11. BEST BLUE REVOLUTION (नीली क्रांति): भारत में मत्स्य उत्पादन की क्रांति | 2025 तक के नवीनतम आँकड़े | Geography Notes

BLUE REVOLUTION

नीली क्रांति

परिचय (Introduction):

    नीली क्रांति का संबंध मत्स्य उत्पादन में तीव्र वृद्धि, मत्स्य पालन के आधुनिकीकरण तथा जलीय कृषि (Aquaculture) के विकास से है। इसके अंतर्गत मछली, झींगा एवं अन्य जलीय जीवों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों, आधुनिक उपकरणों और बेहतर प्रबंधन का उपयोग किया जाता है। इसका प्रमुख उद्देश्य खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, मछुआरों की आय में सुधार करना तथा मत्स्य उत्पादों के व्यापार और निर्यात को प्रोत्साहित करना है।

BLUE REVOLUTION

नीली क्रांति की परिभाषा

(Definition of Blue Revolution)

    मत्स्य उत्पादन एवं जलीय कृषि में आधुनिक तकनीकों, वैज्ञानिक प्रबंधन और बेहतर संसाधनों के उपयोग द्वारा उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया को नीली क्रांति कहा जाता है।

नीली क्रांति के प्रमुख उद्देश्य

(Major Objectives of Blue Revolution)

(i) मत्स्य उत्पादन में वृद्धि: मछली तथा अन्य जलीय जीवों के उत्पादन को बढ़ाना।

(ii) रोजगार सृजन: मत्स्य पालन और संबंधित गतिविधियों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना।

(iii) खाद्य सुरक्षा: लोगों को प्रोटीनयुक्त भोजन उपलब्ध कराने में योगदान देना।

(iv) आय में वृद्धि: मछुआरों तथा मत्स्य पालकों की आर्थिक स्थिति में सुधार करना।

(v) आधुनिक तकनीक का उपयोग: वैज्ञानिक मत्स्य पालन, बेहतर बीज और आधुनिक उपकरणों को प्रोत्साहित करना।

(vi) निर्यात को बढ़ावा: मत्स्य उत्पादों के निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा अर्जित करना।

(vii) जलीय संसाधनों का विकास: तालाबों, झीलों, नदियों और समुद्री क्षेत्रों की मत्स्य उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग करना।

भारत में नीली क्रांति

(Blue Revolution in India)

    भारत में मत्स्य उत्पादन में वृद्धि की प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे तेज हुई। वर्ष 1950–51 में देश में लगभग 7.52 लाख टन मछली का उत्पादन होता था, जो बढ़कर वर्ष 2019–20 में 141.64 लाख टन हो गया। इस वृद्धि में वैज्ञानिक मत्स्य पालन, कृत्रिम मत्स्य बीज उत्पादन, आधुनिक मछली पकड़ने वाले जाल, यांत्रिक नौकाओं तथा बेहतर भंडारण एवं परिवहन सुविधाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

    मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए वर्ष 1970 में केंद्र सरकार ने मछली किसान विकास अभिकरण (Fish Farmers Development Agency-FFDA) को प्रोत्साहित किया। इससे तालाबों एवं अन्य अंतर्देशीय जल संसाधनों में वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन को बढ़ावा मिला।

    समुद्री मत्स्य पालन में भी पारंपरिक नौकाओं के स्थान पर आधुनिक एवं यांत्रिक नौकाओं का उपयोग बढ़ा। ट्रॉलर (Trawlers), कृत्रिम जाल तथा आधुनिक मत्स्य उपकरणों ने मछली पकड़ने की क्षमता में वृद्धि की। इसके साथ ही झींगा पालन, मत्स्य प्रसंस्करण और निर्यात ने मत्स्य उद्योग को पारंपरिक आजीविका से आगे बढ़ाकर एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक गतिविधि का रूप दिया।

    वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच भारत के मत्स्य उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्ज की गई। मत्स्य विभाग के नवीनतम उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत का कुल मत्स्य उत्पादन बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया। वर्ष 2013-14 में यह 95.79 लाख टन था।

   इस प्रकार 2013-14 से 2024-25 के बीच मत्स्य उत्पादन में लगभग 106% की वृद्धि हुई। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मत्स्य उत्पादक देश है और वैश्विक मत्स्य उत्पादन में लगभग 8% योगदान देता है।

भारत में मत्स्य उत्पादन की वृद्धि

(Growth of Fish Production in India)

वर्ष कुल मत्स्य उत्पादन (लाख टन)
2019–20 141.64
2020–21 147.25
2021–22 162.48
2022–23 175.45
2023–24 183.93
2024–25 197.75

स्रोत: भारत सरकार, मत्स्य विभाग एवं प्रेस सूचना ब्यूरो।

   मत्स्य क्षेत्र के विकास को गति देने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2015 से नीली क्रांति सहित विभिन्न योजनाओं को बढ़ावा दिया। बाद में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana-PMMSY) के माध्यम से मत्स्य उत्पादन, आधुनिक आधारभूत संरचना, प्रसंस्करण, विपणन और मछुआरों के कल्याण पर विशेष ध्यान दिया गया। इस प्रकार नीली क्रांति भारत में खाद्य सुरक्षा, रोजगार, ग्रामीण एवं तटीय अर्थव्यवस्था और निर्यात संवर्धन का एक महत्वपूर्ण आधार बन गई है।

नीली क्रांति के प्रमुख घटक

(Major Components of Blue Revolution)

(1) अंतर्देशीय मत्स्य पालन (Inland Fisheries):

    नदियों, झीलों, तालाबों और जलाशयों में मछली उत्पादन करना।

(2) समुद्री मत्स्य पालन (Marine Fisheries):

     समुद्र से मछलियों तथा अन्य जलीय संसाधनों का उत्पादन एवं संग्रह करना।

(3) जलकृषि (Aquaculture):

   नियंत्रित जल क्षेत्रों में मछली, झींगा तथा अन्य जलीय जीवों का वैज्ञानिक तरीके से पालन करना।

(4) मत्स्य बीज उत्पादन (Fish Seed Production):

   अच्छी गुणवत्ता वाले मत्स्य बीज तैयार करके उत्पादन क्षमता बढ़ाना।

(5) प्रसंस्करण एवं विपणन (Processing and Marketing):

    मत्स्य उत्पादों का संरक्षण, प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार तक वितरण करना।

नीली क्रांति का महत्व

(Importance of Blue Revolution)

(i) पोषण में योगदान (Contribution to Nutrition):-

     नीली क्रांति का प्रमुख महत्व लोगों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में है। मछली उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत है। इसमें शरीर के विकास और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व पाए जाते हैं।

    मछली का सेवन बच्चों, वयस्कों तथा वृद्धों के पोषण में योगदान देता है। मत्स्य उत्पादन में वृद्धि से मछली की उपलब्धता बढ़ सकती है, जिससे लोगों को संतुलित आहार प्राप्त करने में सहायता मिलती है। इस प्रकार नीली क्रांति खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(ii) आर्थिक विकास (Economic Development):-

