9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण / Functional Classification of Cities

9.  नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

(Functional Classification of Cities)


नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण

           

       वह अधिवासीय क्षेत्र जहाँ मानव सामूहिक रूप से अधिवास करता है उस स्थान को बस्ती से सम्बोधित करते हैं। अगर किसी भी बस्ती की 2/3 जनसंख्या द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों में संलग्न हो तो वैसे बस्ती को नगरीय बस्ती से सम्बोधित करते हैं। द्वितीयक एवं तृतीयक कार्य भी कई प्रकार होते हैं। उन कार्यों के आधार पर नगरों का वर्गीकरण करना एक जटिल कार्य है। किस नगर में किस कार्य की महता अधिक है? इसके लिए अनुभावाश्रित विधि या सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया जाता है।

      अशोक मिश्रा ने कार्यों के आधार पर भारतीय नगरों को सात वर्गों में बाँटा है। जैसे:-

(1) उत्पादन नगर

(2) व्यापारिक नगर

(3) राजनीतिक या प्रशानिक नगर

(4) सांस्कृतिक नगर

(5) मनोरंजनात्मक नगर

(6) परिवहन नगर  

(7) मिश्रित नगर

(1) उत्पादन नगर⇒ वैसे नगर जहाँ पर मुख्य रूप से उत्पादन का कार्य किया जाता है। उत्पादन के ये कार्य भी दो प्रकार के हो सकते हैं:-

(A) प्राथमिक उत्पादन के कार्य

(B) औद्योगिक उत्पादन के कार्य

     (A) प्राथमिक उत्पादन का कार्य करने वाले नगरों को पुनः 6 भागों में बाँटा जा सकता है:-

(a) खनन पर आधारित नगर⇒ जैसे- झरिया (कोयला), खेतरी (ताम्बा), जादूगोडा (यूरेनियम) उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

(b) खनिज तेल उत्पादन करने वाले नगर ⇒ जैसे- असम का डिग्बोई, नूनमाटी, नरकटियागंज

(c) लकड़ी का कारोबार करने वाले नगर⇒ जैसे- काठ गोदाम, सहारनपुर (UP)

(d) मत्स्यन कार्य करने वाले नगर⇒ जैसे- तमिलनाडु का धनुषकोटी और रामेश्वरम्

(e) पशुपालन आधारित नगर ⇒ सोनपुर

(f) कृषि आधारित नगर⇒ भारत के अधिकांश कस्बाई नगर।

     (B) औद्योगिक उत्पादन करने वाले नगरों में कच्चे माल लाकर तैयार किया जाता है उसके बाद तैयार माल को बेचने का कार्य किया जाता है। भिलाई, दुर्गापुर, कुल्टी, बर्नपुर, सतना (MP), जमशेदपुर।

        औद्योगिक उत्पादन हेतु विभिन्न प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। अतः ऊर्जा उत्पादन के लिए अलग-2 ऊर्जा स्रोत पर अलग-2 संयंत्रों का विकास किया गया है और संयंत्रों के आस-पास नगरीय विकास को देखा जा सकता है। जैसे:

(a) नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन करने वाले नगर⇒ रावतभाटा (राजस्थान), नरौरा, कलपक्कम

(b) तापीय ऊर्जा पर आधारित नगर⇒ तालचर, संथालडीह (W.B), चन्द्रपुरा (बोकारों के पास), रामगढ़

(c) जलविद्युत पर आधारित नगर⇒ तिलैया, कुमारडुब्बी, मैथन, शिवसमुद्रम, इडुक्की

(d) खनिज तेल शोधन शाला पर आधारित नगर⇒ बरौनी, मथुरा, हल्दिया, जामनगर नगर, कोयली

(2) व्यापारिक नगर

                ऐसे नगर जहाँ पर व्यापारिक कार्य प्रमुख रूप से किये जाते हैं। इस तरह के नगरों का विकास दो स्थानों पर हुआ है।

(i) दो विभिन्न प्रकार के भौगोलिक विशेषता रखने वाले मिलन बिन्दु पर। जैसे: पर्वत तथा मैदान के मिलन बिन्दु पर हरिद्वार, कोंटासाहिब (उत्तराखंड)।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

नगरों का कार्यात्मक वर्ग

         भारत में सभी नदियों के संगम स्थल पर धार्मिक नगर बसा हुआ है। जैसे- इलाहाबाद, वाराणसी, राजरप्पा।

मरुस्थल एवं उपजाऊ मैदान की मिलन बिन्दु पर : हनुमानगढ़, गंगानगर, जयपुर।

(ii) दो विभिन्न प्रकार के परिवहन साधनों के मिलन स्थान पर। जैसे:

(a) सड़‌क और रेलवे के मिलन बिंदु पर जैसे- बाजाल्दा (कश्मीर में उधमपुर जिला में)

(b) रेलवे मार्गो के जंक्शन पर जैसे- पंडित दीनदयाल उपाध्याय, कटनी, इटारसी।

(c) सड़‌कों के मिलन बिन्दु पर जैसे- झाँसी।

(3) राजनीतिक या प्रशासनिक नगर 

       वैसे नगर जहाँ पर मुख रूप से राजनीतिक एवं प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं। जैसे- भारत के सभी राजधानी नगर। राजनीतिक एवं प्रशासनिक नगर को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) किला नगर- जयपुर, उदयपुर, चितौड़‌गढ़, दरभंगा, जोधपुर।

(b) विशुद्ध रूप ने प्रशासनिक कार्य करने वाले नगर- दिसपुर, गाँधी नगर।

(4) सांस्कृतिक नगर

           प्राचीन काल से ही भारत में मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर इत्यादि के इर्द-गिर्द नगरों का विकास होता रहा है सांस्कृतिक नगर को निम्नलिखित भागों में बाँटा जा सकता है:-

(i) धार्मिक नगर⇒ गया, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, देवघर।

(i) शैक्षणिक नगर⇒ नालंदा, विक्रमशीला, पिलानी, नेतरहाट, पटना, कोटा।

(iii) धार्मिक सह शैक्षणिक नगर⇒ प्रयागराज, वाराणसी, पटना।

(5) मनोरंजनात्मक नगर

      वैसे  नगर जहाँ प्राथमिक रूप से मनोरंजन के कार्य सम्पादित किये जाते हैं जो कई प्रकार के होते हैं। जैसे-

(i) पर्वतीय पर्यटक नगर ⇒ श्रीनगर, शिमला, मासुरी, दार्जलिंग, माऊण्ट आबू।

(ii) लैगून नगर ⇒ कोबलम, कुमारगम (केरल)

(iii) पुलिन नगर⇒ चेन्नई, पुरी, मुम्बई का जुहू बिच इत्यादि।

(6) परिवहन नगर

       ऐसे नगरों में परिवहन का कार्य मुख्य रूप से किया जाता है। जैसे:- डायमण्ड हार्बर, काल्का, पोर्ट द्वार (उतराखण्ड)

(7) मिश्रित नगर

       ऐसे नगरों में कई कार्य संपादित किये जाते हैं। कार्यों के आधार पर उन नगरों का पहचान कठिन हैं। वैसे नगर को मिश्रित नगर कहते है। उदा०- भारत के सभी महानगर इसके सर्वोत्तम उदाहरण है।

निष्कर्ष

           उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय नगरों को कार्यों के आधार पर कई भागों में बाँटा जाता है लेकिन कोई भी नगर विशुद्ध रूप से एक ही कार्य को संपादित नहीं करते हैं। ऐसे में बहुचर विश्लेषण विधि के आधार पर नगरों का संश्लेषित वर्गीकरण प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।


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11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र / Urban Influence Area

11. नगरीय प्रभाव क्षेत्र


नगरीय प्रभाव क्षेत्र⇒

           नगरीय प्रभाव क्षेत्र का सामान्य तात्पर्य उस भौगोलिक प्रदेश से है जो किसी नगर के सीमा के बाहर अवस्थित है किंतु आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए वह नगर पर निर्भर करता है। नगर भी कई प्रकार के कार्यों के लिए अपने आसपास के क्षेत्रों पर निर्भर करता है। जैफरसन महोदय ने उचित ही लिखा है कि नगर का विकास अपने आप नहीं होता है उनके विकास का आधार आसपास का ग्रामीण क्षेत्र निर्धारित करता है।

      गेडिज तथा स्मैल्स जैसे ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं की अवधारणा है कि नगर के बसाव स्थल (site) का विकास उसकी बसाव स्थिति (situation) पर निर्भर करता है। बसाव स्थिति ही नगर का प्रभाव क्षेत्र है।

नगरीय प्रभाव क्षेत्र

            नगरीय प्रभाव क्षेत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग नॉर्दन महोदय ने पिछली शताब्दी के पाँचवें दशक के मध्य में किया था लेकिन उसके पूर्व भी नगरीय प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन होता रहा था, लेकिन “नगरीय प्रभाव क्षेत्र” के बदले अमलैंड शब्द का अधिक प्रयोग होता था, यह जर्मन शब्द है जहाँ (अम) का अर्थ होता है चारों तरफ और लैंड का अर्थ भूमि अर्थात् नगर के चारों तरफ की भूमि जो नगर का प्रभाव क्षेत्र है। अमलैंड शब्द का विकास सर्वप्रथम एलिक्स महोदय द्वारा 1914 ई० में किया गया। इसके बाद इस शब्द का प्रयोग स्टेनली, डोड्ज, व्हिटेलसी और हैरिस जैसे विद्वानों ने किया।

