Heat Balanceऊष्मा संतुलन |
परिचय (Introduction)
पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सूर्य है। सूर्य से प्राप्त ऊर्जा पृथ्वी की सतह, वायुमंडल, महासागरों तथा अन्य प्राकृतिक घटकों को गर्म करती है। पृथ्वी इस ऊर्जा के एक भाग को अवशोषित करती है तथा शेष भाग को परावर्तित कर देती है।
पृथ्वी और वायुमंडल द्वारा अवशोषित ऊर्जा अंततः दीर्घतरंग विकिरण के रूप में अंतरिक्ष में वापस भेजी जाती है। पृथ्वी द्वारा प्राप्त और अंतरिक्ष में उत्सर्जित ऊर्जा के बीच दीर्घकालीन संतुलन को ऊष्मा संतुलन (Heat Balance) कहा जाता है।
ऊष्मा संतुलन पृथ्वी के औसत तापमान को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि पृथ्वी द्वारा अवशोषित ऊर्जा, उत्सर्जित ऊर्जा से अधिक हो जाए, तो तापमान बढ़ने की प्रवृत्ति होती है। इसके विपरीत, उत्सर्जित ऊर्जा अधिक होने पर तापमान घटने की प्रवृत्ति होती है।
ऊष्मा संतुलन की अवधारणा
Concept of Heat Balance
ऊष्मा संतुलन से आशय पृथ्वी द्वारा सूर्य से प्राप्त ऊर्जा और पृथ्वी-वायुमंडल तंत्र द्वारा अंतरिक्ष में वापस भेजी गई ऊर्जा के बीच संतुलन से है। पृथ्वी पर ऊर्जा का वितरण सभी स्थानों पर समान नहीं होता।
भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें तिरछी पड़ती हैं। इसलिए निम्न अक्षांशों पर ऊर्जा प्राप्ति सामान्यतः अधिक तथा उच्च अक्षांशों पर कम होती है।
वायुमंडल, महासागरीय धाराएँ और पवनें ऊष्मा को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचाने में सहायता करती हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर तापमान के क्षेत्रीय अंतर को कम करने में ऊष्मा का स्थानांतरण महत्वपूर्ण है।
ऊष्मा संतुलन के प्रमुख घटक
Major Components of Heat Balance
(1) सौर विकिरण (Solar Radiation):-
सूर्य से विद्युतचुंबकीय तरंगों के रूप में पृथ्वी तक पहुँचने वाली ऊर्जा को सौर विकिरण कहते हैं। यही पृथ्वी की सतह और वायुमंडल को ऊर्जा प्रदान करने का प्रमुख स्रोत है। प्राप्त सौर ऊर्जा की मात्रा अक्षांश, ऋतु, दिन की अवधि, बादलों और वायुमंडलीय परिस्थितियों से प्रभावित होती है।
(2) परावर्तित विकिरण (Reflected Radiation):-
पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण का कुछ भाग पृथ्वी की सतह, बादलों तथा वायुमंडल द्वारा वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर दिया जाता है। किसी सतह की परावर्तन क्षमता उसके रंग, बनावट और प्रकृति पर निर्भर करती है। बर्फ और बादल सामान्यतः अधिक सौर ऊर्जा परावर्तित करते हैं।
(3) अवशोषित सौर विकिरण (Absorbed Solar Radiation):-
सौर विकिरण का जो भाग पृथ्वी की सतह तथा वायुमंडल द्वारा अवशोषित किया जाता है, वह उन्हें गर्म करने में योगदान देता है। भूमि और महासागर इस ऊर्जा को अवशोषित करके गर्म होते हैं। इसके बाद वे संवेदनशील ऊष्मा, गुप्त ऊष्मा तथा दीर्घतरंग विकिरण के माध्यम से ऊर्जा का आदान-प्रदान करते हैं।
(4) पार्थिव विकिरण (Terrestrial Radiation):-
पृथ्वी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करके उसे मुख्यतः दीर्घतरंग अवरक्त विकिरण के रूप में उत्सर्जित करती है। इसे पार्थिव विकिरण कहते हैं। वायुमंडल की ग्रीनहाउस गैसें इस विकिरण के एक भाग को अवशोषित करती हैं और ऊर्जा को पुनः उत्सर्जित करती हैं। इससे पृथ्वी की सतह और निचला वायुमंडल गर्म बने रहते हैं।
(5) ऊष्मा का स्थानांतरण (Heat Transfer):-
