाहरण है।

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय नगरों को कार्यों के आधार पर कई भागों में बाँटा जाता है लेकिन कोई भी नगर विशुद्ध रूप से एक ही कार्य को संपादित नहीं करते हैं। ऐसे में बहुचर विश्लेषण विधि के आधार पर नगरों का संश्लेषित वर्गीकरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


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11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र / Urban Influence Area

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र


नगरीय प्रभाव क्षेत्र⇒

           नगरीय प्रभाव क्षेत्र का सामान्य तात्पर्य उस भौगोलिक प्रदेश से है जो किसी नगर के सीमा के बाहर अवस्थित है किंतु आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए वह नगर पर निर्भर करता है। नगर भी कई प्रकार के कार्यों के लिए अपने आसपास के क्षेत्रों पर निर्भर करता है। जैफरसन महोदय ने उचित ही लिखा है कि नगर का विकास अपने आप नहीं होता है उनके विकास का आधार आसपास का ग्रामीण क्षेत्र निर्धारित करता है।

      गेडिज तथा स्मैल्स जैसे ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं की अवधारणा है कि नगर के बसाव स्थल (site) का विकास उसकी बसाव स्थिति (situation) पर निर्भर करता है। बसाव स्थिति ही नगर का प्रभाव क्षेत्र है।

नगरीय प्रभाव क्षेत्र

            नगरीय प्रभाव क्षेत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नॉर्दन महोदय ने पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक के मध्य में किया था लेकिन उसके पूर्व भी नगरीय प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन होता रहा था, लेकिन “नगरीय प्रभाव क्षेत्र” के बदले अमलैंड शब्द का अधिक प्रयोग होता था, यह जर्मन शब्द है जहाँ (अम) का अर्थ होता है चारों तरफ और लैंड का अर्थ भूमि अर्थात् नगर के चारों तरफ की भूमि जो नगर का प्रभाव क्षेत्र है। अमलैंड शब्द का विकास सर्वप्रथम एलिक्स महोदय द्वारा 1914 ई० में किया गया। इसके बाद इस शब्द का प्रयोग स्टेनली, डोड्ज, व्हिटेलसी और हैरिस जैसे विद्वानों ने किया।

        ब्रिटिश भूगोलवेत्ता ग्रीन ने नगरीय पृष्ठ (Urban Hinteland) प्रदेश शब्द का प्रारंभ में प्रयोग किया, लेकिन बाद में उन्होंने नगर प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग किया। ब्रिटिश भूगोलवेत्ता स्मैल्स तथा गिल्बर्ट ने नगर क्षेत्र (Urban field) शब्द का प्रयोग किया लेकिन नगरीय भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अमलैंड और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नगर प्रभाव क्षेत्र को सर्वाधिक मान्यता मिली।

       1970 के बाद नगरीय भूगोलवेत्ताओं द्वारा और मुख्यतः विकासशील देश के भूगोलवेत्ताओं द्वारा नगर प्रदेश शब्द का प्रयोग प्रमुखतया से किया जाता है। यद्यपि ये तीनों शब्द अमलैंड, नगर प्रभाव क्षेत्र, नगर प्रदेश एक ही संदर्भ में उपयोग किए जाते है लेकिन कार्यिक दृष्टि से तथा विधितंत्र के दृष्टि से उनमें अंतर है। अमलैंड शब्द का विकास नगर के कार्यों के प्रभाव पर आधारित है।

       नगरीय प्रभाव क्षेत्र का विकास गुरुत्वाकर्षण मॉडल पर आधारित है। जबकि नगर प्रदेश, नियोजन को ध्यान में रखकर प्रभाव क्षेत्र के बदले विकसित किया गया है। नगर प्रदेश के अंतर्गत न सिर्फ प्रभाव क्षेत्र आते है वरन् नगर को भी सम्मिलित किया जाता है।

सीमांकन की विधि:

          नगरीय प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन की तीन प्रमुख विधियाँ है-

1. अनुभवाश्रित विधि

2. सांख्यिकी विधि

3. सांख्यिकी सह अनुभवाश्रित विधि

                द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभवाश्रित विधि की प्रधानता थी। इसके अंतर्गत नगर के कार्यों को आधार मानकर प्रमुख क्षेत्र सीमांकित किया जाता था। इस संदर्भ में अमेरिकी भूगोलवेत्ता हैरिस का कार्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने अमेरिकी नगर (Salt Lake city) के अमलैंड का सीमांकन 12 कार्यिक चरों की मदद से किया था।

ये निम्नलिखित थे-

1. थोक व्यापार

2. खुदरा व्यापार

3. रेडियो प्रसारण (Radio Broad casting

4. बस सेवा (Bus service)

5. मंदिर परिसर (Temple Areas)

6. चिकित्सा सेवा (Medical service)

7. धार्मिक सेवा (Religious service)

8. प्रशासनिक सेवा (Administrative service)

9. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

10. शैक्षणिक सेवा (Educational service)

11. फल एवं सब्जी की उपलब्धता (Fruits and vegitables availability to the market)

12. अन्न (Grains)

            इन चरों को आधार मान कर नगर के प्रभाव क्षेत्र की बाहरी सीमा निर्धारित की गई। कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी अनुभवाश्रित विधि का प्रयोग करते हुए भारतीय नगरों का सीमांकन किया है, लेकिन इनका कार्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही संभव हो सका।

        वस्तुतः भारत में नगरीय भूगोल की पढ़ाई द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रारंभ हुई। भारतीय भूगोलवेत्ताओं में R.L. Singh (B.H.U.) प्रथम थे, जिन्होंने 1955 में बनारस नगर का अमलैंड पाँच चरों की मदद से निर्धारित किया था। ये चर निम्नलिखित थे-