        ब्रिटिश भूगोलवेत्ता ग्रीन ने नगरीय पृष्ठ (Urban Hinteland) प्रदेश शब्द का प्रारंभ में प्रयोग किया, लेकिन बाद में उन्होंने नगर प्रभाव क्षेत्र का प्रयोग किया। ब्रिटिश भूगोलवेत्ता स्मैल्स तथा गिल्बर्ट ने नगर क्षेत्र (Urban field) शब्द का प्रयोग किया लेकिन नगरीय भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अमलैंड और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नगर प्रभाव क्षेत्र को सर्वाधिक मान्यता मिली।

       1970 के बाद नगरीय भूगोलवेत्ताओं द्वारा और मुख्यतः विकासशील देश के भूगोलवेत्ताओं द्वारा नगर प्रदेश शब्द का प्रयोग प्रमुखतया से किया जाता है। यद्यपि ये तीनों शब्द अमलैंड, नगर प्रभाव क्षेत्र, नगर प्रदेश एक ही संदर्भ में उपयोग किए जाते है लेकिन कार्यिक दृष्टि से तथा विधितंत्र के दृष्टि से उनमें अंतर है। अमलैंड शब्द का विकास नगर के कार्यों के प्रभाव पर आधारित है।

       नगरीय प्रभाव क्षेत्र का विकास गुरुत्वाकर्षण मॉडल पर आधारित है। जबकि नगर प्रदेश, नियोजन को ध्यान में रखकर प्रभाव क्षेत्र के बदले विकसित किया गया है। नगर प्रदेश के अंतर्गत न सिर्फ प्रभाव क्षेत्र आते है वरन् नगर को भी सम्मिलित किया जाता है।

सीमांकन की विधि:

          नगरीय प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन की तीन प्रमुख विधियाँ है-

1. अनुभवाश्रित विधि

2. सांख्यिकी विधि

3. सांख्यिकी सह अनुभवाश्रित विधि

                द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व अनुभवाश्रित विधि की प्रधानता थी। इसके अंतर्गत नगर के कार्यों को आधार मानकर प्रमुख क्षेत्र सीमांकित किया जाता था। इस संदर्भ में अमेरिकी भूगोलवेत्ता हैरिस का कार्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने अमेरिकी नगर (Salt Lake city) के अमलैंड का सीमांकन 12 कार्यिक चरों की मदद से किया था।

ये निम्नलिखित थे-

1. थोक व्यापार

2. खुदरा व्यापार

3. रेडियो प्रसारण (Radio Broad casting

4. बस सेवा (Bus service)

5. मंदिर परिसर (Temple Areas)

6. चिकित्सा सेवा (Medical service)

7. धार्मिक सेवा (Religious service)

8. प्रशासनिक सेवा (Administrative service)

9. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

10. शैक्षणिक सेवा (Educational service)

11. फल एवं सब्जी की उपलब्धता (Fruits and vegitables availability to the market)

12. अन्न (Grains)

            इन चरों को आधार मान कर नगर के प्रभाव क्षेत्र की बाहरी सीमा निर्धारित की गई। कई भारतीय भूगोलवेत्ताओं ने भी अनुभवाश्रित विधि का प्रयोग करते हुए भारतीय नगरों का सीमांकन किया है, लेकिन इनका कार्य द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ही संभव हो सका।

        वस्तुतः भारत में नगरीय भूगोल की पढ़ाई द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रारंभ हुई। भारतीय भूगोलवेत्ताओं में R.L. Singh (B.H.U.) प्रथम थे, जिन्होंने 1955 में बनारस नगर का अमलैंड पाँच चरों की मदद से निर्धारित किया था। ये चर निम्नलिखित थे-

1. सब्जी आपूर्ति (Vegitable supply)

2. दूध आपूर्ति (Milk supply)

3. खाद्यान्न आपूर्ति (Grain supply)

4. बस सेवा (Bus service)

5. समाचार पत्र का वितरण (News paper circulation)

                 पुनः डॉ० उजागीर सिंह ने 1961 में KAVAL (A-ALLAHABAD, K-KANPUR, V-VARANASI, A-AGRA, L-LUCKNOW) नगरों के अमलैंड का सीमांकन किया। इसके लिए उन्होंने निम्नलिखित सात चरों का प्रयोग किया।

1. सब्जी आपूर्ति

2. दूध आपूर्ति

3. कॉलेज / विश्वविद्यालय (College service)

4. खाद्यान्न आपूर्ति

5. खुदरा व्यापार

6. थोक व्यापार

7. प्रशासनिक प्रभाव

        आर. एल. सिंह  की तुलना में यह ज्यादा विश्वसनीय कार्य था। यद्यपि इस विधि को व्यापक मान्यता प्राप्त थी लेकिन इसके साथ दो प्रमुख समस्याएँ थी-

         प्रथमत: एक ही नगर के लिए अलग-अलग भूगोलवेताओं द्वारा अलग-अलग प्रभाव क्षेत्र निर्धारित किया जा रहा था। इससे इस प्रकार की अध्ययन की विश्वसनीयता में कमी आती थी।

        इसकी दूसरी समस्या यह थी कि कई नगर कुछ कार्यों को व्यापक स्तर पर करते थे जबकि सही अर्थों में इसका प्रभाव क्षेत्र उतना वृहद और व्यापक नहीं होता है। वस्तुतः डॉ० बी० एल० सिंह ने इसी आलोचना को ध्यान में रखकर बनारस के धार्मिक कार्यों को आधार नहीं माना था।

      अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के प्रभाव में नगरीय भूगोलवेताओं ने गुरुत्वाकर्षण मॉडल का प्रयोग करते हुए नगर के प्रभाव क्षेत्र को सीमांकित करने का कार्य प्रारंभ किया।

       इस विधि के अंतर्गत यह माना गया कि नगर की जनसंख्या द्रव्यमान अथवा पिंड के समान है। जो भी पिंड जितना ही बड़ा होगा उसका गुरुत्वाकर्षण उतना ही अधिक होगा। नॉर्दन ने इस अवधारणा को विकसित किया कि नगर की जनसंख्या गुरुत्वाकर्षण का कार्य करती है।

      दूसरे नगरों  के द्रव्यमान के संदर्भ में बड़े नगरीय प्रभाव क्षेत्र सीमांकित किया जा सकता है। रेली महोदय ने संशोधित गुरुत्वाकर्षण सूत्र विकसित किया जिसे भूगोलवेताओं ने व्यापक मान्यता दी। यह मॉडल इस प्रकार है-

P = MA X MB/d2

P = Point of Break सीमा 

MA= द्रव्यमान >MB

MB= द्रव्यमान <MA

d = दो द्रव्यमानों के बीच की दुरी 

           इस विधि को अपनाने से सीमांकित किये गये नगरीय क्षेत्र की उपयोगिता में वृद्धि होती है। नगर और प्रादेशिक नियोजकों द्वारा इसका प्रयोग किया जाने लगा। प्रसिद्ध भूगोलवेता प्रकाश राव का अनुसरण करते हुए एल०एन०सेन ने कर्नाटक के रायचूर जिला के केन्द्रीय बस्तियों का प्रमुख क्षेत्र के सीमांकन हेतु दिए गये सांख्यिकी विधि का प्रयोग किया था। जिसका सूत्र इस प्रकार है- 

 R = √T x A/U

R = Radius

T = Population of Town 

U = Total population of of the region

A =  Area of the region

            इसी विधि का प्रयोग प्रो० एल० ए० भट्ट ने भी हरियाणा के करनाल जिला के प्रभाव क्षेत्र के सीमांकन के लिए किया। लेकिन विकासशील देशों में डिकिंसन, हैगिस, और हैगेट द्वारा प्रदेश शब्द को 1970 के बाद अधिक मान्यता मिली है। नगर प्रदेश का सीमांकन मात्रात्मक सह अनुभवाश्रित विधि पर आधारित है।

         दूसरे शब्दों में यह विधि प्रदेश के लोगों के व्यवहार  तथा परिवहन साधनों के विकास को ध्यान में रखते हुए सांख्यिकी विधि द्वारा विकसित सीमाओं में आवश्यक संशोधन करता है। भारत में राष्ट्रीय राजधानी प्रदेश का सीमांकन इसी विधि पर आधारित है।

       प्रथमतः गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर सीमा निर्धारण के बाद कई चरों की मदद से उसमें आवश्यक संशोधित किया गया। वस्तुतः इस कार्य के लिए 8 चरों का प्रयोग किया गया। ये निम्नलिखित थे-

