8. Population problems and government policies in India
(भारत में जनसंख्या की समस्याएँ एवं सरकारी नीतियाँ)
वस्तुतः किसी, देश की जनसंख्या उसका एक संसाधन होती है, लेकिन विपरीत परिस्थिति में वह समस्या का कारण भी बन जाती है, स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने का प्रयास तब शुरू किया गया जब इसका भार असहज होने लगा।
जनसंख्या को समस्या के रूप में तब देखा जाता है जब उपलब्ध भौतिक संसाधनों की तुलना में जनसंख्या ही अधिक हो जाता है। भारत की स्थिति ऐसी ही हो गई है। फलतः अधिक जनसंख्या के कारण देश में न्यूनतम प्रति व्यक्ति आय, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, बेरोजगारी, निराशा और क्षेत्रीय अलगाव जैसे कठिनाइयों के कारण भारत की प्रगति धीमी हो गई है।
50 वर्षों के प्रयास के बावजूद जनसंख्या सम्बन्धी समस्याएँ सुलझने के स्थान पर उलझती ही जा रही हैं। भारत कहने के लिए कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हो गया है फिर भी एक विशाल जनसंख्या कुपोषण से ग्रसित है।
कुपोषण बीमारियों का कारण बन गया है, भारत की आधी से कुछ कम या लगभग 37% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे है। गरीबी भारत की जनसंख्या की सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि गरीब व्यक्ति जानवरों से भी बदतर जीवन जीने के लिए बाध्य है।
भारत की जनसंख्या संबंधी समस्याओं को सुविधा के लिए निम्नलिखित वर्गों में विभक्त किया जा सकता है।
(1) तीव्र जनसंख्या वृद्धि:-
भारत की जनसंख्या में औसतन 1.6 करोड़ से अधिक व्यक्ति प्रतिवर्ष जुड़ जाते हैं। 1901 में जहां देश की जनसंख्या केवल 23.83 करोड़ थी वहीं 1951 में बढ़कर 36.10 करोड़ हो गई तथा 60 वर्षों के बाद 2021 को 1.21 अरब से ऊपर हो गई। यह वृद्धि दर विकसित देशों की अपेक्षा बहुत अधिक है। भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यह जन भार कृषिगत भूमि की वहन क्षमता से अधिक है। भारत अपनी अधिकतम भूमि का उपयोग करने के लिए वनों का विनाश भी कर चुका है जो एक अलग समस्या है।
स्पष्ट है कि संसाधनों के विकास के लिए भूमि के गहन उपयोग के साथ अन्य संसाधनों के विकास के भी प्रयास करने होंगे, लेकिन अनेकानेक कारणों से संसाधनों का विकास मन्द गति से हो रहा है, जबकि जनसंख्या वृद्धि सतत् बनी हुई है।
अतः इस तीव्र गति से बढ़ती हुई जनसंख्या का यथा सम्भव नियंत्रण करना समस्या समाधान के लिए एक आवश्यकता है। विगत दशकों के सरकारी प्रयास निराशाजनक रहे हैं।
भारत में जनसंख्या विस्फोट की गूंज अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होने लगी है और इसके समाधान के लिए अनेक उपाय सुझाए जा रहे हैं। जैसे स्त्री शिक्षा, रोगों की रोकथाम, जन्म-नियंत्रण, जन-चेतना का प्रचार-प्रसार, स्वयंसेवी संस्थाओं की सहभागिता आदि, लेकिन भारत जैसे जनसंख्या बोझिल देश में कठोर कदम उठाए बिना इसका समाधान कठिन है। ऐसे उपायों में से निम्न उपाय विशेष उल्लेखनीय हैं- दो से अधिक बच्चा पैदा करने पर दण्ड की व्यवस्था, शादी की वैधानिक आयु का कठोरता से पालन, संतति सुधार कार्यक्रम, स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, आर्थिक विकास, स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से निजात, मनोरंजन के साधनों का विस्तार, परिवार नियोजन कार्यक्रम एवं प्रवास इत्यादि।
(2) जनसंख्या का असमान वितरण:-
अनेकानेक प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक और ऐतिहासिक कारणों से भारत की जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में अत्यधिक विषमता है जिसके कारण संसाधनों के उपयोग में अतिशयता पायी जाती है। अधिकांश जनसंख्या कृषि पर आधारित होने के कारण उपजाऊ मृदा और अनुकूल जलवायु क्षेत्रों पर ही केन्द्रित हैं।
उत्तरी भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र, तटीय मैदान और दक्षिण के पठार का कृषिगत क्षेत्र ऐसे ही जनाधिक्य के क्षेत्र हैं, यदि कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में परिवहन के साधनों, सिंचाई, उद्योग-धन्धों आदि की सुविधा प्राप्त हो जाए तो इस विषमता को कम किया जा सकता है।
भारत में जनसंख्या के क्षेत्रीय स्थानान्तरण की कोई नीति न होने के कारण इस दिशा में अब तक कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ है। पश्चिमी बंगाल, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में घनत्व अत्यधिक है।
यदि राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, छोटा नागपुर पठार जैसे इलाकों में जीविका के साधनों के लिए उचित प्रबन्ध किया जाए तो सघन बसे इलाकों के लोगों को वहां स्थाई रूप से बसाया जा सकता है। सरकार को इस दिशा में गम्भीरता से पहल करनी चाहिए, क्योंकि क्षेत्रवाद से जनसंख्या के स्थानान्तरण पर प्रश्न-चिन्ह लगता दिखाई दे रहा है।
(3) प्रति व्यक्ति कम आय:-
सरकार द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों एवं विविध प्रयासों के बावजूद भी हमारे देश के लोगों की आय इतनी कम है कि उससे जीवन स्तर में सुधार लाना कठिन है। यहां मात्र 39.26% जनसंख्या कार्यशील है और उनमें से भी कम पारिश्रमिक पाने वालों की संख्या सर्वाधिक है। यही कारण है कि सामान्यतः आधी कार्यशील जनसंख्या अपने परिवार के लिए मात्र जीने का साधन जुटा ले, यही बहुत बड़ी उपलब्धि है। कम आय का मुख्य कारण विकास कार्यों में शिथिलता है।
पिछले 50 वर्षों के नियोजित विकास कार्यक्रमों के बावजूद भारत का एक विस्तृत क्षेत्र जहां देश की आधी से अधिक जनसंख्या निवासित है, निम्न स्तर का ही विकास हो पाया है।
(4) अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और बीमारी:-
अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी और बीमारी ये सभी समस्याएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। अशिक्षा धनोपार्जन में बाधक है और कम आय से गरीबी पनपती है। गरीबी कुपोषण को प्राश्रय देती है। भारत की बढ़ती बेरोजगारी, विशेषकर पढ़े-लिखे लोगों में कुण्ठा को जन्म दे रही है, इससे न केवल उत्पादकता का ह्रास होता है, अपितु सामाजिक तनाव को भी बढ़ावा मिल रहा है।
सम्प्रति भारत सरकार की सूचना के अनुसार 2005-06 में 942 रोजगार कार्यालयों में 7,289.5 हजार व्यक्तियों का पंजीकरण हुआ था, जिसमें केवल 177.0 हजार व्यक्तियों को रोजगार मिल सका था। स्पष्ट है कि जनसंख्या वृद्धि दर की अपेक्षा रोजगार के अवसरों में बहुत धीमी वृद्धि हो रही है।
सरकार के अथक प्रयास के बावजूद भी गरीबी और बेकारी बढ़ती जा रही है। कुछ विशेष राज्यों में यह समस्या और अधिक विकट है जैसे-बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, त्रिपुरा, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों की आधे-से-अधिक जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रही है।
(5) सीमित भूखण्ड:-
देश में विश्व की 16.87 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जबकि विश्व क्षेत्रफल का केवल 2.4% भाग ही भारत में उपलब्ध है। स्पष्ट है कि सीमित भू-खण्ड पर जनसंख्या का भारी दबाव है। कृषि देश की अर्थव्यवस्था और अधिकांश लोगों की जीविका का प्रमुख साधन है, लेकिन यहाँ प्रति व्यक्ति कृषि उपयुक्त भूमि की उपलब्धता केवल 0.3 हेक्टेयर या उससे भी कम है।
इसी तरह देश में प्रतिवर्ग किलोमीटर के पीछे 324 व्यक्ति निवास करते हैं। जबकि विश्व का औसत घनत्व 44 व्यक्ति प्रतिवर्ग किमी ही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भूखण्ड पर बढ़ते दबाव के कारण, कृषि भूमि की अनुपलब्धता, आवास एवं पर्यावरण असन्तुलन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है।
(6) अन्य प्राकृतिक विपदाएँ:-
विशाल जनसंख्या के लिए कृषि भूमि की आवश्यकताओं की पूर्ति एवं अन्य कारणों से वनों के अत्यधिक ह्रास से पर्यावरण प्रदूषण जैसे अनेक कारणों से पारिस्थितिकी सन्तुलन तेजी से बिगड़ा है, फलस्वरूप देश में अकाल, सूखा, महामारी, भुखमरी जैसी अनेक आपदाएं उत्पन्न हो गई हैं।
(7) असमान आर्थिक विकास से उत्पन्न समस्याएँ:-
आधुनिक काल में आर्थिक विकास का स्वरूप बदल गया है। संसाधन दोहन, पूंजी, प्रबन्ध और व्यवसायीकरण आदि क्षेत्रों में धन एकत्र हो गया है। इस प्रकार आर्थिक स्तर के अनुसार देश की जनसंख्या उच्च आय वर्ग, औसत आय वर्ग और निम्न आय वर्ग में बंटी हुई है। स्पष्ट है कि आर्थिक असमानता देश की जनसंख्या की सबसे बड़ी समस्या बन गई है।
(8) पर्यावरणीय समस्याएँ:-
आज भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में विकास की अंधी दौड़ में संसाधनों का निर्ममता पूर्ण दोहन होने लगा है। वहीं पर्यावरण प्रदूषण जैसी भीषण समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। अनेक बीमारियाँ, बाढ़, सूखा, मृदा क्षरण, संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। अनेक महानगरों में तो ये समस्याएँ अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी हैं।
(9) सामाजिक-धार्मिक दुःख से उपजी समस्याएँ:-
आज जनसंख्या वृद्धि के साथ ही भौतिकवादिता, स्वच्छन्दता, कट्टरता, आतंकवाद, साम्प्रदायिकता जैसी समस्याएं बढ़ी हैं। चोरी, हत्या, बलात्कार जैसी समस्याएं निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। आज मानव मूल्य, प्रेम, दया, करुणा, सहिष्णुता, भाईचारा जैसी भावनाएं विलुप्त होती जा रही हैं। वहीं उद्दण्डता, घृणा, दुराचार, नैतिक पतन जैसे दुर्गुणों को बढ़ावा मिला है। आज देश की अधिकांश जनसंख्या अनेक सामाजिक, धार्मिक, दैहिक व मानसिक समस्याओं से घिरी हुई है। इन समस्याओं का निराकरण ढूंढ़ना हम सबके लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है।
भारत में जनसंख्या नीति
➤ स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक बाद से ही भारत सरकार भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या को लेकर चिंतित थी। पहली पंचवर्षीय योजना के समय से ही भारत सरकार ने भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयास किए हैं। इसी कड़ी में परिवार नियोजन कार्यक्रम को अपनाने वाला भारत विश्व का पहला देश बना था।
➤ सर्वप्रथम वर्ष 1960 में एक विशेषज्ञ समूह ने भारत में एक जनसंख्या नीति बनाने का सुझाव दिया था। इसके बाद वर्ष 1976 में भारत ने पहली जनसंख्या नीति अपनाई थी।
➤ भारत सरकार ने एम. एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ दल गठित किया था। इसकी सिफारिश के आधार पर वर्ष 2000 में भारत ने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति अपनाई थी। भारत की इस नवीनतम जनसंख्या नीति की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) प्रति 1000 जीवित बच्चों पर शिशु मृत्यु दर 30 से कम करना।
(ii) प्रति 1 लाख बच्चों के जन्म पर मातृ मृत्यु 100 से कम करना।
(iii) प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य की देखभाल के लिए एक समुचित सेवा प्रणाली विकसित करना।
