42. Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau (छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)

Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau

(छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)



Description of Chhotanagpur Plateauपरिचय

     छोटानागपुर पठार भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक अत्यंत प्राचीन भू-आकृतिक इकाई है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के भूगर्भीय विकास का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

    यह पठार न केवल अपने खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी स्थलाकृति, संरचना, नदियों की व्यवस्था, और मानव-भू-संबंधों के कारण यह भारत के भौतिक भूगोल में विशेष स्थान रखता है। छोटानागपुर पठार को भारतीय भू-रचना का “खनिज हृदय” (Mineral Heart of India) भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

     छोटानागपुर पठार का विस्तार मुख्यतः झारखंड राज्य में है, जबकि इसके कुछ भाग छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं।

⇒ इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 22° से 25° उत्तर अक्षांश तथा 83° से 87° पूर्व देशांतर तक है।

⇒ पठार का औसत ऊँचाई स्तर 700 मीटर से 1100 मीटर के बीच है।

⇒ इसके उत्तर में गंगा समतलभूमि, दक्षिण में महानदी बेसिन, पूर्व में संथाल परगना की पहाड़ियाँ और पश्चिम में बघेलखंड पठार स्थित है।

भूगर्भीय संरचना

     छोटानागपुर पठार भारतीय भू-गर्भ के अरावली-धारवाड़ प्रणाली का हिस्सा है। यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन शैलों (Pre-Cambrian rocks) से निर्मित है।

⇒ यहाँ नीश, ग्रेनाइट, शिस्ट, क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट और ट्रैप जैसी रूपांतरित शिलाएँ प्रमुख हैं।

⇒ पठार की चट्टानें कठोर और अग्निय प्रकृति की हैं, जिनके बार-बार अपक्षय और अपरदन से वर्तमान स्थलाकृति बनी है।

⇒ भूगर्भीय दृष्टि से यह क्षेत्र स्थिर शील्ड क्षेत्र (Stable Shield Area) है, जहाँ भूकंपीय गतिविधियाँ सीमित हैं।

स्थलाकृति (Relief Features)

    छोटानागपुर पठार की स्थलरूप विशेषताएँ अत्यंत विविध हैं। इसे मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(i) उत्तर छोटानागपुर पठार

⇒ यहाँ की ऊँचाई लगभग 300-700 मीटर तक है।

⇒ प्रमुख पहाड़ियाँ हैं- हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा आदि।

⇒ इस भाग में नदियों द्वारा गहरी घाटियाँ काटी गई हैं।

(ii) मध्य छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का सबसे विस्तृत क्षेत्र है।

⇒ राँची, लोहरदगा, गुमला और खूंटी जिले इसी भाग में हैं।

⇒ औसत ऊँचाई 700-900 मीटर है।

⇒ यहाँ की सबसे ऊँची चोटी पारसनाथ (1366 मीटर) है।

(iii) दक्षिण छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का उच्चतम भाग है, जहाँ ऊँचाई 900-1100 मीटर तक पहुँचती है।

⇒ नेतरहाट, लुपुंग, टोटो और रायरंग जैसे पठारी क्षेत्र इसी भाग में हैं।

⇒ इसे “छोटानागपुर का पठारी प्रांगण” भी कहा जाता है।

नदी तंत्र (River System)

    छोटानागपुर पठार से अनेक प्रमुख नदियाँ निकलती हैं जो भारत की पूर्वी दिशा की ओर बहती हैं।
मुख्य नदियाँ –

(i) दामोदर नदी – “बंगाल का शोक” कही जाती है, क्योंकि यह बार-बार बाढ़ लाती थी।

(ii) सुवर्णरेखा नदी – राँची से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

(iii) कोएल, बराकर, शंख, दक्षिण कोएल, ब्रह्मणी और बैतरणी ये सभी पठार की जल निकासी में सहायक हैं।

       नदियाँ प्रायः पूर्ववाहिनी (East-flowing) हैं। जल निकासी का स्वरूप डेंड्राइटिक पैटर्न (Dendritic Pattern) का है। नदियों ने घाटियाँ काटकर कई जगह गॉर्ज और जलप्रपात बनाए हैं –

जैसे – हुंडरू फॉल्स, दशम फॉल्स, जोंरी फॉल्स, हिरनी फॉल्स आदि।

जलवायु (Climate)

     पठार की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है, परन्तु ऊँचाई के कारण यहाँ तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।

⇒ ग्रीष्म ऋतु: अप्रैल से जून तक, तापमान 35°C–40°C तक जाता है।

⇒ वर्षा ऋतु: जून से सितंबर तक, औसत वार्षिक वर्षा 1200–1500 मिमी।

⇒ शीत ऋतु: नवम्बर से फरवरी तक, तापमान 10°C–15°C तक गिर जाता है।

    राँची और नेतरहाट जैसे स्थानों में जलवायु अत्यंत सुखद है, इसलिए इन्हें “भारत के छोटे शिमला” कहा जाता है।

मृदा (Soil)

    पठार की मृदाएँ मुख्यतः अपक्षय से बनी हैं-

⇒ लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil) – सबसे अधिक क्षेत्र में पाई जाती हैं।

⇒ लेटराइट मृदा (Laterite Soil) – उच्च पठारी भागों में, लौह ऑक्साइड से युक्त।

⇒ काली मृदा – कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में, ज्वालामुखीय चट्टानों के कारण।

⇒ ये मृदाएँ पोषक तत्वों में गरीब हैं, इसलिए कृषि उत्पादकता कम है।

वनस्पति और जीव-जंतु

    छोटानागपुर पठार में घने वन पाए जाते हैं, जो मुख्यतः उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों (Tropical Deciduous Forests) के रूप में हैं।

मुख्य वृक्ष- साल, सागौन, बांस, अर्जुन, बेल, महुआ, तेंदू, और पलाश।

वन्यजीव- हाथी, बाघ, भालू, लोमड़ी, और कई प्रकार के पक्षी।

      यह क्षेत्र भारत का एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट माना जाता है।

खनिज संपदा (Mineral Resources)

    छोटानागपुर पठार को भारत का “खनिज भंडार गृह” कहा जाता है। यहाँ से भारत के कुल खनिज उत्पादन का लगभग 40% प्राप्त होता है।

मुख्य खनिज-

⇒ लौह अयस्क (सिंहभूम, चिरिया, गोवा)