1. 1961 की जनगणना के अनुसार न्यूनतम जनसंख्या घनत्व 250 व्यक्ति वर्ग किमी०।

2. 1951-61 के दशक के न्यूनतम जनसंख्या वृद्धि दर 20%

3. कम-से-कम 30% कार्यिक जनसंख्या गैर-कृषि कार्यों में लगी हो।

4. वे सभी गाँव जो दिल्ली को प्रतिदिन दूध की आपूर्ति करते हैं।

5. वे सभी गांव जो दिल्ली के लिए प्रतिदिन ताजे सब्जी आपूर्ति करते हैं (1967)।

6. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 1000 व्यक्ति बस द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

7.  वे सभी बस्तियाँ जहाँ से कम-से-कम 250 व्यक्ति रेल द्वारा दिल्ली नगर आते है (1966)।

8. वे सभी बस्तियाँ जहाँ से प्रतिदिन कम-से-कम 75 कॉल दिल्ली नगर आता है (1966)।

           इन चरों की मदद से गुरूत्वाकर्षण विधि द्वारा अपनाए गए सीमाओं में संशोधन किए गए। सामान्यतः यह पाया गया कि रेलमार्ग और सड़कमार्ग के किनारे प्रभाव क्षेत्र अधिक दूरी तक अवस्थित है। कुल मिलाकर इसके प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 30242 वर्ग किमी० क्षेत्र आए। दिल्ली नगर से औसत दूरी 115 किमी० हुई और इस प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 1981 की जनगणना के अनुसार दिल्ली के अतिरिक्त अन्य नगरीय बस्तियाँ और करीब 2000 ग्रामीण बस्तियाँ आई।

        फरीदाबाद, गुड़गांव, रोहतक, महेन्द्रनगर, सोनीपत और बहादुरगढ़ जैसी हरियाणा की बस्तियाँ इसके प्रभाव क्षेत्र में आई। राजस्थान का अलवर और यू०पी० का गाजियाबाद, बुंदेलखंड, मेरठ, हापुड़, मोदीनगर और दादर जैसी नगरीय बस्तियाँ इसके प्रभाव  में आये।

          दिल्ली नगर प्रदेश के सीमांकन से यह एक नियोजन प्रदेश के रूप में मान्यता पा चुका है। भारत के सभी महानगरों के लिए इस प्रकार का नगर प्रदेश सीमांकन और नियोजन की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों के अधिकतर महानगरों के लिए भी यह प्रक्रिया अपनाई गई है। वस्तुतः वर्तमान समय में विकसित देशों में नगर प्रभाव क्षेत्र और विकासशील देशों में नगर प्रदेश शब्द को अधिक मान्यता प्राप्त है।

विशेषताएँ:

      भौगोलिक विशेषताओं की दृष्टि से नगर प्रभाव क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं-

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र (प्राथमिक अमलैंड)

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र (द्वितीयक अमलैंड)

1. आंतरिक प्रभाव क्षेत्र:-

        आंतरिक प्रभाव क्षेत्र को प्राथमिक अमलैंड और बाह्य प्रभाव क्षेत्र को द्वितीयक अमलैंड कहा गया है। आंतरिक प्रभाव क्षेत्र वह है जो मुख्य नगर से सतत् संबंध रखता है। यह नगर के तत्काल बाहर ग्रामीण क्षेत्र में नगरीय, उपनगरीय अथवा लगभग नगरीय भूदृश्य उत्पन्न करता है। अधिकतर भूगोलवेत्ताओं ने इसी प्रदेश को ग्रामीण-नगरीय उपांत कहा है।

      नियमतः यह ग्रामीण क्षेत्र है लेकिन व्यवहारिक तौर पर यह नगरीय क्षेत्र होता है। सामान्यतः इसके आकार तारे के समान होते हैं। नगर के बाहर निकलती हुई सड़को के दोनों तरफ निर्मित क्षेत्र ही ग्रामीण-नगरीय उपांत का निर्माण करते है।

       ग्रामीण-नगरीय उपांत का विकास मुख्यतः नगर में बढ़ते जनसंख्या दबाव का परिणाम होता है। जब नगरीय पारिस्थैतिकी असंतुलित होने लगती है तो नगर की सीमा के बाहर निर्मित क्षेत्र विकसित होने लगते है। इसमें मुख्यतः दो प्रकार के निर्मित क्षेत्र होते है-

1. उच्च आय वर्ग का क्षेत्र- उच्च आय वर्ग के लोग नगर के बहर आकर बस जाते है।  

2. उन कार्यों का विकास होता है जिसको अधिक भूमि चाहिए नगर में मूल्य अधिक होने के कारण वह कार्य नहीं होता है जैसे विश्वविद्यालय का निर्माण, प्रशानिक कार्य, औधोगिक संकुल का विकास इत्यादि। 

लेकिन विकासशील देशों में और मुख्यतः भारत में ग्रामीण-नगरीय उपांत के अंतर्गत दो अन्य निर्मित क्षेत्र होते है-

(i) उपस्तरीय अधिवासीय मकान- कम आय के वर्ग के लोग भी नगर के बाहरी क्षेत्र में भूमि खरीद कर किसी प्रकार मकान बनाते है।इसमें नगरीय विकास के नियमों के पालन नहीं होता है। अत: यह प्रारम्भ से ही देखने से मलिन बस्ती जैसा लगता है।  

(ii) नवीन निर्मित क्षेत्रों के मध्य पुराने गावों का होना कम आय वर्ग के लोगों का दबाव, नगरीय निर्मित क्षेत्र के अंतर्गत आने पर तेजी से बढ़ने लगता है। इसका परिणाम यह होता है कि उसके ग्रामीण पारिस्थैतिकी भी समाप्त हो जाते हैं और वे नगर बनने के पूर्व ही मलिन बस्ती बन जाते हैं।

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रूप से किया है और पश्चिमी देशों के संदर्भ में R.F. Pahl का कार्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने ग्रामीण-नगरीय उपांत की चार प्रमुख विशेषताएँ बताई है-

1. विलगाव

2. चयनित जनसंख्या का आगमन और

3. अभिगमन लोग प्रतिदिन मुख्य नगर जाते है और शाम को लौट आते है। परिणाम यह होता है कि दिन के समय जनसंख्या घनत्व कम होता है तथा रात्रि में जनसंख्या घनत्व अधिक हो जाता है।

4. भूमि का मिश्रित उपयोग- H.M. Mayor ने अमेरिकी नगरों के संबंध में बताया है कि ग्रामीण नगरीय उपांत एक संक्रमण क्षेत्र होता है जहां नगरीय भू-उपयोग में लगातार वृद्धि होती रहती है और उसी अनुपात में ग्रामीण भू-उपयोग में कमी आती है। उन्होंने यह भी लगा कि यहाँ भूमि के मूल्य में लगातार वृद्धि होती है।

       J.N.U. के प्रो० सुदेश नागिया ने 1976 में दिल्ली महानगर के ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र का अध्ययन करते हुए इनकी निम्नलिखित छ: विशेषताएँ बताई है-

1. मलिन बस्तियाँ (Slums)

2. मिश्रित भू-उपयोग

3. कृषि भूमि में लगातार कमी आती है

4. नगरीय सुविधाओं का अभाव

5. बिखरे हुए निर्मित क्षेत्र

6. सांस्कृतिक मिश्रण का क्षेत्र (ग्रामीण-नगरीय संस्कृति के मिश्रण का क्षेत्र)

         ग्रामीण-नगरीय उपांत की ये विशेषताएँ विकासशील देशों के प्रायः सभी महानगरों में पाई जाती है।

निर्मित क्षेत्र और कार्यिक दृष्टि से ये नगर के अंग होते है प्रारम्भ में इसे नगर नियोजन के अंतर्गत सम्मिलित नहीं किया गया था लेकिन वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन  के अंतर्गगत इन प्रदेशों के भी नियोजित विकास को प्राथमिकता दी गई है। 

2. बाह्य प्रभाव क्षेत्र-

        बाह्य प्रभाव क्षेत्र मूलत: ग्रामीण क्षेत्र होता है। यह वही क्षेत्र होता है जहाँ रहने वाले लोग कुछ ही कार्यों के लिए केंद्रीय नगर पर निर्भर करता है। ऐसे कार्यों में प्रशासन, उच्च शिक्षा, थोक व्यापार, उच्च स्तरीय चिकित्सा सुविधा, समाचार पत्र, इत्यादि प्रमुख है।

          अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन क्षेत्रों के लोग स्थानीय बाज़ार में जाते है। वहाँ पदानुक्रमिक केन्द्रीय बस्तियों के अपने प्रभाव क्षेत्र होते है। लेकिन वे छोटे नगरीय बस्ती भी मुख्य नगरीय बस्ती पर अपने कार्यों के लिए निर्भर करता है। जैसे गौण नगरीय बस्तियाँ खुदरा व्यापार का कार्य करती है। उनका थोक व्यापार मुख्य केन्द्रीय बस्ती पर निर्भर करता है।

         वर्तमान समय में नगर प्रदेश नियोजन नीति के अंतर्गत इन प्रदेशों में भी  नगरीय सुविधाओं को विकसित कर ग्रामीण आवास की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। विकासशील देशों में बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण का कारण होता है।

