17. Master Plan of Patna/Patna City Planning (पटना का मास्टर‌ प्लान/पटना नगर‌ नियोजन)

17. Master Plan of Patna/Patna City Planning

(पटना नगर‌ नियोजन/पटना का मास्टर‌ प्लान)



Master Plan of Patna

प्रश्न प्रारूप

Q.1 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए विचारणीय भौगोलिक अभिकर्ताओं का विश्लेषण कीजिए। 

Q.2 पटना नगर विकास से संबंधित नियोजन के लिए भौगोलिक कारकों की चर्चा करें।

Q.3 बिहार का किसी नगर जिसका आपने अध्ययन किया है। उसकी आकारिकी की व्याख्या कीजिए और नगर आकारिकी के लिए कौन-सा मॉडल उपयुक्त है।

Q.3 बिहार के एक न‌गर की आकारिकी पर प्रकाश डालिए।

      गैलीयन महोदय ने नगर नियोजन का तात्पर्य बताते हुए कहा था कि नगर में अधिवासित लोगों के स्वास्थ, सम्पति एवं सौदर्य का संतुलित विकास किया जाना नगर नियोजन कहलाता है। इसके अन्तर्गत भूमि उपयोग, सार्वजनिक सुविधा, पर्यावरण, परिवहन तथा मनोरंजन केन्द्रों का संतुलित विकास किया जाता है।

     कोई भी नगर मानवीय जनसंख्या का जमघट होता है। ऐसे स्थानों पर अधिवासीय अव्यवस्था न हो इसलिए नियोजन का कार्य किया जाता है। भारत में नगर नियोजन का इतिहास काफी पुरानी है। भारत में नगर नियोजन की शुरुआत सिन्धु नदी घाटी सभ्यता के नगरों से प्रारंभ मानी जाती है। लेकित आधुनिक नगर नियोजन का इतिहास 1863 ई० से प्रारम्भ माना जाता है, क्योंकि इंगलैण्ड के स्वास्थ्य विभाग के अनुशंसा पर नगर नियोजन का प्रारंभ किया गया था।

पटना नगर नियोजन

     जहाँ तक पटना नगर के नियोजन का प्रश्न है। इसकी शुरुआत मुगल काल से हुई थी। लेकिन उस समय पटना सिटी व पश्चिम दरवाजा से पूर्वी दरवाजा के मध्य मुख्य सड़क के दोनों तरफ नगरीय बस्ती बसे हुए थे। ये रेखीय नगरीय बस्ती था। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने प० पटना में नियोजन का कार्य प्रारंभ करवाया। इसका नियोजन अर्द्ध वृत्ताकार विन्यास प्रारूप पर आधारित था।

     लेकिन स्वतंत्रता के बाद पटना सहित देश के सभी बड़े नगरों में जनसंख्या वृद्धि की प्रवृति तेज हो गयी। इसका प्रमुख कारण ग्रामीण नगरीय जनसंख्या का स्थानान्तरण था। नगर में लगातार जनसख्या वृद्धि को देखते हुए द्वितीय पंचवर्षीय योजना में नगर नियोजन की दो प्रकार की नीति अपनाई गयी-

(1) एक लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगरों के लिए ‘मास्टर प्लान’ का निर्माण किया गया।

(2) लघु या मध्यम आकार वाले नगरों में सार्वजनिक सुविधाओं का विकास करने का निर्णय लिया गया।

    पुनः मास्टर प्लान की नीति में भी दो प्रकार के नीति निर्धारित किये गये। प्रथम पूर्णतः नवीन नगरों की नीति और द्वितीय पूर्व के बसे हुए नगरों के विकास की नीति।

    नवीन नगरों में मुख्यतः प्रशासन हेतु चण्डीगढ़, औद्योगिक विकास हेतु राऊरकेला, खनन कार्य हेतु कुद्रेमुख और अंकलेश्वर जैसे नियोजित नगर बसाये गये और पूर्व के बसे हुए नगरों में पटना नगर को नियोजित करने का निर्णय लिया गया।

     प्रथम चरण में 36 नगरों के लिए मास्टर प्लान का निर्माण किया गया था। उनमें से पहला नगर पटना था। पटना के लिए प्रथम मास्टर प्लान 1965 ई० में, दूसरा 20 वर्ष बाद 1985 ई० में कार्यान्वित किया गया और तीसरा मास्टर प्लान अभी निर्माणाधीन है। प्रथम मास्टर प्लान 1965 में पटना इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट के द्वारा किया गया था। इसी मास्टर प्लान के तहट राजेन्द्र नगर, कदम कुंआ, गर्दनीबाग और पाटलिपुत्रा कोलोनी का नियोजन किया गया था।

