Periglacial Systemsपरिहिमानी तंत्र Periglacial landforms परिहिमानी भू-आकृतियाँ |
परिचय (Introduction)
परिहिमानी तंत्र उन भौगोलिक क्षेत्रों एवं प्रक्रियाओं से संबंधित है, जहाँ तापमान लंबे समय तक हिमांक के आसपास या उससे नीचे रहता है तथा भूमि पर हिम एवं पाला जमने और पिघलने की प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।
इन क्षेत्रों में सामान्यतः हिमानी (Glacial) बर्फ का व्यापक आवरण आवश्यक नहीं होता, लेकिन जमाव और पिघलाव के कारण स्थलरूपों में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। परिहिमानी तंत्र का विकास मुख्यतः ठंडी जलवायु वाले प्रदेशों, ध्रुवीय क्षेत्रों तथा ऊँचे पर्वतीय भागों में होता है। इन क्षेत्रों में हिम-पिघलाव, पाला अपक्षय, मृदा का विसर्पण और सक्रिय परत की गति जैसी प्रक्रियाएँ प्रमुख होती हैं।
परिहिमानी तंत्र की अवधारणा
Concept of Periglacial Systems
परिहिमानी तंत्र से आशय उन प्राकृतिक परिस्थितियों, प्रक्रियाओं और स्थलरूपों के समूह से है, जो ठंडी जलवायु तथा भूमि के बार-बार जमने और पिघलने से विकसित होते हैं। इन क्षेत्रों में भूमि की ऊपरी परत गर्म मौसम में पिघल सकती है, जबकि उसके नीचे की भूमि लंबे समय तक जमी रह सकती है। स्थायी रूप से जमी भूमि को स्थायी तुषार भूमि (Permafrost) कहा जाता है।
परिहिमानी तंत्र केवल हिमनदों के किनारे तक सीमित नहीं है। इसका विस्तार उन क्षेत्रों में भी हो सकता है जहाँ हिमानी बर्फ उपस्थित नहीं होती, लेकिन पाला एवं जमाव-पिघलाव की प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।
परिहिमानी तंत्र की प्रमुख विशेषताएँ
Major Characteristics of Periglacial Systems
(1) निम्न तापमान (Low Temperature):-
परिहिमानी क्षेत्रों में तापमान सामान्यतः कम रहता है। शीत ऋतु में भूमि जम जाती है और गर्म मौसम में उसकी ऊपरी परत पिघल सकती है। तापमान में यह परिवर्तन चट्टानों, मिट्टी और धरातलीय प्रक्रियाओं को प्रभावित करता है।
(2) स्थायी तुषार भूमि (Permafrost):-
स्थायी तुषार भूमि वह भूमि है, जिसका तापमान कम-से-कम लगातार दो वर्षों तक 0°C या उससे नीचे बना रहता है। इसके ऊपर की सक्रिय परत (Active Layer) मौसम के अनुसार जमती और पिघलती है। यह स्थिति भूमि की जल निकासी, वनस्पति तथा धरातलीय स्थिरता को प्रभावित करती है।
(3) पाला अपक्षय (Frost Weathering):-
चट्टानों की दरारों में प्रवेश किया हुआ जल जमने और पिघलने के दौरान चट्टानों को कमजोर कर सकता है। बार-बार जमाव और पिघलाव से चट्टानों का विखंडन होता है। यह प्रक्रिया ठंडे पर्वतीय तथा परिहिमानी क्षेत्रों में महत्वपूर्ण होती है।
(4) जमाव एवं पिघलाव (Freeze-Thaw Processes):-
परिहिमानी क्षेत्रों में मिट्टी और चट्टानों का बार-बार जमना तथा पिघलना धरातल की संरचना को बदलता है। इससे मिट्टी में हलचल, सतह का उभार और छोटे स्थलरूपों का निर्माण हो सकता है।
(5) सीमित जल निकासी (Restricted Drainage):-
