8. Social Forestry (सामाजिक वानिकी)

8. Social Forestry

(सामाजिक वानिकी)



प्रश्न प्रारूप

Q.1 सामाजिक वानिकी क्या है? क्यों इसे सक्रिय रूप में बढ़ायी जा रही है?

Q.2 भारत में वन प्रबंधन में जन भागीदारी पर प्रकाश डालिए।

Social Forestry

      सामाज के द्वारा समाज के लिए वन लगाने की प्रक्रिया और कार्यक्रम को सामाजिक वानिकी कहते है। सामाजिक वानिकी शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1967 में वेस्टानी महोदय ने किया था। भारतीय संदर्भ में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग ने किया था। कृषि आयोग की अनुसंशा पर ही इसकी प्रायोगिक शुरुआत 1980 ई० में किया गया और 1981 ई० में 101 जिला में शुभारम्भ किया गया। 1983 में इसे सम्पूर्ण भारत में लागू कर दिया गया। 1983 ई० में वानिकी कार्यक्रम हेतु एक “A Tree for every child” का नारा दिया गया तथा हिमाचल प्रदेश में चल रहे मृदा संरक्षण कार्यक्रम की सामाजिक वानिकी का अंग बना दिया गया।

सामाजिक वानिकी के प्रकार

        सामाजिक वानिकी चार प्रकार के होते हैं:-

(1) कृषि वानिकी

(2) ग्रामीण वानिकी

(2) नगरीय वानिकी

(4) क्षति पूर्ति वानिकी

         कृषि वानिकी के अंतर्गत किसानों के द्वारा अपने निजी भूमि पर और खेतों के मेढ़ पर वन लगाया जाता है।

         ग्रामीण वानिकी के तहत गाँव में परती पड़े सरकारी भूमि के ऊपर ग्रामीणों के द्वारा वन लगाया जाता है। यह कार्य सहकारिता संस्था, सामुदायिक संस्था तथा पंचायतों के द्वारा होता है।

         जबकि नगरीय वानिकी के तहत नगरीय लोगों को घरों में एवं नगर में खाली पड़े जमीन पर वन लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है।

       जबकि क्षतिपूर्ति वानिकी के तहत वैसे औद्योगिक घरानों को जो उद्योग लगाना चाहते हैं उन्हें औद्योगिक संस्थानों के इर्द-गिर्द वन लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है। पुनः जिस क्षेत्र में जितना वन काटा जाता है उसके एवज में उससे भी अधिक वन लगाने के लिए लोगों प्रेरित किया जाता है।

सामाजिक वानिकी के उद्देश्य

        सामाजिक वानिकी के निम्नलिखित उद्देश्य स्थापित की गई है:-

(i) जलावन या ईंधन की लकड़ी सुनिश्चित करना,

(ii) ग्रामीण क्षेत्रों में फल-फूल एवं अन्य खाद्य पदार्थों की आपूर्ति बढ़ाना,

(iii) खेतों को छाया प्रदान करना और वाष्पोत्सर्जन को कम करना,

(iv) पशुओं के लिए चारा उपलब्ध कराना,

(v) कृषि उपकरणों तथा अन्य उपयोग के लिए लकड़ी की उपलब्धता बढ़ाना,

(vi) भूमिगत जल स्तर में सुधार लाना इत्यादि।

          प्रसिद्ध सामाजिक वानिकीविद डा० डी० पी० सिंहा ने सामाजिक वानिकी के उद्देश्यों को एक मॉडल के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है। जैसे- 

Social Forestry

         ऊपर के मॉडल के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि सामाजिक वानिकी के काफी व्यापक उद्देश्य निर्धारित किये गये हैं। इन्हीं उद्देश्यों की आपूर्ति हेतु सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है।

सामाजिक वानिकी की असफलता के कारण

(1) आमलोगों की सहभागिता का अभाव- आम जनता की सहभागिता दो कारणों से नहीं बढ़ पा रही है।

(i) आम जनता इसे सरकारी कार्यक्रम समझती है। इसलिए उनका मानना है कि पेड़ लगाने का कर्तव्य सरकार को है।

(ii) लोग लगाये गये वन क्षेत्र को अपना समझ नहीं पाते हैं।

(2) जलवायु के अनुकूल वृक्ष के किस्मों का चुनाव न होना।

(3) क्षेत्र का सर्वेक्षण या मूल्यांकन किए बगैर ही वृक्षारोपण की कार्यक्रम किया गया।

(4) तकनीकी ज्ञान का अभाव:- आम धारणा यह है कि वृक्षों को रोपने के लिए तथा उसके संवर्धन के लिए कोई विशेष तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। जबकि पौधों की पांच साल की सुरक्षा अनिवार्य है तथा वन लगाने के लिए तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है। सरकार के द्वारा इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल नहीं किया गया।

(5) अंधाधुन वृक्षों की कटाई तथा पौधो की पशुचराई आम समस्या है।

(6) उत्पादन योग्य वन होने के पूर्व ही उनका शोषण प्रारंभ हो जाता है।

(7) कानूनी सुरक्षा का अभाव।

(8) वृक्षारोपण के दौरान छोटे-2 पौधों का रोपा जाना।

(9) वृक्ष काटने तथा उनके परिवहन एवं विपणन के नीति का दोषपूर्ण होना।

(10) सरकारी कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न एवं गैर कानूनी शुल्क की वसूली।