1. सब्जी आपूर्ति (Vegitable supply)

2. दूध आपूर्ति (Milk supply)

3. खाद्यान्न आपूर्ति (Grain supply)

4. बस सेवा (Bus service)

5. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

                 पुनः डॉ० उजागीर सिंह ने 1961 में KAVAL (A-ALLAHABAD, K-KANPUR, V-VARANASI, A-AGRA, L-LUCKNOW) नगरों के अमलैंड का सीमांकन किया। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सात चरों का प्रयोग किया।

1. सब्जी आपूर्ति

2. दूध आपूर्ति

3. कॉलेज / विश्वविद्यालय (College service)

4. खाद्यान्न आपूर्ति

5. खुदरा व्यापार

6. थोक व्यापार

7. प्रशासनिक प्रभाव

        आर. एल. सिंह  की तुलना में यह ज्यादा विश्वसनीय कार्य था। यद्यपि इस विधि को व्यापक मान्यता प्राप्त थी लेकिन इसके साथ दो प्रमुख समस्याएँ थी-

         प्रथमत: एक ही नगर के लिए अलग-अलग भूगोलवेताओं द्वारा अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र निर्धारित किया जा रहा था। इससे इस प्रकार की अध्ययन की विश्वसनीयता में कमी आती थी।

        इसकी दूसरी समस्या यह थी कि कई नगर कुछ कार्यों को व्यापक स्तर पर करते थे जबकि सही अर्थों में इसका प्रभाव क्षेत्र उतना वृहद और व्यापक नहीं होता है। वस्तुतः डॉ० बी० एल० सिंह ने इसी आलोचना को ध्यान में रखकर बनारस के धार्मिक कार्यों को आधार नहीं माना था।

      अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के प्रभाव में नगरीय भूगोलवेताओं ने गुरुत्वाकर्षण मॉडल का प्रयोग करते हुए नगर के प्रभाव क्षेत्र को सीमांकित करने का कार्य प्रारंभ किया।

       इस विधि के अंतर्गत यह माना गया कि नगर की जनसंख्या द्रव्यमान अथवा पिंड के समान है। जो भी पिंड जितना ही बड़ा होगा उसका गुरुत्वाकर्षण उतना ही अधिक होगा। नॉर्दन ने इस अवधारणा को विकसित किया कि नगर की जनसंख्या गुरुत्वाकर्षण का कार्य करती है।

      दूसरे नगरों  के द्रव्यमान के संदर्भ में बड़े नगरीय प्रभाव क्षेत्र सीमांकित किया जा सकता है। रेली महोदय ने संशोधित गुरुत्वाकर्षण सूत्र विकसित किया जिसे भूगोलवेताओं ने व्यापक मान्यता दी। यह मॉडल इस प्रकार है-

P = MA X MB/d2

P = Point of Break सीमा 

MA= द्रव्यमान >MB

MB= द्रव्यमान <MA

d = दो द्रव्यमानों के बीच की दुरी 

           इस विधि को अपनाने से सीमांकित किये गये नगरीय क्षेत्र की उपयोगिता में वृद्धि होती है। नगर और प्रादेशिक नियोजकों द्वारा इसका प्रयोग किया जाने लगा। प्रसिद्ध भूगोलवेता प्रकाश राव का अनुसरण करते हुए एल०एन०सेन ने कर्नाटक के रायचूर जिला के केन्द्रीय बस्तियों का प्रमुख क्षेत्र के सीमांकन हेतु दिए गये सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया था। जिसका सूत्र इस प्रकार है- 

 R = √T x A/U

R = Radius

T = Population of Town 

U = Total population of of the region

A =  Area of the region

            इसी विधि का प्रयोग प्रो० एल० ए० भट्ट ने भी हरियाणा के करनाल जिला के प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन के लिए किया। लेकिन विकासशील देशों में डिकिंसन, हैगिस, और हैगेट द्वारा प्रदेश शब्द को 1970 के बाद अधिक मान्यता मिली है। नगर प्रदेश का सीमांकन मात्रात्मक सह अनुभवाश्रित विधि पर आधारित है।

         दूसरे शब्दों में यह विधि प्रदेश के लोगों के व्यवहार  तथा परिवहन साधनों के विकास को ध्यान में रखते हुए सांख्यिकी विधि द्वारा विकसित सीमाओं में आवश्यक संशोधन करता है। भारत में राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का सीमांकन इसी विधि पर आधारित है।

       प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर सीमा निर्धारण के बाद कई चरों की मदद से उसमें आवश्यक संशोधित किया गया। वस्तुतः इस कार्य के लिए 8 चरों का प्रयोग किया गया। ये निम्नलिखित थे-

1. 1961 की जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 250 व्यक्ति वर्ग किमी०।

2. 1951-61 के दशक के न्यूनतम जनसंख्या वृद्धि दर 20%

3. कम-से-कम 30% कार्यिक जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी हो।

4. वे सभी गाँव जो दिल्ली को प्रतिदिन दूध की आपूर्ति करते हैं।

5. वे सभी गांव जो दिल्ली के लिए प्रतिदिन ताजे सब्जी आपूर्ति करते हैं (1967)।

6. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 1000 व्यक्ति बस द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

7.  वे सभी बस्तियाँ जहाँ से कम-से-कम 250 व्यक्ति रेल द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

8. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 75 कॉल दिल्ली नगर आता है (1966)।

