14. Thermal Inversion / तापीय विलोमता

14. Thermal Inversion / तापीय विलोमता


तापीय विलोमता / प्रतिलोमन ⇒

       सामान्य तौर पर क्षोभमंडल मे नीचे से ऊपर की ओर जाने पर सामान्य ताप ह्रास का नियम लागू होता है। लेकिन जब सामान्य ताप ह्रास के बदले तापमान में वृद्धि होने लगती हो तो उसे तापीय विलोमलता (Thermal Inversion) कहते हैं। जलवायुवेताओं के अनुसार तापीय विलोमता क्षोभमंडल से सम्बंधित है। ये विलोमताएँ मौसमी परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।

Thermal Inversion

तापमान की विलोमता के लिए आदर्श दशाएँ:-

(i) शीतकालीन लम्बी रातें

(ii) स्वच्छ एवं मेघ रहित आकाश

(iii) शुष्क पवन

(iv) शान्त एवं स्थिर वायुमण्डल

(v) हिमाच्छादित धरातल

तापीय विलोमता (Thermal Inversion) का प्रकार

          तापीय विलोमता 5 प्रकार के होते हैं:-

(1) सतही तापीय विलोमता

        पर्वत और सँकरे घाटी प्रदेश में सतही तापीय विलोमाता पायी जाती है। स्वीटजरलैण्ड इसके लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसके अंतर्गत पर्वतीय चोटी सबसे पहले सूर्याताप प्राप्त करते हैं जिसके कारण उपरी भाग गरम हो जाता है जबकि घटियाँ 2½-3 घंटे बाद सूर्याताप प्राप्त करती है। यही कारण है कि चोटी पर तापमान अधिक और घाटियों का तापमान न्यून बना रह जाता है। फलतः सुबह में नीचे से ऊपर जाने पर तापमान घटने के बजाय तापमान बढ़ता चला जाता है।

(2) ऊपरी वायु की तापीय विलोमता

         ऊपरी वायु की तापीय विलोमता की स्थिति पछुवा वायु से संबंधित है। पछुवा वायु का उद्गगम उपोष्ण उच्च वायु क्षेत्र से होता है। पछुआ हवा एक गर्म वायु है जो निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चलती है। उपध्रुवीय क्षेत्र में कोरियालिस प्रभाव के कारण पछुआ वायु को ऊपर वायुमण्डल में प्रक्षेपित कर दिया जाता है। जबकि निचले घरातल पर ठंडे वायु का साम्राज्य बना रहता है। फलत: इन क्षेत्रों में बढ़ते हुए ऊँचाई के साथ तापमान में कमी आने के बजाय तापमान बढ़ने लगती है।

(3) नीचे गिरती हुई वायु से उत्पन्न विलोमता

            उपोषण उच्च भार वाले प्रदेश में कभी-2 गिरती हुई वायु के कारण तापीय विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। उपोषण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में वायु के आंतरिक दबाव के कारण हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। जिसके ऊपरी भाग में गर्म वायु का सम्राज्य हो जाता है जबकि ठीक उसके नीचे आंतरिक वायुदाब कम होने के कारण तापमान निम्न रह जाता है। फलत: तापीय विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। सामान्य रूप से ये घटनायें 400-600 मी. की ऊँचाई पर सम्पन्न होता है।

(4) वाताग्र तापीय विलोमता

         मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में पछुआ हवा तथा ध्रुवीय हवा के मिलने से वाताग्र का निर्माण होता है। ध्रुवीय वायु ठंडी एवं भारी होती है जिसके कारण वायुमंडल के निचले सतह पर ध्रुवीय वायु होती है। जबकि पछुवा हवा गर्म एवं हल्की होती है जिसके कारण यह ध्रुवीय हवा के ऊपर चढ़ने की प्रवृत्ति रखती है। यही कारण है कि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात (वाताग्र) वाले क्षेत्र के ऊपरी भाग में तापमान अधिक एवं निचले भाग में तापमान कम हो जाता है।

(5) विकिरण से उत्पन्न तापीय विलोमता

       पार्थिव विकिरण से भी विलोमता की स्थिति उत्पन्न होती है। पार्थिव विकिरण के कारण प्राय: सूर्यास्त के बाद पृथ्वी की सतह से तापीय विकिरण तेजी से होता है। सामान्यतः 90मी०-300मी० की ऊँचाई के बीच तापीय विकिरण से प्राप्त ऊष्मा का संग्रहण होता है। इस परिस्थितियों में सतह की तुलना में 90मी०-300मी० ऊँचाई के बीच अधिक तापमान होता है जबकि सतह का तापमान कम रहता है। इस तरह से उत्पन्न तापीय विलोमता को विकिरण तापीय विलोमता कहते हैं।

निष्कर्ष

            उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि तापीय विलोमता क्षोभमंडल की एक विशिष्ट विशेषता है। जिसके कारण स्थानीय मौसमी वातावरण प्रभावित होते रहती है।


