11. The Agricultural Region of Bihar (बिहार का कृषि प्रदेश)

11. The Agricultural Region of Bihar

(बिहार का कृषि प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. Divide Bihar into agricultural regions and discuss their salient characteristics.

(बिहार को कृषि प्रदेशों में विभाजित करें तथा प्रत्येक की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।)

उत्तर- बिहार की कृषि विभिन्न प्राकृतिक तत्वों पर निर्भर करती है। ये तत्व तापमान, वर्षा, स्थलाकृति, मिट्टी, सिंचाई के साधन आदि हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं पर कृषि तथा फसलों के प्रकार निर्भर करते हैं। इन्हीं भौगोलिक दशाओं को आधार मानकर बिहार की कृषि को बाँटा गया है। इन्हीं तत्वों पर फसलों का उत्पादन निर्भर करता है। इन्हीं तत्वों से फसलें प्रभावित होती हैं। जिन भागों में जिस प्रकार की दशाएँ हैं, वहाँ की फसल उगाई जाती है।

      उदाहरणार्थ, उत्तरी बिहार में उपजाऊ मिट्टी, 40 सेमी० से अधिक वर्षा, समतल भूमि तथा अधिक जनसंख्या मिलती है। अतः वहाँ इन्हीं भौगोलिक दशाओं के अनुरूप धान की फसल लगाई जाती है। इस क्षेत्र के लिए यही फसल सबसे अधिक उपयुक्त है। भौगोलिक दशाओं की अनुकूलता के कारण प्रति एकड़ उत्पादन भी अधिक होता है। इसी कारण बिहार के उत्तरी सीमान्त क्षेत्र में धान की खेती की अधिकता है, यह पट्टी का निर्माण करता है। इस प्रकार बिहार के कृषि क्षेत्र को निम्नलिखित कृषि पट्टियों में बाँट सकते हैं-

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र

3. दक्षिणी गंगा के सिंचित प्रदेश

4. छोटानागपुर के पठारी प्रदेश

1. उत्तर का आर्द्र निम्न धनहर क्षेत्र:-

        बिहार का यह कृषि प्रदेश बूढ़ी गंडक नदी के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह मुख्य रूप से बिना सिंचाई के धान का क्षेत्र है। यह प्रदेश उत्तर पश्चिम में संकीर्ण तथा पूर्व में चौड़ा होता गया है। यह भूमि निम्न है और यहाँ मकई और रबी की भी खेती की जाती है। यह पूरा क्षेत्र समतल है। इस भाग में अनेक नदियों में प्रतिवर्ष बाढ़ आ जाती है।

     यहाँ की मिट्टी जलोढ़ है। जिसमें नमी रखने की क्षमता अधिक है। इस भाग में वर्षा अधिक होती है। जिसके कारण आर्द्रता अधिक रहती है। कोशी नदी के क्षेत्र में बाढ़ अधिक आती है। जिसके फलस्वरूप धान की फसल को हानि होती है। सामान्य रूप से सम्पूर्ण क्षेत्र में धान की ही खेती की जाती है। इस प्रदेश में मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया आदि जिले सम्मिलित हैं। इस भाग में चावल कूटने की मिलें स्थित हैं।

2. भीठ एवं दियारा क्षेत्र:-

     यह प्रदेश उत्तर गंगा में धनहर क्षेत्र के दक्षिण में स्थित है तथा गंगा के दक्षिण का छोटा-सा भाग इसमें सम्मिलित है। इसमें दो तरह की भूमि आती है। पहली भूमि ऊँची है। जिस पर बाढ़ का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसे दियारा भी कहते हैं।

       दूसरी भूमि निम्म् भूमि है जो वर्षा के दिनों में जल से भरी रहती है। दोनों ही भूमि पर भदई फसल मकई एवं रबी की फसल होती है। रबी फसलों में गेहूँ, चना, जौ, दलहन एवं तेहलन होता है। कहीं-कहीं पर धान भी होता है। इसकी भूमि भी उपजाऊ है और वर्षा भी अच्छी हो जाती है। गंगा के दक्षिण में मोकामा-बड़हिया के क्षेत्र में गेहूँ और चना काफी होता है।

3. दक्षिणी गंगा का सिंचित प्रदेश:-

     यह दक्षिणी गंगा के मैदानी भाग का पूर्व प्रदेश है। यह पश्चिम में पुराना शाहाबाद जिला (आरा, रोहतास, बक्सर, कैमूर) से लेकर पूरब में भागलपुर तक फैला है। इस भाग में कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ की कृषि सिंचाई पर आश्रित है। इसी भाग में सोन एवं सकरी नदियों पर नहरें बनाई गई हैं और इस भाग में आहर तथा पईन के द्वारा भी सिंचाई की सुविधा प्रदान की गई है। इन्हीं सुविधाओं के कारण यहाँ सघन कृषि की जाती है।

      इस भाग की सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि की फसल धान ही है। आरा एवं रोहतास जिलों में सोन नहर से सिंचाई के कारण धान की अच्छी खेती की जाती है। गया, जहानाबाद, पटना तथा नालन्दा जिलों में भी इसकी खेती की जाती है। धान के अलावे इस भाग में गेहूँ, आलू, चना, दलहन, तेलहन तथा अन्य फसलें होती हैं।

