Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents (महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents

(महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 4 Distribution of Oceans

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?

(क) अल्फ्रेड वेगनर

(ख) अब्राहम आरटेलियस

(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी

(घ) एमंड हैस

उत्तर- (ख) अब्राहम आरटेलियस

व्याख्या:

    अब्राहम आरटेलियस (Abraham Ortelius) ने सन् 1596 में सर्वप्रथम यह विचार प्रस्तुत किया कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे, परंतु बाद में वे अलग हो गए।

    यह विचार आगे चलकर अल्फ्रेड वेगनर (1912) के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का आधार बना।

(ii) पोलर फ्लिंग बल (Polar fleeing force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?

(क) पृथ्वी का परिक्रमण

(ख) पृथ्वा का घूर्णन

(ग) गुरुत्वाकर्षण

(घ) ज्वारीय बल

उत्तर (ख) पृथ्वा का घूर्णन

व्याख्या:

    पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force) या अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force) पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) से उत्पन्न होता है।

    जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तो इसके कारण भूमध्य रेखा (Equator) पर वस्तुओं को बाहर की ओर धकेलने वाली एक काल्पनिक बल उत्पन्न होती है। इस बल का प्रभाव ध्रुवों पर न्यूनतम और भूमध्य रेखा पर अधिकतम होता है। इसी कारण पृथ्वी का आकार थोड़ा चपटा (Oblate Spheroid) है।

(iii) इनमें से कौन सी लघु (Minor) प्लेट नहीं है?

(क) नाजका

(ख) फिलिप्पिन

(ग) अरब

(घ) अंटार्कटिक

उत्तर- (घ) अंटार्कटिक

व्याख्या:

     पृथ्वी की प्लेटों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है-

1. मुख्य (Major) प्लेटें

2. लघु (Minor) प्लेटें

मुख्य प्लेटें हैं-

→ प्रशांत (Pacific)

→ उत्तर अमेरिकी (North American)

→ दक्षिण अमेरिकी (South American)

→ अफ्रीकी (African)

→ यूरेशियन (Eurasian)

→ अंटार्कटिक (Antarctic)

→ इंडो-ऑस्ट्रेलियाई (Indo-Australian)

लघु प्लेटें हैं —

→ नाजका (Nazca)

→ अरब (Arabian)

→ फिलिप्पिन (Philippine)

→ कोकोस (Cocos) आदि

     इसलिए अंटार्कटिक प्लेट लघु नहीं बल्कि मुख्य प्लेट है।

(iv) सागरीय तल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न से किस अवधारणा को नहीं विचारा?

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना।

(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु।

उत्तर- (ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

व्याख्या:

    हेस (Harry H. Hess) ने सागरीय तल विस्तार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory) में यह बताया कि महासागरीय मध्य कटकों (Mid-Oceanic Ridges) से नए बेसाल्टिक पदार्थ निकलते हैं, जिससे समुद्री तल दोनों ओर फैलता है।

   उन्होंने अपने सिद्धांत में निम्न अवधारणाओं पर विचार किया था-

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियाँ

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु में भिन्नता

    लेकिन विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण का विचार अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) से संबंधित है, न कि हेस के सिद्धांत से।

(v) हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?

(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण

(ख) अपसारी सीमा

(ग) रूपांतर सीमा

(घ) महाद्वीपीय अभिसरण

उत्तर (घ) महाद्वीपीय अभिसरण

व्याख्या:

   हिमालय पर्वतों का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव (अभिसरण) से हुआ है। दोनों ही महाद्वीपीय प्लेटें हैं।

    जब भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो इस टक्कर से पृथ्वी की परतें मुड़कर ऊपर उठीं और हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। इसलिए यह एक महाद्वीपीय-अभिसरण (Continental Convergent) सीमा का उदाहरण है।

(vi) महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?

(क) वेगनर

(ख) बेकन

(ग) टेलर

(घ) हेनरी हेस

उत्तर- (क) वेगनर

व्याख्या:

      महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत (Continental Drift Theory) अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने सन् 1912 में प्रस्तुत किया था।

    उन्होंने यह विचार दिया कि सभी महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे और एक महाद्वीप पैंजिया (Pangaea) के रूप में अस्तित्व में था, जो बाद में टूटकर वर्तमान महाद्वीपों में विभाजित हो गया।

(vii) निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?

(क) हिन्द महासागर

(ख) आर्कटिक महासागर

(ग) अटलांटिक महासागर

(घ) प्रशांत महासागर

उत्तर- (ख) आर्कटिक महासागर

व्याख्या:

    आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) पृथ्वी का सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर है। यह उत्तरी ध्रुव के चारों ओर स्थित है और अधिकांश भाग वर्षभर बर्फ से ढका रहता है।

(viii) निम्नलिखित में से कौन-सा पटल विरूपण से संबंधित नहीं है?

(क) पर्वत बल

(ख) प्लेट विवर्तनिक

(ग) महादेश जनक बल।

(घ) संतुलन

उत्तर- (घ) संतुलन।

व्याख्या:

     पटल विरूपण (Crustal deformation) से तात्पर्य पृथ्वी की भूपर्पटी में होने वाले मोड़, भ्रंश, उत्थान आदि परिवर्तनों से है, जो मुख्यतः अंतर्जात बलों जैसे- पर्वत निर्माण बल (ओरोजेनी), प्लेट विवर्तनिकी आदि के कारण होते हैं।

    जबकि “संतुलन” (Isostasy) पृथ्वी के पर्पटीय द्रव्यमान के संतुलित स्थिति से संबंधित है, न कि विरूपण से।

(ix) समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब कितना होता है?

