4. सम्भववाद / Possibilism

सम्भववाद 

Possibilism

सम्भववाद / Possibilism⇒

सम्भववाद

             सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय प्राप्त कर सकता है अर्थात मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है तथा मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

सम्भववाद के उदय का कारण

              नियतिवाद का उद‌य जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-

(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेत्ताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कल कारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।

(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेत्ताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।

(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।

(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्‌भूत उदाहरण है।

(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर मानव ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दी।

       उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।

         “सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”

          भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डी-मोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।

          पॉल वाइडल डि लॉ ब्लाश के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था‘ (Robber Economy) की संकल्पना प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।

       ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।

         दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।

       अमेरिका में जिमरमैन, कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेत्ता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”

     अमेरिकी भूगोल‌वेत्ता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिश्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।

      अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने The Morphology of Landscape (भूदश्य की आकारिकी), 1925, नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि संभववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।

     इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”

निष्कर्ष

      इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सम्भववाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेत्ताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।



सम्भववाद को दूसरे तरीके से इस प्रकार भी लिखा जा सकता है-



 संभववाद

           नियतिवाद के अनुसार “मानव प्रकृति का दास है” या “मानव मोम का पुतला है जिसे प्रकृति इच्छानुसार ढालती है।” इसी के प्रतिक्रिया स्वरूप एक विचारधारा का उदय हुआ जिसे संभववाद कहा गया। अतः संभववाद “मानव की प्रकृति पर विजय, मानव द्वारा प्रकृति पर नियन्त्रण, मानव का सर्वत्र चयन की सुविधा जैसे अर्थों का समाहित किये हुए हैं।” 19वीं शताब्दी के अंत तक नियतिवादी चिंतन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा था। इसका प्रमुख कारण फ्रांस में भूगोल का उदय होना था फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं पर औद्योगिक क्रांति और इतिहास के घटनाओं का स्पष्ट प्रभाव था।

      इन दो पृष्ठभूमियों के कारण फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के नियतिवादी दृष्टिकोण को अस्वीकार किया और सम्भववादी दृष्टिकोण का विकास किया। 

      भौगोलिक चिंतन के क्षेत्र में संभववाद की शुरूआत 1900 से 1920 ई० के मध्य हुआ। संभववाद में “मानवीय श्रेष्ठता” को स्वीकार किया गया है। फ्रांसीसी चिंतकों ने संभववाद के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह दिया कि औद्योगिक क्रांति के बाद प्रकृति की श्रेष्ठता कमजोर हो चुकी है। क्योंकि मनुष्य ने अपने बलबूते उपनिवेश, महाद्वीपीय रेलवे मार्ग, महानगरों तथा वाणिज्य-व्यापार आदि का विकास किया है। ये सभी मानवीय श्रेष्ठता के द्योतक हैं। अतः भूगोल में प्रकृति को नहीं मानव को अध्ययन का केन्द्रीय बिंदु माना जाना चाहिये। 

     संभववादी चिंतन को व्यवस्थित रूप देकर विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, जीन ब्रूस आदि फ्रांसीसी विद्वानों  को है। इसके अतिरिक्त किरचॉफ, ईशा बोमेन, टैथम, कार्ल सवार और जिमरमैन आदि के नाम भी उल्लेखनीय है।

       इतिहासकार फेब्र को संभववाद का जनक माना जाता है, क्योंकि सर्वप्रथम इन्होंने ही संभववाद शब्द का प्रयोग किया था। इन्होंने अपने पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि मानव एक भौगौलिक दूत है, पशु नहीं है, वह सर्वत्र पृथ्वी की रचना की विवेचना में एवं उसके परिवर्तनशील भौगोलिक तत्वों के अभीव्यक्तियों में अपना योगदान देता है। इसलिए मानव का अध्ययन करना भूगोल का महत्वपूर्ण कर्तव्य है।

        भूगोल में संभववाद के सबसे  बड़े समर्थक ब्लाश ने न केवल मनुष्य को श्रेष्ठ कहा बल्कि यह भी बताया है की प्रकृति की भूमिका अधिक से अधिक एक सलाहकार के रूप में हो सकती है। मानव उनके बात को मान भी सकते है और नहीं भी मान सकते है। इन्होंने Genres-de-vie की संकल्पना भी इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया था।

        ब्रूंश नामक फ्रांसीसी विद्वान ब्लाश के माने हुये शिष्य थे। इसने माना कि मानव भूतल पर निवास करता है साथ ही वह अपने परिवेश में रहकर काम करता है, परन्तु इसका अर्थ कदापि नहीं कि वह वातावरण का दास है। वास्तव में वह जब तक जीवित है क्रिया-प्रतिक्रिया करता रहता है। इन्होंने सर्वप्रथम मानव भूगोल को भूगोल के अध्ययन के लिये एक व्यवस्थित उपागम के रूप में संभववाद को स्पष्ट किया था। Robber Economy Concept इसी पर था। जिसमें कहा कि मानव दिन दिहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज संसाधन का दोहन कर रहा है।

        डिमाजियाँ भी ब्लाश के शिष्य थे। इन्होंने भी संभववाद का समर्थन किया। संभववाद को उन्होंने आस्ट्रेलिया तथा इजरायल के शुष्क प्रदेशों में मानव के अथक प्रयास एवं सफलता का उदाहरण से पुष्ट करने का प्रयास किया है।

       दो अन्य भूगोलवेत्ता किरचॉफ एवं ब्लैन्चार्ड ने भी संभववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने कहा है कि मानव ऐसी मशीन नहीं है जिसकी कोई अपनी इच्छा नहीं है। इसी भाँति ब्लैन्चार्ड ने भी नगरीय भूगोल के विधितंत्र पर शोध लेख एवं अन्य वर्णन प्रस्तुत करते हुये मानवीय प्रभावों का बहुत महत्व दिया।

         अमेरिकी चिंतक जिमरमैन, ईशा बोमेन एवं कार्ल सावर ने संभववादी विचार को अभूतपूर्व समर्थन दिया। जिमरमैन ने यहाँ तक लिखा है कि “संसाधन होते नहीं बनते हैं। संसाधन को बनाने का कार्य मानव करता है, इसलिये मानव प्रमुख है। जिमरमैन ने एक मॉडल के द्वारा इसकी पुष्टि की है-

प्रकृति (Nature)
↓
प्राकृतिक तत्व (Natural Elements)
↓
मानव की आवश्यकता (Human Need)
↓
मानव का ज्ञान + तकनीक (Knowledge & Technology)
↓
उपयोगिता (Utility)
↓
संसाधन (Resource)

         इस मॉडल के आधार पर यह बताने का प्रयास किया है कि मानवीय अध्ययन को ही केन्द्रीय स्थान दिया जाना चाहिये। 

     ईशा बोमन ने भी लगभग इसी प्रकार की बात कही है। इनके अनुसार विकासशील मानव समाज की प्रकृति एवं उसके स्वरूप को भौतिक परिवेश ही सुनिश्चित नहीं करता है बल्कि मानव अपने प्रयास से धरातल पर नवीन तत्व के निर्माण को क्षमता रखता है।

         कार्ल सावर ने भूतल पर सांस्कृतिक विकास में प्राकृतिक परिवेश के हावी होने की बात को स्वीकार नहीं किया। उसने “The Morphology of Landscape“ नामक अन्य लेख ने बताया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्ति के प्रभाव को सामान्य रूप से स्वीकार तो किया जा सकता है परंतु संभववादी इससे पूर्णतया सहमत नहीं हैं कि परिवेश मानव को पूर्ण रूप से प्रभावित करता है, उसके अनुसार प्रकृति की कुछ सीमाएँ अवश्य निर्धारित करती हैं, परन्तु वहाँ भी मानव के लिये सम्भावनाएँ एवं चयन की सुविधाएं है। इसी तरह प्रसिद्ध पारिस्थैतिक विज्ञानी बोरो ने पर्यावरण की अपेक्षा मनुष्य पारिस्थैतिकी (Human Ecology) की अधिक महत्व दिया। मेकिंडर ने तो यहां तक कहा कि मानव भूगोल ही सामान्य भूगोल है। भूगोल में मानव को अधिक महत्व मिलने लगा। मानव भूगोल की शाखा का विस्तार हुआ। 

     इस प्रकार फ्रांसीसी चिंतकों ने जर्मनी चिन्तकों के लिये एक वैकल्पिक चिन्तन प्रस्तुत कर द्वैतवाद की स्थिति उत्पन्न कर दी। फ्रांसीसी भूगोलवेत्ताओं के संभववादी चिंतन ने विश्व भूगोल को दो वर्गों में विभाजित कर दिया अर्थात जर्मनी और फ्रांस में अलग-अलग प्रकार से भूगोल का अध्ययन होने लगा। इससे भूगोल के शैशवावस्था में ही विधितंत्र में विभाजन का खतरा उत्पन्न हो गया। बाद में विभाजन को रोकने हेतु टेलर महोदय ने नवनियतिवाद की संकल्पना विकसित की। 