⇒ कोयला (दामोदर घाटी, गिरिडीह, झरिया, बोकारो)

⇒ अभ्रक (गया, हजारीबाग, कोडरमा)

⇒ बॉक्साइट, तांबा, मैंगनीज, क्रोमाइट आदि।

    खनिज संसाधनों ने यहाँ के औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया है।

मानव बसावट एवं आर्थिक गतिविधियाँ

    पठार की आबादी अपेक्षाकृत विरल है, किन्तु संसाधनों की प्रचुरता ने यहाँ उद्योगों और नगरों के विकास को बढ़ावा दिया है।

मुख्य नगर- राँची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग।

मुख्य उद्योग-

⇒ इस्पात उद्योग (जमशेदपुर, बोकारो, रौरकेला)

⇒ कोयला और बिजली उद्योग

⇒ खनन और परिवहन

⇒ कुटीर उद्योग और वन आधारित उद्योग।

    कृषि की दृष्टि से यह क्षेत्र अपेक्षाकृत पिछड़ा है, क्योंकि मृदा उर्वरता कम और वर्षा अस्थिर है।

भू-आकृतिक विकास की प्रक्रिया

       छोटानागपुर पठार की भू-आकृति का निर्माण दीर्घकालिक अपक्षय, अपरदन और उत्थान की प्रक्रियाओं से हुआ है।

⇒ प्रारंभिक काल में यह एक विशाल पेनिप्लेन (Peneplain) था।

⇒ बाद में टेक्टोनिक उत्थान के कारण इसमें दरारें (faults) बनीं, जिससे पठारी रूप प्राप्त हुआ।

⇒ नदियों ने समय के साथ घाटियाँ और जलप्रपात बनाए।

⇒ वर्तमान में यह अपक्षय की परिपक्व अवस्था में है।

संतुलित भूआकृतिक दृष्टि से विश्लेषण

      “संतुलित भूआकृतिक विवरण” का अर्थ है- क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना, स्थलरूप, जलवायु, जैविक तत्वों और मानव क्रियाओं के बीच संतुलन की व्याख्या।

(क) भौतिक संतुलन

    पठार की ऊँचाई, ढाल और नदियों की दिशा में प्राकृतिक संतुलन दिखाई देता है। नदियाँ पूर्व की ओर प्रवाहित होकर जल निकासी संतुलित करती हैं।

(ख) जैविक संतुलन

   वनस्पति और मृदा का पारस्परिक संबंध क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखता है। जहाँ वन नष्ट हुए हैं, वहाँ मृदा अपरदन बढ़ा है।

(ग) मानव-प्राकृतिक संतुलन

     खनन, उद्योग और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव से यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा है, किंतु वन संरक्षण, पुनर्वनीकरण और पर्यावरणीय योजनाओं से संतुलन पुनः स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ

⇒ खनन और औद्योगीकरण से मृदा एवं जल प्रदूषण।

⇒ वनक्षेत्र में कमी और जैव विविधता का ह्रास।

⇒ जल स्रोतों का क्षरण एवं नदियों में गाद जमाव।

⇒ आदिवासी समुदायों का विस्थापन।

⇒ भूमि अपरदन और मरुस्थलीकरण की प्रवृत्ति।

संरक्षण और विकास के उपाय

⇒ सतत खनन नीति अपनाना।

⇒ वन पुनर्जीवन और वृक्षारोपण कार्यक्रम।

⇒ मृदा संरक्षण तकनीकें – सीढ़ीदार खेती, कंटूर बंडिंग।

⇒ जल निकासी का नियोजन।

⇒ पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक नीति।

⇒ स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

    इस प्रकार छोटानागपुर पठार भारतीय भू-आकृति का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ प्रकृति और मानव दोनों ने मिलकर भू-दृश्य को आकार दिया है। इसकी कठोर चट्टानें, जलप्रपात, खनिज संपदा, और वन इसे विशेष पहचान देते हैं।

     यह पठार न केवल भारत की औद्योगिक शक्ति का आधार है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अतः आवश्यक है कि इसके संसाधनों का दोहन संतुलित एवं सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस भू-आकृतिक धरोहर का लाभ उठा सकें।

प्रश्न प्रारूप

1. छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण प्रस्तुत करें।

नोट: डेंड्राइटिक पैटर्न– डेंड्राइटिक पैटर्न वह जल निकासी आकृति है जो किसी पेड़ की शाखाओं जैसी दिखती है और समान रूप से अपक्षयित भू-भाग पर विकसित होती है।

32. Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake (प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)

Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake

(प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)



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परिचय

     प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन के लिए एक गंभीर चुनौती हैं। ये ऐसी घटनाएँ हैं जो प्राकृतिक शक्तियों के कारण अचानक घटित होती हैं और जिनका प्रभाव पर्यावरण, समाज, अर्थव्यवस्था तथा जनजीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति के बावजूद मानव आज भी प्रकृति के प्रकोपों से पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो पाया है।

     सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ न केवल भौतिक विनाश करती हैं बल्कि मानव जीवन की संरचना, संसाधनों और विकास प्रक्रिया को भी बाधित करती हैं। भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों अत्यधिक हैं।

1. सूखा (Drought)

     भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

    अर्थात सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसमें किसी क्षेत्र में वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप भूमि की नमी घट जाती है, फसलें नष्ट हो जाती हैं, जलस्रोत सूख जाते हैं और पशु-पक्षी तथा मनुष्य दोनों ही जीवन संकट में पड़ जाते हैं।

सूखे के प्रकार

(i) मौसमी सूखा (Meteorological Drought):-

     जब किसी क्षेत्र में औसत वर्षा से 25% या अधिक कमी हो जाती है, तो इसे मौसमी सूखा कहते हैं।

(ii) कृषि सूखा (Agricultural Drought):-

    जब मिट्टी की नमी इतनी कम हो जाती है कि फसलों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होता है।