     1965 ई० में PRDA का प्रस्ताव स्वीकृत करते हुए बिहार सरकार ने नियोजन का स्थायी अधिकार PRDA को ही सौप दिया। दूसरे मास्टर प्लान के तहत फुलवारी शरीफ, कंकड़‌बाग, दीघा जैसे मुहल्लों का नियोजन किया गया। लेकिन दूसरा मास्टर प्लान को पूरी तरह लागू नहीं किया गया। पटना में नगर नियोजन पूरी तरह लागू नहीं किये जाने के पीछे कई कारण उत्तरदायी रहे हैं। जैसे-

(1) विस्फोटक जनसंख्या वृद्धि:-

      1995 ई० के मास्टर प्लान के अनुरूप पटना नगर की जनसंख्या 2001 ई० में 12 लाख होनी चाहिए थी जबकि यह वास्तविक रूप से 17 लाख हो गई। पुनः 1981 ई० में पटना की जनसंख्या 4 लाख 80 हजार थी जो 1991 ई० में बढ़कर 10 लाख 80 हजार हो गयी थी।

      2001 ई० में ही पटना भारत का 14 वाँ सबसे बड़ा नगर बन चुका है। मैनपुर, दीघा, फूलवारी शरीफ में मूल रूप से ग्रामीण क्षेत्र से आयी हुई जनसंख्या अधिवासित होती है। यहाँ ग्रामीण क्षेत्र में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी और भूमिहीनता के कारण जनसंख्या अधिवासित होते रही है।

(2) भूमि उपयोग के नियमों का पालन नहीं होना:-

          भूमि उपयोग के दृष्टि से पटना महानगर को चार भागों में बाँटा जा जा सकता है।-

(ⅰ) अनियोजित पटना का सघन बसा हुआ क्षेत्र

(ⅱ) ब्रिटिशकालीन पश्चिम पटना

(iii) स्वतंत्रता के बाद नियोजित ढंग से विकसित क्षेत्र। जैसे – राजवंशी नगर, शास्त्रीनगर, पाटलिपुत्रा कोलनी और मुंशीनगर

(iv) गैर कानूनी ढंग से निर्मित क्षेत्र- यही क्षेत्र पटना नगर नियोजन की दिशा में सबसे बड़ी बाधा है।

       बुद्धा कोलनी फेज-2, राजीव नगर, कंकड़‌बाग, न्यू वाइपास के दक्षिण का क्षेत्र तथा नगर के पश्चिमी क्षेत्र ये सभी क्षेत्र PRDA के अन्तर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में PRDA के अनुमति से ही निर्माण कार्य किया जा सकता है। लेकिन PRDA के अनुमति के निर्माण कार्य किये जाने से गंदी बस्ती की विकास हुआ है।

(3) परिवहन ही समस्या:-

      पटना की अधिकतर सड़‌कें संकरी है। महात्मा गाँधी सेतु बनने के बाद परिवहन दबाव में भारी वृद्धि हुई है। पटना में ट्रैफिक जाम सामान्य बात हो चुकी है। नगर बस सेवा लगभग असफल से चुकी है। सड़‌कों पर वाहनो के चलने की रफ्तार लगातार कम होती जा रही है जो नगर नियोजन के विरुद्ध है।

(4) पटना में मलीन बस्तियों का विकास:-

      PRDA के अनुसार पटना की आधी जनसंख्या मलीन बस्तियों में निवास करती है क्योंकि पटना में सार्वजनिक सुविधाओं का काफी अभाव है। यहाँ जल विकासी की समस्या यथावत बनी हुई है। पुनः स्वच्छ जलापूर्ति और गंदी नालियों का जबड़दस्त संगम हुआ है। विद्युत आपूर्ति और सार्वजनिक स्थलों का अभाव है। जगह-2 पर पटना में कचड़ों का अम्बार आसानी से देखा जा सकता है।

(5) पटना में मनोरंजन केन्द्रों का जबड़दस्त अभाव:-

     यह नगर को अनियोजित और अस्वस्थकर बनाता है। सार्वजनिक स्थल जैसे- Park, Play ground, सामुदायिक भवन, क्लब, थीयेटर हॉल की यहाँ जबड़दस्त कमी है।

(6) पटना में पर्यावरणीय समस्याएँ भी काफी गंभीर है। पर्यावरणीय समस्याओं के रूप में यहाँ प्रदूषित जल की समस्या, वायु प्रदूषण की समस्या और ध्वनि प्रदूषण से समस्या गंभीर है।

     उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखकर पटना का ‘मास्टर प्लान’ तैयार किया गया है। वास्तव में पटना का मास्टर प्लान मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ी हुई है। यहाँ के ‘मास्टर प्लान’ में उल्लेखित कुछ विशेषताएं निम्नलिखित है। जैसे-