4. छोटानागपुर पठारी क्षेत्र:-

       छोटानागपुर की स्थलाकृति तथा मिट्टी की दशाएँ उत्तर बिहार से बिल्कुल भिन्न है। अतः इस भाग की कृषि “प्रणाली” भी भिन्न हैं। इस भाग में पठारी भूमि एवं अनुपजाऊ मिट्टी के कारण कृषि कम होती है। कृषि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि नदी घाटियों में धान की खेती की जाती है तथा ऊपरी पठारी भागों पर मकई, मडुआ, दलहन आदि की खेती की जाती है।

      मिट्टी की कमी के कारण खेती करने में अधिक कठिनाई है। नदी घाटी के आर्द्र भागों में खेती अधिक की जाती है। वहाँ सिंचाई की भी थोड़ी सुविधा उपलब्ध होती है। इसके अलावे इस भाग में कृषि सिंचाई एवं मिट्टी की कमी के कारण सीमित है। 


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3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation (पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)

20. Causes, consequences and related conservation measures of environmental degradation

(पर्यावरण निम्नीकरण के कारण, परिणाम और संबंधित संरक्षण के उपाय)



प्रश्न प्रारूप

Q. पर्यावरण निम्नीकरण के कारणों, परिणामों की चर्चा कीजिए और संबंधित संरक्षण के उपाय पर प्रकाश डालें।

    पर्यावरणीय निम्नीकरण केवल भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की गंभीर समस्यायों में एक है। यह आज की उपभोक्तावादी जीवन, औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, अनियोजित विकास, इत्यादि की देन है। प्रत्येक पर्यावरण में जैविक एवं अजैविक घटकों के बीच प्राकृतिक संतुलन का संबंध होता है। जब इस संतुलन में नाकारात्मक परिवर्तन होता है तो उसे ‘पर्यावरणीय निम्नीकरण’ कहते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारक

    पर्यावरणीय निम्नीकरण के कई कारण है जिन्हें हम दो प्रमुख वर्गों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

पर्यावरणीय निम्नीकरण के कारण

1. प्राकृतिक कारण

(ⅰ) भारी वर्षा, आकिस्मक वर्षाः

(ii) भूस्खलन, हिमस्खलन;

(iii) भूकंप, सूनामी;

(iv) ज्वालामुखी उद्‌गार;

(V) बाढ़, सूखाड़, अकाल;

(1) चक्रवात, हिमपातः

(vii) वायु इत्यादि।

2. मानवीय कारण

(i) वनों की कटाई,

(ii) वृहद बांधों का निर्माण,

(iii) खनन

(iv) औद्योगिकीकरण,

(v) नगरीकरण,

(vⅰ) संचार एवं परिवहन क्रांति

(vii) कीटनाशक एवं उर्वरक के प्रयोग,

(viii) अवैज्ञानिक कृषि,

(ix) अति पशुचारण,

(x) अनियोजित विकास इत्यादि।

1. प्राकृतिक कारण

     भारी या आकस्मिक वर्षा के कारण तीव्र ढाल एवं उबड़-खाबड़ प्रदेशों में तेजी से मृदा अपरदन होती है। जैसे- भारत के चम्बल घाटी क्षेत्र में रील एवं अवनलिका अपरदन के कारण मृदा का क्षरण हुआ है। जबकि महान हिमालय, लघु हिमालय में तीव्र ढाल एवं गुरुत्वाकर्षण के कारण मृदा ह्रास हुआ है।

     भूस्खलन एवं हिमस्खलन से पर्वतीय प्रदेशों में जैविक ह्रास, मृदा क्षरण, स्थलाकृतिक स्वरूप में परिवर्तन जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। हिम स्खलन से बेड़-2 हिम और भूस्खलन से छोटे-बड़े चटानें ढाल के सहारे गुरुत्वारण के कारण नीचे गिरते हैं। इससे कई वनस्पति, जीव-जन्तु इत्यादि दब कर नष्ट हो जाते हैं जो पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक कारण है।

    भूकंप के दौरान कई पेड़-पौधे उखड़ जाते हैं, कितने जीवों की जानें चली जाती हैं जो पर्यावरण निम्निकारण के कारण है। ज्वालामुखी उद्‌गार के समय लावा, राख, जलवाष्प गैस इत्यादि निकलती है जो पर्यावरण को प्रदूषित कर देती हैं। हिमालय क्षेत्र में अधिकतम भूकम्प आते हैं। 1934 में मुंगेर और दरभंगा का भूकम्प, 2001 में कच्छ की भूकम्प इत्यादि उल्लेखनीय है। हिमालय प्रदेश और बैरन द्वीप में ज्वालामुखी की घटना देखने को मिलती है जिससे पर्यावरण निम्नीकरण होती है।

    बाढ़, सूखाड़ और अकाल पर्यावरण निम्नीकरण को जन्म देते हैं। बाढ़ एवं सूखाड़ की बारम्बारता से खाद्य पदार्थ, पेयजल और चारे में कमी आ जाती है। महामारी, अकालमृत्यु, पशुमृत्यु दर बढ़ जाता है। भारत के वृष्टिछाया प्रदेश, द० बिहार, द०-प० उड़ीसा इत्यादि में सूखे के कारण और असम, उत्तरी बिहार इत्यादि में बाढ़ के कारण यह समस्या उत्पन्न हुई होती है।