(iii) जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought):-

       जब जलाशयों, नदियों, तालाबों और भूजल स्तर में असामान्य कमी हो जाती है।

(iv) सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-economic Drought):-

    जब सूखे के कारण मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।

सूखे के कारण

⇒ अनियमित या असमान वर्षा वितरण

⇒ वनों की कटाई और भूमि का अत्यधिक दोहन

⇒ जल संसाधनों का अनुचित प्रबंधन

⇒ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग

⇒ भूजल का अत्यधिक दोहन

सूखे के प्रभाव

(i) कृषि पर प्रभाव:-

      फसलों की उपज घट जाती है, पशुधन मर जाते हैं और खाद्य संकट उत्पन्न हो जाता है।

(ii) सामाजिक प्रभाव:-

     पलायन, बेरोजगारी, गरीबी और भूखमरी जैसी स्थितियाँ बढ़ती हैं।

(iii) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     भूमि बंजर हो जाती है, वनस्पतियाँ सूख जाती हैं और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है।

(iv) आर्थिक प्रभाव:-

     किसानों की आय घटती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सूखा प्रबंधन

⇒ जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन

⇒ सूखा प्रतिरोधी फसलों की खेती

⇒ वनीकरण और भूमि संरक्षण

⇒ सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सरकार द्वारा राहत पैकेज और रोजगार योजनाएँ (जैसे मनरेगा)

2. बाढ़ (Flood)

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

   अर्थात बाढ़ वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में जल की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह अपनी सामान्य सीमाओं को पार कर मानव बस्तियों, कृषि भूमि और सड़कों को डुबो देती है। यह सबसे सामान्य और व्यापक प्राकृतिक आपदा है।

बाढ़ के प्रकार

(i) नदी बाढ़:

       जब नदियाँ अपने तटों से बाहर निकल जाती हैं, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी आदि की बाढ़।

(ii) शहरी बाढ़:-

    जब शहरों में जल निकासी की कमी के कारण वर्षा जल जमा हो जाता है।

(iii) फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़):-

     पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र वर्षा या ग्लेशियर पिघलने से अचानक उत्पन्न बाढ़।

(iv) तटीय बाढ़:-

     चक्रवात या समुद्री तूफानों के कारण समुद्र का जल तटवर्ती क्षेत्रों में फैल जाता है।

बाढ़ के कारण

⇒ अत्यधिक वर्षा और बादलों का फटना

⇒ नदियों का तल भर जाना और अवैध अतिक्रमण

⇒ जल निकासी प्रणाली का अभाव

⇒ वनों की कटाई और भूमि का क्षरण

⇒ बांधों या तटबंधों का टूटना

बाढ़ के प्रभाव

(i) मानव जीवन पर प्रभाव:-

     जन-धन की हानि, बीमारियों का फैलाव, विस्थापन और पलायन।

(ii) कृषि पर प्रभाव:-

     फसलों का नष्ट होना, मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का बह जाना।

(iii) आर्थिक प्रभाव:-

     बुनियादी ढाँचे, सड़कें, पुल, घर आदि का भारी नुकसान।

(iv) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     जल प्रदूषण, मृदा अपरदन और जैव विविधता पर विपरीत असर।

बाढ़ प्रबंधन उपाय

⇒ बांध, नहरें और तटबंध निर्माण

⇒ वर्षा जल संचयन और जल निकासी सुधार

⇒ नदी तटों पर निर्माण प्रतिबंध

⇒ सटीक मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली

⇒ पुनर्वास और राहत कार्य

    भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण नीति (National Flood Control Programme) के तहत कई योजनाएँ लागू की हैं, जैसे – गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, ब्रह्मपुत्र बोर्ड आदि।

3. भूकंप (Earthquake)

    भूकंप पृथ्वी की सतह के भीतर स्थित टेक्टोनिक प्लेटों के आपसी घर्षण या टकराव के कारण उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक आपदा है। इसमें धरती की सतह अचानक हिलने लगती है, जिससे इमारतें, पुल, सड़कें और जनजीवन प्रभावित होता है।

भूकंप के प्रकार

(i) टेक्टोनिक भूकंप:-

    पृथ्वी की प्लेटों की गति और टकराव के कारण उत्पन्न होते हैं। ये सबसे सामान्य और शक्तिशाली होते हैं।

(ii) ज्वालामुखीय भूकंप:-

     ज्वालामुखी विस्फोट के साथ उत्पन्न होने वाले भूकंप।

(iii) संवेदनशील भूकंप (Collapse Earthquake):-

    भूमिगत खानों या गुफाओं के धंसने से उत्पन्न।

(iv) कृत्रिम भूकंप:-

     विस्फोट या परमाणु परीक्षणों के कारण होने वाले भूकंप।

भूकंप की तीव्रता का मापन

    भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल और मर्काली स्केल से मापी जाती है। रिक्टर पैमाने पर 2 से कम भूकंप सामान्य होता है जबकि 7 या उससे अधिक तीव्रता वाला भूकंप विनाशकारी होता है।

भूकंप के प्रभाव

    भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जो पृथ्वी की सतह के भीतर ऊर्जा के अचानक विस्फोट के कारण होती है। इसके प्रभाव व्यापक और विनाशकारी होते हैं।

    सबसे पहले, भूकंप से इमारतें, पुल, सड़कें और अन्य संरचनाएँ ढह जाती हैं, जिससे भारी जन-धन की हानि होती है।

    भूकंप के कारण भूमिगत पाइपलाइनें टूट जाती हैं, जिससे गैस और पानी की आपूर्ति बाधित हो जाती है। कई बार आग लगने और विस्फोट जैसी घटनाएँ भी होती हैं।

    भूकंप से पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन (landslide) की समस्या उत्पन्न होती है, जिससे सड़कें और गाँव नष्ट हो जाते हैं। तटीय क्षेत्रों में यह सुनामी (tsunami) का रूप ले सकता है, जो समुद्री लहरों के रूप में तटीय बस्तियों को पूरी तरह डुबो देती है।

    सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी इसके गहरे प्रभाव पड़ते हैं- लोग बेघर हो जाते हैं, रोजगार के साधन नष्ट हो जाते हैं, तथा प्रभावित क्षेत्रों में भय और असुरक्षा का माहौल फैल जाता है।

    इसके अतिरिक्त, भूकंप पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। नदियों का मार्ग बदल सकता है और भूमिगत जल स्रोतों में परिवर्तन आ सकता है। अतः भूकंप न केवल मानव जीवन के लिए बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।

भारत में भूकंप संभावित क्षेत्र

      भारत को पाँच भूकंपीय जोनों में बाँटा गया है-

⇒ जोन V : अत्यधिक संवेदनशील (जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य)