          उपरोक्त कारणों के चलते सामाजिक वानिकी अपेक्षित सफलता नहीं दे पायी।

सामाजिक वानिकी में NGO की भूमिका

           सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में गैर सरकारी संगठन (NGO) कई प्रकार से भूमिकाएँ निर्वहन कर सकती है।

(1) ये आम जनता को वन लगाने के लिए उत्प्रेरित कर सकती है।

(2) NGO प्रारंभ में वानिकी के लिए नेतृत्व प्रदान कर सकते है और धीरे-2 लोगों को नेतृत्त्व का काम सीखाकर वहाँ से हट सकते हैं।

(3) NGO आम जनता और सरकारी तंत्र के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।

(4) NGO सामाजिक वानिकी के प्रत्येक पहलू से आम लोगों को अवगत करवा सकते हैं।

(5) NGO सही गुणवत्ता वाले बीज, पौधे, औजार, पॉलीथीन और सुरक्षा सामाग्री लोगों को उचित मूल्य पर उपलब्ध करवा सकते हैं और इसके प्रयोग हेतु लोगों को प्रशिक्षित कर सकते हैं।

(6) NGO लोगों के समुदाय के रूप मैं संगठित कर सकते हैं।

        इस तरह सामाजिक वानिकी के क्षेत्र में NGO की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती हैं। महाराष्ट्र के गरद गाँव में डॉ. अरविन्द रेड्डी और उनके सहयोगियों का NGO ने सामाजिक वानिकी कार्यक्रम को सफलतापूर्वक लागू कर सामाजिक वानिकी में निर्धारित प्रत्येक उद्देश्य को सफलतापूर्वक हासिल किया है। इस कार्य के लिए राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से उन्हें पुरस्कृत भी किया जा चुका है।

7. Crop Pattern (कृषि प्रतिरूप / फसल प्रतिरूप / शस्यन प्रतिरूप)

7. Crop Pattern

(कृषि प्रतिरूप / फसल प्रतिरूप / शस्यन प्रतिरूप)



प्रश्न प्रारूप

Q.1  फसल प्रतिरूप से आप क्या समझते है?

Q.2 फसल प्रतिरूप को प्रभावित करने वाले कारक;

Q.3 फसल प्रतिरूप का वितरण, महत्व तथा मूल्यांकन एवं सुझाव।

फसल प्रतिरूप क्या है?

       फसल प्रतिरूप का तात्पर्य किसी निश्चित समय में विभिन्न फसलों के अन्तर्गत प्रयोग किये जाने वाले भूमि से है। प्रत्येक वर्ष सरकार इस प्रकार का आंकड़ा प्रस्तुत करती है, जिसमें यह बताया जाता है कि किस फसल के अन्तर्गत कितना भूमि का उपयोग किया गया है।

     कृषि प्रतिरूप एक गत्यात्मक संकल्पना है जो समय तथा स्थान के संदर्भ में परिवर्तन होता रहता है। किसी भी भौगोलिक प्रदेश के फसल प्रतिरूप कई कारकों के द्वारा प्रभावित होता है जिनमें भौगोलिक कारक, सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण है।

     भौगोलिक कारकों के अन्तर्गत धरातल की विशेषता जैसे- पर्वत, पठार और मैदान, जलवायु से संबंधित कारक मृदा और जल की उपलब्धता को शामिल करते हैं। जहाँ पर भौगोलिक कारक प्रतिकूल होते हैं वहाँ पर विभिन्न फसलों के अन्तर्गत प्रयुक्त किये जाने वाले भूमि का क्षेत्रफल कम होता है। लेकिन, जहाँ पर भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूल होती है, वहाँ फसल प्रतिरूप का स्तर ऊँचा होता है।

      भौगोलिक विविधता, फसल प्रतिरूप को कैसे प्रभावित करती है, इसे उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे- राजस्थान में कम वर्षा वाला क्षेत्र के किसान अधिकतर भूमि का प्रयोग बाजरा की खेती में करते हैं जबकि असम के ब्रह्मपुत्र घाटी में अधिकतर भूमि का प्रयोग चावल कृषि के अन्तर्गत किया जाता है।

     भौगोलिक कारकों के अलावे कई सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक भी फसल प्रतिरूप को प्रभावित करते है। भूमि स्वामित्व, भूमि काश्तकारी, जोत का आकार, चकबंदी कृषि विकास के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम इत्यादि जैसे कारक प्रमुख मानवीय कारक है। छोटे भूमि रखने वाला किसान खेती के लिए श्रम वाले फसल का चयन करते हैं, वहीं बड़े जोत रखने वाले किसान गहन पूंजी पर आधारित फसलों की प्रधानता देते हैं।

       वर्तमान समय में मानव के द्वारा किया जा रहा तकनीकी विकास भौतिक सीमाओं में सुधार लाकर फसल प्रतिरूप में परिवर्तन ला रहा है जैसे- पंजाब, हरियाणा, उ० राजस्थान में चावल की कृषि संभव नहीं है लेकिन यहाँ के किसानों ने सिंचाई साधनों का विकास कर अधिकाधिक उर्वरकों का प्रयोग कर चावल की कृषि करने लगे हैं। जिसके कारण उस क्षेत्र का कृषि प्रतिरूप लगातार परिवर्तित होता जा रहा है।