(क) 1031.25 मिलीबार

(ख) 1013.25 मिलीबार

(ग) 1013.52 मिलीबार

(घ) 1031.52 मिलीबार

उत्तर- (ख) 1013.25 मिलीबार

व्याख्या:

   समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब को मानक वायुमंडलीय दाब (Standard Atmospheric Pressure) कहा जाता है, जिसका मान 1013.25 मिलीबार (या 1 वायुमंडल, 760 mm Hg) माना जाता है।

(x) लवणता को प्रति, समुद्र तल में घुले हुए नमक (ग्राम) को मात्रा से व्यक्त किया जाता है

(क) 10 ग्राम

(ख) 100 ग्राम

(ग) 1000 ग्राम

(घ) 10,000 ग्राम

उत्तर- (ग) 1000 ग्राम

व्याख्या:

      समुद्र जल की लवणता (Salinity) को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है-

       “1000 ग्राम (अर्थात् 1 किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा (ग्राम में)”।

    उदाहरण: औसत लवणता ≈ 35‰ (प्रति हजार) होती है, अर्थात् 1000 ग्राम समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम नमक घुला होता है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिखित में से किन बलों का उल्लेख किया?

उत्तर- वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए दो बलों का उल्लेख किया- ज्वारीय बल (Tidal Force) और पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force), जो पृथ्वी के घूर्णन व चंद्रमा के आकर्षण से उत्पन्न होते हैं।

(ii) मैंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?

उत्तर- मैंटल में संवहन धाराओं (Convection Currents) के आरम्भ होने और बने रहने के मुख्य कारण हैं-

1. पृथ्वी के अन्दर ऊष्मा का असमान वितरण:-

     पृथ्वी के भीतरी भाग (कोर) में अत्यधिक ताप होता है, जबकि ऊपर के भाग अपेक्षाकृत ठंडे होते हैं।

2. गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव:-

     गर्म, हल्का पदार्थ ऊपर उठता है और ठंडा, भारी पदार्थ नीचे की ओर जाता है।

3. रेडियोधर्मी तत्त्वों का अपक्षय:-

    यूरेनियम, थोरियम आदि तत्त्वों के अपघटन से निरंतर ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो संवहन को बनाए रखती है।

    परिणामस्वरूप, यह ऊष्मा प्रवाह मैंटल में निरंतर ऊपर-नीचे की गति पैदा करता है, जिसे संवहन धाराएँ कहते हैं।

(iii) प्लेट की रूपांतर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमान्त में मुख्य अन्तर क्या है?

उत्तर- रूपांतर सीमा में प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर सरकती हैं, अभिसरण सीमा में प्लेटें टकराती हैं, जबकि अपसारी सीमा में प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं।

(iv) दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?

उत्तर- दक्कन ट्रैप के निर्माण के समय भारतीय स्थलखण्ड गोंडवाना भूभाग का हिस्सा था और भूमध्यरेखीय क्षेत्र के दक्षिण में स्थित था। लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व, जब भारत अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ रहा था, तब इस क्षेत्र में तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियाँ हुईं।

   इन्हीं विस्फोटों से विशाल मात्रा में बेसाल्ट लावा निकला, जिसने परत-दर-परत फैलकर दक्कन ट्रैप का निर्माण किया। उस समय भारतीय प्लेट तेजी से यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही थी, जिससे इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिये गये प्रमाणों का वर्णन करें?

उत्तर-  अल्फ्रेड वेगनर ने सन् 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, आज के सभी महाद्वीप एक समय में “पैंजिया” नामक एक महाद्वीप के भाग थे, जो बाद में टूटकर वर्तमान स्थिति में आ गए।

         इस सिद्धांत के समर्थन में वेगनर ने कई वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किए-

1. भौगोलिक प्रमाण:-

      अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के तटरेखाएँ पज़ल के टुकड़ों की तरह एक-दूसरे से मिलती हैं, जिससे पता चलता है कि ये कभी जुड़े हुए थे।

2. जीवाश्म प्रमाण:-

     विभिन्न महाद्वीपों जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत और ऑस्ट्रेलिया में एक ही प्रकार के जीवाश्म (जैसे ग्लॉसोप्टेरिस पौधा और मेसोसॉरस जन्तु) पाए गए, जो यह दर्शाते हैं कि ये स्थलखंड पहले जुड़े हुए थे।

3. भूगर्भिक संरचना:-

     एक जैसे पर्वत शृंखलाएँ और चट्टानों की बनावट अलग-अलग महाद्वीपों पर पाई जाती हैं, जैसे उत्तरी अमेरिका और यूरोप की अपलाचियन तथा कैलिडोनियन पर्वतमालाएँ।

4. जलवायु प्रमाण:-

     आज ठंडे क्षेत्रों में कोयले की परतें और गर्म क्षेत्रों में हिमनदीय अवशेष मिलते हैं, जो पूर्व की जलवायु में परिवर्तन का संकेत देते हैं।

     इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि महाद्वीप वास्तव में अतीत में एक साथ जुड़े थे और धीरे-धीरे अलग हुए।

(ii) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त में मूलभूत अंतर बताइए।

उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का प्रतिपादन 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने किया था।

    इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक समय “पैंजिया” नामक एक ही भूखंड का भाग थे, जो लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले टूटकर विभिन्न दिशाओं में खिसक गए और वर्तमान स्थिति में आ गए। वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए “ज्वारीय बल” और “पोलर फ्लिंग बल” को कारण बताया।

    यद्यपि उनके सिद्धांत ने महाद्वीपों के समान तट रेखाओं, जीवाश्मों और शैल संरचनाओं में समानता का उल्लेख किया, परंतु इसमें महाद्वीपों के विस्थापन के वास्तविक बलों की वैज्ञानिक व्याख्या का अभाव था, इसलिए इसे पूर्णतः स्वीकार नहीं किया गया।

     दूसरी ओर, प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत (Plate Tectonic Theory) 1960 के दशक में विकसित हुआ, जो सागरीय तल विस्तार (Seafloor Spreading) और महाद्वीपीय विस्थापन दोनों को समाहित करता है। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का बाहरी कठोर भाग कई बड़ी और छोटी लिथोस्फेरिक प्लेटों में विभाजित है, जो पृथ्वी की दुर्बल मंडल (Asthenosphere) पर तैरती हैं। इन प्लेटों की गति के कारण ही पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी और महासागरीय गर्त जैसी भौगोलिक घटनाएँ होती हैं।

      इस प्रकार, मुख्य अंतर यह है कि वेगनर का सिद्धांत केवल महाद्वीपों की गति तक सीमित था, जबकि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत सम्पूर्ण पृथ्वी की प्लेटों की गति और उनसे जुड़ी भौगोलिक प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक व्याख्या करता है।

(iii) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरान्त की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?