मास्टर प्लान की विशेषताएँ

(1) पटना का क्षैतिज विस्तार अब संभव नहीं है। इसलिए सरकार ने बहुमंजली इमारतों में बदलने का निर्णय लिया है।

(2) मौर्या कम्प्लेक्स के बाजार का विकास बाजार संकुल के रूप में किया गया है।

(3) पुराने जेल परिसर में नया बाजार विकसित करने का निर्णय किया गया है। लेकिन High Court के निर्देशानुसार जेल परिसर में पार्किंग बनाने का निर्देश मिल जाने के बाद यह कार्य अभी रूका हुआ है।

(4) पटना मुख्य स्टेशन के भार को कम करने के लिए राजेन्द्र नगर टर्मिनल का विकास किया जा रहा है।

(5) बोरिंग रोड चौराहा क्षेत्र को सुपरमार्केट के रूप में बदलने का निर्णय लिया गया है।

(6) मध्यवर्ती पटना के लिए बाजार समीति कैम्पस में सुपर मार्केट विकास करने निर्णय लिया गया है।

(7) अधिवासीय क्षेत्रों के विकास हेतु पटना को चार प्रमुख निकटतम पड़ोसी क्षेत्र में विभाजित किया गया है। जैसे- पश्चिमी पटना में बिहटा, पूर्वी पटना में फतुहा, दक्षिणी पटना में परसा बाजार और गौरीचक एवं उतरी पटना में हाजीपुर को विकसित करने का निर्णय लिया गया है। इन सभी क्षेत्रों में सार्वजनिक सुविधाएँ, बाजार, पार्क, खेल का मैदान, जलापूर्ति की सुविधा विकसित करने के निर्णय बिला गया है।

(8) मास्टर प्लान के तहत फूलवारी शरीफ एयरपोर्ट को बिहटा में, पटना विश्वविद्यालय और PMCH को बाइपास के दक्षिण में, प्राइवेट बस स्टेण्ड को ट्रान्स पोर्ट नगर में और खागौल में विकसित करने का निर्णय लिया गया है लेकिन पूँजी एवं तकनीक की कमी, आम लोग की सहभागिता का अभाव, प्रशासनिक इच्छा शक्ति की कमी के कारण क्रियान्वित नहीं किया जा सका है।

(9) पटना नगर के परिवहन के समस्या के समाधान हेतु कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव है। जैसे- एक रेलवे लाइन दक्षिणी पटना में पुनपुन नदी के किनारे बिहटा से फतुहा तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। साथ ही दीघा में गंगा नदी पर “जयप्रकाश नारायण रेल पुल” का निर्माण किया जा रहा है।

     पुनः गंगा नदी के किनारे मुम्बई के मेरीन ड्राइव के तर्ज पर River drive Road दानापुर से पटना सिटी तक विकसित करने का निर्णय लिया गया है। नगर के अन्दर सभी सड़‌कें को चौड़ा किया जा रहा है। कंकड़बाग जल निकासी योजना के तहत सम्पूर्ण दक्षिणी पटना में चौड़ी-2 नालियों और बड़े-2 ‘सम्प हाउस’ का निर्माण किया जा रहा है तथा नगर से निकलने वाले प्रदूषित जल को साफ करने हेतु ‘मैला टंकी’ के विकास का निर्णय लिया गया है।

(10) स्टेशन एरिया और नगर के अन्य क्षेत्रों में ट्रैफिक जाम वाले क्षेत्र को पहचान कर फ्लाईओवर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। जैसे- चिरैयाँ टाल पुल, मीठापुर पुल, चारपुर पुल, बहादुरपुर पुल इत्यादि का कार्य प्रगति पर है।

      गंगा नदी के किनारे सड़क निर्माण का कार्य 1942 से ही प्रस्तावित है। लेकिन विभिन्न कारणों से यह प्रस्ताव अभी तक कार्य रूप में नहीं आ पाया है क्योंकि गंगा नदी के किनारे निजी अधिवासीय क्षेत्र और कई सरकारी कार्यालय अवस्थित है जिसे हटाना अभी संभव है।

(11) सार्वजनिक सुविधाओं के विकास हेतु मास्टर प्लान में कई प्रस्ताव शामिल किये गये है। जैसे- खाली पड़े जमीन पर पार्कों का विकास किया जा रहा है। शहर के अंदर जगह-2 सुलभ शौचालय का निर्माण किया जा रहा है। पाटलिपुत्रा कोलनी में और बाजार समीति कैम्पस में मल्टी पलेक्स विकसित करने का निर्णय लिया गया है। कंकड़बाग में ‘इंडोर स्टेडियम’ का निर्माण किया जा रहा है।