     चक्रवात के दौरान वायु की तेज झोंका और तीव्र वर्षा से वृक्ष का गिरना, बड़े भूभाग का जलमग्न होना, बाढ़ आना इत्यादि जैसे पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न होती है। यह घटना भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

     प्राकृतिक वायु मरुस्थलीय क्षेत्रों से धुलकण को उड़ाकर बाहरी क्षेत्रों में जमा करते रहती है जिसके कारण मरुस्थलीय क्षेत्रों का लगातार विस्तार होता जा रहा है। राजस्थान के थार मरुस्थल से वायु द्वारा धूल कण, बालू उड़ाकर पंजाब, हरियाणा, UP के सीमावर्ती क्षेत्रों में जमा करते रहने से यह समस्या उत्पन्न हो रही है।

2. मानवीय कारण

     वनों की कटाई पर्यावरणीय निम्नीकरण का एक प्रमुख कारण है। बढ़ती हुई आबादी के कारण कृषि एवं अधिवास के लिए वनों की कटाई की जा रही है। इसके कारण वनस्पति के विभिन्न प्रजातियों का विलोपीकरण, जैविक विविधता में ह्रास हो रही है और आहार-श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। भूमिगत जल स्तर तेजी से नीचे गिरता है।

       वृहत बांधों के निर्माण भी कई पर्यावरणीय निम्नीकरण को जन्म देते हैं। जैसे- बांधो के पीछे बनाये गये जलाशयों में वनीय भूमि, अधिवासीय क्षेत्र के आ जाने से उनका ह्रास होता है। आस-पास के क्षेत्रों में भूमिगत जलस्तर बढ़ जाने से पेयजल प्रदूषित हो जाता है। खनन से न केवल ऊर्जा संसाधनों का बल्कि अनेक प्रकार के खनिजों का दोहन किया जा रहा है। उन खनिजों पर कई छोटे-बड़े उद्योगों का विकास किया गया है। इससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण इत्यादि की समस्या उत्पन्न हुई हैं।

     औद्योगिकीकरण और नगरीकरण साथ-2 चलने वाली प्रक्रिया है। आज विश्व के कई नगर महानगर में बदल चुके हैं। केवल भारत में ही 35 महानगर पाये जाते हैं। ये नगर अत्याधिक जनसंख्या दबाव वाले क्षेत्र है। इन नगरों में जहाँ एक ओर ध्वनि और वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या है। वहीं अवशिष्ट पदार्थी के जलाशयों में छोड़ दिये जाने से जल प्रदूषण की गंभीर समस्या उत्पन्न हो रही है।

     संचार एवं परिवहन क्रांति के युग में सड़कों पर परिवहन साधनों का बाढ़ आ चुका है। ये परिवहन साधन जीवाश्म ऊर्जा का उपयोग करते हैं जिससे ग्रीन हाउस गैसों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन हो रहा है। इसके कारण अनेक प्रकार के पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

     रासायनिक उर्वरक एवं किटनाशकों का प्रयोग खाद्यान्न उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने हेतु किया जा रहा है। इसके चलते मृदाक्षरण, जल प्रदूषण, सूक्ष्मजीवों के ह्रास की समस्या उत्पन्न हो रही है।

    अवैज्ञानिक कृषि, अतिपशुचारण, अनियोजित विकास, मिसाइल तकनीक, आण्विक तकनीक, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी इत्यादि के कारण अनेक गंभीर पर्यावरणीय निम्नीकरण की समस्या उत्पन्न हो रही है।

परिणाम

    उपरोक्त पाकृतिक एवं मानवीय कारणों से पर्यावरणीय निम्नीकरण की कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हुई है। जैसे-

Causes

   इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर परिणाम के रूप में उभर रहे हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना अति आवश्यक है। इस दिशा में 1992 ई० में विश्व स्तर पर महत्त्वपूर्ण कदम रियो द जेनरियो में हुए पृथ्वी शिखर सम्मेलन में उठाये गये। भारत सरकार भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके लिए उन्होंने वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना किया है जो कई कामक्रमों के माध्यम से इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही है। इसके अलावे निम्नलिखित उपाय सुझाए जा सकते हैं:-

(i) वनोन्मूलन से बचाव हेतु वनीय नीति और वन संरक्षण कानून के क्रियान्वयन पर सख्ती से ध्यान दिया जाय। सामाजिक वानिकी, कृषि वानिकी, वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया जाय।

(ii) वन्य जीवों के शिकार पर कठोर प्रतिबंध लगायी जाय।

(iii) खेतों में रासायनिक उर्वरक की जगह पर जैविक खाद का प्रयोग किया जाय।

(iv) जीवाश्म ऊर्जा के जगह पर सौर ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा एवं अन्य वैकल्पिक ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया जाय।

(v) ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम से कम किया जाय।

(vi) विस्फोट पदार्थों का कम से कम प्रयोग किया जाय।

(vii) वैज्ञानिक कृषि पर जोर दिया जाए।

(viii) विकास का कार्य सतत् विकास की अवधारणा पर किया जाय।

(ix) पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरण बढ़ायी जाय इत्यादि।