⇒ जोन IV : उच्च संवेदनशील (दिल्ली, बिहार, हिमाचल प्रदेश)

⇒ जोन III : मध्यम (गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश)

⇒ जोन II एवं I : कम संवेदनशील क्षेत्र

भूकंप प्रबंधन

⇒ भूकंप प्रतिरोधी भवन निर्माण

⇒ आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सुरक्षित निकासी मार्ग और राहत केंद्र

⇒ जनजागरूकता अभियान

भारत में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन

    भारत में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act) लागू किया गया। इसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया है।
इसके अतिरिक्त-

⇒ प्रत्येक राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

⇒ जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्यरत हैं।

     इन संस्थाओं का कार्य आपदा पूर्व तैयारी, राहत एवं पुनर्वास कार्यों का संचालन तथा जन-जागरूकता बढ़ाना है।

निष्कर्ष:-

     इस प्रकार प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें पूर्णतः रोका नहीं जा सकता, लेकिन इनके प्रभाव को वैज्ञानिक तकनीक, सुविचारित नीति और जनसहभागिता से अवश्य कम किया जा सकता है। सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही सतत् विकास संभव है।

     जल संरक्षण, वनीकरण, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन शिक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से हम इन आपदाओं के दुष्प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं। अतः आवश्यकता है कि हम “आपदा को आपदा न बनने दें, बल्कि उसे सीख और सुधार का अवसर बनाएँ।”

31. Environmental management and policies (पर्यावरण प्रबंधन और नीतियाँ)

Environmental management and policies

(पर्यावरण प्रबंधन और नीतियाँ)



Environmental management and policies

परिचय  

   वर्तमान समय में पर्यावरणीय असंतुलन विश्व के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को खतरे में डाल दिया है। ऐसे में पर्यावरण प्रबंधन और पर्यावरणीय नीतियाँ वह प्रमुख उपकरण हैं, जिनके माध्यम से हम विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।

पर्यावरण प्रबंधन की अवधारणा

     पर्यावरण प्रबंधन (Environmental Management) का अर्थ है- मानव और पर्यावरण के बीच संतुलित संबंध बनाए रखना, ताकि विकास की प्रक्रिया पर्यावरण को नष्ट न करे, बल्कि उसे सुरक्षित रखते हुए सतत् विकास सुनिश्चित करे। यह एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें नीति-निर्माण, संसाधन प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण, ऊर्जा उपयोग, तथा सामाजिक सहभागिता जैसे तत्व शामिल हैं।

पर्यावरण प्रबंधन के उद्देश्य

        पर्यावरण प्रबंधन के निम्नलिखित उद्देश्य है-

(i) प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और विवेकपूर्ण उपयोग करना।

(ii) प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण करना।

(iii) जैव विविधता का संरक्षण और संवर्धन करना।

(iv) पर्यावरण शिक्षा और जनजागरूकता का प्रचार-प्रसार करना।

(v) सतत् विकास के सिद्धांतों का पालन करना।

(vi) पर्यावरणीय आपदाओं से निपटने की क्षमता विकसित करना।

पर्यावरण प्रबंधन के प्रमुख घटक

     पर्यावरण प्रबंधन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से मानव और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित किया जाता है ताकि विकास और पर्यावरण दोनों का संरक्षण हो सके। इसके प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं-

1. नीतिगत घटक (Policy Component):-

    यह पर्यावरण संरक्षण से संबंधित कानूनों, नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण एवं कार्यान्वयन से जुड़ा होता है, जैसे पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, जल और वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम आदि।

2. संगठनात्मक घटक (Institutional Component):-

    विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं जैसे केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, UNEP, WWF आदि पर्यावरण प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

3. तकनीकी घटक (Technical Component):-

     पर्यावरणीय निगरानी, प्रदूषण नियंत्रण तकनीक, अपशिष्ट प्रबंधन, तथा पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) इसके अंतर्गत आते हैं।

4. सामाजिक एवं शैक्षणिक घटक (Social & Educational Component):-

    जन-जागरूकता, पर्यावरण शिक्षा, और स्थानीय समुदायों की सहभागिता से पर्यावरणीय नीतियों को प्रभावी बनाया जाता है।

5. आर्थिक घटक (Economic Component):-

   हरित अर्थव्यवस्था, सतत विकास, और प्राकृतिक संसाधनों का आर्थिक मूल्यांकन पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करते हैं।

    इन सभी घटकों का समन्वय ही प्रभावी पर्यावरण प्रबंधन की आधारशिला बनाता है, जिससे विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित होता है।

पर्यावरण प्रबंधन के साधन

      पर्यावरण प्रबंधन के साधन वे उपाय हैं जिनके माध्यम से पर्यावरण की गुणवत्ता को संरक्षित, सुधारित और संतुलित किया जाता है। इनका उद्देश्य विकास और पर्यावरण के बीच सामंजस्य स्थापित करना है। पर्यावरण प्रबंधन के प्रमुख साधनों को चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है-

(1) नीतिगत साधन,

(2) विधिक साधन,

(3) आर्थिक साधन, और

(4) शैक्षणिक एवं तकनीकी साधन।

(1) नीतिगत साधन:–

   सरकार द्वारा बनाई गई पर्यावरण नीतियाँ, योजनाएँ और कार्यक्रम जैसे राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, वन नीति आदि।
(2) विधिक साधन:-

     पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986, जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981 आदि कानूनों के माध्यम से पर्यावरणीय अपराधों पर नियंत्रण।
(3) आर्थिक साधन:-

     प्रदूषण कर, हरित कर, अनुदान, प्रोत्साहन, और पर्यावरणीय बीमा जैसी आर्थिक व्यवस्थाएँ, जो उद्योगों को स्वच्छ तकनीक अपनाने हेतु प्रेरित करती हैं।
(4) शैक्षणिक एवं तकनीकी साधन:-

    पर्यावरण शिक्षा, जनजागरूकता, और आधुनिक तकनीकी उपाय जैसे पुनर्चक्रण, नवीकरणीय ऊर्जा, GIS और रिमोट सेंसिंग का उपयोग।

भारत में पर्यावरण प्रबंधन का विकास

      भारत में पर्यावरण संरक्षण की परंपरा प्राचीन काल से रही है। वेदों, उपनिषदों और पुराणों में प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संरक्षण की भावना विद्यमान रही है। स्वतंत्रता के पश्चात औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ीं, जिससे सरकार ने संगठित पर्यावरण प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाए।     