     नीली क्रांति मत्स्य क्षेत्र के विकास के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में योगदान देती है। मछली पालन, जलीय कृषि तथा मत्स्य उत्पादों के प्रसंस्करण से ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होता है।

   मत्स्य उत्पादन बढ़ने से उत्पादकों की आय में वृद्धि की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त, मछली बाजारों, परिवहन तथा व्यापार से स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रकार नीली क्रांति ग्रामीण विकास, आर्थिक आत्मनिर्भरता और विभिन्न क्षेत्रों में आय के अवसर बढ़ाने में सहायक होती है।

(iii) रोजगार सृजन (Employment Generation):-

     नीली क्रांति रोजगार के अवसर बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। मत्स्य पालन, मछली पकड़ने, मत्स्य बीज उत्पादन, मछलियों के परिवहन, प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन जैसी गतिविधियों में लोगों को रोजगार मिलता है।

    इससे ग्रामीण क्षेत्रों तथा तटीय समुदायों के लोगों को आजीविका के साधन प्राप्त होते हैं। छोटे मत्स्य पालक भी तालाबों और अन्य उपयुक्त जल क्षेत्रों में मछली पालन करके अपनी आय बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार नीली क्रांति बेरोजगारी कम करने, स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने तथा स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ाने में योगदान देती है।

(iv) निर्यात आय (Export Earnings):-

    नीली क्रांति का एक प्रमुख आर्थिक महत्व मत्स्य उत्पादों के निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित करना है। भारत से मछली, झींगा तथा अन्य समुद्री उत्पादों का निर्यात किया जाता है। मत्स्य उत्पादन की गुणवत्ता, प्रसंस्करण, शीत भंडारण और परिवहन सुविधाओं में सुधार से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ सकती है।

    निर्यात से मत्स्य पालकों, व्यापारियों और प्रसंस्करण उद्योगों को आर्थिक लाभ प्राप्त होने की संभावना रहती है। इस प्रकार नीली क्रांति देश के विदेशी व्यापार तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सहायक होती है।

(v) महिला सशक्तीकरण (Women Empowerment):-

   नीली क्रांति महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। मत्स्य पालन, मछली के प्रसंस्करण, सुखाने, पैकेजिंग, भंडारण और विपणन जैसी गतिविधियों में महिलाएँ भागीदारी कर सकती हैं। इससे उन्हें आय अर्जित करने तथा परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के अवसर मिलते हैं।

    स्वयं सहायता समूहों और सहकारी समितियों के माध्यम से महिलाएँ छोटे मत्स्य व्यवसाय भी संचालित कर सकती हैं। प्रशिक्षण, ऋण तथा आधुनिक तकनीक की उपलब्धता उनकी कार्यक्षमता बढ़ा सकती है। इस प्रकार नीली क्रांति महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रोत्साहित कर सकती है।

(vi) संसाधनों का उपयोग (Utilisation of Resources):-

    नीली क्रांति का महत्वपूर्ण उद्देश्य उपलब्ध जलीय संसाधनों का वैज्ञानिक एवं उत्पादक उपयोग करना है। तालाबों, झीलों, जलाशयों तथा अन्य उपयुक्त जल क्षेत्रों में योजनाबद्ध तरीके से मछली पालन किया जा सकता है।

    आधुनिक तकनीकों, गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज और उचित प्रबंधन से इन क्षेत्रों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है। इससे भूमि और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है तथा स्थानीय लोगों को आजीविका के अवसर मिलते हैं। हालांकि, उत्पादन बढ़ाते समय जल की गुणवत्ता, जलीय जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी का संरक्षण करना भी आवश्यक है।

नीली क्रांति की प्रमुख समस्याएँ

(Major Problems of Blue Revolution)

✍️ जल प्रदूषण और जल की गुणवत्ता में गिरावट।

✍️ मछलियों के प्राकृतिक आवासों का विनाश।

✍️ अत्यधिक मत्स्य दोहन से जलीय जैव विविधता पर दबाव।

✍️ मत्स्य पालकों के लिए पूँजी और आधुनिक तकनीक की कमी।

✍️ शीत भंडारण, परिवहन तथा विपणन सुविधाओं का अभाव।

✍️ जलवायु परिवर्तन और जल तापमान में बदलाव का प्रभाव।

नीली क्रांति की संभावनाएँ

(Prospects of Blue Revolution)

     भारत में नदियों, तालाबों, जलाशयों और समुद्री संसाधनों की उपलब्धता के कारण मत्स्य क्षेत्र के विकास की व्यापक संभावनाएँ हैं। वैज्ञानिक मछली पालन, गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज, आधुनिक शीत भंडारण, डिजिटल विपणन तथा टिकाऊ जलीय कृषि के माध्यम से उत्पादन और आय बढ़ाई जा सकती है। इसके साथ ही जल संसाधनों एवं जलीय जैव विविधता का संरक्षण भी आवश्यक है।

निष्कर्ष (Conclusion)

   नीली क्रांति भारत में मत्स्य उत्पादन, रोजगार सृजन, पोषण सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। आधुनिक तकनीकों और वैज्ञानिक प्रबंधन से मत्स्य क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है। हालांकि इसके दीर्घकालीन लाभ के लिए जल प्रदूषण पर नियंत्रण, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और टिकाऊ मत्स्य पालन को प्राथमिकता देना आवश्यक है।

नोट: नीली क्रांति – मत्स्य उत्पादन एवं जलीय कृषि; हरित क्रांति – खाद्यान्न उत्पादन; श्वेत क्रांति – दुग्ध उत्पादन; पीली क्रांति – तिलहन उत्पादन।

UGC NET Geography Paper 2 Mock Test 1

UGC NET – 2026 (PRACTICE SET-1)

PAPER – II

GEOGRAPHY (Subject Code: 80)

Time Allowed: 2 Hours (suggested)  Maximum Marks: 200
Total Questions: 100 (all compulsory) Marks per Question: 2

INSTRUCTIONS TO CANDIDATES

  • This paper contains 100 multiple-choice questions. Each question carries 2 marks.
  • Each question has four alternatives, (1), (2), (3) and (4), out of which only ONE is correct.
  • There is no negative marking for wrong answers.
  • The paper is arranged unit-wise as per the UGC NET Geography syllabus (10 units, 10 questions each). Unit names are given in the answer key.
  • In the actual exam, Paper-1 (50 Q) and Paper-ll (100 Q) are attempted together in a single session of 3 hours.
  • Answer key with brief explanations is given at the end. Attempt the paper first, then check.