पृथ्वी की सतह से वायुमंडल और एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक ऊष्मा का स्थानांतरण विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा होता है। इनमें विकिरण, चालन, संवहन तथा वाष्पीकरण और संघनन से संबंधित गुप्त ऊष्मा का स्थानांतरण शामिल हैं। पवनें और महासागरीय धाराएँ भी ऊष्मा को निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वैश्विक ऊर्जा बजट (Global Energy Budget)
जलवायुवेताओं ने अपने अध्ययन में बताया है कि पृथ्वी सूर्य से जितना उष्मा सौर विकिरण के रूप में प्राप्त करता है उतना ही उष्मा पार्थिव विकिरण के रूप में पुन: अंतरिक्ष में लौटा दिया जाता है। धरातल पर सौर ऊर्जा या विकिरण लघु तरंगों के रूप में प्राप्त होती है। जबकि पार्थिव विकिरण दीर्घ तरंगों के रूप में अन्तरिक्ष में लौटती है।
वायुमण्डल में उपस्थित धुलकण, जलवाष्प और CO2 गैसे दीर्घ एवं लघु तरंगों को अवशोषित करने की प्रवृति रखते हैं। वास्तव में हमारा वायुमंडल सौर विकिरण से गर्म नहीं होता बल्कि पार्थिव विकिरण से गर्म होता है क्योंकि हमारा वायुमंडल सौर विकिरण के लिए पारदर्शक जबकि पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शक है।
सौर विकिरण के द्वारा प्राप्त ऊर्जा और पार्थिव विकिरण द्वारा परित्याग किया गया ऊर्जा के बीच भी अभूतपूर्व संतुलन पाया जाता है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। जैसे: हमारा वायुमण्डल जितना सूर्यातप प्राप्त करता है उसे अगर 100 इकाई माना जाय तो उसका मात्र 65% इकाई ही वायुमण्डल में प्रविष्ट कर पाता है।

लेकिन वास्तव में 47% उष्मा धरातल को प्राप्त होती है और शेष 18% को वायुमण्डल अवशोषित कर लेती है। सौर विकिरण का वितरण निम्न प्रकार से बताया गया है। जैसे:-
⇒ 25% इकाई बादल के द्वारा सौर विकिरण का परावर्तन कर दिया जाता है।
⇒ 7% इकाई सौर ऊर्जा वायु से टकराकर सौर विकिरण का परावर्तन हो जाता है।
⇒ 19% इकाई क्षोभमंडल में उपस्थित वायु द्वारा अवशोषित कर ली जाती है।
⇒ 2% इकाई उष्मा पृथ्वी के भूतल के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से परावर्तन कर दिया जाता है।

उपरोक्त आँकड़े से स्पष्ट है कि 53% इकाई सौर विकिरण को वायुमण्डल के विभिन्न स्तर से परावर्तित कर दिए जाते हैं। शेष 47% सौर विकिरण को धरातल ग्रहण करता है जिसे कालान्तर में पार्थिव विकिरण के रूप में अन्तरिक्ष में पुन: लौटा दी जाती है।
ऊष्मा संतुलन को प्रभावित करने वाले कारक
Factors Affecting Heat Balance
(i) अक्षांश (Latitude):-
अक्षांश पृथ्वी पर सौर ऊर्जा के वितरण को प्रभावित करता है। भूमध्यरेखीय क्षेत्रों में सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत सीधी पड़ती हैं, जिससे ऊर्जा की प्राप्ति अधिक होती है। इसके विपरीत, ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें तिरछी पड़ने के कारण ऊर्जा की प्राप्ति कम होती है। इस प्रकार अक्षांश पृथ्वी के तापमान और ऊष्मा संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(ii) ऋतु (Season):-
पृथ्वी के अक्षीय झुकाव तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के कारण विभिन्न ऋतुओं में सौर ऊर्जा की प्राप्ति बदलती रहती है। ग्रीष्म ऋतु में दिन बड़े होने और सूर्य की किरणें अधिक सीधी पड़ने से ऊर्जा की प्राप्ति बढ़ती है। शीत ऋतु में दिन छोटे होने तथा किरणें तिरछी पड़ने से ऊर्जा की प्राप्ति कम हो जाती है।
(iii) बादल (Clouds):-
बादल पृथ्वी के ऊष्मा संतुलन को दो प्रकार से प्रभावित करते हैं। वे आने वाले सौर विकिरण के एक भाग को परावर्तित करके अंतरिक्ष में वापस भेज देते हैं, जिससे पृथ्वी की सतह पर ऊर्जा की प्राप्ति कम होती है। दूसरी ओर, बादल पृथ्वी से निकलने वाले दीर्घतरंग विकिरण को अवशोषित करके पुनः उत्सर्जित करते हैं, जिससे सतह का तापमान प्रभावित होता है।