      कृषि प्रतिरूप का आकलन आपेक्षिक उपज सूचकांक तथा आपेक्षिक विस्तार के आधार पर ज्ञात किया जाता है। आपेक्षिक उपज सूचकांक और आपेक्षिक उपज विस्तार निम्न सूत्र से ज्ञात करते हैं:-

(1) आपेक्षिक सूचकांक = क्षेत्रीय इकाई क्षेत्रफल में किसी फसल का औसत उपज /  कुल क्षेत्रफल का औसत उपज X 100

(2) आपेक्षिक विस्तार सूचकांक = किसी विशिष्ट फसल के अंतर्गत प्रयुक्त भूमि का क्षेत्रफल (% के रूप में) / कुल फसल के अंतर्गत प्रयुक्त भूमिका क्षेत्रफल X 100

     भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने संपूर्ण भारत को चार फसल प्रतिरूप में विभक्त किया है:-

(1) अधिक उपज अधिक विस्तार वाला क्षेत्र, जैसे- धान एवं गेहूँ का फसल प्रतिरूप।

(2) अधिक उपज निम्न विस्तार का क्षेत्र,जैसे- फल एवं सब्जी कृषि फसल प्रतिरूप।

(3) निम्न उपज अधिक विस्तार का क्षेत्र, जैसे- मोटे अनाज फसल प्रतिरूप।

(4) निम्न उपज निम्न विस्तार का क्षेत्र, जैसे- दहलन तथा तेलहन फसल प्रतिरूप।

      उपरोक्त वर्गीकरण से स्पष्ट है कि भारत में विविध फसल प्रतिरूप का विकास हुआ है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि ऊपर बताया गया फसल प्रतिरूप कोई दीर्घकालिक वर्गीकरण नहीं है बल्कि समय तथा स्थान के संदर्भ में परिवर्तित होता रहा है।

फसल प्रतिरूप का महत्व

      फसल प्रतिरूप संकल्पना का अध्ययन कृषि अर्थव्यवस्था के विकास हेतु महत्वपूर्ण है। इसके अध्ययन से किस फसल के अंतर्गत कितना भूमिका उपयोग होता है, इसके संबंध में जानकारी प्राप्त कर कितना संस्थागत तथा संरचनात्मक कारकों का निवेश किया जा सकता है। इसका आकलन किया जा सकता है। इसके अलावे किस भौगोलिक क्षेत्र में किस फसल को प्राथमिकता दी जाय? इसका निर्धारण किया जा सकता है।

      फसल प्रतिरूप के अध्ययन से ही यह ज्ञात हुआ है कि भारत के 72% योग्य भूमि पर खाद्यान्न फसलों की खेती होती है उसमें भी धान तथा गेहूँ की महत्ता अधिक है। भारत में जीवन निर्वाह फसलों की खेती अधिक होती है। यहाँ का किसान आधुनिक तकनीक तथा पूंजी का निवेश कम करता है। इसका मूल्यांकन हम आपेक्षिक विस्तार सूचकांक के माध्यम से ज्ञात करते हैं।

      अत: भारत में अधिक उपज देने वाले फसल-प्रतिरूप को बढ़ावा देने हेतु ज्यादा से ज्यादा संस्थागत एवं संरचनात्मक कारकों के पुनर्निवेशन को बढ़ावा देना होगा। फसल चक्र पर आधारित कृषि कार्य को महत्ता प्रदान करनी होगी।

6. Intensity of Cropping (फसल गहनता / शस्य गहनता / फसल तीव्रता)

6. Intensity of Cropping

(फसल गहनता / शस्य गहनता / फसल तीव्रता)



       शस्य गहनता का अर्थ यह है कि एक खेत में एक वर्ष में कितनी बार फसलें ली जाती है। शस्य गहनता भूमि उपयोग की गहनता को व्यक्त करता है। शस्य गहनता का सूचकांक जितना अधिक होगा, भूमि उपयोग की क्षमता भी उतनी अधिक होगी।

भारत का शस्य गहनता सूचकांक 136% (2021 में) है। 

       खाद्यान्नों के उत्पादन को बढ़ाने के दो उपाय है-

(i) कृषि योग्य भूमि का विस्तार कर और

(ⅱ) फसल गहनता में वृद्धि कर।

    भारत के संदर्भ में अब, कृषि योग्य भूमि का विस्तार किसी सीमा तक ही बढ़ाया जा सकता है, उसके बाद नहीं। अतः खाद्यान्नों के उत्पादन में वृद्धि करने के लिए शस्य गहनता में वृद्धि एक मात्र विकल्प नजर आता है।

    शस्य गहनता कुल बोया गया क्षेत्र तथा कुल कृषि योग्य भूमि का अनुपात होता है। इसे प्रतिशत (%) में व्यक्त किया जाता है। भूगोलवेत्ता डॉ. ब्रजभूषण सिंह ने फसल गहनता निकालने के लिए 1979 ईo में निम्न सूत्र विकसित किया है-