12. Best Periglacial Systems/ परिहिमानी तंत्र / Periglacial landforms/ परिहिमानी भू-आकृतियाँ

Periglacial Systems

परिहिमानी तंत्र 

Periglacial landforms

परिहिमानी भू-आकृतियाँ

परिचय (Introduction)

      परिहिमानी तंत्र उन भौगोलिक क्षेत्रों एवं प्रक्रियाओं से संबंधित है, जहाँ तापमान लंबे समय तक हिमांक के आसपास या उससे नीचे रहता है तथा भूमि पर हिम एवं पाला जमने और पिघलने की प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।

     इन क्षेत्रों में सामान्यतः हिमानी (Glacial) बर्फ का व्यापक आवरण आवश्यक नहीं होता, लेकिन जमाव और पिघलाव के कारण स्थलरूपों में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। परिहिमानी तंत्र का विकास मुख्यतः ठंडी जलवायु वाले प्रदेशों, ध्रुवीय क्षेत्रों तथा ऊँचे पर्वतीय भागों में होता है। इन क्षेत्रों में हिम-पिघलाव, पाला अपक्षय, मृदा का विसर्पण और सक्रिय परत की गति जैसी प्रक्रियाएँ प्रमुख होती हैं।

परिहिमानी तंत्र की अवधारणा

Concept of Periglacial Systems

     परिहिमानी तंत्र से आशय उन प्राकृतिक परिस्थितियों, प्रक्रियाओं और स्थलरूपों के समूह से है, जो ठंडी जलवायु तथा भूमि के बार-बार जमने और पिघलने से विकसित होते हैं। इन क्षेत्रों में भूमि की ऊपरी परत गर्म मौसम में पिघल सकती है, जबकि उसके नीचे की भूमि लंबे समय तक जमी रह सकती है। स्थायी रूप से जमी भूमि को स्थायी तुषार भूमि (Permafrost) कहा जाता है।

    परिहिमानी तंत्र केवल हिमनदों के किनारे तक सीमित नहीं है। इसका विस्तार उन क्षेत्रों में भी हो सकता है जहाँ हिमानी बर्फ उपस्थित नहीं होती, लेकिन पाला एवं जमाव-पिघलाव की प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।

परिहिमानी तंत्र की प्रमुख विशेषताएँ

Major Characteristics of Periglacial Systems

(1) निम्न तापमान (Low Temperature):-

     परिहिमानी क्षेत्रों में तापमान सामान्यतः कम रहता है। शीत ऋतु में भूमि जम जाती है और गर्म मौसम में उसकी ऊपरी परत पिघल सकती है। तापमान में यह परिवर्तन चट्टानों, मिट्टी और धरातलीय प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।

(2) स्थायी तुषार भूमि (Permafrost):-

   स्थायी तुषार भूमि वह भूमि है, जिसका तापमान कम-से-कम लगातार दो वर्षों तक 0°C या उससे नीचे बना रहता है। इसके ऊपर की सक्रिय परत (Active Layer) मौसम के अनुसार जमती और पिघलती है। यह स्थिति भूमि की जल निकासी, वनस्पति तथा धरातलीय स्थिरता को प्रभावित करती है।

(3) पाला अपक्षय (Frost Weathering):-

    चट्टानों की दरारों में प्रवेश किया हुआ जल जमने और पिघलने के दौरान चट्टानों को कमजोर कर सकता है। बार-बार जमाव और पिघलाव से चट्टानों का विखंडन होता है। यह प्रक्रिया ठंडे पर्वतीय तथा परिहिमानी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण होती है।

(4) जमाव एवं पिघलाव (Freeze-Thaw Processes):-

    परिहिमानी क्षेत्रों में मिट्टी और चट्टानों का बार-बार जमना तथा पिघलना धरातल की संरचना को बदलता है। इससे मिट्टी में हलचल, सतह का उभार और छोटे स्थलरूपों का निर्माण हो सकता है।

(5) सीमित जल निकासी (Restricted Drainage):-

    स्थायी तुषार भूमि के ऊपर स्थित जमी हुई परत पानी के नीचे की ओर जाने को रोक सकती है। परिणामस्वरूप गर्म मौसम में पिघली हुई ऊपरी मिट्टी में जलभराव हो सकता है और भूमि की सतह पर जल का प्रवाह बढ़ सकता है।

परिहिमानी तंत्र की प्रमुख प्रक्रियाएँ

Major Processes of Periglacial Systems

(i) पाला अपक्षय (Frost Weathering): पानी के जमने-पिघलने से चट्टानों का टूटना।

(ii) सोलिफ्लक्शन (Solifluction): जलसंतृप्त मिट्टी की ऊपरी परत का ढाल के सहारे धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकना।

(iii) क्रायोटर्बेशन (Cryoturbation): मिट्टी के जमने और पिघलने से मृदा परतों का मिश्रण एवं विक्षोभ।

(iv) पिंगो निर्माण (Pingo Formation): स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में भूमिगत बर्फ के दबाव से भूमि का गुंबदाकार ऊपर उठना।

(v) बहुफलीय धरातलीय आकृतियों का निर्माण (Patterned Ground Formation): जमाव-पिघलाव की प्रक्रियाओं से भूमि पर बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित प्रतिरूपों का बनना।

परिहिमानी तंत्र के प्रमुख स्थलरूप

Major Landforms of Periglacial Systems

(1) प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground):-

     जमाव-पिघलाव और मृदा की गति के कारण धरातल पर बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित आकृतियाँ बनती हैं। ये विशेष रूप से टुंड्रा और स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

Periglacial Systems
(2) पिंगो (Pingo):-   

      पिंगो स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में बनने वाली गुंबदाकार पहाड़ी होती है। इसके भीतर बर्फ के जमाव से भूमि ऊपर उठती है। यह मुख्यतः आर्कटिक क्षेत्रों में पाई जाती है।

Periglacial Systems

(3) सोलिफ्लक्शन लोब (Solifluction Lobes):-

      जलसंतृप्त मिट्टी के धीरे-धीरे ढाल के नीचे खिसकने से अर्धवृत्ताकार या जीभनुमा आकृतियाँ बनती हैं। ये ठंडे पर्वतीय और टुंड्रा क्षेत्रों में सामान्य हैं।

Periglacial Systems

परिहिमानी तंत्र का वितरण

Distribution of Periglacial Systems

   परिहिमानी तंत्र मुख्यतः निम्नलिखित क्षेत्रों में पाए जाते हैं-

1. आर्कटिक क्षेत्र (Arctic Region): साइबेरिया, अलास्का, उत्तरी कनाडा तथा ग्रीनलैंड के कुछ भाग।

2. उच्च पर्वतीय क्षेत्र (High Mountain Regions): हिमालय, आल्प्स तथा अन्य ऊँचे पर्वतीय प्रदेशों के ठंडे भाग।

3. उपध्रुवीय क्षेत्र (Subpolar Regions): वे क्षेत्र जहाँ लंबे समय तक ठंड रहती है और भूमि का मौसमी जमाव-पिघलाव होता है।

4. शीत मरुस्थलीय क्षेत्र (Cold Desert Regions): अत्यंत ठंडे और शुष्क प्रदेश, जहाँ पाला अपक्षय सक्रिय हो सकता है।

परिहिमानी तंत्र का महत्व

Importance of Periglacial Systems

      परिहिमानी तंत्र का अध्ययन भौतिक भूगोल और भू-आकृति विज्ञान में महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से ठंडी जलवायु में चट्टानों के अपक्षय, मिट्टी के विकास, ढाल प्रक्रियाओं तथा विशिष्ट स्थलरूपों के निर्माण को समझा जाता है। स्थायी तुषार भूमि के पिघलने से सड़क, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