आलोचना

      संभववाद की सर्वाधिक आलोचना कट्टर नियतिवादियों द्वारा की गयी। बाद में यह आलोचना संभववादियों द्वारा दोहरे वक्तव्य दिये जाने के कारण भी हुई। सेम्पुल ने संभवत: ऐसे ही वक्तव्यों को देखकर चुटकी लेते हुये लिखी है कि “मानव अपनी प्रकृति विजय को डींगे हाँकता-फिरता है, जबकि प्रकृति मौन रहकर भी निरन्तर मानव पर निश्चित प्रभाव डालती रहती है।” 

   दूसरी आलोचना यह है कि संभववाद भौगोलिक पर्यावरण के अध्ययन को प्रोत्साहन नहीं देता है बल्कि यह भूगोल में Anthropocentric को बढ़ावा देता है। 

       टेलर ने संभववाद का आलोचना करते हुये लिखा कि भूगोल का कार्य प्राकृतिक वातावरण का अध्ययन और उसका मानव पर प्रभावों का अध्ययन करना है, मानव अथवा सांस्कृतिक भूदृश्य से सम्बन्धित सभी समस्याओं का अध्ययन करना नहीं।



नोट:

♣ Genres-de-vie की संकल्पना फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता पॉल विडाल डी ला ब्लाश (Paul Vidal de la Blache) द्वारा प्रतिपादित की गई थी।

       इसका शाब्दिक अर्थ है – “जीवन-शैली” (Way of Life)। अर्थात् Genres-de-vie से आशय किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाले लोगों की जीवन पद्धति, आजीविका के साधन, सामाजिक व्यवहार, परंपराएँ और पर्यावरण के साथ उनका सामंजस्य से है।

✍️ यह संभववाद (Possibilism) से संबंधित है।

✍️ मनुष्य प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी जीवन-शैली विकसित करता है।

✍️ समान भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले लोगों की जीवन-पद्धति प्रायः समान होती है।

✍️ उदाहरण: मरुस्थलीय क्षेत्र में ऊँट पालन, ध्रुवीय क्षेत्र में मछली पकड़ना आदि।

       अतः Genres-de-vie मानव और पर्यावरण के पारस्परिक संबंध को समझाने की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है।

YOU TUBE LINK – https://youtu.be/Hzlu7wVDSYM

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3. नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद / Determinism or Environmentalism

3. नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद

(Determinism or Environmentalism)




नियतिवाद या निश्चयवाद या पर्यावरणवाद⇒   

      भूगोल में कई प्रकार के द्वैतवाद का विकास हुआ है। इनमें नियतिवाद बनाम सम्भववाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह द्वैतवाद भूगोल के विषयवस्तु से संबंधित है। यूरोप में जब आधुनिक भूगोल का विकास हुआ तो जर्मन भूगोलवेताओं ने नियतिवाद दृष्टिकोण अपनाया। नियतिवादी का तात्पर्य है- भूगोल में प्रकृति की श्रेष्ठता को महत्वपूर्ण मानना। जर्मन विद्वानों के विरुद्ध फ्रांस में संभववाद का उदय हुआ।

       फ्रांसीसी विद्वान भूगोल में मानव के अध्ययन पर अधिक जोर देते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि जर्मनी और फ्रांस में भूगोल में विषय वस्तु को लेकर द्वंद छिड़ गया। यह द्वन्द द्विविभाजन का रूप धारण कर लिया। कालांतर में टेलर महोदय ने नियतिवादियों एवं सम्भववादियों की आलोचना करते हुए तार्किक तरीके  से नवनियतिवाद की संकल्पना प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने बताया कि नियतिवाद और संभववाद दोनों अलग-2 पहलू नहीं है, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू है। अर्थात नियतिवाद और सम्भववाद को नियतिवाद बनाम सम्भववाद के रूप में देखा जाना चाहिए।नियतिवाद या निश्चयवादनियतिवाद

     भूगोल में मानव एवं पर्यावरण के बीच संबंधो का अध्ययन हेतु अनेक पद्धति एवं वैचारिक सम्प्रदाय का विकास हुआ। उनमें से एक विचार निश्चवादी के नाम से जाना जाता है। भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध तक निश्चयवादी विचार का प्रभाव बना रहा। निश्चयवादी विचार का तात्पर्य है- समय का इतिहास, सभ्यता, जीवनशैली, संस्कृति एवं राष्ट्र की सभी धारणाएँ पर्यावरण के द्वारा निर्धारित एवं संचालित होती है।

सिद्धांत- नियतिवादी संकल्पना मानव को एक निष्क्रिय अभिकर्ता या मोम का पुतला मानता है जिस पर भौतिक तत्व क्रियाशील रहते हैं और उसके व्यवहार तथा निर्णय लेने की प्रवृति को भी नियंत्रित करती है।

नियतिवाद या निश्चयवाद के समर्थन में तर्क

      नियतिवाद की सर्वप्रथम व्याख्या करने का कार्य यूनानी एवं रोमन भूगोलवेताओं ने किया। हिप्पोक्रेटस, अरस्तु, यूथीडेड्स, जोनोफोन जैसे भूगोलवेताओं ने बताया कि भौगोलिक अवस्थिति, पर्यावरणीय अनुकूलता के कारण ही एथेंस नगर को पूरे दुनिया में विशिष्ट महत्त्व प्राप्त है।

(1) हिप्पोक्रेटस ने अपनी पुस्तक “एक वायु, जल और स्थान” में बताया है कि माननीय अधिवास वायु, जल, और स्थान के द्वारा ही निर्धारित होते हैं। उन्होंने बताया कि नील नदी घाटी क्षेत्र में सघन जनसंख्या इसलिए पायी जाती है कि वहाँ कृषि कार्य के लिए मानव तथा अधिवास के लिए जल, वायु, और स्थान काफी अनुकूल है।

(2) अरस्तू महोदय ने बताया कि शीत प्रदेश में निवास करने वाले निवासी साहसी और उष्ण प्रदेश में निवास करने वाले निवासी आलसी और डरपोक होते हैं। शीत प्रदेश के निवासी हमेशा शासक होते हैं और उष्ण प्रदेश के निवासी शोसित होते हैं। इसी कारण से नियति (प्रकृति) के द्वारा शोषित एवं शासक वर्गो का निर्धारण होता है।

(3) रोमन भूगोलवेता स्ट्रेबो ने बताया कि ढाल, उच्चावच और जलवायु ये सभी प्रकृति प्रदत है। ये तीनों कारक मिलकर मावन के जीवन शैली को विकसित करते हैं।

(4) मध्ययुगीन चिंतकों में बोल्डिंग, मोटेस्क्यू ने बताया कि मानवीय, अधिवास और उसके कार्यकलाप का निर्धारण भौतिक कारक  जैसे- जलवायु, उच्चावच और मृदा के द्वारा निर्धारित होता है। मोंटेस्क्यू ने यहाँ तक बताया कि उपरोक्त तीनों कारकों के द्वारा मानवीय संस्कृति भी निर्धारित होती है।

     निश्चयवादी विचार के विकास में अरब भूगोलवेता जैसे- अलबरुनी, अलमसूदी, इब्न हॉकल, अल इदरिसी, इब्न खाल्दून ने इस विचार को पुष्ट किया।

(5) अलमसूदी ने उत्तर भारत का अध्ययन करके बताया था कि जहाँ पर पर्याप्त मात्रा में भूमिगत जलस्तर उपलब्ध हो वहाँ के लोग हमेशा प्रसन्नचित और विनोदपूर्ण होते है और जबकि शुष्क प्रदेश के निवासी काफी असंतुलित होते हैं।

(6) जर्मन भूगोलवेता काण्ट महोदय ने बताया कि उष्ण प्रदेश के निवासी सुस्त और भिरू होते हैं जबकि शीत प्रदेश के निवासी साहसी और प्रतिज्ञ होते हैं।

* आधुनिक भूगोल में नियतिवादी चिंतन के विकास में जर्मन भूगोलवेता हमबोल्ट के कॉसमोस और रीटर के Erdkunde नामक पुस्तक का विशेष योगदान है। इन दोनों विद्वानों ने न केवल प्रकृति की श्रेष्टता को स्थापित किया वरन् भौतिक भूगोल को ही मुख्य भूगोल माना।

(7) रीटर महोदय ने यहाँ तक बताया कि मानव के शरीर की बनावट, शारिरीक गठन और स्वास्थ्य कई पर्यावरणीय विभिन्नता के कारण ही उत्पन्न होती है।

(8) हमबोल्ट ने बताया कि पर्वतीय प्रदेश के लोगों की जीवनशैली मैदानी क्षेत्र के निवासियों की जीवनशैली से भिन्न होता है।

(9) डार्विन ने अपने पुस्तक “Origin of species” में प्राकृतिक चयन का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसमें बताया कि जीवों के उद्द्विकासीय प्रक्रिया को प्राकृतिक कारण ही निर्धारित करते हैं। जो जीव प्रकृति के साथ अनुकूलन स्थापित कर लेते हैं, वे जीवित रह पाते हैं और जो अनुकूलन स्थापित नहीं कर पाते हैं उन्हें प्रकृति परित्याग कर देती हैं।