     उपरोक्त तथ्यों के विश्लेषण से स्पष्ट है कि पर्यावरण निम्नीकरण एक गंभीर समस्या है। यह कई प्रकृतिक एवं मानवीय कारणों से उत्पन्न होती है। इसके कई भयानक परिणाम आ रहे हैं। इसलिए ‘पर्यावरण संरक्षण’ की दिशा में कई कार्य किये जा रह हैं और कई कार्य और भी किये जाने की आवश्यकता है। लेकिन इसकी पूर्ण सफलता आमलोगों की सहभागिता, राजनीतिक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता पर भी निर्भर करती है।

2. Climate of Bihar (बिहार की जलवायु)

2. Climate of Bihar

(बिहार की जलवायु)



प्रश्न प्रारूप

Q. Explain Climate of Bihar.

(बिहार की जलवायु का विस्तृत वर्णन करें।)

उत्तर-  बिहार की जलवायु उष्णार्द्र मानसूनी है। यह जलवायु अल्प वर्षाकाल तथा दीर्घ शुष्ककाल के मानी जाती है। यहाँ की जलवायु में महाद्वीपीयता के लक्षण मिलते हैं, लेकिन अधिक आर्द्रता के कारण यहाँ संशोधित महाद्वीपीय जलवायु है। उत्तर की ओर हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ इसको मध्य एशिया की ओर से आने वाली शीतल वायु से बचाकर महाद्वीपीय जलवायु का स्वरूप प्रदान करती है। इस जलवायु की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) न्यून दैनिक ताप परिसर

(ii) ताप परिसर की समानता

(iii) वायु में अधिक आर्द्रता

(iv) वर्षा का न्यूनाधिक रूप में सर्वत्र होना

(v) ऋतु परिवर्तन होना

      बिहार की जलवायु निम्नलिखित भौगोलिक तत्त्वों से प्रभावित होती है-

(i) अक्षांशीय विस्तार

(ii) हिमालय पर्वत की स्थिति

(iii) स्थलाकृति का प्रभाव

(iv) बंगाल की खाड़ी से निकटता

(v) नारवेस्टर तथा अन्य ग्रीष्मकालीन तूफान

(vi) दक्षिण-पश्चिम मानसून की क्रियाशीलता

      मॉनसूनी जलवायु की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ के मौसमी परिवर्तन की हैं। यहाँ की ऋतुएँ ऐसी है जो लयबद्ध रूप में आती है। ग्रीष्मकाल की भीषण गर्मी से उबने के बाद वर्षाकाल की फुहारे वातावरण में प्रसन्नता पैदा करती है। जब वर्षाकाल की उमस से मन उब जाता है, तो शरदकालीन ठण्डक से राहत मिलती है। जबकी शीत लहर से मन घबरा जाता है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है तो ग्रीष्म ऋतु राहत पहुँचाती है। इस प्रकार बिहार की जलवायु में तीन ऋतुएँ स्पष्ट अनुभव की जाती है। अतः यहाँ तीन ऋतुएँ निम्नलिखित हैं-

1. ग्रीष्म ऋतु- मध्य मार्च से मध्य जून तक

2. वर्षा ऋतु- मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक

3. शरद ऋतु-मध्य अक्टूबर से मध्य मार्च तक

1. ग्रीष्म ऋतु:-

       यह ऋतु मध्य मार्च से प्रारम्भ होता है। इस माह के बाद तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है मई के अन्त तक तापमान बहुत बढ़ जाता है। अधिक गर्मी से सापेक्षित आर्द्रता बहुत घट जाती है। मई-जून में कुछ स्थानों का तापमान 46°C तक पहुँच जाता है। बिहार के पश्चिमी भाग के क्षेत्रों में अधिक तापमान रहता है। पछुआ हवा के कारण हवा बहुत ही गर्म हो जाती है। जिसे ‘लू’ कहा जाता है। इसकी तुलना में पूर्वी भाग के क्षेत्रों में तापमान कम रहता है।

     इस ऋतु में अधिक गर्मी के कारण हवा का दबाव कम हो जाता है, हवा के निम्नदाब के कारण बिहार के पूर्वी भाग में चक्रवाती तूफान आता है, जिससे वर्षा होती है, इस तूफान से पूर्णियाँ, कटिहार में 4 से 8 सेमी० वर्षा होती है। इस भयंकर तूफान को ‘काल वैशाखी’ कहते हैं। इस आर्द्रयुक्त हवा से वर्षा होती है, जिसे नारवेस्टर या मैंगोसाँवर कहते हैं। इस वर्षा से आम एवं लीची फसलों को फायदा पहुँचती है। इस मौसम में गया शहर का तापमान सबसे ऊँचा 47°C तक चला जाता है।

(2) वर्षा ऋतु:-

         ग्रीष्मकाल से भीषण गर्मी के कारण एक विशाल निम्न भार का कटिबन्ध कायम हो जाता है। इस निम्न भार को भरने के लिए बंगाल की खाड़ी से मुड़कर दक्षिण-पश्चिम हवाएँ स्थल की ओर चलने लगती हैं। बिहार में मानसूनी हवा का प्रवेश पूर्व से जानेवाली मानसूनी धारा के रूप में होता है। यह हिमालय के समानान्तर चलती है। सामान्यतः 15-20 जून तक बिहार में मानसून का आगमन हो जाता है। इस मानसून के आगमन से तापमान में कमी होती है और सापेक्ष आर्द्रता बढ़ जाती है। धीरे-धीरे तापमान में कमी होती है और उमस बढ़ जाती है। जुलाई-अगस्त में काफी वृष्टि होती है।