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15. वायुमण्डल का संगठन / Composition of The Atmosphere

15. वायुमण्डल का संगठन

(Composition of The Atmosphere)


वायुमण्डल⇒

वायुमण्डल का संगठन

         ठोस पृथ्वी के चारों ओर गैंसों का एक आवरण मिलता है जिसे वायुमण्डल (Atmosphere) कहते हैं। इसकी कई विशेषताएँ है। जैसे:-

(i) वायुमण्डल के ही अंतर्गत कई प्रकार के मौसमी एवं जलवायु सबंधित घटनाएं घटित होती है। हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है। जलवाष्प की उपस्थिति के कारण मौसमी घटनायें घटित होती है।

(ii) हमारा वायुमंडल कई उपपेटियों में विभक्त है।

(iii) वायुमण्डल में प्रतिरोधात्मक क्षमता है।

(iv) गुरुत्वाकर्षण बल के कारण वायुमंडल पृथ्वी से चिपका हुआ है।

(v) वायुमण्डल में वायुदाब, वायुसंचरण, जलवायु परिवर्तन जैसे गुण पाये जाते हैं।

(vi) वायुमण्डल अपने आपको लगातार स्वच्छ बनाए रखता है।

वायुमण्डल का संगठन (Composition of the Atmosphere)

      हमारा वायुमण्डल मुख्यत: गैस, जलवाष्प और धुलकण से निर्मित है। वायुमण्डल को निर्मित करने वाले संघटन की चर्चा नीचे कर रहे हैं-

(1) गैस (Gases)- हमारा वायुमंडल कई प्रकार के गैसों से निर्मित हैं।

क्रम गैस सूत्र आयतन (% में)
1. नाइट्रोजन N2 78.03
2. ऑक्सीजन O2 20.95
3. आर्गन Ar 0.93
4. कार्बन डाई ऑक्साइड CO2 0.036
5. नियॉन Ne 0.002
6. हीलियम He 0.0005
7. क्रिप्टन Kr 0.001
8. जेनन Xe 0.00009
9. हाइड्रोजन H2 0.00005

       उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि वायुमण्डल में नाइट्रोजन की मात्रा सर्वाधिक है। वायुमण्डल में यह दो कार्यों को सम्पन्न करता है-

(i) ऑक्सीकरण की क्रिया को मंद करता है या रोकता है।

(ii) नाइट्रोजन चक्र को संचालित करता है।

       हमारे वायुमण्डल में दूसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस ऑक्सीजन है जो ऑक्सीकरण तथा प्रज्वलन की क्रिया में मदद करता है। साथ ही जैविक श्वसन क्रिया का प्रमुख आधार है।

हमारे वायुमण्डल में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण गैस अक्रिय गैसे हैं। जैसे- आर्गन, नियॉन

      सभी अक्रिय गैसों को मिलाने पर वायुमण्डल में इनकी मात्रा 1% है। इनमें भी सर्वाधिक आर्गन (0.93%) है। ये वायुमण्डल में अति अल्प मात्रा में मौजूद है। वायुमण्डल में रहकर यह कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ को निष्क्रिय करती है।

      हमारे वायुमण्डल में ऑक्सीजन का एक अपरूप ओजोन (O3) के रूप में मौजूद है। यह गैस समताप मण्डल के ओजोन परत में पायी जाती है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक किरणों को शोखकर पृथ्वी को सुरक्षित करती है। इसलिए ओजन परत को “वायुमण्डल का छतरी” कहा जाता है।

      हमारे वायुमण्डल का अगला महत्वपूर्ण गैस ग्रीनहाउस गैसें हैं। इसके अंतर्गत CO2, CO, CFC, CH4 मिथेन जैसे गैसों को शामिल करते हैं। इनमें सिर्फ CO2 को छोड़कर शेष सभी गैस वायुमण्डल में प्रदूषक के रूप में मौजूद रहते हैं। CO2 गैस प्राकृतिक रुप से वायुमण्डल में मौजूद रहता है। CO2 गैस ही पार्थिव विकिरण को अवशोषित कर वायुमण्डल को गर्म बनाये रखता है। CO2 को “वायुमण्डल का कम्बल” भी कहा जाता है।

      अंतिम महत्वपूर्ण गैस हाइड्रोजन है जो जलवाष्प एवं जल के निर्माण में मदद करता है।

     सामान्यतः समुद्रतल से 80 Km की ऊँचाई तक गैस समान अनुपात में पाये जाते हैं लेकिन उसके बाद गैंसों का भिन्न-2 स्तर पाया जाता है। जैसे:-