    इसके अतिरिक्त, स्थायी तुषार भूमि में संचित कार्बनिक पदार्थों के विघटन से ग्रीनहाउस गैसें मुक्त हो सकती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया प्रभावित होती है।

निष्कर्ष (Conclusion):

     परिहिमानी तंत्र ठंडी जलवायु में सक्रिय जमाव-पिघलाव, पाला अपक्षय, सोलिफ्लक्शन तथा स्थायी तुषार भूमि से संबंधित प्रक्रियाओं का समूह है। इसके कारण प्रतिरूपित भूमि, पिंगो और सोलिफ्लक्शन लोब जैसे विशिष्ट स्थलरूप विकसित होते हैं।

    परिहिमानी तंत्र का अध्ययन पृथ्वी की सतह के विकास, ठंडे क्षेत्रों की पर्यावरणीय परिस्थितियों तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Periglacial landforms

(परिहिमानी भू-आकृतियाँ)

परिचय/ Introduction

     भूगोल में स्थलरूपों (landforms) का अध्ययन पृथ्वी की सतह पर हो रही भौतिक प्रक्रियाओं और उनके परिणामस्वरूप निर्मित आकृतियों को समझने हेतु किया जाता है। हिमानी (Glacial), शुष्क (Arid), जलीय (Fluvial), तटीय (Coastal) आदि विभिन्न वातावरणों की भाँति “पेरिग्लेशियल” (Periglacial) भी एक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक वातावरण है।

    “पेरिग्लेशियल” शब्द का प्रयोग उन भौगोलिक क्षेत्रों के लिए किया जाता है जहाँ हिमनद तो नहीं होते परंतु तीव्र शीत, ठंढ-जमाव-गलन (Freeze-thaw) चक्र, स्थायी हिममृदा (Permafrost) तथा मौसमी बर्फ (Seasonal snow) स्थलरूप निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।

   “Periglacial” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1909 में पोलिश (पोलैंड) भूगोलवेत्ता वालेरी वॉन लोजिंस्की ने किया था। आज यह शब्द व्यापक रूप से उच्च अक्षांशों (high latitudes) तथा उच्च पर्वतीय (high mountain) क्षेत्रों में पाए जाने वाले भू-आकृतिक परिदृश्य के लिए प्रयुक्त होता है।

⇒ 1950 में एलसी पेल्टियर ने क्षरण के पेरिग्लेशियल चक्र की अवधारणा को सामने रखा। यह क्षरण के सामान्य चक्र की डेविसियन अवधारणा के समान है, और पेरीग्लेशियल परिदृश्य युवावस्था और परिपक्वता के चरणों से गुजरने के बाद बुढ़ापे को प्राप्त करता है।

परिभाषा और विशेषताएँ

     परिग्लेशियल क्षेत्र (Periglacial environment) वे क्षेत्र हैं जहाँ का जलवायु अत्यधिक ठंडा होता है, परन्तु संपूर्ण सतह हिमनदों से आच्छादित नहीं रहती। यहाँ permafrost, मौसमी हिम (seasonal frost), तथा freeze-thaw प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।

मुख्य विशेषताएँ-

⇒ अत्यधिक ठंडा मौसम, परन्तु पूरा हिमनद क्षेत्र नहीं।

⇒ सतह पर मौसमी हिम आवरण और भूजल का जमना।

⇒ मृदा एवं शैल का यांत्रिक अपक्षय (frost weathering)।

⇒ Permafrost (स्थायी जमी हुई मृदा) का होना।

⇒ भूमिगत बर्फ के पिघलने-बनने से विशिष्ट स्थलरूपों का विकास।

⇒ उच्च अक्षांशों (अलास्का, साइबेरिया, आर्कटिक, ग्रीनलैंड) तथा उच्च पर्वतीय क्षेत्र (हिमालय, आल्प्स, एंडीज) में प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।

परिग्लेशियल प्रक्रियाएँ

     परिग्लेशियल स्थलरूपों का निर्माण निम्नलिखित प्रमुख प्रक्रियाओं से होता है –

Freeze-Thaw Weathering (Frost Action):

     पानी का दरारों में जाना, जमकर फैलना और पुनः पिघलना, जिससे चट्टानें टूट जाती हैं।

Permafrost Processes:

     स्थायी जमी हुई मिट्टी/शैल का पिघलना एवं जमना, जिससे भूमिगत गड़बड़ी, धँसाव और उभार उत्पन्न होते हैं।

Solifluction (Gelifluction):

    जमी हुई परत पर सतही मिट्टी का धीमा खिसकना, जिससे ढलानों पर लोब्स (lobes) और टेरेसेज बनते हैं।

Frost Heaving and Frost Creep:

    जमने-पिघलने की प्रक्रिया के कारण मृदा कणों का ऊपर-नीचे होना और धीरे-धीरे ढलान की ओर खिसकना।

Nivation:

    हिम-क्षरण (snow patches) के नीचे भूमि का क्षरण और अपक्षय।

प्रमुख परिग्लेशियल स्थलरूप

अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ

Erosional landforms)

1. जमना-पिघलना चक्र (Freeze-Thaw Cycle)

2. निवेशन हॉलो (Nivation Hollow)

3. विषम घाटी (Asymmetrical Valley)

4. क्रायोप्लानेशन टेरेस या गोलेट्ज टेरेस (Cryoplanation Terraces or Goletz Terraces)

5. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground)

6. फ्रॉस्ट क्रैक बहुभुज (Frost Crack Polygon)

7. पत्थर की पट्टियाँ (Stone Strips)

8. पिंगो (Pingo)

9. हम्मोक्स (Hummocks)

10. पलसा (Palsa)

निक्षेपणात्मक भू-आकृतियाँ

Depositional Landforms

1. ब्लॉकफील्ड्स या फ़ेलसेनमीर (BlockFields or Felsenmeer)

2. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground)

3. टोर्स (Tors)

4. बोल्डर फील्ड (Boulder Fields)

अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ (Erosional landforms)

1. पिंगो (Pingo):-

⇒ यह गोलाकार या शंक्वाकार (conical) हिमीय उभार होते हैं जो permafrost क्षेत्रों में बनते हैं।

⇒ इनका आकार 30–70 मीटर ऊँचा और 300–1000 मीटर चौड़ा हो सकता है।

प्रकार-

⇒ Closed-system pingos (permafrost के भीतर जलदाब से बने)

⇒ Open-system pingos (भूजल के जमने से बने)

     उदाहरण: साइबेरिया, अलास्का, उत्तरी कनाडा।

2. थर्मोकार्स्ट (Thermokarst):-

⇒ यह भूमिगत बर्फ के पिघलने पर सतह के धँसने से निर्मित अनियमित गड्ढेदार भूमि है।

⇒ झीलें, गड्ढे, छोटे-छोटे ताल (ponds) बन जाते हैं।

⇒ अलास्का और साइबेरिया में व्यापक।

3. सॉलिफ्लक्शन लोब्स (Solifluction Lobes):-

⇒ ढलानों पर जमी हुई परत के ऊपर गीली मिट्टी के धीरे-धीरे बहाव से अर्धचंद्राकार लोब्स (lobes) बनते हैं।