(iv) गर्भ निरोधक एवं स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित बुनियादी ढांचा सुदृढ़ करना।
(v) वर्ष 2010 तक 2.1 की ‘सकल प्रजनन दर’ (TFR) प्राप्त करना तथा वर्ष 2045 तक जनसंख्या स्थायित्व प्राप्त करना।
(vi) लड़कियों के विवाह की न्यूनतम आयु में वृद्धि करना।
(vii) एड्स का प्रसार रोकना और प्रजनन अंग संबंधी रोगों के प्रबंधन व ‘राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन’ (NACO) के बीच समन्वय स्थापित करना।
(vii) 80% प्रसव अस्पतालों, नर्सिंग होम इत्यादि में संपन्न कराना तथा इस कार्य हेतु प्रशिक्षित लोगों को नियुक्त करना।
(ix) प्रत्येक व्यक्ति को सूचना व परामर्श देना तथा गर्भ निरोधक संबंधित अनेक विकल्प उपलब्ध कराना।
(x) चौदह वर्ष की आयु तक के बच्चों के लिए स्कूली शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य बनाना।
(xi) बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या 20% से कम करना।
(xii) सभी बच्चों को टीका जनित प्रतिरक्षित उपलब्ध करना।
(xiii) जन्म, मरण, विवाह और गर्भ का 100% पंजीकरण सुनिश्चित करना।
(xiv) संक्रामक रोगों को नियंत्रित करना तथा प्रजनन और शिशु स्वास्थ्य सुविधाओं को घर-घर तक पहुंचाना।
(xv) एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित करना।
राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग
‘राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2000’ के अंतर्गत मई 2000 में एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग’ गठित किया गया था। इस आयोग के अंतर्गत एक ‘राष्ट्रीय जनसंख्या स्थिरता कोष’ की स्थापना भी की गई थी, लेकिन आगे इसे ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग’ को हस्तांतरित कर दिया गया था। इस आयोग की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है। इस आयोग के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं-
➤ राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के क्रियान्वयन की समीक्षा करना।
➤ राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की निगरानी करना तथा इससे संबंधित दिशा-निर्देश देना।
➤ इस जनसंख्या नीति हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण व अन्य विकास कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करना।
➤ इससे संबंधित कार्यक्रमों की योजना बनाने व उन्हें क्रियान्वित करते समय अंतर क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ावा देना।
➤ इस प्रकार भूपटल में उत्पन्न होने वाला किसी भी प्रकार के कम्पन को भूकम्पकहते है।
➤ समुद्र के अंदर उत्पन्न होने वाले भूकंप को सूनामी (Tsunami) कहते है।
➤ सूनामी जापानी शब्द है जिसका अर्थ बंदरगाह लहर होता है।
➤ विज्ञान की वह शाखा जिसमें भूकम्प का अध्ययन किया जाता है उसे सिस्मोलोजी (Seismology) कहते है।
➤ भूपटल के जिस बिंदु से भूकम्प प्रारंभ होती है। उसे भूकम्प केंद्र (Focus) कहते है।
➤ अधिकेंद्र-भूपटल के जिस बिंदु पर भूकम्प का झटका सबसे पहले अनुभव होता है उसे अधिकेंद्र कहते है।
➤ प्रघात (Shocks)-अधिकेंद्र पर भूकम्पीय तरंग के द्वारा अनुभव किया गया पहला भूकम्पीय झटका को प्रघात कहते है।
➤ जब भूकंप समाप्त हो जाता है तो भी कई दिनों तक हल्के भूकम्प के झटके महसूस किए जाते है उसे After Shockकहा जाता है।
➤ बिहार में औसतन प्रत्येक 17 वर्ष पर भूकम्प आता है।
➤ सिस्मोग्राफ: सिस्मोग्राफ भूकम्पीय तरंगों के प्रवृति को रेखांकन करने वाला यंत्र है।
➤ समभूकम्प रेखा: समान भूकम्पीय तीव्रता वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकम्पीय रेखाकहते है।
➤ सहभूकम्प रेखा: एक ही समय पर पहुँचने वाले भूकम्पीय तरंगों को मिलने वाली सरल रेखा को सह-भूकम्प रेखा कहते है।
भूकम्प के प्रकार
भूकम्प का वर्गीकरण दो आधार पर किया जाता है:-
(A) गहराई के आधार पर
(B) समय के आधार पर
गहराई के आधार पर भूकम्प तीन प्रकार के होते है-
(i) छिछला भूकम्प– फोकस 50 KM की गहराई तक होता है।
(ii) मध्यम भूकम्प– फोकस 50-250 KM के बीच
(iii) गहरा भूकम्प– फोकस 250-700 KM के बीच
(B) समय के आधार पर
समय के आधार पर भूकम्प दो प्रकार के होते है:-
(i) धीमा भूकम्प
(ii) अचानक भूकम्प
➤ धीमा भूकम्प की तीव्रता कम होती है लेकिन इसके झटके लम्बे समय तक अनुभव किये जाते है। ऐसे भूकम्प से ही वलित पर्वत तथा पठारों का निर्माण होता है।
➤ अचानक भूकम्प की तीव्रता अधिक होती है। इसके झटके अति उच्च समय तक अनुभव किये जाते है। इसके चलते इससे ज्वालामुखी पर्वत तथा ब्लॉक पर्वत का निर्माण होता है।
➤ विश्व में सर्वाधिक छिछले उदगम वाले भूकम्प होते हैं जिसका प्रभाव लम्बे समय तक होता है।
भूकम्प के कारण
भूकम्प क्यों आते है उन कारणों को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जा सकता है:-
(A) मानवीय कारण
(B) प्राकृतिक कारण
(A) मानवीय कारण :-
(i) परमाणु विस्फोट
(ii) मानव के द्वारा किया जा रहा खनन कार्य
(iii) बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण
(iv) पर्वतीय क्षेत्रों में किया जा रहा विकास कार्यक्रम जैसे- सड़क निर्माण, वन ह्रास इत्यादि।
(B) प्राकृतिक कारक:-
➤ ज्वालामुखी उदगार, मोड़दार एवं ब्लॉक पर्वत का निर्माण जब कभी होता है। भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या होती है।
भूकम्प आने से संबंधित प्राकृतिक कारणों की व्याख्या करने हेतु दो सिद्धान्त दिए गए है:-
(1) प्रत्यास्थ पुनश्चलन का सिद्धान्त (Elastic Rebond Theory)
➤ इस सिद्धांत को अमेरिकी वैज्ञानिक H.F. रीड ने दिया था।
➤ इनके अनुसार भुपटल प्रत्यास्थ चट्टानों से निर्मित है।
➤ जब इन चट्टानों पर बाहरी दबाव बल कार्य करता है तो चट्टानें फैलती है और जब दबाव हटता है तो चट्टानें सिकुड़ने के क्रम में ही भूकम्प उत्पन्न होता है।
➤ इन्होंने बताया कि पृथ्वी का भूपटल कई प्लेटों से निर्मित है।
➤ यही प्लेट जब क्षैतिज या उदग्र रूप से गति करते है तो भूकम्प उत्पन्न होते है।
➤ प्लेटों में सर्वाधिक भूकम्प प्लेट के किनारे अनुभव किये जाते है।
➤ भूकम्प के आधार पर प्लेट के किनारों को तीन भागों में बांटा गया है-
I. अपसरण सीमा
II. अभिसरण सीमा
III. संरक्षी सीमा
➤ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में यह बताया गया है कि प्लेटों में गति चार कारणों से उत्पन्न होती है:-
जैसे:-
(i) चन्द्रमा एवं ब्रहाण्डीय पिण्डों का आकर्षण बल
(ii) एक प्लेट के सापेक्ष में दूसरे प्लेट का 45° कोण पर झुका हुआ होना
(iii) पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल
(iv) दुर्बलमण्डल में उत्पन्न होने वाला संवहन तरंग
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त में उपरोक्त सभी कारणों को भूकम्प के लिए जिम्मेवार बताये गये है लेकिन इनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण संवहन तरंग है।
➤ जिन किनारों पर संवहन तरंग ऊपर की ओर उठकर फैलने की प्रवृति रखती है वहाँ पर अपसरण सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को अपसरण गति कहते है।
जैसे- अटलांटिक कटक के सहारे
➤ जब किसी प्लेट के नीचे संवहन तरंग बैठने की पवृति रखती है वहाँ पर अभिसरण सीमा (किनारा) का निर्माण होता है। अभिसरण किनारों के सहारे प्लेटों में अभिसरण गति उत्पन्न होती है।
➤ जब दो प्लेट आपस में समांतर रूप से रगड़ खाते है तो वैसे स्थानों पर संरक्षी सीमा का निर्माण होता है और प्लेटों में उत्पन्न होने वाले गति को संरक्षी गति कहते है।
➤ जापान, फिलीपींस, इंडोनेशिया जैसे द्वीप समूह अभिसारी सीमा पर अवस्थित है। यही कारण है कि यहाँ सबसे अधिक तीव्र वाले भूकम्प रिकॉर्ड किया जाता है।
इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के कारणों का सर्वाधिक वैज्ञानिक व्याख्या प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त द्वारा किया जाता है।
भूकम्प का वितरण
विश्व में मुख्यतः भूकम्प के तीन क्षेत्र है:-
(i) प्रशांत महासागर के चारों ओर-
विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ही आती है। यहाँ अधिकांश गहरे केंद्र वाले भूकम्प आते है।
(ii) मध्य महाद्वीपीय क्षेत्र-
यह क्षेत्र यूरेशियन प्लेट और इसके दक्षिण में स्थित भारतीय प्लेट तथा अफ्रीकन प्लेट के मध्य स्थित है। यहाँ मध्यम एवं छिछले किस्म के भूकम्प आते है।
(iii) मध्य अटलांटिक कटक एवं पूर्वी अफ्रीका के भ्रंश घाटी क्षेत्र-
अटलांटिक महासागर में अपसरण सीमा के सहारे भूकम्प आती है जिसका विस्तार उत्तर में आइसलैंड के थोड़ा ऊपर से दक्षिण में बोवेट द्वीप तक हुआ है।
भूकम्पीय तीव्रता एवं इसका मापन
➤ भूकम्प के आगमन के दौरान बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। इसी ऊर्जा का मापन भूकम्पीय तीव्रता कहलाता है।
➤ वैज्ञानिकों ने भूकम्पीय तीव्रता की मापन हेतु दो प्रकार के पैमाने का विकास किया है-
1. मार्सेली पैमाना
2. रिक्टर (Richter) पैमाना
मार्सेली पैमाना
➤ मार्सेली पैमाना का विकास फ्रांस के मार्सेली महोदय द्वारा किया गया था।
➤ इन्होंने इसे ज्ञानेन्द्रियों के अनुभव एवं विनाशकारी प्रभाव पर विकसित किया।
➤ इस पैमाने से न्यूनतम 1 और अधिकतम 12 इकाई तक भूकम्पीय तीव्रता का मापन किया जाता है।
रिचर पैमाना
➤ रिचर पैमाना का विकास 1835 ई० में सी.एफ. रिचर महोदय ने किया था।
➤ इसके अंतर्गत भूकम्पीय तीव्रता का मापन 1 से 9 इकाई तक किया जाता है। रिचर पैमाना में भूकम्पीय तीव्रता का मापन 10 के घात के रूप में होता है।
रिचर पैमाना पर तीव्रता
प्रभाव
1
केवल यंत्रों द्वारा अनुभव किया जाता है।
2
केवल अधिकेन्द्र के पास हल्का कम्पन होता है।
3
चट्टानों में सामान्य कम्पन होती है।
4
केन्द्र से 32 किमी० की त्रिज्या में भूकम्प अनुभव की जाती है।
5
अधिकेन्द्र से 5 हजार किमी० की दूरी तक भूकम्प अनुभव किया जाता है और पेड़-पौधे हिलने लगते हैं।
6
विनाश प्रारंभ हो जाता है और दीवारों में दरारें पड़ने लगती हैं।
7
दीवारें ध्वस्त हो जाती है, वृहत भूकम्प की स्थिति उत्पन्न होती है।
8
इसका प्रभाव विश्वव्यापी होती है, नदियाँ अपना मार्ग बदल लेती है।
9
सम्पूर्ण सर्वनाश (नदी, नाला, मकान) की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी।
➤ अगर रिचर स्केल पर भूकम्प तीव्रता 6.5 हो तो यह मानव के लिए विनाशात्मक साबित होता है।
भूकम्पीय तरंग एवं इसकी विशेषता
भूकम्प के दौरान कई प्रकार के प्रमुख एवं गौण तरंगों की उत्पति होती है:-
(A) प्रमुख तरंग
I. P तरंग
II. S तरंग
III. L तरंग
(B) गौण तरंग
I. P* तथा S*
II. Pg तथा Sg
(A) प्रमुख तरंग
P तरंग
➤ P तरंग को कई नामों से जानते है। जैसे: प्राथमिक तरंग, Pull & Push तरंग या अनुधैर्य तरंग।
➤ इसे ध्वनि तरंग से तुलना की जा सकती है क्योंकि यह ठोस, द्रव्य और गैस तीनों प्रकार के माध्यम से संचारित हो सकती है।
➤ इसकी गति 7.8 Km/Sec होती है।
