(घ) खनिज संसाधन/ बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions इकाई-1. खण्ड (क)

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solutions

खण्ड (क) इकाई-1. (घ) खनिज संसाधन



(घ) खनिज संसाधन खनिज संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर

1. भारत में लगभग कितने खनिज पाए जाते है?

(a) 50

(b) 100

(c) 150

(d) 200

उत्तर- (b) 100

2. इन में से कौन लौह युक्त खनिज का उदाहरण है?

(a) मैंगनीज़

(b) अभ्रक़

(c) बॉक्साइट

(d) चुना-पत्थर

उत्तर- (a) मैंगनीज

3. निम्नलिखित में कौन अधात्विक खनिज का उदाहरण है?

(a) सोना

(b) टिन

(c) अभ्रक

(d) ग्रेफाइट

उत्तर- (c) अभ्रक

4. किस खनिज की उद्योग की जननी माना गया है?

(a) सोना

(b) तांबा

(c) लोहा

(d) मैंगनीज

उत्तर- (c) लोहा

5. कौन लौह अयस्क का एक प्रकार है?

(a) लिग्नाइट

(b) हेमेटाइट

(c) बिटुमिनस

(d) इन में से सभी

उत्तर- (b) हेमेटाइट

6. कौन भारत का सबसे बड़ा लौह उत्पादक राज्य है?

(a) कर्नाटक

(b) गोवा

(c) उड़ीसा

(d) झारखंड

उत्तर- (c) कर्नाटक

7. छतीसगढ़ भारत का कितना प्रतिशत लौह अयस्क का उत्पादन करता है?

(a) 10

(b) 20

(c) 30

(d) 40

उत्तर- (b) 20

8. मैंगनीज उत्पादन में भारत का विश्व में क्या स्थान है?

(a) प्रथम

(b) द्वितीय

(c) तृतीय

(d) चतुर्थ

उत्तर- (c) तृतीय

9. एक टन इस्पात बनाने में कितने मैंगनीज़ का उपयोग होता है?

(a) 5 कि०ग्रा०

(b) 10कि०ग्रा०

(c) 15 कि०ग्रा०

(d) 20 कि०ग्रा०

उत्तर- (b) 10 कि०ग्रा०

10. उड़ीसा किस खनिज का सबसे बड़ा उत्पादक है?

(a) लौह अयस्क

(b) मैंगनीज

(c) टिन

(d) तांबा

उत्तर- (b) मैंगनीज

11. अल्युमिनियम बनाने के लिए किस खनिज की आवश्यकता पड़ती है?

(a) मैंगनीज

(b) टिन

(c) लोहा

(d) बॉक्साइट

उत्तर- (d) बॉक्साइट

12. देश में तांबे का कुल भण्डार कितना है?

(a) 100 करोड़ टन

(b) 125 करोड़ टन

(c) 150 करोड़ टन

(d) 175 करोड़ टन

उत्तर- (b) 125 करोड़ टन

13. बिहार-झारखंड में देश का कितना प्रतिशत अभ्रक़ का उत्पादन होता है?

(a) 60

(b) 70

(c) 80

(d) 90

उत्तर- (c) 80

14. सीमेंट उद्योग का सबसे प्रमुख कच्चा माल क्या है?

(a) चुना -पत्थर

(b) बॉक्साइट

(c) ग्रेनाइट

(d) लोहा

उत्तर- (a) चुना-पत्थर

लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. खनिज क्या है?

उत्तर- खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क इत्यादि।

प्रश्न 2. धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान क्या है?

उत्तर– धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान-

(l) ये कठोर एवं चमकीले होते है ।

(ll) ये प्रायः आग्नेय चाट्टानों में मिलते हैं।

प्रश्न 3. खनिजों की विशेषताओं का उल्लेख कीजिये।

उत्तर–  खनिजों की विशेषताएँ-

◆ खनिजों का वितरण असमान होता है।

◆ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

◆ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 4. लौह अयस्क के प्रकारों के नाम लिखिए।

उत्तर– शुद्ध लोहे की मात्रा के आधार पर भारत मे पाये जाने वाले  लौह अयस्क तीन प्रकार के है – हेमेटाइट, मैग्नेटाइट और लीमोनाइट।

प्रश्न 5. लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्यों के नाम लिखिए।

उत्तर – लोहे के प्रमुख उत्पादक राज्य- कर्नाटक, छतीसगढ़, उड़ीसा,  गोवा एवं झारखण्ड है।

प्रश्न 6. झारखंड के मुख्य लौह उत्पादक जिलों के नाम लिखिए।

उत्तर– झारखंड के मुख्य लौह उत्पादक जिला का नाम- पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला, पलामू, धनबाद, हजारीबाग, लोहरदगा, तथा राँची।

प्रश्न 7.  मैंगनीज के  उपयोग पर प्रकाश डालिए।

उत्तर– मैंगनीज का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) जंगरोधी इस्पात बनाने में।

(ii) शुष्क सेल के निर्माण में।

(iii) फोटोग्राफी में।

(iv) चमड़ा एवं माचिस उद्योग में।

(v) पेंट तथा कीटनाशक दवाओं के उत्पादन में इत्यादि।

प्रश्न 8. अल्युमिनियम के उपयोग का उल्लेख कीजिए।

उत्तर– अल्युमिनियम का बहुमुखी उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) वायुयान निर्माण में

(ii) विद्युत उपकरण के निर्माण में

(iii) घरेलू साज-सज्जा के साधनों के निर्माण में

(iv) बर्तन बनाने में

(v) सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएँ बनाने में इत्यादि।

प्रश्न 9. अभ्रक का उपयोग क्या है?

उत्तर– अभ्रक का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में

(ii) आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में 

(iii)  विद्युत उपकरण बनाने में।

प्रश्न 10. चुना-पत्थर की क्या उपयोगिता है?

उत्तर– चुना-पत्थर का उपयोग निम्नलिखित रूपों में किया जाता है-

(i) सीमेंट बनाने में

(ii) लौह इस्पात बनाने में

(iii)रसायन उद्योग में

(iii) उर्वरक, कागज एवं चीनी उद्योग में।

प्रश्न 11. खनिजों की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर– खनिजों की मुख्य विशेषताएँ-

◆ खनिजों का वितरण असमान होता है।

◆ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

◆ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न 12. खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन से क्या समझते है?

उत्तर- खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-

★ खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण,

★ उनका बचतपूर्वक उपयोग तथा

★ कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

     खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्वक उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। यदि खनिजों के संरक्षण के साथ-साथ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. खनिज कितने प्रकार के होते है?  प्रत्येक  का  सोदाहरण  परिचय दीजिए।

उत्तर- खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

(i) धात्विक खनिज-

        वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है

(क) लौहयुक्त खनिज-

      जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे – लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।

(ख) अलौहयुक्त खनिज-

       जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे – सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।

(ii) अधात्विक खनिज-

         वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि।

 अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-

(क) कार्बनिक खनिज-

         इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।

(ख) अकार्बनिक खनिज-

          इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे–अभ्रक, ग्रेफाइट।

प्रश्न 2. धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में क्या अंतर है ? तुलना कीजिये।

उत्तर- धात्विक एवं अधात्विक खनिजों में  अंतर  एवं तुलना-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं
प्रश्न 3. भारत क खनिज पट्टियों का नाम लिखकर किन्हीं दो का वर्णन करें।

उत्तर- भारत के अधिकांश खनिज निम्नलिखित तीन पट्टियों में पाई जाती हैं –

(i) उत्तर-पूर्वी पठार

(i) दक्षिणी-पश्चिमी पठार

(iii) उत्तर-पश्चिमी प्रदेश

(i) उत्तरी-पूर्वी पठार-

      यह देश की सबसे धनी खनिज पट्टी है जिसमें छोटानागपुर का पठार, उड़ीसा का पठार, छत्तीसगढ़ का पठार तथा पूर्वी आन्ध्रप्रदेश का पठार अवस्थित है। इस पट्टी में लौह अयस्क, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट, चना पत्थर, डोलामाइट, ताँबा,थोरियम, यूरेनियम, क्रोमियम, सिलिमेनाइट तथा फास्फेट के विशाल भण्डार हैं।