⇒ हिमालय, स्कैंडेनेविया, अलास्का में पाये जाते हैं।

4. आइस वेज (Ice Wedges):-

⇒ भूमि में गहरी दरारों में पानी भरकर जम जाता है।

⇒ समय के साथ दरारें चौड़ी होकर बहुभुजाकार patterned ground का निर्माण करती हैं।

⇒ यह पेरिग्लेशियल परिदृश्य की पहचान है।

5. पैटर्न्ड ग्राउंड (Patterned Ground):-

⇒ freeze-thaw क्रिया से भूमि की सतह पर वृत्ताकार, बहुभुजाकार, या धारियों जैसी आकृतियाँ।

⇒ इसमें stone polygons, stone circles, stone stripes शामिल हैं।

6. रॉक ग्लेशियर (Rock Glaciers):-

⇒ बर्फ और चट्टानी अवशेषों का मिश्रण जो धीमी गति से ढलान की ओर बढ़ता है।

⇒ यह हिमनद और परिग्लेशियल प्रक्रियाओं का संयोग है।

7. नाइवेेशन होलो (Nivation Hollows):-

⇒ हिम पैच (snow patches) के नीचे भूमि का क्षरण होकर गड्ढेदार आकृति बनती है।

निक्षेपणात्मक भू-आकृतियाँ (Depositional Landforms)

1. ब्लॉकफील्ड्स या फेलसेनमीर (Blockfields or Felsenmeer):-

    ब्लॉकफील्ड्स बड़े-बड़े चट्टानी खंडों से ढके क्षेत्र होते हैं। इनका निर्माण मुख्यतः पाला अपक्षय और चट्टानों के विखंडन से होता है। ये ठंडे पर्वतीय एवं परिहिमानी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

2. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground):-

    प्रतिरूपित भूमि पर जमाव और पिघलाव की प्रक्रियाओं के कारण बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित आकृतियाँ बनती हैं। ये स्थलरूप मुख्यतः टुंड्रा तथा स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

3. टोर्स (Tors):-

    टोर्स धरातल पर स्थित अलग-अलग खड़े चट्टानी उभार होते हैं। इनका निर्माण चट्टानों के अपक्षय और अपरदन से होता है। ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में पाला अपक्षय इनके विकास में योगदान दे सकता है।

4. बोल्डर फील्ड (Boulder Fields):-

     बोल्डर फील्ड ऐसे क्षेत्र होते हैं, जहाँ बड़े-बड़े शिलाखंड व्यापक रूप से फैले रहते हैं। इनका निर्माण चट्टानों के विखंडन और शिलाखंडों के ढाल के सहारे संचलन से हो सकता है।

परिग्लेशियल स्थलरूपों का महत्व:

(i) पृथ्वी के शीत क्षेत्रों की जलवायु एवं पर्यावरणीय स्थिति को समझने में सहायक।

(ii) जलवायु परिवर्तन (climate change) के सूचक – permafrost पिघलने से CO₂ व मीथेन उत्सर्जन।

(iii) मानव बस्तियों और अवसंरचना पर प्रभाव – भवन, सड़क, पाइपलाइन पर धँसाव।

(iv) प्राचीन पेलियो-क्लाइमेट (paleoclimate) के पुनर्निर्माण हेतु महत्त्वपूर्ण।

निष्कर्ष:

    परिग्लेशियल स्थलरूप भूगोल की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण शाखा है जो पृथ्वी के उच्च अक्षांशीय तथा उच्च पर्वतीय शीत क्षेत्रों में पाए जाने वाले विशेष भौगोलिक परिदृश्य को दर्शाती है। freeze-thaw क्रिया, permafrost प्रक्रियाएँ, तथा मौसमी हिम आवरण मिलकर ऐसे स्थलरूपों का निर्माण करते हैं जो न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होते हैं, बल्कि मानव जीवन एवं पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं।

    पिंगो, थर्मोकार्स्ट, आइस वेज, पैटर्न्ड ग्राउंड आदि स्थलरूप पृथ्वी के जलवायु इतिहास तथा भविष्य के पर्यावरणीय संकटों की ओर संकेत करते हैं। अतः परिग्लेशियल भू-आकृति विज्ञान का अध्ययन आधुनिक भूगोल में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

22. Best Heat Balance (ऊष्मा संतुलन)

Heat Balance

ऊष्मा संतुलन

परिचय (Introduction)

   पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य है। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा पृथ्वी की सतह, वायुमंडल, महासागरों तथा अन्य प्राकृतिक घटकों को गर्म करती है। पृथ्वी इस ऊर्जा के एक भाग को अवशोषित करती है तथा शेष भाग को परावर्तित कर देती है।

   पृथ्वी और वायुमंडल द्वारा अवशोषित ऊर्जा अंततः दीर्घतरंग विकिरण के रूप में अंतरिक्ष में वापस भेजी जाती है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त और अंतरिक्ष में उत्सर्जित ऊर्जा के बीच दीर्घकालीन संतुलन को ऊष्मा संतुलन (Heat Balance) कहा जाता है।

     ऊष्मा संतुलन पृथ्वी के औसत तापमान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि पृथ्वी द्वारा अवशोषित ऊर्जा, उत्सर्जित ऊर्जा से अधिक हो जाए, तो तापमान बढ़ने की प्रवृत्ति होती है। इसके विपरीत, उत्सर्जित ऊर्जा अधिक होने पर तापमान घटने की प्रवृत्ति होती है।

ऊष्मा संतुलन की अवधारणा

Concept of Heat Balance

   ऊष्मा संतुलन से आशय पृथ्वी द्वारा सूर्य से प्राप्त ऊर्जा और पृथ्वी-वायुमंडल तंत्र द्वारा अंतरिक्ष में वापस भेजी गई ऊर्जा के बीच संतुलन से है। पृथ्वी पर ऊर्जा का वितरण सभी स्थानों पर समान नहीं होता।

    भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें तिरछी पड़ती हैं। इसलिए निम्न अक्षांशों पर ऊर्जा प्राप्ति सामान्यतः अधिक तथा उच्च अक्षांशों पर कम होती है।

    वायुमंडल, महासागरीय धाराएँ और पवनें ऊष्मा को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचाने में सहायता करती हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर तापमान के क्षेत्रीय अंतर को कम करने में ऊष्मा का स्थानांतरण महत्वपूर्ण है।

ऊष्मा संतुलन के प्रमुख घटक

Major Components of Heat Balance

(1) सौर विकिरण (Solar Radiation):-

   सूर्य से विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचने वाली ऊर्जा को सौर विकिरण कहते हैं। यही पृथ्वी की सतह और वायुमंडल को ऊर्जा प्रदान करने का प्रमुख स्रोत है। प्राप्त सौर ऊर्जा की मात्रा अक्षांश, ऋतु, दिन की अवधि, बादलों और वायुमंडलीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है।