➤ P तरंग भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे पहले पहुँचती है या अनुभव किया जाता है।
➤ इसकी उत्पत्ति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।
S तरंग
➤ S तरंग को द्वितीयक तरंग या अनुप्रस्थ तरंग कहते है।
➤ इसकी तुलना प्रकाश तरंग से की जा सकती है।
➤ यह तरंग तरल भाग में विलुप्त हो जाती है।
➤ भूकम्प रिकॉर्डिंग स्टेशन पर P तरंग की तुलना में S तरंग देरी से पहुंचती है।
➤ S तरंग की भी उत्पति भूकम्पीय केंद्र/फोकस से होती है।
➤ P तरंग अपने संचरण अक्ष के क्षैतिज जबकि S तरंग अपने संचरण मार्ग के लम्बवत गमन करती है।
➤ S तरंग की औसत गति 4.5 Km/Sec होता है।
L तरंग
➤ L तरंग को सतही तरंग (Surface Wave or Long Wave) भी कहा जाता है।
➤ L तरंगों की खोज H. D. Love ने की थी, इसलिए इन्हें Love Waves के नाम से भी जाना जाता है।
➤ L तरंग की उत्पति अधिकेंद्र (Epicentre) से होती है।
➤ L तरंग रिकॉर्डिंग स्टेशन पर सबसे देर से पहुँचती है।
➤ Lतरंग के कारण ही सर्वाधिक क्षति होती है।
➤ L तरंग की गति काफी अनियमित होती है।
भूकंपीय छाया क्षेत्र (Shadow Zone)
भूकंप लेखी यंत्र (सिस्मोग्राफ) पर दूर के क्षेत्रों से आने वाली भूकंपीय तरंग अंकित होती हैं, परन्तु कुछ ऐसे क्षेत्र भी हैं जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है, ऐसे क्षेत्र को भूकंपीय छाया क्षेत्र कहते है।
➤ भूकंप अधिकेंद्र से 105° और 145° के बीच का क्षेत्र जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग अंकित नहीं होती है। यह क्षेत्र दोनों प्रकार की तरगों के लिए छाया क्षेत्र (Shadow zone) हैं।
➤ 105° के परे पूरे क्षेत्र में ‘S’ तरंगें नहीं पहुँचतीं।
➤ ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र ‘P’ तरंगों के छाया क्षेत्र से अधिक विस्तृत है।
➤ भूकंप अधिकेंद्र के 105° से 145° तक ‘P’ तरंगों का छाया क्षेत्र एक पट्टी (Band) के रूप में पृथ्वी के चारों तरफ प्रतीत होता है।
➤ ‘S’ तरंगों का छाया क्षेत्र न केवल विस्तार में बड़ा है, वरन् यह पृथ्वी के 40 प्रतिशत भाग से भी अधिक है।
(B) गौण तरंग
P* तथा S* तरंग
➤ पृथ्वी का भुपटल मुख्यत: दो प्रकार के चट्टानों से निर्मित है:-
(1) ग्रेनाइट तथा
(2) बैसाल्ट चट्टान
➤ P* तथा S* ऐसा तरंग है जो केवल बैसाल्टिक चट्टानों से होकर गुजरती है।
➤ P* की गति=6-7 Km/Sec
➤ S* की गति=3-4 Km/Sec
➤ ये तरंग समुद्री भूपटल और महाद्वीपों के आंतरिक भागों में चलती है।
➤ इस तरंगों की खोज 1923 ई० में कोनार्ड महोदय के द्वारा किया गया था।
➤ इस तरंगों की खोज कोनार्ड ने टायर्न में आये भूकम्प के दौरान किया गया था।
Pg तथा Sg तरंग
➤ ये दोनों तरंगे ग्रेनाइट चट्टानों से होकर गुजरती है।
➤ इसका खोज जेफरीज महोदय ने 1909 ई० में क्रोएशिया (Croatia) के कुपा घाटी में आये भूकम्प के दौरान किया था।
➤ Pg तरंग की औसत गति =5.4 Km/Sec
➤ Sg तरंग की औसत गति =3.3 Km/Sec
➤ Pg & Sg एक ऐसी तरंग है जो केवल महाद्वीपीय भागों से होकर गुजरती है।
निष्कर्ष:-
इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूकम्प के दौरान अलग-अलग प्रकार के तरंगों की उत्पत्ति होती है जिनकी अपनी विषिष्टता होती है। इन्हीं विशिष्टताओं के आधार पर पृथ्वी के आंतरिक भागों के अध्ययन वैज्ञानिक तरीके से किया जाता है।
सूनामी (Tsunami)
➤ सुनामी समुद्र के नीचे भूकंप या ज्वालामुखी विस्फोट के कारण उत्पन्न होने वाली विनाशकारी लहरें हैं।
➤ “सुनामी” एक जापानी शब्द से लिया गया है , जिसका अर्थ है “बंदरगाह लहर”।
➤ ‘सुनामी’ शब्द वास्तव में दो शब्दों ‘सू’अर्थात ‘बंदरगाह’और ‘नामी’ अर्थात ‘विनाशकारी लहरें’से मिलकर बना है।
➤ सुनामी एक दीर्घ तरंग (Long wave) है जो समुद्र तल के समानांतर विशाल तरंगें (Giant waves) के रूप में संचरित होती है
➤ सुनामी की तरंग आवृत्ति (Wave Frequency) एवं तरंग आयाम (Wave Amplitude) में तट (Coast) की ओर निरंतर वृद्धि होती है।
➤ सुनामी लहरों के साथ जल की गति संपूर्ण गहराई तक होती है, इसलिए ये अधिक प्रलयकारी होती हैं।
➤ सुनामी का तरंग दैर्ध्य 160 किमी. तक देखा गया है, साथ ही इनकी गति अत्यधिक होती है जो कभी-कभी 650 किमी० प्रति घंटा भी देखी गई है।
➤ खुले सागरों में इन तरंगों की ऊँचाई अधिकतम 1 मी. की होती है, परंतु जब ये तटवर्ती उथले जल क्षेत्र में प्रवेश करती है तो इनकी ऊँचाई में अचानक असामान्य वृद्धि हो जाती है जिससे बहुत कम समय में ही भीषण विनाश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
➤ सुनामी लहरों की दृष्टि से प्रशांत महासागर सबसे संवेदनशील स्थिति में है। महासागरीय प्लेटों के अभिसरण क्षेत्र में ये सर्वाधिक शक्तिशाली होती हैं।
➤ इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 को हिंद महासागर के तल के नीचे उत्पन्न सुनामी लहरें भारतीय प्लेट के बर्मी प्लेट के नीचे क्षेपण (Subduction) का परिणाम था।
टेलीसुनामी (Teletsunami)
➤जब सुनामी लहरों का प्रसार तथा प्रभाव इतना अधिक व्यापक हो कि वे अपनी उत्पत्ति वाले समुद्री क्षेत्र को भी पार करते हुए हज़ारों मील दूर स्थित क्षेत्र तक को भी अपनी चपेट में ले लेता हो, तो इस सुनामी को टेलीसुनामी या मेगासुनामी या समुद्रपारीय सुनामी (Trans-oceanic tsunami) कहा जाता हैं।
➤1883 की क्राकाटोआ सुनामी और इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 की हिंद महासागर की सुनामी, 2021 की दक्षिणी अटलांटिक महासागर की सुनामी इत्यादि इसी प्रकार की सुनामी थी जिसका प्रभाव हजारों मील दूर के क्षेत्रों पर भी देखा गया था।
➤ इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप में 26 दिसंबर, 2004 की हिंद महासागर सुनामी का प्रभाव पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के तटीय भाग, मेडागास्कर और अफ्रीका महाद्वीप के पूर्वी व सुदूर दक्षिणी भाग तक देखा गया था।
भूकंप व सुनामी से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर
1. प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धान्त निम्नलिखित में से किसकी उत्पत्ति की व्याख्या करता है?
(a) ज्वालामुखी
(b) भूकम्प
(c) चक्रवात
(d) भूकम्प एवं ज्वालामुखी
(b) भूकम्प
2. भूकम्प की उत्त्पत्ति से सम्बन्धित प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया है?
(a) होम्स
(b) रीड
(c) जॉली
(d) डेली
(b) रीड
3. पृथ्वी की आन्तरिक संरचना की विश्वसनीय जानकारी प्राप्त करने का सबसे प्रमुख स्रोत है-
(a) भूकम्प विज्ञान
(c) ज्वालामुखी
(b) तापमान
(d) दबाव एवं घनत्व
(a)भूकम्प विज्ञान
4. भू-गर्भ में जिस स्थान पर भूकम्पीय तरंगों की उत्पत्ति होती है, उस स्थान को क्या कहा जाता है?
(a) अधिकेन्द्र
(b) भूकम्प अधिकेन्द्र
(c) भूकम्प केन्द्र
(d) इक्लोजाइट
(c) भूकम्प केन्द्र
5. भूकम्प-मूल (Focus) वह स्थान होता है जहाँ-
(a) धरातल पर भूकम्पीय लहरों का सर्वप्रथम ज्ञान होता है।
(b) जहाँ से भूकम्प की उत्पत्ति होती है।
(c) जहाँ से भूकम्प की उत्पत्ति के पश्चात् उसकी लहरें ठीक नीचे स्थित स्थान तक यात्रा करके पुनः वापस लौट आती है।
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
(b) जहाँ से भूकम्प की उत्पत्ति होती है।
6. अधिकेन्द्र (Epicentre) भूकम्प का एक बिन्दु है, जो सम्बन्धित है-
(a) पृथ्वी के अंदर भूकम्प के उद्गम स्थान से
(b) भूकम्प उद्गम केन्द्र के ऊपर भूपृष्ठीय बिन्दु से
(c) वह स्थान जहाँ भूकम्प का अनुभव किया जाता है।
(d) भू-पृष्ठ का वह बिन्दु जहाँ पहला झटका अनुभव किया जाता है।
(d) भू-पृष्ठ का वह बिन्दु जहाँ पहला झटका अनुभव किया जाता है।, (b) भूकम्प उद्गम केन्द्र के ऊपर भूपृष्ठीय बिन्दु से
7. धरातल के जिस स्थान पर सर्वप्रथम भूकम्प का अनुभव किया जाता है, कहलाता है-
(a) भूकम्प मूल
(b) भूकम्प अधिकेन्द्र
(c) भूकम्प केन्द्र
(d) इनमें से कोई नहीं
(b) भूकम्प अधिकेन्द्र
8. भूकम्प में धरातलीय तरंगें होती है-
(a) गौण तरंगें
(b) L तरंगे
(c) प्राथमिक तरंगें
(d) प्राथमिक एवं गौण तरंगें
(b) L तरंगे
9. निम्नलिखित में से कौन-सी भूकम्पीय तरंगें सर्वाधिक क्षति पहुँचाती है?
(a) प्राथमिक
(b) द्वितीयक
(c) दीर्घ पृष्ठीय
(d) क्षितिजीय
(c) दीर्घ पृष्ठीय
10. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(a) भूकम्प के कारण समान बर्बादी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को समभूकम्प रेखा कहा जाता है।
(b) समभूकम्प रेखा का आकार नियमित (Regular) होता है।
(c) उन स्थानों को मिलाने वाली रेखा जहाँ भूकम्प एक साथ आते हैं, सहभूकम्प रेखा कहलाती है।
(d) भूकम्पीय तरंगों को अंकित करने वाला यंत्र सिस्मोग्राफ कहलाता है।
(b) समभूकम्प रेखा का आकार नियमित (Regular) होता है।
11 . निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(a) रिक्टर स्केल भूकम्प की तीव्रता मापने का एक यंत्र है।
(b) रिक्टर स्केल एक लोगारिथमिक स्केल होता है।
(c) यह स्केल भूकम्प की ऊर्जा को मापता है।
(d) इनमें से कोई नहीं।
(d) इनमें से कोई नहीं।
12. अन्तः सागरीय भूकम्पों द्वारा उत्पन्न समुद्री लहरों को क्या कहा जाता है?
(a) सर्क
(b) सुनामी
(c) स्केल
(d) केम
(b) सुनामी
13. सुनामी का मुख्य कारण निम्नलिखित में से कौन है?
(a) ज्वालामुखी
(b) भूकम्प
(c) चक्रवात
(d) प्रतिचक्रवात
(b) भूकम्प
14. विश्व के सर्वाधिक (63% के लगभग) भूकम्प निम्न में से किस पेटी में आते हैं?
(a) परिप्रशान्त महासागरीय पेटी
(b) मध्य महाद्वीपीय पेटी
(c) मध्य अटलांटिक पेटी
(d) हिन्द महासागरीय पेटी
(a) परिप्रशान्त महासागरीय पेटी
15. भूकम्पों का प्रभाव महाद्वीपीय भागों के अतिरिक्त महासागरीय भागों पर भी पड़ता है और इससे महासागरों में भयंकर लहरें उत्पन्न होती है। इन लहरों को किस नाम से जाना जाता है?
(a) ज्वार भित्ति
(b) सीचेस लहरें
(c) सदाशिव
(d) सुनामी
(d) सुनामी
16. सुनामी किस भाषा का शब्द है?
(a) जर्मन
(b) पुर्तगाली
(c) जापानी
(d) चीनी
(c) जापानी
17. किस देश में भूकम्प से उत्पन्न विनाशकारी समुद्री तरंगों को सुनामी कहते हैं?
(a) मैक्सिको
(b) जापान
(c) ब्रिटेन
(d) न्यूजीलैंड
(b) जापान
18. तरल पदार्थों से होकर न गुजर सकने वाली भूकम्पीय लहर कौन-सी है?
(a) P-तरंगें
(b) L-तरंगें
(c) S-तरंगें
(d) इनमें से कोई नहीं
(c) S-तरंगें
19. रिक्टर स्केल मापता है-
(a) भूकम्प की तीव्रता
(b) सापेक्षिक आर्द्रता
(c) वर्षा की मात्रा
(d) ताप
(a) भूकम्प की तीव्रता
20. सिस्मोग्राफ किसे मापने के लिए काम में लाया जाता है?
(a) सागरीय तरंगों को
(b) ज्वार-भाटे को
(c) भूकम्पीय तरंगों को
(d) इनमें से कोई नहीं
(c) भूकम्पीय तरंगों को
21. भूकम्प का अध्ययन कहलाता है-
(a) सिस्मोलॉजी
(b) टेराटोलॉजी
(c) पीडोलॉजी
(d) आइकोनोलॉजी
(a) सिस्मोलॉजी
22. समान भूकम्पीय तीव्रता अर्थात् समान बर्बादी वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा को क्या कहा जाता है?