    डार्विन के सिद्धांत से प्रभावित होकर रैटजेल महोदय ने नियतिवाद के स्थान पर पर्यावरणवाद की संकल्पना प्रस्तुत की। नियतिवाद संकल्पना के तहत मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रकृति के समस्त घटकों के प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। जबकि पर्यावरणवाद के तहत प्रकृति के कुछ निश्चित घटकों के प्रभाव का ही विश्लेषण किया जाता है।

          पारिस्थितिक वैज्ञानिक बक्क्ल महोदय ने अपनी पुस्तक “इंगलैंड में सभ्यता का इतिहास” नामक पुस्तक में मानवीय कार्यों का निर्धारक प्रकृति को माना और बताया कि धन का संग्रह तथा उसका विवरण इत्यादि भी जलवायु, मृदा जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

      फ्रांसीसी भूगोल लैप्ली ने Place – Work – Folk (स्थान-कार्य-लोकपरम्परा/ संस्कृति) नामक संकल्पना का विकास किया जिसमें उन्होंने बताया कि स्थान कार्य को निर्धारित करता है और कार्य लोक संस्कृति को निर्धारित करता है। इसी तरह लैमोलिन महोदय ने यह बताया कि समाज का सौंदर्यीकरण वातावरण के द्वारा ही किया जाता है।

       कई अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं ने भी नियतिवादी संकल्पना का समर्थन किया। डेविस महोदय ने “Geographical Essay” नामक पुस्तक में भूदृश्य के विकास पर जलवायु जैसे कारकों को महत्त्वपूर्ण माना।

     अमेरिकी भूगोलवेत्ता मिस सेम्पल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “Influence of Geographic Environment” (भौगोलिक वातावरण का प्रभाव) में अनेक प्रकार के तथ्यों से नियतिवाद का समर्थन किया। उन्होंने इस पुस्तक में “मानव को धरातल की उपज” बताया। उन्होंने यह भी कहा कि “मानव मोम का पुतला है।” इसे प्रकृति जब चाहे तब चुट‌कियों से मसल सकती है। इस तरह मिस सेम्पल को नियतिवाद का कट्टर समर्थक माना जाता है। इसकी पुस्तक नियतिवाद के समर्थन में लिखा गया अंतिम पुस्तक था।

        उपरोक्त भूगोलवेत्ताओं के अलावे ब्रिटिश भूगोलवेत्ता मैकिण्डर, चिशोल्म, हबर्टसन, रॉबर्टमिल, बोमेन जैसे भूगोलवेत्ताओं ने भी नियतिवाद का समर्थन किया। इन भूगोलवेत्ताओं ने यूरोप, अफ्रीका के कई देशों में अध्ययन कर अपने विचारों को पुष्टि किया। गैडीस महोदय ने यह बताया कि न्यून पोषण से ग्रसित मनुष्य को मलेरिया की बीमारी अधिक होती है। जैसे- भारत के लोग निरामिश भोजन कम करते है जिससे उनमें रोग-प्रतिरोधी क्षमता कम होती है। फलतः उनमें मलेरिया जैसी बीमारी होती है। जबकि माँस खाने वाले मनुष्यों में मलेरिया की बीमारी कम होती है।

आलोचना

      द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नियतिवादी की निम्नलिखित आलोचना किया जाने लगा:-

(i) कुछ विद्वानों ने यह कहा कि नियतिवादी एक पक्षीय विचार प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसमें प्रकृति की भूमिका को बहुत अधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहे हैं।

(ii) O.H.K. स्पेट महोदय में नियतिवादियों की आलोचना करते हुए कहा कि वातावरण अपने आप में अर्थहीन वाक्यांश है, बिना मानव के वातावरण का कोई अस्तित्व नहीं है।

(iii) हार्टशोन महोदय ने नियतिवाद की आलोचना करते हुए कहा कि इस संकल्पना को पूर्णत: त्याग देना चाहिए क्योंकि यह मानव और प्रकृति को अलग करता है।

(iv) नियतिवादी संकल्पना के सबसे आलोचक संभववादी भूगोलवेता हुए जिनमें फ्रांसीसी भूगोलवेता सबसे प्रमुख हैं।

(v) ब्लास महोदय ने कहा कि प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार की भूमिका निभा सकता है न कि निर्णायककर्ता हो सकता है।

(vi) ब्रूंश महोदय ने नियतिवाद की आलोचना करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज पदार्थों को निकाल रहा है और प्रकृति मौन बनी रहती है।

निष्कर्ष

      उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि नियतिवादी संकल्पना के कई कट्टर आलोचक हुए। फिर भी नियतिवादी के विरोध में ही संभववादी संकल्पना का अभ्युदय हुआ। फलत: नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद की शुरुआत हुआ जिसके फलस्वरूप भूगोल के विषय वस्तु को विस्तृत आयाम देने में काफी मदद मिली।



नियतिवाद या निश्चयवाद पर नोट्स लिखने का दूसरा तरीका  इस प्रकार है 



नियतिवाद या निश्चयवाद (Determinism)

       मानव और प्रकृति के बीच में सदियों से संतुलन का संबंध रहा है। लेकिन भूगोल में कुछ ऐसे विचारधारा विकसित हुए हैं जिसके तहत कुछ विद्वान प्रकृति को श्रेष्ठ मानते हैं। जबकि कुछ विद्वान मानव को श्रेष्ठ मानते हैं। वैसी विचारधारा जिसमें प्रकृति को श्रेष्ठ माना गया है वैसी विचारधारा को नियतिवाद से संबोधित करते हैं। प्रकृति में सबसे सक्रिय तत्व पर्यावरण होता है। पर्यावरण मानव को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

      इसलिए इस विचारधारा को पर्यावरणवाद नाम से भी जानते हैं। प्रकृति के द्वारा घटित घटनाओं के संबंध में यह माना जाता है कि प्रकृति में जो भी घटनाएँ घट रही हैं। वे ईश्वर प्रदत और निश्चय है। इसलिए ऐसी विचारधारा को नियतिवाद या निश्वयवाद कहते हैं।

      निश्चयवाद एक ऐसा दर्शन है जो यह मानता है कि मानव एक निष्क्रिय अभिकर्ता या मोम का पुतला है। प्रकृति मानव के न केवल भौतिक विशेषताओं का बल्कि उसके समस्त सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक, मनोवैज्ञानिक चिंतन को प्रभावित करता है। सामान्यत: भूगोल में इस दर्शन का अभिउदय जर्मनी में हुआ।

      नियतिवाद को विकसित करने में कई भूगोलवेताओं का योगदान रहा है। यहाँ तक जर्मन भूगोल विकसित होने के पूर्व कुछ यूनानी एवं रोमन भूगोलवेताओं ने भी इसकी पुष्टि की है। जैसे-यूनानी भूगोलवेत्ताओं वे हिप्पोक्रेटस, अरस्तू इत्यादि का नाम उल्लेखनीय है। हिप्पोक्रेटस ने अपनी पुस्तक “वायु, जल और स्थान” में लिखा है कि “मानवीय अधिवास मूलत: वायु, जल और स्थान जैसे भौतिक कारकों से निर्धारित होते हैं। उन्होंने नील नदी घाटी का उदा० देते हुए बताया है कि नील नदी घाटी में सघन जनसंख्या निवास करती है क्योंकि वहाँ के वायु, जल और स्थान मानव के लिए अनुकूलित है।”

            अरस्तू ने बताया है कि “शीत प्रदेश निवासी शाहसी, राजनैतिक संगठन बनाने में दक्ष और अपने पड़ोसियों पर शासन करने के लिए उपयुक्त होते हैं।” यहाँ तक कि एशिया के लोग इसीलिए कमजोर एवं डरपोक हैं और यूरोप के लोग उन्हें गुलामी के जंजीर में जकड़ लिया है।

          रोमन भूगोलवेता स्ट्रैबो ने अपनी पुस्तक “ढाल, उच्चावच और जलवायु” में लिखा है कि ढाल, उच्चावच और जलवायु प्रकृति के द्वारा प्रदत और ये तीनों ही तत्व मानव जीवन शैली को नियंत्रित करते हैं।

        मध्ययुगीत चिंतकों में बोल्डिंग, और मोण्टेस्क्यू ने बताया कि “मानव का अधिवास और उसका कार्यकलाप जलवायु, उच्चावच और मिट्टी के द्वारा नियंत्रित होती है।”

कई अरब भूगोलवेता भी नियतिवादी विचाराधार का समर्थन करते हैं। जैसे- अलमसूदी ने कहा है “उस भूमि में जहाँ जल की अधिकता पायी जाती है वहाँ के निवासी प्रफुल्लित और विनोदप्रिय होते हैं। जबकि शुष्क प्रदेश के निवासी असंतुलित (पागल) और अविनोदप्रिय होते हैं।”

         इतिहासकार जार्ज थाटन ने नियतिवाद विचारधारा को समर्थन करते हुए कहा है कि दो अलग-2 भौगोलिक प्रदेशों में निवास करने वाले निवासी में विभिन्नता भौगोलिक वातावरण के कारण ही उत्पन्न होता है।