      ऊँचाई               गैसों का स्तर

(i) 80 – 200 किमी०- N2 गैस के अणुओं का स्तर

(ii) 200 – 1100 किमी०- O2 गैस के परमाणु का स्तर

(iii) 1100 – 3500 किमी०- He गैस का स्तर

(iv) 3500 – 10000 किमी०- H2 परमाणु का स्तर

(2) जलवाष्प (Water Vapour)-

      जलवाष्प हमारे वायुमण्डल का दूसरा प्रमुख संघटक है। यह वायुमण्डल में 12 किमी० की ऊँचाई तक पायी जाती है। लेकिन 90% हिस्सा 8 किमी० की ऊँचाई तक ही मिलती है। कभी-2 वायु में चलने वाले संवहन तरंगों के कारण जलवाष्प को 50 किमी० की ऊँचाई तक पहुँचा दी जाती है।

    ये जलवाष्प ब्रह्माण्डीय धुल-कणों के साथ मिलकर विश्व में सबसे ऊँचाई पर मिलने वाले बादल निशा दीप्ति बादल का निर्माण करती है। वायुमण्डलीय जलवाष्प के कारण ही वर्षण क्रिया, बादल निर्माण क्रिया, कुहरा, कुहासा, ओस और आर्द्रण की क्रिया होती है। वायुमण्डल में जलवाष्प की आपूर्ति पृथ्वी के धरातल से ही वाष्पोत्सर्जन, वाष्पीकरण, उर्ध्वपातन (ठोस से गैस) की क्रिया द्वारा होता है।

(3) धुलकण (Dust Particle)-

       वायुमण्डल का तीसरा सबसे प्रमुख संघटक धूलकण है। वायुमण्डल में इसकी आपूर्ति दो स्थानों से होती है- ब्रह्माण्ड और पृथ्वी के धरातल से। ब्रह्मण्ड से मिलने वाले धुलकण को ब्रह्मण्डलीय धूलकण कहते हैं। ये धुलकण दूसरे ग्रह, उपग्रह से विखण्डित होकर पृथ्वी पर गिरने वाला पदार्थ है। कभी-2 इनके आकार इतनी बड़ी होती है कि पृथ्वी पर उल्का वृष्टि की घटना घटती है।

      पार्थिव धूलकण का मुख्य स्रोत धरातल है। ये परागण एवं हाइग्रोस्कोपिक (आर्द्रताग्राही) कण के रूप में मौजूद रहते हैं। वायुमण्डल में सर्वाधिक धुलकण की आपूर्ति समुद्र तटीय भागों से होती है। ये धूलकण वायुमंडल में जाकर जल की तुलना में पहले ठण्डी होने की प्रवृत्ति रखते हैं।

    इस कणों के इर्द-गिर्द आर्द्रता या जलवाष्प का संघनन होने लगता है जिससे जलबून्दों का निर्माण होने लगता है। सामान्य तौर पर वायुमण्डल में 12 Km की ऊँचाई तक धूलकण पाये जाते हैं लेकिन इसका अधिकांश भाग 5 किमी० की ऊँचाई तक मिलते हैं।

निष्कर्ष:

        सैद्धांतिक रूप से हमारा वायुमण्डल गैस, जलवाष्प और धूलकण से निर्मित है। लेकिन तीव्र औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, बढ़ती जनसंख्या इत्यादि के कारण कई प्रदूषक तत्व वायुमण्डल में छोड़े जा रहे हैं जिसके कारण वायु प्रदूषण, ओजोन क्षरण, ग्लोबल वार्मिंग, अम्ल वर्षा जैसी घटनायें घटित हो रही हैं। अत: आवश्यकता इस बात का है कि वायुमण्डल में मौजूद गैस, जलवाष्प एवं धुलकण के अनुपात को नियत बनाकर रखा जाय।



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3. कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन

3. कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन


कोपेन और थार्न्थवेट के जलवायु वर्गीकरण का तुलनात्मक अध्ययन⇒

समानताएँ:- 

(i) दोनों योजनाएँ अनुभवात्मक परीक्षण पर आधारित है।

(ii) दोनों ने तापमान और वर्षा को वायुमंडल की मूलभूत तत्व माना है जो जलवायु को नियंत्रित करती है। 

(iii) दोनों ने जलवायु-वनस्पति संबंध को महत्व दिया है।

(iv) दोनों ने जलवायु प्रदेश को दिखाने के लिए अंग्रेजी अक्षर का प्रयोग किया है।

(v) दोनों वर्गीकरण में उष्ण क्षेत्र की सीमाएँ समान होती हैं।

(vi) दोनों ने वर्गीकरण को कई बार प्रस्तुत किया।

जैसे- कोपेन ने 1900, 1918, 1931, 1936, 1953 में

थार्न्थवेट ने 1931, 1936, 1948, 1955 में

विषमताएँ:-

(i) कोपेन ने वनस्पति को जलवायु का समग्र रूप से व्यक्त करने वाला प्रत्यक्ष सूचक माना। यही कारण है कि कोपेन के वर्गीकरण में जलवायु प्रकारों की सीमाएँ एवं वनस्पति प्रकारों की सीमाएँ लगभग एक है। वहीं थार्न्थवेट ने वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन प्रभाविता को प्रत्यक्ष और वनस्पति को अप्रत्यक्ष रूप से वर्गीकरण का आधार माना।