(12) पर्यावरणीय नियोजन:-

     मास्टर प्लान के अन्तर्गत प्रत्येक मलीन बस्ती को विकसित करने के लिए दो प्रकार के निर्णय लिये गये हैं। मलीन बस्तियों में गरीबी, निवारण कार्यक्रम चलाया जा रहा है तथा मलीन बस्तियों में सस्ते लागत वाले मकान बनाकर गरीबों को उपलब्ध करवाया जा रहा है।

        बिहार सरकार गरीब परिवारों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है तथा गंदी बस्तियों में सुलभ इंटरनेशनल के माध्यम से शौचालय निर्माण किया जा रहा है। पर्यावरणीय विकास के अंतर्गत खुले नालों को ढका जा रहा है। निजी शौचालय को नालियों से जोड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कचड़ा उठाव के लिए नगर निगम को रात्रि में उठाने को कहा गया है। पटना के चारों ओर एक हरित पेटी (चौ० ½ km) के विकास का निर्णय लिया गया है।

      उपयुक्त कार्यक्रमों के द्वारा पटना नगर के नगरीय पर्यावरण में सुधार की पूरी संभावना है। चूंकि पटना एक पुराना नगर है इसलिए इसका पूर्ण नियोजन संभव नही है। इसलिए आंशिक नियोजन और कुछ सुधारों से ही नगरीय लोगों की समस्साओं से निजात दिलायी जा सकती है।

      लेकिन पूँजी, और तकनीक, आम लोगों की सहभागिता, प्रशासनिक एवं राजनीतिक इच्छाशक्ति, कानून में संशोधन, विस्थापित लोगों को उचित मुआवजा इत्यादि पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। पुन: इसका भी व्यवस्था किया जाना चाहिए कि गया, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, आरा, बक्सर जैसे नगरों के इस रूप में विकास किया जाय कि ग्रामीण क्षेत्रों से स्थानान्तरित होने वाली जनसंख्या वहीं अधिवासित हो सके।


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17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


18. Urbanization in Bihar (बिहार में नगरीकरण)

    18. Urbanization in Bihar

(बिहार में नगरीकरण)   Urbanization in Bihar

     नगरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कार्यिक प्रतिरूप, नगर के आकार और नगर की जनसँख्या में लगातार वृद्धि होती है। आजादी के समय बिहार में कुल आबादी का 10 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास करती थी और आज 70 साल के बाद भी 11.3 प्रतिशत आबादी ही नगरों में निवास करती है। बिहारी अर्थव्यवस्था की निस्तेजता और स्थिरता की यह सबसे बड़ा उदाहरण है। बिहार में नगरीकरण के नगण्य होने के पीछे कई कारण है:-

1. कृषि उत्पादन की स्थिरता,

2. औद्योगिकीकरण की दर नगण्य होना,

3. सड़क, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

4. बाढ़ और सुखाड़ की स्थायी समस्या,

5. सिंचाई की अपर्याप्त व्यवस्था।

          बिहार के 130 शहरों में से 111 स्वतंत्र शहर है और 19 ऐसे शहर है जिन्हें नव-नगर समूहों में बाँटा गया है। ‘नगर समूह’ ऐसे नगरीय बस्ती को कहते है जब दो या दो से अधिक नगरों की सीमा आपस में मिल जाते है। जैसे- पटना, गया, मोतिहारी, समस्तीपुर, भागलपुर, पूर्णिया, बेगुसराय, कटिहार, सीतामढ़ी इत्यादि नगर समूह के उदाहरण है।

       भारत में नगरीकरण का औसत प्रतिशत 2.78 प्रतिशत है। भारत के सभी राज्य और केन्द्र प्रशासित राज्यों में बिहार में सबसे कम नगरीय जनसंख्या अधिवासित होती है। कुल जनसंख्या के दृष्टिकोण से बिहार भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है जबकि यहाँ भारत की मात्र 3.04 प्रतिशत जनसंख्या ही बिहार के नगरों में निवास करती है।

       जनगणना 2011 के अनुसार बिहार में 11758016 लोग नगरों में निवास करते है। जिसमें से 6204307 पुरूषों तथा 5553709 महिलाओं की संख्या हैं। पिछले 10 सालों में बिहार में नगरीय जनसंख्या में 11.29 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

        2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में 26 ऐसे नगर है जिनकी जनसख्या 01 लाख से अधिक है। इस नीचे की तालिका में देखा जा सकता है।