          जर्मन भूगोलवेता इमैनुएल काण्ट ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि उष्ण प्रदेश के निकासी सुस्त और भिरू (डरपोक) होते हैं जबकि शीत प्रदेश के लोग साहसी और दृढ़ होते हैं।

कई आधुनिक भूगोलवेता भी नियतिवाद के कट्टर समर्थक रहे हैं। जैसे-आधुनिक नियतिवाद विचारधारा विकसित करने का श्रेय हम्बोल्ट- और रीटर को जाता है। हम्बोल्ट ने इस विचारधारा का समर्थन “Cosmos” नामक पुस्तक में रीटर ने “अर्डकुण्डे” नामक पुस्तक में किया है।

       इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने न केवल मानव से प्रकृति को श्रेष्ठ मानते हैं बल्कि भौतिक भूगोल को ही मूल भूगोल मानते हैं। हम्बोल्ट ने तर्क देते हुए कहा है कि प्रकृति के ही कारण पर्वतीय प्रदेशों के निवासियों की जीवन पद्धति मैदान के लोगों से भिन्न होती है। इसी तरह रीटर ने कहा है कि भौतिक पर्यावरण ही मानव शरीर के गठन, बनावट और यहाँ तक ही स्वास्थ्य को भी निर्धारित करती है।

        जर्मन भूगोलवेत्ताओं में रेटजेल महोदय नियतिवाद के सबसे बड़े समर्थक रहे हैं। इन्होंने नियतिवाद के स्थान पर ‘वातावरणीय नियतिवाद’ शब्द का प्रयोग किया क्योंकि रैटजेल का मानना था कि मानव के ऊपर सम्पूर्ण प्रकृति का प्रभाव नहीं पड़ता बल्कि वातावरण का प्रभाव अधिक पड़ता है।

        पारिस्थैतिक वैज्ञानिक वकेल ने अपनी पुस्तक सभ्यता का “सभ्यता का इतिहास इन इंगलैण्ड” में बताया है कि मानव की सभ्यता प्रकृति के द्वारा ही निर्धारित होती है उन्होंने बताया है कि धन का संग्रह और उनका वितरण की प्रक्रिया भी जलवायु, मिट्टी और खाधान्न आपूर्ति से प्रभावित होती है।

         फ्रांसीसी भूगोलवेता फैब्रिक लैप्ली ने Place-Work-folk (स्थान-कार्य-संस्कृति) संकल्पना विकसित किया। उन्होंने इस संकल्पना में नियतिवाद का समर्थन करते हुए कहा है कि स्थान कार्य का निर्धारक होता है और कार्य संस्कृति का निर्धारक होता है।

            लैमोलीन नामक भूगोलवेता ने नियतिवाद के समर्थन में तर्क देते हुए कहा है कि वातावरण के द्वारा समाज का सौन्दर्यी किया जाता है।

     अमेरिकी भूगोलवेत्ताओं में डेविस, हटिंग्टन एवं मिस सेम्पल इत्यादि भी नियतिवाद के समर्थक रहे हैं। हटिंग्टन ने “मानव भूगोल के सिद्धत” नामक पुस्तक में मानवीय कार्यों का विभाजन नियतिवादी दृष्टिकोण से किया है।

       नियतिवाद के सबसे कट्टर समर्थक मिस सेम्पल को माना जाता है। ये रैटजेल महोदय के शिष्या थी, इसलिए इनके विचारों पर रैटजेल का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। इन्हें नियतिवाद का अंतिम भूगोलवेता भी माना जाता है। इन्होंने अपनी पुस्तक “Influence of geographic Environment” नियतिवाद के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं “मानव पृथ्वीतल का उपज है।”

       पुनः वे कहती हैं “मानव प्रकृति का अभिकर्ता है।” उन्होंने संभववादियों पर चुटकी लेटे हुए लिखा है कि मानव अपने कार्यों का डींग हाँकता है लेकिन प्रकृति मौन रहकर अपने कार्यों को सम्पादित करते रहता है। यहाँ तक कि मानव मोम का एक पुतला है प्रकृति जब चाहे तब उसे चुट‌कियों से मसल सकती है।

            कई ब्रिटिश भूगोलवेत्ताओं भी नियतिवाद के समर्थक रहे हैं। जैसे कार्ल मेकेये ने सेटलैण्ड द्वीप का अध्ययन करते हुए बताया कि वातावरणीय प्रभाव के कारण ही यहाँ के घोड़ों की ऊँचाई 3.5 फीट रह गया है।

           गैडीस (ब्रिटिश) महोदय ने मानव के स्वास्थ पर पोषण के प्रभाव का अध्ययन किया है। उन्होंने बताया है कि किस क्षेत्र में कौन खाद्य पदार्थ मिलेगा प्रकृति स्वयं निर्धारित करती है। उन्होंने भारत का उदाहरण देते हुए कहा है कि भारत में मुसलमानों की तुलना में हिन्दुओं में मलेरिया की बीमारी अधिक होती है क्योंकि हिन्दू लोग निरामिश (vegetarian) होते हैं।

निष्कर्ष:

         इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नियतिवादियों ने अपने-2 तर्कों के माध्यम नियतिवादी संकल्पना को पुष्ट करने का प्रयास किया है। यह संकल्पना भूगोल के विषय-वस्तु में द्वितीय विश्वयुद्ध तक विशेष मान्यता रखता था, लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानव ने जिस रफ्तार से विकास कार्य किया है वह चौकाने वाला है। अत: कई आधारों पर नियतिवाद की आलोचना भी की जाती है। इसके सबसे बड़े आलोचक फांसासी भूगोलवेत्ता और संभवावादी रहे हैं।

        संभववादियों ने कहा है कि नियतिवाद एक एकांकी विचारधारा है जिसमें प्रकृति को महत्व अधिक दिया गया है और मानव को निष्क्रिय अभिकर्ता माना गया है जो गलत है।

      स्पेट महोदय ने नियतिवाद का आलोचना करते हुए कहा है कि प्रकृति या वातावरण अपने आप एक अर्थहीन वाक्यांश है। बिना मानव के वातावरण का कोई महत्व नहीं है।

      ऑस्ट्रेलियाई विद्वान वोल्फ गांग हारटेक ने जर्मनी के दक्षिण भाग में स्थित फ्रैंकफर्ट नगर के सीमान्त क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए बताया है कि यहाँ भौतिक तत्वों की भूमिका नगण्य है। सर्वत्र मानवीय भूमिका का परचम लहरा रहा है।

        जर्मन भूगोलवेत्ता होर्टसोन ने कहा है कि नियतिवाद जैसे एकल विचारधारा मानव और प्रकृति को अलग-2 करते हैं। इससे भूगोल में विभाजन की खतरा उत्पन्न होती है। अत: भूगोलवेत्ताओं को ऐसे विचारधारा से बचना चाहिए।



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2. Dichotomy and Dualism (द्विविभाजन एवं द्वैतवाद)

Dichotomy and Dualism

द्विविभाजन एवं द्वैतवाद



Dichotomy and Dualism(नोट- द्वि, द्वै = दो, विभाजन = बँटवारा, वाद = विचारधारा)

             किसी विषय के कोई भी विषयवस्तु को लेकर दो प्रकार के विचार प्रस्तुत करना द्वैतवाद कहलाता है। जबकि किसी विषय के विषयवस्तु पर प्रस्तुत किया गया दो दृष्टिकोण में से किसी एक दृष्टिकोण को ही प्रमुख मान लेना द्विविभाजन कहलाता है अर्थात द्विविभाजन में दो प्रकार के स्वतंत्र विचारधारा प्रस्तुत किये जाते हैं। जबकि द्वैतवाद में किसी विषयवस्तु पर दो अन्तर संबंधित विचार प्रस्तुत किये जाते हैं। द्विविभाजन का प्रमुख उद्देश्य किसी भी विषय-वस्तु को बाँटना है। जबकि द्वैतवाद का मुख्य उद्देश्य बिना बँटवारा किये हुए वाद-विवाद के आधार पर विषय को विकसित करना है।

      16वीं शताब्दी तक भूगोल में किसी भी प्रकार के द्विविभाजन एवं द्वैतवाद का आगमन नहीं हुआ था। भूगोल में द्विविभाजन को जन्म देने का श्रेय इमैनुएल काण्ट को जाता है क्योंकि इन्होंने ही भूगोल को इतिहास से अलग करने का कार्य किया था। काण्ट के अनुसार किसी भी विषयवस्तु का अध्ययन दो संदर्भों में किया जा सकता है। प्रथम समय के संदर्भ में और द्वितीय स्थान के संदर्भ में।

    समय के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन करना इतिहास कहलाता है। जबकि स्थान के संदर्भ में किसी विषयवस्तु का अध्ययन भूगोल कहलाता है। इस तरह स्पष्ट होता है कि इमैनुएल काण्ट महोदय ने द्विविभाजन की संकल्पना को जन्म देकर भूगोल को इतिहास से पृथक करने का कार्य किया।