उत्तर- अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory) के उपरांत 20वीं शताब्दी के मध्य में वैज्ञानिकों ने कई महत्वपूर्ण खोजें कीं, जिनसे महासागर के वितरण और संरचना के अध्ययन में पुनः गहरी रुचि उत्पन्न हुई।

      इनमें सबसे प्रमुख खोज थी “सागरीय तल प्रसार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory)”, जिसे 1960 के दशक में हैरी हेस (Harry Hess) ने प्रस्तुत किया।

   इस सिद्धांत के अनुसार, महासागरों के मध्य में स्थित मध्य-महासागरीय पर्वतमालाओं (Mid-Oceanic Ridges) से नये भू-पटल का निर्माण होता है, और यह धीरे-धीरे दोनों ओर फैलता जाता है।

     इसके समर्थन में चुंबकीय अनियमितताओं (Magnetic anomalies), समुद्री तल की आयु, तथा गहराई के सर्वेक्षणों से प्राप्त प्रमाण मिले। यह भी पाया गया कि महासागरों का तल अपेक्षाकृत नया है और इसका निरंतर पुनर्निर्माण होता रहता है। इस खोज से यह स्पष्ट हुआ कि महाद्वीप वास्तव में गतिशील हैं और पृथ्वी की सतह प्लेटों में विभाजित है जो आपस में गतिमान हैं।

   इस प्रकार, सागरीय तल प्रसार सिद्धांत तथा प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) के विकास ने वेगनर के विचारों को वैज्ञानिक आधार दिया और पृथ्वी के महाद्वीपों व महासागरों के वितरण, गति तथा उनके विकास को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth (पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth

(पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 The Origin and Evolution

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?

(क) 46 लाख वर्ष

(ख) 4600 मिलियन वर्ष

(ग) 13.7 अरब वर्ष

(घ) 13.7 खरब वर्ष

उत्तर- (ख) 4600 मिलियन वर्ष

व्याख्या:

    वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष (यानी 4600 मिलियन वर्ष) मानी जाती है। यह अनुमान रेडियोधर्मी तत्वों जैसे यूरेनियम और सीसा के विश्लेषण द्वारा लगाया गया है।

(ii) निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है

(क) इओन (Eons)

(ख) कल्प (Period)

(ग) महाकल्प (Era)

(घ) युग (Epoch)

उत्तर- (क) इओन (Eons)

व्याख्या:

    भूवैज्ञानिक समय को विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया है-

1. इओन (Eon) – सबसे बड़ी और सबसे लंबी समय इकाई।

2. महाकल्प (Era) – इओन का उपविभाग।

3. कल्प (Period) – महाकल्प का उपविभाग।

4. युग (Epoch) – कल्प का उपविभाग।

अतः क्रम होगा: Eon > Era > Period > Epoch

       इसलिए सबसे लंबी अवधि इओन (Eon) होती है।

(iii) निम्न में कौन सा-तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?

(क) सौर पवन

(ख) गैस उत्सर्जन

(ग) विभेदन

(घ) प्रकाश संश्लेषण

उत्तर- (ग) विभेदन 

व्याख्या:

  सौर पवन, गैस उत्सर्जन, और प्रकाश संश्लेषण ये तीनों तत्त्व पृथ्वी के वायुमण्डल के निर्माण और संशोधन में योगदान देते हैं।

सौर पवन ने प्रारम्भिक वायुमण्डल की गैसों को प्रभावित किया।

गैस उत्सर्जन (Volcanic emission) ने नए गैसों को वायुमण्डल में जोड़ा।

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) ने ऑक्सीजन बढ़ाकर वायुमण्डल की संरचना बदली।

जबकि विभेदन (Differentiation) पृथ्वी के आन्तरिक भागों के अलग-अलग स्तरों (कोर, मेंटल, क्रस्ट) में विभाजन से सम्बन्धित है, न कि सीधे वायुमण्डल के निर्माण या संशोधन से।

(iv) निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन से हैं

(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।

(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।

उत्तर- (ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

व्याख्या:

    भीतरी ग्रह (Inner Planets) वे हैं जो सूर्य और क्षुद्र ग्रहों की पट्टी (Asteroid Belt) के बीच स्थित हैं।

   इनमें चार ग्रह शामिल हैं-

1. बुध (Mercury)

2. शुक्र (Venus)

3. पृथ्वी (Earth)

4. मंगल (Mars)

    ये ग्रह छोटे, ठोस तथा चट्टानी होते हैं, जबकि बाहरी ग्रह गैसीय होते हैं।

(v) पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ।

(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले

(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले

(ग) 38 लाख वर्ष पहले

(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

उत्तर- (घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

व्याख्या:

   वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन का आरंभ लगभग 3.8 अरब (380 करोड़) वर्ष पहले हुआ था। प्रारंभिक जीवन सूक्ष्म जीवों (micro organisms) के रूप में समुद्रों में उत्पन्न हुआ था।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?

