26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)

26. अनुप्रस्थ काट (Cross Section)



अनुप्रस्थ काट

        किसी समोच्च मानचित्र में अंकित किसी रेखा के सहारे त्रिमितीय धरातल का द्विमितीय (लम्बाई एवं ऊंचाई) पार्श्व चित्र ही अनुप्रस्थ काट (Cross Section) कहलाता है।

       अनुप्रस्थ काट सामान्यतः निम्नलिखित विधियों से खींचें जाते हैं।

⇒ सीधी रेखा के सहारे (Along a Straight Line)-

(i) लम्ब डालकर, एवं

(ii) कागज की पट्टी विधि।

(i) लम्ब डालकर (By drawing perpendiculars):-

       मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ इस विधि द्वारा बनायी जाती है। समोच्च मानचित्र में एक AB रेखा को बाह्य सीमा के समानान्तर खीचा। मानचित्र के बाहर नीचे की ओर AB के समानान्तर एवं बराबर लम्बी CD रेखा खींच लें।

        अब जितनी समोच्च रेखाओं को AB रेखा काटती है, उतनी ही लम्बवत् रेखाएँ नीचे की CD रेखा की ओर अनुकूल दूरी पर खींच लें। CD के दोनों ओर लम्ब डालकर उसे पेन्सिल से AB से मिला दें। अब इस लम्बवत् AC रेखा के निचले भाग के बाहर की ओर धरातल की प्रकृति के अनुसार एवं समोच्च रेखाओं के फैलाव या मान के अनुसार ऊँचाइयाँ अंकित कर CD के समानान्तर या आड़ी रेखाएँ खीच लें।

     अतः वह रेखा जिसके सहारे अनुप्रस्थ काट का पार्श्व चित्र (Cross Section) खींचा जाता है, उसे अनुदैर्ध्य रेखा (Line of Profile) कहते हैं। AB रेखा समोच्च रेखाओं को जिन बिन्दुओं पर काटती हुई जाती है, उनसे CD की ओर कटी हुई रेखाओं की तरह लम्ब डालते हुए उन्हें सम्बन्धित ऊँचाई वाली आड़ी रेखा पर मिलाया।

       इस विधि से जो बिन्दु मानचित्र के नीचे के रेखाचित्र पर आये, उन्हें एक गहरी रेखा द्वारा मिला दें। यही आकृति AB रेखा के सहारे आने वाली समोच्च आकृति का अनुप्रस्थ काट है। इसमें मानचित्र एवं अनुप्रस्थ काट दोनों ही की रेखाएँ समानान्तर एवं बराबर लम्बी होने से शुद्ध होगी। इससे आसानी से क्षैतिज और लम्बवत् दोनों ही मापनियों का अनुपात निश्चित किया जा सकता है। प्रायः लम्बवत् मापनी क्षैतिज मापनी से कई गुना अधिक होती है।

(ii) कागज की पट्टी विधि द्वारा (By Strip Mehtod):-

        व्यवहार में समोच्च रेखाओं से बनी आकृतियों का अनुप्रस्थ काट प्रायः तिर्यक् या तिरछी रेखा खींचकर बनाना होता है। ऐसे मानचित्रों का अनुप्रस्थ काट यदि तिरछी रेखा पर ही लम्ब डालकर खींचा जायेगा तो वहाँ दूरी सिकुड़ जाने से पूर्णतः गलत होगा।

        इसमें धरातल की समानुपातिक लम्बाई भी सही-सही नहीं बताई जा सकती। अतः ऐसी तिरछी या तिर्यक रेखा के सहारे आने वाले धरातल का सही अनुप्रस्थ काट खींचने के लिये एक मुड़ी हुई साफ कागज की पट्टी लेकर उसे चित्र (B) की भाँति तिर्यक रेखा के सहारे सटाते हुए इस प्रकार रखेंगे कि यह पट्टी पूरी रेखा पर आ जाय।

        इस पट्टी को जिस ऊँचाई की समोच्च रेखा जहाँ-जहाँ पर छूती है, वहाँ-वहाँ पर छोटे-छोटे चिह्न पट्टी पर अंकित कर उन पर बीच-बीच में ऊँचाई लिख दी जाती है। चोटियों व सबसे निम्न भागों में सुविधा के लिए ढाल के अनुसार तीर खींच दें।