(a) समभूकम्प रेखा
(b) सहभूकम्प रेखा
(c) समताप रेखा
(d) समदाब रेखा
(a) समभूकम्प रेखा
23. किसी क्षेत्र के उन स्थानों को मिलाने वाली रेखा जहाँ भूकम्प एक साथ अनुभव किया जाता है, कहलाती है-
(a) समभूकम्प रेखा
(b) सहभूकम्प रेखा
(c) आइसोपाइक्निक रेखा
(d) आइसोगोनल रेखा
(b) सहभूकम्प रेखा
24. समभूकम्प रेखा (Iso Seismal Line) का आकार प्रायः होता है-
(a) नियमित
(b) अनियमित
(c) वृत्ताकार
(d) एकरेखीय
(b) अनियमित
25. भूकम्प मापी यंत्र के अनुसार एक वर्ष की अवधि में सामान्यतः कितने बार भूकम्प आते हैं?
(a) 5000 से 7000
(b) 8000 से 10000
(c) 10000 से 12000
(d) 1200 से 15000
(b) 8000 से 10000
26. अग्नि वलय (Circle of Fire) प्रशान्त महासागर के उस विशाल क्षेत्र को कहते हैं जहाँ कुल भूकम्प का… .आता है।
(a) 68%
(b) 40%
(c) 30%
(d) 25%
(a) 68%
27. भूकम्पीय तरंगों का मापन निम्नलिखित में से किस यंत्र द्वारा किया जाता है?
(a) बैरोग्राफ
(b) क्लाइमोग्राफ
(c) सीस्मोग्राफ
(d) इर्गोग्राफ
(c) सीस्मोग्राफ
28. निम्नलिखित में से कौन-सी घटना धरातल पर नहीं घटित होती है?
ज्वालामुखी क्रिया दो शब्दों सेे मिलकर बना है। प्रथम ज्वालामुखी, द्वितीय क्रिया। पुनः ज्वालामुखी शब्द को भी दो भागों में बांटा जा सकता है:- प्रथम ज्वाला द्वितीय मुखी।
➤ जब पृथ्वी के भूपटल में किसी भी प्रकार का छिद्र का निर्माण होता है तो उसे मुख कहते है, जब उस मुख से पृथ्वी के दुर्बल मण्डल का मैग्मा पदार्थ जल एवं बाष्प बाहर की ओर निकलता है तो उसे ज्वाला कहते है। ज्वाला और मुख को सम्मिलित रूप से ज्वालामुखी कहते है।
➤ क्रिया का तात्पर्य विभिन्न प्रकार के प्रक्रियाओं से है। ज्वालामुखी उदगार में निकलने वाला पदार्थ भुपटल के ऊपर निकलने का प्रयास करता है या निकल जाता है पुनः निकलकर अनेक प्रकार के स्थलाकृतियों को जन्म देता है। इस सम्पूर्ण परिघटना को ही ज्वालामुखी क्रिया (Volcanism) कहा जाता है।
➤ ज्वालामुखी क्रिया शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वारसेस्टर महोदय ने किया था। उन्होनें ज्वालामुखी क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि “ज्वालामुखी क्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है कि जिसमे गर्म पदार्थ की धरातल के तरफ या धरातल के ऊपर आने वाली सभी प्रक्रिया को शामिल किया जाता है।”
➤ परिभाषा से स्पष्ट होता है कि ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता है- प्रथम आन्तरिक ज्वालामुखी की क्रिया दूसरा बाह्य ज्वालामुखी की क्रिया।
➤ आन्तरिक ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर धरातल के नीचे ही ठोस होने की प्रवृत्ति रखता है जबकि बाह्य ज्वालामुखी क्रिया में गर्म पदार्थ धरातल के ऊपर प्रकट होकर अनेक स्थलाकृतियां को जन्म देता है।
➤ ज्वालामुखी क्रिया में निकलने वाला पदार्थ- ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकलने वाला पदार्थ को तीन श्रेणी में विभाजित करते है:-
(i) गैस तथा जलवाष्प
(ii) विखण्डित पदार्थ
(iii) लावा पदार्थ
(i) गैस तथा जलवाष्प
➤ सर्वप्रथम जब ज्वालामुखी का उदगार होता है तो गैस एवं जलवाष्प धरातल को तोड़कर सबसे पहले तेजी से बाहर निकलते है।
➤ इसमें जलवाष्प की मात्रा सर्वाधिक होती है।
➤ सम्पूर्ण गैस का 60 से 90 प्रतिशत भाग जलवाष्प का होता है।
➤ इसमें जलवाष्प के अलावा कार्बन डाई ऑक्साइड (CO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NO2), सल्फर डाई ऑक्साइड (SO2), जैसे गैस भी मौजूद रहते है।
(ii) विखण्डित पदार्थ
➤ विखण्डित पदार्थ में बारीक धूलकण से लेकर बड़े बड़े चट्टानी टुकड़ों को शामिल किया जाता है।
➤ इसका मुख्य स्रोत भूपटलीय चट्टान होता है।
➤ जब गैस निलकना मंद पड़ता है तो ये विखण्डित चट्टानें धरातल पर पुनः वापस आने लगते है जिससे ऐसा लगता है कि अकाश से बम्ब बरसाए जा रहे है।
➤ ज्वालामुखी उदगार के दौरान अकाश से नीचे गिरने वाले बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़ों को“ज्वालामुखी बम्ब” कहा जाता है।
➤ इसका व्यास कुछ इंच से लेकर कुछ फीट तक होता है।
➤ जब विखण्डित चट्टानों के आकार मटर के दाना या अखरोट के आकार का होता है तो उसे‘लैपिली’ कहते है।
➤ जब टुकड़ों का आकार लैपिली से थोड़े छोटे हो तो उसे स्कोरिया कहते है।
➤ जब विखण्डित चट्टानों के आकार अत्यंत बारीक होता है तो उसे ज्वालामुखी राख एवं धूलकण कहते है।
➤ जब लावा का जमाव का आकार त्रिकोण के समान होता है तो उसे ब्रेसिया कहा जाता है।
(iii) लावा पदार्थ
➤ ज्वालामुखी उद्गार के दौरान सबसे अंत में लावा या मैग्मा पदार्थ बाहर निकलता है।
➤ लावा पदार्थ का स्रोत दुर्बलमण्डल में मिलने वाला मैग्मा चैम्बर या ‘बेनी ऑफ जोन’होता है।
➤ ये लावा रासायनिक दृष्टि से दो प्रकार के होते है- प्रथम अम्लीय लावा तथा द्वितीय क्षारीय लावा।
➤ अम्लीय लावा का रंग पीला भार में हल्का लेकिन गाढ़ा होता है। अर्थात इसमें सिलिका की मात्रा अधिक होती है। जिसके कारण अति उच्च तापमान पर पिघलता है।
➤ क्षारीय लावा का रंग गहरा तथा काला होता है। इसमें सिलिका की मात्रा कम होने के कारण शीघ्र पिघलने की क्षमता रखता है, यह पतला और शीघ्र जमकर ठोस रूप धारण करने वाला होता है।
➤ जब लावा पदार्थ पानी के अंदर जमकर ठोस हो जाता है तो उसे ‘टफ(Tuff)’कहते है
➤ जब लावा पदार्थ धरातल के ऊपर आकर ठोस तथा छिद्रदार हो जाता है तो उसे ‘प्यूमिस (Pumiss)’ कहते है।
ज्वालामुखी उदगार के कारण
ज्वालामुखी उदगार के चार कारण है-
(1) भूगर्भ में ताप का अधिक होना,
(2) अत्यधिक ताप तथा दबाव के कारण लावा की उत्पति
(3) गैस तथा वाष्प की उत्पति,
(4) लावा पदार्थ का ऊपर की ओर आना।
1. भूगर्भ में ताप की वृद्धि-
➤ भूपटल के नीचे की ओर जाने पर प्रति 32 मीटर पर 1℃ तापमान बढ़ जाता है। इस कारण पृथ्वी के आन्तरिक भाग का तापमान अत्यधिक होता है।
➤ तापमान में बढ़ोतरी होना पृथ्वी के आन्तरिक भागों में रेडियोसक्रिय पदार्थों के उपस्थिति का होना बतलाया जाता है।
➤ पृथ्वी के अंदर तापमान बढ़ने से चट्टानें पिघल जाती है और पिघलकर हल्की हो जाती है। यही पिघला हुआ पदार्थ धरातल को तोड़कर बाहर निकलता है या भूपटल के नीचे ही ठंडा हो जाता है तो ज्वालामुखी उत्पन्न होता है।2. अत्यधिक ताप एवं दबाव के कारण लावा की उत्पति-
➤ पृथ्वी के धरातल से ज्यों-ज्यों पृथ्वी के केन्द्र की ओर जाते है त्यों-त्यों पृथ्वी के दबाव में बढ़ोतरी होती जाती है।
➤ ज्यों-ज्यों दबाव बढ़ता है त्यों-त्यों तापमान में बढ़ोतरी होती जाती है।
➤ इसी तापमान की बढ़ोतरी से चट्टानें पिघलकर मैग्मा पदार्थ का निर्माण करती है।
➤ यह मैग्मा पदार्थ जब अपने स्रोत क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करता है तो ज्वालामुखी का उदगार होता है।
3. गैस तथा वाष्प की उत्पति-
➤ ज्वालामुखी उदगार के समय कई तरह की गैस एवं जलवाष्प निकलती है।
➤ ज्वालामुखी गैसों की उत्पति के विषय में उनेेेक मत प्रचलित है। जैसे- जब भूमिगत जल रिसकर पृथ्वी के दुर्बलमण्डल में पहुंच जाते है तो अत्यधिक ताप के कारण बड़े पैमाने पर गैस तथा जलवाष्प का निर्माण होता है।
➤ दूसरे मत के अनुसार वर्षा जल जब संरोधी चट्टानों के सहारे धरातल के अंदर पहुंचते है तो भी बड़े पैमाने पर गैस एवं जलवाष्प का निर्माण होता है। भूपटल के नीचे निर्मित ये जलवाष्प एवं गैस ही भूकम्पीय उदगार को जन्म देते है।
4. लावा पदार्थ का ऊपर की ओर अग्रसर होना-
➤ पृथ्वी के अंदर स्थित दुर्बलमण्डल में मैग्मा पदार्थ स्थायी रूप से मौजूद है।
➤ दुर्बलमण्डल के चारों ओर स्थलमण्डल अवस्थित है।
➤ जब स्थलमण्डल में पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन या भूकंप या किसी कारण वश स्थलमण्डल कमजोर पड़ता है तो स्वत: मैग्मा पदार्थ धरातल से बाहर निकलने का प्रयास करते है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देते है।
➤ प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त ज्वालामुखी उदगार की व्याख्या करने वाला सबसे सटीक संकल्पना है। इस संकल्पना के अनुसार पृथ्वी अनेक प्लेटों से निर्मित है।
➤ ये प्लेट संवहन तरंगों के कारण हमेशा गतिशील रहते है।
➤ इन प्लेटों में तीन प्रकार के सीमा का निर्माण होता है:-
I. निर्माणकारी सीमा या अपसरण सीमा
II. विनाशकारी या अभिसरण सीमा
III. संरक्षी सीमा
➤ विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के प्रमाण इन्हीं सीमाओं के सहारे मिलते है।
➤ अपसरण सीमा में उठते हुए संवहन तरंग के कारण दो प्लेटें एक दूसरे से दूर खिसकती है जिससे लम्बे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से मैग्मा चैंबर का लावा पदार्थ बाहर निकलता है और ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है। मध्य अटलांटिक कटक के सहारे इसी प्रक्रिया से ज्वालामुखी का उदगार हो रहा है।
➤ विश्व के लगभग 15 प्रतिशत ज्वालामुखी रचनात्मक प्लेट किनारों के सहारे पाये जाते हैं।
➤ विश्व के लगभग 80 प्रतिशत ज्वालामुखी विनाशी प्लेट किनारों के सहारे पाये जाते हैं।
➤ इनके अलावा कुछ ज्वालामुखी का उद्भेदन प्लेट के आन्तरिक भाग में भी होता है।
➤ विनाशात्मक प्लेट सीमा का निर्माण नीचे गिरते हुए संवहन तरंगों के कारण होता है।
➤ प्रशान्त महासागर के चारों ओर इस प्रकार का सीमा का निर्माण हुआ है।
➤ विनाशात्मक प्लेट सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले महासागरीय प्लेट कम घनत्व वाले महाद्वीपीय प्लेट के अंदर प्रविष्ट करने की प्रवृति रखते है।
➤ महासागरीय प्लेट का नीचे की ओर प्रक्षेपित भाग पिघलकर “बेनी ऑफ जोन” का निर्माण करते है।
➤ बेनी ऑफ जोन का ही मैग्मा पदार्थ धरातल से ऊपर आकर ज्वालामुखी उदगार को जन्म देता है।
➤ कभी-कभी संरक्षी सीमा के सहारे भी ज्वालामुखी का उदगार होता है- जैसे जापान के होंशु द्वीप के सहारे दो महासागरीय प्लेट आपस में रगड़ खा रहे है। एक प्लेट जापान सागर प्लेट कहलाता है तो दूसरा प्लेट प्रशान्त महासागरीय प्लेट कहलाता है।
➤ प्रशान्त महासागरीय प्लेट का सापेक्षिक घनत्व अधिक होने के कारण जापान सागर प्लेट के नीचे प्रक्षेपित हो गया है और होन्शु द्वीप के नीचे ‘बेनी ऑफ जोन’ का निर्माण हुआ है।
➤ यहां जापान सागर प्लेट स्थिर है जबकि प्रशांत प्लेट ही गतिशील है।
➤ इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि प्लेट टेक्टोनिक संकल्पना ज्वालामुखी उदगार का व्याख्या करने वाला सबसे सटीक मत है।
ज्वालामुखी क्रिया का प्रकार
ज्वालामुखी क्रिया दो प्रकार का होता है-
A. केंद्रीय उदगार वाले ज्वालामुखी क्रिया:-
➤ इस प्रकार के उदगार में भूपटल में एक सँकरा छिद्र का निर्माण होता है और इन्ही छिद्रों के सहारे ज्वालामुखी पदार्थ बाहर की ओर निकलते है।
➤ इस प्रकार के उदगार में मुख का व्यास कुछ 100 फीट से अधिक नहीं होता है।