      राज्य के पूर्वी भाग में वर्षा अधिक तथा पश्चिम में वर्षा कम होती है। पूर्व में स्थित कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा तथा पश्चिम में स्थित राज्य के कुछ प्रमुख शहरों की औसत वार्षिक वर्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है। जैसे- पूर्णियाँ 107.5 सेमी०, सहरसा 138.5 सेमी०, दरभंगा 125 सेमी०, पटना 117 सेमी०, गया 99.2 सेमी० इस आँकड़े से पूर्व से पश्चिम आने पर वर्षा में कमी आती जाती है।

      बिहार में अधिकतर वर्षा ग्रीष्मकालीन मौनसून से होती है। इसे दक्षिण-पश्चिम मानसून भी कहते हैं।

     मानसून की वापसी तापमान की कमी के कारण अक्टूबर माह में प्रारम्भ होती है। इस काल में वर्षा की स्थिति नहीं बन पाती है। इस समय केवल हथिया नक्षत्र में थोड़ी वर्षा हो जाती है। इस समय रबी की फसल की बुआई शुरू हो जाती है।

3. शरद ऋतु:-

    वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर सितम्बर महीने से तापमान में गिरावट शुरू हो जाती है। इसके फलस्वरूप नवम्बर से फरवरी तक की अवधि में शीत शुष्क में बदल जाती है। इस ऋतु में मौसम अच्छा रहता है। यहाँ का औसत तापमान 10°C से नीचे चला जाता है। इस समय पश्चिमी चक्रवात से थोड़ी वर्षा हो जाती है। वर्षा की मात्रा 1 से 2 सेमी० से अधिक नहीं होती है। इस ऋतु में पटना का औसत तापमान 6.1°C, गया का 5.8°C तथा पूर्णियाँ का 4.4°C रहता है। शरद के अन्तिम चरण में तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है।

13. Sugar Industry in Bihar (बिहार में चीनी उद्योग

13. Sugar Industry in Bihar

(बिहार में चीनी उद्योग)



प्रश्न प्रारूप

Q. बिहार में चीनी उद्योग की स्थिति, समस्या एवं समाधान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

    बेबर के अनुसार चीनी उद्योग एक वजन ह्रास उद्योग है। इसलिए ऐसे उद्योगों की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में की जाती है। विश्व प्रसिद्ध गन्ना की पेटी बिहार के मुजफ्फरपुर से UP के मुजफ्फरनगर के बीच अवस्थित है। इसी गन्ना की पेटी में बिहार के अधिकांश चीनी मील अवस्थित थे।

    1960 के दशक तक बिहार भारत का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक राज्य था। लेकिन वर्तमान समय में प्रथम पाँच राज्य में बिहार की स्थान नहीं है। उत्तरी बिहार की भूमि और परम्परागत कृषि पद्धति चीनी उद्योग के लिए समुचित आधार प्रदान करती है। यही कारण है कि मेहरौरा (छपड़ा) नामक स्थान पर 1903 ई० में प्रथम चीनी का कारखाना स्थापित किए गया था।

      आज यह उद्योग रुग्ण अवस्था से गुजर रही है। बिहार में कुल 33 चीनी मीलें थी। इनमें से 17 चीनी मीलें पूर्णत बन्द हो चुके है। 33 चीनी मील में से 28 मील स्वतंत्रता से पूर्व ही स्थापित हुए थे। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के पूर्व 56 मील भारत में थी उनमें से 28 मील केवल बिहार में स्थापित है।

      स्वतंत्रता के बाद सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक भ्रष्टाचार, किसानों की घटती हुई अभिरुचि, खाद्यान्न फसल के साथ गन्ना उद्योग की प्रतिस्पर्द्धा इत्यादि के कारण चीनी का उत्पादन लगातार घटता गया। इसी संदर्भ में बिहार विभाजन के बाद JJ ईरानी की अध्यक्षता में पहली औद्योगिक विकास का गठन किया गया तो उसने सिफारिश किया कि झारखण्ड निर्माण के बाद बिहार को औद्योगिक मान‌चित्र पर लाने के लिए चीनी उद्योगों विकास अनिवार्य है।

     दर असल गन्ना एक नकदी फसल है। जिसका उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ा है लेकिन रणनीति के अभाव में बिहार का यह उद्योग लगातार पिछड़ रहा है। इसके पिछड़ेपन के निम्न‌लिखित कारण हैं:-

बिहार में चीनी उद्योग के पिछड़ापन के कारण

(1) गन्ना का उचित मूल्य नहीं:-

    गन्ना एक वर्षीय एवं नगदी फसल है। इसके उत्पादन के पीछे किसानों की मानसिकता और पर्याप्त लाभ की प्राप्ति रहती है अगर चीनी मील मालिक गन्ना उत्पादकों को उचित मूल्य समय पर दे देते हैं तो अगली बार किसान गन्ना की खेती करते हैं अन्यथा नहीं।

(2) अधिकांश गन्ना का उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में:-

     बिहार के अधिकांश गन्ना चीनी मील तक नहीं पहुंच पाती है बल्कि उनका उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में होता है। सम्पूर्ण भारत का 50% गन्ना उपयोग गुड़ एवं खण्डसारी उद्योग में ही प्रयुक्त हो जाता है।