           इन चरों की मदद से गुरूत्वाकर्षण विधि द्वारा अपनाए गए सीमाओं में संशोधन किए गए। सामान्यतः यह पाया गया कि रेलमार्ग और सड़कमार्ग के किनारे प्रभाव क्षेत्र अधिक दूरी तक अवस्थित है। कुल मिलाकर इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 30242 वर्ग किमी० क्षेत्र आए। दिल्ली नगर से औसत दूरी 115 किमी० हुई और इस प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 1981 की जनगणना के अनुसार दिल्ली के अतिरिक्त अन्य नगरीय बस्तियाँ और करीब 2000 ग्रामीण बस्तियाँ आई।

        फरीदाबाद, गुड़गांव, रोहतक, महेन्द्रनगर, सोनीपत और बहादुरगढ़ जैसी हरियाणा की बस्तियाँ इसके प्रभाव क्षेत्र में आई। राजस्थान का अलवर और यू०पी० का गाजियाबाद, बुंदेलखंड, मेरठ, हापुड़, मोदीनगर और दादर जैसी नगरीय बस्तियाँ इसके प्रभाव  में आये।

          दिल्ली नगर प्रदेश के सीमांकन से यह एक नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता पा चुका है। भारत के सभी महानगरों के लिए इस प्रकार का नगर प्रदेश सीमांकन और नियोजन की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों के अधिकतर महानगरों के लिए भी यह प्रक्रिया अपनाई गई है। वस्तुतः वर्तमान समय में विकसित देशों में नगर प्रभाव क्षेत्र और विकासशील देशों में नगर प्रदेश शब्द को अधिक मान्यता प्राप्त है।

विशेषताएँ:

      भौगोलिक विशेषताओं की दृष्टि से नगर प्रभाव क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं-

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र (प्राथमिक अमलैंड)

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र (द्वितीयक अमलैंड)

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र:-

        आंतरिक प्रभाव क्षेत्र को प्राथमिक अमलैंड और बाह्य प्रभाव क्षेत्र को द्वितीयक अमलैंड कहा गया है। आंतरिक प्रभाव क्षेत्र वह है जो मुख्य नगर से सतत् संबंध रखता है। यह नगर के तत्काल बाहर ग्रामीण क्षेत्र में नगरीय, उपनगरीय अथवा लगभग नगरीय भूदृश्य उत्पन्न करता है। अधिकतर भूगोलवेत्ताओं ने इसी प्रदेश को ग्रामीण-नगरीय उपांत कहा है।

      नियमतः यह ग्रामीण क्षेत्र है लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह नगरीय क्षेत्र होता है। सामान्यतः इसके आकार तारे के समान होते हैं। नगर के बाहर निकलती हुई सड़को के दोनों तरफ निर्मित क्षेत्र ही ग्रामीण-नगरीय उपांत का निर्माण करते है।

       ग्रामीण-नगरीय उपांत का विकास मुख्यतः नगर में बढ़ते जनसंख्या दबाव का परिणाम होता है। जब नगरीय पारिस्थैतिकी असंतुलित होने लगती है तो नगर की सीमा के बाहर निर्मित क्षेत्र विकसित होने लगते है। इसमें मुख्यतः दो प्रकार के निर्मित क्षेत्र होते है-

1. उच्च आय वर्ग का क्षेत्र- उच्च आय वर्ग के लोग नगर के बहर आकर बस जाते है।  

2. उन कार्यों का विकास होता है जिसको अधिक भूमि चाहिए नगर में मूल्य अधिक होने के कारण वह कार्य नहीं होता है जैसे विश्वविद्यालय का निर्माण, प्रशानिक कार्य, औधोगिक संकुल का विकास इत्यादि। 

लेकिन विकासशील देशों में और मुख्यतः भारत में ग्रामीण-नगरीय उपांत के अंतर्गत दो अन्य निर्मित क्षेत्र होते है-

(i) उपस्तरीय अधिवासीय मकान- कम आय के वर्ग के लोग भी नगर के बाहरी क्षेत्र में भूमि खरीद कर किसी प्रकार मकान बनाते है।इसमें नगरीय विकास के नियमों के पालन नहीं होता है। अत: यह प्रारम्भ से ही देखने से मलिन बस्ती जैसा लगता है।  

(ii) नवीन निर्मित क्षेत्रों के मध्य पुराने गावों का होना कम आय वर्ग के लोगों का दबाव, नगरीय निर्मित क्षेत्र के अंतर्गत आने पर तेजी से बढ़ने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसके ग्रामीण पारिस्थैतिकी भी समाप्त हो जाते हैं और वे नगर बनने के पूर्व ही मलिन बस्ती बन जाते हैं।

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रूप से किया है और पश्चिमी देशों के संदर्भ में R.F. Pahl का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण-नगरीय उपांत की चार प्रमुख विशेषताएँ बताई है-

1. विलगाव

2. चयनित जनसंख्या का आगमन और

3. अभिगमन लोग प्रतिदिन मुख्य नगर जाते है और शाम को लौट आते है। परिणाम यह होता है कि दिन के समय जनसंख्या घनत्व कम होता है तथा रात्रि में जनसंख्या घनत्व अधिक हो जाता है।

4. भूमि का मिश्रित उपयोग- H.M. Mayor ने अमेरिकी नगरों के संबंध में बताया है कि ग्रामीण नगरीय उपांत एक संक्रमण क्षेत्र होता है जहां नगरीय भू-उपयोग में लगातार वृद्धि होती रहती है और उसी अनुपात में ग्रामीण भू-उपयोग में कमी आती है। उन्होंने यह भी लगा कि यहाँ भूमि के मूल्य में लगातार वृद्धि होती है।