नगर जनसंख्या (लाख में)
पटना 16.84
गया 4.8
भागलपुर 4.0
मुजफ्फरपुर 3.54
बिहारशरीफ 2.97
दरभंगा 2.96
पूर्णिया 2.82
आरा 2.6
बेगूसराय  2.52
कटिहार 2.26
मुंगेर 2.1
छपड़ा 2.02
दानापुर 1.82
सहरसा 1.56
हाजीपुर 1.47
सहरसा 1.56
डेहरी 1.37
सीवान 1.35
बेतिया 1.32
मोतिहारी 1.26
बगहा 1.26
किशनगंज 1.05
जमालपुर 1.05
जहानाबाद 1.03
बक्सर 1.02
औरंगाबाद 1.02

     बिहार में छोटे-बड़े नगरों की संख्या 130 है। उल्लेखनीय है कि 1991 में अविभाजित बिहार की नगरीय जनसंख्या 11353012 थी। वर्तमान बिहार का जो क्षेत्र है उसकी नगरीय जनसंख्या 67.1 लाख थी। 1991-2001 की अवधि में 19.67 लाख तथा 2001-2011 की अवधि में 30 लाख जनसंख्या वर्तमान बिहार में नगरीय जनसंख्या के रूप में बढ़ी।

     वर्तमान बिहार में कुल नगरीय जनसंख्या जनगणना 2011 के अनुसार 117 लाख है। बेगुसराय, मधेपुरा, समस्तीपुर और सुपौल ऐसे जिले थे जहाँ नगरीकरण की दर ऋणात्मक रही क्योंकि 2001 की जनगणना 2011 के अनुसार वैसे शहरों में नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हुई है। अगर बिहार के नगरों के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाये तो स्पष्ट होता है कि बिहार के जिला को 06 समूहों में विभक्त किया जा सकता है।-

क्रम नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत वृद्धि जिला
1. 50 प्रतिशत से अधिक नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला कैमूर, जहानाबाद, शिवहर, सहरसा
2. 40-50 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला पूर्णिया, मोतिहारी, बक्सर, औरंगाबाद, नवादा, पटना
3. 30-40 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला पश्चिम चम्पारण, भोजपुर, गया, लखीसराय, जमुई, भागलपुर, वैशाली
4. 20-30 प्रतिशत के बीच कटिहार जनसंख्या वृद्धि वाले जिला सिवान, सारण, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, मधुबनी, अररिया, कटिहार, रोहतास, बांका
5. 0-20 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला बिहारशरीफ, मुंगेर
6. 0-6 प्रतिशत के बीच नगरीय जनसंख्या वृद्धि वाले जिला सुपौल, मधेपुरा, समस्तीपुर, बेगुसराय

       इस तरह उपर्युक्त दिए गये आंकड़ों और तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि बिहार नगरीकरण के मामले में भारत का सबसे पिछड़ा राज्यों में से एक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय बिहार में नगरीय जनसंख्या जहाँ मात्र 6.5 प्रतिशत थी वही आज भी आजादी के 70 वर्षों के बाद भी मात्र 4.8 प्रतिशत बढ़कर 11.3 प्रतिशत जनसंख्या नगरों में निवास कर रही है जो कि भारत के अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम है। अतः बिहार में कृषि सुधार, औद्योगिकरण इत्यादि को बढ़ावा देकर नगर विकास की प्रक्रिया को तीव्र करने की आवश्यकता है।



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19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


19. Rural Market Center in Bihar (बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र)

19. Rural Market Center in Bihar

(बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका की विवेचना कीजिए।

       बिहार के ग्रामीण-नगरीय क्षेत्रों के विकास के क्रम में कई ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास हुआ है। ग्रामीण बाजार में प्राय: हाट मेला कस्बाई बाजार, सप्ताहिक बाजार या पाक्षिक बाजार इत्यादि के नाम से जानते है। ग्रामीण बाजार केन्द्र बड़े नगर और ग्रामीण क्षेत्र के बीच योजक कड़ी का कार्य  करते हैं।

ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास:-

       बिहार में ऐसे ग्रामीण बाजार केन्द्रों का विकास लगभग पुरे बिहार में हुई है। ऐसे बाजार जैसे क्षेत्रों पर विकसित होते हैं जहाँ पर सड़कों का चौराहा हो या कोई सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़ा हुआ केन्द्र हो या कोई जलाशय उपलब्ध हो सोनपुर, बाढ़, बख्तियारपुर, बिहटा, तारेगना, अकबरपुर, रजौली, गिरियक इत्यादि ऐसे बाजार केंद्र हैं जो पटना महानगर के इर्द-गिर्द स्थित हैं।

ग्रामीण बाजार केन्द्रों की भूमिका:-

       बिहार के ग्रामीण बाजार केन्द्रों की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित भूमिकाएँ रेखांकित की जा सकती हैं-