(3) समुद्र से अधिक दूरी:-

     समुद्र से अधिक दूर होने के कारण बिहार के गन्ना में रस की मात्रा अपेक्षाकृत कम पायी जाती है। जैसे महाराष्ट्र में कुल गन्ना वजन का 12-15% रस प्राप्त होता है जबकि बिहार में 8-9% रस प्राप्त होता है।

(4) अधिकांश मील पुरानी:-

     बिहार के अधिकांश चीनी मील पुरानी हो चुकी है जिसके कारण उत्पादन की क्षमता अत्याधिक कम हो गयी है।

(5) वर्षभर चीनी मिलें चालू नहीं:-

    दक्षिण भारत की चीनी मील सांलो भर चलती रहती है क्योंकि इससे प्राप्त होने वाला ‘खोई’ आधारित कागज उद्योग मोलास पर आधारित शराब उद्योग का विकास किया गया है। वहीं जिस मौसम में गन्ने की आपूर्ति नहीं होती है उस मौसम में वहाँ की चीनी मीलें तेलहन की पेराई करते हैं।

     इस तरह दक्षिण भारत की मीलें सालोंभर किसी-न-किसी रूम में चलते रहती हैं लेकिन बिहार में इस तरह के उद्योग के अभाव में कुछ माह ही उद्योग चल पाते हैं।

(6) सरकारी उदासीनता और भ्रष्टाचार:-

     सरकारी उदासीनता और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के कारण चीनी उद्योगों से संबंधित अनुसंधान कार्य ठीक तरीके से नहीं हो पा रहे हैं।

(7) प्रतिकूल चीनी औद्योगिक नीति:-

     चीनी उद्योग का लाइसेन्सीकरण 40% लेबी और 15 किमी० के दायरे में 2 चीनी मील नहीं लगाने की नीति इत्यादि के कारण चीनी उद्योग के विकास में बाँधा पहुंची है।

(8) हरित क्रांति का आगमन:-

     बिहार में हरित क्रांति के आगमन के बाद गन्ना क्षेत्र में खाद्यान्न फसलों का घुसपैठ बढ़ा है जिसके कारण गन्ना उत्पादक क्षेत्र लगातार सिकुड़ते जा रहे है।

(9) सहकारिता का अभाव:-

      इन समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में सरकार ने समय-2 पर महत्वपूर्ण सुधारों की घोषणा करती रही है। जैसे-1998 ई० में सरकार ने लाइसेन्सी करण की नीति रद्द कर दिया। इसके बाद 40% की लेबी को घटाकर 15% कर दिया। वैश्विक स्तर पर WTO की स्थापना हो जाने के बाद अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्यात करने की मार्ग प्रशस्त हो चुकी है। सरकार ने यह निर्णय लिया है कि गन्ने के उपउत्पादकों को गैसहोल के रूप में किया जायेगा।

     उपरोक्त कदम उठाये जाने के बाद भी बिहार में पुनः चीनी उद्योग नहीं पनप पा रहे हैं क्योंकि किसानों को नकदी और गन्ना का उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। किसानों के फसलों का बीमाकरण नहीं हो पा रहा है।

      पुनः न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार मूल्य में काफी अन्तर दिखायी दे रहा है। रुग्ण मील तकनीकी सुधार नहीं कर पा रहे हैं। अपने कर्मचारियों को पिछला भुगतान नहीं कर पाये हैं। जब तक इन समस्याओं का समाधान नहीं होगा। तब तक इनका विकास संभव नहीं है।

    इसके अलावे बिहार की घरेलू बाजार अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार को मजबूत करते हुए चीनी उद्योग पर आधारित बिहार को विशिष्ट पहचान स्थापित की जा सकती है। मॉरीशस, क्यूबा, फिजी जैसे छोटे-2 द्वीपीय देश प्रबंधन के बल पर ही अगर वैश्विक पहचान रखते हैं तो बिहार ऐसा क्यों नहीं कर सकता है?


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2. बिहार का प्राकृ‌तिक प्रदेश / भौतिक इकाई

3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


2. Natural Region of Bihar (बिहार का प्राकृतिक प्रदेश)

2. Natural Region of Bihar

(बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई)



प्रश्न प्रारूप

Q. वर्तमान बिहार के प्राकृतिक प्रदेश की चर्चा करें।

      भारत के पूर्वी भाग में स्थित बिहार राज्य क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से भारत का 13वाँ सबसे बड़ा राज्य है। इसका भौगोलिक विस्तार 24ºN से 27°N अक्षांश और 83ºE से 88°E देशान्तर के बीच फैला हुआ है। इसका कुल क्षेत्रफल 94,163 किमी०² है। पूरब से पश्चिम इसकी लम्बाई 483किमी० तथा उत्तर से दक्षिण इसकी चौड़ाई 345 किमी० है।

    बिहार राज्य के उत्तर में नेपाल, दक्षिण में झारखण्ड, पूरब में प० बंगाल और पश्चिम में उत्तर प्रदेश अवस्थित है। इस राज्य का आकार लगभग आयताकार है। भारत के कुल क्षेत्रफल का 2.85% भाग बिहार के पास है। बिहार राज्य मुख्यतः मध्य गंगा के मैदानी क्षेत्र में फैला हुआ है। समुद्रतल से बिहार की औसत ऊँचाई 53 मी० है। भौतिक बनावट और संरचना के दृष्टि से बिहार को तीन प्राकृतिक प्रदेश में बाँटते हैं:-