(ii) कोपेन ने जहाँ किसी स्थान के तापमान और वर्षा के आंकिक मानों को लेकर वहाँ के जलवायु का निर्धारण किया है: वहीं थार्न्थवेट ने जटिल सूत्रों के माध्यम से वर्षा प्रभाविता तथा तापीय दक्षता का मान निकालकर किसी स्थान की जलवायु का निर्धारण किया।

(ii) जहाँ कोपेन ने मुख्य 6 जलवायु समूह को निर्धारित किया है, वहीं थार्न्थवेट ने 8 जलवायु समूह का निर्धारण किया है-

जैसे-

कोपेन का जलवायु समूह   थार्नथ्वेट का जलवायु समूह  
1. उष्ण   

2. उपोष्ण 

3. मध्य तापीय

4. सूक्ष्म तापीय 

5. ध्रुवीय

6. पर्वतीय 

1. अति आर्द्र

2. आर्द्र 

3. तर आर्द्र 

4. शुष्क उपार्द्र

5. अर्द्ध शुष्क 

6. शुष्क 

7. उप ध्रुवीय

8. ध्रुवीय 

(iv) कोपेन ने जहाँ जलवायु पर ऊँचाई के कारण पड़ने वाले प्रभाव को महत्व देते हुए उच्च भूमि की जलवायु को एक समूह माना वहीं थार्न्थवेट ने इस पर ध्यान नहीं दिया है।

(v) थार्न्थवेट ने एक मॉडल दिया जो कि उनके योजना द्वारा जलवायु प्रकारों में वर्गीकृत कर की गई। कोपेन ने ऐसा कोई मॉडल नहीं दिया।

(vi) कोपेन ने शुष्क क्षेत्र और शुष्क ध्रुवीय क्षेत्रों में स्पष्ट अंतर किया लेकिन थार्न्थवेट ने ऐसा नहीं किया लोकेन 1955 में इन्होंने भी इस कमी को दूर किया। 

(vii) कोपेन 1936 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “टैण्डबुक डर क्लाइमेटोलॉजी” के माध्यम से अपना वर्गीकरण प्रस्तुत किया जबकि थार्न्थवेट एक अनुसंधान प्रपत्र के में अपनी योजना 1948 में “ज्योग्राफिकल रिव्यू” नामक पत्रिका में “एन एप्रोच टोवार्डस ए रेशनल क्लासीफिकेशन ऑफ क्लाइमेंट” में प्रस्तुत किया।

कोपेन और थार्न्थवेट के जल


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11. उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन

11. उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन


उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवातों का तुलनात्मक अध्ययन⇒

समानताएँ

(i) उष्ण कटिबंधीय एवं शीतोष्ण कटिबंधीय दोनों चक्रवातों में निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

(ii) दोनों चक्रवातों में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृत्ति रखती हैं।

(iii) दोनों चक्रवातों की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण, आँधी-तूफान जैसी मौसमी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है।

(iv) दोनों चक्रवातों के केन्द्र में हवाएँ नीचे से ऊपर उठने की प्रवृति रखती है।

(V) दोनों चक्रवातो उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा (Anticlockwise) चलती है।

(vi) दोनों चक्रवात दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई की दिशा के अनुरूप चलती है।

असमानताएँ

(i) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में 8º-20º अक्षांशों के बीच या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति दोनों गोलार्द्धों में मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों (30º-60° अक्षांश) में होती है।

(ii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति हेतु सागर एवं स्थल का मिलन बिन्दु आदर्श परिस्थितियाँ उत्पन्न करती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र होता है, जहाँ ध्रुवीय एवं पछुवा वायु मिलने की प्रवृत्ति रखती हैं।

(iii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति शीत ऋतु की अपेक्षा ग्रीष्म ऋतु में अधिक होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा शीत ऋतु में अधिक होती है।

(iv) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का विस्तार अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र पर होता है जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात विस्तृ‌त क्षेत्र पर होता है।

(v) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात काफी विनाशकारी होती है क्योंकि इसमें काफी तेज हवा चलती है तथा मूसलाधार वर्षा होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात विनाशकारी नहीं होती है।

(vi) उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की संख्या तथा प्रभावित क्षेत्र शीतोष्ण चक्रवातों की तुलना में कम होते हैं।

(vii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में समदाब रेखाएँ गोलाकार, चक्राकार या अण्डाकार होती हैं, जबकि शीतोष्ण चक्रवात में समदाब रेखाएँ  प्राय: V आकार की होती है।