     अर्थात भारत में पर्यावरण प्रबंधन का विकास एक दीर्घकालीन प्रक्रिया रही है, जो पारंपरिक जीवनशैली से आधुनिक नीतियों तक फैली हुई है। प्राचीन भारत में पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का हिस्सा माना जाता था। वन, जल, भूमि और पशुओं के प्रति आदर की भावना वैदिक और पौराणिक ग्रंथों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

    स्वतंत्रता के बाद औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण पर्यावरणीय समस्याएँ बढ़ीं, जिससे वैज्ञानिक और नीतिगत स्तर पर पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता महसूस हुई।

     1972 के स्टॉकहोम सम्मेलन के बाद भारत ने पर्यावरण संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए। 1976 में संविधान में अनुच्छेद 48A और 51A(g) जोड़े गए, जिनमें राज्य और नागरिकों के पर्यावरण संरक्षण के दायित्व का उल्लेख है।

   1986 में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम लागू किया गया, जिसने देश में पर्यावरण नीति का कानूनी आधार प्रदान किया। इसके बाद राष्ट्रीय वन नीति (1988), जैव विविधता अधिनियम (2002) तथा जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (2008) जैसी पहलें की गईं।

    आज भारत सतत विकास और हरित तकनीकों के माध्यम से पर्यावरण प्रबंधन को मजबूत बना रहा है। सरकारी योजनाओं जैसे स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे, और जल जीवन मिशन ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारत की प्रमुख पर्यावरण नीतियाँ

1. राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (National Environment Policy, 2006):-

⇒ सतत् विकास, पर्यावरण संरक्षण और गरीबी उन्मूलन को एकीकृत करने का प्रयास।

⇒ विकास परियोजनाओं में पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) को अनिवार्य किया गया।

⇒ स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर बल।

2. राष्ट्रीय वन नीति (National Forest Policy, 1988):-

⇒ देश के कम से कम 33% भूभाग पर वनावरण बनाए रखने का लक्ष्य।

⇒ सामाजिक वनीकरण एवं संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम।

3. राष्ट्रीय जल नीति (National Water Policy, 2012):-

⇒ जल का समान वितरण, पुनर्चक्रण और पुनःउपयोग को बढ़ावा।

⇒ जल संरक्षण हेतु सामुदायिक भागीदारी।

4. राष्ट्रीय जैव विविधता नीति (National Biodiversity Policy, 2002):-

⇒ पारिस्थितिक संतुलन और जैव विविधता की रक्षा।

⇒ पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा और जैव संसाधनों का सतत् उपयोग।

5. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC, 2008):-

⇒ आठ मिशनों पर आधारित नीति, जैसे सौर मिशन, ऊर्जा दक्षता, जल मिशन आदि।

⇒ कार्बन उत्सर्जन घटाने और नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग पर बल।

भारत में प्रमुख पर्यावरणीय कानून

1. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974

⇒ जल प्रदूषण की रोकथाम हेतु केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की स्थापना।

2. वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981

⇒ वायु गुणवत्ता मानकों का निर्धारण एवं प्रदूषकों के उत्सर्जन पर नियंत्रण।

3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

⇒ यह अधिनियम सभी पर्यावरणीय समस्याओं के लिए “छत्र कानून” के रूप में कार्य करता है।

⇒ सरकार को पर्यावरणीय मानक निर्धारित करने और दंड लगाने की शक्ति देता है।

4. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972

⇒ वन्यजीवों और उनके आवासों की सुरक्षा।

⇒ संरक्षित क्षेत्र जैसे राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, बायोस्फीयर रिजर्व की स्थापना।

5. वन संरक्षण अधिनियम, 1980

⇒ वनों की कटाई पर नियंत्रण और वन भूमि के उपयोग में बदलाव पर रोक।

6. जैव विविधता अधिनियम, 2002

⇒ स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की रक्षा और जैव संसाधनों के उपयोग का नियमन।

अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण नीतियाँ और भारत की भूमिका

    भारत वैश्विक पर्यावरणीय प्रयासों में सक्रिय भागीदार रहा है।

1. स्टॉकहोम सम्मेलन (1972):- भारत ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की।

2. रियो अर्थ समिट (1992):- सतत् विकास की अवधारणा को भारत ने नीति में शामिल किया।

3. क्योटो प्रोटोकॉल (1997):- भारत ने ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने के लिए स्वैच्छिक पहल की।

4. पेरिस समझौता (2015):- भारत ने 2030 तक 40% बिजली उत्पादन को नवीकरणीय ऊर्जा से करने का संकल्प लिया।

पर्यावरणीय संस्थान और संगठन

(i) पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC)

(ii) केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB)

(iii) राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs)

(iv) नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT)- पर्यावरण से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए।

(v) TERI, NEERI, WWF-India, और CSE जैसे गैर-सरकारी संस्थान भी सक्रिय हैं।

पर्यावरण प्रबंधन की चुनौतियाँ

⇒ तीव्र औद्योगिकीकरण और नगरीकरण।

⇒ जनसंख्या वृद्धि और संसाधनों का अति-दोहन।

⇒ पर्यावरणीय शिक्षा और जागरूकता का अभाव।

⇒ नीति क्रियान्वयन में प्रशासनिक ढिलाई।

⇒ तकनीकी और वित्तीय संसाधनों की कमी।

नवीन पहलें

⇒ स्वच्छ भारत अभियान

⇒ नमामि गंगे परियोजना

⇒ राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP)

⇒ अमृत योजना और स्मार्ट सिटी मिशन

⇒ हरित भारत मिशन और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA)

जनसहभागिता और पर्यावरण प्रबंधन

     पर्यावरणीय नीतियों की सफलता नागरिकों की भागीदारी पर निर्भर करती है।गाँवों में जल, वन, भूमि प्रबंधन समितियाँ; शहरों में कचरा प्रबंधन, वृक्षारोपण, जल संरक्षण आंदोलन। ये सब जनसहभागिता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

निष्कर्ष

      पर्यावरण प्रबंधन और नीतियाँ केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि यह मानव अस्तित्व और जीवन गुणवत्ता की रक्षा का आधार हैं। यदि विकास पर्यावरण के विरुद्ध होगा, तो वह अंततः मानवता के विरुद्ध होगा। अतः आवश्यक है कि हम “विकास और पर्यावरण संरक्षण” के बीच सामंजस्य बनाकर सतत् विकास की दिशा में आगे बढ़ें।