(iii) उत्तर-पश्चिमी प्रदेश-

      इस पट्टी का विस्तार खम्भात की खाड़ी से लेकर अरावली की श्रेणियों तक है। यहाँ  अनेक अलौह धातुएँ, जैसे–चाँदी, सीसा, जस्ता, ताँबा आदि मिलते हैं। बालु पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर, जिप्सम, मुल्तानी मिट्टी, डोलोमाइट, चूना-पत्थर, नमक आदि के भी पर्याप्त भंडार हैं।

        हिमालय एक अन्य खनिज पट्टी है जहाँ ताँबा, सीसा, जस्ता, कोबाल्ट आदि प्राप्त हैं।

प्रश्न 4. लौह अयस्क का वर्गीकरण कर उनकी विशेषताओं को लिखिए।

उत्तर- लौह अयस्क का वर्गीकरण इस प्रकार है-
(i) हेमेटाइट- इसमें 68% लौह अंश होता है। इसे लाल अयस्क भी कहते हैं।
(ii) मैग्नेटाइट- इसमें 60% लौह अंश होता है। इसे काला अयस्क भी कहते हैं।
(iii) लिमोनाइट- इसमें 40% लौह अंश होता है। इसे पीला अयस्क भी कहते हैं।
प्रश्न 5. भारत में लौह अयस्क के वितरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर- भारत में लौह अयस्क प्रायः सभी राज्यों में पाया जाता है परन्तु यहाँ के कुल भण्डार का 96% कर्नाटक, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, गोवा, झारखण्ड, राज्यों में सीमित है। शेष भण्डार तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र एवं अन्य राज्यों में अवस्थित है। भारत में 1950-51 में 42 लाख टन लोहे का उत्पादन हुआ जो 2004-05 में बढ़कर 1427.1 लाख टन हो गया। अतः लोहे के उत्पादन में भारी विकास हुआ है।
          कर्नाटक राज्य भारत का लगभग एक-चौथाई लोहा उत्पादन करता है। यहाँ बेल्लारी, हास्पेट, सुदूर क्षेत्रों में लौह अयस्क की खानें हैं।
         
         छत्तीसगढ़ देश का दूसरा उत्पादन राज्य है जो देश का करीब 20 प्रतिशत लोहा उत्पन्न करता है। दाँतेवाड़ा जिले का बैलाडिला तथा दुर्गा जिले के डल्ली एवं राजहरा प्रमुख उत्पादक हैं। रायगढ़, विलासपुर तथा सरगुजा अन्य उत्पादक जिले हैं। यहाँ का अधिकांश लोहा विशाखापट्नम बंदरगाह से जापान को निर्यात किया जाता है।
           
         उड़ीसा देश का 19 प्रतिशत लोहा उत्पादन करता है। यहाँ की प्रमुख खानें गुरु माहिषानी, बादम पहाड़ (मगूरगंज) एवं किरिबुरू हैं।
         
        गोवा देश का चौथा बड़ा लोहा उत्पादक राज्य है तथा 16 प्रतिशत देश का लोहा यहीं से प्राप्त होता है। यहाँ की प्रमुख खाने साहक्वालिम, संग्यूम, क्यूपेम, सतारी, पौडा एवं वियोलिम में स्थित हैं। यहाँ के मर्मागांव पतन से लोहा निर्यात किया जाता है।
           
      झारखण्ड देश का पांचवां बड़ा अयस्क उत्पादक राज्य है और 15 प्रतिशत से अधिक लोहे का उत्पादन करता है। यहाँ के सिंहभूम, पलामू, धनबाद, हजारीबाग, लोहरदगा तथा राँची मुख्य उत्पादक जिले हैं।
   
       महाराष्ट्र में लौह अयस्क की खाने चन्द्रपुर, रत्नागिरि और भण्डारा जिलों में स्थित हैं।
             
       आन्ध्रप्रदेश के कसीमनगर, बारंगल, कुर्नुल, कड़प्पा आदि जिले लौह अयस्क उत्पादक हैं जबकि तमिलनाडु के तीर्थ मल्लाई पहाड़ियों (सलेम) एवं यादपल्ली (नीलगिरी) क्षेत्र में लोहे के भण्डार हैं।
प्रश्न 6. मैंगनीज तथा बॉक्साइट की उपयोगिता तथा देश में इनके वितरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर- मैंगनीज अयस्क-
       मैंगनीज के उत्पादन में भारत का स्थान विश्व में रूस एवं दक्षिण अफ्रीका के बाद तीसरा है। यह मुख्य रूप से जंगरोधी इस्पात बनाने तथा लोहा एवं मैंगनीज के मिश्रधातु बनाने के उपयोग में आता है। इसका उपयोग शुष्क बैटरियों के निर्माण में, फोटोग्राफी में, चमड़ा एवं माचिस उद्योग में भी होता है। साथ ही इसका उपयोग पेंट तथा कीटनाशक दवाओं के बनाने में भी किया जाता है। भारत के कुल उत्पादन का 85% मैंगनीज का उपयोग मिश्रधातु बनाने में किया जाता है।
वितरण-
         भारत में मैंगनीज का संचित भण्डार 1670 लाख टन है। विश्व में जिम्बाब्वे के बाद भारत में ही मैंगनीज का सबसे बड़ा संचित भण्डार है जो विश्व के कुल संचित भण्डार का 20 प्रतिशत है।
         
        भारत के उत्पादन में मुख्य क्षेत्र उड़ीसा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आन्ध्रप्रदेश हैं। भारत का 78% से ज्यादा मैंगनीज अयस्क के भण्डार महाराष्ट्र के नागपुर तथा भण्डारा जिलों से लेकर मध्यप्रदेश के बालघाट एवं छिन्दवाड़ा जिलों तक फैली पट्टी में मिलते हैं।
     उड़ीसा भारत में मैंगनीज के उत्पादन में अग्रणी है। यहाँ देश के कुल उत्पादन का 37.6% मैंगनीज उत्पादन होता है। यहाँ मैंगनीज के मुख्य खादानें, सुन्दरगढ़, कालाहांडी, रायगढ़ बोलांगीर, क्योंझर, जालसुर एवं मयूरभंज जिलों में हैं। 
         
           महाराष्ट्र भारत के कुल उत्पादन का लगभग एक चौथाई मैंगनीज उत्पादन करता है। इस राज्य की मुख्य मैंगनीज उत्पादन पेटी नागपुर तथा भण्डारा जिले में हैं। इस पेटी में उत्तम कोटि के मैंगनीज अयस्क मिलते हैं। रत्नागिरि में उच्चकोटि का मैंगनीज का उत्पादन होता है।
            मध्यप्रदेश 21% मैंगनीज पैदा कर देश का तीसरा बड़ा उत्पादक राज्य है। बालघाट तथा छिन्दवाड़ा जिलों में मैंगनीज का उत्पादन होता है।
            कर्नाटक में मैंगनीज शिमोगा, तुमकुर, बेलारी, धारवाड़, चिकमंगलूर और बीजापुर जिले मुख्य उत्पादक हैं। पहले यहाँ देश का एक चौथाई मैंगनीज उत्पादन होता था किन्तु अब उत्पादन कम हो रहा है।
         