इमैनुएल काण्ट

          इमैनुएल काण्ट

         16वीं शताब्दी तक भूगोल में द्वैतवाद की कोई भी संकल्पना विकसित नहीं हुई। 17वीं शताब्दी में बर्नहार्ड वारेनियस ने पहली बार भूगोल के सामान्य भूगोल एवं विशिष्ट भूगोल में बाँटकर अध्ययन करने का प्रयास किया। लेकिन इनका उद्देश्य भूगोल को बाँटना नहीं था बल्कि भूगोल से संबंधित विषयवस्तु के अध्ययन को विकसित करना था। इस तरह वारेनियस के कार्य से भूगोल द्वैतवाद का श्रीगणेश हुआ।

बर्नहार्ड वारेनियस

बर्नहार्ड वारेनियस

        19 वीं शताब्दी में भूगोल के विषयवस्तु को लेकर पुनः द्वैविभाजन की स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि कुछ भूगोलवेता भूगोल में केवल प्राकृतिक भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे तो कुछ भूगोलवेता केवल मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। हम्बोल्ट, रीटर, डेविस, पेंक, मिस सेम्पल इत्यादि प्राकृतिक भौतिक भूगोल के अध्ययन को समर्थन करते थे।

      वहीं ब्लाश, ब्रूंस, डिमांजिया, मैकिन्डर जैसे भूगोलवेता मानव भूगोल के अध्ययन के पक्षधर थे। इस तरह भूगोल द्विविभाजन के आगमन के कारण बँटने के कगार पर पहुँच गया। भूगोल में विभाजन की समस्या उत्पन्न न हो इसलिए द्वैतवाद पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इस तरह भूगोल में विधितंत्र से संबंधित और भूगोल के विषयवस्तु को लेकर कई द्वैतवाद को जन्म देकर अध्ययन करने की परम्परा प्रारंभ हुई। जैसे:-

(1) सामान्य भूगोल बनाम विशिष्ट भूगोल

(2) भौतिक भूगोल बनाम मानव भूगोल

(3) सैद्धांतिक भूगोल बनाम व्यावहारिक भूगोल

(4) क्रमबद्ध भूगोल बनाम प्रादेशिक भूगोल

(5) नियतिवाद बनाम सम्भववाद

        द्विविभाजन एवं द्वैतवाद के कारण भूगोल के ऊपर मिश्रित प्रभाव देखा जा सकता है। द्विविभाजन के कारण कोई भी विषय बँटवारे के कगार पर पहुँच जाता है जबकि द्वैतवाद के कारण भूगोल के विषयवस्तु और उसके अध्ययन के तकनीक के विकास में मदद मिलती है। भूगोल के अलावे सभी कला विषय में द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की समस्या उत्पन्न हुई है। भूगोल में अब द्विविभाजन एवं द्वैतवाद की घटना इतिहास की घटना माना जाने लगा है। भूगोल को इस समस्या से मुक्त करने का श्रेय टेलर, सावर, हार्टसोन, हरबर्टसन जैसे भूगोलवेताओं को जाता है।

निष्कर्ष–

     निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि द्विविभाजन एवं द्वैतवाद से भूगोल के विषयवस्तु को विकसित करने में मदद अवश्य मिलती है लेकिन इनकी चरम परकाष्ठा भूगोल को विभाजित भी कर सकती है।

नोट :- हालाँकि यूनानी, रोमन और अरब भूगोलवेत्ताओं के लेखों में भी द्वैतवाद की धुंधली झलक मिलती है। हिरोडोटस ने जन-जातियों के विवरण के साथ-साथ उनकी प्राकृतिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है। स्ट्रेबो का प्रादेशिक विवरण और टॉलमी का गणितीय भूगोल पर ध्यान भी ऐसे विवरण हैं जो द्वैतवादी हैं। हिप्पोक्रेट्स, अरस्तु जिनोफोन, आर्यभट्ट, अल-मसूदी और इब्नखाल्दून ने अनेक लोगों के जन-जीवन शैली को प्राकृतिक वातावरण के प्रभावों द्वारा उनको स्पष्ट बनाया है।



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10. नगरीय वर्गीकरण

10. नगरीय वर्गीकरण


नगरीय वर्गीकरण⇒नगरीय वर्गीकरण

            नगरों का वर्गीकरण चार आधार पर किया जाता है:-

1. उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर

2. स्थानीयकरण अथवा बसाव स्थान एवं बसाव स्थिति के आधार पर

3. कार्यों के आधार पर

2. जनसंख्या आकार के आधार पर

उत्पत्ति तथा विकास के आधार पर नगरों का वर्गीकरण 

          नगरों के उत्पत्ति और विकास के आधार पर वैज्ञानिक विश्लेषण अनेक विद्वानों के द्वारा किया गया है। इस दृष्टि से पैट्रिक गेडिस, ममफोर्ड एवं ग्रिफिथ टेलर के कार्य अधिक महत्व के है। 

          पैट्रिक गेडिस के अनुसार नगरों का विकास व पत्तन की छः अवस्थाएँ जाती है जिन्हें मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है।

1. पैलियोटेकनीक वाले नगर में पुरानी अर्थव्यवस्था वाले नगर और

2. नियोटेकनीक नगर में नई अर्थव्यवस्था वाले नगर आते है।

                 टेलर ने नगरों के उत्पत्ति एवं विकास के आधार पर मानव जीवन चक्र से तुलना करते हुए सात अवस्थाओं की चर्चा की गई है-

1. पूर्व शैशवावस्था (Sub-infantile stage)⇒ इस अवस्था में मकानों के अंदर की दुकान फिर गली अथवा सड़क के दोनों ओर मकान तथा दुकान बनने लगते हैं।

2. शैश्वावस्था (Infantile stage)⇒ इस अवस्था में गलियों व सड़कों का कुछ सुधरा रूप दिखाई देने लगता है तथा बस्ती बढ़ने लगती है।

3. बाल्यवस्था (Juvenile stage)⇒ इस अवस्था में मुख्य सड़क के दोनों किनारों पर गलियों का निर्माण होना शुरू हो जाता है।

4. किशोरावस्था (Adolescent Stage)⇒ नगर में विभिन्न प्रकार के मकान दिखलाई देने शुरू हो जाते है। नगर अपना व्यापार-क्षेत्र अलग से बना लेते हैं।

5. प्रौढ़ावस्था (Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर की प्रत्येक क्षेत्र में विभिन्नता आ जाती है। रिहाइशी क्षेत्र, औद्योगिक क्षेत्र, व्यापारिक क्षेत्रों का पृथक्कीकरण स्पष्ट दिखाई देने लगता है। मकानों की ऊंचाई बढ़ने लगती है।

6. उत्तर प्रौढावस्था (Late Mature Stage)⇒ इस अवस्था में नगर का विकास योजना के अनुसार होने लगता है।

7. वृद्धावस्था (Sensile Stage)- यह नगर की अंतिम अवस्था है जिसमें नगर उजड़ने लगता है। चित्तौड़, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इस्फान (ईरान) इसी के उदाहरण हैं।

मैगापोलिस

               ममफोर्ड ने सामाजिक वातावरण को ध्यान में रखकर नगरों की छ: अवस्थाएँ बतायी हैं-

1. इओपोलिस

2. पोलिस

3. पट्रोपोलिस

4. मैगापोलिस

5. टायरेनोपोलिय

6. मेक्रोपोलिस

1. Eopolis- इस अवस्था में केंद्रीय स्थान पर नगर का विकास अपने शैशवकाल में होता है लेकिन नगर के आकार की पहचान नहीं हो पाती है।

2. Polis- इस अवस्था में जनसंख्या आकार बड़े हो जाते हैं तथा नगरीय आकार की पहचान संभव है। बड़े गाँव कस्बे का रूप धारण कर लेते है।

3. Metropolis- मुख्य नगर के आकार में पुनः वृद्धि होती है तथा इस पर निर्भर रहने वाले कई छोटी-छोटी नगरीय बस्तियाँ भी विकसित हो जाती है।

4. Megapolis- यह अवस्था नगर की चरम सीमा को बताती हैं। इसमें प्रादेशिक नगरीकरण की प्रवृत्ति होती है। आस-पास की ग्रामीण बस्तियों में भी नगरीय कार्यों की प्रधानता हो जाती है। अमेरिकन मेगापोलिस का विस्तार बोस्टन से लेकर बाल्टीकमोर तक हैं। रोर्टरडम-एम्सटर्डम मेगापोलिस। टोक्यो-योकोहामा-कवासाकी-कोबे मेगापोलिस इसके उदाहरण है।

5. Trynopolis- इस अवस्था में नगर की जनसंख्या में ह्रास प्रारंभ हो जाता है। नगरीय आकर्षण पर्याप्त नहीं रह जाता। इसे Diging Stage of City कहते है। लंदन और पेरिस इसके उदाहरण है।

6. Nekropolis- इस अवस्था में नगर का पूर्ण पत्तन हो जाता है।उजड़े हुए नगर की इस अवस्था में चारों ओर  भग्नावशेष दिखाई देने लगते है। हड़प्पा, कन्नौज, तक्षशिला इसके उदाहरण है।

बसाव-स्थान (Site) व बसाव-स्थिति (Situation) में अंतर व संबंध  

             बसाव-स्थान (Site) वास्तव में बसाव-स्थिति (Situation) का एक छोटा अंग है। ये दोनों मिलकर नगर की उत्पत्ति व विकास पर प्रभाव डालते हैं। नगर एवं गाँव दोनों प्रकार के बस्ती के लिए Site और Situation महत्व रखता। इनके बीच निम्नलिखित अंतर है-