➤ मुख का आकार लगभग गोल होता है। जिससे गैस, लावा एवं विखण्डित पदार्थ अत्यधिक भयंकर विस्फोट के साथ बाहर निकलते हैं तथा आकाश में काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते हैं। ऐसे उदगार को ही केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार कहते है।
➤ इस प्रकार का उदगार काफी विनाशकारी होता है। उदगार के समय भयंकर भूकम्प आती है।
➤ केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार को भी चार भागों में बांटा गया है:-
1. हवाईतुल्य ज्वालामुखी उदगार
2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार
3. वोल्केनियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार
4. पिलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार
1. हवाई तुल्य ज्वालामुखी उद्गार-
➤ इस प्रकार का ज्वालामुखी का उद्गार काफी शांत तरीके से होता है। क्योंकि इसमें निकलने वाला मैग्मा पदार्थ काफी पतला तथा गैसों की मात्रा कम होती है। इस कारण विस्फोट तीव्र नहीं होता है।
➤ इसमें निकलने वाला विखण्डित पदार्थ नगण्य होता है।
➤ उद्गार के समय लावा के छोटे-छोटे लाल पिंड गैसों के साथ ऊपर उछाल दिए जाते है जिसे हवाई द्वीप के निवासी “अग्नि देवी पिलीकेश राशि” कहते है।
➤ इस तरह का उद्गार खासकर हवाई द्वीप पर देखने को मिलता है, इसीलिए इसे हवाईयन प्रकार का ज्वालामुखी कहते है।
2. स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उद्गार–
➤ हवाईयन के तुलना में ये ज्यादा विस्फोटक होता है।
➤ इसमें तरल लावा पदार्थ एवं अन्य विखण्डित पदार्थ उसके तुलना में अधिक निकलते है।
➤ उदगार के समय विखण्डित पदार्थ काफी ऊँचाई पर चले जाते है और जाकर पुनः क्रेटर में गिरते रहते है।
➤ इस प्रकार का उदगार इटली के लिपारी द्वीप पर स्थित स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी में पाया जाता है, इसीलिए इसे स्ट्राम्बोली तुल्य ज्वालामुखी उदगार कहते है।
3. वोल्केनियन ज्वालामुखी उदगार–
➤ इस प्रकार का उदगार काफी भयंकर एवं विस्फोटक होता है।
➤ इससे निकलने वाला लावा काफी चिपचिपा एवं लसदार होता है। जिसके कारण दो उदगार के बीच यह ज्वालामुखी छिद्र पर जमकर ढक देता है। जिसके कारण ज्वालामुखी नली में बड़ी मात्रा में गैस एवं जलवाष्प जमा हो जाते है जब विस्फोट होता है तो काफी तीव्रता के साथ बाहर निकलते है।
➤इसमें गैस बाहर निकलने के बाद यह आसमान में फूलगोभी के समान दिखाई देता है।
➤इसका नामांकरण लीपारी द्वीप पर स्थित वोल्केनो पर्वत के नाम पर किया गया है।
4.पीलियन तुल्य ज्वालामुखी उदगार-
➤ यह उदगार सबसे अधिक विस्फोटक एवं भयंकर होता है।
➤ इसमें निकलने वाला लावा सबसे अधिक चिपचिपा एवं लसदार होता है।
➤ इसमें विस्फोट के समय काफी तीव्रता से आवाज उत्पन्न होता है।
➤ 8 May,1902 ई० को वेस्टइंडीज में स्थित पिल्ली ज्वालामुखी के भयंकर विस्फोट के आधार पर इसे पीलियन ज्वालामुखी उदगार कहते है।
➤ 1883 में हुआ क्राकातोआ विस्फोट (जावा और सुमात्रा द्वीप के बीच में) पीलीयन प्रकार का विस्फोट था। यह अब तक का सबसे भयंकर ज्वालामुखी विस्फोट का उदाहरण है।
कुछ विद्वान एक अन्य प्रकार केविसुवियस तुल्य ज्वालामुखी उदगारभी मानते है।
➤ इस प्रकार के उदगार का पहला अध्ययन प्लिनी (इटली) ने किया था, इसलिए इसे प्लिनियन प्रकार का ज्वालामुखी उद्गार भी कहते है।
➤ यह भी काफी विस्फोटक होता है लेकिन इसमें लावा पदार्थ काफी ऊँचाई तक पहुंच जाते है और ज्वालामुखी बादल का आकार गोलाकार हो जाता है।
(B) दरारी उदभेदन वाले ज्वालामुखी–
➤ जब ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान गैस की मात्रा कम और लावा की मात्रा अधिक होती है तो भूपटल में दरार का विकास होता है और उससे लावा निकलकर ठोस होने की प्रवित्ति रखती है तो इसे ही दरारी उदभेदन वाले ज्वालामुखी कहते है।
➤ इससे निकलने वाला लावा प्रायः क्षारीय (Basic) प्रकार का होता है।
➤ कोलम्बिया का पठार (USA), दक्कन का पठार दरारी उदगार के प्रमुख उदाहरण है।
ज्वालामुखी स्थलाकृति
ज्वालामुखी क्रिया से मुख्यत: दो प्रकार के स्थलाकृति का निर्माण होता है।
1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति और
2. बाह्य ज्वालामुखी स्थलाकृति।
1. आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति-
➤जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर भूपटल के नीचे ही ठंडा होने की प्रवृति रखता है, तब उससे आन्तरिक ज्वालामुखी स्थलाकृति का निर्माण होता है। जैसे–
➤जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर लम्बत ठोस होता है तो डाइक, क्षैतिज ठोस होता है तो सिल, जब उत्तल दर्पण के समान ठोस होता है तोलैकोलिथ, जब अवतल दर्पण के समान ठोस होता है तो लोपोलिथ, जब तरंग के समान ठोस होता है तो फैकोलिथस्थलाकृति का निर्माण होता है।
➤इसी तरह जब मैग्मा पदार्थ अपने स्रोत क्षेत्र से ऊपर उठकर एक गुम्बद के समान ठोस हो जाते है तो उससे बैथोलिथ का निर्माण होता है।
2. बाह्य स्थलाकृति-
जब गर्म पदार्थ भूपटल को तोड़कर बाहर निकलती है तो निम्नलिखित स्थलाकृति का निर्माण करते है:-
(i) क्रैटर- वैसा ज्वालामुखी छिद्र जिसका व्यास कम हो तथा समय-समय पर लावा निकलता रहता हो उसे क्रैटर कहते है,
(ii) कोल्डेरा-जिस ज्वालामुखी के छिद्र का व्यास बहुत अधिक हो तथा लावा निकलना बंद हो गया हो तो उसे कोल्डेरा कहते है।
➤अमेरिका का ओरेगन झील और भारत का लोनार झील क्रैटर का उदाहरण है जबकि किलिमंजारो पर्वत के ऊपर तथा भारत के पुष्कर झील कोल्डेरा का उदाहरण है।
लुनार झील
पुष्कर झील
(iii) सोल्फतारा और धुँआरा-जब ज्वालामुखी उदगार के बाद लावा निकलना बन्द हो जाता है तो लम्बे समय तक गैस एवं जलवाष्प निकलते रहते है तो उसेधुँआरा कहते है लेकिन जिस धुँआरे में गंधक की मात्रा अधिक होती है तो उसे सोल्फतारा कहते है।
➤अलास्का के कटमई ज्वालामुखी के पास 10000 (दस हजार) धुँआरों की घाटी, न्यूजीलैण्ड के प्लेनेटी के खाड़ी में व्हाइट टापू का धुँआरा, ईरान में कोह सुल्तान का धुँआरा का विकास हुआ है।
(iv) गीजर– यह एक ऐसी ज्वालामुखी स्थलाकृति है जिसमें भिन्न-भिन्न समयांतराल पर गर्म जलवाष्प फव्वारे के रूप में बाहर निकलते है।
➤इसका सबसे अच्छा उदाहरण USA के वायोमिंग राज्य में स्थित ओल्डफेथफुल गीजर है।
➤इसी तरह आइसलैंड केद ग्रेट गीसिर और न्यूजीलैंड के वायमान्यू गीजर प्रसिद्ध है।
(v) गर्म जल के सोते– यह एक ऐसी ज्वालामुखीय स्थलाकृति है, जिसके मुख से गर्म पानी बाहर निकलता रहता है। जैसे- राजगीर का सूर्य कुंड, नानक कुंड, हजारीबाग का सूर्य कुंड, सीताकुंड और मुंगेर का सीताकुंड प्रसिद्व है।
(vi) ज्वालामुखी पठार एवं मैदान-दरारी ज्वालामुखी उदगार के समय पर्याप्त मात्रा में क्षारीय लावा धरातल पर प्रकट होकर ठंडा हो जाते है और पठार जैसी स्थलाकृति का निर्माण करते है।
➤भारत का दक्कन का पठार, USA का कोलम्बिया का पठार, इथोपिया का पठार और अनातोलिया का पठार इसका उदाहरण है।
(vii) ज्वालामुखी पर्वत- जब केंद्रीय ज्वालामुखी उदगार होती है तो उससे पर्याप्त मात्रा में अम्लीय लावा बाहर की ओर निकलती है जो काफी गाढ़ा होता है। इनके जमाव से निर्मित पर्वतीय स्थलाकृति को ज्वालामुखी पर्वत कहते है। ज्वालामुखी पर्वत तीन प्रकार का होता है।
1. सक्रीय/जीवित ज्वालामुखी पर्वत-
वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिसके क्रेटर से वर्त्तमान समय में भी मलवा बाहर निकल रहा हो। विश्व में कुल 500 जीवित ज्वालामुखी पर्वत है। जैसे– इटली का एटना, स्ट्रोम्बोली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। “स्ट्रोम्बोली को भूमध्यसागर का प्रकाश स्तम्भ”कहते है।
2. शांत ज्वालामुखी पर्वत-
जब ज्वालामुखी का उदगार पूर्णतया समाप्त हो गया हो या भविष्य में भी उदगार की कोई संभावना न हो, उसे शांत या मृत ज्वालामुखी कहते है। जैसे– इरान का कोह-सुल्तान, म्यंनमार का माउंट पोपो मृत ज्वालामुखी के उदाहरण है।
3. प्रसुप्त ज्वालामुखी पर्वत-
वैसा ज्वालामुखी पर्वत जिनके क्रेटर से वर्तमान समय में लावा का उत्सर्जन नहीं हो रहा हो लेकिन भविष्य में लावा का उत्सर्जन की पूरी संभावना हो, उसे प्रसुप्त या सुषुप्त ज्वालामुखी पर्वत कहते है। जैसे- इटली का विसुवियस, जावा व सुमात्रा के मध्य क्राकाटोवा, इक्वेडोर का चिम्बराजों और चिली का एकांकागुआ इत्यादि।
(viii) शंकु-केन्द्रीय ज्वालामुखी उदगार के दौरान निकले विखण्डित पदार्थों के निक्षेपण से शंकु का निर्माण होता है। शंकु कई प्रकार का होता है। जैसे:-
1. सिंडर शंकु
जैसे – म्यांमार का प्यूमा शंकु
2. मिश्रित शंकु
जैसे- जापान का फ्यूजियामा
3. सैटेलाइट शंकु
सैटेलाइट शंकु
जैसे- जापान का फ्यूजियामा
विश्व में ज्वालामुखी का वितरण
विश्व में ज्वालामुखी वितरण का एक निश्चित क्रम है जिसे नीचे की शीर्षक में चर्चा की जा रही है।
1. परिप्रशान्त मेखला के सहारे मिलने वाला ज्वालामुखी–
यह मेखला प्रशांत महासागर के सहारे चारों ओर स्थित है, इसे“प्रशांत अग्निवलय”के नाम से भी जानते है। विश्व में सर्वाधिक ज्वालामुखी इसी क्षेत्र में मिलते है। जैसे जापान का फ्यूजियामा, फिलीपींस का माउंट टाल, USA का माउंट सस्ता, इक्वेडोर का कोटोपैक्सी और चिम्बरजो, अर्जेंटीना का एकांकागुआ, कनाडा का माउंट रेनजल इत्यादि।
विश्व के अधिकांश ऊँचे ज्वालामुखी पर्वत एवं चोटियाँ इसी मेखला के सहारे मिलती है।
2. मध्य महाद्वीपीय पेटी:-
इस पेटी का विस्तार पूर्व में प्रशांत महासागर से लेकर पश्चिम में अटलांटिक महासागर के केनारी द्वीप तक हुआ है। यह हिमालय और आल्पस पर्वत से होकर गुजरती है। यह प्लेट अभिसरण का क्षेत्र है। हिमालय क्षेत्र में बाहरी ज्वालामुखी का प्रमाण मिलने की पूरी-पूरी संभावना है। जबकि इसी पेटी में स्थित भूमध्यसागरीय क्षेत्र में अनेक जीवित एवं प्रसुप्त ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है। जैसे- इटली का विसुवियस, स्ट्राम्बोली, एटना, एल्बुर्ज, ईरान का कोह-सुल्तान इत्यादि।
3. मध्य अटलांटिक कटक पेटी:
यह पेटी अटलांटिक महासागर के मध्य भाग में उत्तर से दक्षिण दिशा से होकर गुजरती है। यह प्लेट अपसरण का क्षेत्र है। यहाँ पर लम्बे दरार का निर्माण हुआ है। जिससे बैसाल्टिक लावा बाहर निकलता है और ठंडा होकर मध्य अटलांटिक कटक को जन्म दिया है। जैसे- आइसलैंड का माउंट हेकला, माउंट लोकी, सक्रिय ज्वालामुखी है, जो मध्य अटलांटिक पेटी में ही पड़ते है।
4. अन्य क्षेत्र:-
विश्व के कई ऐसे छोटे-छोटे क्षेत्र है जहाँ पर ज्वालामुखी उदगार का प्रमाण मिलता है। जैसे- अफ्रीका के पूर्वी भाग में निर्मित महान भ्रंश घाटी के सहारे तंजानिया का किलिमंजारो, केन्या का माउंट केनिया पर्वत मिलते है। इसी तरह क्रिटैशियस काल में हुए लावा उदगार से दक्कन के पठार पर ज्वालामुखी का प्रमाण मिलता है तथा अंडमान एवं निकोबार में बैरन (सक्रिय) एवं नरकोंडम (प्रसुप्त) द्वीप ज्वालामुखी के ही उदहारण है।
अतः उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी के क्षेत्र प्लेट के किनारे पर अवस्थित है।
➤विश्व के प्रमुख सक्रिय (Active) ज्वालामुखी
क्रम
नाम
देश
ऊँचाई (मीटर में)
1.