(iv) धरातल की प्रकृति (Nature of Surface):-
पृथ्वी की सतह के विभिन्न भागों की परावर्तन तथा ऊष्मा अवशोषण क्षमता अलग-अलग होती है। बर्फ और हिम सामान्यतः अधिक सौर विकिरण परावर्तित करते हैं, जबकि वन, जल तथा अन्य सतहें अलग-अलग मात्रा में ऊर्जा अवशोषित करती हैं। धरातल की प्रकृति के कारण विभिन्न क्षेत्रों के तापमान और ऊष्मा संतुलन में अंतर पाया जाता है।
(v) ग्रीनहाउस गैसें (Greenhouse Gases):-
कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और जलवाष्प जैसी ग्रीनहाउस गैसें पृथ्वी से उत्सर्जित होने वाले दीर्घतरंग विकिरण के एक भाग को अवशोषित करती हैं तथा उसे पुनः उत्सर्जित करती हैं। इस प्रक्रिया से पृथ्वी की सतह और निचला वायुमंडल गर्म बने रहते हैं। इन गैसों की सांद्रता बढ़ने से पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन में परिवर्तन हो सकता है और वैश्विक तापमान बढ़ सकता है।
(vi) पवनें एवं महासागरीय धाराएँ (Winds and Ocean Currents):-
पवनें और महासागरीय धाराएँ पृथ्वी पर ऊष्मा के वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पवनें वायुमंडल में गर्म और ठंडी वायु को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचाती हैं, जबकि महासागरीय धाराएँ गर्म जल को निम्न अक्षांशों से उच्च अक्षांशों तथा ठंडे जल को अन्य क्षेत्रों की ओर ले जाती हैं। इससे विभिन्न क्षेत्रों के तापमान में अंतर कम करने और वैश्विक ऊष्मा संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।
ऊष्मा संतुलन का महत्व
Importance of Heat Balance
ऊष्मा संतुलन पृथ्वी की जलवायु प्रणाली को समझने का एक प्रमुख आधार है। यह पृथ्वी के औसत तापमान, वायुमंडलीय परिसंचरण, महासागरीय प्रक्रियाओं और क्षेत्रीय जलवायु में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि पृथ्वी पर ऊर्जा का वितरण किस प्रकार होता है तथा तापमान में क्षेत्रीय एवं मौसमी अंतर क्यों पाए जाते हैं। वैश्विक ऊष्मा संतुलन में परिवर्तन जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है।
ऊष्मा संतुलन और वैश्विक तापन
Heat Balance and Global Warming
जब पृथ्वी-वायुमंडल तंत्र द्वारा अवशोषित ऊर्जा और अंतरिक्ष में उत्सर्जित ऊर्जा के बीच असंतुलन उत्पन्न होता है, तो पृथ्वी की ऊर्जा मात्रा में परिवर्तन होने लगता है। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता के कारण पृथ्वी से बाहर जाने वाले दीर्घतरंग विकिरण का कुछ भाग अधिक अवशोषित होता है। इससे पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन में सकारात्मक असंतुलन उत्पन्न होता है और वैश्विक औसत तापमान बढ़ने लगता है।
इसलिए ऊष्मा संतुलन का अध्ययन जलवायु परिवर्तन के कारणों और उसके संभावित प्रभावों को समझने में विशेष महत्व रखता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
ऊष्मा संतुलन पृथ्वी द्वारा प्राप्त सौर ऊर्जा तथा अंतरिक्ष में वापस उत्सर्जित ऊर्जा के बीच दीर्घकालीन संतुलन को दर्शाता है। यह पृथ्वी के औसत तापमान और जलवायु प्रणाली को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अक्षांश, ऋतु, धरातल की प्रकृति, बादल, ग्रीनहाउस गैसें, पवनें और महासागरीय धाराएँ इस संतुलन को प्रभावित करती हैं। अतः ऊष्मा संतुलन का अध्ययन भौतिक भूगोल, जलवायु विज्ञान तथा वैश्विक तापन को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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