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

2. गंगा का मैदानी क्षेत्र

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी क्षेत्र

Natural Region of Bihar

चित्र: बिहार का प्राकृतिक प्रदेश/भौतिक इकाई

1.  उत्तर का शिवालिक पर्वत पदीय प्रदेश

      यह बिहार के उ०-प० भाग में (प० चम्पारण) अवस्थित है। यह शिवालिक पर्वत का ही एक भाग है। इसका विस्तार 546 किमी०² पर हुआ है। इसकी औसत ऊंचाई 160 मी० निर्धारित है। इस पहाड़ी क्षेत्र में दो स्पष्ट पर्वतीय श्रृंखलाएं हैं और दोनों पर्वत एक-दूसरे के समानान्तर उ०-प० दिशा से द०-पू० दिशा में नेपाल की सीमा के सहारे फैला हुआ है। इस पर्वत पदीय प्रदेश के सम्पूर्ण भाग को तीन भाग में बाँटकर अध्ययन करते है-

(i) रामनगर दून की पहाड़ी

(ii) सोमेश्वर की पहाड़ी

(iii) दून क्षेत्र

     रामनगर दून की पहाड़ी 214 km2 क्षेत्र पर फैला हुआ है। इसकी अधिकतम ऊंचाई 240 मी० है। इसकी अधिकतम चौड़ाई संतपुर के पास है। रामनगर दून 6-8 km चौड़ा है। यहाँ पर दक्षिणी श्रेणी के रूप में फैला हुआ है।

    सोमेश्वर श्रेणी त्रिवेणी नहर के शीर्ष भाग से शुरू होकर पूरब में भिखना थोरी दर्रा तक बिहार में फैला हुआ है। इसकी लम्बाई 74 किमी० और चौड़ाई 4.6 से 6.4 किमी० तक है। इसकी औसत ऊँचाई 457 मी० है। इस पर्वत में नदियों के द्वारा कई दर्दो का निर्माण हुआ है। जैसे सोमेश्वर दर्रा, भिखनाथोरी दर्रा, हरहा दर्रा इत्यादि प्रमुख हैं।

दून क्षेत्र-

    रामनगर दून और सोमेखर पहाड़ी के बीच में 22.5 किमी० लम्बा और समुद्रतल से 152 मी० ऊँचा एक घाटी है। जिसे दून घाटी से सम्बोधित करते हैं। उल्लेखनीय है कि विभाजित बिहार की सबसे ऊंची चोटी “सोमेश्वर की पहाड़ी” (874 मी०) है।

2.  गंगा का मैदानी भाग

     इसे बिहार का मैदान भी कहा जाता है। इसका विस्तार 90,650 km² भूभाग पर हुआ है। इस मैदान के उत्तर में शिवालिक पर्वत श्रृंखला और दक्षिण में छोटानागपुर का पठार अवस्थित है। पश्चिम में इसकी चौड़ाई अधिक है जबकि पूरब में कम। इस मैदान का निर्माण हिमालय तथा प्रायद्वीय पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा लायी गयी मालवा के निक्षेपण से हुआ है। गंगा नदी इस मैदान के मध्य से होकर पश्चिम से पूरब दिशा में प्रवाहित होती है। इसका तात्पर्य है कि इस मैदान का सामान्य ढाल पश्चिम से पूरब दिशा की ओर हुआ है। गंगा नदी बिहार के मैदान को दो भागों में बाँट देती है।

(i) गंगा के उत्ती मैदानी भाग

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदानी भाग

(i) गंगा का उत्तरी मैदानी भाग

      गंगा नदी के उत्तर में पूरब से पश्चिम दिशा में फैला एक चौरस मैदान है जिसका क्षेत्रफल 57000 km2 है। इस मैदान का सामान्य ढाल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर है। इसकी औसत ऊँचाई 76.2 मी० से भी कम है। इसका निर्माण गण्डक, बागमती, कोशी और महानन्दा नदी के द्वारा लायी गयी मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। यह मैदान गण्डक के मैदान, बागमती का मैदान (मिथिला का मैदान), कोशी के मैदान के नाम से भी जाना जाता है। इस मैदान में निम्नलिखित संरचना दिखाई देते हैं-

(a) भावर प्रदेश-

    इसका विस्तार नेपाल और बिहार के सीमामर्ती क्षेत्रों में हुआ है। इसक निर्माण नदियों के द्वारा लायी गई “बोल्डर क्ले” के निक्षेपण से हुआ है। इसकी चौड़ाई 8-16 किमी० के बीच है।

(b) तराई प्रदेश

    यहां का दूसरा महत्वपूर्ण संरचना तराई प्रदेश है। इसक विस्तार भावर के दक्षिणी भाग में हुआ है। इस प्रदेश में जगह-जगह पर दलदली भूमि भी मिलते हैं। इसी भूभाग पर विश्व की प्रसिद्ध गन्ना की पेटी अवस्थित है।

(c) बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश 

    गंगा नदी और उसके सहायक नदियों के द्वारा यहाँ कई अन्य स्थलाकृतियों का विकास हुआ है। जैसे- बाँगड़ और खादर मृदा प्रदेश।

    बाँगड़ प्रदेश वे हैं जहाँ नदियों के द्वारा लायी गयी मलवा निक्षेपण का कार्य बंद हो चुका है और खादर संरचना वह है जहाँ पर मलवा का निक्षेपण आज भी जारी है।