(i) बसाव-स्थान व बसाव-स्थिति में सबसे पहले अंतर रैटजेल ने किया। उसने बर्लिन नगर का अध्ययन कर यह बताया कि यह नगर ऐसे बसाव-स्थान पर है जहाँ कि उसके बड़ा नगर बनने की संभावना नहीं थी, परंतु जर्मनी के उपजाऊ मैदान में इसकी बसाव-स्थिति ही इसके विकास का कारण बनी और यह एक बड़ा नगर बन गया।

(ii) बसाव स्थान भौतिक विशेषताओं पर अधिक बल देता है, जबकि बसाव-स्थिति में प्राकृतिक एवं मानवीय दोनों परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाता है।

(iii) बसाव-स्थान विशिष्टता रखने वाला होता है लेकिन बसाव-स्थिति व्यापक होती है।

(iv) नगर व गाँव दोनों प्रकार की बस्ती के लिए बसाव-स्थान का महत्व होता है लेकिन बसाव-स्थिति ही होती है, जो गाँव के आकार को वृद्धि प्रदान करके उसको नगर में परिवर्तित कर देती हैं।

(v) गंगा-यमुना नदियों का संगम तथा गंगा के अर्द्ध-वृत्ताकार मोड़ बसाव-स्थान की विशेषता है। जिन्होंने नगर को वर्तमान आकृति प्रदान की है। इन नदियों के बीच की भूमि बाढ़ से सुरक्षित होने के कारण बसाव-स्थिति की दृष्टि से उपयुक्त थी। बसाव-स्थिति की दृष्टि से नगर अपने चारों और विस्तृत उपजाऊ भूमि, अतिरिक्त कृषि उत्पादन, रेल व सड़क मार्गों का जंक्शन आदि सुविधाएँ रखता है।

            बसाव स्थान वह भू-भाग है जहाँ पर नगर बसा होता है। किसी नगर का विकास किस दिशा में होगा यह उसके बसाव स्थान पर निर्भर करता है। जैसे-यदि नगर किसी सड़क या नदी के किनारे बसा है तो उसकी आकृति लंबी होगी। बसाव स्थान के अंतर्गत उस स्थान को धरातलीय दशा, भूगर्भिक दशा, जलप्राप्ति आदि का अध्ययन करते हैं।

           नगर प्रारंभ में बसाव स्थान की आकृति के अनुरूप ही फैलना शुरू करता है। बाद में समय के साथ-साथ अपने आकार में वृद्धि कर लेता है। उन दिशाओं में फैलता है, जहाँ पर भूमि नगरीय विकास के लिए उपयुक्त होती है और यातायात मार्गों के सहारे बढ़ता है लेकिन यदि किसी नगर का बसाव-स्थान कुछ भौतिक असुविधाओं से युक्त है तो भी वहाँ पर नगर का विस्तार होता है ऐसा तब होता है, जब नगर स्थिति बसाव स्थिति को तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे स्थान पर भूमि की कीमत ऊँची होती हैं। इस प्रकार बसाव स्थान का तात्पर्य उस जगह से है जहाँ नगरीय आकारिकी का विकास होता है जबकि बसाव स्थिति का संबंध बसाव स्थल के चारों तरफ पाये जाने वाले प्राकृतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक वातावरण से है, जो नगर के विकास में सहायक होता है। दोनों ही कारक मिलकर नगरीय बस्ती का स्थानीयकरण करते हैं। इस कारण बसाव स्थान और बसाव स्थिति के आधार पर किया गया वर्गीकरण स्थानीयकरण के आधार पर किया गया वर्गीकरण माना जाता है।

भौगोलिक स्थानीयकरण के आधार पर नगरों का वर्गीकरण अथवा बसाव-स्थान तथा बसाव-स्थिति के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

         भौगोलिक स्थानीय करण अर्थात बसाव-स्थल तथा बसाव स्थिति के अनुसार नगरों को दो प्रमुख भागों में बाँटते है-

(A) जलीय सुविधा के किनारें बसे नगर और

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर

(A) जलीय सुविधा के किनारे बसे नगर- इसे पुन: तीन भागों में बाँटते है:-

(a) नदी के किनारे बसे नगर- इसे पुन: छ: भागों में बाँटते है:- 

(i) जलप्रपात नगर-  जलप्रपात के सुविधा के कारण पर्यटन स्थल बन गया है। उदाहरण सागर (कर्नाटक), भेड़ाघाट, नियाग्रा।

(ii) मोड़ लेते हुए बसाव-स्थलीय नगर- यह बाढ़ से मुक्त नगर होता है।  जैसे -आगरा, जायरे का लिविंग स्टोन नगर।

(iii) संगम स्थल पर बसा नगर- जहाँ दो नदियों का संगम होता है वहाँ बसे नगर इसके तहत आते है। जैसे प्रयाग, अलकनंदा और भागीरथी के संगम पर वसा देवप्रयाग, स्वर्णरेखा और खरकई के संगम पर बसा जमशेदपुर।

(iv) ब्रिजटाउन या नदियों के  दोनों किनारों पर बसे नगर। जैसे लंदन (टेम्स) बुडापेस्ट (डेन्यूब), श्रीनगर (झेलम)  

(v) ज्वारीय नगर – ज्वारभाटा के जल से नदियों के मुहानो पर बंदरगाह बन जाते हैं जिससे समुद्र से दूर आंतरिक भाग में नगर बन जाते हैं। जैसे हुगली के किनारे कलकत्ता।

(vi) प्राकृतिक बाँध नगर- बाढ़ के मलबे से धरातलीय ऊंचाई में वृद्धि होती है तो प्राकृतिक बाँध बन जाता है।

उसी पर नगर बस जाते हैं। जैसे पटना, बुहांग वियना।

(b) झील के किनारे बसे नगर:- प्रायः झील के किनारे भी नगरों का विकास हो जाता है। इसके कई कारण है।

जैसे-

(i) पर्यटन के चलते- पुष्कर झील के किनारे पुष्कर नगर, इसी तरह नैनीताल को भी लिया जा सकता है।

(ii) औद्योगिक गतिविधि के चलते- कर्लोस (झील के किनारे), ग्रेटसाल्ट लेक (USA)।

(iii) नौकागम्य के कारण- महान झील के किनारे- क्लीवलैंड, बफैलो, कम्पाला (युगांडा), डलुथ आदि अस्थावान (कैस्पीयन पर), बोल्गा नदी के मुहाना पर बने झील पर बसे नगर।

(c) समुद्री प्रभाव से भी कई प्रकार के नगर विकसित होते हैं। जैसे-

(i) पुलीन नगर- यहाँ पर पर्यटन का विकास हो जाता है। जैसे मियामी बीच सिटी, कोयलम, दीघा (WB) आदि।

(ii) ज्वारनद-मुख नगर- ज्वारनद्मुख नगर प्राकृतिक बंदरगाह के कारण जैसे सूरत (ताप्ती के किनारे) नावें और स्वीडेन के सभी।

बंदरगाह- जैसे डंवर फिस्ट, गोटेंवर्ग (नार्वे)

(iii) लैगुन के किनारे बसे लैगुन नगर- जैसे आस्ट्रेलिया के टाउंसविले, भारत में कोचीन का विकास।

(iv) द्वीपीय नगर- द्वीपों पर संचार या जहाजरानी के कारण जैसे पोर्टब्लेयर।

(v) बंदरगाह नगर या जलमार्ग नगर- समुद्री जलमार्ग के सुविधाओं के कारण तट के किनारे प्राकृतिक बंदरगाह के अलावे कृत्रिम बंदरगाह भी विकसित किए जाते है। जैसे मद्रास।

(B) जलीय सुविधा से दूर बसे नगर- इसके भी छः प्रमुख वर्ग आते है। जैसे-

(1) सीमावर्ती नगर- सीमा के किनारे सामरिक महत्त्व के कारण जैसे राजौरी एवं पिथौरागढ़ आदि।

(ii) परिवहन मार्ग पर विकास  नगर- काठगोदाम (नैनीताल) परिवर्तन से बने नगर और योगेन्द्र नगर (HP)। 

(iii) धर्मिक नगर-  धार्मिक कारण से बने नगर  जैसे- अजमेर, वाराणसी। 

(iv) शैक्षणिक नगर- जैसे पिलानी, रुढ़की।

(v) क्रोड नगर- परिवहन मार्गों के संगम स्थल पर बसा नगर है। जैसे लंदन, पेरिस, शिकागो, पंडित दीन दयाल उपाध्याय नगर। 

(vi) सेवा केंद्र नगरीय बस्ती- मूलत: ग्रामीण क्षेत्रों की केन्द्रीय बस्ती होती है और आसपास के लोगों के बाजार सुविधा के लिए ग्रामीण बाजार बस्तियाँ विकसित होती है जैसे प्राय: हर देश के ग्रामीण क्षेत्र में। 