       J.N.U. के प्रो० सुदेश नागिया ने 1976 में दिल्ली महानगर के ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र का अध्ययन करते हुए इनकी निम्नलिखित छ: विशेषताएँ बताई है-

1. मलिन बस्तियाँ (Slums)

2. मिश्रित भू-उपयोग

3. कृषि भूमि में लगातार कमी आती है

4. नगरीय सुविधाओं का अभाव

5. बिखरे हुए निर्मित क्षेत्र

6. सांस्कृतिक मिश्रण का क्षेत्र (ग्रामीण-नगरीय संस्कृति के मिश्रण का क्षेत्र)

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की ये विशेषताएँ विकासशील देशों के प्रायः सभी महानगरों में पाई जाती है।

निर्मित क्षेत्र और कार्यिक दृष्टि से ये नगर के अंग होते है प्रारम्भ में इसे नगर नियोजन के अंतर्गत सम्मिलित नहीं किया गया था लेकिन वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन  के अंतर्गगत इन प्रदेशों के भी नियोजित विकास को प्राथमिकता दी गई है। 

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र-

        बाह्य प्रभाव क्षेत्र मूलत: ग्रामीण क्षेत्र होता है। यह वही क्षेत्र होता है जहाँ रहने वाले लोग कुछ ही कार्यों के लिए केंद्रीय नगर पर निर्भर करता है। ऐसे कार्यों में प्रशासन, उच्च शिक्षा, थोक व्यापार, उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा, समाचार पत्र, इत्यादि प्रमुख है।

          अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों के लोग स्थानीय बाज़ार में जाते है। वहाँ पदानुक्रमिक केन्द्रीय बस्तियों के अपने प्रभाव क्षेत्र होते है। लेकिन वे छोटे नगरीय बस्ती भी मुख्य नगरीय बस्ती पर अपने कार्यों के लिए निर्भर करता है। जैसे गौण नगरीय बस्तियाँ खुदरा व्यापार का कार्य करती है। उनका थोक व्यापार मुख्य केन्द्रीय बस्ती पर निर्भर करता है।

         वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन नीति के अंतर्गत इन प्रदेशों में भी  नगरीय सुविधाओं को विकसित कर ग्रामीण आवास की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों में बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण का कारण होता है।

     दिल्ली नगर पर बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या का सर्वाधिक दबाव था लेकिन वर्तमान समय में राजधानी नियोजन प्रदेश के अंतर्गत बाह्य क्षेत्रों में द्वितीयक और तृतीयक कार्यों का विकास किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण प्रवृत्ति में कमी आई है। वास्तविकता यह है कि पिछले वर्षों के अंतर्गत दिल्ली महानगर में जनसंख्या का स्थानांतरण नगर प्रभाव क्षेत्र से कहीं अधिक अंतर प्रादेशिक प्रक्रियाओं से हुआ है।

निष्कर्ष:-

       ऊपर के तथ्यों और विश्लेषणों से स्पष्ट है कि अगर प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन न सिर्फ भौगोलिक परिपेक्ष्य में आवश्यक है वरन् यह प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में भी आवश्यक है। अधिकतर विकासशील देशों में नगर आधारित प्रादेशिक नियोजन की नीति अपनाई गई है और उस कार्य में नगर प्रभाव क्षेत्र / नगर प्रदेश का सीमांकन अनिवार्य है।


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12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य / Rural-Urban Fringe

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य


ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के अर्थ⇒

            “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

            ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

                  दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्ष

                ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है, जो नगर की प्रशासनिक प्रदेश की सीमा के बाहर है किन्तु नगरीय आकारिकी के विकास की प्रवृति जारी रहती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र एक ऐसा गत्यात्मक क्षेत्र है जहाँ लगातार भू उपयोग में परिवर्तन की प्रवृति होती है अर्थात् कृषि क्षेत्र घटते जाते हैं और निर्मित क्षेत्र बढ़ते जाती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के प्रकार 

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं:-

(ii) प्रमुख उपान्त क्षेत्र

(ii) गौण उपान्त क्षेत्र

                प्रमुख उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर नगरीय विशेषताओं का अनुपात अधिक है। और गौण उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर ग्रामीण विशेषताओं का अनुपात अधिक है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के विकास के कारण

(1) केन्द्रों उन्मुखी शक्तियों का सक्रिय होता⇒ चूँकि नगर के केन्द्र में भूमि का मूल्य और मकान का किराया बहुत अधिक होता है। जबकि उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य और मकान का किराया कम होता है। इसलिए केन्द्रीय बस्ती के लोग बाहरी क्षेत्रों में बसने की प्रवृति रखते है।

               केन्द्रीय बस्ती में अधिवासीय क्षेत्रों की कमी और प्रदूषण ज्यादा होता है। इसलिए भी लोग बाहर की ओर जाकर बसने की प्रकृति रखते हैं। पुनः केन्द्रीय बस्ती में पार्क, खेल का मैदान, हवाई अड्‌डा, फर्म हाउस, शोरूम खोलने के लिए विस्तृत भूमि नहीं मिल पाती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का विकास होता है।

               केन्द्रीय बस्ती में प्रदूषण से संबंधित कड़े नियम लागू होते हैं लेकिन उपान्त क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों के द्वारा प्रदूषणकारी पदार्थों के स्राव पर कोई रोक नहीं होता है इसलिए औद्योगिक इकाइयों प्रान्त क्षेत्रों में विकसित होकर इनके विकास में योगदान देते हैं।

(2) कर से बचने के लिए भी इस प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों के विकसित होने से उपान्त क्षेत्र विकसित होता है।