      गंगा के उत्तरी मैदान में कई जगह प्राकृतिक बाँध, चौर, नदी दोआब का भी प्रमाण मिलता है। प्राकृतिक बाँध ऐसी स्थलाकृति है जो नदियों के तट के सहारे विकसित होती है। बाढ़ के दिनों में लोग इस पर आकर शरण लेते हैं।

    उत्तरी बिहार की नदियाँ मार्ग परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध है। नदियों के पुराने मार्ग को ही चौर कहा जाता है। दो नदियों के मध्यवर्ती भूभाग को नदी दोआब कहा जाता है। नदियों के बीच-2 में बालू के निक्षेपण से दियरा क्षेत्र का भी विकास हुआ है।

(ii) गंगा के दक्षिणी मैदान

     इसका कुल क्षेत्रफल 33,670 किमी०² है। यह उत्तरी बिहार की तरह समतल नहीं है। इस मैदान के दक्षिणी भाग में छोटानागपुर का पठार और उसके कई छोटे-2 पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं। पहाड़ी के रूप में कैमूर की पहाड़ी, राजगीर की को पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, राजमहल की पहाड़ी, बांका की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी इत्यादि प्रमुख है। इस मैदान के दक्षिणी सीमा पर रोहतास का पठार, डुमरिया उच्च भूमि इत्यादि अवस्थित है। इस मैदान का निर्माण छोटानागपुर के पठार से निकलने वाली नदियों के द्वारा हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर क्रमश: कर्मनाशा, सोन, पुनपुन, फल्गू, किऊल जैसी नदि‌याँ मिलती है।

    इस मैदान का सामान्य ढाल दक्षिण से उतर की ओर हुआ है। सोन का मैदान, मगध का मैदान, बिहारशरीफ- लखीसराय का मैदान और भागलपुर के मैदान के रूप में विभक्त है। गंगा नदी के किनारे जल्ला, टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इनके अलावे गंगा नदी पटना के पास प्राकृतिक बाँध का निर्माण करती है। पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र, मोकामा क्षेत्र और मोकामा के पास टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। इस मैदान में ही आरा और बक्सर के बीच में सहार-संदेश क्षेत्र का निर्माण हुआ है।

3. दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश

      बिहार के दक्षिणी सीमान्त भूगाग में विन्ध्यन श्रेणी का पूर्वी भाग और छोटानागपुर पठार का उत्तरी भाग अवस्थित है। छोटानागपुर के पठार के अधिकांश भाग ग्रेनाइट, नीस और शिष्ट जैसे चट्टानों से निर्मित है। विन्ध्यन श्रेणी का बिहार में विस्तृत श्रेणी कैमूर की श्रेणी कहलाती है जिसमें चूना पत्थर संरचना का विकास हुआ है।

   दक्षिण का सीमान्त पठारी प्रदेश में कई छोटी पहाड़ि‌याँ मिलती हैं। जैसे- बराबर की पहाड़ी, गया की पहाड़ी, जेटठियन की पहाड़ी, राजगीर की पहाड़ी, शेखपुरा की पहाड़ी, खड़गपुर की पहाड़ी, बिहार शरीफ एवं जमालपुर की पहाड़ी इत्यादि प्रसिद्ध है। छोटानागपुर तथा कैमूर के पठार का अपरदित भाग ही बिहार में अवस्थित है। जिसकी औसत ऊँचाई 150-300 मी० है। यह भाग पूर्णतः विषम क्षेत्र है। छोटानागपुर पठार से निकलने वाली नदियाँ इसी सीमान्त प्रदेश को छोड़‌कर मैदानों में प्रविष्ट करती है। रोहतास से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक कटक के रूप में यह ‌भाग अवस्थित है। कोडरमा की घाटी, चतरा की घाटी और कैमूर की घाटी छोटानागपुर पठार में प्रवेश हेतु द्वार उपलब्ध करवाती है।

निष्कर्ष:

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार का अधिकांश भाग मध्यवर्ती गंगा के मैदानी क्षेत्र में अवस्थित है। इसका उत्तरी भाग हिमालय को तथा दक्षिणी भाग प्रायद्वीपीय भारत को छूती है। इस तरह से यहाँ पर्वतों, पठारों एवं मैदानों का विषम संयोग पाया जाता है।


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1. बिहार : सामान्य जानकारी

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3. बिहार की जलवायु

4. बिहार के भौगोलिक इकाई का आर्थिक विकास पर प्रभाव

5. बिहार की मिट्टियाँ

6. बिहार में सूखा

7. बिहार में बाढ़

8. बिहार का औद्योगिक पिछड़ापन

9. बिहार के आर्थिक पिछड़ेपन के कारण

10. बिहार का औद्योगिक प्रदेश

11. बिहार का कृषि प्रदेश

12. बिहार में कृषि आधारित उद्योग

13. बिहार में चीनी उद्योग

14. सिन्दरी उर्वरक उद्योग

15. बिहार की जनजातीय समस्या एवं समाधान

16. बिहार में ग्रामीण बस्ती प्रतिरूप

17. पटना नगर नियोजन/पटना का मास्टर प्लान

18. बिहार में नगरीकरण

19. बिहार में ग्रामीण बाजार केन्द्र

20. महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ट प्रश्नोत्तर


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