         आन्ध्रप्रदेश में देश के सकल उत्पादन का 6 प्रतिशत ही मैंगनीज का उत्पादन होता है। यहाँ मुख्य उत्पादक जिला श्रीकाकुलम है। अन्य उत्पादक जिलों में विशाखापतनम, कुडप्पा, विजयनगर, गुंटूर हैं।
बॉक्साइट-
        यह एक अलौह धातु निक्षेप है जिससे अल्यूमीनियम नामक धातु निकाली जाती है। भारत में बॉक्साइट का इतना भण्डार है कि अल्यूमीनियम में हम आत्मनिर्भर हो सकते हैं। इसका बहुमुखी उपयोग वायुयान निर्माण, बर्तन बनाने, सफेद सीमेंट तथा रासायनिक वस्तुएं बनाने में किया जाता है। भारत में बॉक्साइट का अनुमानित भण्डार 3037 मिलियन टन है।
वितरण-
          बॉक्साइट भारत के अनेक क्षेत्रों में मिलता है किन्तु मुख्य रूप से इसका भण्डार उड़ीसा, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश में अवस्थित है। देश का आधा से अधिक भण्डार उड़ीसा में है। उड़ीसा भारत के कुल उत्पादन का 42 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करता है। कालाहांडी, बोलंगीर, कोरापुट, सुन्दरगढ़ तथा संभलपुर बॉक्साइट के मुख्य उत्पादक जिले हैं।
           
        गुजरात भारत का 17.35 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करके दूसरे स्थान पर है। जामनगर, कैरा, सबरकंठ तथा सूरत महत्वपूर्ण उत्पादक जिले हैं।
 
        झारखण्ड बॉक्साइट के उत्पादन में तीसरा स्थान रखता है तथा देश का 14 प्रतिशत बॉक्साइट उत्पादन करता है। इसके लोहरदगा राँची, लातेहार एवं पलामू मुख्य उत्पादक जिले हैं।
        महाराष्ट्र के कोलावा, रत्नागिरि तथा कोल्हापुर जिलों में बॉक्साइट का खनन होता है तथा 12 प्रतिशत उत्पादन करता है।
         
          छत्तीसगढ़ भारत का 6 प्रतिशत से अधिक बॉक्साइट उत्पादन करता है। सरगूजा का पठारी प्रदेश, रायगढ़ तथा विलासपुर जिले इसके उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं।
             
         अन्य उत्पादन राज्यों में कर्नाटक में बॉक्साइट के प्रमुख निक्षेप बेलगाम जिले में पाये जाते हैं।
       तमिलनाडु के नीलगिरि, सलेम, मदुरई और कोयम्बटूर जिले, उत्तरप्रदेश के बांदा जिले बॉक्साइट के अन्य उत्पादक हैं। जम्मू और कश्मीर के पूंछ एवं उधमपुर जिलों में उत्तम कोटि के बॉक्साइट पाये जाते हैं। भारत विभिन्न देशों को बॉक्साइट निर्यात करता है। मुख्य आयातक देश इटली, यू. के., जर्मनी, जापान हैं।
प्रश्न 7. अभ्रक की उपयोगिता एवं वितरण पर प्रकाश डालें।
उत्तर- भारत विश्व में शीट अभ्रक का अग्रणी उत्पादक है। अब तक इलेक्ट्रॉनिक उद्योगों में इसका उपयोग होता रहा है, किन्तु कुछ कृत्रिम विकल्प आ जाने से अभ्रक के उत्पादन एवं निर्यात दोनों पर बुरा असर पड़ा है। वैसे तो प्राचीन काल से अभ्रक का प्रयोग आयुर्वेदिक दवाओं के लिए किया जाता रहा है, लेकिन विद्युत उपकरण में इसका खास उपयोग होता है। क्योंकि यह विद्युत रोधक होने के कारण उच्च विद्युत शक्ति को सहन कर सकता है।
           
             भारत में उत्पादन की दृष्टि से अभ्रक निक्षेप की तीन पट्टियाँ हैं जो बिहार, झारखंड, आन्ध्रप्रदेश तथा राजस्थान राज्यों के अन्तर्गत आती हैं। भारत में अभ्रक के कुल भण्डार 59065 टन है। 2002-03 में इसका उत्पादन 1217 टन था। बिहार एवं झारखण्ड में उत्तम कोटि के रूबी अभ्रक का उत्पादन होता है। पश्चिम में गया जिले में हजारीबाग, मुंगेर होते हुए पूर्व में भागलपुर तक फैला हुआ है। इसके अतिरिक्त धनबाद, पलामू, राँची एवं सिंहभूम जिलों में भी अभ्रक के भण्डार मिले हैं। बिहार एवं झारखंड भारत का 80% अभ्रक का उत्पादन करते हैं। आन्ध्रप्रदेश के नेल्लोर जिले में अभ्रक का उत्पादन होता है। राजस्थान देश का तीसरा अभ्रक उत्पादक राज्य है। यहाँ जयपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर आदि जिलों में अभ्रक की पेटी फैली हुई है। यू. एस. ए. भारतीय अभ्रक का मुख्य आयातक है।
प्रश्न 8. खनिजों के संरक्षण के उपाय सुझायें।
उत्तर- खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-
(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण, 
(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं
(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

       खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संरक्षण के साथ-साथ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।



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इकाई 1 (ग) वन एवं वन्य प्राणी संसाधनवन एवं वन्य प्राणी संसाधन


वन एवं वन्य प्राणी संसाधन

वस्तुनिष्ठ प्रश्नोतर

1. भारत में 2001 में कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन का विस्तार था?
(a) 25
(b) 19.27
(c) 20
(d) 20.60
उत्तर- (b) 19.27
2. वन स्थिति रिपोर्ट (2005)के अनुसार भारत में वन का विस्तार है-
(a) 20.60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(b) 20.55 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(c) 20 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) 20.60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में
3. बिहार में कितने प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र में वन का फैलाव है?
(a) 15
(b) 20
(c) 20.5
(d) 7.1
उत्तर- (d) 7.1
4. पूर्वोत्तर राज्यों के 188 आदिवासी जिलों में देश के कुल क्षेत्र का कितना प्रतिशत वन है?
(a) 75
(b) 80.05
(c) 90.03
(d) 60.11
उत्तर- (d) 60.11
5. किस राज्य में वन का सबसे अधिक विस्तार है?
(a) केरल
(b) कर्नाटक
(c) मध्यप्रदेश
(d) उत्तर प्रदेश
उत्तर- (c) मध्यप्रदेश
6. वन संरक्षण एवं प्रबंधन की दृष्टि से वनों को वर्गीकृत किया गया है- 
(a) 4 वर्गों में
(b) 3 वर्गों में
(c) 5 वर्गों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (b) 3 वर्गों में
7. 1951 से 1980 तक लगभग कितना वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र कृषि भूमि में परिवर्तित हुआ?
(a) 30,000
(b) 26,000
(c) 25,200
(d) 35,500
उत्तर- (b) 26,200
8. संविधान की धारा 21 का संबंध है-
(a) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण
(b) मृदा संरक्षण
(c) जल संसाधन संरक्षण
(d) खनिज सम्पदा संरक्षण
उत्तर- (a) वन्य जीवों तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण
9. एक एन०जी०ओ० की वानिकी रिपोर्ट के अनुसार 1948 में विश्व में कितने हेक्टेयर भूमि पर वन का विस्तार था।
(a) 6 अरब हेक्टेयर
(b) 4 अरब हेक्टेयर
(c) 8 अरब हेक्टेयर
(d) 5 अरब हेक्टेयर
उत्तर- (b) 4 अरब हेक्टेयर
10. प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण 1968 में कौन सा कनवेंशन हुआ था?
(a) अफ्रीकी कनवेंशन
(b) वेटलैंड्स कनवेंशन
(c) विश्व आपदा कनवेंशन
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर- (a) अफ्रीका कनवेंशन
11. इनमें कौन सा जीव है जो केवल भारत में ही पाया जाता है?
(a) घड़ियाल
(b) डॉलफिन
(c) ह्वेल
(d) कछुआ
उत्तर- (a) घड़ियाल
12. भारत का राष्ट्रीय पक्षी है-
(a) कबूतर
(b) हंस
(c) मयूर
(d) तोता
उत्तर- (c) मयूर
13. मैंग्रोवस का सबसे अधिक विस्तार है-
(a) अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के तटीय भाग में
(b) सुंदर वन में
(c) पश्चिमी तटीय प्रदेश में
(d) पूर्वोतर राज्य में
उत्तर- (b) सुंदर वन में
14. टेक्सोल का उपयोग होता है-
(a) मलेरिया में
(b) एड्स में
(c) कैंसर में
(d) टी०बी० के लिए
उत्तर- (c) कैंसर में
15. ‘चरक’ का संबंध किस देश से था?
(a) म्यांमार
(b) श्रीलंका
(c) भारत से
(d) नेपाल से