स्थायी तुषार भूमि के ऊपर स्थित जमी हुई परत पानी के नीचे की ओर जाने को रोक सकती है। परिणामस्वरूप गर्म मौसम में पिघली हुई ऊपरी मिट्टी में जलभराव हो सकता है और भूमि की सतह पर जल का प्रवाह बढ़ सकता है।
परिहिमानी तंत्र की प्रमुख प्रक्रियाएँ
Major Processes of Periglacial Systems
(i) पाला अपक्षय (Frost Weathering): पानी के जमने-पिघलने से चट्टानों का टूटना।
(ii) सोलिफ्लक्शन (Solifluction): जलसंतृप्त मिट्टी की ऊपरी परत का ढाल के सहारे धीरे-धीरे नीचे की ओर खिसकना।
(iii) क्रायोटर्बेशन (Cryoturbation): मिट्टी के जमने और पिघलने से मृदा परतों का मिश्रण एवं विक्षोभ।
(iv) पिंगो निर्माण (Pingo Formation): स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में भूमिगत बर्फ के दबाव से भूमि का गुंबदाकार ऊपर उठना।
(v) बहुफलीय धरातलीय आकृतियों का निर्माण (Patterned Ground Formation): जमाव-पिघलाव की प्रक्रियाओं से भूमि पर बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित प्रतिरूपों का बनना।
परिहिमानी तंत्र के प्रमुख स्थलरूप
Major Landforms of Periglacial Systems
(1) प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground):-
जमाव-पिघलाव और मृदा की गति के कारण धरातल पर बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित आकृतियाँ बनती हैं। ये विशेष रूप से टुंड्रा और स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
पिंगो स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में बनने वाली गुंबदाकार पहाड़ी होती है। इसके भीतर बर्फ के जमाव से भूमि ऊपर उठती है। यह मुख्यतः आर्कटिक क्षेत्रों में पाई जाती है।
(3) सोलिफ्लक्शन लोब (Solifluction Lobes):-
जलसंतृप्त मिट्टी के धीरे-धीरे ढाल के नीचे खिसकने से अर्धवृत्ताकार या जीभनुमा आकृतियाँ बनती हैं। ये ठंडे पर्वतीय और टुंड्रा क्षेत्रों में सामान्य हैं।
परिहिमानी तंत्र का वितरण
Distribution of Periglacial Systems
परिहिमानी तंत्र मुख्यतः निम्नलिखित क्षेत्रों में पाए जाते हैं-
1. आर्कटिक क्षेत्र (Arctic Region): साइबेरिया, अलास्का, उत्तरी कनाडा तथा ग्रीनलैंड के कुछ भाग।
2. उच्च पर्वतीय क्षेत्र (High Mountain Regions): हिमालय, आल्प्स तथा अन्य ऊँचे पर्वतीय प्रदेशों के ठंडे भाग।
3. उपध्रुवीय क्षेत्र (Subpolar Regions): वे क्षेत्र जहाँ लंबे समय तक ठंड रहती है और भूमि का मौसमी जमाव-पिघलाव होता है।
4. शीत मरुस्थलीय क्षेत्र (Cold Desert Regions): अत्यंत ठंडे और शुष्क प्रदेश, जहाँ पाला अपक्षय सक्रिय हो सकता है।
परिहिमानी तंत्र का महत्व
Importance of Periglacial Systems
परिहिमानी तंत्र का अध्ययन भौतिक भूगोल और भू-आकृति विज्ञान में महत्वपूर्ण है। इसके माध्यम से ठंडी जलवायु में चट्टानों के अपक्षय, मिट्टी के विकास, ढाल प्रक्रियाओं तथा विशिष्ट स्थलरूपों के निर्माण को समझा जाता है। स्थायी तुषार भूमि के पिघलने से सड़क, भवन और अन्य आधारभूत संरचनाओं की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