कोटापैक्सी
इक्वाडोर
5897
2.
क्लूचेवस्काया
रूस
4750
3.
मौनालोआ
हवाई द्वीप (USA)
4170
4.
कैमरून
कैमरून
4070
5.
इरेबस (माउन्ट एर्बुस)
रॉस द्वीप, अंटार्कटिका
3795
6.
एटना
सिसली, इटली
3340
7.
सेंट हेलेंस पर्वत
USA
2530
8.
किलाउएला
हवाई द्वीप (USA)
1277
9.
स्ट्रोम्बोली
इटली (लिपारी द्वीप /भूमध्य सागर)
925
10.
बैरेन द्वीप
अंडमान-निकोबार (भारत)
354
➤विश्व के प्रमुख सुषुप्त (Dormant) ज्वालामुखी
क्रम
नाम
देश
ऊँचाई (मीटर में)
1.
विसुवियस
इटली (नेपल्स की खाड़ी)
1277
2.
क्राकाटाओ
सुमात्रा व जावा द्वीप के मध्य, इंडोनेशिया
110
3.
नारकोंडम
अंडमान-निकोबार (भारत)
710
4.
मेयाना
फिलीपींस
2,463
5.
फ्यूजीयामा
जापान
3776
➤विश्व के प्रमुख मृत (Dead or Extinct) ज्वालामुखी
क्रम
नाम
देश
ऊँचाई (मीटर में)
1.
मौना केआ
हवाई द्वीप (USA)
4,207
2.
माउंट फूजी
जापान
3,776
3.
किलीमंजारो
केन्या (अफ्रीका)
5,895
4.
देमबंद व कोह सुल्तान
ईरान
5,610 व 2334
5.
चिम्बराजो
इक्वेडोर
6,263
6.
पोपा
म्यांमार
1,518
7.
एकान्कागुआ (एंडीज पर्वतमाला )
अर्जेंटीना
6,961
➤महाद्वीपों की सर्वोच्च ज्वालामुखी चोटियाँ
क्रम
चोटी
पर्वत श्रेणी
महाद्वीप
देश
ऊँचाई (मीटर में)
1.
ओजोस डेल सलाडो
एंडीज
दक्षिण अमेरिका
चिली /अर्जेंटीना
6,893
2.
किलीमंजारो
किलिमंजारो
अफ्रीका
तंजानिया
5,895
3.
एल्ब्रस
काकेशस
यूरोप
रूस
5,642
4.
पिको डे ओरिजाबा
ट्रांसमेक्सिकन ज्वालामुखी बेल्ट
उत्तरी अमेरिका
मेक्सिको
5,636
5.
देमबंद
एल्बोर्ज
एशिया
ईरान
5,610
6.
माउन्ट गिलुवे
सदर्न उच्च भूमि
प्रशांत ओशिनिया, आस्ट्रेलिया
पापुआ न्यूगिनी
4,367
7.
माउन्ट सिडले
एक्जीक्यूटिव कमेटी श्रेणी
अंटार्कटिका
4,285
➤मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का प्रभाव:
मानवीय क्रियाकलापों कोज्वालामुखी सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह से प्रभावित करता है।
1. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का सकारात्मक प्रभाव:
मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखियों के सकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-
➤ज्वालामुखी से बहुत सारे नए भू-आकृतियों का निर्माण होता है। जैसे- क्रेटर और काल्डेरा झीलें, लावा मैदान, गेसर, ज्वालामुखीय पठार और ज्वालामुखी पर्वत।
➤ यह दुर्बलमंडल (Asthenosphere) से सतह पर सोना, लोहा, निकेल और मैग्नीशियम जैसे मूल्यवान तत्व को पृथ्वी के सतह पर लाता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग का सोना और कनाडा में सडबरी का निकेल निक्षेप ज्वालामुखी निक्षेपण के उदाहरण हैं।
➤आग्नेय शैल लावा के ठंडा होने के बाद बनता है, जिसका उपयोग निर्माण जैसी विभिन्न गतिविधियों के लिए किया जाता है।
➤ज्वालामुखी हमें उपजाऊ भूमि प्रदान करते हैं। ज्वालामुखी की धूल और राख का जमाव भूमि को उपजाऊ बनाता है। उदाहरण के लिए, दक्कन ट्रैप की काली मिट्टी और जावा द्वीपों की उपजाऊ भूमि ज्वालामुखी द्वारा बनाई गई है।
➤यह सुंदर दृश्य भी बनाता है और जिससे यह पर्यटकों को आकर्षित करता है।
➤यह पृथ्वी के आंतरिक भाग के बारे में भी बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है।
➤यह टेक्टोनिक प्लेट सीमाओं और प्लेटों की गति की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करता है।
➤यह भूतापीय ऊर्जा का एक संभावित स्रोत भी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, इटली और जापान जैसे कई देश भूतापीय ऊर्जा का उत्पादन कर रहे हैं।
2. मानवीय क्रियाकलापों पर ज्वालामुखी का नकारात्मक प्रभाव:
मनुष्य पर ज्वालामुखी के नकारात्मक प्रभाव निम्नलिखित हैं:-
➤ज्वालामुखी की धूल और गैसें वातावरण को अपारदर्शी बना देती हैं जिससे वायु परिवहन मुश्किल हो जाता है, श्वसन रोग बढ़ जाता है और सूर्यातप को पृथ्वी की सतह तक पहुंचने से भी रोकता है अर्थात यह पृथ्वी को ठंण्डा करता है।
➤ ज्वालामुखी विस्फोट के बाद क्षेत्र में लावा का जमाव होने से वहाँ की जमीन को सरंध्र बनाती है जिससे क्षेत्र में पानी की कमी हो जाती है।
➤ज्वालामुखियों के अचानक फटने से मानव बस्ती, मानव जीवन और उसकी संपत्ति को काफी नुकसान होता है। उदाहरण के लिए, माउंट वेसुवियस (जो एक ज्वालामुखी विस्फोट से बना है) ने 78 ई० में इटली में पोम्पेई शहर को नष्ट कर दिया।
➤ जब समुद्र में ज्वालामुखियों का विस्फोट होता है तो यह आसपास के जल को गर्म कर देता है जिससे की वहाँ के जलीय जीवों पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।
ज्वालामुखी से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर
1. निम्नलिखित में से किसे ‘प्रकृति का सुरक्षा वाल्व’ कहा जाता है?
(a) भूकम्प
(b) ओजोन गैस
(c) ज्वालामुखी
(d) नदियाँ
[c] ज्वालामुखी
2. ज्वालामुखियों के बारे में निम्न में से कौन-सा कथन सत्य है?
(a) यह पृथ्वी की क्रस्ट की एक नली होती है जिसके माध्यम से भू-गर्भ की पिघली चट्टानें (Magma) तथा अन्य पदार्थ बाहर आते हैं।
(b) अक्सर इनकी नली के चारों ओर गोल कीपाकार पहाड़ी अथवा पर्वतीय भाग का विस्तार हो जाता है।
(c) ज्वालामुखी जाग्रत, प्रसुप्त या शान्त तथा मृत तीन प्रमुख प्रकारों में वर्गीकृत किये जाते हैं।
(d) उपर्युक्त सभी।
[d] उपर्युक्त सभी
3. निम्नलिखित में से कौन-सा ज्वालामुखी के उन तीन वर्गों में शामिल नहीं है जो उनके उद्भव की आवृत्ति के आधार पर वर्गीकृत किये गये हैं?
(a) जाग्रत ज्वालामुखी
(b) प्रसुप्त ज्वालामुखी
(c) मृत ज्वालामुखी
(d) यौगिक ज्वालामुखी
[d] यौगिक ज्वालामुखी
4. किस ज्वालामुखी में अक्सर उद्गार होती रहती है?
(a) जाग्रत ज्वालामुखी
(b) प्रसुप्त ज्वालामुखी
(c) मृत ज्वालामुखी
(d) शान्त ज्वालामुखी
[a] जाग्रत ज्वालामुखी
5. किस ज्वालामुखी में ऐतिहासिक काल से उद्गार नहीं हुए हैं?
(a) जाग्रत ज्वालामुखी
(b) प्रसुप्त ज्वालामुखी
(c) शान्त ज्वालामुखी
(d) मृत ज्वालामुखी
[d] मृत ज्वालामुखी
6. लम्बे समय तक शान्त रहने के पश्चात् विस्फोट होने वाला ज्वालामुखी क्या कहलाता है?
(a) मृत ज्वालामुखी
(b) सुसुप्त ज्वालामुखी
(c) सक्रिय ज्वालामुखी
(d) निष्क्रिय ज्वालामुखी
[b] सुसुप्त ज्वालामुखी
7. पृथ्वी की पपड़ी (Earth’s Crust) की ठोस चट्टानों के नीचे जो पिघला हुआ पदार्थ होता है, जो कभी-कभी ज्वालामुखी के उद्गार के साथ धरती के ऊपरी तल पर आ जाता है, उसे क्या कहते हैं?
(a) मैग्मा
(b) मैक्युस
(c) मार्श
(d) मेसेटा
[a] मैग्मा
8. ‘पेले अश्रु’ (Pale’s Tear) की उत्पत्ति कब होती है?
(a) भूकम्प के समय
(b) सेट विवर्तनिकी से
(c) ज्वालामुखी उद्गार के समय
(d) पर्वत निर्माण के समय
[c] ज्वालामुखी उद्गार के समय
9. ज्वालामुखी में जलवाष्प के अलावा मुख्य गैसें होती है
(a) नाइट्रोजन, ऑक्सीजन
(b) हाइड्रोजन, ऑक्सीजन
(c) कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन
(d) सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन
[d]सल्फर डाइऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन
10. ज्वालामुखी उद्गार के फलस्वरूप प्राप्त लावा एवं घरातलीय चट्टानों के टुकड़े को सम्मिलित रूप से क्या कहा जाता है?
(a) पायरोक्लास्ट
(b) ब्रेसिया
(c) लैपिली
(d) स्कोरिया
[a] पायरोक्लास्ट
11. क्रेटर तथा काल्डेरा स्थलाकृतियाँ निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?
(a) उल्कापात
(b) ज्वालामुखी क्रिया
(c) पवन क्रिया
(d) हिमानी क्रिया
[b] ज्वालामुखी क्रिया
12. निम्नलिखित में से कौन-सी स्थलाकृति ज्वालामुखी क्रिया से सम्बन्धित नहीं है?
(a) क्रेटर
(b) काल्डेरा
(c) गैसर
(d) फियोर्ड
[d] फियोर्ड
13. किस स्थलाकृति का निर्माण ज्वालामुखी क्रिया से नहीं होता है?
(a) लावा पठार
(b) लावा मैदान
(c) सिल तथा डाइक
(d) विसर्प
[d] विसर्प
14. डाइक क्या है?
(a) ज्वालामुखी निर्मित बहिवर्ती स्थलाकृति
(b) ज्वालामुखी निर्मित आन्तरिक स्थलाकृति
(c) तटीय स्थलाकृति
(d) हिमनद निर्मित स्थलाकृति
[b] ज्वालामुखी निर्मित आन्तरिक स्थलाकृति
15. काल्डेरा सम्बन्धित है-
(a) हिमनद से
(b) भूकम्प से
(c) ज्वालामुखी से
(d) अंश से
[c] ज्वालामुखी से
16. वह कौन-सा महाद्वीप है जहाँ एक भी ज्वालामुखी नहीं है?
(a) आस्ट्रेलिया
(b) अफ्रीका
(c) अंटार्कटिका
(d) यूरोप
[a] आस्ट्रेलिया
17. अग्नि वलय (Circle of Fire) किसे कहा जाता है?