शस्य गहनता = कुल बोया गया क्षेत्र/ कुल कृषि योग्य भूमि X 100

       उदाहरण के लिए माना कि किसी किसान के पास 10 हेक्टेयर कृषि भूमि है। उसने खरीफ के मौसम में पूरे 10 हेक्टेयर क्षेत्र पर फसलें बो दी और खरीफ की फसल काटने के बाद उसने पुनः 6 हेक्टेयर भूमि पर रबी की फसलें बो दीं। इसका अर्थ यह हुआ कि उसने 10+6 = 16 हेक्टेयर भूमि से फसलें ली, हालांकि उसके पास कुल भूमि 10 हेक्टेयर ही है। इस उदाहरण में शस्य गहनता 160% हुई।

शस्य गहनता = 16 /10 ×100

                     = 160%

     इस प्रकार, शस्य गहनता भूमि उपयोग की गहनता/क्षमता/दक्षता को व्यक्त करता है। शस्य गहनता का सूचकांक जितना अधिक होगा, भूमि उपयोग की क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी।

शस्य गहनता को प्रभावित करने वाले कारक

(1) सिंचाई

(2) उर्वक

(3) शीघ्र पकने वाली तथा उन्नत बीज (HYV)

(4) कृषि का यंत्रीकरण

(5) कीटनाशक दवाएँ

(6) मृदा की उर्वरता

(7) कृषि पद्धति

(8) जलवायु

(9) संस्थागत एवं संस्चनात्मक सुविधाओं का विकास

शस्य गहनाता का वितरण

      सम्पूर्ण भारत में औसत शस्य गहनता सूचकांक 135% है। यह विभिन्न प्रदेशों में भिन्न-भिन्न है जिससे विभिन्न क्षेत्रों में भूमि की उपयोगिता तथा खाद्यान्नों के उत्पादन का अनुमान लगाया जा सकता है। शस्य गहनता का सूचकांक एक बार से अधिक बोये गये क्षेत्र के विस्तार पर निर्भर करता है। जितना एक बार से अधिक बोया गया क्षेत्र विस्तृत होगा, उतना ही शस्य गहनता का सूचकांक भी अधिक होगा। जिन क्षेत्रों में शस्य गहनता का सूचकांक अधिक होगा, वहाँ पर खाद्यान्नों का उत्पादन भी अधिक होगा।

भारत में शस्य गहनता का वितरण
गहनता का वर्ग गहनता का % क्षेत्र कारण
अति न्यून गहनता 10 % से कम प० राजस्थान, लद्दाख, वृष्टि छाया प्रदेश मरुस्थलीय भाग, पहाड़, कम वर्षा
न्यून गहनता 10-30 % उ०-पू० भारत, सिक्किम, कुमायूं हिमालय पर्वतीय स्थिति
मध्यम गहनता 30-70% मध्यवर्ती भारत, प्रायद्वीपीय भारत के 50-100 cm वर्षा वाला क्षेत्र पठारीय स्थिति
अधिक गहनता 70-130 % हरित क्रांति एवं कमांड एरिया वाले क्षेत्र हरित क्रांति, संरचनात्मक एवं संस्थागत सुविधा का विकास
अत्यधिक गहनता 130 % से अधिक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, महानगरों के चारों ओर  हरित क्रांति, महानगरीय सुविधा

स्रोत: कृषि संगणना वर्ष (2005-06)Intensity of Cropping

फसल गहनता बढ़ाने के उपाय

(1) सिंचाई का विकास

(2) HYV

(3) उर्वरक तथा कीटनाशक का प्रयोग

(4) कृषि का यंत्रीकरण

(5) फसल चक्र

(6) वैज्ञानिक कृषि पद्धति

(7) इन्द्रधनुषी क्रांति

(8) पशु और फसलों का संयोजन

        इत्यादि आधारभूत संरचना एवं संस्थागत सुविधाओं का विस्तार कर फसल गहनता बढ़ायी जा सकती है।

निष्कर्ष:

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि भारत में फसल गहनता में काफी विषमता देखी जाती है। अतः निम्न फसल गहनता वाले क्षेत्रों में ऊपर बताये गये उपायों को लागू कर फसल गहनता बढ़ायी जा सकती है।

5. Agro-Climatic Regions of India (भारत का कृषि जलवायु प्रदेश)

Agro-Climatic Regions of India

(भारत का कृषि जलवायु प्रदेश)

प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में कृषि जलवायु प्रदेश के भौगोलिक आधार की विवेचना कीजिए।

Q. भारत के कृषि जलवायु प्रदेश के निर्धारण के आधार, वर्गीकरण तथा विशेषता बतलाइए।

    कृषि जलवायु प्रदेश के वर्गीकरण का कार्य भारतीय कृषि के नियोजन और विकास की दिशा में किया गया एक महत्वपूर्ण कार्य है। यह वर्ष योजना आयोग के आवश्यकता पर आधारित है। योजना आयोग के अनुशंसा पर 1988 ई० में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कृषि जलवायु प्रदेश का निर्धारण किया था। कृषि जलवायु प्रदेश एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है जहाँ जलवायु के अनुरूप कृषि कार्य किया जाता है। भारतीय कृषि जलवायु प्रदेश का निर्धारण पाँच कारकों के आधार पर किया गया है। जैसे-