उष्ण एवं शीतोष्ण कटिबंधी

शीतोष्ण चक्रवात की विभिन्न अवस्थाओं का प्रतिरूप

(viii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात में अति अल्प समय में तीव्र गति से वर्षा होती है, जबकि शीतोष्ण चक्रवात में अपेक्षाकृत अधिक समय तक धीरे-धीरे वर्षा होती है।

(ix) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के केन्द्र में चक्रवात का आँख बनता है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में ऐसा नहीं होता।

(x) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उष्ण होती है, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात शीतोष्ण होती है।

(xi) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के दौरान वाताग्र का निर्माण नहीं  या नगण्य होता है, जबकि शीतोष्ण चक्रवात के दौरान वाताग्र का निर्माण होता है।

(xii) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में पूर्व से पश्चिम की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ते हैं, जबकि शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात उत्तरी गोलार्द्ध में पश्चिम से पूर्व की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ते हैं।

 


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10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात / Temperate Cyclone

10. शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

(Temperate Cyclone)


शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

         चक्रवात को आँग्ल भाषा में Cyclone कहते है। “Cyclone” शब्द यूनानी भाषा से लिया जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ है- सर्प की अँगूली। इस शब्द का प्रयोग जलवायु विज्ञान में प्रथम बार पिडिंगटन महोदय ने किया था। चक्रवात उस वायुमंडलीय परिस्थिति को कहते हैं जिनमें हवाएँ एक निम्न वायुदाब केन्द्र के चारों ओर घूमने की प्रवृति रखती है।

      चक्रवात में ज्यों ही किसी स्थान पर निम्न वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है त्यों ही उच्च वायुदाब केन्द्र से हवाएँ निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने लगती है। उच्च वायुदाब केन्द्र से आने वाली हवाओं का मुख्य उद्देश्य निम्न वायुदाब को समाप्त करना होता है। लेकिन निम्न वायुदाब केन्द्र की ओर दौड़ने वाली हवाएँ पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव में आकार उत्तरी गोलार्द्ध में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा (Anti Clock Wise) में और दक्षिणी गोलार्द्ध में घड़ी की सूई की दिशा में घूमने लगती है।

प्रतिचक्रवात (Anti Cyclone)     

     चक्रवात का उल्टा प्रतिचक्रवात होता है। प्रतिचक्रवात के केन्द्र में एक उच्च दाब केन्द्र का निर्माण होता है और हवाएँ केन्द्र से बाहर की ओर निकलने की प्रवृति रखती है। उत्तरी गोलार्द्ध में प्रतिचक्रवात (Clock wise) और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anti Clock wise घुमने की प्रवृति रखती हैं।

चक्रवात और प्रतिचक्रवात में अन्तर

(1) चक्रवात की स्थिति में निम्न वायुदाब केन्द्र और प्रतिचक्रवात की स्थिति में उच्च वायुदाब केन्द्र का निर्माण होता है।

(2) चक्रवात में हवा बाहर से केन्द्र की ओर आने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में केन्द्र से बाहर की ओर जाने की प्रवृति रखती है।

(3) चक्रवात की स्थिति में परिवर्तन के फलस्वरूप बादल, वर्षण एवं तेज हवाएँ जैसी मौसमी परिस्थितियां उत्पन्न होती है। वहीं प्रतिचक्रवात की स्थिति में मौसम साफ होने की प्रवृति रखती है।

(4) चक्रवात के केन्द्र से हवाएँ नीचे से ऊपर की ओर उठने की प्रवृति रखती है जबकि प्रतिचक्रवात में हवाएँ ऊपर से नीचे की ओर बैठने की प्रवृत्ति रखती है।

(5) जिस स्थान पर चक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है। ठीक उसके ऊपर प्रतिचक्रवातीय स्थिति उत्पन्न होती है।         

  अतः स्पष्ट है कि चक्रवात एवं प्रतिचक्रवात जलवायु विज्ञान की दो अलग-2 धारणाएँ है।

चक्रवात का वर्गीकरण
       विशेषताओं एवं भौगोलिक स्थिति के आधार पर चक्रवात को दो भागों में बाँटते है-

(1) उष्ण कटिबंधीय चक्रवात

(2) शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात

        मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले चक्रवात को शीतोष्ण चक्रवात कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति का मुख्य आधार उपध्रुवीय निम्न वायु भार का क्षेत्र होता है क्योंकि इस निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर ध्रुवीय वायु और पछुवा वायु चलने की प्रवृति रखती है। ध्रुवों की ओर से आने वाली वायु प्राय: ठण्डी, भारी, और शुष्क होती है। जबकि पछुआ हवा गर्म, हल्की और आर्द्रता से युक्त होती है। विपरीत दिशाओं से आने वाली तथा अलग-2 भौतिक विशेषता रखने वाली वायु जब आपस में मिलने का प्रयास करती है तो मिश्रण शीघ्र संभव नहीं हो पाता है। इन दो वायु के अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण की स्थिति उत्पन्न करते हैं। संक्रमण का यह क्षेत्र ही वाताग्र (Front) कहलाता है।