      अब मानचित्र के बाहर सुविधाजनक स्थान पर कागज की पट्टी के दोनों पर्श्वीय बिन्दुओं की लम्बाई के बराबर सीधी रेखा खींचकर उसके दोनों किनारे पर लम्ब डाल दें। इन लम्बों पर 1″ या सुविधाजनक दूरी लेकर ऊँचाइयाँ अंकित करने हेतु तल रेखा के समानान्तर अन्य रेखाएँ खींच लें।

       अब जिस पट्टी पर ऊँचाइयाँ अकित की गई है, उस कागज की पट्टी को पुनः तल रेखा पर रखकर उस पर अंकित चिह्नों की ऊँचाई के अनुसार ऊपर की ओर लम्ब खींचे। इन लम्बों के शीर्ष बिन्दुओं को जोड़ते हुए एक गहरी रेखा खींच लें, इस रेखा को खींचते समय शीर्ष और निम्न स्थल के पास लगे तीरों को ध्यान में रखना चाहिये। अतः यही तिर्यक रेखा के सहारे खींचा गया सही अनुप्रस्थ काट है। यहाँ इस आकृति की आधार रेखा की लम्बाई तिर्यक अनुदैर्ध्य रेखा के बराबर है।

⇒ लम्बवत् मापनी एवं लम्बवत् अभिवृद्धि (Vertical Scale and Vertical Exaggeration):-

      समोच्च मानचित्र में धरातल जटिल बना रहता है, अतः इससे अनुप्रस्थ काट (Cross Section) बनाते समय लम्बवत् मापनी की ओर भी ध्यान रखा जाना चाहिये। क्षैतिज विस्तार एवं लम्बवत् अभिवृद्धि के बीच मापनी के आधार पर अन्तः सम्बन्ध रहता है। इसमें धरातल के स्वरूप- मैदान, पहाड़ी, पठार, पर्वत, आदि के ढाल को ध्यान में रखा जाता है।

अनुप्रस्थ काट

अन्य उदहारण


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25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान (Properties and Identification of Minerals)

25. खनिजों के भौतिक गुण एवं पहचान

(Properties and Identification of Minerals)


      खनिजों की पहचान उनकी भौतिक विशेषताओं या गुणों के आधार पर कर सकते हैं। खनिजों के मुख्य गुण इस प्रकार हैं-

1. रंग (Colour)

2. चमक (Lustre )

3. विशिष्ट गुरुत्व (Specific gravity)

4. कठोरता (Hardness)

5. दरार (Cleavage)

6. धारी (Streak)

7. विशेष गुण (Special characteristics)

1. रंग (Colour):-

    किसी खनिज का सबसे स्पष्ट गुण उसका रंग है। खनिजों के रंग का निर्धारण उनकी परमाणविक संरचना से तथा कुछ में अशुद्धियों के कारण होता है। वैसे तो कई खनिजों का रंग एक जैसा होता है। उदाहरण के लिए, कई खनिज हरे रंग के होते हैं। जैसे- ओलिवाइन, एपिडोट और एक्टिनोलाइट आदि। लेकिन यदि रासायनिक संरचना में अशुद्धियाँ हैं, जैसे कि क्वार्ट्ज तो एक खनिज कई अलग-अलग रंग ले सकता है, जो स्पष्ट, धुएँ के रंग का गुलाबी, बैंगनी या पीला हो सकता है।

       खनिजों के रंग का विशिष्ट निदान नहीं होने का एक कारण यह है कि क्रिस्टल संरचना और संरचना के कई घटक हैं जो रंग उत्पन्न कर सकते हैं। लौह जैसे कुछ तत्वों की उपस्थिति से सदैव एक रंगीन खनिज बनता है, लेकिन लौह अपने ऑक्सीकरण की स्थिति के आधार पर विभिन्न प्रकार के रंग उत्पन्न कर सकता है। ये रंग आमतौर पर काला, लाल या हरा होता है।

       कुछ खनिजों की क्रिस्टल संरचना में रंग-उत्पादक तत्व होते हैं। जैसे ओलिवाइन (Fe2SiO4), जबकि अन्य उन्हें क्वार्ट्स (SiO2) जैसी अशुद्धियों के रूप में शामिल करते हैं। यह सारी परिवर्तनशीलता किसी खनिज की पहचान के लिए केवल रंग का उपयोग करना कठिन बना देती है। हालाँकि, क्रिस्टल रूप जैसे अन्य गुणों के संयोजन में, रंग संभावनाओं को कम करने में सहायता कर सकता है। उदाहरण के लिए, हॉर्नब्लेंड, बायोटाइट एवं मस्कोवाइट सभी आमतौर पर ग्रेनाइट जैसी चट्टानों में पाए जाते हैं।