इसके अतिरिक्त, स्थायी तुषार भूमि में संचित कार्बनिक पदार्थों के विघटन से ग्रीनहाउस गैसें मुक्त हो सकती हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
निष्कर्ष (Conclusion):
परिहिमानी तंत्र ठंडी जलवायु में सक्रिय जमाव-पिघलाव, पाला अपक्षय, सोलिफ्लक्शन तथा स्थायी तुषार भूमि से संबंधित प्रक्रियाओं का समूह है। इसके कारण प्रतिरूपित भूमि, पिंगो और सोलिफ्लक्शन लोब जैसे विशिष्ट स्थलरूप विकसित होते हैं।
परिहिमानी तंत्र का अध्ययन पृथ्वी की सतह के विकास, ठंडे क्षेत्रों की पर्यावरणीय परिस्थितियों तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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Periglacial landforms (परिहिमानी भू-आकृतियाँ) |
भूगोल में स्थलरूपों (landforms) का अध्ययन पृथ्वी की सतह पर हो रही भौतिक प्रक्रियाओं और उनके परिणामस्वरूप निर्मित आकृतियों को समझने हेतु किया जाता है। हिमानी (Glacial), शुष्क (Arid), जलीय (Fluvial), तटीय (Coastal) आदि विभिन्न वातावरणों की भाँति “पेरिग्लेशियल” (Periglacial) भी एक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक वातावरण है।
“पेरिग्लेशियल” शब्द का प्रयोग उन भौगोलिक क्षेत्रों के लिए किया जाता है जहाँ हिमनद तो नहीं होते परंतु तीव्र शीत, ठंढ-जमाव-गलन (Freeze-thaw) चक्र, स्थायी हिममृदा (Permafrost) तथा मौसमी बर्फ (Seasonal snow) स्थलरूप निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
“Periglacial” शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम 1909 में पोलिश (पोलैंड) भूगोलवेत्ता वालेरी वॉन लोजिंस्की ने किया था। आज यह शब्द व्यापक रूप से उच्च अक्षांशों (high latitudes) तथा उच्च पर्वतीय (high mountain) क्षेत्रों में पाए जाने वाले भू-आकृतिक परिदृश्य के लिए प्रयुक्त होता है।
⇒ 1950 में एलसी पेल्टियर ने क्षरण के पेरिग्लेशियल चक्र की अवधारणा को सामने रखा। यह क्षरण के सामान्य चक्र की डेविसियन अवधारणा के समान है, और पेरीग्लेशियल परिदृश्य युवावस्था और परिपक्वता के चरणों से गुजरने के बाद बुढ़ापे को प्राप्त करता है।
परिभाषा और विशेषताएँ
परिग्लेशियल क्षेत्र (Periglacial environment) वे क्षेत्र हैं जहाँ का जलवायु अत्यधिक ठंडा होता है, परन्तु संपूर्ण सतह हिमनदों से आच्छादित नहीं रहती। यहाँ permafrost, मौसमी हिम (seasonal frost), तथा freeze-thaw प्रक्रियाएँ सक्रिय रहती हैं।
मुख्य विशेषताएँ-
⇒ अत्यधिक ठंडा मौसम, परन्तु पूरा हिमनद क्षेत्र नहीं।
⇒ सतह पर मौसमी हिम आवरण और भूजल का जमना।
⇒ मृदा एवं शैल का यांत्रिक अपक्षय (frost weathering)।
⇒ Permafrost (स्थायी जमी हुई मृदा) का होना।
⇒ भूमिगत बर्फ के पिघलने-बनने से विशिष्ट स्थलरूपों का विकास।