     दिल्ली नगर पर बाह्य नगर प्रभाव क्षेत्र की जनसंख्या का सर्वाधिक दबाव था लेकिन वर्तमान समय में राजधानी नियोजन प्रदेश के अंतर्गत बाह्य क्षेत्रों में द्वितीयक और तृतीयक कार्यों का विकास किया जा रहा है। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप ग्रामीण-नगरीय स्थानांतरण प्रवृत्ति में कमी आई है। वास्तविकता यह है कि पिछले वर्षों के अंतर्गत दिल्ली महानगर में जनसंख्या का स्थानांतरण नगर प्रभाव क्षेत्र से कहीं अधिक अंतर प्रादेशिक प्रक्रियाओं से हुआ है।

निष्कर्ष:-

       ऊपर के तथ्यों और विश्लेषणों से स्पष्ट है कि अगर प्रभाव क्षेत्र का अध्ययन न सिर्फ भौगोलिक परिपेक्ष्य में आवश्यक है वरन् यह प्रादेशिक नियोजन के संदर्भ में भी आवश्यक है। अधिकतर विकासशील देशों में नगर आधारित प्रादेशिक नियोजन की नीति अपनाई गई है और उस कार्य में नगर प्रभाव क्षेत्र / नगर प्रदेश का सीमांकन अनिवार्य है।


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नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020

नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020



नई शिक्षा नीति में शिक्षा का विजन @ 2020⇒

परिचय

         नई शिक्षा नीति 2020 के तहत शिक्षा दृष्टि और प्रतिमान पर केंद्रित है जो भारत की संपूर्ण शिक्षा प्रणाली के पुनर्निर्माण, पुनर्गठन और पुनर्रचना का वादा करता है। इसका उद्देश्य प्राचीन शिक्षा प्रणाली और आधुनिक शिक्षा प्रणाली के जुड़वां मैट्रिक्स के बीच की खाई को पाटना है।

      यह एक ओर अपनी प्राचीन परंपरा में गहराई से निहित है और दूसरी ओर युवा पीढ़ी को एकीकृत शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, जहां मन, शरीर और आत्मा सभी एकजुट हो जाते हैं ताकि 21वीं सदी की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया जा सके। 

       “शिक्षा पूर्ण होने के लिए मानवीय होनी चाहिए, इसमें न केवल बुद्धि का प्रशिक्षण बल्कि हृदय का शोधन और आत्मा का अनुशासन शामिल होना चाहिए। किसी भी शिक्षा को पूर्ण नहीं माना जा सकता है यदि वह दिल और आत्मा की उपेक्षा करती है।” – डॉ० एस० राधाकृष्णन

        एक देश की शिक्षा एक व्यक्ति और एक राष्ट्र के मानसिक विकास में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा जड़ से अलग नहीं होती है बल्कि मूल पर फिर से विचार करने और राष्ट्र के भविष्य को फिर से बनाने के लिए आगे बढ़ने के लक्ष्यों का प्रसार करती है। शिक्षा का पहिया भौतिकवाद की परिधि पर नहीं बल्कि उससे परे कुछ घूमता है।

      शिक्षा का उद्देश्य सपना पैदा करना और उसे हासिल करना है और इसके बिना राष्ट्र निर्माण की कल्पना नहीं की जा सकती है। इसलिए, शिक्षा समाज के हर वर्ग के लिए पूरा किया जाने वाला प्राथमिक लक्ष्य बन गया है और इस संबंध में, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली की जड़ पर फिर से विचार करके राष्ट्र की भावी पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिए रोड मैप प्रदान करती है।

         प्राचीन भारतीय संस्कृति अपनी विरासत में बहुत समृद्ध है चाहे हम बौद्धिकता, आध्यात्मिकता, प्रबंधन, राजनीति, संस्कृति, परंपरा या शिक्षा पर ध्यान दें। भौतिकवादी जीवन के झोंके में हमारी पीढ़ी ऐसे जालों में उलझी हुई है कि उनकी आंखों के सामने धुंध के सिवा कुछ नहीं है। अब समय आ गया है कि हम अपनी दृष्टि को सत्य करें और पुराने को बदलें।

      अल्फ्रेड लॉर्ड टेनीसन के अनुसार, “पुराना आदेश नए को स्थान देता है, और ईश्वर कई तरह से खुद को पूरा करता है, कहीं ऐसा न हो कि एक अच्छी प्रथा दुनिया को दूषित कर दे।” इस संबंध में, नई शिक्षा नीति @ 2020 का रास्ता बनाती है। उपनिवेशवादियों की सदियों पुरानी थोपी गई शिक्षा नीति से प्रचलित शिक्षा व्यवस्था को मुक्त करना।

        भारतीय शिक्षा प्रणाली प्राचीन काल से चली आ रही है जब छोटे बच्चों को गुरुकुलों के प्राकृतिक परिवेश में पढ़ाया जाता था। छात्रों की आवश्यकता, क्षमता और रुचि के अनुसार गुरु उन्हें ज्ञान प्रदान करते थे और उन्हें संस्कृत से लेकर पवित्र शास्त्रों, साहित्य से लेकर विज्ञान और गणित से लेकर तत्वमीमांसा तक विभिन्न विषयों में प्रशिक्षित करते थे। यह माना जाता था कि शिक्षा ही एकमात्र तरीका है जो मनुष्य को ब्रह्मांड की अन्य प्रजातियों से अलग करती है। यह वह साधन था जिसके द्वारा गुरु अपने शिष्यों में वैसुधैव कुटुम्बकम (पूरी दुनिया एक परिवार है) के पवित्र विचार की कल्पना करने के लिए ज्ञान को सशक्त करते हैं।

      प्रमुख जोर इस बात पर दिया गया कि व्यक्ति का विकास ही राष्ट्र का विकास है। इसका मतलब है कि वृद्धि के बीज एक व्यक्ति के चरित्र में निहित हैं, जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था, “सभी ज्ञान का अंत चरित्र निर्माण होना चाहिए।”

        इस प्रकार हमारी प्राचीन शिक्षा प्रणाली व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और मानसिक विस्तार पर ध्यान केंद्रित करती है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को बौद्धिकता और आध्यात्मिकता के रत्नों से अलंकृत करना और चरित्र को निर्भीक और रचनात्मक ऊर्जा के स्पंदन से परिपूर्ण बनाना था। जैसे-जैसे गुरु-शिष्य प्रणाली पर समय का पहिया घूमता गया, वैसे-वैसे नालंदा, तक्षशिला, मनसा, उज्जैन और विक्रमशिला आदि जैसे विश्वविद्यालयों का उदय हुआ और उस समय की भारतीय शिक्षा प्रणाली को विश्वविख्यात किया।

       एक समय भारत विदेशी राष्ट्रीयताओं के छात्रों के लिए भी ज्ञान और ज्ञान का पालना बन गया था। यद्यपि यह सदाबहार ज्ञान वृक्ष समय के साथ-साथ आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों द्वारा समान रूप से बिगाड़ा गया और नष्ट हो गया। हालाँकि, वे गुरुकुलों और आश्रमों के माध्यम से ज्ञान प्रदान करने की प्राचीन भारतीय प्रणाली की भावना को उखाड़ने में विफल रहे। नई शिक्षा नीति में शिक्षाआधुनिक शिक्षा प्रणाली

      मैकाले के एजेंडा(1835) का नाम लॉर्ड थॉमस बबिंगटन मैकाले के भारत में अंग्रेजी भाषा को बढ़ावा देने के प्रसिद्ध प्रस्ताव के नाम पर रखा गया है। उन्होंने प्रस्तावित किया कि भारत में औपनिवेशिक स्कूलों में अरबी, संस्कृत और फारसी के बजाय अंग्रेजी पढ़ाई जानी चाहिए।

     लॉर्ड मैकाले को भारत में ब्रिटिश या आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है, जिसने शिक्षा के पूर्ववर्ती गुरुकुल और आश्रम प्रणाली में जबरदस्त बदलाव लाए। इन एजेंडों का पहला उद्देश्य ब्रिटिश शासकों और उनके द्वारा शासित लाखों भारतीयों के बीच द्विभाषियों का एक वर्ग बनाना था।  दूसरा उद्देश्य व्यक्तियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो खून और रंग में भारतीय लेकिन मत, नैतिकता और बुद्धि में ब्रिटिश हो।

        भारत में आधुनिक स्कूली शिक्षा प्रणाली मूल रूप से इसी प्रस्ताव द्वारा लाई गई थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835) को लागू किया जो लॉर्ड मैकाले द्वारा प्रस्तावित एजेंडों पर आधारित था। उत्तर प्रदेश हाई स्कूल और इंटरमीडिएट शिक्षा बोर्ड 1921 में भारत में स्थापित होने वाला पहला बोर्ड बन गया। हाई स्कूल और इंटरमीडिएट शिक्षा बोर्ड, राजपुताना 1929 में स्थापित होने वाली कतार में दूसरा बन गया।

         स्वतंत्रता के बाद 1952 में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की स्थापना की गई थी। यह भारत का पहला राष्ट्रीय स्तर का शिक्षा बोर्ड था।