(1) कृषि उत्पादों की माँग एवं आपूर्ति,

(2) कृष्‌कों की वास्तविक आय,

(3) कृषि प्रदेश में भूमिहीन कृषकों का अनुपात,

(4) कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रबंधन का स्तर,

(5) सतत् विकास की अवधारणा।

       भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) का यह कार्य भारत के 456 जिलों के अध्ययन पर आधारित था। ऊपर बताये गये कारकों का पुनः सह संबंध जलवायु से स्थापित कर कृषि जलवायु प्रदेश के निर्धारण किया गया। ICAR ने भारत को कुल 15 कृषि जलवायु प्रदेशों में बांटा है। :-

(1) पश्चिम हिमालय क्षेत्र,

(2) पूर्वी हिमालय क्षेत्र,

(3) निचली गंगा का मैदान,

(4) मध्यवर्ती गंगा का मैदान,

(5) ऊपरी गंगा का मैदान,

(6) गंगा का तराई क्षेत्र,

(7) पूर्वी पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(8) मध्य पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(9) पश्चिमी पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(10) द० पठार और पहाड़ी क्षेत्र,

(11) पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र,

(12) प० तटीय मैदान और प० घाट,

(13) गुजरात का मैदान और पहाड़ी क्षेत्र,

(14) पश्चिमी शुष्क क्षेत्र,

(15) द्वीपीय क्षेत्र।

      ICAR द्वारा सभी प्रदेशों में उत्पन्न होने वाले सभी फसलों का तालिका बनाया गया। उसके बाद उत्पादन और उत्पादकता का विश्लेषण किया। विश्लेषण के क्रम में ICAR ने अनुभव किया कि किसान जलवायु और भूमि की दक्षता के अनुरूप फसलों का उत्पादन नहीं करते है। जहाँ की पारिस्थैतिकी चावल के लिए उपयुक्त नहीं है वहाँ भी चावल की खेती की जाती है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कृषि जलवायु प्रादेशीकरण की योजना प्रस्तुत की गई। प्रत्येक कृषि जलवायु प्रदेश की विशेषता निम्न है:- 

(1) पश्चिम हिमालय क्षेत्र:-

    यहाँ की जलवायु उपोष्ण तथा शीतोष्ण प्रकार की है। यहाँ बगानी फसलों की प्रधानता दी गई है। लेकिन, अन्तर पर्वतीय मैदानी भाग में चावल, गेहूँ, मक्का और दलहन को प्रमुख फसल माना गया है। लद्दाख के पहाड़ पर मक्का तथा सोयाबीन जैसे फसलों की अनुसंशा की गई है।

(2) पूर्वी हिमालय क्षेत्र:-

     यहाँ की जलवायु विषुवतीय एवं मानसूनी प्रकार की है जहाँ सिंचाई की सुविधा उपलब्ध नहीं है, वहाँ पर झूम कृषि की जा सकती है। जिन क्षेत्रों में सिंचित भूमि उपलब्ध है, वहाँ पर चावल, गेहूं और सरसों की खेती अनुशंसा की गई है। पुनः वर्षा आधारित सिंचाई वाले क्षेत्रों में चावल और जूट प्रमुख फसल माना गया है।

(3) निम्न गंगा मैदान:-

      यह मूलतः प० बंगाल और पूर्वी बिहार में फैला हुआ है। यहाँ चावल तथा जूट की खेती की अनुसंशा की गई है। पुनः प० बंगाल के उत्तरी भाग में चाय की खेती और दक्षिण में स्थित मिदनापुर में गन्ना को एक महत्त्वपूर्ण फसल माना गया है।

(4) मध्यवर्ती गंगा के मैदान:-

     इसका विस्तार इलाहाबाद से लेकर राजमहल की पहाड़ी तक हुआ है। यहाँ चावल की खेती सघन निर्वाह कृषि के रूप में किया जाता है। हाल के वर्षों में सिंचाई की मदद से गेहूं की कृषि प्रारंभ की गई है। ICAR ने चावल, गेहूँ, दलहन को जलवायु के अनुकूल माना है।

(5) ऊपरी गंगा के मैदान:-

     इसका विस्तार इलाहाबाद के पश्चिम में हुआ है। यहाँ सिंचित भूमि पर गेहूँ और असिंचित भूमि पर मक्का तथा दिलहन की खेती की जाती है। लेकिन नवीन योजना में निम्नलिखित फसल समूह को विकसित करने पर जोर दिया है-

(i) चावल-गेहूँ-मूंग

(iⅰ) मक्का-दलहन-प्याज

(6) गंगा के तहाई प्रदेश:-

     यहाँ गेहूं तथा गन्ना प्रमुख फसल है। लेकिन, जलवायु प्रदेश योजना में उपरोक्त फसल के अलावे आलू और चावल की अनुसंशा की गई है।

(7) पूर्वी पठार तथा पहाड़ी क्षेत्र:-

    यहाँ का कृषक मुख्यतः मडुवा, दलहन और चावल उत्पन्न करते रहे हैं। यह क्षेत्र छोटानागपुर के पठार पर स्थित है। ICAR ने यहाँ उपरोक्त फसल के अलावे गेहूँ चावल तथा चना की खेती करने की अनुसंशा की है।