⇒ उच्च अक्षांशों (अलास्का, साइबेरिया, आर्कटिक, ग्रीनलैंड) तथा उच्च पर्वतीय क्षेत्र (हिमालय, आल्प्स, एंडीज) में प्रमुख रूप से पाए जाते हैं।
परिग्लेशियल प्रक्रियाएँ
परिग्लेशियल स्थलरूपों का निर्माण निम्नलिखित प्रमुख प्रक्रियाओं से होता है –
Freeze-Thaw Weathering (Frost Action):
पानी का दरारों में जाना, जमकर फैलना और पुनः पिघलना, जिससे चट्टानें टूट जाती हैं।
Permafrost Processes:
स्थायी जमी हुई मिट्टी/शैल का पिघलना एवं जमना, जिससे भूमिगत गड़बड़ी, धँसाव और उभार उत्पन्न होते हैं।
Solifluction (Gelifluction):
जमी हुई परत पर सतही मिट्टी का धीमा खिसकना, जिससे ढलानों पर लोब्स (lobes) और टेरेसेज बनते हैं।
Frost Heaving and Frost Creep:
जमने-पिघलने की प्रक्रिया के कारण मृदा कणों का ऊपर-नीचे होना और धीरे-धीरे ढलान की ओर खिसकना।
Nivation:
हिम-क्षरण (snow patches) के नीचे भूमि का क्षरण और अपक्षय।
प्रमुख परिग्लेशियल स्थलरूप
अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ
Erosional landforms)
1. जमना-पिघलना चक्र (Freeze-Thaw Cycle)
2. निवेशन हॉलो (Nivation Hollow)
3. विषम घाटी (Asymmetrical Valley)
4. क्रायोप्लानेशन टेरेस या गोलेट्ज टेरेस (Cryoplanation Terraces or Goletz Terraces)
5. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground)
6. फ्रॉस्ट क्रैक बहुभुज (Frost Crack Polygon)
7. पत्थर की पट्टियाँ (Stone Strips)
8. पिंगो (Pingo)
9. हम्मोक्स (Hummocks)
10. पलसा (Palsa)
निक्षेपणात्मक भू-आकृतियाँ
Depositional Landforms
1. ब्लॉकफील्ड्स या फ़ेलसेनमीर (BlockFields or Felsenmeer)
2. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground)
3. टोर्स (Tors)
4. बोल्डर फील्ड (Boulder Fields)
अपरदनात्मक भू-आकृतियाँ (Erosional landforms)
1. पिंगो (Pingo):-
⇒ यह गोलाकार या शंक्वाकार (conical) हिमीय उभार होते हैं जो permafrost क्षेत्रों में बनते हैं।
⇒ इनका आकार 30–70 मीटर ऊँचा और 300–1000 मीटर चौड़ा हो सकता है।
प्रकार-
⇒ Closed-system pingos (permafrost के भीतर जलदाब से बने)
⇒ Open-system pingos (भूजल के जमने से बने)
उदाहरण: साइबेरिया, अलास्का, उत्तरी कनाडा।
2. थर्मोकार्स्ट (Thermokarst):-
⇒ यह भूमिगत बर्फ के पिघलने पर सतह के धँसने से निर्मित अनियमित गड्ढेदार भूमि है।
⇒ झीलें, गड्ढे, छोटे-छोटे ताल (ponds) बन जाते हैं।
⇒ अलास्का और साइबेरिया में व्यापक।
3. सॉलिफ्लक्शन लोब्स (Solifluction Lobes):-
⇒ ढलानों पर जमी हुई परत के ऊपर गीली मिट्टी के धीरे-धीरे बहाव से अर्धचंद्राकार लोब्स (lobes) बनते हैं।
⇒ हिमालय, स्कैंडेनेविया, अलास्का में पाये जाते हैं।
4. आइस वेज (Ice Wedges):-
⇒ भूमि में गहरी दरारों में पानी भरकर जम जाता है।
⇒ समय के साथ दरारें चौड़ी होकर बहुभुजाकार patterned ground का निर्माण करती हैं।
⇒ यह पेरिग्लेशियल परिदृश्य की पहचान है।
5. पैटर्न्ड ग्राउंड (Patterned Ground):-