       इसी तरह उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1818 में सेरामपुर कॉलेज की स्थापना की गई थी और भी कई लोग कतार में आए। जैसे- 1847 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की, 1857 में मुंबई विश्वविद्यालय, 1857 में मद्रास विश्वविद्यालय, 1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय, 1875 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय, 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, 1921 में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, 1922 में दिल्ली विश्वविद्यालय और कई अन्य लोगों को विभिन्न धाराओं में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए युवा भारतीयों को प्रोत्साहित करने और प्रेरित करने के लिए विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई थी।

भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली

       भारत सरकार 1947 से भारत में साक्षरता दर में सुधार पर हमेशा ध्यान केंद्रित कर रही है। भारतीय संविधान के विभिन्न लेखों के तहत 5 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया है। शिक्षा प्रदान करने के विभिन्न तरीके अब उपलब्ध हैं, जैसे कि सरकारी स्कूल, सरकार द्वारा जोड़े गए निजी स्कूल, निजी स्कूल, अंतर्राष्ट्रीय स्कूल, आदि।

     शैक्षिक सांख्यिकीय वार्षिकी 2019 के अनुसार, लगभग 15,22,346 मान्यता प्राप्त प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय हैं। भारत में लगभग 1000 विश्वविद्यालय और 52,627 कॉलेज भी हैं जो भारत में उच्च शिक्षा की मांग को पूरा करते हैं। हालाँकि, सभी निजी स्कूल और कॉलेज भारत सरकार द्वारा इस आधार पर शासित होते हैं कि वे क्या पढ़ा सकते हैं और अन्य पहलुओं के साथ-साथ वे किस रूप में काम कर सकते हैं।

नई शिक्षा नीति में शिक्षा के विभिन्न स्तर और संरचनाएँ

       वर्तमान में, भारत में वर्तमान शिक्षा प्रणाली के केंद्रीय बोर्ड और अधिकांश राज्य बोर्ड विभिन्न स्कूल स्तरों पर शिक्षा के 10+2 ढांचे का समान रूप से पालन करते हैं। इसके बाद विश्वविद्यालय स्तर पर स्नातक और आगे की उच्च शिक्षा होती है। शिक्षा को निम्न स्तरों में विभाजित किया गया है:-

क्रम संख्या  शिक्षा के विभिन्न स्तरें सम्बंधित वर्ग 
1.
पूर्व प्राथमिक शिक्षा
1. प्री नर्सरी

2. नर्सरी

3. एलकेजी

4. यूकेजी

2.
प्राथमिक शिक्षा
⇒प्राथमिक शिक्षा के 
दो भाग हैं:-
1.  निम्न प्राथमिक (कक्षा I से IV तक) 

2. उच्च प्राथमिक (कक्षा V से VIII तक)

3.
माध्यमिक शिक्षा
1. कक्षा IX से X तक
4.
उच्च माध्यमिक शिक्षा
1. कक्षा XI से XII तक
5.
उच्च शिक्षा
1. स्नातक या स्नातक स्तर  के तहत 

2. पोस्ट ग्रेजुएट या मास्टर स्तर

3. डॉक्टरेट या पीएचडी स्तर

4. व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण

5. डिप्लोमा कार्यक्रम

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और इसका विकास

      1947 के बाद से भारत सरकार साक्षरता दर बढ़ाने और अपने नागरिकों को शिक्षा के साथ सशक्त बनाने के लिए विभिन्न पहलों के साथ आगे आई। इस संबंध में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, उच्च शिक्षा विभाग, शिक्षा मंत्रालय और भारत सरकार द्वारा यूजीसी अधिनियम 1956 के अनुसार एक सांविधिक निकाय स्थापित किया गया था, जिसका उद्देश्य उच्च शिक्षा के मानकों का समन्वय, निर्धारण और रख रखाव करना था।

      1961 में भारत सरकार ने विभिन्न स्कूल स्तरों पर शिक्षा नीतियों को बनाने और लागू करने के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) का गठन किया। राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-1966), जिसे लोकप्रिय रूप से कोठारी आयोग के नाम से जाना जाता है। यह भारत में शैक्षिक क्षेत्र के सभी पहलुओं की जांच करने, शिक्षा के एक सामान्य पैटर्न को विकसित करने और दिशा-निर्देशों की सलाह देने के लिए भारत सरकार द्वारा स्थापित एक तदर्थ आयोग था।

       भारत में शिक्षा के विकास के लिए 1968 में सरकार द्वारा पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) की घोषणा की गई थी। 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई थी जिसे 1992 में भारत सरकार द्वारा संशोधित किया गया था। 29 जुलाई 2020 को भारत सरकार ने तीसरी मंजूरी दिया जो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने पिछले  राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE 1986) की जगह ली।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020

       29 जुलाई, 2020 को माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणा की जिसमें 2040 तक भारतीय शिक्षा प्रणाली को बदलने की दृष्टि है। 34 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद एनईपी 2020 वृद्धिशील सुधार के बजाय शैक्षिक क्षेत्र में एक व्यवस्थित सुधार का वादा और आशा लेकर आया है।

      माननीय केंद्रीय मंत्री श्री जितेंद्र सिंह के अनुसार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का दोहरा उद्देश्य पिछली विसंगतियों को ठीक करना और वर्तमान वैश्विक रुझानों को ध्यान में रखते हुए समकालीन प्रावधानों को पेश करना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मुख्य फोकस 2020 शिक्षा के निम्नलिखित स्तंभों पर है:-

1. सामर्थ्य

2. अभिगम्यता

3. गुणवत्ता

4. इक्विटी

5. जवाबदेही – निरंतर सीखने को सुनिश्चित करने के लिए

     एनईपी 2020 भारत की 21वीं सदी की युवा पीढ़ी की चुनौतियों और जरूरतों से निपटने के लिए सबसे उपयुक्त समाधान है। एनईपी 2020 वर्तमान शैक्षिक ढांचे में पूर्ण सुधार और एक नई शिक्षा प्रणाली बनाने का प्रस्ताव करता है जो 21वीं सदी की शिक्षा के आकांक्षी उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद कर सकता है और भारतीय संस्कृति, परंपरा, शिक्षा और विरासत पर यूरोपीय प्रभाव का उत्तर प्रदान कर सकता है।

     पहले चरण में, NEP 2020 ने शिक्षा मंत्रालय के रूप में मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदल दिया ताकि शिक्षा और सीखने पर मुख्य ध्यान बहाल किया जा सके। यदि इसे लागू किया जाएगा और योजना के अनुसार पालन किया जाएगा तो नए मानदंड न केवल नियामक बाधाओं को कम करेंगे बल्कि शैक्षणिक संस्थानों को और अधिक स्वायत्तता को बढ़ावा देंगे और छात्रों को लाभान्वित करेंगे।

एनईपी 2020 के मुख्य उद्देश्य

      राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली के समान भारत-केंद्रित/पूर्वी शिक्षा प्रणाली को वापस लाने की कल्पना करती है जो सभी को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करती है। इसका उद्देश्य भारत की सतत शिक्षा को दुनिया में एक समान, जीवंत और सर्व-समावेशी ज्ञान प्रणाली में बदलना है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है।

      सरकार आजादी के बाद से जाति, पंथ, नस्ल, लिंग, रंग और समुदाय के बावजूद सभी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करती है। इस संबंध में एनईपी 2020 आधुनिक और प्राचीन ज्ञान प्रणालियों के बीच की खाई को पाटने के लिए भारतीय शिक्षा प्रणाली में कई महत्वपूर्ण बदलावों का मार्ग प्रशस्त करता है। NEP 2020 के परिवर्तन, सुधार और उद्देश्य इस प्रकार हैं:

➤ प्रत्येक छात्र की जरूरतों और रुचि को पहचानें और मजबूत करें,

➤ समग्र विकास,

➤ मूलभूत साक्षरता और अंकज्ञान,

➤ शिक्षार्थियों के लिए लचीलापन,

➤ हानिकारक पदानुक्रम को हटा दें,

➤ बहु अनुशासन वाली पहुँच,

➤ बहुभाषावाद को बढ़ावा देना,

➤ जीवन कौशल को बढ़ावा देना,

➤ नियमित रचनात्मक आकलन,

➤ पूर्ण इक्विटी और समावेशन,

➤ सीखने की प्रक्रिया के केंद्र के रूप में शिक्षक और संकाय,

➤ अखंडता, पारदर्शिता और संसाधन दक्षता को बढ़ावा देना,

➤ स्वायत्तता, सुशासन और अधिकारिता के माध्यम से नवाचार और लिंक से हटकर विचारों को प्रोत्साहित करना।

एनईपी 2020 के तहत स्कूलों में प्रमुख सुधार

➤ वर्तमान ’10+2′ संरचना को ‘5+3+3+4’ के एक नए शैक्षणिक और पाठ्यचर्या संरचना द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना है।

➤  हर साल वार्षिक परीक्षाओं का कोई प्रावधान नहीं, छात्र अब केवल कक्षा 3, 5 और 8 में परीक्षा देंगे।

➤ कक्षा 10 और 12 की बोर्ड परीक्षाएं आयोजित की जाएंगी लेकिन छात्रों को साल में दो बार परीक्षा देने की अनुमति देकर परीक्षा को आसान बनाया जाएगा। परीक्षा में दो भाग होंगे, वस्तुनिष्ठ और वर्णनात्मक।