       हॉर्नब्लेंड और बायोटाइट दोनों काले हैं, लेकिन उन्हें उनके क्रिस्टल रूप से उनकी पहचान आसानी से की जा सकती है क्योंकि बायोटाइट शीट में होता है, जबकि हॉर्नब्लेंड मजबूत प्रिज्म बनाता है। मास्कोवाइट और बायोटाइट दोनों शीट में बनते हैं, लेकिन वे अलग-अलग रंग के होते हैं। वास्तव में मस्कोवाइट रंगहीन होता है।

2. चमक या आभा (Lustre):-

    प्रत्येक खनिज की अपनी चमक होती है, जैसे- मेटैलिक, रेशमी, ग्लॉसी आदि। चमक या आभा शब्द से तात्पर्य प्रकाश की मात्रा एवं गुणवत्ता से है जो किसी खनिज की बाहरी सतहों से परावर्तित होती है। चमक इस बात का आंकलन प्रदान करती है कि खनिज सतह कितनी ‘चमकती’ है।

       किसी खनिज की चमक वह तरीका है जिससे वह प्रकाश को प्रतिबिंबित करता है। एक खनिज जो कांच की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है, उसमें काँच (Vitreous) जैसी या ग्लासी चमक होती है।

      एक खनिज जो क्रोम की तरह प्रकाश को परावर्तित करता है उसमें धात्विक (Metallic) चमक होती है। चमक के लिए विभिन्न प्रकार की अन्य संभावनाएँ भी हैं, जिनमें मोती (pearly), मोमी (waxy) एवं राल (resinous) शामिल है। जो खनिज हीरे की तरह अदम्य या शानदार परावर्तक होते हैं उनमें अदम्य चमक होती है। थोड़े से प्रयास से, चमक को आसानी से पहचाना जा सकता है साथ ही यह अत्यन्त विशिष्ट होते हैं। विशेषकर उन खनिजों के लिए जो जैसे कई रंगों में होते हैं।

(i) धात्विक या चमकदार (Metallic or splendent):-

        खनिजों में पॉलिश धातु की चमक होती है और आदर्श सतहें परावर्तक सतहों के रूप में काम करती है, जैसे गैलेना, पाइराइट एवं मैग्नेटाइट।

(ii) विट्रियस (Vitreous):-

     यह शब्द लैटिन भाषा के ग्लास, विट्रियम से लिया गया है। यह चमक का एक ऐसा प्रकार है जो खनिजों में सबसे अधिक देखा जाता है और अपेक्षाकृत कम अपवर्तक सूचकांक वाले पारदर्शी या पारभासी खनिजों में होती है। जैसे- कैल्साइट, क्वार्ट पुखराज, बेरिल, टूमलाइन और फ्लोराइट आदि।

(iii) रालयुक्त (Resinous):-

      रालयुक्त चमक की सतह पर राल जैसी चमक होती है। ऐसी सामग्रियों का अपवर्तनांक 2.0 से अधिक होता है। स्पैलेराइट (ZnS) एक रालयुक्त चमक प्रदर्शित करता है।

(iv) फीके या मटमैले (Dull or Earthy):-

   फीके या मटमैले चमक वाले खनिज, प्रकाश को बहुत खराब तरीके से परावर्तित करते हैं एवं चमकते नहीं हैं। ऐसी चमक अक्सर उन खनिजों में देखी जाती है जो छोटे-छोटे दानों के समूह से बने होते हैं।

(v) मोती (Pearly):-

   मोती की चमक इंद्रधनुषी, ओपेलेसेंट या मोती जैसी दिखाई देती है। यह सामान्यतः खनिज सतहों द्वारा प्रदर्शित होता है जो पूर्ण दरार के विमानों के समानांतर होते हैं। टैल्क जैसे परत सिलिकेट अक्सर दरार वाली सतहों पर मोती जैसी चमक प्रदर्शित करते हैं।

(vi) चिकनाई (Greasy):-

     एक सतह जिसमें चिपचिपी चमक होती है वह तेल की एक पतली परत से ढकी हुई प्रतीत होती है। एक प्रकाश प्रकीर्णन सतह जो थोड़ी खुरदरी होती है, चिकनाई वाली चमक प्रदर्शित कर सकती है, जैसे- नफाइना।