उत्तर- (c) भारत से
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. बिहार में वन संपदा की वर्तमान स्थिति का वर्णन कीजिये।
उत्तर –बिहार विभाजन के बाद वन विस्तार में बिहार राज्य दयनीय स्थिति में आ गया है, क्योंकि वर्तमान बिहार में अधिकतर भूमि कृषि योग्य है। मात्र 6764.14 हेक्टेयर में वन क्षेत्र बच गया है जो कि सम्पूर्ण बिहार के  भोगोलिक क्षेत्र का मात्र 7.1 प्रतिशत है। बिहार के 38 जिलों में से 17 जिलों से वन क्षेत्र समाप्त हो गया है। पश्चिमी चम्पारण, मुंगेर, बांका, जमुई, नवादा, नालन्दा, गया, रोहतास, कैमूर और औरंगाबाद जिलों के वनों की स्थिति कुछ बेहतर है, जिसका कुल क्षेत्रफल 3700 वर्ग किमी है। शेष में अवक्रमित वन क्षेत्र है, वन के नाम पर केवल झाड़-झरमूट बच गऐ हैं।
 प्रश्न 2. वन विनाश के मुख्य कारकों को लिखिए।
उत्तर –वन विनाश के मुख्य कारक निम्न हैं-
◆पशुचारण
◆ईंधन के लिए लकड़ियों के उपयोग
◆यातायात(सड़क मार्ग, रेलमार्ग) के साधन का निर्माण
◆औद्योगिक एवं नगरीकरण का विकास
◆कुछ पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार भारत के कई क्षेत्रों में सम्वर्द्धन ‘वृक्षारोपण’ अर्थात  वाणिज्य की दृष्टि से  एकल वृक्ष रोपण करने से पेड़ों की दूसरी प्रजातियाँ  खत्म हो गयी है।
 प्रश्न 3. वन के पर्यावरणीय महत्व का वर्णन कीजिये।
उत्तर –वन मानव जीवन के प्रमुख हमसफर हैं। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच जैसा है। यह केवल एक संसाधन ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण घटक है। हमारा इससे अटूट संबंध है । वास्तव में वन प्रकृति का एक अमूल्य  उपहार है। सृष्टि के आरम्भ से ही मानव इसके आँचल में पोषित होता रहा है।  यह इस जीवमंडल में सभी जीवों को संतुलित स्थिति में जीने के लिए अथवा संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा(Food Energy) का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति ही है। 
प्रश्न 4. वन्य-जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारकों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर –वन्य जीवों के ह्रास के चार प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
(l) प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण- यातायात की सुविधाओं में वृद्धि आदि कारणों से भी वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों का अतिक्रमण हो हुआ है  जिससे  प्राकृतिक आवास के छीन जाने के दबाव से वन्य जीवों की सामान्य वृद्धि तथा  प्रजनन क्षमता में कमी आ गई।
(ll) प्रदूषण जनित समस्या- प्रदूषण के कारण वन्य जीवों का जीवन-चक्र गंभीर रूप से  प्रभावित हो रहा है।
(lll) आर्थिक लाभ- आर्थिक लाभ के लिए  योजनाबद्ध तरीके से खास प्रजातियों के पेड़-पौधों एवं वन्य जीवों को स्थानीय, क्षेत्रीय या राज्यस्तर पर दोहन किये जाने से कई प्रजातियाँ संकट ग्रस्त हो गयी है।
(lV) सह विलुप्तता-जब एक जाति विलुप्त होती है तब उसपर आधारित दूसरी जातियाँ भी विलुप्त होने लगती हैं।
प्रश्न 5. वन और वन्य जीवों के संरक्षण में सहयोगी रीति रिवाजों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर –सहयोगी रीति-रिवाजों का वन और वन्य जीवों के संरक्षण में काफी महत्वपूर्ण योगदान है। ग्रामीण लोग कई धार्मिक अनुष्ठानों में 100 से अधिक पादप प्रजातियों का प्रयोग करते हैं और इन पौधों को अपने खेतों में भी उगाते हैं। आदिवासियों को अपने क्षेत्र में पाये जाने वाले पेड़-पौधों तथा वन्य जीवों से भावनात्मक तथा आत्मीय लगाव होता है। वे प्रजनन काल में मादा वन पशुओं का शिकार नहीं करते हैं। वन संसाधनों का उपयोग चक्रीय पद्धति से करते हैं। वन के खास क्षेत्रों को सुरक्षित रख उसमें प्रवेश नहीं करते हैं। समय-समय पर आवश्यकतानुसार वृक्षारोपण तथा उनकी रक्षा करते है। इस प्रकार से जनजातीय क्षेत्रों के वन को स्वभाविक संरक्षण प्राप्त हो जाता है। 
प्रश्न 6. चिपको आंदोलन क्या है?
उत्तर – सुदरलाल बहुगुणा के नेतृत्व में  उत्तर प्रदेश के टेहरी- गढ़वाल पर्वतीय जिले में  वन की रक्षा हेतु जो आंदोलन चलाया गया उसे चिपको आन्दोदन के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन में स्थानीय लोग ठेकेदारों की कुल्हाड़ी से हरे-भरे पौधों को काटते देख, उसे बचाने के  लिए अपने आगोश में पौधा को घेर कर इसकी रक्षा करते थे। इस आंदोलन की शुरूआत 1972 में हुआ था।
प्रश्न 7. कैंसर रोग के उपचार में वन का क्या योगदान है ?
उत्तर – टेक्सस बेनकेटा एवं टी. ब्रव्ही फोलिया एक औषधीय पौधा है जो हिमालय और अरुणाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में पाया जाता है तथा  यह  एक सदाबहार वृक्ष  है। चीड़ की छाल, पत्तियों, टहनियों और जड़ों से टैक्सोल नामक रसायन निकाला जाता है। इससे कैंसर रोधी औषधि बनायी जाती है। यह विश्व में सबसे अधिक बिकने वाली कैंसर औषधि है।
प्रश्न 8. दस लुप्त होने वाले पशु-पंक्षियों का नाम लिखिए।
उत्तर –दस लुप्त होने वाले पशु-पंक्षियां का नाम – एशियाई चीता, गुलाबी सिर वाला बत्तख, डोडो, गिद्ध (भारत), थाईलैंसीन (आस्ट्रेलिया), ‘स्टीलर्स सीकाउ (रूस), शेर की तीन प्रजातियाँ (बाली, जावन एवं कास्पियन) (अफ्रिका), कस्तुरी मृग, चीतल, लाल पांडा।
प्रश्न 9. वन्य-जीवों के ह्रास में प्रदुषण जनित समस्याओं पर अपना विचार स्पष्ट कीजिए।
उत्तर –बढ़ते प्रदूषणों ने कई समस्याओं को जन्म दिया है। पराबैंगनी किरणें, अम्ल वर्षा और हरितगृह प्रभाव प्रमुख प्रदूषक हैं जिन्होंने वन्य जीवों को काफी प्रभावित किया है। इसके अलावे वायु, जल एवं मृदा प्रदूषण के कारण वन एवं वन्य जीवों का जीवनचक्र गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। इससे इनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित हो रही है। फलस्वरूप धीरे-धीरे वन्य जीवन संकटग्रस्त होते जा है। 
प्रश्न 10. भारत के दो प्रमुख जैवमंडल क्षेत्र का नाम, क्षेत्रफल एवं राज्यों का नाम बताएं।
उत्तर –
◆नीलगिरि -5520 वर्ग किमी – तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक।
◆सुंदरवन-9630 वर्ग किमी –पश्चिम बंगाल
 दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर : 
प्रश्न 1. वन एवं वन्य  जीवों के महत्व का विस्तार सेे वर्णण कीजिये।
उत्तर -पृथ्वी का वह बड़े भूभाग जो पेड़-पौधे तथा झाड़ियों द्वारा आच्छादित होते है, उसे वन कहा जाता है। एवं उसमें रहने वाले जीव-जंतुओं को वन्य जीव कहा जाता है। वन एवं वन्य जीव मानव के प्रमुख हमसफ़र है। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। वन जैव विविधताओं का आवास होता है। यह न केवल एक संसाधन ही है  बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। मानव का इससे अटूट संबंध है। वन प्रकृति का एक अमूल्य धरोहर है। वन एवं वन्य प्राणी मानव के लिए प्रतिस्थापित होने वाला संसाधन है। यह इस जीव-मंडल में सभी जीवों की संतुलित स्थिति में जीने के लिए पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति होता है। वर्तमान समय के विकास की दौड़ में हम ने अपने अतीत के सभी गौरवशाली परंपराओं को नकार दिया है। वन एवं वन्य प्राणी के महत्व को नहीं समझ रहे हैं। और तेजी से इस संसाधन का विदोहन कर रहे है। वस्तुतः वन एवं वन्य प्राणी के महत्व को हमे समझना होगा और उसके संरक्षण पर पर ध्यान देना होगा।  
प्रश्न 2. वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों का वर्गीकरण कीजिये और सभी वर्गों का वर्णन विस्तार से कीजिये।
उत्तर- भारत में वनों का विस्तार एक समान नहीं है, यहां का पूर्वोत्तर राज्य एवम मध्यप्रदेश वनों की दृष्टि से काफी समृद्ध है, किंतु अंडमान निकोबार द्वीप समूह सबसे आगे है, जहां 90.3 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्रों में वन विकसित हैं। वृक्षों के घनत्व के आधार पर वनों को पांच वर्गों में बाँटा गया है-
1. अत्यंत सघन वन- भारत में इस प्रकार के वन विस्तार 54.6 लाख हेक्टेयर भूमि पर है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 1.66 प्रतिशत है, असाम और सिक्किम को छोड़कर समूचा पूर्वोत्तर – राज्य इस वर्ग में आते हैं। इन क्षेत्रों में वनों का घनत्व 75% से अधिक है।
2.सघन वन- इसके अन्तर्गत 73.60 लाख हेक्टेयर भूमि आती है जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 3% है। हिमालय, सिक्किम, मध्यप्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र एवं उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है। यहाँ वनों का घनत्व 621.99 प्रतिशत है।