     पर्यावरण संरक्षण केवल कानूनों या योजनाओं से नहीं, बल्कि नागरिक चेतना और सामूहिक प्रयास से संभव है। तभी पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध रह सकेगी।

30. Bio-diversity: Hot Spots (जैव विविधता हॉटस्पॉट्स)

Bio-diversity: Hot Spots

(जैव विविधता हॉटस्पॉट्स)



परिचय

   जैव विविधता हॉटस्पॉट्स वे क्षेत्र हैं जहाँ जीव-जंतुओं और पादपों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है, परंतु ये क्षेत्र मानवीय क्रियाकलापों के कारण गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

    इस अवधारणा को सर्वप्रथम 1988 में नॉर्मन मायर्स (Norman Myers) ने प्रस्तुत किया था। किसी क्षेत्र को जैव विविधता हॉटस्पॉट कहलाने के लिए दो प्रमुख शर्तें होती हैं—पहली, वहाँ कम से कम 1,500 स्थानिक (endemic) प्रजातियाँ होनी चाहिए, और दूसरी, उस क्षेत्र की कम से कम 70% प्राकृतिक वनस्पति नष्ट हो चुकी होनी चाहिए।

    विश्व में वर्तमान में लगभग 36 जैव विविधता हॉटस्पॉट्स मान्यता प्राप्त हैं, जिनमें भारत के चार प्रमुख हॉटस्पॉट शामिल हैं—हिमालय, पश्चिमी घाट, भारत-बर्मा क्षेत्र और सुंडलैंड। भारत के ये क्षेत्र अनेक स्थानिक और विलुप्तप्राय प्रजातियों जैसे एशियाई शेर, नीलगिरी तहर, लाल पांडा आदि के निवास स्थल हैं।

   जैव विविधता हॉटस्पॉट्स न केवल पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं बल्कि औषधीय पौधों, जलवायु नियंत्रण और जल स्रोत संरक्षण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन क्षेत्रों का संरक्षण सतत् विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए अत्यावश्यक है।

      भारत में चार प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट्स हैं:-

1. हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट

     हिमालय क्षेत्र में भारत, नेपाल, भूटान, पाकिस्तान और तिब्बत के हिस्से शामिल हैं। यह क्षेत्र लगभग 7,50,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां लगभग 10,000 वनस्पति प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 3,160 प्रजातियाँ स्थानिक हैं।

   इसके अलावा, 300 स्तनधारी प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं। यहां के प्रमुख जीवों में हिमालयी ताहर, सुनहरा लंगूर, हुलोक गिब्बन, उड़न गिलहरी, हिम तेंदुआ, गांगेय डॉल्फिन आदि शामिल हैं।

2. पश्चिमी घाट जैव विविधता हॉटस्पॉट

     पश्चिमी घाट, जिसे सह्याद्रि भी कहा जाता है, भारत के पश्चिमी तट पर स्थित है। यह क्षेत्र लगभग 1,60,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यहां 5,916 वनस्पति प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 50 प्रतिशत स्थानिक हैं। स्तनधारी जीवों की 140 प्रजातियां यहां पाई जाती हैं, जिनमें से 18 स्थानिक हैं।

    पक्षियों की 458 प्रजातियां, उभयचरों की 178 प्रजातियां और मछलियों की 191 प्रजातियां भी यहां पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले प्रमुख जीवों में एशियाई हाथी, मैकाक बंदर, काले भालू, तेंदुआ, किंग कोबरा, भारतीय सागौन, काजू, इलायची, काली मिर्च आदि शामिल हैं।

3. भारत-बर्मा जैव विविधता हॉटस्पॉट

      यह क्षेत्र भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और म्यांमार के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। यहां मिश्रित आर्द्र सदाबहार, शुष्क सदाबहार, पतझड़ी और पर्वतीय वन पाए जाते हैं।

     इस क्षेत्र में 433 स्तनधारी प्रजातियां, 1,266 मछली प्रजातियां, 1,500 से अधिक पक्षी प्रजातियां, 1,000 से अधिक उभयचर प्रजातियां, 3,000 से अधिक कीट प्रजातियां और 1,000 से अधिक पौधों की प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां के प्रमुख जीवों में एशियाई हाथी, बाघ, तेंदुआ, काले भालू, गैंडा, काजू, इलायची, काली मिर्च आदि शामिल हैं।

4. सुंडलैंड जैव विविधता हॉटस्पॉट

     यह क्षेत्र भारत के अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। यहां उष्णकटिबंधीय वर्षावन, मैंग्रोव वन, समुद्री घास के मैदान और प्रवाल भित्तियां पाई जाती हैं।

      इस क्षेत्र में 1,500 से अधिक पौधों की प्रजातियां, 1,000 से अधिक कीट प्रजातियां, 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां, 100 से अधिक स्तनधारी प्रजातियां और 50 से अधिक उभयचर प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां के प्रमुख जीवों में अंडमान डॉल्फिन, निकोबार पिग, अंडमान ट्री फॉग, निकोबार किंगफिशर आदि शामिल हैं।

जैव विविधता हॉटस्पॉट्स के संरक्षण की आवश्यकता

      इन हॉटस्पॉट्स के संरक्षण के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

(i) संरक्षित क्षेत्र स्थापित करना:-

    राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभयारण्यों और बायोस्फीयर रिजर्व्स की स्थापना करके इन क्षेत्रों की जैव विविधता की रक्षा की जा सकती है।

(ii) स्थानीय समुदायों की भागीदारी:-

     स्थानीय समुदायों को जैव विविधता संरक्षण में शामिल करके उनके पारंपरिक ज्ञान और संसाधनों का उपयोग किया जा सकता है।

(iii) शिक्षा और जागरूकता:-

   लोगों में जैव विविधता के महत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाकर संरक्षण प्रयासों को सफल बनाया जा सकता है।

(iv) वैज्ञानिक अनुसंधान:- 

   वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से इन क्षेत्रों की जैव विविधता, पारिस्थितिकी और संरक्षण के उपायों का अध्ययन किया जा सकता है।