(vii) रेशमी (Silky):-

     जब प्रकाश बारीक समानांतर रेशों के समुच्चय से परावर्तित होता है तो उत्पन्न चमक रेशमी चमक होती है। मैलाकाइट और सर्पेन्टाइन दोनों रेशमी चमक प्रदर्शित कर सकते हैं।

(viii) एडमैंटाइन या ब्रिलियंट (Adamantine or brilliant):-

      हीरे का चमकदार प्रतिबिंब एडमेंटाइन के रूप में जाना जाता है। एडामेंटाइन चमक वाले खनिजों में उच्च अपवर्तक सूचकांक (1.9-2.6) होते हैं और ये अत्यधिक फैलाव वाले और पारभासी होते हैं।

3. कठोरता (Hardness):-

      खनिज कठोर एवं कोमल दोनों प्रकार के होते हैं, लेकिन अधिकांश खनिज कठोर ही होते हैं। कठोरता की डिग्री तुलानात्मक रूप से आसानी या कठिनाई को देखकर निर्धारित की जाती है किसी खनिज की कठोरता का परीक्षण कई तरीकों से किया जा सकता है। आमतौर पर खरोंच परीक्षण का उपयोग करके खनिजों की तुलना ज्ञात कठोरता की वस्तु से की जाती है।

       उदाहरण के लिए यदि कोई कील क्रिस्टल को खरोंच सकती है, तो कील उस खनिज की तुलना में कठोर है। 1800 के दशक की शुरुआत में लगभग 1812 में प्रसिद्ध भूविज्ञानी और खनिजविज्ञानी फ्रेंडरिक मोहस ने स्क्रैच परीक्षण के आधार पर एक सापेक्ष कठोरता पैमाना विकसित किया। उन्होंने प्रत्येक खनिज को पूर्णांक संख्याएँ दी, जहाँ 1 सबसे नरम और 10 सबसे कठोर है।

     यद्यपि इनका यह पैमाना रैखिक नहीं है (कोरंडम वास्तव में क्वार्ट्ज की तुलना में 4 गुना अधिक कठोर है), और अन्य तरीकों ने अब कठोरता के अधिक कठोर माप प्रदान किए हैं। मोहस पैमाने में सटीकता की कमी के बावजूद, यह आज भी उपयोगी बना हुआ है क्योंकि यह सरल याद रखने में आसान एवं परीक्षण करने में आसान है।

     पॉकेटनाइफ का स्टील (भूवैज्ञानिकों के लिए क्षेत्र में ले जाने के लिए एक सामान्य उपकरण) लगभग ठीक मध्य में पड़ता है, इसलिए ऊपरी आधे हिस्से को निचले आधे से अलग करना आसान होता है। उदाहरण के लिए, क्वार्ट्ज और कैल्साइट बिल्कुल एक समान दिखते हैं। दोनों रंगहीन एवं पारभासी हैं, और विभिन्न प्रकार की चट्टानों में पाए जाते हैं। लेकिन एक साधारण स्क्रैच परीक्षण उन्हें अलग बता सकता है।

      कैल्साइट को पॉकेटनाइफ या पत्थर के हथौड़े से खरोंचा जाएगा और क्वार्ट्ज को नहीं। जिप्सम भी काफी हद तक कैल्साइट जैसा दिख सकता है, लेकिन यह इतना नरम होता है कि इसे नाखून से खरोंचा जा सकता है। कठोरता में भिन्नता खनिजों को विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोगी बनाती है।

       कैल्साइट की कोमलता इसे मूर्तिकला के लिए, एक लोकप्रिय सामग्री बनाती है (संगमरमर पूरी तरह से कैल्साइट से बना होता है) जबकि हीरे की कठोरता का मतलब है कि इसका उपयोग चट्टान को चमकाने के लिए अपघर्षक के रूप में किया जाता है।

खनिज कठोरता
Tak 1
Gypsum 2
Calcite 3
Fluorite 4
Apatite 5
Feldspar 6
Quartz 7
Topaz 8
Corundum 9
Diamond 10

4. क्रिस्टल रूप (Crystal form):-

    किसी खनिज क्रिस्टल अर्थात् कणों का ब्राह्मरूप (बाहरी आकार या उसका क्रिस्टल रूप) बहुत सीमा तक उसकी आंतरिक परमाणु संरचना द्वारा निर्धारित होता है, जिसका अर्थ है कि यह गुण अत्यधिक नैदानिक हो सकता है। खनिजों के कण घनाकार, अष्टभुजाकार या षट्भुजाकार भी हो सकते हैं। विशेष रूप से, क्रिस्टल के रूप को क्रिस्टल चेहरों के बीच कोणीय सम्बन्धों द्वारा परिभाषित किया जाता है। कुछ खनिज, जैसे हेलाइट (NaCl या नमक) और पाइराइट (FeS) का घन रूप (cubic form) होता है।