(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति करते हैं तथा उनका जीवन स्तर सुधारने में मदद करते हैं।
(2) ग्रामीण बाजार आर्थिक गतिविधियों का केन्द्र बिन्दु होता है। यहाँ द्वितीयक तथा तृतीयक प्रकार के आर्थिक गतिविधि सम्पन्न किये जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लोग अपने कृषि उत्पादों को ग्रामीण बाजार केन्द्र में आकर बेचते हैं अपनी आवश्यकता की चीजें खरीदकर ले जाते हैं।

(3) ग्रामीण बाजार केन्द्र नवो उत्पाद विसाण का केन्द्र होता है। इसका तात्पर्य है कि किसानों के कृषि कार्य से संबंधित नवीन उपकरण, बीज, उर्वरक इत्यादि सबसे पहले ग्रामीण बाजार केन्द्र तक पहुंचते है और वहाँ से उनका धीरे-2 ग्रामीण क्षेत्रों में विसरण होता है।

(4) ग्रामीण बाजार केन्द्र बफर स्टॉक का कार्य करते हैं। जैसे- ग्रामीण बाजार केन्द्रों में ‘Cold Storage’ स्थापित होते है जहाँ किसान अपने उत्पादों को सुर‌क्षित एवं संरक्षित रखते हैं।

(5) ग्रामीण कृषि और कुटीर उद्योग से संबंधित उत्पादों का विपनण का कार्य किया करते है।

(6) ग्रामीण बाजार केन्द्र सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है। जैसे- एक ओर ग्रामीण केन्द्रों में आर्थिक गतिविधियाँ चल रही होती है वहीं दूसरी ओर मनोरंजन से जुड़े हुए गतिविधि भी चल रहे होते हैं।

(7) ग्रामीण बाजार केन्द्र सूचना के प्रमुख केन्द्र होते हैं। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित NGO, नुक्कड़ नाटक इत्यादि के माध्यम से सरकारी कार्यक्रम, परिवार नियोजन, साक्षरता, स्वास्थ संबंधित जानकारी इत्यादि आसानी से सम्प्रेषित करते हैं।

(8) ग्रामीण बाजार केन्द्र विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों को मिलने-जुलने का अवसर प्रदान करता है जिससे सामाजिक एकता बनी रहती है।

(9) ग्रामीण बाजार में साहुकार, छोटे-छोटे बैंक, बीमा एजेन्ट, व्यापारी इत्यादि का जमघट होता है। ये किसानों को जरूरत के उननुसार धन उपलब्ध करवाते हैं और किसानों के उत्पादों को खरीदकर राष्ट्रीय एवं अन्तरर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुं‌चाते हैं।

(1) ग्रामीण बाजार केन्द्र प्रादेशिक असमानता को दूर करने में सहायक है।

    इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण बाजार केन्द्र ग्रामीण क्षेत्रों में न केवल आर्थिक गतिविधियों को संचालित करता है बल्कि समस्त सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का भी केन्द्र बिन्दु होता है।

Rural Market Center in Bihar



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8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

14. Sindri Fertilizer Industries (सिन्दरी उर्वरक उद्योग)

14. Sindri Fertilizer Industries

(सिन्दरी उर्वरक उद्योग)



Sindri Fertilizer Industries

प्रश्न प्रारूप

Q. सिन्दरी उर्वरक उद्योग एक वृहत केन्द्र के रूप में व्याख्या कीजिए।

     सिन्दरी एकीकृत बिहार राज्य की एक प्रमुख उर्वरक उद्योग का एक महान् केन्द्र रहा है जो वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य के धनबाद जिला में अवस्थित है। यह औद्योगिक केन्द्र धनबाद से 82 किमी० दक्षिण में अवस्थित है। यह छोटानागपुर खनिज औद्योगिक प्रदेश के दामोदर नदी घाटी में अवस्थित है। इसकी व्यापना 1951 ई० में किया गया था। यहाँ उर्वरक निर्माण के तीन इकाई है-

1. फर्टिलाइजर्स कारपोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड (FCIL)-

    यह अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइ‌ट्रेट और आमोनिया कार्बोनेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

2. बिहार स्टेट सुपर फॉस्फेट (BBSF)-

     यह इकाई सुपर फॉस्फेट नामक उर्वरक का उत्पादन करता है।

3. गैनुलर फर्टिलाइजर्स फैक्ट्री-

      यह दामोदर उर्वरक का उत्पादन करता है।

     सिन्दरी को महान उर्वरक उत्पादन केन्द्र के रूप में विकसित करने पीछे कई भौगोलिक कारक उत्तरदायी रहे है। जैसे-

(i) सिन्दरी भारत के महान कोयला संचित भण्डार क्षेत्र में स्थित है। इसे झरिया क्षेत्र से कोयला की प्राप्ति हो जाती है।यहाँ कोयला से ही उर्वरक का उत्पादन होता है।