3. खुले वन- 2.59 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर इस प्रकार के वनों का विस्तार है। यह कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.12% है, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा के कुछ जिले एवं असम के 16 आदिवासी जिलों में इस प्रकार के वनों का विस्तार है, असाम आदिवासी जिलों में वृक्षों का घनत्व 23.89% है।

4. झाड़ियाँ एवं अन्य वन- राजस्थान का मरुस्थलीय क्षेत्र एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्र में इस प्रकार के वन पाये जाते हैं। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार एवं प. बंगाल के मैदानी भागों में वृक्षों का घनत्व 10% से भी कम है इसलिए यह क्षेत्र इसी वर्ग में सम्मिलित है। इसके अन्तर्गत 2.459 करोड़ हेक्टेयर भूमि आती है, जो कुल भौगोलिक क्षेत्र का 8.66% है।

5. मैंग्रोव (तटीय वन) – विश्व के तटीय वन क्षेत्र (मैंग्रोव्स) का मात्र 5% 4,500 किमी. क्षेत्र ही भारत में है, जो समुद्र तटीय राज्यों में फैला है, जिसमें आधा क्षेत्र पश्चिम बंगाल का सुंदरवन है, इसके बाद गुजरात के अंडमान निकोबार द्वीप समूह आते हैं, कुल मिलाकर 12 राज्यों तथा केन्द्र प्रशासित प्रदेशों में मैंग्रोव्स वन है जिनमें आंध्रप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु, प. बंगाल, अंडमान-निकोबार, पाण्डेिचरी, केरल एवं दमन-द्वीप शामिल हैं।
 
प्रश्न 3. जैव विविधता क्या है? यह मानव के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? विस्तार से लिखिए।
उत्तर- जैव विविधता से तात्पर्य, पृथ्वी पर पाये पाई जाने वाली जीवों की विविधता से है। यह शब्द किसी विशेष क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की विभिन्न रूपों की ओर इंगित करता है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर जीवों की करीब एक करोड़ प्रजातियां पाई जाती हैं।
               ये हमारी धरा पर अमूल्य धरोहर हैं। वन्य जीव सदियों से हमारे सांस्कृतिक एवं आर्थिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इनसे हमें भोजन, वस्त्र के लिए रेशे, खालें, आवास आदि सामग्री एवं अन्य उत्पाद प्राप्त होते हैं। इनकी चहक और महक हमारे जीवन में स्फूर्ति प्रदान करते हैं। पारिस्थितिकी के लिए ये श्रृंगार के समान हैं। भारत में इन्हें सदैव आदरभाव एवं पूज्य समझा गया। मनीषियों के लिए प्रेरणा का स्रोत तो सैलानियों के लिए आकर्षण का विषय रहा है। ये पर्यावरण संतुलन के लिए भी अति आवश्यक हैं तथा हमारी भावी पीढ़ियों के लिए भी ये अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हमारा देश जैविक विविधता में समृद्ध देश है। सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्र  पश्चिमी घाट और उत्तरी पूर्वी भारत है। इनमें  क्रमशः भारत का 4% और 5.2 % भौगोलिक क्षेत्रफल है, विश्व के 15 हॉट स्पॉट में इन्हें भी रखा गया  है।
प्रश्न 4. विस्तार पूर्वक बतायें कि मानव किस प्रकार प्राकृतिक वनस्पति और प्राणीजात के ह्रास के कारक है।
उत्तर- मानव के निम्नलिखित क्रियाकलापों वनस्पतियों एवं प्राणीजगत के ह्रास के कारक हैं –
◆आवासीय एवं कृषि योग्य भूमि का विस्तार
◆हानिकारक रसायनों का  प्रयोग
◆आर्थिक लाभ प्राप्त करने के लिये जैव विविधताओं का अति दोहन
◆जनसंख्या में वृद्धि
◆औद्योगिकीकरण एवं शहरीकरण में  वृद्धि
◆जंगली जीवों का शिकार इत्यादि।   
                    मानव जीवमण्डल का सबसे महत्वपूर्ण सदस्य है जो न केवल अन्य जैविक घटकों को ही प्रभावित करता है बल्कि पर्यावरण के अजैविक घटकों में भी अत्यधिक परिवर्तन लाता है। मानव अपनी बुद्धि और विवेक के कारण प्रकृति के दूसरे जीवों और अजैविक घटकों का प्रयोग कर अपने जीवन को सुखमय और आरामदायक बनाता है। किन्तु जब मानव के क्रियाकलाप अनियंत्रित हो जाते हैं तो पर्यावरण के घटकों जैसे-वायु, जल तथा मृदा एवं दूसरे जीवों में अनावश्यक परिवर्तन हो जाता है जिसका वनस्पतियों एवं प्राणियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मानव अपने आवास, खेती एवं कारखाने स्थापित करने के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को काटता रहा है। शाकाहारी एवं मांसाहारी जानवरों का अंधाधुंध शिकार कर जीवों में असंतुलन पैदा कर दिया है और बहुत-से जन्तु लुप्त होने के कगार पर हैं। जैसे—सिंह, बाघ, चीता, गैंडा, बारहसिंगा, कस्तुरी मृग आदि।
5. भारतीय जैवमण्डल क्षेत्रों की चर्चा विस्तार से कीजिये।      
उत्तर- हमारा देश जैव विविधता के संदर्भ में विश्व के सर्वाधिक समृद्ध देशों में से एक है। इसकी गणना विश्व के 12 विशाल जैविक-विविधता वाले देशों में की जाती है। यहाँ विश्व की सारी जैव उप जातियों का 8 प्रतिशत संख्या (लगभग 16 लाख) पाई जाती है। राष्ट्र के स्वास्थ्य जैव मंडल एवं जैविक उद्योग के लिए समृद्ध जैव-विविधता अनिवार्य है। जैव-विविधता  से हम सभी लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से लाभ उठाते है। इससे भोज, औषधियां, भैषज्य दवाइयों, रेशों, रबड़, लकडियाँ इत्यादि करते है। कई सूक्ष्म जीवों का उपयोग बहुमूल्य उत्पाद तैयार करने के लिए उद्योगों में प्रयोग होता है। इन्हीं जैव विविधताओं के संरक्षण हेतु यूनेस्को के सहयोग से भारत में 14 जैव मण्डल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना की गई है जिसका विवरण निम्नलिखित है-

वन एवं वन्य प्राणी संसाधन


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(ख) जल संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solution खण्ड (क) इकाई 1.