     अन्य जैसे टूमलाइन प्रिज्मीय (prismatic) है। कुछ खनिज जैसे अजुराइट और मैलाइट, जो दोनों ताँबे के अयस्क हैं, नियमित क्रिस्टल नहीं बनाते हैं, और अनाकार (amorphous) होते हैं।

   दुर्भाग्य से, हमें सदैव क्रिस्टल का रूप देखने को नहीं मिलता। हम पूर्ण क्रिस्टल तभी देख पाते हैं जब उन्हें किसी गुहा में विकसित होने का अवसर मिलता है, जैसे कि जियोड में। हालांकि, जब ठंडा मैग्मा के संदर्भ में क्रिस्टल बढ़ते हैं, तो वे अन्य सभी क्रिस्टल के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं जो बढ़ने का प्रयास कर रहे होते हैं और वे जितनी भी जगह भर सकते हैं, भर लेते हैं। क्रिस्टल का आकार उपलब्ध स्थान की मात्रा के आधार पर काफी भिन्न हो सकता है, लेकिन क्रिस्टल फेस के मध्य का कोण सदैव समान रहता है।

5. घनत्व (Density):-     

       खनिजों का घनत्व व्यापक रूप से लगभग 1.01 ग्राम / सेमी से लेकर लगभग 17.5 ग्राम/सेमी तक भिन्न होता है। पानी का घनत्व 1 ग्राम / सेमी है, शुद्ध लोहे का घनत्व 7.6 ग्राम/सेमी है, शुद्ध सोने का घनत्व 17.65 ग्राम सेमी है। इसलिए, खनिज पानी एवं शुद्ध सोने के मध्य घनत्व की सीमा पर होते हैं।

       किसी विशिष्ट खनिज के घनत्व को मापने के लिए समय लेने वाली तकनीकों की आवश्यकता होती है, और अधिकांश भूवैज्ञानिकों ने “सामान्य” घनत्व क्या है, इसके आकार के लिए असामान्य रूप से भारी क्या है, और असामान्य रूप से हल्का क्या है। इसके लिए अधिक सहज ज्ञान विकसित किया है। किसी चट्टान को “तौल” करके अनुभवी भूविज्ञानी आमतौर पर अनुमान लगा सकते हैं कि चट्टान किन खनिजों से बनी है।

6. दरार (विदलन) और फ्रैक्चर (Cleavage and Fracture):-

        खनिज विज्ञान में क्रिस्टलीय सामग्रियों की निश्चित क्रिस्टलोग्राफिक संरचनात्मक विमानों के साथ विभाजित होने की प्रवृत्ति है। सापेक्ष कमजोरी के ये स्तर क्रिस्टल में परमाणुओं और आयनों के नियमित स्थान का परिणाम हैं, जो चिकनी दोहराव वाली सतह बनाते हैं जो माइक्रोस्कोप और नग्न आँखों दोनों में दिखाई देते हैं। दरार क्रिस्टलोग्राफिक विमानों के समानांतर बनती है।

        इसे ऐसे भी समझा जा सकता है, कि अधिकांश खनिजों में उनकी परमाणु संरचनाओं के भीतर अंतर्निहित कमजोरियाँ होती हैं एक ऐसा तल जिसके साथ बंधन की ताकत आसपास के बंधनों से कम होती है। जब हथौड़े से मारा जाता है या अन्यथा तोड़ दिया जाता है, तो खनिज पहले से मौजूद कमजोरी के उस स्तर पर टूट जाएगा। इस प्रकार के टूटने को दरार कहा जाता है, और दरार की गुणवत्ता बंधन की ताकत के साथ बदलती रहती है।

         खनिजों में विदलन प्रकृति दिशा द्वारा निश्चित होती है। खनिज एक या अनेक दिशाओं में एक-दूसरे से कोई भी कोण बनाकर टूट सकते हैं। 

(i) बेसल या पिनाकोइडल दरार तब होती है जब केवल एक दरार तल होता है, जैसे-ग्रेफाइट, अभ्रक (Mica) (मास्कोवाइट या बायोटाइट)। यही कारण है कि अभ्रक को छीलकर पतली शीट में बदला जा सकता है।