उत्तर- ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं और अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। अर्थात पार्थिव ग्रह चट्टानी हैं क्योंकि ये सूर्य के निकट बने, जहाँ उच्च तापमान के कारण हल्की गैसें उड़ गईं और केवल भारी तत्व जैसे लोहा, सिलिका आदि रह गए, जिनसे ठोस सतह बनी।

   ये ग्रह छोटे होने के कारण उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके फलस्वरूप इनसे निकली हुई गैस इन पर रुकी नहीं रह सकी।

(ii) पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधित दिये गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अंतर बताएँ-

(क) कान्ट व लाप्लेस (ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन

उत्तर-

(क) कान्ट व लाप्लेस: कान्ट व लाप्लेस की परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।

(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन: चैम्बरलेन व मोल्टेन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के पास से गुजरा। इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया।

    यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यहीं पर धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

(iii) विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-  विभेदन प्रक्रिया से तात्पर्य है- जब पृथ्वी के निर्माण के दौरान भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र में और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एल्युमिनियम) ऊपर की ओर आ गए, जिससे परतें बनीं।

विस्तार से व्यख्या- पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान और उत्पत्ति के तुरंत बाद अत्यधिक ताप के कारण, पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण ही हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए ।

     इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ यह और ठंडे हुए और ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए।

    अंततोगत्वा यह पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।

(iv) प्रारंभिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?

उत्तर- प्रारंभ में पृथ्वी, चट्टानी गर्म और वीरान ग्रह थी जिसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था।

    अर्थात प्रारंभिक काल में पृथ्वी का धरातल अत्यंत गर्म, अस्थिर और पिघले हुए पदार्थों से बना था। इसमें ठोस भू-पर्पटी नहीं थी तथा ज्वालामुखीय क्रियाएँ निरंतर होती रहती थीं।

(v) पृथ्वी के वायुमंडल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं?

उत्तर- हाइड्रोजन व हीलीयम।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर- बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है-

1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड बना है, अति छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था ।

2. बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की विस्फोट प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी।

    ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरम्भिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ।

3. बिग बैंग के कारण 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया। ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में विस्तार का होना।

    हॉयल (Hoyle) ने इसका विकल्प ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Concept) के नाम से प्रस्तुत किया । इस संकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा हैं। यद्यपि ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड विस्तार सिद्धांत के ही पक्षधर हैं।

(ii) पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था या चरण को संक्षेप में वर्णित करें।

उत्तर- पृथ्वी के विकास की प्रक्रिया अत्यंत दीर्घ और जटिल रही है, जो लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौरमंडल के निर्माण के साथ आरंभ हुई। इस विकास को विभिन्न अवस्थाओं या चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

1. निहारिका अवस्था (Nebular Stage):-

    सौरमंडल प्रारंभ में गैसों और धूल कणों के विशाल बादल के रूप में था। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से यह निहारिका सिमटने लगी और इसके केंद्र में सूर्य का निर्माण हुआ, जबकि परिक्रमा करती धूल और गैस से ग्रहों की उत्पत्ति हुई।

2. प्रोटो-पृथ्वी अवस्था (Proto-Earth Stage):-

     संकुचन और संलयन के परिणामस्वरूप धूल और गैस के कण आपस में मिलकर प्रोटो-पृथ्वी का निर्माण करने लगे। इस समय पृथ्वी अत्यंत गर्म और अस्थिर अवस्था में थी।

3. विभेदन अवस्था (Differentiation Stage):-

     पृथ्वी के भीतर तापमान बढ़ने के कारण भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र की ओर चले गए और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एलुमिनियम) ऊपर की ओर आ गए। परिणामस्वरूप पृथ्वी का आंतरिक ढांचा – कोर, मेंटल और क्रस्ट बना।

4. वायुमंडल और महासागर निर्माण अवस्था:-

     ज्वालामुखीय गैसों और जलवाष्प के उत्सर्जन से प्रारंभिक वायुमंडल बना। जलवाष्प के संघनन से वर्षा हुई और महासागरों का निर्माण हुआ।

5. जैविक विकास अवस्था:-

     लगभग 3.8 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन का उद्भव हुआ, जिसने धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल और पर्यावरण को परिवर्तित कर वर्तमान स्वरूप दिया।

     इस प्रकार, पृथ्वी का विकास एक सतत भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रिया का परिणाम है।

Chapter 1 Geography as a Discipline (भूगोल एक विषय के रूप में)

Chapter 1 Geography as a Discipline

(भूगोल एक विषय के रूप में)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 1 Geography as a Discipline

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल (Geography) शब्द (Terms) का प्रयोग किया?

(क) हेरोडोटस

(ख) गैलिलियो

(ग) इरेटास्थिनीज

(घ) अरस्तू

उत्तर- (ग) इरेटास्थिनीज

व्याख्या:

“भूगोल” (Geography) शब्द का प्रयोग सबसे पहले यूनानी विद्वान इरेटास्थिनीज (Eratosthenes) ने किया था। यह शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है:

Geo = पृथ्वी,  Graphy = वर्णन या लेखन अर्थात्, Geography का अर्थ हुआ ‘पृथ्वी का वर्णन या अध्ययन’।

(ii) निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?

(क) बंदरगाह

(ख) मैदान

(ग) सड़क

(घ) जल उद्यान

उत्तर- (ख) मैदान

व्याख्या:

   भौतिक लक्षण (Physical features) वे होते हैं जो प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं, जैसे- पर्वत, नदियाँ, मैदान, पठार आदि। जबकि अन्य विकल्प- बंदरगाह, सड़क, जल उद्यान – ये मानव द्वारा निर्मित (मानव निर्मित या कृत्रिम) लक्षण हैं।

(iii) स्तम्भ I एवं II के अंतर्गत लिखे गए विषयों को पढ़िए।

स्तम्भ I प्राकृतिक सामाजिक विज्ञान स्तम्भ II भूगोल की शाखाएँ
1. मौसम विज्ञान अ. जनसंख्या भूगोल
2. जनांकिकी ब. मृदा भूगोल
3. समाजशास्त्र स. जलवायु विज्ञान
4. मृदा विज्ञान द. सामाजिक भूगोल

सही मेल को चिह्नांकित कीजिए

(क) 1.ब, 2.स, 3.अ, 4.द

(ग) 1.अ, 2.द, 3.ब, 4.स

(ख) 1.द. 2.ब, 3.स, 4.अ

(घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

उत्तर- (घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?

(क) क्यों

(ख) क्या

(ग) कहाँ

(घ) कब

उत्तर- (क) क्यों

व्याख्या:
   “क्यों” प्रश्न का प्रयोग किसी घटना या स्थिति के कारण (cause) को जानने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कार्य-कारण संबंध (cause-effect relationship) से जुड़ा हुआ प्रश्न होता है।

(v) निम्नलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?