(a) अटलांटिक परिमेखला
(b) हिन्द परिमेखला
(c) प्रशान्त परिमेखला
(d) आर्कटिक परिमेखला
[c] प्रशान्त परिमेखला
18. लैकोलिथ सम्बन्धित है-
(a) ज्वालामुखी से
(b) भूकम्प से
(c) पर्वत निर्माण से
(d) महाद्वीपीय प्रवाह से
[a] ज्वालामुखी से
19. पेण्टपॉट (Paintpot) के विषय में कौन-सा कथन सत्य है?
(a) ज्यालामुखी क्षेत्रों का एक छिद्र जिससे गर्म एवं गहरे रंग का द्रव्य कीचड़ (Mud) बाहर निकलता है।
(b) इसके साथ सामान्यतः गेसर पाये जाते हैं।
(c) पैण्टपॉट USA के वेलोस्टोन नेशनल पार्क में पाये जाते हैं।
(d) उपर्युक्त सभी।
[d] उपर्युक्त सभी।
20. विश्व में सर्वाधिक जागृत ज्वालामुखी कहाँ स्थित है?
(a) आन्ध्र महासागर के आस-पास
(b) प्रशान्त महासागर के आस पास
(c) हिन्द महासागर के आस पास
(d) आर्कटिक महासागर के आस पास
[b] प्रशान्त महासागर के आस पास
21. विश्व की अधिकांश ज्वालामुखी घटनाएँ घटित होती है-
(a) रचनात्मक प्लेट किनारों पर
(b) भ्रंश मेखला के सहारे
(c) मोड़दार मेखला के सहारे
(d) विनाशात्मक प्लेट किनारों पर
[d] विनाशात्मक प्लेट किनारों पर
22. विश्व के अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी पाए जाते हैं-
(a) प्राचीन पठारी क्षेत्रों में
(b) गहन सागरीय मैदानों में
(c) नवीन मोड़दार पर्वतीय क्षेत्रों में
(d) मैदानी क्षेत्रों में
[c] नवीन मोड़दार पर्वतीय क्षेत्रों में
23. प्रशान्त महासागर के चारों तरफ स्थित ज्वालामुखी की पेटी को क्या कहा जाता है?
(a) नुइस अरडेंटे
(b) हार्नितो
(c) अग्नि श्रृंखला
(d) सोल्फ तारा
[c] अग्नि श्रृंखला
24. विश्व के अधिकांश सक्रिय ज्वालामुखी निम्नलिखित में से किस क्षेत्र में पाये जाते हैं?
(a) मध्य महाद्वीपीय पेटी
(b) मध्ये अटलांटिक पेटी
(c) परिप्रशांत पेटी
(d) अफ्रीका की भ्रंश घाटी
[c] परिप्रशांत पेटी
25. निम्नलिखित में से कौन-सा ज्वालामुखी पर्वत का उदाहरण नहीं है?
(a) माउण्ट एटना
(b) माउण्ट फ्यूजीयामा
(c) माउण्ट ब्लैक
(d) माउण्ट किलिमंजारो
[c] माउण्ट ब्लैक
26. विश्व का सबसे ऊँचा ज्वालामुखी पर्वत कोटोपैक्सी कहाँ थित है?
(a) जापान
(b) फिलीपीन्स
(c) इक्वेडोर
(d) हवाई द्वीप
[c] इक्वेडोर
27. स्ट्राम्बोली (Stramboli) किस प्रकार का ज्वालामुखी है?
(a) जाग्रत
(b) सुसुप्त
(c) मृत या शान्त
(d) इनमें से कोई नहीं
[a] जाग्रत
28. मृत ज्वालामुखी किलिमंजारो किस देश में स्थित है?
(a) इटली
(b) तंजानिया
(c) मैक्सिको
(d) सं० स० अ०
[b] तंजानिया
29. फ्यूजीयामा किस देश का ज्वालामुखी पर्वत है?
(a) इटली
(b) जापान
(c) कीनिया
(d) मैक्सिको
[b] जापान
30. निम्नलिखित में से किस ज्वालामुखी को भूमध्य सागर का प्रकाश स्तम्भ (Light house of the Mediterranean sea) कहा जाता है?
(a) एटना
(b) क्राकाटाओ
(c) स्ट्राम्बोली
(d) विसुवियस
[c] स्ट्राम्बोली
31. फौसा मैग्ना है एक-
(a) ज्वालामुखी
(b) V-आकार की घाटी
(c) भ्रंशोत्थ पर्वत
(d) दरार घाटी
[a] ज्वालामुखी
32. एयर बस ज्वालामुखी कहाँ स्थित है?
(a) अटलांटिक महासागर
(b) आर्कटिक महासागर
(c) अण्टार्कटिका महाद्वीप
(d) अण्डमान निकोबार द्वी० स०
[c] अण्टार्कटिका महाद्वीप
33. माउण्ट एटना ज्वालामुखी किस द्वीप पर स्थित है?
(a) लिपारी
(b) सिसली
(c) कोर्सिका
(d) त्रिस्टान-डि-कुन्हा
[b] सिसली
34. निम्नलिखित में से कौन-सा एक ज्वालामुखी पर्वत नहीं है?
(a) फ्यूजीयामा
(b) एण्डीज
(c) विसुवियस
(d) वास्जेज
[d] वास्जेज
35. विसुवियस ज्वालामुखी किस देश में स्थित है?
(a) कीनिया
(b) इटली
(c) इण्डोनेशिया
(d) मैक्सिको
[b] इटली
36. मौनालोआ उदाहरण है-
(a) सक्रिय ज्वालामुखी
(b) प्रसुप्त ज्वालामुखी
(c) मृत ज्वालामुखी
(d) ज्वालामुखी क्षेत्र में पठार का
[b] प्रसुप्त ज्वालामुखी
37. क्राकाटाओ ज्वालामुखी निम्नलिखित में से किस द्वीप समूह में स्थित है?
(a) पापुआ न्यू गिनी में
(b) स्प्रैटली द्वीप समूह में
(c) इण्डोनेशिया में
(d) पश्चिमी द्वीप सुमह में
[b] स्प्रैटली द्वीप समूह में
38. निम्नलिखित में से कौन-सा युग्म सुमेलित नहीं है?
(a) एटना-इटली
(c) पोपा- म्यान्मार
(b) फ्यूजीवामा- जापान
(d) काकाटाओ- मलेशिया
[d] काकाटाओ- मलेशिया
39. किलिमंजारों पर्वत निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में स्थित है?
(a) एशिया
(b) यूरोप
(c) अफ्रीका
(d) आस्ट्रेलिया
[c] अफ्रीका
40. एड मिस्टी (El-Misti) ज्वालामुखी किस देश में हैं?
(a) इटली
(b) चिली
(c) पेरू
(d) कोलम्बिया
[c] पेरू
41. ज्वालाखण्डाश्मी (Pyroclastics) क्या होता है?
(a) तप्त शैल के टुकड़े और लावा
(b) लावा स्तर
(c) निराविषी गैस
(d) भाप विस्फोटक
[a] तप्त शैल के टुकड़े और लावा
42. फिलीपीन्स में कौन-सा ज्वालामुखी लगभग छह शताब्दियों तक सुप्त रहने के बाद फट पड़ा था?
(a) माउण्ट बैरन
(b) माउण्ट फ्यूजीयामा
(c) माउण्ट उन्जेन
(d) माउण्ट पिनेटुबो
[d] माउण्ट पिनेटुबो
43. क्रेटर (ज्वालामुखी छिद्र) मुख्यतः किस आकृति के होते हैं?
(a) गोलाकार
(b) कीपाकार
(c) शंक्वाकार
(d) लम्बवत
[b] कीपाकार
44. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस ज्वालामुखी उद्भेदन के समय नहीं निकलती है?
(a) ऑक्सीजन
(b) हाइड्रोजन
(c) अमोनिया
(d) कार्बन डाइऑक्साइड
[a] ऑक्सीजन
45. ज्वालामुखी के उद्गार के समय निकलने वाली गैस में जलवाष्प की मात्रा कितनी होती है?
(a) 40 से 50 प्रतिशत
(b) 50 से 60 प्रतिशत
(c) 60 से 70 प्रतिशत
(d) 80 से 90 प्रतिशत
[d] 80 से 90 प्रतिशत
46. विश्व का सर्वाधिक ज्वालामुखी वाला क्षेत्र है-
(a) फिलीपाइन द्वी० स०
(b) जापान द्वी० स०
(c) पश्चिमी द्वी० स०
(d) इण्डोनेशिया द्वी० स०
[a]फिलीपाइन द्वी० स०
47. निम्न में से कौन सुमेलित नहीं है?
(a) शान्त ज्वालामुखी- देमवन्द
(b) जाग्रत ज्वालामुखी- स्ट्राम्बोली
(c) प्रसुप्त ज्वालामुखी- क्राकाटाओ
(d) निष्क्रिय ज्वालामुखी- एटना
[d]निष्क्रिय ज्वालामुखी- एटना
48. स्ट्राम्बोली ज्वालामुखी कहाँ स्थित है?
(a) मार्टिनिक द्वीप में
(b) लक्षद्वीप में
(c) लिपारी द्वीप में
(d) हवाई द्वीप में
[c] लिपारी द्वीप में
49. विश्व का सबसे ऊँचा सक्रिय ज्वालामुखी निम्नलिखित में से कौन है?
(a) एटना
(b) मौनालोआ
(c) चिम्बोरेजो
(d) कोटोपैक्सी
[d] कोटोपैक्सी
50. माउण्ट एरेबसो ज्वालामुखी निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में स्थित है?
(a) यूरोप
(b) एशिया
(c) अण्टार्कटिका
(d) अफ्रीका
[c] अण्टार्कटिका
51. निम्नलिखित में से कौन प्रसुप्त ज्वालामुखी है?
(a) मौनालोआ
(b) स्ट्राम्बोली
(c) काकाटाओ
(d) चिम्बोरेजो
[c]काकाटाओ
उत्तर– (c)
52. निम्नलिखित में से कौन सक्रिय ज्वालामुखी नहीं है?
(a) स्ट्राम्बोली
(b) किलिमंजारो
(c) एटना
(d) कोटोपैक्सी
[b]किलिमंजारो
53. निम्नलिखित में से कौन मृत ज्वालामुखी नहीं है?