(v) नीति और योजना:- 

   सरकारों द्वारा जैव विविधता संरक्षण के लिए नीतियां और योजनाएं बनाकर उनका प्रभावी क्रियान्वयन किया जा सकता है।

निष्कर्ष

   भारत के जैव विविधता हॉटस्पॉट्स न केवल जैविक विविधता से समृद्ध हैं, बल्कि ये पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता और मानव सभ्यता के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका संरक्षण हमारे पर्यावरणीय संतुलन और जीवन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है। इसलिए, इन क्षेत्रों के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।

29. Environmental Degradation (पर्यावरणीय क्षरण)

Environmental Degradation

(पर्यावरणीय क्षरण)



Environmental Degradation

परिचय

    मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही मनुष्य और पर्यावरण के बीच गहरा संबंध रहा है। मनुष्य ने अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति से संसाधन लिए और बदले में उसे प्रभावित भी किया। आरंभिक काल में यह प्रभाव सीमित था, परंतु औद्योगिक क्रांति, तकनीकी विकास, जनसंख्या वृद्धि और नगरीकरण ने इस संतुलन को बिगाड़ दिया। परिणामस्वरूप आज विश्व एक गंभीर पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है जिसे “पर्यावरणीय क्षरण (Environmental Degradation)” कहा जाता है।

पर्यावरणीय क्षरण की परिभाषा

      पर्यावरणीय क्षरण का अर्थ है- प्राकृतिक पर्यावरण की गुणवत्ता में वह गिरावट जो मानवीय या प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होती है, जिससे वायु, जल, भूमि, वन, जैव विविधता, और पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता प्रभावित होती है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार-

       “पर्यावरणीय क्षरण वह प्रक्रिया है जिसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के संसाधनों जैसे कि जल, मृदा, वायु, वन, खनिज और जैव विविधता की गुणवत्ता और मात्रा में ह्रास होता है।”

पर्यावरणीय क्षरण के प्रमुख कारण

1. जनसंख्या वृद्धि:-

   तीव्र जनसंख्या वृद्धि के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा है। भोजन, आवास और ईंधन की बढ़ती मांग ने भूमि उपयोग में असंतुलन उत्पन्न किया है। इससे वनों की कटाई, जल प्रदूषण और भूमि क्षरण जैसी समस्याएँ बढ़ी हैं।

2. औद्योगिकीकरण (Industrialization):-

   औद्योगिक गतिविधियों से बड़ी मात्रा में प्रदूषक गैसें (जैसे CO₂, SO₂, NO₂) उत्सर्जित होती हैं। औद्योगिक अपशिष्ट जल और ठोस कचरा नदियों और मिट्टी को प्रदूषित करते हैं। इससे पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

3. नगरीकरण (Urbanization):-

      शहरीकरण की तेज प्रक्रिया ने भूमि, जल और ऊर्जा संसाधनों का अत्यधिक दोहन किया है। कंक्रीट के जंगलों ने हरित क्षेत्रों को नष्ट किया और वायु गुणवत्ता में गिरावट आई है। महानगरों में ठोस अपशिष्ट और वाहनों के उत्सर्जन ने पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ दिया है।

4. वनों की कटाई (Deforestation):-

     वन कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। लेकिन खेती, चराई, खनन, और निर्माण के लिए वनों की अंधाधुंध कटाई से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ी है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग तेजी से बढ़ रही है।

5. कृषि का तीव्रीकरण (Intensive Agriculture):-

     रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंथेटिक पदार्थों का अत्यधिक प्रयोग मृदा और जल को विषैला बना रहा है। इससे मृदा की उर्वरता में कमी, भूजल प्रदूषण और जैव विविधता का क्षरण हुआ है।

6. खनन गतिविधियाँ (Mining Activities):-

    खनन से भूमि का कटाव, जलस्रोतों का प्रदूषण और वनों का विनाश होता है। कोयला, बॉक्साइट, और लौह अयस्क जैसे खनिजों के अत्यधिक दोहन ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

7. ऊर्जा उपभोग और जीवाश्म ईंधन:-

     कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों को बढ़ा रहा है। इससे जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या तीव्र हो गई है।

8. जल संसाधनों का दुरुपयोग:-

     अतिरिक्त भूजल दोहन, प्रदूषित अपशिष्ट जल, और औद्योगिक निस्तारण के कारण जल स्रोत दूषित हो रहे हैं। कई नदियाँ मृतप्राय हो चुकी हैं, जैसे- यमुना और गंगा के प्रदूषण स्तर में अत्यधिक वृद्धि।

पर्यावरणीय क्षरण के प्रकार

1. वायु प्रदूषण (Air Pollution):-

         औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन धुएं और धूल कणों के कारण।

2. जल प्रदूषण (Water Pollution):-

        रासायनिक अपशिष्ट, सीवेज और प्लास्टिक से।

3. मृदा क्षरण (Soil Degradation):-

      रासायनिक उर्वरक, कटाव और जलभराव के कारण।

4. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution):-

      यातायात, उद्योगों और लाउडस्पीकर से उत्पन्न।

5. थर्मल और रेडियोएक्टिव प्रदूषण:-

      औद्योगिक संयंत्रों और परमाणु कचरे से।

6. जैव विविधता का क्षरण (Loss of Biodiversity):-

      प्राकृतिक आवासों के विनाश के कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।

पर्यावरणीय क्षरण के प्रभाव

(i) मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव:-

    वायु और जल प्रदूषण के कारण अस्थमा, कैंसर, त्वचा रोग, हृदय रोग जैसी बीमारियाँ बढ़ी हैं। WHO के अनुसार हर वर्ष लगभग 70 लाख लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती है।

(ii) जलवायु परिवर्तन (Climate Change):-

      ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि से पृथ्वी का औसत तापमान बढ़ रहा है। परिणामस्वरूप ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समुद्र स्तर बढ़ रहा है और चरम मौसमीय घटनाएँ (जैसे बाढ़, सूखा, चक्रवात) बढ़ रही हैं।

(iii) भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण:-

    अधिक चराई, वनों की कटाई और जल का अत्यधिक दोहन भूमि की उत्पादकता घटाता है। यह मरुस्थलीकरण को जन्म देता है, जिससे खाद्य असुरक्षा की समस्या उत्पन्न होती है।