(3) विकासशील देशों में ग्रामीण-स्थानान्तरित जनसंख्या उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य कम होने के कारण निवास की प्रवृति रखती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता जाता है।

          कुछ कार्य नगरों के आन्तरिक भागों में संभव नहीं है। जैसे- सीवेज प्लांट का निर्माण, कचड़ा संग्रहण केन्द्र, कसाई खाना, श्मशान घाट, विस्फोटक पदार्थों के डिप्पो, माल गोडॉन इत्यादि का निर्माण संभव नहीं है। अत: इनका विकास नगर के बाहरी क्षेत्रों में ही उपयुक्त मानी जाती है। फलतः उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता है।

(4) उपान्त क्षेत्र अभिगमन के क्षेत्र होते हैं जिसके कारण यहाँ पर तीव्र गति से चलने वाले परिवहन साधनों का विकास अधिक होता है। अत: सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती तक कम समय में तीव्र परिवहन साधन कर पहुँच जाते हैं जिसके कारण सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती से दूर उपान्त क्षेत्र में अधिवासित होने की प्रवृति रखते है। इससे उपान्त क्षेत्रों का सतत् विकास होता है।

नगरीय उपान्त


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13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ

13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ


ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता⇒

                  ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेशों की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें आर. ई. पहल, उजागर सिंह, सुदेश नागिया इत्यादि का महत्वपूर्ण कार्य है। आर. ई. पहल के अनुसार विकसित देशों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है-

(i) यहाँ अधिवासीय क्षेत्र विलगाव के नियम पर आधारित होता है।

(ii) यहाँ रखने वाले लोग आर्थिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए नगरों से जुड़े रहते हैं।

(iii) उपान्त प्रदेश में जगह-2 पर औद्योगिक प्रतिष्ठान, प्रशासनिक संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, शोरूम, वर्क शॉप, तथा विभिन्न आय के लोगों का अधिवासीय क्षेत्र दिखाई देता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र चयनित जनसंख्या स्थानान्तरण का लक्ष्य क्षेत्र होता है क्योंकि नगर के केन्द्र में जनसंख्या दबाव अधिक होता है। प्रदूषण की समस्या होती है तथा अधिवासीय मकान और भूमि मँहगे होते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्र जनसंख्या अभिगमन का क्षेत्र होता है। इन क्षेत्रों में दिन में जनसंख्या घनत्त्व घट जाती है और रात में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र मिश्रित भूमि उपयोग के क्षेत्र होते हैं, अर्थात् खाली स्थानों में गहन कृषि का कार्य किया जाता है तो दूसरी ओर अधिवासीय कार्य भी साथ-2 किये जाते है।

(vii) कानून के दृष्टिकोण से उपान्त क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र होते हैं जबकि कार्य एवं जनसंख्या के दृष्टिकोण से नगर समान होते हैं।

(viii) विकसित देशों में उपांत क्षेत्र नियोजित होते हैं अर्थात् नगर नियोजन के साथ-2 उपान्त क्षेत्रों के नियोजन पर भी विशेष जोर दिया जाता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त

         भारतीय नगरों के संदर्भ में 1961 ई० में पाँच नगर कानपुर, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद तथा लखनऊ (KAVAL) का अध्ययन करने के बाद ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों के विशेषताओं का चर्चा किया। जैसे :

(i) भूमि प्रयोग के दृष्टिकोण से यह सतत् परिवर्तन क्षेत्र होता है यानी कृषि भूमि में लगातार कमी आते जाती है और निर्मित क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी होते जाती है। यहाँ कार्यिक संरचना में भी तेजी से परिवर्तन होता है।

(ii) यहाँ लगातार घरों के आकार एवं प्रकार में परिवर्तन देखा जा सकता है।

(iii) यह मिश्रित अर्थव्यवस्था का क्षेत्र होता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र में नगरीय सार्वजनिक सेवाओं का अभाव होता है क्योंकि यह क्षेत्र नगर प्रशासन अन्तर्गत नहीं आते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्रों में नगरीय संस्कृति और नैतिकता का अभाव होता है।

              JNU के प्रो० सुदेश नागिया 1976 ई० में दिल्ली महानगरीय प्रदेश का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया हैं-

(i) उपांत क्षेत्र झुग्गी-झोपड़ी और गन्दी बस्ती के क्षेत्र होते हैं।

(ii) यह मिश्रित कृषि भूमि उपयोग का क्षेत्र होता है।

(iii) कृषि क्षेत्र की भूमि कम होती है लेकिन कृषि कार्यों की सघनता में वृद्धि होती है।

(iv) यहाँ नगरीय सुविधाओं का अभाव होता है।

(v) उपान्त क्षेत्र में सतत निर्माण की प्रक्रिया चलते रहती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र में ग्रामीण एवं नगरीय संस्कृति साथ-2 मिलती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश के तीव्र फैलाव का कारण 

                 उपान्त क्षेत्रों के तीव्र फैलाव का दो प्रमुख कारण होते हैं:-

(i) विकसित देशों में CBD से जनसंख्या का चयनित स्थानान्तरण।

(ii) विकासशील देशों में ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या के स्थानान्तरण का जमघट।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की समस्याएँ

              ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की निम्नलिखित समस्याएँ है:-

 (i) इसके तीव्र फैलाव के कारण यहाँ गंदी बस्तियों का विकास तेजी से होता है। लंदन, न्यूयार्क में एशियाई एवं निग्रो लोगों की गंदी बस्ती को घेटों से संबोधित करते हैं। जबकि दिल्ली के उपान्त क्षेत्रों में विकसित झुग्गी-झोपड़ी जे.जे. कोलनी के रूप में प्रसिद्ध है।