(2) परावर्तित विकिरण (Reflected Radiation):-

    पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण का कुछ भाग पृथ्वी की सतह, बादलों तथा वायुमंडल द्वारा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर दिया जाता है। किसी सतह की परावर्तन क्षमता उसके रंग, बनावट और प्रकृति पर निर्भर करती है। बर्फ और बादल सामान्यतः अधिक सौर ऊर्जा परावर्तित करते हैं।

(3) अवशोषित सौर विकिरण (Absorbed Solar Radiation):-

    सौर विकिरण का जो भाग पृथ्वी की सतह तथा वायुमंडल द्वारा अवशोषित किया जाता है, वह उन्हें गर्म करने में योगदान देता है। भूमि और महासागर इस ऊर्जा को अवशोषित करके गर्म होते हैं। इसके बाद वे संवेदनशील ऊष्मा, गुप्त ऊष्मा तथा दीर्घतरंग विकिरण के माध्यम से ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं।

(4) पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation):-

    पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करके उसे मुख्यतः दीर्घतरंग अवरक्त विकिरण के रूप में उत्सर्जित करती है। इसे पार्थिव विकिरण कहते हैं। वायुमंडल की ग्रीनहाउस गैसें इस विकिरण के एक भाग को अवशोषित करती हैं और ऊर्जा को पुनः उत्सर्जित करती हैं। इससे पृथ्वी की सतह और निचला वायुमंडल गर्म बने रहते हैं।

(5) ऊष्मा का स्थानांतरण (Heat Transfer):-

    पृथ्वी की सतह से वायुमंडल और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक ऊष्मा का स्थानांतरण विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा होता है। इनमें विकिरण, चालन, संवहन तथा वाष्पीकरण और संघनन से संबंधित गुप्त ऊष्मा का स्थानांतरण शामिल हैं। पवनें और महासागरीय धाराएँ भी ऊष्मा को निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

वैश्विक ऊर्जा बजट (Global Energy Budget) 

     जलवायुवेताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि पृथ्वी सूर्य से जितना उष्मा सौर विकिरण के रूप में प्राप्त करता है उतना ही उष्मा पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष में लौटा दिया जाता है। धरातल पर सौर ऊर्जा या विकिरण लघु तरंगों के रूप में प्राप्त होती है। जबकि पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में लौटती है।

    वायुमण्डल में उपस्थित धुलकण, जलवाष्प और CO2 गैसे दीर्घ एवं लघु तरंगों को अवशोषित करने की प्रवृति रखते हैं। वास्तव में हमारा वायुमंडल सौर विकिरण से गर्म नहीं होता बल्कि पार्थिव विकिरण से गर्म होता है क्योंकि हमारा वायुमंडल सौर विकिरण के लिए पारदर्शक जबकि पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शक है।

      सौर विकिरण के द्वारा प्राप्त ऊर्जा और पार्थिव विकिरण द्वारा परित्याग किया गया ऊर्जा के बीच भी अभूतपूर्व संतुलन पाया जाता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे: हमारा वायुमण्डल जितना सूर्यातप प्राप्त करता है उसे अगर 100 इकाई माना जाय तो उसका मात्र 65% इकाई ही वायुमण्डल में प्रविष्ट कर पाता है।

       लेकिन वास्तव में 47% उष्मा धरातल को प्राप्त होती है और शेष 18% को वायुमण्डल अवशोषित कर लेती है। सौर विकिरण का वितरण निम्न प्रकार से बताया गया है। जैसे:-

⇒ 25% इकाई बादल के द्वारा सौर विकिरण का परावर्तन कर दिया जाता है।

⇒ 7% इकाई सौर ऊर्जा वायु से टकराकर सौर विकिरण का परावर्तन हो जाता है।

⇒ 19% इकाई क्षोभमंडल में उपस्थित वायु द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।

⇒ 2% इकाई उष्मा पृथ्वी के भूतल के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से परावर्तन कर दिया जाता है।        

Heat Balance

    उपरोक्त आँकड़े से स्पष्ट है कि 53% इकाई सौर विकिरण को वायुमण्डल के विभिन्न स्तर से परावर्तित कर दिए जाते हैं। शेष 47% सौर विकिरण को धरातल ग्रहण करता है जिसे कालान्तर में पार्थिव विकिरण के रूप में अन्तरिक्ष में पुन: लौटा दी जाती है।

ऊष्मा संतुलन को प्रभावित करने वाले कारक

Factors Affecting Heat Balance

(i) अक्षांश (Latitude):-

   अक्षांश पृथ्वी पर सौर ऊर्जा के वितरण को प्रभावित करता है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, जिससे ऊर्जा की प्राप्ति अधिक होती है। इसके विपरीत, ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें तिरछी पड़ने के कारण ऊर्जा की प्राप्ति कम होती है। इस प्रकार अक्षांश पृथ्वी के तापमान और ऊष्मा संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) ऋतु (Season):-

    पृथ्वी के अक्षीय झुकाव तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के कारण विभिन्न ऋतुओं में सौर ऊर्जा की प्राप्ति बदलती रहती है। ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े होने और सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ने से ऊर्जा की प्राप्ति बढ़ती है। शीत ऋतु में दिन छोटे होने तथा किरणें तिरछी पड़ने से ऊर्जा की प्राप्ति कम हो जाती है।

(iii) बादल (Clouds):-

    बादल पृथ्वी के ऊष्मा संतुलन को दो प्रकार से प्रभावित करते हैं। वे आने वाले सौर विकिरण के एक भाग को परावर्तित करके अंतरिक्ष में वापस भेज देते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह पर ऊर्जा की प्राप्ति कम होती है। दूसरी ओर, बादल पृथ्वी से निकलने वाले दीर्घतरंग विकिरण को अवशोषित करके पुनः उत्सर्जित करते हैं, जिससे सतह का तापमान प्रभावित होता है।

(iv) धरातल की प्रकृति (Nature of Surface):-

    पृथ्वी की सतह के विभिन्न भागों की परावर्तन तथा ऊष्मा अवशोषण क्षमता अलग-अलग होती है। बर्फ और हिम सामान्यतः अधिक सौर विकिरण परावर्तित करते हैं, जबकि वन, जल तथा अन्य सतहें अलग-अलग मात्रा में ऊर्जा अवशोषित करती हैं। धरातल की प्रकृति के कारण विभिन्न क्षेत्रों के तापमान और ऊष्मा संतुलन में अंतर पाया जाता है।

(v) ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases):-

   कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प जैसी ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाले दीर्घतरंग विकिरण के एक भाग को अवशोषित करती हैं तथा उसे पुनः उत्सर्जित करती हैं। इस प्रक्रिया से पृथ्वी की सतह और निचला वायुमंडल गर्म बने रहते हैं। इन गैसों की सांद्रता बढ़ने से पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन में परिवर्तन हो सकता है और वैश्विक तापमान बढ़ सकता है।