(a) चिम्बोरेजो
(b) कोह सुल्तान
(c) मौनालोआ
(d) देमवन्द
[c] मौनालोआ
54. ‘दस हजार धुआँरों की घाटी’ (A valley of ten thousand smokes) पायी जाती है
(a) अलास्का में
(b) भूमध्य सागर में
(c) अंटार्कटिका में
(d) हवाई द्वीप समूह में
[a] अलास्का में
55. विस्फोट की तीव्रता के आधार पर ज्वालामुखियों के प्रकारों का सही आरोही क्रम है-
(a) हवाई तुल्य, स्ट्राम्बोली तुल्य, पीलियन तुल्य, वल्केनियन तुल्य
(b) हवाई तुल्य, स्ट्राम्बोली तुल्य, वल्केनियन तुल्य, पीलियन तुल्य
(c) हवाई तुल्य, वल्केनियन तुल्य, पीलियन तुल्य, स्ट्राम्बोली तुल्य
(d) हवाई तुल्य, वल्केनियन तुल्य, स्ट्राम्बोली तुल्य, पीलियन तुल्य
➤ प्लेट विवर्तनिकी एक ऐसा सिद्धान्त है जो भू-भौतिकी से संबंधित अनेक घटनाओं जैसे-पर्वत निर्माण, ज्वालामुखी क्रिया इत्यादि के संबंध में व्यक्त किये गये सभी परम्परागत सिद्धान्तों का परित्याग कर नया विचार प्रस्तुत करता है।
➤ इस परिकल्पना के अनुसार पृथ्वी का ऊपरी भाग दृढ़ भूखंडों से निर्मित है। ये भूखंड कई भागों में विभक्त है, इसके एक भाग को प्लेट से संबोधित करते है।
➤ सर्वप्रथम वर्ष 1955 में कनाडा के भू-वैज्ञानिक जे. टूजो विल्सन (J-Tuzo Wilson) ने ‘प्लेट’ शब्द का प्रयोग किया था।
प्लेटों की संख्या
➤ अमेरिकी अर्थ साइंस के अनुसार पृथ्वी 7 बड़े और 6 छोटे प्लेट निम्नलिखित है-
प्रमुख प्लेट- 7
1. प्रशांत महासागरीय प्लेट
2. उ० अमेरिकी प्लेट
3. द० अमेरिकी प्लेट
4. अफ्रीकन प्लेट
5. युरेशियन प्लेट
6. इण्डियन प्लेट
7. अंटार्कटिका प्लेट
गौण प्लेट- 6
(i) अरेबियन प्लेट
(ii) फिलीपींस /फिलीपाइन प्लेट
(iii) कोकस प्लेट
(iv) नास्का प्लेट
(v) स्कोशिया प्लेट
(vi) कैरेबियन प्लेट
➤ इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों को दो भागों में बांटा जाता है–
1. स्थिर प्लेट
2. गतिशील प्लेट
➤ स्थिर प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे नहीं चल रही है जबकि गतिशील प्लेटों के नीचे संवहन तरंगे चल रही है।
➤ संरचना के दृष्टिकोण से प्लेट दो प्रकार के होते है-
1. महासागरीय प्लेट
2. महाद्वीपीय प्लेट
➤ महासागरीय प्लेट बैसाल्ट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व अधिक है जबकि महाद्वीपीय प्लेट ग्रेनाइट चट्टानों से निर्मित है तथा इसका घनत्व कम है।
सीमा या सीमांत
➤ इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों के मिलन स्थल को प्लेट के सीमा या सीमांत कहते है।
➤ इसके अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार की सीमाएं पायी जाती है। इसे निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
प्लेटों के संचालन शक्तियाँ
➤ इस सिद्धांत के अनुसार सभी प्लेट पृथ्वी के अक्ष का अनुसरण करते हुए पूरब से पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हो रही है।
➤ प्लेटों में गति हेतु कई कारक उत्तरदायी माना गया है। जैसे- पृथ्वी के घूर्णन गति, प्लवनशीलता बल, गुरुत्वाकर्षण बल और प्लेटों का 45° पर प्रत्यावर्तन, सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल, संवहन तरंग आदि।
➤ इस सिद्धांत के अनुसार प्लेटों में 3 प्रकार के गतियाँ पायी जाती है। जैसे – निर्माणकारी गति की उत्पत्ति अपसरण सीमा के सहारे होती है, विनाशकारी गति की उत्पति अभिसारी सीमा के सहारे तथा संरक्षी गति संरक्षी सीमा के सहारे उत्पन्न होता है।
प्लेटों का क्रियाविधि
➤ उठती हुई संवहन तरंगे अपसरण सीमा को जन्म देती है। इसी सीमा के सहारे दरार का निर्माण होता है। इन दरारों से ही दुर्बलमंडल से लावा/मैग्मा निकलती है, जिससे ज्वालामुखी क्रिया होती है।
➤ गिरती हुई संवहन तरंगे अभिसारी सीमा का निर्माण करती है। इस सीमा के सहारे अधिक घनत्व वाले प्लेट कम घनत्व वाले प्लेट में घुसने की प्रवृति रखती है। प्लेट अत्यधिक अंदर जाकर पिघलती है और “बेनी ऑफ जोन” निर्माण करती है तथा चट्टानों के वलन के साथ-साथ ज्वालामुखी का उदगार भी होता है। इसे निम्न चित्र से समझा जा सकता है-
प्रमाण
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के समर्थन में निम्नलिखित प्रमाण प्रस्तुत किये गए है–
1. ज्वालामुखी-
विश्व के ज्वालामुखी वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व के अधिकांश ज्वालामुखी क्रियाएं अभिसारी प्लेट सीमा के सहारे होती है।
2. भूकम्प-
भूकम्पीय वितरण के अध्ययन से स्पष्ट है कि विश्व में सर्वाधिक भूकम्प प्रशांत महासागर के चारों ओर स्थित क्षेत्रों में आती है। ये क्षेत्र संरक्षी प्लेट सीमा के सहारे स्थित है।
3. सागर नितल प्रसार और पुराचुमकत्व-
सागर नितल प्रसार सिद्धान्त से स्पष्ट है कि सागर नितल प्रसार अपसारी सीमा के सहारे हो रही है तथा नवीन चट्टानों में पुराचुमकत्व का गुण कम तथा पुराने चाट्टानों में चुमकत्व का गुण अधिक पाया जाता है।
4. भूगर्भिक समस्याओं का समाधान
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त के माध्यम से कई भूगर्भिक समस्याओं का समाधान होता है। जैसे- पर्वतों के उत्त्पति, भूकंप, भूसंचालन, महाद्वीपीय विखण्डन, समुद्री नितल प्रसार, पुराचुमकत्व, द्वीपीय चाप के निर्माण आदि।
आलोचना
उपरोक्त विशेषताओं के वाबजूद इस सिद्धांत की कई खामियां है। जैसे – प्लेटों की संख्या का स्पष्ट पता नहीं चल पाता है, प्लेटों में संवहन तरंगे क्यों उत्पन्न होती है?, हरसिनियन और कैलिडोनियन युग के पर्वतों की उत्पत्ति की व्याख्या नहीं करता है, बेनी ऑफ जोन से निकलने वाला मैग्मा पदार्थ के परिणाम का वैज्ञानिक व्याख्या नहीं करता।
इन सीमाओं के वाबजूद भूगर्भ विज्ञान का एक क्रांतिकारी विचार है क्योंकि भूपटल से संबंधित सभी भूगर्भिक घटनाओं का एक बार में ही व्याख्या प्रस्तुत करता है।
प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर
1. महाद्वीप और महासागर किस श्रेणी के उच्चावच हैं?
[A] प्रथम श्रेणी [B] द्वितीय श्रेणी [C] तृतीय श्रेणी [D] चतुर्थ श्रेणी
[A] प्रथम श्रेणी
2. पृथ्वी के धरातल के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीपों का विस्तार पाया जाता है?
[A] 25.5 [B] 29.2 [C] 35.6 [D] 40.7
[B] 29.2
3. महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त के प्रणेता हैं-
[A] ग्रेगरी [B] प्राट [C] वेग्नर [D] होम्स
[C] वेग्नर
4. कार्बोनिफेरस युग में विश्व में सम्पूर्ण महाद्वीप आपस में मिले हुए थे, यह किसकी मान्यता है?
[A] वेग्नर [B] डाना [C] जेफ्रीज [D] होम्स
[A] वेग्नर
5. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त किस वर्ष प्रस्तुत किया?
[A] 1875 [B] 1965 [C] 1875 [D] 1960
[D] 1960
6. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया था?
[A] हैरी हैस [B] टेलर [C] जेफ्रीज [D] डाना
[A] हैरी हैस
7. वेग्नर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन जिस दिशा में हुआ, वह है-
[A] भूमध्य रेखा व उत्तरी ध्रुव [B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी [C] भूमध्य रेखा व दक्षिणी ध्रुव [D] भूमध्य रेखा व पूर्व
[B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी
8. वेग्नर के अनुसार पेंजिया का विखण्डन किस युग में प्रारम्भ हुआ?
9. वेग्नर के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
[A] कार्बोनिफेरस युग में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे उन्होंने पेंजिया कहा। [B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था। [C] उत्तरी अमेरिका, यूरोप आदि अंगारालैंड के भाग थे। [D] अंटार्कटिका गोण्डवानालैंड का अंग था।
[B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था।
10. महाद्वीपीय विस्थापन को स्पष्ट करने वाला नवीनतम सिद्धान्त कौन है?
[A] टेलर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना [B] वेग्नर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त [C] चतुष्फलक परिकल्पना [D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त
➤ वेगनर महोदय एक जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे।
➤ इन्होंने 1912 ई० में अपनी पुस्तक डाई इंटेस्टहंगडर कण्टिनेंट एण्ड ओगोनी में महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
➤ इनका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं विभिन्न स्थानों पर मिलने वाले वनस्पतियों के समानता का व्याख्या करना था।
➤ इन्होंने सिद्धांत के व्याख्या में दो तर्क दिए-
(1) या तो समय-समय पर जलवायु में परिवर्तन होता रहा है।
(2) या तो महाद्वीपों का विस्थापन होता रहा है।
➤ वेगनर के अनुसार कार्बोनिफेरस युग में सभी महाद्वीप आपस में जुड़े थे, जिसे पेंजिया कहा है।
➤ पेंजिया के चारों ओर स्थित विशाल महासागर को पैंथालास कहा।
➤ कालान्तर में पेंजिया के विखण्डन से मध्य भाग में गहरी व सकरी भूसन्नति का निर्माण हुआ जिसे टेथिस सागर कहा।
➤ उन्होंने टेथिस के उत्तर में स्थित भूखण्ड को लॉरेशिया तथा दक्षिण में स्थित भूखण्ड को गोंडवानलैंड कहा।
➤ वेगनर के अनुसार भूपटल सियाल से निर्मित है और इससे नीचे सीमा तथा निफे की परत है तथा सियाल सीमा पर अबाध रूप से तैर रही है।
➤ कार्बोनिफेरस युग में कुछ भूगर्भिक शक्तियों के कारण लॉरेशिया एवं गोंडवाना लैंड में विखण्डन की क्रिया हुई जिससे छोटे-छोटे भूखण्ड यानी महाद्वीपों का निर्माण हुआ।
➤ इन महाद्वीपों के विस्थापन से ही दरार घाटी में हुए जलविस्तार से महासागरों का निर्माण हुआ जिसे निम्न चित्रों में देखा जा सकता है-
महाद्वीपों का प्रवाह
वेगनर के अनुसार महाद्वीपों के विस्थापन के लिए दो बल उत्तरदायी है–
(i) गुरुत्वाकर्षण एवं प्लवनशीलता बल- महाद्वीपों का उत्तर की ओर विस्थापन
(ii) सूर्य एवं चन्द्रमा का ज्वारीय बल- महाद्वीपों के पश्चिम दिशा की ओर विस्थापन के लिए उत्तरदायी।
➤ वेगनर के अनुसार लौरेशिया भूखंड में उ० अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप एवं एशिया के अधिकांश भाग तथा गोण्डवाना लैंड में द० अमेरिका, अफ्रीका, प्रायद्वीपीय भारत, ऑस्ट्रेलिया एवं अंटार्कटिका सम्मलित थे।
पक्ष में प्रमाण
(1) भूगर्भिक प्रमाण- भारतीय पठार, अफ्रीकी पठार, ब्राजील का पठार एवं ऑस्ट्रेलिया के पठार सभी एक ही समय के निर्मित एवं समान विशेषताएं वाले चट्टान है।
(2) अटलांटिक महासागर के दोनों तटों पर समानता पायी जाती है तथा दोनों तटों को मिलाया जा सकता है, जिसे उन्होंने– Zig-Saw-Fitकहा।
(3) साइबेरिया, ग्रीनलैण्ड, कनाडा में कोयला का पाया जाना तथा केन्या, युगांडा, ब्राजील के मध्य भाग में बोल्डर क्ले का पाया जाना।
(4) सभी महाद्वीपों पर गलोसॉप्टेरिस एवं रेन्डियर का पाया जाना।
(5) लेमिंग नामक जंतु का पश्चिम की ओर भागने की प्रवृति।
(6) सभी महाद्वीपों को कम्प्यूटर पर टूटे हुए प्लेट के समान जोड़ा जा सकता है।
आलोचना
➤ वेगनर मूलतः जलवायुवेता एवं भूगर्भशास्त्री थे जो जलवायु परिवर्तन का अध्ययन न कर महाद्वीप के विस्थापन का अध्ययन करने लगे।
➤ इनके द्वारा प्रस्तुत महाद्वीपीय विस्थापन का कारक बल पर्याप्त नहीं है।
➤ आस्ट्रेलिया का उ० पू० में प्रवाहित होना इस सिद्धांत के विरुद्ध है।
➤ प्लेट विवर्तनिकी के अनुसार विस्थापन महाद्वीपों का नहीं बल्कि प्लेटों का हो रहा है।
➤ इनके अनुसार महाद्वीप सियाल एवं महासागर सीमा से निर्मित है जो गलत है।
➤ इनके अनुसार सियाल सीमा पर निर्बाध रूप से तैर रही है परंतु मोड़दार पर्वतों की उत्पत्ति के लिए सीमा द्वारा अवरोध बताता है जो विरोधाभाषी है।
महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत से सम्बंधित पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर
1. महाद्वीप और महासागर किस श्रेणी के उच्चावच हैं?
[A] प्रथम श्रेणी [B] द्वितीय श्रेणी [C] तृतीय श्रेणी [D] चतुर्थ श्रेणी
[A] प्रथम श्रेणी
2. पृथ्वी के धरातल के कितने प्रतिशत भाग पर महाद्वीपों का विस्तार पाया जाता है?
[A] 25.5 [B] 29.2 [C] 35.6 [D] 40.7
[B] 29.2
3. महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धान्त के प्रणेता हैं-
[A] ग्रेगरी [B] प्राट [C] वेग्नर [D] होम्स
[C] वेग्नर
4. कार्बोनिफेरस युग में विश्व में सम्पूर्ण महाद्वीप आपस में मिले हुए थे, यह किसकी मान्यता है?
[A] वेग्नर [B] डाना [C] जेफ्रीज [D] होम्स
[A] वेग्नर
5. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त किस वर्ष प्रस्तुत किया?
[A] 1875 [B] 1965 [C] 1875 [D] 1960
[D] 1960
6. प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किसने किया था?
[A] हैरी हैस [B] टेलर [C] जेफ्रीज [D] डाना
[A] हैरी हैस
7. वेग्नर के अनुसार महाद्वीपीय विस्थापन जिस दिशा में हुआ, वह है-
[A] भूमध्य रेखा व उत्तरी ध्रुव [B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी [C] भूमध्य रेखा व दक्षिणी ध्रुव [D] भूमध्य रेखा व पूर्व
[B] भूमध्य रेखा व पश्चिमी
8. वेग्नर के अनुसार पेंजिया का विखण्डन किस युग में प्रारम्भ हुआ?
9. वेग्नर के अनुसार निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
[A] कार्बोनिफेरस युग में विश्व के सभी महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे जिसे उन्होंने पेंजिया कहा। [B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था। [C] उत्तरी अमेरिका, यूरोप आदि अंगारालैंड के भाग थे। [D] अंटार्कटिका गोण्डवानालैंड का अंग था।
[B] पेंजिया टेथिस सागर नामक महासागर से घिरा हुआ था।
10. महाद्वीपीय विस्थापन को स्पष्ट करने वाला नवीनतम सिद्धान्त कौन है?
[A] टेलर की महाद्वीपीय विस्थापन परिकल्पना [B] वेग्नर का महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धान्त [C] चतुष्फलक परिकल्पना [D] प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त