    दूसरे शब्दों में ध्रुवीय हवा और पछुआ हवा के अग्र भाग आपस में मिलकर जिस संक्रमण पेटी का निर्माण करते हैं, उस पेटी को वाताग्र कहते है। इसकी चौड़ाई सामान्यतः 5-7 Km तक होती है। कभी-2 इसकी चौड़ाई 2-75 Km तक होती है। धरातल से इसकी ऊँचाई 1½- 2 Km तक होती है और लम्बाई 750 Km तक हो सकती हैं। वाताग्र धरातल के साथ एक निश्चित कोण पर झुका होता है।

ध्रुवीय हवा (ठंडी, शुष्क, भारी)

शीतोष्ण कटिबन्धीय चक्रवात

पछुआ हवा (गर्म, आर्द्र, हल्की)

वाताग्र (ल०- 750 किमी०, ऊँ०-1.5 किमी०, चौ०-5-7 किमी०)

           शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति प्रारंभ होना Fronto-genesis (वाताग्र जनन की अवस्था) कहलाता है। जबकि चक्रवात का अन्त/ विनाश Frontolisis (वाताग्र समापन की अवस्था) कहलाता है।

        वाताग्र निर्माण के बाद या संक्रमण स्थिति बनने के बाद वायु में चक्रीय प्रवाह की प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। इसका मुख्य कारण ठण्डी वायु का गर्म वायु राशि क्षेत्र में प्रवेश करना है। जब ठण्डी वायुराशि, गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ग्रहीय नियमों के अनुरूप प्रवाहित नहीं हो पाती हैं क्योंकि प्रवाहित वायु का लक्ष्य कोई अक्षांशीय निम्न बायुदाब की पेटी न होकर आस-पास की गर्म वायु का केन्द्र होता है।

     अत: प्रविष्ट करने वाली वायु गर्म वायु की दिशा में प्रवाहित होने लगती है और ठण्डी वायु अपना ग्रहीय प्रवाह को छोड़ देती है। प्रवाह का यह विचलन अंततः चक्रीय रूप धारण कर लेती है। इसे चित्र के माध्यम से भी समझा जा सकता है।

      कई मौसम वैज्ञानिकों ने शीतोष्ण चक्रवात की उत्पत्ति का अध्ययन किया है। इस संदर्भ में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य स्वीडीश मौसम वैज्ञानिक जैकोट्स और जर्केंस का है। इन्होंने चक्रवात उत्पत्ति के संबंध में ध्रुवीय वाताग्र सिद्धांत प्रस्तुत किया है। इस सिद्धांत के अनुसार शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की उत्पत्ति 6 अवस्थाओं में होती है:-

प्रथम अवस्था – प्रारंभिक अवस्था/ वाताग्र जनन की अवस्था

द्वितीय अवस्था – चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभ की अवस्था

तृतीय अवस्था – उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

चतुर्थ अवस्था – शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

पाँचवा अवस्था – संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

छठा अवस्था – समापन की अवस्था

(1) प्रारंभिक अवस्था (Fronto genesis)/ वाताग्र जनन की अवस्था

       प्रारंभिक अवस्था में ध्रुवीय और पछुआ वायु का अग्र भाग मिलकर एक संक्रमण पेटी या स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है जिसकी चौड़ाई 5-7 किमी०, ऊँचाई 1.5-2 किमी० और लम्बाई 750 किमी० या उससे अधिक होती है।

        स्थिर वाताग्र के निर्माण के लिए अति अनुकूल क्षेत्र उत्तरी अटलांटिक महासागर का मध्य अक्षांशीय क्षेत्र है। सामान्यत: वाताग्र का निर्माण उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र के सहारे होता है। लेकिन, स्थल और समुद्र के असमान वितरण के कारण वाताग्र सीधा न होकर लहरदार होता है या थोड़ा सा मुड़ा होता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में समुद्री सतह के अधिकता के कारण लहरदार स्थिर वाताग्र का निर्माण नहीं होता।

(2) चक्रीय परिसंचरण की प्रारंभिक अवस्था

       इस अवस्था में ग्रहीय वायु (ध्रुवीय वायु) अपने मार्ग से विचलित होती है जिसके परिणामस्वरूप स्थिर वाताग्र का कुछ भाग दक्षिण की ओर अग्रसारित हो जाती है। जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र ठण्डी / ध्रुवीय वायु के कारण जुड़ जाती है। उस भाग को शीत वाताग्र और शेष भाग को उष्ण वाताग्र कहते हैं। गर्म वाताग्र के सहारे मंद ढाल बनाते हुए गर्म वायु स्वतः ठंडी वायु के ऊपर उठने की प्रवृति रखती है। जबकि शीत वाताग्र में तीव्र ढाल के सहारे शीत वायु चक्रीय प्रवाह की प्रवृति खती है।