(क) समाजशास्त्र

(ख) मानवशास्त्र

(ग) इतिहास

(घ) भूगोल

उत्तर- (घ) भूगोल

व्याख्या:

    भूगोल (Geography) एक ऐसा विषय है जो स्थानिक (spatial) और कालिक (temporal) दोनों प्रकार के विश्लेषण करता है।

   यह विभिन्न समय अवधियों (कालों) में पृथ्वी की सतह पर घटित परिवर्तनों का अध्ययन करता है- जैसे स्थलरूप, जलवायु, जनसंख्या, उद्योग आदि में समय के साथ होने वाले परिवर्तन।

   इसीलिए भूगोल को “विषयकालिक संश्लेषण” (Temporal Synthesis) करने वाला विषय कहा जाता है।

(vi) निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?

(क) इरेटॉस्थनीज

(ख) हम्बोल्ट

(ग) स्ट्रेबो

(घ) टॉलेमी

उत्तर- (ख) हम्बोल्ट

व्याख्या:
   क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) की अवधारणा अलेक्ज़ेंडर वॉन हम्बोल्ट ने दी थी। उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को कारण-कार्य संबंध के आधार पर व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने की परंपरा शुरू की।

   वहीं, कार्ल रिटर (Carl Ritter) ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) की परंपरा को आगे बढ़ाया।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए:

(i) आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?

उत्तर- हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों, मंदिर, मस्जिद, वस्त्र, भाषा एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि ये मानव-पर्यावरण संबंध को दर्शाते हैं।

(ii) आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?

उत्तर- पृथ्वी का आकार जियोइड (Geoid) है, क्योंकि पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी और विषुवत् रेखा पर उभरी होती है, इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

(iii) क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधारोपण क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?

उत्तर- हाँ, हमारे विद्यालय में वन महोत्सव मनाया जाता है। हम पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधारोपण करते हैं। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर और ऑक्सीजन छोड़कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।

(iv) आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?

उत्तर- हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक्ष एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। इसमें वायु, जल और भूमि के जीवित तत्व परस्पर क्रिया करते हैं।

(v) आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान तथा, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?

उत्तर- मुझे अपने निवास से विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सड़क के उस पार होता, तो मात्र 2–3 मिनट में पहुँच सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि घर और विद्यालय के बीच की दूरी आने-जाने के समय को सीधे प्रभावित करती है- दूरी जितनी अधिक होगी, समय भी उतना ही अधिक लगेगा।

    वास्तव में, दूरी और समय का गहरा संबंध है; हम दूरी को समय में और समय को दूरी में परिवर्तित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय 2 किलोमीटर दूर है और मैं 6 किमी/घंटा की गति से चलता हूँ, तो विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट लगेंगे। 

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तथ्यों में भिन्नता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पशु एवं पक्षी जिसे आप देखते हैं भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सभी भिन्न तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है?

उत्तर- हाँ, हम यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक (क्षेत्रीय) भिन्नता का अध्ययन है, क्योंकि भूगोल का मूल उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्राकृतिक और सांस्कृतिक तत्वों की विविधता को समझना है।

     जब हम अपने आसपास के वातावरण का अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि कहीं पर्वत हैं तो कहीं मैदान, कहीं वन हैं तो कहीं रेगिस्तान। इसी प्रकार, मानव जीवन की संस्कृति, निवास, वेशभूषा, भाषा और जीवनशैली भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होती है।

    इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन भूगोल करता है और यह समझने का प्रयास करता है कि इन भिन्नताओं के पीछे कौन-से प्राकृतिक कारण (जैसे जलवायु, स्थलरूप, मृदा) तथा मानवीय कारण (जैसे आर्थिक क्रियाएँ, तकनीकी विकास, संस्कृति) जिम्मेदार हैं। अतः भूगोल वास्तव में पृथ्वी की सतह पर क्षेत्रीय विविधताओं और उनके पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है।

(ii) आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।

उत्तर- भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ये चारों सामाजिक विज्ञान के प्रमुख घटक हैं, जो मानव समाज के विभिन्न पहलुओं को समझने में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

     इतिहास हमें समय के साथ मानव सभ्यता के विकास और परिवर्तन की जानकारी देता है, जबकि भूगोल यह बताता है कि भौगोलिक परिस्थितियाँ मानव जीवन और समाज को कैसे प्रभावित करती हैं।

    अर्थशास्त्र संसाधनों के उत्पादन, वितरण और उपभोग का अध्ययन करता है, जो भौगोलिक संसाधनों और ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

    नागरिक शास्त्र समाज में शासन, अधिकारों और दायित्वों की समझ प्रदान करता है, जो इतिहास और आर्थिक संरचना दोनों से प्रभावित होते हैं।

    इन विषयों का अंतरापृष्ठ (interface) यह दर्शाता है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय प्रक्रियाएँ परस्पर निर्भर हैं। इस प्रकार, इनका समाकलन मानव समाज की समग्र समझ विकसित करने में सहायक होता है।

34. Sound pollution and their remedial measures (ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)

Sound pollution and their remedial measures

(ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)



Sound pollution and their remedialपरिचय

     ध्वनि हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। यह हमारे संचार, आनंद, संगीत और पर्यावरण का हिस्सा है। किंतु जब ध्वनि अपनी प्राकृतिक सीमा को पार कर जाती है और व्यक्ति, समाज अथवा जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य, मानसिक शांति एवं कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है, तो उसे ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution) कहा जाता है।

   आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाहनों की वृद्धि, मशीनों एवं लाउडस्पीकरों के अत्यधिक उपयोग के कारण यह एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है।

परिभाषा

     ध्वनि प्रदूषण वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता (Sound Intensity) मानव श्रवण सीमा (लगभग 60 डेसिबल) से अधिक हो जाती है और वह असहनीय या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार –

“जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता 85 डेसिबल से अधिक हो जाती है, तो वह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है।”

ध्वनि का मापन (Measurement of Sound)

   ध्वनि को डेसिबल (Decibel, dB) नामक इकाई में मापा जाता है। नीचे कुछ सामान्य ध्वनियों की तीव्रता दी गई है:

ध्वनि का स्रोत तीव्रता (dB)
सामान्य बातचीत 60
भारी यातायात 90
रेल इंजन 100
लाउडस्पीकर या संगीत कार्यक्रम 110-120
जेट विमान 130-140

     85 dB से अधिक ध्वनि निरंतर सुनना खतरनाक माना जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Major Sources of Sound Pollution)

(i) वाहन यातायात (Transportation Noise):-

       बसें, ट्रक, ऑटोमोबाइल, मोटरसाइकिलें, ट्रेनें, हवाई जहाज आदि निरंतर शोर उत्पन्न करते हैं। महानगरों में यह प्रमुख कारण है।

(ii) औद्योगिक स्रोत (Industrial Noise):-

     कारखानों में चलने वाली भारी मशीनें, टरबाइन, जनरेटर, प्रेस मशीनें आदि लगातार शोर उत्पन्न करती हैं।

(iii) निर्माण कार्य (Construction Activities):-

     इमारतें, पुल, सड़कें, मेट्रो आदि निर्माण कार्यों में ड्रिलिंग मशीन, क्रेन और अन्य उपकरण शोर करते हैं।

(iv) सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम (Social and Religious Functions):-

   विवाह, जुलूस, त्यौहारों, राजनीतिक रैलियों और धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकरों और पटाखों का अत्यधिक प्रयोग होता है।

(v) घरेलू उपकरण (Domestic Appliances):-

    टेलीविजन, मिक्सर, वैक्यूम क्लीनर, कूलर, वॉशिंग मशीन आदि भी शोर का कारण बनते हैं।

(vi) विमानन क्षेत्र (Aviation Noise):-

    एयरपोर्ट के आसपास लगातार विमान उड़ान भरने और उतरने की आवाज से वातावरण अत्यधिक शोरग्रस्त रहता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Sound Pollution)

1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

⇒ श्रवण क्षमता में कमी: लगातार ऊँची आवाज़ सुनने से कान की नसें क्षतिग्रस्त होती हैं और स्थायी बहरापन आ सकता है।

⇒ मानसिक तनाव और अनिद्रा: निरंतर शोर मानसिक अशांति, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, चिंता और अवसाद उत्पन्न करता है।

⇒ रक्तचाप में वृद्धि: अत्यधिक ध्वनि से हार्मोनल असंतुलन और रक्तचाप बढ़ता है।

⇒ हृदय रोग: निरंतर शोर से हृदय गति बढ़ती है और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

⇒ एकाग्रता में कमी: छात्रों और कर्मचारियों में एकाग्रता और उत्पादकता कम होती है।

2. पशु-पक्षियों पर प्रभाव

⇒ पक्षियों की दिशा निर्धारण क्षमता प्रभावित होती है।

⇒ शोर के कारण कई पक्षी अपने प्रजनन स्थल छोड़ देते हैं।

⇒ जलीय जीव भी सोनार तरंगों से प्रभावित होते हैं।

3. पर्यावरण पर प्रभाव

⇒ शोर प्रदूषण से प्राकृतिक पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ता है।

⇒ वन्यजीव क्षेत्रों में प्रजनन दर घटती है।

⇒ पेड़ों की वृद्धि और पौधों की संवेदनशीलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत में ध्वनि प्रदूषण की स्थिति

    भारत में ध्वनि प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के अनुसार, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना और लखनऊ जैसे महानगरों में औसतन ध्वनि स्तर 80 से 100 डेसिबल तक पहुँच गया है।

    यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा निर्धारित मानक (55 dB – दिन में, 45 dB – रात में) से कहीं अधिक है।

कानूनी प्रावधान (Legal Provisions)

(i) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986:-

  ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इसे पर्यावरण प्रदूषण के दायरे में शामिल किया गया है।

(ii) Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000:-

    औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और मौन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग ध्वनि सीमा निर्धारित की गई है। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर या ध्वनि यंत्रों के उपयोग पर प्रतिबंध है।

(iii) भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268, 290, 291:-

    सार्वजनिक उपद्रव या असुविधा उत्पन्न करने वाले शोर को दंडनीय अपराध माना गया है।

ध्वनि प्रदूषण के उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures for Sound Pollution)

1. तकनीकी उपाय :-

⇒ ध्वनि अवरोधक (Sound Barriers): सड़कों और उद्योगों के आसपास दीवारें, वृक्ष पंक्तियाँ लगाकर ध्वनि अवरोध बनाए जाएँ।

⇒ ध्वनि अवशोषक सामग्री: भवन निर्माण में ध्वनि अवशोषक सामग्री जैसे रबर, फोम, ग्लास वूल का प्रयोग।

⇒ मशीनों की नियमित मरम्मत: पुरानी और शोर करने वाली मशीनों की मेंटेनेंस से ध्वनि कम होती है।

⇒ वाहन नियंत्रण: साइलेंसर यंत्रों का उचित रखरखाव और पुराने वाहनों पर नियंत्रण।

2. नीतिगत और प्रशासनिक उपाय

⇒ ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र निर्धारण: स्कूल, अस्पताल और कोर्ट के आसपास “Silence Zone” बनाना।

⇒ ध्वनि मानक पालन: औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में निर्धारित डेसिबल सीमा का पालन।

⇒ कानूनी प्रवर्तन: लाउडस्पीकर, पटाखों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में ध्वनि सीमा उल्लंघन पर दंड।

⇒ शहरी योजना: आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों का अलग-अलग नियोजन।

3. सामाजिक और व्यक्तिगत उपाय

⇒ जन-जागरूकता: ध्वनि प्रदूषण के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षण संस्थानों और मीडिया द्वारा प्रचार-प्रसार।