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ Geography Solution
खण्ड (क)

इकाई 1. (ख) जल संसाधन

जल संसाधन


जल संसाधन

 वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर:

1. वृहद क्षेत्र में जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को कहते हैं-
(a) उजला ग्रह
(b) नीला ग्रह
(c) लाल ग्रह
(d) हरा ग्रह
उत्तर- (b) नीला ग्रह 
2. कुल जल का कितना प्रतिशत भाग महासागरों में निहित है?
(a) 9.5 %
(b) 95.5 %
(c) 96 %
(d) 96.6 %
उत्तर- (d) 96.6 % 
3. देश के बाँधों को किसने भारत का मंदिर कहा था?
(a) महात्मा गाँधी
(b) डॉ राजेन्द्र प्रसाद
(c) पंडित नेहरू
(d) स्वामी विवेकानंद
उत्तर- (c) पंडित नेहरू
4. प्राणियों के शरीर में कितना प्रतिशत जल की मात्रा निहित होती है?
(a) 55 %
(b) 60 %
(c) 65 %
(d) 70 %
उत्तर- (c) 65 %
5. बिहार में अति जल-दोहन से किस तत्व का सकेन्द्रण बढ़ा है?
(a) फ्लोराइड
(b) क्लोराइड
(c) आर्सेनिक
(d) लौह
उत्तर- (c) आर्सेनिक 
लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:
प्रश्न 1. बहुउद्देशीय परियोजना से आप क्या समझते है?
उत्तर – वैसी नदी घाटी परियोजना जिसका निर्माण दो या दो से अधिक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु किया जाता है उसे बहुउद्देश्यीय परियोजना कहा जाता है। इन परियोजना के विकास के मुख्य उद्देश्य प्रायः इस प्रकार होते है-
          ● बाढ़ नियंत्रण
          ● मृदा अपरदन पर रोक
          ● पेयजल एवं सिंचाई हेतु जलापूर्ति
          ● विद्युत उत्पादन
          ● उद्योगों के जलापूर्ति
          ●  परिवहन
          ● मनोरंजन
          ● वन्य जीव संरक्षण, मत्स्य पालन, जल कृषि, पर्यटन इत्यादि।
जैसे- भाखड़ा-नाङ्गल, हीराकुंड, दमोदर, गोदावरी, कृष्णा इत्यादि  नदी परियोजन बहुउद्देशीय है।
प्रश्न 2. जल संसाधन के क्या उपयोग है? लिखें।
उत्तर– जल संसाधन का मानवीय जीवन में काफी उपयोगी है। यहाँ तक कि जीवन-सृजन में भी जल महत्वपूर्ण है। प्राणी एवम वनस्पति में भी अधिकांश भाग जल ही होते है। जल के उपयोग की सूची इस प्रकार है।  –पेयजल, घरलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, जन स्वास्थ्य, स्वच्छ्ता तथा मूत्र विसर्जन इत्यादि।
प्रश्न 3. आन्तर्राष्ट्रीय जल-विवाद कारण है?
उत्तर– दो या अधिक राज्यों के बीच नदी जल के समुचित बंटवारे न होना ही जल-विवाद का मुख्य कारण है। चूँकि जल संसाधन का उपयोग सभी के लिए अति आवश्यक एवं व्यापक है।
जैस- कावेरी नदी के जल बंटवारे का विवाद कर्नाटक एवम तमिलनाडू के बीच काफी पुराना है।
प्रश्न 4. जल संकट क्या है?
उत्तर – जल की अनुपलब्धता ही जल संकट कहलाता है । जल संकट के भाव उत्पन्न  होते ही मानव मस्तिष्क पर सुख ग्रस्त या अनावृष्टि क्षेत्र(जहाँ वर्ष का अभाव हो) का चित्र उपस्थित होना स्वाभाविक है। पृथ्वी पर विशाल जल सागर होने एवं नवीकरणीय संसाधन होने के बावजूद जल संकट का होना एक जटिल समस्या है। जल संकट का मुख्य कारण बढ़ती जनसंख्या, उनकी व्यापक मांग, जल का अति उपयोग तथा जल के असमान वितरण का होना है। 
              
प्रश्न 5. भारत की नदियों के प्रदूषण के कारणों का वर्णन कीजिये।
उत्तर– भारत की नदियों के प्रदूषण के निम्नलिखित कारण है-
◆ मृत जानवरों एवं लाशों का नदियों में फेंक दिया जाना। 
◆ घरेलू एवं औद्योगिक अवशिष्टों का नदी में गिराया जाना।
◆  शहरों में बढ़ती आबादी एवं शहरी जीवनशैली।
◆ वाहित  मल कल का नदियों में निस्तारण। 
◆  धार्मिक अनुष्ठान एवम अन्धविश्वस।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर :
प्रश्न 1. जल संरक्षण से आप क्या समझते है ? इसके क्या उपाय है?
उत्तर –  जल संसाधनों की सीमित आपूर्ति,तेजी से फैलते प्रदूषण एवं वर्तमान समय मे मांग को देखते हुए जल संसाधनों का संरक्षण एवं प्रबंधन करना अति आवश्यक है ताकि लोगों के स्वस्थ जीवन, खाद्यान- सुरक्षा, आजीविका और उत्पादक अनुक्रियाओं को सुनिश्चित किया जा सके और नैसर्गिक परिवर्तनों के निम्नीकरण पर विराम लगाया जा सके। इस संदर्भ में निम्निलिखित विधियाँ कारगर हो सकती है –
(i) भूमिगत जल की पूनर्पूर्ति- पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने ‘जल मिशन’ संदर्भ देकर भूमि जल पुनर्पूर्ती पर बल दिया था। जिससे खातों, गांवों, शहरों, उद्योगों को पर्याप्त जल मिल सके। इसके लिए वृक्षारोपण, जैविक तथा कम्पोस्ट खाद का उपयोग, वेटलैंड्स(वेटलैंड्स) का संरक्षण, वर्षा जल का संचयन एवं मल-जल शोधन पुनः चक्रण जैसे क्रियाकलाप उपयोगी हो सकते हैं।
(ii) जल संभर प्रबंधन (Watershed Management)- जल प्रवाह या जल जमाव का उपयोग कर उद्यान, कृषि वानिकी, जल कृषि, कृषि उत्पादन को बढ़ाया जा सकता है। इससे पेयजल की आपूर्ति भी की जा सकती है। इस प्रबंधन को छोटी इकाइयों पर लागू करने की आवश्यकता है।
(iii) तकनीकि विकास- तकनीकी विकास से तात्पर्य ऐसे उपक्रम से है जिसमें जल का कम-से-कम उपयोग कर, अधिक से अधिक लाभ लिया जा सके। जैसे ड्रिप सिंचाई, लिफ्ट सिंचाई, सूक्ष्म फुहारों से सिंचाई, सीढ़ीनुमा खेती इत्यादि।
प्रश्न 2. वर्षा जल की मानव जीवन में क्या भूमिका है? इसके संग्रहण व पुनः चक्रण के विधियों का उल्लेख करें।
उत्तर – जल संकट की समस्या को को कम करने की दिशा में में वर्षा जल संग्रह एक लोकप्रिय एवं राहनीय कदम हो सकता है। वर्षा जल मानव जीवन मे काफी उपयोगी है पश्चिमी भारत खासकर राजस्थान में पेयजल हेतु वर्षा-जल का संग्रहण छत पर करते थे। पश्चिम बंगाल के बाढ़ मैदान में सिंचाई के लिए बाढ़ जल वाहिकाएँ बनाने का चलन था। शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में वर्ष-जल को एकत्रित करने के लिए गड्ढ़ों का निर्माण कर मृदा सिंचित का कार्य किया जाता था। मेघालय के शिलांग में छत पर वर्षा जल संग्रहण आज भी परम्परागत रूप में परिचित है।