(vi) पवनें एवं महासागरीय धाराएँ (Winds and Ocean Currents):-

   पवनें और महासागरीय धाराएँ पृथ्वी पर ऊष्मा के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पवनें वायुमंडल में गर्म और ठंडी वायु को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचाती हैं, जबकि महासागरीय धाराएँ गर्म जल को निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों तथा ठंडे जल को अन्य क्षेत्रों की ओर ले जाती हैं। इससे विभिन्न क्षेत्रों के तापमान में अंतर कम करने और वैश्विक ऊष्मा संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।

ऊष्मा संतुलन का महत्व

Importance of Heat Balance

   ऊष्मा संतुलन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को समझने का एक प्रमुख आधार है। यह पृथ्वी के औसत तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, महासागरीय प्रक्रियाओं और क्षेत्रीय जलवायु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि पृथ्वी पर ऊर्जा का वितरण किस प्रकार होता है तथा तापमान में क्षेत्रीय एवं मौसमी अंतर क्यों पाए जाते हैं। वैश्विक ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है।

ऊष्मा संतुलन और वैश्विक तापन

Heat Balance and Global Warming

    जब पृथ्वी-वायुमंडल तंत्र द्वारा अवशोषित ऊर्जा और अंतरिक्ष में उत्सर्जित ऊर्जा के बीच असंतुलन उत्पन्न होता है, तो पृथ्वी की ऊर्जा मात्रा में परिवर्तन होने लगता है। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता के कारण पृथ्वी से बाहर जाने वाले दीर्घतरंग विकिरण का कुछ भाग अधिक अवशोषित होता है। इससे पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन में सकारात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है और वैश्विक औसत तापमान बढ़ने लगता है।

   इसलिए ऊष्मा संतुलन का अध्ययन जलवायु परिवर्तन के कारणों और उसके संभावित प्रभावों को समझने में विशेष महत्व रखता है।

निष्कर्ष (Conclusion)

    ऊष्मा संतुलन पृथ्वी द्वारा प्राप्त सौर ऊर्जा तथा अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित ऊर्जा के बीच दीर्घकालीन संतुलन को दर्शाता है। यह पृथ्वी के औसत तापमान और जलवायु प्रणाली को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अक्षांश, ऋतु, धरातल की प्रकृति, बादल, ग्रीनहाउस गैसें, पवनें और महासागरीय धाराएँ इस संतुलन को प्रभावित करती हैं। अतः ऊष्मा संतुलन का अध्ययन भौतिक भूगोल, जलवायु विज्ञान तथा वैश्विक तापन को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।

26. Best Population Potential Model / जनसंख्या संभाव्यता मॉडल

Population Potential Model 

जनसंख्या संभाव्यता मॉडल

परिचय (Introduction):

    जनसंख्या संभाव्यता मॉडल भूगोल का एक महत्वपूर्ण मात्रात्मक मॉडल है, जिसका उपयोग किसी स्थान पर आसपास के क्षेत्रों की जनसंख्या के संभावित प्रभाव का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।

     इस मॉडल के अनुसार किसी स्थान की जनसंख्या संभाव्यता वहाँ से अन्य स्थानों की जनसंख्या तथा उनकी दूरी पर निर्भर करती है। सामान्यतः अधिक जनसंख्या वाले निकटवर्ती स्थान का प्रभाव अधिक और दूर स्थित स्थान का प्रभाव कम माना जाता है।

     इस मॉडल का विकास अमेरिकी खगोलभौतिकीविद् एवं सामाजिक वैज्ञानिक जॉन क्यू. स्टीवर्ट (John Q. Stewart) के कार्यों से जुड़ा है। उन्होंने 1941 में “An Inverse Distance Variation for Certain Social Influences” नामक शोधपत्र में सामाजिक प्रभावों और दूरी के बीच संबंध को गणितीय रूप में प्रस्तुत किया।

     इसके बाद 1947 में “Empirical Mathematical Rules Concerning the Distribution and Equilibrium of Population” नामक शोधपत्र में उन्होंने जनसंख्या के वितरण एवं संतुलन से संबंधित गणितीय नियमों का विस्तृत अध्ययन किया।

    इस मॉडल का सैद्धांतिक आधार न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से मिलता-जुलता है। इसमें भौतिक पिंडों के द्रव्यमान के स्थान पर जनसंख्या तथा उनके बीच की दूरी को आधार बनाकर विभिन्न स्थानों की जनसंख्या संभाव्यता का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या संभाव्यता की अवधारणा

Concept of Population Potential

      जनसंख्या संभाव्यता से आशय किसी स्थान पर आसपास के विभिन्न जनसंख्या केंद्रों के संभावित प्रभाव के संयुक्त माप से है। इसमें प्रत्येक जनसंख्या केंद्र का योगदान उसकी जनसंख्या के आकार और अध्ययनाधीन स्थान से उसकी दूरी के आधार पर निर्धारित किया जाता है।

     उदाहरण के लिए, यदि कोई गाँव दो नगरों के निकट स्थित है, तो उन नगरों की जनसंख्या और गाँव से उनकी दूरी के आधार पर गाँव की जनसंख्या संभाव्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। सामान्यतः अधिक जनसंख्या और कम दूरी जनसंख्या संभाव्यता को बढ़ाते हैं, जबकि दूरी बढ़ने पर संभाव्यता घटती है।

जनसंख्या संभाव्यता मॉडल का सूत्र

Formula of Population Potential Model

    जनसंख्या संभाव्यता की गणना के लिए सामान्यतः निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया जाता है।

Population Potential Modelजहाँ-

Vi = स्थान i की कुल जनसंख्या संभाव्यता।

Pj = स्थान j की जनसंख्या।

dij = स्थान i और स्थान j के बीच की दूरी।

Σ = सभी संबंधित स्थानों के योगदान का योग।

n = अध्ययन में शामिल स्थानों की कुल संख्या।

   इस सूत्र में प्रत्येक स्थान की जनसंख्या को अध्ययनाधीन स्थान से उसकी दूरी से विभाजित किया जाता है। इसके बाद सभी स्थानों से प्राप्त मानों को जोड़कर कुल जनसंख्या संभाव्यता ज्ञात की जाती है।

ध्यान दें: कुछ विस्तारित रूपों में दूरी के घातांक β का प्रयोग किया जाता है। सामान्य सूत्र में दूरी का घातांक 1 होता है।

जनसंख्या संभाव्यता मॉडल की प्रमुख विशेषताएँ

Major Characteristics of Population Potential Model

(i) जनसंख्या पर आधारित /Based on Population:-

    इस मॉडल में विभिन्न स्थानों की जनसंख्या को प्रमुख आधार माना जाता है। अधिक जनसंख्या वाले स्थान का संभावित प्रभाव सामान्यतः अधिक होता है। इसलिए बड़े नगरों और जनसंख्या केंद्रों का आसपास के क्षेत्रों पर प्रभाव समझने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

(ii) दूरी का प्रभाव /Effect of Distance:-

   इस मॉडल में दूरी बढ़ने के साथ किसी स्थान की जनसंख्या का प्रभाव सामान्यतः कम होता जाता है। निकट स्थित जनसंख्या केंद्र का योगदान अधिक तथा दूर स्थित केंद्र का योगदान कम हो सकता है।