(ii) क्यूबिक दरार तब होता है जब तीन दरार तल 90 डिग्री पर एक-दूसरे को काटते हैं। जैसे- हेलाइट, गैलेना।

(iii) अष्टफलकीय बिदलन तब होता है जब एक क्रिस्टल में चार विदलन तल होते हैं। अर्धचालकों के लिए अष्टफल्कीय विदलन सामान्य है। जैसे-हीरा, फ्लोराइट।

(iv) रौम्बोहेड्रल दरार तब होती है जब तीन दरार तल ऐसे कोणों पर एक-दूसरे को काटते हैं जो 90 डिग्री नहीं होते हैं जैसे-कैल्साइट।

(v) प्रिज्मीय दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में दो दरार तल होते हैं, जैसे- स्पोडुमिन।

(vi) डोडेकाहेड्रल दरार तब होती है जब एक क्रिस्टल में छह दरार तल होते हैं, जैसे स्पेलराइट।

7. खनिज वर्गीकरण प्रणाली (Mineral Classification Systems):-

       मध्य युग से 1800 के दशक के मध्य तक खनिजों के वर्गीकरण के लिए भौतिक गुण मुख्य आधार थे। खनिजों को कठोरता के अनुसार समूहीकृत किया गया था, जिसमें हीरा एवं कोरन्डम खनिज एक ही वर्ग में थे। जैसे-जैसे खनिजों की रासायनिक संरचना निर्धारित करने की क्षमता विकसित हुई, वैसे-वैसे एक नई वर्गीकरण प्रणाली भी विकसित हुई हैं।

      कई वैज्ञनिकों ने खनिज रासायनिक सूत्रों की खोज में योगदान दिया, लेकिन 1850 से 1892 तक येल विश्वविद्यालय के खनिज विज्ञानी जेम्स ड्वाइट डाना ने रासायनिक संरचना के आधार पर खनिजों के लिए वर्गीकरण प्रणाली विकसित को जो आज तक चल रही है। उन्होंने खनिजों को उनके आयनों के अनुसार समूहीकृत किया। एक रासायनिक वर्गीकरण प्रणाली का मतलब था कि जिन खनिजों को सैद्धांतिक रूप से एक साथ समूहीकृत किया गया था, वे भी चट्टानों में एक-दूसरे के साथ दिखाई देते थे क्योंकि वे समान भू-रासायनिक परिस्थितियों में विकसित होते थे।

        अभी भी भौतिक गुण खनिजों की पहचान के लिए मुख्य साधन हैं, हालांकि, अब उनका उपयोग खनिजों को समूहित करने के लिए नहीं किया जाता है। एक संरचना आधारित समूहन कुछ सामान्य खनिज संघों पर प्रकाश डालता है जो भूवैज्ञानिकों को एक त्वरित नजर से भी इस बारे में शिक्षित अनुमान लगाने की अनुमति देता है कि चट्टान में कौन से खनिज मौजूद हैं।

     अब तक सबसे आम खनिज सिलिकेट हैं, जो पृथ्वी की परत का 90% भाग बनाते हैं। सैकड़ों नामित सिलिकेट खनिजों में से केवल आठ ही सामान्य हैं, जिनमें से एक क्वार्ट्ज है। हालांकि, असामान्य खनिज महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उनमें आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण जैसे गैलेना, जो सीसा के लिए प्राथमिक अयस्क हैं, और ऐपेटाइट, फॉस्फोरिक एसिड के लिए खनन किया जाने वाला फॉस्फेट शामिल हैं, जिसे उर्वरकों में जोड़ा जाता है।

8. धारियाँ ( Streak):-

      खनिजों में विभिन्न रंगों के मिश्रण के कारण धारियाँ होती हैं। किसी खनिज की धारियाँ उस पाउडर के रंग की होती है जो तब उत्पन्न होता है जब इसे किसी अपक्षयित सतह पर खींचा जाता है। किसी खनिज के स्पष्ट रंग के विपरीत, जो अधिकांश खनिजों के लिए काफी भिन्न हो सकता है, बारीक पिसे हुए पाउडर के निशान में आमतौर पर अधिक सुसंगत विशेषता वाला रंग होता है और इस प्रकार यह खनिज पहचान में एक महत्वपूर्ण नैदानिक उपकरण है। यदि कोई लकीर बनी नहीं दिखती है, तो खनिज की लकीर सफेद या रंगहीन मानी जाती है। अपारदर्शी और रंगीन सामग्रियों के निदान के रूप में स्ट्रीक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