⇒ व्यक्तिगत अनुशासन: लाउडस्पीकर, टीवी, रेडियो आदि की आवाज़ सीमित रखें।

⇒ त्यौहारों और समारोहों में संयम: पटाखों और तेज ध्वनि वाले उपकरणों का सीमित प्रयोग।

⇒ पेड़-पौधों का रोपण: वृक्ष ध्वनि अवरोधक की तरह कार्य करते हैं, जिससे ध्वनि तीव्रता कम होती है।

4. वैज्ञानिक उपाय

⇒ Noise Mapping: शहरों के विभिन्न हिस्सों में ध्वनि स्तर का वैज्ञानिक मापन और मानचित्रण।

⇒ Noise Monitoring Systems: निरंतर ध्वनि मापन के लिए ऑटोमेटिक उपकरणों का प्रयोग।

⇒ Green Belt Development: औद्योगिक क्षेत्रों के चारों ओर हरित पट्टी विकसित करना।

⇒ Soundproof Technology: शोर नियंत्रित मशीनों और वाहनों का विकास।

सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास

⇒ CPCB और SPCB (State Pollution Control Board) द्वारा नियमित ध्वनि सर्वेक्षण।

⇒ NGO द्वारा जनजागरूकता अभियान और ध्वनि सीमाओं का पालन सुनिश्चित कराने हेतु कार्य।

⇒ स्वच्छ भारत अभियान और ग्रीन सिटी प्रोग्राम में ध्वनि प्रदूषण को शामिल करना।

अंतरराष्ट्रीय प्रयास

⇒ WHO और UNEP ने ध्वनि प्रदूषण को वैश्विक स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार किया है।

⇒ कई देशों में “Noise Abatement Policies” और “Quiet City Zones” लागू हैं।

⇒ यूरोपीय देशों ने “Environmental Noise Directive (END)” लागू कर नागरिकों के लिए शांत वातावरण सुनिश्चित किया है।

शिक्षा और अनुसंधान की भूमिका

⇒ उच्च शिक्षण संस्थानों में पर्यावरणीय शिक्षा के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण को विशेष रूप से पढ़ाया जाए।

⇒ अनुसंधान संस्थान ध्वनि नियंत्रण की नई तकनीकों का विकास करें।

⇒ स्थानीय निकायों को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे नियमों का पालन करा सकें।

निष्कर्ष

    ध्वनि प्रदूषण एक अदृश्य लेकिन गंभीर पर्यावरणीय खतरा है जो मानव स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और पारिस्थितिक तंत्र को गहराई से प्रभावित करता है। इसका समाधान केवल कानूनों या तकनीकी उपायों से नहीं बल्कि जन-सहयोग और जागरूकता से संभव है।

     हमें यह समझना होगा कि शांति ही प्रगति का आधार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ध्वनि सीमा का पालन करना चाहिए। जन-जागरूकता, कानूनी नियंत्रण और तकनीकी सुधार के माध्यम से हम एक “Noise-Free India” का निर्माण कर सकते हैं।

33. International Standard of Drinking Water (पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)

International Standard of Drinking Water

(पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)



International Standard of Drinking Water

परिचय

       जल जीवन का मूल स्रोत है। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए जल का शुद्ध एवं सुरक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से निर्मित है, अतः इसका सेवन शुद्ध, स्वच्छ तथा रोगाणु रहित होना चाहिए।

     किंतु आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण जल प्रदूषण की समस्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया कि पेयजल के लिए कुछ निश्चित मानक निर्धारित किए जाएँ, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित जल मिल सके।

    इसी उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने पेयजल की गुणवत्ता से संबंधित मानक निर्धारित किए हैं, जिन्हें “अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानक (International Drinking Water Standards)” कहा जाता है।

परिभाषा

    पेयजल (Drinking Water) वह जल है जो मनुष्य द्वारा पीने, भोजन तैयार करने तथा घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त हो। यह जल भौतिक, रासायनिक और जैविक दृष्टि से शुद्ध होना चाहिए। इसमें कोई हानिकारक तत्व, सूक्ष्मजीव या प्रदूषक नहीं होना चाहिए जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करें।

अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानकों की आवश्यकता

(i) स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु – दूषित जल अनेक जलजनित रोगों जैसे टाइफाइड, हैजा, पेचिश, हेपेटाइटिस आदि का कारण बनता है।

(ii) वैज्ञानिक तुलना हेतु – विभिन्न देशों में जल की गुणवत्ता का तुलनात्मक मूल्यांकन करने हेतु।

(iii) विकासशील देशों में नीति निर्माण हेतु – स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के कार्यक्रमों और योजनाओं में दिशा देने हेतु।

() औद्योगिक नियंत्रण हेतु – उद्योगों द्वारा उत्सर्जित अपशिष्ट से जल स्रोतों की रक्षा करने हेतु।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल मानक

    WHO ने अपने “Guidelines for Drinking-water Quality” में पेयजल के लिए विभिन्न मानदंड निर्धारित किए हैं, जो मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटे गए हैं –

1. भौतिक मानक (Physical Standards)

2. रासायनिक मानक (Chemical Standards)

3. जैविक मानक (Biological Standards)

भौतिक मानक (Physical Standards)

     भौतिक मानक जल के बाह्य गुणों से संबंधित होते हैं जैसे रंग, गंध, स्वाद, तापमान, और मटमैलापन।

मानक तत्व WHO अनुशंसित सीमा विवरण
रंग (Colour) 15 TCU (True Colour Unit) से अधिक नहीं अधिक रंग होने पर जल अस्वच्छ प्रतीत होता है।
गंध (Odour) अप्रिय गंध नहीं होनी चाहिए जैविक या रासायनिक पदार्थों के कारण गंध उत्पन्न होती है।
स्वाद (Taste) सामान्य और प्राकृतिक होना चाहिए क्लोरीन या अन्य रसायनों की अधिकता स्वाद को प्रभावित करती है।
मटमैलापन (Turbidity) 5 NTU से कम अधिक मटमैलापन रोगाणुओं की उपस्थिति का संकेत हो सकता है।
तापमान (Temperature) 25°C से कम अधिक तापमान वाले जल का स्वाद खराब हो जाता है।