नगरों का कार्यिक वर्गीकरण

          यद्यपि नगरों का कार्य द्वितीयक और तृतीयक प्रकार का होता है लेकिन नगरों में कार्यिक विशेषता की प्रवृत्ति होती है। इसी विशेषता के आधार पर नगरों का कार्यिक वर्गीकरण किया जाता है। यह विशेषता उसकी भौगालिक वातावरण का परिणाम होता है। 

       कई भूगोलवेत्ताओं ने कार्यिक विशेषीकरण के आधार पर नगरों के वर्गीकरण का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों का वर्गीकरण इस प्रकार से है-

1. मेकेंजी का वर्गीकरण- मेकेंजी ने कार्यिक विशेषता को आधार मानते हुए नगरों को दो भागों में बाँटा है-

(A) सक्रीय नगर (Active Town or Basic Town)- वैसे नगर जो उत्पादन कार्यों में संलग्न है अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था को आर्थिक लाभ दे रहें हो।

(B) अक्रीय नगर (Passive or Non-Basic Town)- वैसे नगर जहाँ उत्पादन कार्य ठप्प पड़ गया हो अथवा नगरीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक योगदान न के बराबर दे रहें हों इसके तहत अधिवासी नगर, शिक्षा नगर, धार्मिक नगर आदि आते हैं।

2. जेलसन का वर्गीकरण-

(i) औधोगिक नगर-जैसे ऐसेन, बर्मिधम आदि।

(ii) खनन नगर- जैसे जोहान्सबर्ग, चुकियामाता, कालगुर्ली, टैक्सास आदि।

(iii) परिवहन एवं संचार नगर- जैसे शिकागों, कोवे, वेनिस, डुजोन मारसर्ली आदि। 

(iv) प्रशासनिक नगर- जैसे कैनबेरा, इस्लामाबाद, मास्को, पैकिंग, वाशिंगटन, हेग आदि।

(v) व्यवसायिक नगर

(vi) वित्त एवं बीमा नगर

(vii) मुद्रा व्यापार नगर

(vi) थोक व्यापार का केंद्रीय नगर

(ix) सेवा केंद्र वाला नगर

(x) विविध कार्यों का नगर- सैनिक  महत्व, स्वास्थ्य केंद्र, क्रीडा केंद्र, धार्मिक केंद्र आदि।

3. एस्कार्ट एंड मोसर का वर्गीकरण- भूगोलवेत्ता एस्कोट एवं मोसर ने बहुचरक विधि का प्रयोग करते हुए  ब्रिटिश नगरों को चौदह भागों में बाँटा है। इसके लिए उन्होंने 67 चरों का प्रयोग किया। इस आधार पर निम्नलिखित वर्गीकरण है-

(1) समुद्रतटीय स्वास्थ्य

(ii) वाणिज्यिक प्रशासनिक नगर 

(iii) रेलवे जंक्शन वाला नगर

(iv) वृहत बंदरगाह नगर

(v) सूती वस्त्र वाला नगर

(vi) औद्योगिक नगर

(vii) औद्योगिक सह वाणिज्यिक नगर

(viii) उपनगर

(ix) मिश्रित अधिवासी नगर

(x) नवीन मिश्रित अधिवासी नगर

(xi) हल्के उद्योग का नगर

(xii) पुराने औद्योगिक नगर

(xiii) नवीन औद्योगिक नगर

(xiv) नवीन औद्योगिक उपनगरनगरीय वर्गीकरण

          बहुचरक विधि के एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि सभी देशों के लिए समान चर और समान वर्गीकरण नहीं हो सकते है। जैसे ब्रिटेन में अनेक नगर सूती वस्त्रों के कारण बसे हैं। इस प्रकार की संभावनाएँ थाइलैंड, इंडोनेशिया जैसे देशों में नहीं हो सकता। अतः एस्कोट एवं मोसर ने यह बताया है कि सभी देशों को अपनी परिस्थितियों के अनुरूप अपने चरों का निर्धारण करना होगा। इसी आधार पर कार्यिक वर्गीकरण संभव है।

4. अशोक मित्रा का वर्गीकरण- भारतीय नगरों के कार्यिक वर्गीकरण हेतु अशोक मित्रा का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। कार्यिक विशेषता के आधार पर भारतीय नगरों को निम्नलिखित सात वर्गों में रखा है-

(i) उत्पादन नगर⇒

औद्योगिक नगर- बोकारो, टाटा, भिलाई, सिंदरी, हावड़ा

खनन केंद्र- धनबाद

तेल निकालने वाला नगर- डिगबोई

(ii) वाणिज्यिक और व्यापारिक नगर⇒ हापुड़, काठगोदाम, रक्सोल आदि।

(iii) प्रशासनिक नगर⇒ गांधी नगर, चण्डीगढ़, ईटानगर, भोपाल, भुवनेश्वर।

(iv) परिवहन नगर⇒ पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर, कालीकट, विशाखापट्नम।

(v) सांस्कृतिक नगर⇒ अजमेर, पुष्कर, काशी, मथुरा, गया, अमृतसर, मदुरई।

(vi) पर्यटन तथा स्वास्थ्यवर्धक नगर⇒ श्रीनगर, नैनीताल, शिमला, मसूरी, ऊँटी आदि।

(vii) विविध कार्यों का नगर⇒ भारत के सभी महानगर इसमें आएँगे जैसे- दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई आदि।

छावनियाँ- अंबाला, मेरठ, लैंसडॉन आदि

शिक्षा का केंद्र- शांति निकेतन, उज्जैन, सागर

विस्थापितों का नगर⇒ द० हस्तिनापुर

            इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि नगरीय वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिली है।

जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण

          जनसंख्या के आधार पर नगरों का वर्गीकरण में कार्यिक विशेषता को विशेष महत्व प्राप्त है क्योंकि इससे नगर नियोजन कार्यक्रम में विशेष सहायता मिलती है।

 जनसंख्या के आधार पर भी नगरों का वर्गीकरण का प्रयास किया गया है। इसके लिए विभिन्न देशों में अलग-अलग मानदंड अपनाये गये है। भारत, मलेशिया, थाईलैंड जैसे देशों में नगरीय मान्यता के लिए 5000 जनसंख्या का होना आवश्यक है लेकिन नार्वे, स्वीडन, डेनमार्क जैसे देशों में मात्र 200 जनसंख्या उसका आधार है। पुन: नगरीय जनसंख्या को आधार माना जाए तो USA में वह कोई भी नगर महानगर है जिसकी जनसंख्या करीब 54 हजार है और उसके कई सहयोगी नगरीय बस्तियों का विकास हुआ है। भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ पर महानगरीय मान्यता के लिए सहायक नगरीय बस्तियों का होना आवश्यक नहीं लेकिन महानगर की जनसंख्या 10 लाख से अधिक हो सकती है। 

        अगर सभी देशों की सामान्य मान्यता को देखा जाए तो जनसंख्या आकार के आधार पर नगरीय बस्तियाँ निम्न प्रकार की होती है-

1. छोटे आकार के सेवा केंद्र- वह छोटी से-छोटी बस्ती जो गैर प्राथमिक कार्यों से जुड़ा हो। ऐसे केंद्रों के लिए आवश्यक नहीं कि वह मान्यता प्राप्त नगरीय बस्ती हों।

2. शहर- जिसकी जनसंख्या एक लाख से कम हो।

3. नगर- जिसकी जनसंख्या एक लाख एवं उससे अधिक हो।

4. महानगर- भारत में कोई भी नगरीय बस्ती महानगर है जिसकी जनसंख्या 10 लाख या उससे अधिक हैं लेकिन USA तथा जापान में कोई भी नगरीय बस्ती तब तक महानगर नहीं हो सकता जब तक कि उसका सहयोगी नगर न हो। वहाँ वस्तुतः सबसे बड़ी नगर के लिए 50,000 जनसंख्या जरूरी है।


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तुर्की तथा सीरिया के भूकंप @ 2023

तुर्की तथा सीरिया के भूकंप @ 2023


तुर्की तथा सीरिया के भूकंप⇒

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

भूकंप के दो बड़े झटकों ने तुर्की एवं सीरिया में तबाही मचा दी। इस भूकंप से जहाँ लगभग 34000 से अधिक लोग मौत की नींद सो गए वहीं हजारों लोग घायल हो गए और कई तो मलबे में दब गये हैं। पहला भूकंप सीरियाई सीमा के पास स्थित गजियांतेप के नजदीक 6 फरवरी 2023 को आया था। रिक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 7.8 थी जिसे लगभग सुदूर ब्रिटेन तक महसूस भी किया गया। 9 घंटे बाद तुर्की में पुन: दूसरे भूकंप आया जिसकी तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 7.5 थी। पुन: तुर्की में भूकंप के 36 घंटो बाद में लगभग 100 से ज्यादा भूकंप आया। हालांकि, यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे के भूकंप वैज्ञानिक सुसान हफ का कहना है कि इसमें चौंकने वाली बात नहीं है, कई बार आफ्टरशॉक मूल भूकंप से भी ज्यादा तीव्रता के भूकम्प आते है। वैज्ञानिकों को ऐसा लगता है कि यह भूकंप ”इंटरसेक्टिंग फॉल्ट” की वजह से आया है। यह स्थिति तब होती है जब एक टेक्टॉनिक प्लेट दूसरी टेक्टॉनिक प्लेट के ऊपर आने की कोशिश करती है। तुर्की सरकार के अनुसार इस तबाही में लगभग 3,450 से अधिक छोटी बड़ी इमारतें जमींदोज हो गईं। इनमें से कई तो आधुनिक इमारतें थीं जिनका निर्माण ढाँचे के ”पैनकेक मॉडल” के आधार पर किया गया था लेकिन यह मॉडल भूकंप के आगे नाकाम साबित हुआ।