(i) कुछ खनिज अपने प्राकृतिक रंगों के समान एक धारियाँ छोड़ते हैं, जैसे सिनेबार और लाजुराइट।

(ii) अन्य खनिज आश्चर्यजनक रंग छोड़ते हैं, जैसे फ्लोराइट, जिसमें हमेशा एक सफेद लकीर होती है। हालांकि यह बैंगनी, नीले, पीले या हरे क्रिस्टल में दिखाई दे सकता है।

(iii) हेमेटाइट, जो दिखने में काला होता है, एक लाल लकीर या चेरी लाल छोड़ता है जो इसके नाम का कारण बनता है, जो ग्रीक शब्द “हैमा” से आया है जिसका अर्थ है “रक्त”।

(iv) गैलेना, जो दिखने में हेमेटाइट के समान हो सकता है, अपनी भूरे रंग की लकीर से आसानी से पहचाना जा सकता है।

खनिज संसाधनों को उपयोग (Uses of Mineral Sources)-

      खनिज संसाधनों के उपयोग में से कुछ हैं-

1. भवनों, पुलों एवं आवास निर्माण के उपयोग किया जाता है।

2. उद्योगों एवं मशीनरी के विकास में इसका उपयोग किया जाता है।

3. मुख्य रूप से कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस का उपयोग ऊर्जा उत्पादन के लिए किया जाता है।

4. रक्षा उपकरणों के विकास के लिए उपयोग किया जाता है।

5. टेलीफोन, तार, केबल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण आदि जैसे संचार के क्षेत्र में उपयोग किया जाता है।

6. विभिन्न प्रयोजनों के लिए मिश्र धातुओं का निर्माण।

7. आभूषणों के निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है जैसे सोना, हीरा, चाँदी आदि के आभूषण।

8. उर्वरकों, कवकनाशी आदि के संश्लेषण के लिए उपयोग किया जाता है।


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29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

23. रूढ़ चिन्ह और संकेत / Conventional Signs and Symbols

रूढ़ चिन्ह और संकेत

(Conventional Signs and Symbols)

रूढ़ चिन्ह और संकेत

         स्थलाकृतिक मानचित्र पर विभिन्न भौगोलिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को प्रदर्शित करने के लिए निश्चित एवं मानकीकृत चिन्हों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे निश्चित चिन्हों को रूढ़ चिन्ह कहा जाता है। भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा इन चिन्हों का मानकीकरण किया गया है, जिससे स्थलाकृतिक मानचित्रों में विभिन्न विशेषताओं को एक समान तरीके से प्रदर्शित किया जा सके। भारतीय स्थलाकृतिक मानचित्रों में प्रयुक्त अनेक रूढ़ चिन्हों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता प्राप्त है।

    सामान्यतः 1:50,000 तथा 1:25,000 मापनी वाले स्थलाकृतिक पत्रकों में रूढ़ चिन्हों का प्रयोग समरूप रूप से किया जाता है। इन चिन्हों की सहायता से मानचित्र पर सड़क, नदी, रेलमार्ग, बस्ती, पुल, वन, विद्यालय आदि लक्षणों को आसानी से पहचाना जा सकता है। मुख्यतः रूढ़ चिन्हों को निम्नलिखित दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है-

     यह मुख्यत: दो प्रकार के होते है-

1. मौसम विज्ञान के लिए

2. स्थलाकृतिक पत्रक के लिए

CONVENTIONAL SIGNS

AND

SYMBOLS

रूढ़ चिन्ह और संकेत

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20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ

20. हीदरग्राफ, क्लाइमोग्राफ, मनारेख और अरगोग्रफ


हीदरग्राफ

       हीदरग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम टेलर महोदय ने किया था।

⇒ हीदरग्राफ में जलवायु के आँकड़े को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ में X-अक्ष पर वर्षा और Y-अक्ष पर तापमान को दिखाया जाता है।

⇒ हीदरग्राफ का प्रयोग औपनिवेशिक काल में अँग्रेज लोग बड़े पैमाने पर किया करते थे।

⇒ हीदरग्राफ पर बहुत अधिक गर्म, बहुत अधिक ठण्डा, बहुत अधिक सूखा और बहुत अधिक आर्द्रता के साथ-2 अधिवासित होने के लिए उपयुक्त क्षेत्र को प्रदर्शित किया जाता था।

हीदरग्राफ

 

 