                 कर्नाटक के मैसूर जिले में स्थित गंगथर गाँव में छत पर जल संग्रहण की व्यवस्था 200 घरों में है जो जल संरक्षण की दिशा में एक मिसाल है। वर्तमान समय में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश बाजस्थान एवं गुजरात सहित कई राज्यों में वर्षा-जल संरक्षण एवं पुनः चक्रण किया जा रहा है।


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इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन / बिहार बोर्ड-10 Geography Solutions खण्ड (क)

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खण्ड (क)

इकाई-1. (क) प्राकृतिक संसाधन

प्राकृतिक संसाधन


प्राकृतिक संसाधन

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1. पंजाब में भूमि निम्नीकरण का मुख्य कारण है:
(a) वनोन्मूलन
(b) गहन खेती
(C) अति पशुचारण
(d) अधिक सिंचाई
उत्तर- (d) अधिक सिंचाईं

2. सौपानी कृषि किस राज्य में प्रचलित है?
(a) हरियाणा
(b) पंजाब
(C) कर्नाटक
(d) उत्तराखंड
उत्तर- (d) उत्तराखंड

3.मरुस्थलीय मृदा का विस्तार निम्न में से कहाँ है?
(a) उत्तर प्रदेश
(b) राजस्थान
(C) कर्नाटक
(d) महाराष्ट्र
उत्तर- (b) राजस्थान

4. मेढ़क के प्रजनन को नष्ट करने वाला रसायन कौन है?
(a) बेंजीन
(b) यूरिया
(c) एंड्रिन
(d) फॉस्फोरस
उत्तर – (c) एंड्रिन

5. काली मृदा का दूसरा नाम क्या है?
(a) बलुई
(b) रेगुर मृदा
(c) लाल मृदा
(d) पर्वतीय मृदा
उत्तर- (b) रेगुर मृदा

लघु उत्तरीय  प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्यों के नाम बतावें। इस मृदा में कौन-कौन सी फसलें लगायी जा सकती हैं?
उत्तर– जलोढ़ मृदा के विस्तार वाले राज्य  बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, असम, उड़ीसा इत्यादि है।

       इस मृदा में गन्ना, धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन जैसी फसल उपयुक्त मानी जाती है।

प्रश्न 2. समोच्च कृषि से आप क्या समझते है?
उत्तर– पहाड़ी क्षेत्रों में जल के तेज बहाव के कारण होने वाले मृदाअपरदन से बचने के लिए पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली सीढ़ीनुमा खेती को समोच्च कृषि कहा जाता है।
प्रश्न 3. पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में कृषि की कौन-सी पद्धति उपयोगी मानी जाती है?
उत्तर– पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पट्टिका कृषि पध्दति उपयोगी मानी जाती है। यह फसलों के बीच घास की पट्टियां विकसित करने पर आधारित है। 

प्रश्न 4. भारत के किन भागों में नदी डेल्टा का विकास हुआ है ? यहाँ की क्या विशेषता है।

उत्तर– भारत के पूर्वी तटीय भागों में गंगा- ब्रह्मपुत्र, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, एवं कावेरी नदियों द्वारा डेल्टा का विकास हुआ है। यहाँ जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है जिसका निर्माण बालू, सिल्ट, एवं मृतिका के विभिन्न अनुपात से होता है। इसका रंग धुंधला से लेकर लालिमा लिये हुये भूरे होता है।

प्रश्न 5. फसल चक्रण मृदा संरक्षण में किस प्रकार सहायक है?
उत्तर– दो फसलों के बीच एक दलहन या तेलहन की फसलों को उगाना ही फसल चक्रण कहलाता है। इसके द्वारा मृदा के पोषणीय स्तर को बरकरार रखा जा सकता है क्योंकि इससे नाइट्रोजन का स्थिरीकरण होता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. जलाक्रांतता कैसे उपस्थित होता है ? मृदा अपरदन में इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर- अति सिंचन से जलाक्रांतता (WaterLogging) की समस्या पैदा होती है जिससे मृदा में लवणीय और क्षारीय गुण बढ़ जाती है जो भूमि के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी होते है। अर्थात इससे मृदा की उर्वरा शक्ति घटते जाती है और भूमि धीरे-धीरे बंजर में बदल जाती है।                                                                                                                        
              इस प्रकार की समस्या मुख्यत: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अति सिंचाई से भूमि का निम्नीकरण की समस्या देखने को मिलती है।
प्रश्न 2. मृदा संरक्षण पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर- मृदा को बंजर या अनुपजाऊ होने से बचाना ही मृदा संरक्षण कहलाता है। मृदा पारितंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह न केवल पेड़ पौधों के विकास का माध्यम है बल्कि पृथ्वी पर विद्यमान अनेकों जीव समुदायों के भरण-पोषण भी करती है। मृदा में मौजूद उर्वराशक्ति मानव के आर्थिक क्रियाकलापों को प्रभावित करती है। लगभग 1 सेंटीमीटर मोटी मृदा परत के निर्माण में हजारों वर्षों का समय लगता है।                         
                     मृदा का अपने मूल स्थान से अपरदन के विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना भू-क्षरण कहलाता है। यह मृदा की एक बहुत बड़ी समस्या है। मृदा-क्षरण के कई कारणों जैसे वायु और जल के तेज बहाव, जलक्रांतता,अतिपशुचारण, खनन, रसायनों का अत्यधिक उपयोग जैसी मानवीय अनुक्रियाओं द्वारा होता है। वृक्षारोपण, पट्टिका कृषि, फसलचक्रण, समोच्च कृषि इत्यादि द्वारा मृदा-क्षरण को रोकना ही मृदा संरक्षण का मुख्य तरीका है। रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद का उपयोग मृदा संरक्षण में सहायक होता है। वृक्षारोपण से भी मृदा संरक्षण बढ़ता है; क्योंकि इससे मृदा को बाधा पहुँचती है और इनकी पत्तियों से प्राप्त ह्यूमस मृदा की गुणवत्ता को बढ़ाने में सहायक होते हैं।
प्रश्न 3. भारत में अत्यधिक पशुधन होने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान लगभग नगण्य है। स्पष्ट करें।
उत्तर- भारत पशुधन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल किया जाता है। विश्व मे सबसे अधिक पशु भारत में ही पाये जाते है परंतु यहाँ स्थायी चारागाह के लिए बहुत कम भूमि उपलब्ध है जो कि पशुधन के लिए पर्याप्त नहीं है। परिणामस्वरूप पशुपालन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। 
            भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन का योगदान लगभग नगण्य होने का कारण निम्नलिखित कारण है-
◆उत्तम किस्म के पशुनस्लों में भारी कमी।
◆वैज्ञानिक प्रणाली एवं तकनीकी ज्ञान का अभाव।
◆चारागाह का अभाव।
◆बढ़ती आबादी का दबाव।
◆पूँजी का अभाव इत्यादि। 
◆ इच्छा शक्ति की कमी। 
◆पशुचिकित्सक का अभाव।

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इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग / बिहार बोर्ड-10 GEOGRAPHY SOLUTIONS  खण्ड (क)

इकाई 1 भारत : संसाधन एवं उपयोग

खण्ड (क)

बिहार बोर्ड वर्ग-10वाँ GEOGRAPHY SOLUTIONS 

संसाधन एवं उपयोग



संसाधन एवं उपयोग

वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

1.कोयला किस प्रकार का संसाधन है?