➤ सभी सार्वजनिक और निजी स्कूलों में सीखने के सार्वभौमिक मानक और नियम।

➤ कक्षा 6 से व्यावसायिक शिक्षा और कोडिंग का परिचय।

➤ शिक्षा का माध्यम कम से कम कक्षा 5 तक और अधिमानतः कक्षा 8 तक मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा होनी चाहिए।

➤ केवल अंकों और ग्रेड के बजाय छात्रों के कौशल और क्षमताओं पर एक व्यापक रिपोर्ट के आधार पर एक 360-डिग्री समग्र प्रगति कार्ड।

➤ पाठ्यक्रम की मूल अवधारणाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करता है।

➤ अर्ली चाइल्डहुड केयर एजुकेशन (ईसीसीई) से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा का सार्वभौमीकरण।

➤ 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) प्राप्त करना।

➤ प्रारंभिक बचपन के शिक्षकों (ईसीई), स्कूलों, शिक्षकों और वयस्क छात्रों के लिए नई राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तावित है।

➤ स्कूल न जाने वाले बच्चों’ को शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए ओपन स्कूलिंग सिस्टम।

➤ छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार और देखभाल के लिए परामर्शदाताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की तैनाती।

➤ मध्याह्न भोजन योजना में नाश्ता भी शामिल किया जाएगा।

एनईपी 2020 के तहत उच्च शिक्षा में प्रमुख सुधार

➤ विभिन्न प्रकार के प्रमाणपत्रों और डिग्री के साथ 4 साल की पाठ्यक्रम अवधि के दौरान कई निकास विकल्पों के साथ स्नातक स्तर पर समग्र और बहु-विषयक शिक्षा।

➤ एम.फिल. (मास्टर ऑफ फिलॉसफी) पाठ्यक्रम बंद किए जाएं।

➤ पीजी प्रोग्राम 1 या 2 साल के लिए हो सकते हैं।

➤ जेईई मेन और एनईईटी के अलावा देश भर के विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए प्रवेश परीक्षा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित की जाएगी।

➤ क्रेडिट हस्तांतरण की सुविधा के लिए अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की स्थापना की जाएगी।

➤ वैश्विक मानकों के सर्वश्रेष्ठ बहु-विषयक शिक्षा के मॉडल प्रदान करने के लिए, बहु-विषयक शिक्षा और अनुसंधान विश्वविद्यालयों (एमईआरयू) की स्थापना की जाएगी।

➤ एक मजबूत अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देने और उच्च शिक्षा में अनुसंधान क्षमता के निर्माण के लिए नेशनल रिसर्च फाउंडेशन नामक एक शीर्ष निकाय की स्थापना की जाएगी।

➤ निजी और सार्वजनिक संस्थानों के लिए नियमों, मान्यता और शैक्षणिक मानकों का एक ही सेट तैयार करके उच्च शिक्षा को विनियमित करने के लिए भारतीय उच्च शिक्षा परिषद (एचईसीआई) की स्थापना की जाएगी। एचईसीआई के चार स्वतंत्र कार्यक्षेत्र होंगे, अर्थात्-

1. चिकित्सा और कानूनी शिक्षा को छोड़कर, उच्च शिक्षा के नियमन के लिए राष्ट्रीय उच्च शिक्षा नियामक परिषद (एनएचईआरसी)।

2. मानक तय करने के लिए सामान्य शिक्षा परिषद (जीईसी)।

3. कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के वित्त पोषण और वित्तपोषण के लिए उच्च शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी)।

4. मान्यता के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी)।

➤ एचईसीआई मौजूदा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की जगह लेगा।

➤ 15 वर्षों की अवधि में विश्वविद्यालय स्तर पर ‘संबद्धता प्रणाली’ को समाप्त करना।

➤ 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को मौजूदा 26.3% से बढ़ाकर 50% करना।

➤ 2040 तक उच्च शिक्षा में 3.5 करोड़ से अधिक सीटें जोड़ना।

➤ उच्च शिक्षा संस्थानों को पूर्ण रूप से ऑनलाइन पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति के साथ ऑनलाइन शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है और ऑनलाइन सामग्री की सीमा को बढ़ाकर 40% कर दिया गया है।

एनईपी 2020 के तहत शिक्षक शिक्षा में प्रमुख सुधार

➤ शिक्षकों के लिए न्यूनतम योग्यता 4 वर्षीय एकीकृत बी.एड. होगी, 2023 तक डिग्री।

➤ शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को मजबूत करने और पारदर्शिता बनाए रखने पर अधिक जोर।

➤ एनसीटीई द्वारा शिक्षक शिक्षा के लिए एक नई और व्यापक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (एनसीएफटीई) 2021 तैयार की जाएगी।

➤ एनसीटीई शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (एनपीएसटी) 2022 तैयार करेगा।

अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य

➤ राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की स्थापना।

➤ भारत के वंचित क्षेत्रों में कम प्रतिनिधित्व वाले समूहों के बीच शिक्षा में सुधार के लिए विशेष शिक्षा क्षेत्र (एसईजेड) की स्थापना।

➤ महिलाओं और ट्रांसजेंडर बच्चों के लिए समान शिक्षा में सुधार और प्रदान करने के लिए लिंग समावेशन कोष।

➤ छात्रों और शिक्षकों के बीच समान रूप से शिक्षा में प्रौद्योगिकी के उपयोग पर विचारों के मुक्त आदान-प्रदान की सुविधा के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (एनईटीएफ) की स्थापना।

➤ राष्ट्रीय मूल्यांकन केंद्र- ‘पारख‘ छात्र के समग्र विकास का आकलन करेगा।

➤ राष्ट्रीय संग्रह में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों की समझ को बढ़ावा देने के लिए भारतीय अनुवाद और व्याख्या संस्थान और पाली, फारसी और प्राकृत के लिए राष्ट्रीय संस्थान/संस्थान जैसे नए भाषा संस्थानों की स्थापना।

➤ सलाह के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की स्थापना, राष्ट्रीय पुस्तक संवर्धन नीति, मूलभूत साक्षरता और संख्यात्मकता पर राष्ट्रीय मिशन।

➤ धन की अनुपलब्धता के मुद्दों से निपटने के लिए जल्द से जल्द सकल घरेलू उत्पाद के वर्तमान 4.6% से 6% तक शिक्षा व्यय को बढ़ाना।

➤ भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए शिक्षा के विभिन्न डिजिटल प्लेटफार्मों को बढ़ावा देकर शिक्षा योजना, शिक्षण, सीखने और मूल्यांकन में प्रौद्योगिकी का व्यापक उपयोग।

एनईपी 2020 का कार्यान्वयन: संभावनाएं और सीमाएँ            

          विश्वविद्यालय स्तर पर उच्च शिक्षा के संबंध में एनईपी (2020) एक लचीले पाठ्यक्रम के साथ व्यापक, बहु-विषयक, समग्र स्नातक शिक्षा की परिकल्पना करता है। यह विषयों का रचनात्मक संयोजन, व्यावसायिक शिक्षा का एकीकरण और उचित प्रमाणन के साथ कई प्रविष्टि और निकास बिंदु पर आधारित है। यह सतत विकास की दृष्टि और शिक्षा के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को एक वास्तविकता बना देगा।

      संयुक्त राज्य अमेरिका की 1987 की ब्रंटलैंड आयोग की रिपोर्ट में सतत विकास को “ऐसा विकास जो भविष्य की पीढ़ियों की अपनी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बिना वर्तमान की जरूरतों को पूरा करता है” के रूप में वर्णित किया गया है।

       इस परिभाषा के आलोक में एनईपी 2020 शैक्षणिक प्रतिमानों के लक्ष्यों को पूरा करता है और एक प्राच्य स्पर्श के साथ शिक्षा के वैश्विक मानक प्रदान करता है। भारत के राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद के अनुसार- “उच्च शिक्षा संस्थानों पर भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। इन संस्थानों द्वारा बेंचमार्क के रूप में निर्धारित गुणवत्ता मानकों का अन्य संस्थानों द्वारा पालन किया जाएगा।

       नई शिक्षा नीति के मूल सिद्धांतों में छात्रों के बीच तार्किक निर्णय लेने, नवाचार और एकीकृत शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए रचनात्मकता और महत्वपूर्ण सोच को शामिल करना शामिल है। उन्होंने आगे कहा कि “एनईपी महत्वपूर्ण सोच और जांच की भावना को प्रोत्साहित करना चाहता है।

      नीति के प्रभावी कार्यान्वयन से तक्षशिला और नालंदा के समय के दौरान शिक्षा के एक महान केंद्र के रूप में भारत के गौरव को बहाल करने की संभावना है। “भागवत गीता” और कृष्ण-अर्जुन संवाद से प्रेरणा लेते हुए राष्ट्रपति ने शिक्षक और छात्र के बीच मुक्त संचार और चर्चा की अवधारणा को दोहराया।

      2018-19 के अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार महिलाओं के लिए सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) पुरुषों की तुलना में थोड़ा अधिक है। हालांकि, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में और विशेष रूप से तकनीकी शिक्षा के केंद्रों में महिला छात्रों की हिस्सेदारी बेहद कम है।