चित्र: शीत और उष्ण वाताग्र के निर्माण की अवस्था या चक्रीय परिसंचरण की अवस्था

(3) उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था
        इस अवस्था में ठण्डी वायु और भी अधिक निम्न अक्षांश की ओर खिसकते हुए चक्रीय प्रवाह लेने की प्रवृति रखती है जिसके कारण शीत वायु गर्म वायु के वृहत क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। इतना ही नहीं शीत वाताग्र के अग्रसारित हो जाने से पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत क्षेत्र से खत्म हो जाता है जिसके कारण गर्म वायु एक खण्ड के रूप से बचा रह जाता है जिसे उष्ण खण्ड के नाम से जानते हैं।

चित्र: उष्ण खण्ड निर्माण की अवस्था

(4) शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी होने की अवस्था

       इस अवस्था में शीत वाताग्र और आगे बढ़ता है। इस अवस्था में शीत वाताग्र के लगातार आगे बढ़ने के कारण पछुवा हवा का सम्पर्क अपने स्रोत्र क्षेत्र से पूर्णतः कट जाता है। इतना ही नहीं बल्कि गर्म हवा एक संकरे प्रदेश में सिकुड़‌कर रह जाता है तथा शीत वाताग्र को पछुआ हवा और ठण्डी ध्रुवीय हवा दोनों मिलकर दबाव लगाना प्रारंभ कर देती है जिसके कारण शीत वाताग्र तेजी से अग्रसारित होने लगता है।

     दूसरी ओर जिस स्थान पर स्थिर वाताग्र मुड़ा था उस स्थान पर शीत सीमाग्र और गर्म सीमाग्र के मिलने से आवर्त की स्थिति उत्पन्न होती है। इस अपर्त के चारों ओर गर्म एवं ठण्डी वायु का मिश्रित चक्रीय प्रवाह देखने को मिलता है।

चित्र: शीत वाताग्र के तीव्र अग्रसारी की अवस्था

(5) संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

            इस अवस्था में शीत वाताग्र और उष्ण वाताग्र आपस में मिलने की प्रवृति रखती है। लेकिन मिलने की प्रक्रिया वाताग्र के केन्द्र से शुरू होती है। गर्म वाताग्र और शीत वाताग्र मिलकर संरोध वाताग्र (Occluded front) का निर्माण करती है। संरोध वाताग्र एक ऐसा वाताग्र है जिसमें उष्ण एवं शीत दोनों प्रकार की वायु पायी जाती हैं। संरोध वाताग्र दो प्रकार का होता है:-

(i) शीत संरोध वाताग्र

(ii) गर्म संरोध वाताग्र

        शीत संरोध वाताग्र वह स्थिति है जिसमें गर्म वाताग्र समाप्त हो जाता है और शीत वाताग्र गर्म वाताग्र के आगे अवस्थित ठण्डी वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाती है।

चित्र: संरोध निर्माण या अधिविष्ट वाताग्र की अवस्था

उष्ण संरोध वाताग्र वह हैं जहाँ पर वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र वाताग्र के केन्द्र प्रभाव में एक छोटे से केन्द्र में रह जाता है।

(6) समापन की अवस्था (Frontolisis)

         समापन की अवस्था को Frontolisis की अवस्था भी कहते हैं। इस अवस्था में उष्ण वाताग्र एवं शीत वाताग्र आपस में पूर्णतः मिल जाते हैं। ध्रुवीय वायु और पछुवा हवा पृथ्वी की घुर्णन गति के प्रभाव में आकर ग्रहीय मार्ग अपना लेती है और चक्रवात की समाप्ति हो जाती है।

 

शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात की मौसमी दशाएँ एवं वाताग्र के प्रकार

       शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात में विभिन्न प्रकार के मौसमी दशाओं का विवेचना निर्मित होने वाले चारों वाताग्र के आधार पर करते हैं। प्रत्येक वाताग्र की अलग-2 विशेषताएँ होती हैं। मौसमी विशेषताओं के आधार पर ही वाताग्र को चार भागों में बाँटते हैं।

(1) स्थिर वाताग्र (Stationary Front)

(2) उष्ण वाताग्र (Warm Front)

(3) शीत वाताग्र (Cold Front)

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

(1) स्थिर वाताग्र

      शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होने के पहले आसमान साफ होता है। ध्रुवीय और पछुआ वायु अपने-2 प्रचलित मार्ग से चलने की प्रवृति रखते हैं। ज्यों ही पछुआ वायु और ध्रुवीय वायु एक-दूसरे के विपरीत दिशाओं से आकर मिलती है तो स्थिर वाताग्र का निर्माण करती है। स्थिर वाताग्र में वायु स्थिर रहती है। वर्षा नहीं होती है। लेकिन आसमान धुंधला होने लगता है।