(iv) जैव विविधता में ह्रास:-

     वन्यजीवों के आवास नष्ट होने से कई प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। यह पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता को प्रभावित करता है।

(v) आर्थिक हानि:-

   पर्यावरणीय क्षरण से कृषि उत्पादन, मत्स्य पालन, जल स्रोत, और उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इससे राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ पड़ता है।

(vi) सामाजिक असमानता और विस्थापन:-

     पर्यावरणीय क्षरण के कारण गरीब और ग्रामीण समुदाय सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। जल और भूमि की कमी से “पर्यावरणीय शरणार्थी” (Environmental Refugees) की संख्या बढ़ रही है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर्यावरणीय क्षरण

         वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर्यावरणीय क्षरण आज मानव सभ्यता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, जनसंख्या वृद्धि और अत्यधिक संसाधन दोहन के कारण पृथ्वी का पर्यावरण असंतुलित होता जा रहा है।

     वनों की कटाई, भूमि क्षरण, जल एवं वायु प्रदूषण, जैव विविधता की हानि और ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकट विश्व स्तर पर चिंता का विषय बन चुके हैं। विकसित देशों में अत्यधिक औद्योगिक गतिविधियाँ और विकासशील देशों में अनियोजित शहरीकरण इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।

    जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप तापमान में वृद्धि, हिमनदों का पिघलना, समुद्र-स्तर में बढ़ोतरी तथा अनियमित वर्षा जैसी घटनाएँ मानव जीवन को सीधे प्रभावित कर रही हैं। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में पर्यावरणीय क्षरण के कुछ उदाहरण निम्नलिखित है- 

⇒ अमेजन वर्षावन की कटाई विश्व के 20% ऑक्सीजन स्रोत को खतरे में डाल रही है।

⇒ सहारा मरुस्थल का विस्तार अफ्रीका की कृषि भूमि को नष्ट कर रहा है।

⇒ आर्कटिक बर्फ के पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ रहा है।

⇒ भारत और चीन में वायु प्रदूषण के स्तर विश्व में सबसे ऊँचे हैं।

⇒ गंगा-यमुना जैसी नदियाँ धार्मिक महत्व के बावजूद अत्यधिक प्रदूषित हैं।

भारत में पर्यावरणीय क्षरण की स्थिति

      भारत में तीव्र जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और औद्योगीकरण ने पर्यावरणीय संकट को गहरा किया है।

⇒ वायु प्रदूषण: दिल्ली, कानपुर, पटना, और लखनऊ जैसे शहर विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में हैं।

⇒ जल प्रदूषण: गंगा, यमुना, साबरमती जैसी नदियाँ औद्योगिक अपशिष्ट से प्रभावित हैं।

⇒ वनों की कटाई: बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड में वनों का क्षरण तेजी से हो रहा है।

⇒ भूमि क्षरण: भारत की लगभग 30% भूमि किसी न किसी रूप में क्षतिग्रस्त है।

पर्यावरण संरक्षण हेतु उपाय

1. वन संरक्षण और वृक्षारोपण:-

      वनों की कटाई पर नियंत्रण और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण से कार्बन स्तर कम किया जा सकता है।

2. स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग:-

      सौर, पवन, जल और जैव ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग जीवाश्म ईंधनों के विकल्प के रूप में किया जाना चाहिए।

3. अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management):-

        रीसाइक्लिंग, पुनः उपयोग और ठोस कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण आवश्यक है।

4. औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण:-

     उद्योगों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण जैसे स्क्रबर और फिल्टर लगाना अनिवार्य होना चाहिए।

5. पर्यावरण शिक्षा:-

     विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा अनिवार्य करने से जन-जागरूकता बढ़ेगी।

6. कानूनी प्रावधान:-

    भारत में पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986, जल अधिनियम 1974, वायु अधिनियम 1981 जैसे कानून लागू हैं। इनका कठोर पालन आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय पहल

(i) स्टॉकहोम सम्मेलन (1972):-

      स्टॉकहोम सम्मेलन (1972) पर्यावरण संरक्षण हेतु पहली अंतरराष्ट्रीय पहल थी। इसमें 113 देशों ने भाग लिया और “एक पृथ्वी” के सिद्धांत को अपनाया गया। इस सम्मेलन ने संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की स्थापना की, जिससे वैश्विक स्तर पर पर्यावरणीय नीतियों और संरक्षण प्रयासों की नींव पड़ी।

(ii) रियो अर्थ समिट (1992):-

      1992 में ब्राज़ील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित रियो अर्थ समिट पर्यावरणीय क्षरण रोकने की एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय पहल थी। इसमें सतत विकास, जैव विविधता संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और वन प्रबंधन पर वैश्विक समझौते हुए, जिससे पर्यावरण संरक्षण के लिए विश्वव्यापी सहयोग की दिशा तय हुई।

(iii) क्योटो प्रोटोकॉल (1997):-

      क्योटो प्रोटोकॉल (1997) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना है। यह विकसित देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी दायित्व लगाता है ताकि वैश्विक तापवृद्धि और पर्यावरणीय क्षरण को कम किया जा सके। यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा समझौते (UNFCCC) का भाग है।

(iv) पेरिस समझौता (2015):-

    पर्यावरणीय क्षरण को रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेरिस समझौता (2015) और क्योटो प्रोटोकॉल (1997) महत्वपूर्ण पहल हैं। क्योटो प्रोटोकॉल ने विकसित देशों पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटाने की बाध्यता डाली, जबकि पेरिस समझौते ने सभी देशों को जलवायु परिवर्तन नियंत्रण हेतु साझा जिम्मेदारी निभाने पर बल दिया।

    इन सभी प्रयासों का उद्देश्य पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखना और सतत विकास को प्रोत्साहित करना है। हालांकि चुनौतियाँ अब भी बनी हुई हैं, परंतु अंतरराष्ट्रीय सहयोग से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में निरंतर प्रगति हो रही है।

निष्कर्ष

       इस प्रकार कहा जा सकता है कि पर्यावरणीय क्षरण आज मानव अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। यह केवल पारिस्थितिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक, आर्थिक और नैतिक संकट भी है।

      यदि तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाली पीढ़ियों को जल, वायु और भूमि जैसी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करना पड़ेगा।अतः आवश्यक है कि मानव विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

संरक्षण ही समाधान है– “Save Environment, Save Life.”

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