(8) मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र:-

    यह मध्य भारत में अवस्थित है। यहाँ सिंचाई साधनों का सीमित विकास हुआ है जिसके चलते मृदा में नमी कम पायी जाती है। यहाँ पर मोटे अनाजों की खेती की जाती है।

     यही परिस्थितिक (9) पश्चिमी पठार और पहाड़ी क्षेत्र में पुन: (10) दक्षिण पठारी एवं पहाड़ी क्षेत्र में मिलती है। इसलिए इन दोनों में मृदा की नमी पर आधारित फसलों की अनुसंशा की गई है। मध्यवर्ती पठारी क्षेत्र में चावल, मूंगफली और गेहूँ की खेती के लिए अनुकूल माना गया है। असिंचित क्षेत्रों में सोयाबीन ज्वार, अरहर और बाजरा की खेती को अनुकूल माना गया है। इसी प्रकर की अनुशंसा प‌श्चिमी और दक्षिण के पठारी क्षेत्रों के लिए किया गया।

(11) पश्चिमी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र:-

      इस क्षेत्र को सिंचित एवं असिंचित क्षेत्र में बाँटा जा सकता है। सिंचित क्षेत्र में चावल, अरहर, दलहन, खासकर के मूंग को प्रमुख फसल माना गया है। जबकि असिंचित क्षेत्र में मूंगफली, सोरघम (ज्वार) और अरहर को प्रमुख फसल माना गया है। पुनः केरल के लैटेराइट वाला पठार पर चावल, टोपाइका और नारियल की खेती की अनुसंशा की गई।

(12) पूर्वी तटीय मैदान और पहाड़ी क्षेत्र:-

      इसमें पूर्वी घाट, कोरोमंडल तट और उत्तरी सरकार तट को शामिल करते हैं। यहाँ ज्वार, बाजरा की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। यहाँ सिंचित क्षेत्रों में चावल और गेहूँ जबकि असिंचित क्षेत्रों में ज्वार, बाजरा, दलहन एवं तेलहन की अनुशंसा की गयी है।

(13) गुजरात का मैदानी एवं पहाड़ी क्षेत्र:-

        गुजरात में सूरत जिला को छोड़कर सिंचाई साधनों का अभाव है, लेकिन संभावित सिंचित क्षेत्र अधिक है। वर्तमान समय में असिंचित क्षेत्र में मूँगफली, ज्वार, बाजरा, अरहर और मूंग की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इस क्षेत्रों में अरहर, मूंगफली और गेहूँ अथवा मूँगफली- अरहर- गेहूँ या फिर चावल- सरसों- मूँग फसल समूह की चर्चा की गयी है।

(14) प० का शुष्क क्षेत्र:-

     यह पश्चिमी राजस्थान और उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विस्तृत है। ज्वार, बाजरा, दलहन और तेलहन यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ पर इन्हीं फसलों को मान्यता दिया गया है।

(15) द्वीपीय क्षेत्र:-

      अंडमान-निकोबार पर चावल, नारियल और बगानी कृषि की अनुशंसा की गयी है जबकि लक्षद्वीप पर नारियल और चावल को प्रमुख फसल माना गया है।

Agro-Climatic Regions of India

निष्कर्ष:

     इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ICAR ने कृषि-जलवायु प्रदेश का निर्धारण कर एक सराहनीय कार्य किया है। इस योजना के आधार पर कृषक फसलों का चुनाव, जलवायु के अनुरूप कर सकता है। इससे भारत की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था जहाँ एक ओर सुदृढ़ होगी वहीं दूसरी ओर किसान प्रतिकूल जलवायु से भी लड़ सकेंगे।

4. Agricultural Region of India (भारत का कृषि प्रदेश)

4. Agricultural Region of India

(भारत का कृषि प्रदेश)



प्रश्न प्रारूप

Q. भारत को कृषि प्रदेशों में वर्गीकृत करें और प्रत्येक प्रदेश की विशेषता लिखें।

Q. कृषि प्रदेश के वर्गीकरण के आधार को स्पष्ट करें तथा कृषि प्रदेशों का वर्गीकरण करते हुए प्रत्येक प्रदेश की विशेषता लिखें।

उत्तर-

         वैश्विक स्तर पर कृषि प्रदेश का अध्ययन कई भूगोलवेताओं के द्वारा किया गया है जिनमें जर्मन भूगोलवेता व्हिटलसी के द्वारा प्रस्तुत कृषि प्रदेश सबसे प्रमुख है। इन्होंने 5 कारकों को आधार मानते हुए विश्व को 13 कृषि प्रदेश में वर्गीकृत किया था। किसी भी भौगोलिक प्रदेश में कृषि के विभिन्न तत्वों के बीच अगर समरूपता पायी जाती है तो वैसे प्रदेश को कृषि प्रदेश कहते हैं। कृषि प्रदेश के निर्धारण में प्रमुख फसल, उत्पादन की प्रक्रिया, पूंजी एवं तकनीक के प्रयोग का स्तर, फसल और पशुओं तथा फसलों के बीच साहचर्य, कृषि उत्पादों का विपणन इत्यादि को ध्यान में रखकर किया जाता है।