(2) उष्ण वाताग्र

        उष्ण वाताग्र की स्थिति में भी वायु स्थिर बनी रहती है क्योंकि गर्म पछुवा वायु ठण्डी ध्रुवीय वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट करने का प्रयास करती है। लेकिन गर्म वायु प्रविष्ट नहीं कर पाती है। फलत: गर्म वायु मंद ढाल के सहारे ठण्डी वायु के ऊपर धीरे-2 चढ़ने की प्रवृ‌त्ति रखती है जिससे बहुस्तरीय बादलों का निर्माण होता है। जैसे:- उपर से नीचे आने पर क्रमशः Cirrus, Cirro stratus, Alto stratus और Cumulus नामक बादल का निर्माण करती है। इस प्रकार के बादलों से धीरे-धीरे लम्बी अवधि तक वर्षण का कार्य होती है। वर्षा का प्रभाव क्षेत्र भी विस्तृत होता है।

(3) शीत वाताग्र (Cold front)

         शीत वाताग्र की स्थिति में ठण्डी वायुराशि गर्म वायुराशि के क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण वाताग्र तीव्र ढाल का निर्माण करती है। तीव्र ढाल के सहारे गर्म वायु राशि उपर उठकर संतृप्त हो जाती है और ऊपर से नीचे क्रमशः तीन प्रकार के बादलों का निर्माण करती है। जैसे-

(i) स्तरी बादल (Cirro Stratus)

(ii) कपासी वर्षी बादल (Cumulo Nimbus)

(iii) वर्षा स्तरी बादल (Nimbo Stratus)

         शीत वाताग्र वाले क्षेत्र में अति अल्प समय में भारी वर्षा रिकॉर्ड किया जाता है। शीत वाताग्र का प्रभाव क्षेत्र काफी छोटे क्षेत्रों में होता है। जबकि उस स्थान से शीत वाताग्र गुजर जाता है तो अचानक वर्षा रुक जाती है। शीतलहरी चलने लगती है। तापमान में भारी गिरावट आती है। वायुदाब बढ़ जाती है और मौसम कष्टकर हो जाता है।

(4) संरोध/अधिविष्ट वाताग्र (Occluded Front)

      संरोध वाताग्र में कई प्रकार के बादलों का निर्माण होता है। लेकिन इसमें वर्षा तीव्र होती है। संरोध के कारण शीतोष्ण चक्रवात में अंतिम रूप से वर्षा होती है। जब उष्ण वाताग्र और शीत वाताग्र पूर्णतः आपस में मिलते हैं तो उष्ण खण्ड भी समाप्त हो जाता है। ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु पुन: ग्रहीय मार्ग को अपना लेते हैं। आकाश साफ हो जाता है।

      ध्रुवीय वायु और पछुआ वायु अपने-2 क्षेत्र में रहकर उप-ध्रुवीय भागों में कोरियालिस प्रभाव के कारण ऊपर उठने लगती है। जिससे मौसम पूर्णतः सामान्य हो जाता है। पुनः जब ध्रुवीय वायु पछुवा वायु के क्षेत्र में प्रविष्ट होने का प्रयास करती है तो पुन: नई चक्रवात का निर्माण प्रारंभ होता है।

शीतोष्ण चक्रवात का वितरण

              शीतोष्ण चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र सामन्यत: 45º से 65° अक्षांश के बीच दोनों गोलार्द्धों में होता है। शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र हजारों किमी० तक हो सकता है।:-

(1) उत्तरी अटलांटिक महासागर और पश्चिमी यूरोप शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात के सबसे अनुकूल क्षेत्र हैं। प० यूरोप में शीतोष्ण चक्रवात के कारण ही सालों भर वर्षा होती है।

(2) शीतोष्ण चक्रवात का दूसरा सबसे प्रमुख क्षेत्र उत्तरी प्रशान्त महासागर में स्थित है। इस क्षेत्र में चक्रवात का प्रभाव क्षेत्र बेरिंग सागर, ओखोटस्क सागर से लेकर कनाडा के प० तट तक होता है।

(3) शीतोष्ण चक्रवात का तीसरा प्रमुख क्षेत्र न्यू फाउंडलैण्ड (कनाडा) और उसके आसपास का क्षेत्र होता है।

(4) भूमध्य सागर के ऊपर भी शीत ऋतु में शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण होता है। इसके कारण तुर्की, ईरान, इराक, अफगानिस्तान और उ०-प० भारत में चक्रवातीय वर्षा होती है।

       दक्षिणी गोलार्द्ध में सागरीय स्थिति अधिक होने के कारण शीतोष्ण चक्रवात का निर्माण लगभग नगण्य होता है। द० गोलार्द्ध में मात्र चिली के दक्षिणी भाग में छोटी शीतोष्ण चक्रवात उत्पन्न होता है जिससे वर्षण का कार्य होता है।


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