(ii) उपान्त क्षेत्रों में पूर्ण नगरीय विकास के पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन की समस्याएँ पाई जाती है।

(ii) यहाँ अनियोजित विकास की समस्याएँ भी पायी जाती हैं।

(iii) सेवाओं एवं जन सुविधाओं का अभाव होता है। जैसे- पेयजल, सुलभ-शौचालय, मनोरंजन पार्क और स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर मिलते हैं।

(v) उपांत क्षेत्रों में जल निकासी की भी गंभीर समस्या पायी जाती है।

(vi) सड़क एवं गलियों में प्रकाश प्रबंध नहीं होता है।

(vii) उपान्त क्षेत्र से बड़ी-2 एवं चौड़ी से चौड़ी सड़‌के तो अवश्य गुजरती है लेकिन सहायक लड़‌कों की स्थति दयनीय होती है।

(viii) इस प्रदेश में कई सामाजिक समस्याएँ भी होती है। जैसे- अशिक्षा, वेश्यावृति, प्रवजन, जनसंख्या वृद्धि, भूमि बेदखल, कर इत्यादि।

(ix) उपान्त क्षेत्र कई सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं। इस प्रदेश में न तो नगरीय संस्कृति पायी जाती है और न हीं ग्रामीण संस्कृति।

(xi) उपान्त क्षेत्र में भूमि उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं होता है।

निष्कर्ष:- इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना रहीं है। इस प्रदेश के विकास के कारण उनकी समस्याओं का अध्ययन करके ही संतुलित नगर नियोजन की संकल्पना विकसित की जा सकती है।

19. बहुस्तरीय नियोजन

19. बहुस्तरीय नियोजन



बहुस्तरीय नियोजनबहुस्तरीय नियोजन

          भारत भौगोलिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से विविधताओं वाला देश है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए संविधान निर्माताओं ने भारत को एक संघीय राष्ट्र के रूप में स्थापित किये। भारत जैसे विविधता वाले देश में संविधान निर्माताओं ने बहुस्तरीय नियोजन की आवश्यकता महसूस किया। प्रो० R.P. मिश्रा, L.S. भट्ट और L.K. सेन जैसे भूगोलवेताओं ने भी बहुस्तरीय नियोजन को भारत के संदर्भ में उपयुक्त माना है।

     बहुस्तरीय नियोजन का तात्पर्य वैसी व्यवस्था से है जिसके तहत कई स्तर पर योजनाओं एवं विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन किया जाता है। बहुस्तरीय नियोजन कई स्तरीय राजनैतिक एवं प्रशासनिक तंत्र से मिला जुला एक तंत्र होता है जिसके ऊपर विभिन्न प्रकार कार्यक्रमों का निर्माण करने और उसे क्रियान्वयन करने का उत्तरदायित्त्व होता है।

           विश्व के कई बड़े-2 देश बहुस्तरीय नियोजन के माध्यम से ही सामाजिक-आर्थिक एवं प्रादेशिक विषमताओं को दूर करने के लिए विकास कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

       भारत में नियोजन का कार्य छः स्तरीय प्रदानुक्रमिक स्तर के द्वारा संचालित किया जा रहा है। जैसे-

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन

(2) राज्य स्तरीय नियोजन

(3) जिला स्तरीय नियोजन

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन

(5) ग्राम पंचायत स्तरीय नियोजन

(6) ग्राम सभा स्तरीय नियोजन

(1) केन्द्र स्तरीय नियोजन-

       भारत में संघीय प्रशासनिक व्यवस्था होने के कारण भारत में सामाजिक, आर्थिक नियोजन और विकास का दायित्व केन्द्र सरकार पर होता है। केन्द्र में इसका सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति होता है लेकिन वास्तविक कार्यकारिणी प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद होता है।

        केन्द्र स्तर पर योजना आयोग का गठन किया गया है। जो विभिन्न एजेन्सियों की सहायता से देश के विभिन्न संसाधनों का मूल्यांकन कर योजनाओं का निर्माण करता है। योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं। इसलिए इनका निर्णय राष्ट्रीय महत्त्व का होता है हालाँकि इस संस्था का गठन संविधान के तहत नहीं किया गया है।

       योजना आयोग योजनाओं का निर्माण कर राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष रखता है। NDC की इच्छा पर यह निर्भर करता है कि योजना आयोग के द्वारा लाया गया कार्यक्रम को लागू किया जाए या नहीं। जब किसी योजना का NDC स्वीकार्य कर लेता है तो वित आयोग की अनुसंशा के आधार पर केन्द्र एवं राज्यों के बीच आवंटन एवं धन राशि बँटवारा किया जाता है।

     संघ स्तर पर धन-राशि की संग्रह और उसके वितरण संघसूची में उल्लेखित विषय से इकट्टा किये गये धन का होता है। केन्द्र सरकार सुरक्षा ,परिवहन, संचार विकास, वन विकास, बाद एवं सूखा जैसे विषयों पर ध्यान केन्द्रित करती है।

       केन्द्र सरकार अपना धन विभिन्न मंत्रालयों के माध्यम से खर्च करती हैं। मन्त्रिपरिषद संसद के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इन्हें प्रतिवर्ष अपना वित्तीय लेखा-जोखा संसद के समक्ष रखना पड़ता है। संसद कटौती प्रस्ताव एवं टोकेन प्रस्ताव के द्वारा खर्च पर नियंत्रण रखती है।
नोट : अब योजना आयोग का कार्य नीति आयोग द्वारा किया जाने लगा है।