(ii) परिवहन मार्ग की सुविधा- सिन्दरी धनबाद से पुरुलिया जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है। यह रेलवे लाइन ये भी जुड़ी हुई है। रेगवे लाइन धनबाद, कोलकाता, मुम्बई, दिल्ली जैसे महानगरों से जुड़े हुए हैं। सिन्दरी में ही मंझोले एयरपोर्ट का भी निर्माण किया गया है। कालकोता एवं पारादीप बंदरगाह पास में ही अवस्थित है।

(iii) श्रमिक उपलब्धता- सिन्दरी सघन जनसंख्या वाले प्रदेश में अवस्थित है। कुशल इंजीनियरों की आपूर्ति हेतु सिन्दरी में ही बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गई थी।

(iv) सिन्दरी को दामोदर और उसके सहायक नदी बराकर से पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध हो जाती है।

(v) विद्युत आपूर्ति हेतु चन्द्रपुरा और सिन्दरी थर्मल प्लाण्ट से विद्युत मिल जाती है। आकस्मिक बिजली इसे दामोदर भैली कारपोरेशन (DVC) से मिल जाती है।

(vi) किसी उद्योग के विकास हेतु एवं पथरीली भूमि की आवश्यकता होती है जो सिन्दरी उर्वरक कारखाना को आसानी से उपलब्ध है।

(vii) सिन्दरी प० बंगाल और बिहार के मैदानी क्षेत्र के जंक्शन पर अवस्थित है जहाँ नाइट्रोजन एवं फॉस्फेटयुक्त उर्वरक की भारी माँग है। इस तरह इसे विस्तृत बाजार की सुविधा भी उपलब्ध है।

     उपरोक्त भौगोलिक कारकों के अलावे आधुनिक तकनीक का अभाव, पूँजी की कमी, बिजली की आपूर्ति न किये जाने, कर्मचारियों के द्वारा अक्सर के द्वारा अक्सर हड़ताल एवं तालाबंदी किये जाने, इंजीनियरिंग कॉलेज की बिगड़ती स्थिति, झारखण्ड की बिग‌ड़ती राजनीतिक अस्थिरता, बेहतर प्रबंधन के अभाव में उर्वरक की यह महान केन्द्र रुग्ण स्थिति में बदल चुका है। लेकिन उपरोक्त समस्याएँ सामयिक दिखाई पड़‌ती है। ज्यों-ही इन परिस्थितियों में थोड़ी बहुत बदलाव आती है तो सिन्दरी पुनः महान उर्वरक केन्द्र के रूप में तब्दील हो जायेगी। सरकार ने सिन्दरी उर्वरक संयंत्र से निकलने वाले कचड़ों से सीमेंट का निर्माण प्रारंभ कर दिया है तथा इसे हल्दिया गैस पाइप लाइन से भी जोड़ने का निर्णय लिया गया है।

      इससे स्पष्ट होता है कि आने वाला समय में इनकी महानता पुनः स्थापित हो के रहेगी।



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1. बिहार : सामान्य जानकारी

2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर

7. Flood in Bihar (बिहार में बाढ़)

7. Flood in Bihar

(बिहार में बाढ़)



प्रश्न प्रारूप

Q. Describe the flood problems in Bihar.

(बिहार में बाढ़ से सम्बन्धित समस्याओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार एक कृषि प्रधान राज्य है। यहाँ की 80 या 85 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। बिहार से झारखण्ड राज्य के अलग होने के कारण यहाँ केवल कृषि का ही क्षेत्र रह गया है। अब बिहार की आर्थिक उन्नति केवल कृषि पर निर्भर है। बिहार में कई समस्याओं के कारण कृषि सम्पदा से परिपूर्ण बिहार आज भी अपनी निर्धनता के लिए देश में विख्यात है। अतः इन समस्याओं के निदान के बगैर इसकी आर्थिक उन्नति असंभव है।

बाढ़ की समस्या:-

     बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है। बाढ़ नदियों में अत्यधिक जल के कारण आती है। यहाँ की नदियाँ सदियों से विनाशकारी बाढ़ के लिए प्रसिद्ध रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार बिहार के कुल बाढ़ग्रस्त क्षेत्र का लगभग 64 लाख हेक्टेयर है। इसका अधिकतर क्षेत्र उत्तरी बिहार में पड़ता है। उत्तर बिहार में अधिकतर नदियाँ हिमालय से निकलती है। इन नदियों में कोसी, कमला, बागमती, गण्डक, बूढ़ी गण्डक आदि सम्मिलित हैं।