        उच्च शिक्षा में इस तरह की लैंगिक असमानता एक बड़ी चुनौती है जिसे एक सर्व-समावेशी और न्यायसंगत राष्ट्र के दृष्टिकोण को सामने लाने के लिए ठीक किया जाना चाहिए। यह संस्थानों के प्रमुख की भूमिका को बढ़ाएगा जिसका प्रभाव शिक्षकों और छात्रों पर समान रूप से पड़ेगा। इसलिए संगठनों के प्रमुखों को इसके निर्माण की दृष्टि के अनुसार नीति को लागू करने में सक्रिय रुचि लेनी चाहिए।

        एनईपी 2020 के कार्यान्वयन के दौरान एक और चुनौती शिक्षण भाषाओं के स्तर पर आएगी। वर्तमान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि कोई भी भारतीय भाषा दूसरी से कम नहीं है, और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 सभी भारतीय भाषाओं को समान रूप से सीखने पर जोर देती है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की आधिकारिक भाषाओं को सूचीबद्ध करती है।

       हालांकि देश भर में कई सैकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं, आठवीं अनुसूची कुल 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता देती है जो (1) असमिया, (2) बंगाली, (3) गुजराती, (4) हिंदी, (5) कन्नड़ (6) कश्मीरी, (7) कोंकणी, (8) मलयालम, (9) मणिपुरी, (10) मराठी, (11) नेपाली, (12) उड़िया, (13) पंजाबी, (14) संस्कृत, (15) सिंधी , (16) तमिल, (17) तेलुगु, (18) उर्दू (19) बोडो, (20) संथाली, (21) मैथिली और (22) डोगरी है। ये सभी एनईपी 2020 में शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से पढ़ाए जाने वाले विषय के रूप में शामिल हैं।

       एक तरफ हमारे छात्रों के दिमाग को औपनिवेशिक चंगुल से मुक्त करने और उन्हें भारतीय भाषाओं को पढ़ाने के द्वारा एकीकृत शिक्षा के लक्ष्य की ओर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। हालाँकि, दूसरी तरफ, संचार की वैश्विक भाषा के रूप में इसकी मान्यता के कारण अंग्रेजी भाषा को शुरू से सीखने के महत्व को कभी भी नकारा नहीं जा सकता है।

      आज के परिदृश्य में जब पूरी दुनिया वैश्वीकरण के तहत एक बड़ा परिवार बन रही है और वसुधैव कुटुम्बकम का विचार एक वास्तविकता बन रहा है, तो कक्षा 6 से अंग्रेजी भाषा पढ़ाना स्वागत योग्य कदम नहीं है। यह भविष्य में छात्रों के बीच आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में समस्या पैदा कर सकता है।

      1968 के राष्ट्रीय नीति संकल्प में प्रतिपादित तीन भाषा सूत्र ने हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और आधुनिक भारतीय भाषा (अधिमानतः दक्षिणी भाषाओं में से एक) और गैर-हिंदी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषा के अध्ययन पर जोर दिया। इस चुनौती से निपटने के लिए बोलने वाले राज्यों को एनईपी 2020 में शामिल किया जाना चाहिए।

       प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, “लॉन्च होने के बाद से दो वर्षों में, पहुंच, इक्विटी, समावेशिता और गुणवत्ता के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई पहलें शुरू की गई हैं, जैसा कि नीति के तहत निर्धारित किया गया है। नीति।” उन्होंने छात्रों को समग्र विकास की ओर अधिक उन्मुख बनाने के लिए एक हाइब्रिड शिक्षण पद्धति (ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों) के कार्यान्वयन पर जोर दिया।

      इससे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री रमेश निशंक पोखरियाल ने उम्मीद जताई थी कि “नई शिक्षा नीति जुलाई 2020 में एनईपी पर बातचीत के दौरान देश की शिक्षा प्रणाली को विकेंद्रीकृत और मजबूत करेगी। मुख्य ध्यान हमारे देश में शिक्षा मानकों की गुणवत्ता में सुधार करना है।”

        आगे उन्होंने कहा कि नीति ने पहले ही विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में खुले परिसरों तक पहुंच प्रदान कर दी है जो भारत को एक सॉफ्ट पावर बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस संबंध में उन्होंने उद्धृत किया कि “एनईपी 2020 के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में सभी बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए और सभी हितधारकों के साथ संवाद स्थापित किया जाना चाहिए।” कार्यान्वयन प्रक्रिया के बारे में विचार-मंथन करने में सभी वर्गों का समर्थन अनिवार्य है।

निष्कर्ष       

        निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 सरकार द्वारा 34 साल पुरानी शिक्षा नीति के पुनर्निर्माण, पुनर्गठन और पुनर्रचना के लिए उठाया गया एक बहुत ही क्रांतिकारी कदम है। भारतीय शिक्षा प्रणाली की जड़ को वैदिक काल से पूर्व-मुगल काल के समय तक फिर से स्थापित करना और भारतीय शिक्षा प्रणाली में बहुत आवश्यक संशोधन को सामने लाना समय की मांग और आवश्यकता थी।

       एनईपी ने शिक्षा प्रणाली में परंपरा और बहु-विषयक दृष्टिकोण के बीच एक उचित संतुलन को सफलतापूर्वक बनाए रखा है। सभी सकारात्मक गुणों से युक्त एनईपी छात्रों को कौशल आधारित शिक्षा प्रदान करेगा, जिससे वे जीवन में सफलता की दौड़ में वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने में सक्षम होंगे। यह निस्संदेह एक अत्यधिक प्रगतिशील और महत्वाकांक्षी नीति है जिसका भारत अपनी युवा पीढ़ी को राष्ट्र निर्माण के मार्ग में योगदान देने के लिए और अधिक सक्षम बनाने के लिए प्रतीक्षा कर रहा है।   

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य / Rural-Urban Fringe

12. ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र / नगरीय सीमान्त क्षेत्र / ग्रामीण-नगरीय सांतत्य


ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के अर्थ⇒

            “ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र” का शाब्दिक अर्थ है- नगरों की सीमाओं पर स्थित वह क्षेत्र जहाँ ग्रामीण एवं नगरीय भूदृश्य की विशेषताएँ देखने को मिलती है। दूसरे शब्दों में उपान्त क्षेत्र वह क्षेत्र है जो नगर और ग्रामीण बस्ती के बीच में विकसित होते हैं तथा वहाँ पर नगरीय और ग्रामीण आर्थिक-क्रियाकलाप साथ-2 चलते रहती है। इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1942 ई० में बेहरबिन महोदय ने किया था।

            ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को ग्रामीण नगरीय सांतत्य शब्द से संबोधित किया जाता है। इस संकल्पना में बताया गया है कि नगर के केन्द्र में विशुद्ध रूप से नगरीय संस्कृति होती है लेकिन ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूर जाते हैं त्यों-2 नगरीय संस्कृति या नगरीय विशेषता में कमी आते जाती है और ग्रामीण विशेषताएँ बढ़ने लगती हैं।

                  दूसरे शब्दों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र मुख्यतः दो शब्दों का संग्रह है- उसमें से एक ग्रामीण उपान्त क्षेत्र एवं दूसरा नगरीय उपान्त क्षेत्र है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि ग्रामीण- नगरीय उपान्त अतिक्रमण क्षेत्र का प्रतीक है। यह नगर के चारों ओर एक ऐसी संक्रमण पेटी का प्रतिनिधित्व करता है जो न तो पूर्णतया ग्रामीण है और न ही पूर्णतया नगरीय। इस प्रकार के संक्रमण पेटी में ग्रामीण एवं नगरीय दोनों प्रकार का वातावरण देखने को मिलता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्ष

                ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र वह भौगोलिक क्षेत्र है, जो नगर की प्रशासनिक प्रदेश की सीमा के बाहर है किन्तु नगरीय आकारिकी के विकास की प्रवृति जारी रहती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र एक ऐसा गत्यात्मक क्षेत्र है जहाँ लगातार भू उपयोग में परिवर्तन की प्रवृति होती है अर्थात् कृषि क्षेत्र घटते जाते हैं और निर्मित क्षेत्र बढ़ते जाती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के प्रकार 

           ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र को दो भागों में बाँटते हैं:-

(ii) प्रमुख उपान्त क्षेत्र

(ii) गौण उपान्त क्षेत्र

                प्रमुख उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर नगरीय विशेषताओं का अनुपात अधिक है। और गौण उपान्त क्षेत्र वह है जहाँ पर ग्रामीण विशेषताओं का अनुपात अधिक है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र के विकास के कारण

(1) केन्द्रों उन्मुखी शक्तियों का सक्रिय होता⇒ चूँकि नगर के केन्द्र में भूमि का मूल्य और मकान का किराया बहुत अधिक होता है। जबकि उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य और मकान का किराया कम होता है। इसलिए केन्द्रीय बस्ती के लोग बाहरी क्षेत्रों में बसने की प्रवृति रखते है।