          कृषि प्रदेश के निर्धारण हेतु द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभावाश्रित विधि को महत्व दिया जाता था लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कृषि प्रदेशों के निर्धारण हेतु सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाने लगा। सांख्यिकी विधि के आधार पर फसल संयोजन को प्राथमिकता दी गई। वर्तमान समय में सांख्यिकी विधि पर आधारित फसल संयोजन के आधार पर भारतीय कृषि प्रदेश का निर्धारण किया जा रहा है।

     भारतीय भूगोलवेत्ता प्रो० मुहम्मद शफी, पीठावाला, चतुर्भुज ममोरिया जैसे लोगों ने फसल संयोजन, फसलों की विशेषता, फसलों की प्रमुखता के अलावे स्थलाकृतिक विशेषता जलवायु, मृदा तथा जनसंख्या दबाव को आधार मानते हुए कृषि प्रदेश का निर्धारण किया है। वास्तव में यह विधि अनुभावाश्रित सह सांख्यिकी विधि पर आधारित है। इन भूगोलवेत्ताओं ने भारत को छः कृषि प्रदेशों में वर्गीकृत दिया है। जैसे-

(1) फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश

(2) चावल, जूट और चाय कृषि प्रदेश

(3) गेहूँ एवं गन्ना कृषि प्रदेश

(4) ज्वार, बाजरा एवं तेलहन कृषि प्रदेश

(5) मक्का एवं मोटे अनाज वाले कृषि प्रदेश

(6) कपास आधारित कृषि प्रदेश

(1) फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश:-

      इसके अन्तर्गत हिमालय प्रदेश को शामिल करते हैं। हिमालय प्रदेश के पर्वतीय मिट्टी मुख्यतः शिवालिक के ढाल तथा अन्तरा पर्वतीय घाटियों में मिलती है। ढाल पर फलों की खेती होती है जबकि घाटी में सब्जी की खेती होती है। वस्तुतः इस प्रदेश में होने वाले पर्यटन, नगरीकरण और अन्तरर्राष्ट्रीय बाजार में होने वाली माँग के कारण इस कृषि प्रदेश का विकास हुआ है।

      वस्तुतः फल एवं सब्जी कृषि प्रदेश के अन्तर्गत 10% भूमि शामिल है। लेकिन आर्थिक मूल्य के दृष्टि से सबसे प्रमुख प्रदेश है। परंपरागत रूप से यह कृषि प्रदेश झूम कृषि, सीढ़ीनुमा कृषि तथा यायावर जीवन के लिए प्रसिद्ध रहा है। पुन: इस कृषि प्रदेश में कश्मीर की घाटी में चावल & उत्तरी-पूर्वी भारत के ढालों पर चाय की खेती की जाती है। हिमालय प्रदेश के कृषि प्रदेश को पुनः दो भागों में बांटा जाता है-

(i) प० हिमालय की कृषि प्रदेश

(ii) पूर्वी हिमालय की कृषि प्रदेश

      दोनों प्रदेशों में पहाड़ी के ढालों पर आलू कृषि की प्राथमिकता दी जाती है। प० हिमालय में इसकी सर्वाधिक खेती लाहूल एवं स्फीति घाटी में की जाती है। पूर्वी हिमालय में मुख्यतः उष्णकटिबंधीय फलों की व्यापारिक खेती की जाती है जिसमें अनानस तथा नारंगी प्रमुख है। प० हिमालय सेब की खेती के लिए प्रसिद्ध है। कुल्लू तथा कांगड़ा घाटी उच्च कोटि के सेब उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

      पुनः प० हिमालय कशर उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। कश्मीर का डोडा जिला और हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में इसकी कृषि होती है। पश्चिम हिमालय अखरोट और अंगूर जैसे फसलों के लिए प्रसिद्ध है। अंगूर की कृषि, पीर-पंजाल के दक्षिणी ढाल पर, आखरोट की खेती बनिहाल में सबसे अधिक की जाती है।

    स्पष्ट है कि हिमालय क्षेत्र फल एवं सब्जी उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ इटली और बुल्गारिया के सहयोग से फल एवं सब्जी का उत्पादन किया जा रहा है। इस क्षेत्र के उत्पाद अपनी गुणवत्ता के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(2) चावल, जूट और चाय कृषि प्रदेश:-

      इस प्रदेश में भारत के वैसे क्षेत्र को शामिल किया जाता है जहाँ वार्षिक वर्षा 100-200 cm और तापमान 80°F से 90°F होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, सम्पूर्ण बिहार बंगाल, असम की घाटी, पूर्वी एवं पश्चिमी तटवर्ती मैदान को इसमें शामिल करते हैं। ये क्षेत्र भारत के 3/4 चावल का उत्पादन करते है। बंगाल, आन्ध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश चावल के सबसे बड़े उत्पादक राज्य है।

    जलोढ़ समतल मैदान, अनुकूल वर्षा एवं श्रम के अधिकता के कारण चावल कृषि का विकास अधिक हुआ है। इस प्रदेश का कृषक जूट, चाय व नारियल की खेती वाणिज्यिक फसल के रूप में करता है। जूट की कृषि तराई, प० बंगाल, पूर्वी बिहार ‌और महानदी के डेल्टाई भाग में की जाती है। चाय की खेती असम और प० बंगाल के पर्वतीय ढालों पर की जाती है। तटवर्ती मैदान में नारियल की कृषि होती है। इस प्रदेश में तम्बाकू हाल के वर्षों में प्रवेश किया है।

      ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि यह प्रदेश विविध प्रकार के फसलों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन चावल एक ऐसा फसल है जो सम्पूर्ण प्रदेश को जोड़ता है।

(3) गेहूँ एवं गन्ना कृषि प्रदेश:-

       यह प्रदेश भारत के उपार्द्र जलवायु प्रदेश में स्थित है। इसके अंतर्गत सतलज के मैदान पंजाब, हरियाणा, उ० राजस्थान और प० UP को शामिल करते हैं। इस प्रदेश की सबसे प्रमुख फसल गेंहूँ है। जोड़े की ऋतु में पछुआ विक्षोभ से हल्की बारिश होती है जो गेहूँ फसल के लिए लाभकारी होता है। इस प्रदेश में गेहूँ एवं गन्ना की खेती किये जाने के अन्य कारण भी मौजूद है। जैसे- पुरानी जलोढ़ मिट्टी के मैदान उपलब्ध है। इस क्षेत्र में जुझारू किसान रहते है। सिंचाई साधनों का विकास बड़े पैमाने पर किया गया है।

          UP गेहूँ और गन्ना उत्पादन में सबसे अग्रणी राज्य है। यह प्रदेश अन्न भण्डार के रूप में जानी जाती है। इस क्षेत्र में संरचनात्मक सुविधाओं के विकास के कारण नवीन फसल जैसे- चावल, कपास, चारा, तेलहन और दलहन फसलों का आगमन हुआ है। भारत में हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति सर्वाधिक सफल इसी प्रदेश में हुआ है।

(4) ज्वार, बाजरा एवं तेलहन कृषि प्रदेश:-

     इसके अन्तर्गत प्रायद्वीपीय भारत के 50-125 cm वर्षा वाले क्षेत्र को शामिल करते हैं। इन फसलों का क्षेत्र मुख्यतः लाल एवं लेटेराइट मिट्टी पर आधारित है। वर्षा की कम मात्रा और वर्षा की अनिश्चितता के कारण यहाँ के कृषक मोटे अनाजों की खेती करते हैं। ज्वार तथा बाजरा के उत्पादन में भारत विश्व का अग्रणी देश है। ज्वार उत्पादन में महाराष्ट्र और बाजरा के उत्पादन में राजस्थान सबसे अग्रणी है। इस प्रदेश में परंपरागत रूप से टोपायका मडुवा की खेती की जाती है।

(5) मक्का एवं मोटे अनाज वाले कृषि प्रदेश:-

      यह कृषि प्रदेश के शुष्क जलवायु कृषि प्रदेश में स्थित है। यहाँ वर्षा 50 cm से कम होती है। भारत में इस कृषि प्रदेश का विकास तीन क्षेत्रों में हुआ है:-

(i) प्रायद्वीपीय भारत के वृष्टि छाया प्रदेश- यहाँ की मक्का और ज्वार प्रमुख फसल है।

(ii) प० राजस्थान और गुजरात- यहाँ का प्रमुख फसल मक्का है।

(ii) लद्दाख क्षेत्र- यहाँ का मुख्य फसल मक्का है।

     वस्तुतः ये प्रदेश अत्यन्त ही सूखा ग्रस्त क्षेत्र है। भूमिगत जलस्तर काफी नीचे है। भौगोलिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल है। संरचनात्मक सुविधाओं का विकास नहीं हो सका है। जिसके कारण उत्पादकता बहुत कम है।

(6) कपास आधारित कृषि प्रदेश:-

        यह दक्वन लावा पठारीय भाग पर स्थित है। यह प्रदेश महाराष्ट्र, गुजरात, मालवा के पठार, तेलंगाना के पठार, कोयम्बटूर पठार, कर्नाटक का पठार पर स्थित है। यह विश्व का सबसे बड़ा कपास की पेटी है। यहाँ की सबसे प्रमुख फसल कपास है क्योंकि इस प्रदेश में अति उर्वर काली मिट्टी पायी जाती है। मिट्टी में लम्बे समय तक नमी धारण करने की क्षमता होती है। वर्षा 75-100 cm तक हो जाती है।

     कपास आधारित कृषि प्रदेश में ज्वार की खेती की जाती है। हाल के वर्षों में गन्ना का आगमन नकदी फसल के रूप में हुआ है।

निष्कर्ष:-

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के अलग-2 क्षेत्रों में मुख्यतः 6 कृषि प्रदेश का विकास हुआ है। पुनः प्रत्येक कृषि प्रदेश में अभूतपूर्व फसलों में विविधता दिखाई देती है। पुनः यह कृषि प्रदेश गत्यात्मक है क्योंकि प्रत्येक प्रदेश परंपरागत रूप से विशेष फसलों के लिए जाने जाते थे, लेकिन वर्तमान समय में विभिन्न फसलों के लिए जाने जाते है अर्थात जिन प्रदेशों में संस्थागत संरचनात्मक सुविधाओं का ज्योंहि विकास किया जाता है त्यों ही उस प्रदेश में नवीन फसलों का आगमन हो जाता है। इस प्रकार सरंपरागत पह‌चान को त्यागकर नवीन पहचान स्थापित कर देते हैं।

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