     ये सभी नदियाँ हिमालय के अतिवृष्टि के क्षेत्र से निकलने के कारण काफी जलराशि लाती है, इनका जलग्रहण क्षेत्र भी काफी विस्तृत है। इन नदियों में बाढ़ का मुख्य कारण हिमालय के तराई क्षेत्र में अत्यधिक वृष्टि है। इस भाग की कोसी तथा गण्डक नदियों का जलक्षेत्र ऊँचे हिमालय के शिखर पर है।

      इस भाग में अधिक वर्षा से यहाँ बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इसी कारण कोसी नदी में जल का प्रवाह काफी तीव्र है। इसका क्षेत्र बाढ़ प्रभावित रहता है। यह नदी मार्ग परिवर्तन के लिए भी विख्यात है। विगत 200 वर्षों से 150 किलोमीटर पश्चिम की ओर खिसक गई है और बार-बार खिसकने से पुरानी धारा जल प्लावन को बढ़ावा देती है। वर्षाऋतु में पूर्णिया से दरभंगा तक का क्षेत्र बाढ़ की विभीषिका से प्रभावित रहता है। अतः इस नदी को ‘बिहार का शोक’ (‘Sorrow of Bihar’) कहा जाता है। परन्तु कोसी परियोजना के कार्यान्वयन से अब कुछ राहत मिली है।

     हिमालय से जब नदियाँ बिहार के मैदान में प्रवेश करती है तो इनके द्वारा लायी गयी जलोढ़ मिट्टी यहाँ के समतल मैदान पर बिछाकर उथला बना देती है और कहीं-कहीं पर अवरोध भी उत्पन्न कर देती हैं। इसके फलस्वरूप नदी अपने दोनों किनारे पर जल फैला देती है। मन्द ढाल के कारण छाड़न झीलें, दलदली भूमि तथा चौर आदि का निर्माण करती हैं।

      इसी प्रकार बूढ़ी गण्डक, कमला, बागमती तथा महानन्दा अपने किनारे पर जल फैलाकर बाढ़ उत्पन्न करती हैं। जल की निकासी ठीक से नहीं होती है। इस प्रकार महीनों पानी भरा रहता है और फसलों को क्षति होती है। उत्तरी बिहार के अररिया, सुपौल, मधेपुरा, खगड़िया, सहरसा, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, बेगुसराय, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, वैशाली, छपरा आदि जिलों में भयंकर बाढ़ आती है।

      दक्षिण बिहार की नदियाँ पठारी भाग से निकलकर गंगा में गिरती हैं। इस प्रदेश की प्रमुख नदियाँ, सोन, पुनपुन, फल्गु, मोरहर, पैमार, पंचाने, सकरी, मोहाने, कर्मनाशा आदि है। इस भाग में वर्षा के कारण कुछ महीनों के लिए बाढ़ की समस्या बनी रहती है।

    जब गंगा नदी स्वयं जलमग्न रहती है तो सोन, पुनपुन, सकरी, फल्गू आदि नदियों के पानी के निकास को अवरूद्ध कर देती है। इसके फलस्वरूप नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भयंकर बाढ़ आ जाती है। इन नदियों से भी दलदली भूमि, दियारा भूमि, तालभूमि, चऊर भूमि, तथा जल प्रदेश बन जाते है। वर्षाऋतु में पटना से मोकामा तक का क्षेत्र जलप्लावित रहता है। दक्षिण बिहार के मैदान में पटना, उत्तरी नालन्दा, उत्तरी मुंगेर, लक्खीसराय तथा उत्तरी भागलपुर के जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं।

Flood in Bihar

बाढ़ की समस्याओं का निदान-

     बिहार में बाढ़ से निपटने के लिए अनेक प्रयास किये गये हैं। इसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार द्वारा भी कई प्रयास किये गये हैं। इधर बिहार की नदियों पर बाँध बनाकर बाढ़ को नियंत्रित किया गया है। इससे जल की निकासी हो जाती है और बाढ़ की विभीषिका से बचाव भी हो जाता है। सोन नदी पर भी बाँध बनाया गया है। इसके अलावे गंगा तट पर कोइलवर बक्सर बाँध, भूतहीबलान बाँध मधुबनी, वैशाली जिले में हाजीपुर-बाजीपुर बाँध, कोसी के किनारे बदलाघाट-नगरपाला बाँध, त्रिमुहानी कुरसेला बाँध, पुनपुन नदी बाँध, बेतवा नहर बाँध, फल्गु नदी पर उदेरास्थान बाँध आदि है।

        बाँध निर्माण के अलावा बाढ़ नियंत्रण के लिए और भी कई उपाय किये गये हैं। पेड़-पौधे लगाकर बाढ़ से बचाव किया गया है। इसका प्रयास भी हो रहा है।


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