⇒ freeze-thaw क्रिया से भूमि की सतह पर वृत्ताकार, बहुभुजाकार, या धारियों जैसी आकृतियाँ।
⇒ इसमें stone polygons, stone circles, stone stripes शामिल हैं।
6. रॉक ग्लेशियर (Rock Glaciers):-
⇒ बर्फ और चट्टानी अवशेषों का मिश्रण जो धीमी गति से ढलान की ओर बढ़ता है।
⇒ यह हिमनद और परिग्लेशियल प्रक्रियाओं का संयोग है।
7. नाइवेेशन होलो (Nivation Hollows):-
⇒ हिम पैच (snow patches) के नीचे भूमि का क्षरण होकर गड्ढेदार आकृति बनती है।

निक्षेपणात्मक भू-आकृतियाँ (Depositional Landforms)
1. ब्लॉकफील्ड्स या फेलसेनमीर (Blockfields or Felsenmeer):-
ब्लॉकफील्ड्स बड़े-बड़े चट्टानी खंडों से ढके क्षेत्र होते हैं। इनका निर्माण मुख्यतः पाला अपक्षय और चट्टानों के विखंडन से होता है। ये ठंडे पर्वतीय एवं परिहिमानी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
2. प्रतिरूपित भूमि (Patterned Ground):-
प्रतिरूपित भूमि पर जमाव और पिघलाव की प्रक्रियाओं के कारण बहुभुजाकार, वृत्ताकार या अन्य नियमित आकृतियाँ बनती हैं। ये स्थलरूप मुख्यतः टुंड्रा तथा स्थायी तुषार भूमि वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
3. टोर्स (Tors):-
टोर्स धरातल पर स्थित अलग-अलग खड़े चट्टानी उभार होते हैं। इनका निर्माण चट्टानों के अपक्षय और अपरदन से होता है। ठंडे पर्वतीय क्षेत्रों में पाला अपक्षय इनके विकास में योगदान दे सकता है।
4. बोल्डर फील्ड (Boulder Fields):-
बोल्डर फील्ड ऐसे क्षेत्र होते हैं, जहाँ बड़े-बड़े शिलाखंड व्यापक रूप से फैले रहते हैं। इनका निर्माण चट्टानों के विखंडन और शिलाखंडों के ढाल के सहारे संचलन से हो सकता है।

परिग्लेशियल स्थलरूपों का महत्व:
(i) पृथ्वी के शीत क्षेत्रों की जलवायु एवं पर्यावरणीय स्थिति को समझने में सहायक।
(ii) जलवायु परिवर्तन (climate change) के सूचक – permafrost पिघलने से CO₂ व मीथेन उत्सर्जन।
(iii) मानव बस्तियों और अवसंरचना पर प्रभाव – भवन, सड़क, पाइपलाइन पर धँसाव।
(iv) प्राचीन पेलियो-क्लाइमेट (paleoclimate) के पुनर्निर्माण हेतु महत्त्वपूर्ण।
निष्कर्ष:
परिग्लेशियल स्थलरूप भूगोल की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण शाखा है जो पृथ्वी के उच्च अक्षांशीय तथा उच्च पर्वतीय शीत क्षेत्रों में पाए जाने वाले विशेष भौगोलिक परिदृश्य को दर्शाती है। freeze-thaw क्रिया, permafrost प्रक्रियाएँ, तथा मौसमी हिम आवरण मिलकर ऐसे स्थलरूपों का निर्माण करते हैं जो न केवल प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण होते हैं, बल्कि मानव जीवन एवं पर्यावरण पर भी गहरा प्रभाव डालते हैं।
पिंगो, थर्मोकार्स्ट, आइस वेज, पैटर्न्ड ग्राउंड आदि स्थलरूप पृथ्वी के जलवायु इतिहास तथा भविष्य के पर्यावरणीय संकटों की ओर संकेत करते हैं। अतः परिग्लेशियल भू-आकृति विज्ञान का अध्ययन आधुनिक भूगोल में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
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