(2) राज्य स्तरीय नियोजन-

        भारत में राज्यों के नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। हालांकि भारत में राज्यों का गठन विशुद्ध रूप में भौगोलिक एवं आर्थिक कारकों के आधार पर नहीं किया गया है। बल्कि राज्यों के गठन में भाषा को अधिक महत्व दिया गया है। राज्य स्तर पर कई ऐसे नियोजन के कार्य किये गए है जो राजनीतिक सीमाओं का उल्लंघन करते हैं। जैसे कृषि-जलवायु प्रदेश का नियोजन।

               राज्य स्तर पर नियोजन का कार्य राज्य नियोजन बोर्ड के द्वारा किया जाता है। यह योजना आयोग के समान सशक्त और सक्षम नहीं है क्योंकि किसी भी योजना या कार्यक्रम को मॉडल का निर्धारण योजना आयोग ही कर देती है। ऐसे में राज्य नियोजन बोर्ड का प्रमुख कार्य विभागीय खर्च का लेखा-जोखा रखने के अलावे कोई कार्य नहीं रह जाता है।

       दूसरा इसके महत्व में कमी आने का कारण यह है कि राज्य मंत्रिमण्डल के सदस्य लघु स्तर पर अपने क्षेत्र के लोगों से सीधे जुड़े होते हैं। ऐसे में मंत्रिमण्डल के सदस्य विकास के लिए अपनी बात राज्य वियोजन बोर्ड में नहीं रखते हैं बल्कि मंत्रिमंडल की बैठक में रखते है।

               राज्य नियोजन बोर्ड और राज्य सरकार राज्य सूची के आधार पर विकास कार्यों को अंजाम देती है। इसके अलावे केन्द्र सरकार के द्वारा जो कार्यक्रम लागू किये जाते हैं। उसे राज्य में क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व होता है।

           राज्य सूची के विषय पर नियोजन का कार्य करने का अधिकार राज्य सरकार को सौपा गया है। केन्द्र सरकार के तर्ज पर ही राज्य व संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होते हैं जो मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। राज्यपाल राज्य एवं केन्द्र के बीच कड़ी का कार्य करते हैं।

       राज्य विधानसभा में भी प्रत्येक वर्ष राज्य सरकार को वित्तीय लेखा-जोखा रखना पड़ता है। विधानसभा यहाँ भी कटौती प्रस्ताव, टोकन प्रस्ताव के माध्यम से खर्च पर नियंत्रण रखती है। राज्य सरकार मूलतः राजमार्गो के निर्माण, सिंचाई, वन और विद्युत से संबंधित नियोजन कार्यों को अंजाम देती है।

(3) जिला स्तरीय नियोजन- बहुस्तरीय नियोजन की सबसे प्रमुख इकाई जिला नियोजन को माना गया है। इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है-

केन्द्र
⇓
राज्य
⇓
जिला
⇓
प्रखण्ड
⇓
पंचायत

           जिला स्तरीय नियोजन ऊपरी स्तरीय केन्द्र एवं राज्य और निचली स्तरीय प्रखण्ड एवं पंचायत के बीच योजक कड़ी का कार्य करता है। पुन: संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्व के साथ-2 यह एक ऐसी लघु स्तरीय इ‌काई हैं जहाँ पर प्रशासक एवं नियोजक आम जनता के संपर्क में रहती है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चौथी पंचवर्षीय योजना में केन्द्र सरकार राज्य सरकारों को यह सलाह दिया था कि आप प्रत्येक जिला में जिला नियोजन बोर्ड का गठन करें।

       पुनः छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को सलाह दिया कि आप जिला नियोजन सृजित करें ताकि जिला अधिकारियों के ऊपर जो कार्य का दबाव बना रहता है उस दबाव को कम किया जा सके।

            नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत लघु स्तरीय विकास के लिये प्रत्येक जिला में जिला परिषद के गठन का प्रावधान किया गया है। इस परिषद में तीन प्रकार के सदस्य शामिल होते हैं।

प्रथम- जिला के निर्वाचित सभा सदस्य जैसे- लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद के सदस्य,

दूसरा- प्रत्येक जिला के प्रखण्ड स्तरीप प्रमुख नगर निगम एवं नगरपालिका के निर्वाचित सदस्य,

तीसरा- प्रत्येक जिला के जिला स्तरीय पदाधिकारी, इंजीनियर तथा कुछ विशेषज्ञ लोग इसमें शामिल होते हैं।      

     जिला परिषद के तीन प्रमुख कार्य होते है-

(i) लघु स्तर पर नियोजन के नीतियों का निर्धारण करना और पंचायत स्तरीय नियोजन के बीच समन्वय स्थापित करना।

(ii) प्राथमिकता के आधार पर धन राशि का आवंटन करना।

(iii) विकास कार्यों का मूल्यांकन खर्च किये धन राशि का Audit तथा केन्द्र एवं राज्य से जरूरत के अनुसार धन राशि की माँग करना तथा पंचायतों को यह सलाह देना, इनका कार्य सांवैधानिक प्रावधानों के अनुसार Tax लगा सकते है।

     जिला परिषद निर्वाचित सदस्यों एवं पदेन पदाधिकारियों का परिषद होता है जिसके कारण राजनीतिक हितों के टकराव की संभावना बनी रहती है। ऐसे में नियोजन कार्य प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है।

(4) प्रखण्ड स्तरीय नियोजन-

          प्रथम पंचवर्षीय योजना के दौरान ही 1952 ई० में सामुदायिक विकास प्रखंडों की स्थापना की गई थी जिसका मुख्य उद्देश्य था- ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक विकास करना।