(iii) मात्रात्मक अध्ययन /Quantitative Analysis:-

    यह मॉडल गणितीय सूत्र पर आधारित है। इसकी सहायता से विभिन्न स्थानों की जनसंख्या संभाव्यता की गणना करके उनके बीच तुलना की जा सकती है।

(iv) संयुक्त प्रभाव / Combined Influence:-

    किसी स्थान की जनसंख्या संभाव्यता केवल एक नगर पर निर्भर नहीं करती, बल्कि आसपास के अनेक जनसंख्या केंद्रों के योगदान को जोड़कर निर्धारित की जाती है।

(v) स्थानिक विश्लेषण / Spatial Analysis:-

    यह मॉडल विभिन्न स्थानों के बीच संभावित प्रभाव और स्थानिक संबंधों को समझने में सहायता करता है। इसके परिणामों को मानचित्र पर प्रदर्शित करके अधिक और कम संभाव्यता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।

उदाहरण (Example of Calculation)-

1. मान लीजिए, स्थान A की जनसंख्या संभाव्यता ज्ञात करनी है। इसके निकट दो नगर स्थित हैं।

नगर जनसंख्या A से दूरी
B 20,000 10 किमी
C 30,000 30 किमी

सूत्र के अनुसार-

VA = 
PBdAB
 + 
PCdAC

VA =  
20,00010
 + 
30,00030

VA = 2,000 + 1,000
VA = 3,000

    अतः स्थान A की जनसंख्या संभाव्यता का गणितीय मान 3,000 प्राप्त होता है। यहाँ जनसंख्या प्रति किलोमीटर के आधार पर संभाव्यता व्यक्त की गई है। यह उदाहरण केवल गणना समझाने के लिए है; वास्तविक अध्ययन में सभी प्रासंगिक स्थानों और उनके योगदान को शामिल करना आवश्यक है।

भूगोल में जनसंख्या संभाव्यता मॉडल के अनुप्रयोग

Applications of Population Potential Model in Geography

(1) नगरीय भूगोल (Urban Geography):-

    इस मॉडल का उपयोग नगरों के संभावित प्रभाव क्षेत्र तथा आसपास के जनसंख्या केंद्रों के साथ उनके संबंधों का अध्ययन करने में किया जाता है। इससे यह समझने में सहायता मिलती है कि किसी बड़े नगर की जनसंख्या आसपास के क्षेत्रों को किस सीमा तक प्रभावित कर सकती है।

(2) जनसंख्या वितरण (Population Distribution):-

    जनसंख्या संभाव्यता मॉडल विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या के संयुक्त प्रभाव का अध्ययन करने में उपयोगी है। इसकी सहायता से अधिक और कम जनसंख्या संभाव्यता वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है तथा जनसंख्या वितरण के स्थानिक स्वरूप को समझा जा सकता है।

(3) परिवहन भूगोल (Transport Geography):-

   इस मॉडल से विभिन्न जनसंख्या केंद्रों की संभावित पहुँच और उनके बीच स्थानिक संबंधों का आकलन किया जा सकता है। इसका उपयोग परिवहन नियोजन के प्रारंभिक अध्ययन में किया जा सकता है, हालाँकि वास्तविक यातायात की गणना के लिए अतिरिक्त आँकड़ों की आवश्यकता होती है।

(4) आर्थिक भूगोल (Economic Geography):-

    आर्थिक भूगोल में इसका प्रयोग जनसंख्या केंद्रों के संभावित आर्थिक प्रभाव को समझने में किया जाता है। अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में बाजार, श्रम तथा उपभोक्ता माँग की संभावनाएँ अधिक हो सकती हैं। फिर भी वास्तविक आर्थिक प्रभाव आय, परिवहन और अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।

(5) क्षेत्रीय नियोजन (Regional Planning):-

    इस मॉडल की सहायता से विभिन्न क्षेत्रों की संभावित जनसंख्या पहुँच का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। इससे विद्यालय, अस्पताल, बाजार तथा अन्य सार्वजनिक सुविधाओं के नियोजन में प्रारंभिक जानकारी प्राप्त होती है।

(6) संभाव्यता मानचित्र (Potential Maps):-

    विभिन्न स्थानों की जनसंख्या संभाव्यता की गणना करके समान संभाव्यता वाले स्थानों को रेखाओं द्वारा जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार समसंभाव्यता रेखाओं वाला मानचित्र तैयार किया जाता है, जिससे किसी क्षेत्र में जनसंख्या के संभावित प्रभाव का स्थानिक वितरण स्पष्ट होता है।

जनसंख्या संभाव्यता मॉडल का महत्व
Importance of Population Potential Model

    जनसंख्या संभाव्यता मॉडल का महत्व इस बात में है कि यह केवल किसी क्षेत्र की स्थानीय जनसंख्या पर ध्यान देने के बजाय आसपास के अनेक जनसंख्या केंद्रों के संयुक्त प्रभाव को भी सम्मिलित करता है। इससे विभिन्न स्थानों की संभावित पहुँच और आकर्षण का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है।

   यह जनसंख्या भूगोल, नगरीय भूगोल, क्षेत्रीय विश्लेषण तथा नियोजन संबंधी अध्ययनों में उपयोगी है। इसके माध्यम से प्राप्त परिणामों को सारणी, गणना और मानचित्र के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

जनसंख्या संभाव्यता मॉडल की सीमाएँ

Limitations of Population Potential Model

    इस मॉडल की कुछ सीमाएँ भी हैं। इसमें सामान्यतः जनसंख्या और दूरी को प्रमुख आधार माना जाता है, जबकि वास्तविक स्थानिक प्रभाव पर सड़क, परिवहन लागत, आय, रोजगार, सामाजिक संबंध तथा प्राकृतिक बाधाओं का भी प्रभाव पड़ता है। समान जनसंख्या और दूरी वाले दो क्षेत्रों की वास्तविक संभाव्यता अलग-अलग हो सकती है।

   इसके अतिरिक्त, परिणाम इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि अध्ययन में किन स्थानों को शामिल किया गया है और दूरी किस प्रकार मापी गई है। इसलिए मॉडल से प्राप्त परिणामों की व्याख्या स्थानीय परिस्थितियों और अन्य प्रासंगिक आँकड़ों के साथ करना आवश्यक है।

निष्कर्ष (Conclusion):

     जनसंख्या संभाव्यता मॉडल भूगोल में जनसंख्या के स्थानिक प्रभाव तथा विभिन्न जनसंख्या केंद्रों के संयुक्त योगदान को समझने का एक महत्वपूर्ण मात्रात्मक साधन है। यह जनसंख्या और दूरी के संबंध को गणितीय रूप में व्यक्त करता है। इसकी सहायता से विभिन्न क्षेत्रों की संभाव्यता की तुलना, संभाव्यता मानचित्रों का निर्माण तथा क्षेत्रीय नियोजन के लिए प्रारंभिक विश्लेषण किया जा सकता है।

   हालाँकि, अधिक विश्वसनीय निष्कर्ष प्राप्त करने के लिए जनसंख्या और दूरी के साथ अन्य भौगोलिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारकों पर भी विचार करना आवश्यक है।

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