(a) अनवीकरणीय

(b) नवीकरणीय

(c) जैव

(d) अजैव

उत्तर- (a) अनवीकरणीय

2.सौर ऊर्जा निम्नलिखित में से कौन-सा संसाधन है:

(a) मानवकृत

(b) पुनः पूर्तियोग्य

(C) अजैव

(d) अचक्रीय

उत्तर- (b) पुनः पूर्तियोग्य

3. तट रेखा से कितने कि०मी० क्षेत्र सीमा अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र कहलाते है?

(a) 100 N.M.

(b) 200N.M.

(C) 150 N.M.

(d) 250N.M.

उत्तर- (b) 200 N.M.

4. डाकुओं की अर्थव्यवस्था का संबंध है:-

(a) संसाधन संग्रहण से

(b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

(C) संसाधन के नियोजित दोहन से

(d) इनमें से कोई नहीं।

उत्तर- (b) संसाधनों के अनियोजित विदोहन से

5. समुद्री क्षेत्र में राजनैतिक सीमा के कितनी कि०मी० क्षेत्र तक राष्ट्रीय सम्पदा निहित है:-

(a) 10.2 कि०मी०

(b) 15.5 कि०मी०

(C) 12.2 कि०मी०

(d) 19.2 कि०मी०

उत्तर- (d) 19.2 कि०मी०

लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन को परिभाषित कीजिये।

उत्तर- संसार में उपलब्ध वे सभी वस्तुएँ जिसका मानव अपने उपयोग में करता हो उसे संसाधन कहते है। जिमरमैन के अनुसार, संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन भौतिक एवं जैविक दोनों हो सकते हैं। भूमि मृदा,जल खनिज जैसे भौतिक संसाधन मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति संसाधन बन जाते हैं। जैविक संसाधन वनस्पति, वन्यजीव तथा जलीय जीव जो मानवीय जीवन को सुखमय बनाते हैं।

प्रश्न 2. संभावी एवं संचित-कोष संसाधन में अंतर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संभावी संसाधन- संभावी संसाधन ऐसे संसाधन को कहते है जिसका उपयोग भविष्य में लाये जाने की संभावना बनी रहती है। यह किसी विशेष क्षेत्र में मौजूद होते है। जैसे- हिमालयी क्षेत्र का खनिज, राजस्थान एवम गुजरात क्षेत्र में पवन और सौर ऊर्जा का उपयोग अभी तक नहीं किया किया गया।

संचित-कोष संसाधन- ऐसे संसाधन जिसे वर्तमान में उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है, संचित-कोष संसाधन कहलाता है। यह भी भविष्य की पूँजी है। जैसे – नदी जल का उपयोग भविष्य में व्यापक रुप से जल विधुत निर्माण में किया जाएगा।

प्रश्न 3. संसाधन संरक्षण की उपयोगिता को लिखिए।

उत्तर – संसाधनों का योजनाबद्व समुचित एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन संरक्षण कहलाता है। संसाधनों  का अविवेकपूर्ण या अतिशय उपयोग विविध प्रकार के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, एवं पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म देते है। अतः इन समस्याओं से बचने हेतु विभिन्न स्तरों पर संरक्षण की आवश्यकता है। इस संदर्भ में महान दार्शनिक महात्मा गांधी के विचार प्रासंगिक है – “हमारे पास पेट भरने के लिए बहुत कुछ है लेकिन पेटी के लिए कुछ नहीं”। मेधा पाटेकर का ‘नर्मदा  बचाओ आंदोलन’ सुंदर लाल बहुगुणा का ‘चिपको आंदोलन’ एवं संदीप पाण्डे  द्वारा वर्षा -जल संचय कर कृषित भूमि का विस्तार,संसाधन संरक्षण दिशा में अत्यंत सराहनीय  कदम है।

प्रश्न 4. संसाधन निर्माण में तकनीक की क्या भूमिका है, स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- संसाधन-निर्माण में तकनीक की भूमिका अत्यंत ही महत्वपूर्ण होती है, केवल संसाधनों की उपलब्धता से ही विकास संभव नहीं है बल्कि संसाधनों में वांछित परिवर्तन के साथ-साथ तकनीकी  का उपयोग करना अति आवश्यक है। क्योंकि अनेक प्रकृति-प्रदत्त वस्तुएँ तब तक संसाधन का रूप नहीं लेती जबतक कि किसी विशेष तकनीक द्वारा उन्हें उपयोगी नहीं बनाया जाता। जैसे- नदियों के बहते जल से पनबिजली उत्पन्न करना, बहती हुई वायु से पवन ऊर्जा उत्पन्न करना, भूगर्भ में उपस्थित खनिज अयस्कों का शोधन कर उपयोगी बनाना, इन सभी में अलग-अलग तकनीकों की आवश्यकता होती है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर:

प्रश्न 1. संसाधन के विकास में ‘सतत विकास’ की अवधारणा की व्याख्या कीजिये।

उत्तर- पर्यावरण को क्षति पहुँचाये बिना भविष्य की आवश्यताओं के मद्देनजर, वर्तमान विकास को कायम रखने की धारणा ही ‘सतत विकास’ की अवधारणा कहलाता है। संसाधन मनुष्य के जीविका का आधार है। जीवन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए संसाधनों के सतत विकास की अवधारणा अति आवश्यक है। ‘संसाधन प्रकृति प्रदत उपहार है’ की अवधारणा के कारण मानव ने इनका अंधाधुंध दोहन किया, परिणामस्वरूप अनेकों पर्यावरणीय समस्याएं उतपन्न हो गयी है। जैसे- भूमण्डलीय तपन (Global Warming), ओज़ोन क्षय, पर्यावरण-प्रदूषण, मृदाक्षरण, भूमि-विस्थापन, अम्लीय वर्षा, असमय ऋतु-परिवर्तन इत्यादि।

       अतः उपरोक्त समस्याओं से निजात पाने हेतु वर्तमान समय में सतत विकास की अवधारणा को विश्व स्तर पर पालन करने की आवश्यकता है ताकि विश्व शांति के साथ साथ जैव जगत को भी गुणवत्तापूर्ण जीवन लौट सके और वर्तमान विकास के  साथ भविष्य भी सुरक्षित हो सके।

प्रश्न 2. स्वामित्व के आधार पर संसाधन के विविध स्वरूपों का वर्णन कीजिये।

उत्तर- स्वामित्व के आधार पर संसाधन चार प्रकार के होते है-

व्यक्तिगत संसाधन: ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास व्यक्ति का अधिकार हो उसे व्यक्तिगत संसाधन कहते है। जैसे- भूखंड, घर व अन्य जायदाद, बाग-बगीचा, तालाब, कुआँ इत्यादि जिस पर व्यक्ति निजी स्वामित्व रखता है।

सामुदायिक संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर किसी खास समुदाय का आधिपत्य होता है, उसे सामुदायिक संसाधन कहते है। जैसे- गाँवों में  श्मशान, मंदिर या मस्जिद परिसर, सामुदायिक भवन, तालाब आदि। शहरों में सार्वजनिक पार्क, पिकनिक स्थल, खेल मैदान, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, एवं गिरिजाघर।

राष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर राष्ट्र या देश का अधिकार हो, उसे राष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी राजनीतिक सीमा के अंतर्गत भूमि, खनिज पदार्थ, जल संसाधन, वन व वन्यजीव एवं समुद्री जीव (200 KM महासागरीय क्षेत्र तक) राष्ट्रीय संसाधन है।

अंतरार्ष्ट्रीय संसाधन- ऐसे संसाधन जिस पर दो या दो से अधिक देशों का अधिकार हो, उसे अंतराष्ट्रीय संसाधन कहते है। जैसे- किसी देश की तट रेखा से 200 KM की  दूरी तक का क्षेत्र (अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र)।



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