रासायनिक मानक (Chemical Standards)

      रासायनिक मानक जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों एवं यौगिकों की सीमा निर्धारित करते हैं। इन तत्वों की अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

तत्व स्वीकार्य सीमा (WHO) प्रभाव
pH मान 6.5 – 8.5 बहुत अम्लीय या क्षारीय जल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कुल घुलित ठोस (TDS) 500 mg/L स्वाद और उपयोगिता पर प्रभाव डालता है।
क्लोराइड (Chloride) 250 mg/L अधिक मात्रा में खारापन बढ़ाता है।
सल्फेट (SO₄) 250 mg/L अधिक मात्रा दस्त या उल्टी का कारण बन सकती है।
नाइट्रेट (NO₃) 50 mg/L बच्चों में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” का कारण बनता है।
फ्लोराइड (F⁻) 1.0 mg/L कम मात्रा में दाँतों के लिए लाभदायक, अधिक मात्रा में फ्लोरोसिस।
आयरन (Fe) 0.3 mg/L अधिक मात्रा जल का स्वाद बदलती है, पाइपों में जंग लगाती है।
मैंगनीज (Mn) 0.1 mg/L तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव डालता है।
आर्सेनिक (As) 0.01 mg/L कैंसरजनक तत्व, दीर्घकालीन सेवन से त्वचा रोग।
सीसा (Pb) 0.01 mg/L तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुँचाता है।
पारा (Hg) 0.001 mg/L गुर्दों और मस्तिष्क को नुकसान।
कैडमियम (Cd) 0.003 mg/L हड्डियों और किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव।

जैविक मानक (Biological Standards)

     जल में उपस्थित सूक्ष्मजीव रोगों के प्रमुख स्रोत हैं। अतः WHO ने जैविक मानकों के लिए विशेष दिशा-निर्देश दिए हैं।

सूक्ष्मजीव WHO अनुशंसा
E. coli (Escherichia coli) 0 प्रति 100 ml जल में
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 0 प्रति 100 ml
वायरस, प्रोटोजोआ, हेल्मिंथ्स अनुपस्थित होने चाहिए

     यदि जल में उपर्युक्त किसी भी प्रकार के रोगाणु पाए जाते हैं, तो वह पेयजल के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

भारत में पेयजल मानक (BIS – IS 10500:2012)

    भारत में पेयजल की गुणवत्ता मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। ये मानक अधिकांशतः WHO के दिशा-निर्देशों पर आधारित हैं।

तत्व स्वीकार्य सीमा अधिकतम अनुमेय सीमा
pH 6.5 – 8.5 –
कुल कठोरता (Hardness) 200 mg/L 600 mg/L
TDS 500 mg/L 2000 mg/L
फ्लोराइड 1.0 mg/L 1.5 mg/L
नाइट्रेट 45 mg/L –
आयरन 0.3 mg/L –
आर्सेनिक 0.01 mg/L –
सीसा 0.01 mg/L –

     भारत सरकार द्वारा “जल जीवन मिशन”, “स्वच्छ भारत मिशन”, और “राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम” के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अन्य संगठन

1. यूएस एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (USEPA) – अमेरिका में पेयजल की गुणवत्ता के लिए मानक निर्धारित करती है।

2. यूरोपीय संघ (European Union Drinking Water Directive) – यूरोपीय देशों के लिए गुणवत्ता मानक तय करता है।

3. ISO (International Organization for Standardization) – जल गुणवत्ता के मापदंडों के लिए तकनीकी दिशा-निर्देश प्रदान करता है (ISO 10500 आदि)।

4. FAO/UNESCO संयुक्त आयोग – जल संसाधनों के संरक्षण और गुणवत्ता मानकों पर कार्य करता है।

पेयजल गुणवत्ता के मूल्यांकन के प्रमुख पैरामीटर

(i) भौतिक पैरामीटर – रंग, गंध, मटमैलापन, तापमान।

(ii) रासायनिक पैरामीटर – pH, TDS, नाइट्रेट, फ्लोराइड, भारी धातुएँ।

(iii) जैविक पैरामीटर – बैक्टीरिया, वायरस आदि।

(iv) रेडियोधर्मी पदार्थ – ट्रिटियम, रेडियम आदि की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए।

पेयजल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत

⇒ औद्योगिक अपशिष्ट और रासायनिक कारखाने।

⇒ कृषि में प्रयुक्त कीटनाशक और उर्वरक।

⇒ घरेलू सीवेज और अपशिष्ट जल।

⇒ भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड या नाइट्रेट की प्राकृतिक अधिकता।

⇒ असुरक्षित जल भंडारण और पाइपलाइन लीक।

पेयजल की गुणवत्ता सुधार के उपाय

(i) जल का शोधन (Treatment)- क्लोरीनीकरण, उबालना, फिल्ट्रेशन, रिवर्स ऑस्मोसिस (RO)।

(ii) स्रोत संरक्षण – नदी, झील, भूमिगत जल स्रोतों का प्रदूषण से बचाव करना।

(iii) जनजागरूकता – स्वच्छता और जल संरक्षण के प्रति लोगों को शिक्षा देना।

(iv) नियमित परीक्षण – समय-समय पर जल की गुणवत्ता की जांच करना।

(v) नीति निर्माण – सरकार द्वारा कठोर मानक और निगरानी तंत्र की स्थापना करना।

निष्कर्ष:

     पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक मानव स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। WHO और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा निर्धारित दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करते हैं कि जल में किसी भी प्रकार का रासायनिक, जैविक या भौतिक प्रदूषण मानव जीवन को प्रभावित न करे।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए इन मानकों का पालन करना न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रश्न है बल्कि सतत विकास का भी आधार है। इसलिए प्रत्येक नागरिक, संस्था और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति को स्वच्छ, सुरक्षित और मानक के अनुरूप पेयजल उपलब्ध हो।

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