क्लाइमोग्राफ

       Climograph का आविष्कार सर्वप्रथम ग्रिफिथ टेलर महोदय ने किया था।

⇒ Climograph X-अक्ष पर Relative Humidity (सापेक्षिक आर्द्रता) को और Y-अक्ष पर Wet Bulb Temperature (आर्द्र बल्ब तापमान) को ध्यान में रखकर मानचित्र या ग्राफ बनाया जाता है।

⇒ इंग्लैण्ड के निवासी औपनिवेशिक काल में Climograph का उपयोग वैश्विक स्तर पर निवास करने योग्य स्थान के निर्धारण में किया कर‌ते थे।

⇒ जबकि हीदरग्राफ का प्रयोग स्थानीय स्तर पर निवास करने योग्य स्थान का निर्धारण किया करते थे।

⇒ टेलर ने कुछ विशेष प्रकार की जलवायु को भी दर्शाया है जो क्लाइमोग्राफ के चारों कोनों पर होता है। इसके चार प्रकार हैं:

1. झुलसता हुआ (SCORCHING):-

        NW कोने पर, आर्द्र बल्ब तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् उष्ण-शुष्क जलवायु।

2. उमसदार (MUGGY):-

       NE कोने पर तापमान 60° F से अधिक तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् उष्णार्द्र जलवायु।

3. शीतार्द्र (RAW):-

      SE कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 70% से अधिक अर्थात् ठंडी आर्द्र जलवायु।

4. शीत-शुष्क (KEEN):-

       SW कोने पर, तापमान 40° F से कम तथा सापेक्षिक आर्द्रता 40% से कम अर्थात् शीत व शुष्क जलवायु।

 

Cartogram (मानारेख)

        मानारेख में किसी क्षेत्र की मूल आकृति को किसी विशेष उद्देश्य से विकृत कर सांख्यिकीय आंकड़ों का आरेखी विधि से मानचित्र पर प्रदर्शन किया जाता है। यह एक अति सारगर्भित एवं सरल मानचित्र होता है तथा आधुनिक भूगोल में काफी लोकप्रिय है।

⇒ इरविन रेख ने मानारेख को परिभाषित करते हुए कहा कि-“किसी एकल विचार को आरेखी ढंग से दिखाने के लिए बनाया गया अमूर्त और सरलीकृत मानचित्र को मानारेख कहते हैं।”

       मानारेख चार प्रकार का होता है:-

(1) क्षेत्र मूल मानारेख

        क्षेत्र मूल मानारेख में संसार अथवा किसी महाद्वीप, देश अथवा राज्य के क्षेत्रफल को आयत चित्र के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

क्षेत्र मूल मानारेख

(2) यातायात परिवहन मानारेख (Traffic flow Cartogram)

        वैसा मानारेख जिस पर सड़‌क पर चलने वाली गाड़ियों के भार को प्रदर्शित किया जाता है। इसे Star Diagram भी कहते हैं।

⇒ Star Diagram पर नियत समय में दिशा के अनुरूप चलने वाली वायु को प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ इस आरेख में  शांत दिनों की संख्या को केन्द्र में लिख दिया जाता है या नहीं तो Calm Days लिख दिया जाता है। ऐसे Diagram को Wind Diagram कहते है।

यातायात परिवहन मानारेख

(3) Isochronic Diagram (समकालीन मानारेख)

         किसी निश्चित बिन्दु से समान समय में पहुँच वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समकालीन रेखा कहते हैं।

⇒ जब परिवहन मार्ग पर समकालीन रेखा को प्रदर्शित किया जाता है तो Isochronic Diagram का निर्माण होता है।

Isochronic Diagram

(4) समान मूल्य दूरी मानारेख

         किसी भी क्षेत्र के संदर्भ में सड़क अथवा रेलमार्ग पर तय की जाने वाली समान दूरी अन्तराल पर खींचे जाने वाली क्रमिक ट्रैफिक को प्रदर्शित करने वाले मानचित्र को समान मूल्य दूरी मानारेख कहते है।

⇒ समान मूल्य दूरी मानारेख पर दूरी एवं परिवहन के भार को साथ-2 प्रदर्शित किया जाता है।

समान मूल्य दूरी मानारेख

अरगोग्राफ

       अरगोग्राफ का निर्माण सर्वप्रथम गेडिज महोदय ने किया था।

⇒ अरगोग्राफ कृषकों के लिए काफी उपयोगी है।

⇒ अरगोग्राफ पर तापमान, वर्षा, फसलों की संख्या और उत्पादन को एक साथ प्रदर्शित किया जाता है।


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