               केन्द्रीय बस्ती में अधिवासीय क्षेत्रों की कमी और प्रदूषण ज्यादा होता है। इसलिए भी लोग बाहर की ओर जाकर बसने की प्रकृति रखते हैं। पुनः केन्द्रीय बस्ती में पार्क, खेल का मैदान, हवाई अड्‌डा, फर्म हाउस, शोरूम खोलने के लिए विस्तृत भूमि नहीं मिल पाती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का विकास होता है।

               केन्द्रीय बस्ती में प्रदूषण से संबंधित कड़े नियम लागू होते हैं लेकिन उपान्त क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयों के द्वारा प्रदूषणकारी पदार्थों के स्राव पर कोई रोक नहीं होता है इसलिए औद्योगिक इकाइयों प्रान्त क्षेत्रों में विकसित होकर इनके विकास में योगदान देते हैं।

(2) कर से बचने के लिए भी इस प्रदेश में औद्योगिक इकाइयों के विकसित होने से उपान्त क्षेत्र विकसित होता है।

(3) विकासशील देशों में ग्रामीण-स्थानान्तरित जनसंख्या उपान्त क्षेत्रों में भूमि का मूल्य कम होने के कारण निवास की प्रवृति रखती है जिसके कारण उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता जाता है।

          कुछ कार्य नगरों के आन्तरिक भागों में संभव नहीं है। जैसे- सीवेज प्लांट का निर्माण, कचड़ा संग्रहण केन्द्र, कसाई खाना, श्मशान घाट, विस्फोटक पदार्थों के डिप्पो, माल गोडॉन इत्यादि का निर्माण संभव नहीं है। अत: इनका विकास नगर के बाहरी क्षेत्रों में ही उपयुक्त मानी जाती है। फलतः उपान्त क्षेत्रों का सतत विकास होता है।

(4) उपान्त क्षेत्र अभिगमन के क्षेत्र होते हैं जिसके कारण यहाँ पर तीव्र गति से चलने वाले परिवहन साधनों का विकास अधिक होता है। अत: सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती तक कम समय में तीव्र परिवहन साधन कर पहुँच जाते हैं जिसके कारण सम्पन्न लोग केन्द्रीय बस्ती से दूर उपान्त क्षेत्र में अधिवासित होने की प्रवृति रखते है। इससे उपान्त क्षेत्रों का सतत् विकास होता है।

नगरीय उपान्त


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13. ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता तथा समस्याएँ

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ग्रामीण-नगरीय उपान्त की विशेषता⇒

                  ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेशों की विशेषताओं का अध्ययन कई भूगोलवेताओं ने किया है। इनमें आर. ई. पहल, उजागर सिंह, सुदेश नागिया इत्यादि का महत्वपूर्ण कार्य है। आर. ई. पहल के अनुसार विकसित देशों में ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों की निम्नलिखित विशेषताएं होती है-

(i) यहाँ अधिवासीय क्षेत्र विलगाव के नियम पर आधारित होता है।

(ii) यहाँ रखने वाले लोग आर्थिक-सांस्कृतिक कार्यों के लिए नगरों से जुड़े रहते हैं।

(iii) उपान्त प्रदेश में जगह-2 पर औद्योगिक प्रतिष्ठान, प्रशासनिक संस्थाएँ, शिक्षण संस्थान, शोरूम, वर्क शॉप, तथा विभिन्न आय के लोगों का अधिवासीय क्षेत्र दिखाई देता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र चयनित जनसंख्या स्थानान्तरण का लक्ष्य क्षेत्र होता है क्योंकि नगर के केन्द्र में जनसंख्या दबाव अधिक होता है। प्रदूषण की समस्या होती है तथा अधिवासीय मकान और भूमि मँहगे होते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्र जनसंख्या अभिगमन का क्षेत्र होता है। इन क्षेत्रों में दिन में जनसंख्या घनत्त्व घट जाती है और रात में जनसंख्या घनत्व बढ़ जाती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र मिश्रित भूमि उपयोग के क्षेत्र होते हैं, अर्थात् खाली स्थानों में गहन कृषि का कार्य किया जाता है तो दूसरी ओर अधिवासीय कार्य भी साथ-2 किये जाते है।

(vii) कानून के दृष्टिकोण से उपान्त क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्र होते हैं जबकि कार्य एवं जनसंख्या के दृष्टिकोण से नगर समान होते हैं।

(viii) विकसित देशों में उपांत क्षेत्र नियोजित होते हैं अर्थात् नगर नियोजन के साथ-2 उपान्त क्षेत्रों के नियोजन पर भी विशेष जोर दिया जाता है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त

         भारतीय नगरों के संदर्भ में 1961 ई० में पाँच नगर कानपुर, आगरा, वाराणसी, इलाहाबाद तथा लखनऊ (KAVAL) का अध्ययन करने के बाद ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्रों के विशेषताओं का चर्चा किया। जैसे :

(i) भूमि प्रयोग के दृष्टिकोण से यह सतत् परिवर्तन क्षेत्र होता है यानी कृषि भूमि में लगातार कमी आते जाती है और निर्मित क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी होते जाती है। यहाँ कार्यिक संरचना में भी तेजी से परिवर्तन होता है।

(ii) यहाँ लगातार घरों के आकार एवं प्रकार में परिवर्तन देखा जा सकता है।

(iii) यह मिश्रित अर्थव्यवस्था का क्षेत्र होता है।

(iv) उपान्त क्षेत्र में नगरीय सार्वजनिक सेवाओं का अभाव होता है क्योंकि यह क्षेत्र नगर प्रशासन अन्तर्गत नहीं आते हैं।

(v) उपान्त क्षेत्रों में नगरीय संस्कृति और नैतिकता का अभाव होता है।

              JNU के प्रो० सुदेश नागिया 1976 ई० में दिल्ली महानगरीय प्रदेश का अध्ययन करते हुए निम्नलिखित विशेषताओं का उल्लेख किया हैं-

(i) उपांत क्षेत्र झुग्गी-झोपड़ी और गन्दी बस्ती के क्षेत्र होते हैं।

(ii) यह मिश्रित कृषि भूमि उपयोग का क्षेत्र होता है।

(iii) कृषि क्षेत्र की भूमि कम होती है लेकिन कृषि कार्यों की सघनता में वृद्धि होती है।

(iv) यहाँ नगरीय सुविधाओं का अभाव होता है।

(v) उपान्त क्षेत्र में सतत निर्माण की प्रक्रिया चलते रहती है।

(vi) उपान्त क्षेत्र में ग्रामीण एवं नगरीय संस्कृति साथ-2 मिलती है।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश के तीव्र फैलाव का कारण 

                 उपान्त क्षेत्रों के तीव्र फैलाव का दो प्रमुख कारण होते हैं:-

(i) विकसित देशों में CBD से जनसंख्या का चयनित स्थानान्तरण।

(ii) विकासशील देशों में ग्रामीण-नगरीय जनसंख्या के स्थानान्तरण का जमघट।

ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की समस्याएँ

              ग्रामीण-नगरीय उपान्त प्रदेश की निम्नलिखित समस्याएँ है:-

 (i) इसके तीव्र फैलाव के कारण यहाँ गंदी बस्तियों का विकास तेजी से होता है। लंदन, न्यूयार्क में एशियाई एवं निग्रो लोगों की गंदी बस्ती को घेटों से संबोधित करते हैं। जबकि दिल्ली के उपान्त क्षेत्रों में विकसित झुग्गी-झोपड़ी जे.जे. कोलनी के रूप में प्रसिद्ध है।

(ii) उपान्त क्षेत्रों में पूर्ण नगरीय विकास के पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन की समस्याएँ पाई जाती है।

(ii) यहाँ अनियोजित विकास की समस्याएँ भी पायी जाती हैं।

(iii) सेवाओं एवं जन सुविधाओं का अभाव होता है। जैसे- पेयजल, सुलभ-शौचालय, मनोरंजन पार्क और स्वास्थ केन्द्र नहीं के बराबर मिलते हैं।

(v) उपांत क्षेत्रों में जल निकासी की भी गंभीर समस्या पायी जाती है।

(vi) सड़क एवं गलियों में प्रकाश प्रबंध नहीं होता है।

(vii) उपान्त क्षेत्र से बड़ी-2 एवं चौड़ी से चौड़ी सड़‌के तो अवश्य गुजरती है लेकिन सहायक लड़‌कों की स्थति दयनीय होती है।

(viii) इस प्रदेश में कई सामाजिक समस्याएँ भी होती है। जैसे- अशिक्षा, वेश्यावृति, प्रवजन, जनसंख्या वृद्धि, भूमि बेदखल, कर इत्यादि।

(ix) उपान्त क्षेत्र कई सांस्कृतिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं। इस प्रदेश में न तो नगरीय संस्कृति पायी जाती है और न हीं ग्रामीण संस्कृति।

(xi) उपान्त क्षेत्र में भूमि उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं होता है।

निष्कर्ष:- इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि ग्रामीण-नगरीय उपान्त क्षेत्र बस्ती भूगोल की एक महत्वपूर्ण संकल्पना रहीं है। इस प्रदेश के विकास के कारण उनकी समस्याओं का अध्ययन करके ही संतुलित नगर नियोजन की संकल्पना विकसित की जा सकती है।

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