             भारत एक कृषि प्रधान देश है। इसलिए कृषि आधारित नियोजन पर बल दिया गया। कुछ राज्यों में प्रखण्ड स्तर पर B.A.O. (Block Agriculture Officer) की नियुक्ति की। लेकिन कुछ ऐसा नहीं कर पाये। कुछ राज्य सामुदायिक स्तर पर नियोजन अथवा कृषि पदाधिकारी की नियुक्त न कर B.D.O. की नियुक्ति कर संतुष्ट हो गये। लेकिन BDO के उपर अनेक प्रकार के प्रशासनिक जबावदेही होने के कारण विकास कार्यों को इन लोगों ने गौण कर दिया। पुनः 1976 ई0 के बाद पंचायतों का चुनाव न करवाये जाने के कारण सामुदायिक प्रखण्ड की अवधारणा असफल हो गई।

          समन्वित ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) छठी पंचवर्षीय योजना के दौरान जब IRDP लागू किया जाने लगा तो इसके लिए सामुदायिक विकास प्रखण्ड को ही एक इकाई के रूप में चुना गया। 1977 ई० में गठित दाँतावाला कमिटि ने यह विचार प्रकट किया कि IRDP को न केवल प्रखण्ड स्तर पर लागू किया जाय, बल्कि निम्नलिखित 13 कार्यों को संपादित करने हेतु जबावदेही को भी सुनिश्चित जाय। ये 13 कार्य निम्नलिखित थे-

(1) कृषि और उससे संबंधित विकास कार्य

(2) लघु सिंचाई की व्यवस्था करना।

(3) मृदा संरक्षण की दिशा में कार्य करना

(4) पशुपालन एवं मुर्गीपालन की व्यवस्था करना।

(5) मत्स्य पालन

(6) वानिकी कार्यक्रम

(7) कृषि परिसंस्करण

(8) बाजार का प्रबंधन

(9) कुटीर एवं लघु उद्योग का विकास

(10) प्रशिक्षण कार्यक्रम

(11) कल्याणकारी कार्यक्रम

(12) चिकित्सा, शिक्षा, पेयजल, पोषण, आवास जैसे सामाजिक सेवाओं का विकास।

(13) स्थानीय आधारभूत संरचनाओं का विकास।

         स्पष्ट है कि दातावाला कमिटि की अनुशंसा के आधार पर उपरोक्त कार्यों को संचालित करने हेतु प्रखण्ड स्तरीय नियोजन की नींव रखी गयी। नवीन पंचायती राज व्यवस्था के तहत पंचायत समीति का गठन कर इस संस्था को लोकतांत्रिक बनाने का प्रयास किया है ताकि नियोजन के कार्यों को और त्वरित किया जाय।

ग्राम पंचायत एवं ग्रामसभा        

     73 वें संविधान संशोधन के तहत नियोजन हेतु सबसे निचले स्तर पर पंचायती राज व्यवस्था का गठन किया गया है। भारत में इसका गठन बलवन्त राय मेहता समिति की अनुसंशा पर किया गया था। 73वें संविधान संशोधन के तहत इसे संवैधानिक दर्जा दिया गया तथा 11वीं अनुसूची में पंचायतों को 29 कार्य सौपे गये। इनमें से कुछ प्रमुख कार्य निम्नलिखित है:-
(1) कृषि विकास

(2) भूमि सुधार,

(3) लघु सिंचाई विकास,

(4) पशुपालन, दुग्ध कृषि, कुक्कुट पालन

(5) मत्स्यपालन

(6) सामाजिक वानिकी

(7) लघु एवं कुटीर उद्योग

(8) कृषि प्रसंस्करण उद्योग

(10) आवास, ईंधन, चारा

(11) पेयजल सुविधा का विकास।

(12) सार्वजनिक वितरण प्रणाली

(13) प्राथमिक शिक्षा एवं चिकित्सा

(14) गरीबी निवारक कार्यक्रम

(15) विद्युतीकरण

(16) गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों का विकास

(17) ग्रामीण परिवहन का विकास           

     इत्यादि का उत्तरदायित्व सौंपा गया। यह व्यवस्था किया गया है कि ग्राम पंचायतों के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष में दिये गये उनके कार्यों के प्राथमिकता का निर्धारण करें और ग्रामसभा से अनुमति लेकर पंचायत समीति के पास भेजती है। पंचायत समीति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजती है।

       पंचायत समिति ग्राम पंचायत के द्वारा भेजे गये प्रस्ताव की जाँच करती है और पुनः प्राथमिकता के आधार पर ही लागू करने के लिए जिला परिषद के पास अनुसंशा करती है। जिला परिषद से जब अनुमति मिल जाती है तो ग्राम पंचायत इसे लागू करती है और पंचायत समीति उस‌ पर निगरानी रखती है। स्वर्ण जयन्ती स्वरोजगार योजना, नरेगा जैसे कार्यक्रम पंचायत स्तर पर ही संचालित किये जा रहे हैं।

निष्कर्ष :

       अतः ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में बहुस्तरीय नियोजन की व्यवस्था की गई है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है। लेकिन राज्यों के द्वारा पंचायतों से पूरा अधिकार नहीं दिये जाने के कारण सुचारू रूप से पंचायतें कार्य नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में जल्द-से-जल्द राज्यों को पदानुक्रमिक नियोजन में विश्वास करते हुए नीचले स्तर के संस्थाओं को और मजबूत करना चाहिए। केंद्र को चाहिए कि गाँव के विकास हेतु सीधे पंचायतों को धन उपलब्ध करवाये और बहुस्तरीय नियोजन प्रणाली के तहत उस पर निगरानी रखा जाय।


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