⇒ ऐसे तो तुर्की तथा सीरिया के भूकंप आम बात है क्योंकि ये दोनों देश भूकंपीय क्षेत्र रूस से सटे सक्रिय क्षेत्र में स्थित है, जहाँ तीन टेक्टोनिक प्लेट पृथ्वी की सतह के नीचे लगातार एक-दूसरे से टकरा रही हैं। इन क्षेत्रों में भूकंपों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड कम-से-कम दो हजार साल पुराने हैं। पूर्व में सत्रहवीं सदी में आए महाविनाशकारी भूकंप ने तुर्की के एक दर्जन से अधिक शहरों को समतल कर दिया था। इन भूकंपों की मेजबानी करने वाला ईस्ट एनाटोलियन फॉल्ट जोन अरब और एनाटोलियन टेक्टोनिक प्लेटों के बीच की सीमा पर है। ये टेक्टोनिक प्लेट प्रत्येक वर्ष लगभग 6 से 10 मिमी० की गति से एक-दूसरे से आगे लगातार बढ़ते जा हैं। ये प्लेट अक्सर एक-दूसरे को धक्का देते हैं। कभी-कभी टेक्टोनिक प्लेट एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं, जिसका असर सतह पर देखने के लिए मिलता है। हाल में आया भूकंप इसी का एक नमूना है।

⇒ भूकंप आज से नहीं बल्कि हजारों साल से आते रहे हैं। तुर्की में भूकंप आम हैं क्योंकि यह देश भूकंप की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में आता है। ऐसे क्षेत्र में जहाँ पृथ्वी की सतह के नीचे तीन टेक्टॉनिक प्लेटें लगातार एक-दूसरे के साथ घर्षण करती रहती हैं। लगभग दो हजार सालों से तुर्की भूकंप का सामना करता रहा आ है। 17वीं शताब्दी में तुर्की के कई शहर भूकंप से तबाह हो गए थे।

⇒ भूकंप अक्सर ”ईस्ट अनातोलियन फॉल्ट” जोन में आते हैं जो अरेबियन और अनातोलियन टेक्टॉनिक प्लेटों के मध्य में सीमा पर स्थित है। ये दोनों प्लेटें हर साल 6 से 10 मिमी० की गति से एक-दूसरे के पास आ रही हैं। इस क्षेत्र में उत्पन्न तन्यता का दबाव रुक रुक कर आए भूकंप के चलते धीरे-धीरे कम हुआ। यह सिलसिला बरसों-बरस चलता रहा। इसे देखते हुए हाल ही में आये भूकंप आश्चर्यजनक नहीं हैं। यह भी जाहिर है कि यहाँ अवसंरचना भी जोखिम के साए में है।

⇒ बीते करीब 2000 साल में हमने ऐसी इमारतों के निर्माण के बारे में बहुत कुछ सीखा है जो भूगर्भीय हलचल होने पर सुरक्षित रहें। लेकिन यह भी सच है कि इस क्षेत्र में तथा दुनिया के दूसरे हिस्सों में इमारतों का निर्माण प्रभावित करने वाले कई कारक भी हैं।

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

बिल्डिंगों का घटिया निर्माण होना सबसे बड़ा कारक

ऐसा प्रतीत होता है कि ध्वस्त हुई कई इमारतें भूकंप की दृष्टि से पर्याप्त सुदृढ़ीकरण के बिना कंक्रीट से बनी थीं। इस क्षेत्र में इमारतों के भूकंप संबंधी कोड संकेत देते हैं कि इन इमारतों को इतना मजबूत होना चाहिए था कि वे भूकंप के तेज झटके सह लेतीं। ये झटके आम तौर पर भूमि में सामान्य गुरूत्व के 30 से 40 फीसदी अधिक होते हैं। ऐसा लगता है कि 7.8 और 7.5 तीव्रता के भूकंप की वजह से कंपन की दर गुरूत्व के 20 से 50 फीसदी के बीच रही। ”डिजाइन कोड” से कम तीव्रता की थर्राहट भी ये इमारतें नहीं सह पाईं। तुर्की और दुनिया के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षित इमारतों का निर्माण सुनिश्चित करना और भूकंप के मद्देनजर समुचित ”इमारत कोड” का पालन करना एक बड़ी समस्या है।

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

इससे पूर्व में भी आये तुर्की में महा विनाशकारी भूकंप
1999ई० में इज्मित के समीप आए भूकंप ने करीब 17,000 लोगों की जान ली थी और लगभग 20,000 इमारतों को मिट्टी में मिला दिया था। 2011 में आए भूकंप ने सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। तुर्की के तत्कालीन प्रधानमंत्री रजब तैयब एर्दोआन ने तब मृतकों की अधिक संख्या के लिए इमारतों के गुणवत्ताहीन निर्माण को दोषी ठहराया था। उन्होंने कहा था ”नगर निकायों, ठेकेदारों, निरीक्षकों को देखना चाहिए कि उनकी लापरवाही इस हत्या की वजह है।”

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

इमारतों का पुन: र्निर्माण सबसे बड़ी समस्या
तुर्की के अधिकारी यह जानते हैं कि कई इमारतें भूकंप को सह नहीं पाएंगी लेकिन यह समस्या उनके लिए समाधान से परे है। कई इमारतें बन चुकी हैं और भूकंप रोधी उपाय या तो महंगे हो सकते हैं या अन्य सामाजिक आर्थिक चुनौतियों के चलते उन पर प्राथमिकता से विचार नहीं किया गया। बहरहाल, इन इमारतों का पुनर्निर्माण इन्हें अधिक सुरक्षित बनाने का एक अवसर दे सकता है। तुर्की ने इमारतों को भूकंप रोधी बनाने के लिए 2019 में नए नियमन में पैनकेक मॉडल तय किए। इन नियमन का स्वागत तो किया गया लेकिन यह देखा जाना अभी बाकी है कि क्या इनसे इमारतों की गुणवत्ता में वास्तव में सुधार हो पाएगा?

तुर्की तथा सीरिया के भूकं

भूकंप और पर्यावरण
इतने कम अंतराल में एशिया में आए कई बड़े भूकंप से हमें कुछ तो सीखना ही होगा। पहले नेपाल, अफगानिस्तान और अब तुर्की तथा सीरिया में आया भूकंप यह संकेत है कि हमें नए सिरे से पर्यावरण को समझना होगा। पर्यावरण और भूकंप दो अलग-अलग विषय हो सकते हैं पर भूकंप की वजह से होने वाले नुकसान से पता चलता है कि पर्यावरण के प्रति हमारा व्यवहार कैसा हो गया है। भूकंप से अवसंरचना को जिस तरह नुकसान पहुंचा है उससे पर्यावरण को दूरगामी प्रभाव पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इन प्रभावों की वजह से भी कई जगहों पर इमारतों का पुनर्निर्माण असुरक्षित हो सकता है। इसे देखते हुए जरूरी है कि कहां क्या निर्माण किया जाना है इस संबंध में योजना बनाकर निर्णय किए जाएं ताकि भविष्य में जोखिम का खतरा कम हो सके। सुरक्षित पर्यावरण भूकंपीय आपदाओं को तो नहीं रोक सकता पर इसकी तीव्रता से होने वाले बड़े नुकसानों को अवश्य कम कर सकता है। अब भूकंप का केंद्र चाहे कहीं भी हो पर अगर हम अपने ठिकानों को पारिस्थतिकीय रूप से सुरक्षित और बेहतर रखेंगे तो निश्चित रूप से हम एक हद तक इन भीषण विनाशकारी से अपने को सुरक्षित रख सकते हैं।

⇒ समय बीतने के साथ तुर्की और सीरिया में तबाही का दायरा बढ़ता जा रहा है। हालांकि भारत समेत दुनिया के कई देशों की टीमें यहाँ राहत-बचाव कार्यों में लगातार जुटी हुई हैं। वसुधैव कुटुंबकम को मानने वाले भारत संकट की इस घड़ी में तुर्की और सीरिया को मदद मुहैया करा रहा है और इस अभियान का नाम ‘ऑपरेशन दोस्त‘ दिया गया है।


स्रोत:

1. https://navbharattimes.indiatimes.com/world/rest-of-europe/what-was-reason-for-earthquake-in-turkey-has-erdogan-building-pancake-model-failed-during-kahramanmaras-earthquake/articleshow/97700434.cms

2. https://www.amarujala.com/columns/opinion/adding-to-the-environment-from-the-earthquake-hindi

3. https://www.aajtak.in/world/story/earthquake-in-turkey-syria-photos-of-turkey-earthquake-ground-situation-in-turkey-ntc-1631688-2023-02-07

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