9. अतिवादी भूगोल या क्रांतिकारी उपागम / उग्र सुधारवाद / Radical Geography

          9. अतिवादी भूगोल या क्रांतिकारी उपागम / उग्र सुधारवाद

(Radical Geography)



 अतिवादी भूगोल ⇒

            अतिवादी भूगोल को उग्र सुधारवाद या अमूल्य चुल परिवर्तनवादी क्रांतिकारी उपागम के नाम से जानते है। अतिवादी भूगोल का जन्म 1960-70 ई० के दशक में USA में हुआ। भूगोल में अतिवाद का उदय मात्रात्मक क्रांति और स्थानिक विश्लेषण के विरोध में हुआ। यह साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित है लेकिन इसका उद‌य साम्यवादी या समाजवादी देशों में न होकर पूँजीवादी देश USA में हुआ है। अतिवादी भूगोल के विचारधारा को विकसित करने में अमेरिका के क्लार्क विश्वविद्यालय और वहाँ से प्रकाशित होने वाला पत्रिका ‘एंटीपोड’ का विशेष योगदान है। व्यक्तिगत रूप से डेविड हार्वे और जे.आर. पीट जैसे भूगोलवेताओं का योगदान रहा है।

अतिवादी भूगोल

         USA में अतिवादी विचारधारा का जन्म उस समय हुआ जब अमेरिकी समाज में वियतनाम युद्ध में पराजय के कारण निराशा, सामाजिक विषमता, अन्याय, जातीय तनाव, गरीबों के प्रति सत्ताधारियों की नकारात्मक दृष्टिकोण तथा मार्क्सवाद के प्रति उदासीनता का वातावरण था। अमेरिका में वैसे भौगोलिक विचारक जिन्होंने आर्थिक विषमता, उत्पादक व्यवस्था और मानव-वातावरण संबंध के विश्लेषण करने के लिए जिस विचारधारा को जन्म दिया उसे अतिवादी भूगोल कहते हैं। अतिवादी भूगोल समय के संदर्भ में सामाजिक विषमता को दूर करने का प्रयास करता है।

            अतिवादी विचारधारा मात्रात्मक क्रांति के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत को सार्वभौमिक नहीं मानता है क्योंकि इसके द्वारा विकसित किये गए नियम एक निश्चित समाज को एक निश्चित आस्था को बताता है जबकि सामाजिक व्यवस्था में सामाजिक रूप से निरंतर परिवर्तन होता रहा है।

जैसे-

पाषाणकाल→नवपाषाणकाल→ सामंतवाद→ पूँजीवाद→समाजवाद→ साम्यवाद

          अतिवादी विचारधारा इसीलिए तत्कालिक सिद्धांतों एवं नियमों को एकांकी मानता है।

अतिवादी विचारधारा आचारपरक भूगोल पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि आपको केवल मानव के व्यवहार उसके इच्छा, अनुभूति को समझकर केवल संतुष्ट नहीं होना चाहिए बल्कि मानव के समस्त व्यवहारों की समझकर समाजिक समस्याओं को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस तरह अतिवादी विचारधारा आचारपरक भूगोल से भिन्न हो जाता है।

         भूगोल में प्रत्यक्षवादी दर्शन ही काफी लोकप्रिय रहा है। यह दर्शन हमेशा प्रत्यक्ष रूप से किसी घटना को देखकर उसे समझने का प्रयास करता है। जबकि अतिवादी भूगोल के समर्थक परिवर्तन की बात करते हैं और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं।

        पूँजीवादी देशों में पनपे अतिवादी भूगोल के कारण वहाँ के समाज पर जबड़दस्त प्रभाव पड़ा। इसी विचारधारा से प्रभावित होकर पूँजीवादी देशों में कई प्रकार के सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गये। उत्पादन के साधन में समाज के प्रत्येक वर्ग का हिस्सा सुनिश्चित करने हेतु कई संस्थागत एवं रचनात्मक कदम उठाये गये। जिसके कारण पूँजीवादी देशों में अमीरी एवं गरीबी जैसे सामाजिक विषमताओं में कमी आयी है। अमेरिका जैसे देशों में भी कोटा प्रणाली, आरक्षण प्रणाली जैसे संकल्पनाओं का अभ्युदय हुआ।

आलोचना

         अतिवादी विचारधारा की भी कई आधार पर आलोचना की जाती है। जैसे- अतिवादी विचारधारा किसी घटना का सामयिक विश्लेषण पर अधिक जोर देता है। अत: इसके कारण ये काफी नजदीक हो जाता है जबकि भूगोल स्थानिक विश्लेषण करने वाला विषय है।

          इसी तरह अतिवादी विचारधारा भूगोल के परम्परागत सिद्धांतों एवं विश्लेषण करने की तकनीक परित्याग कर देता है जो पूर्ण रूप में अतिशयोक्ति नहीं है।

निष्कर्ष

         निष्कर्षतः जा सकता है कि मात्रात्मक कांति, व्यावहारात्म्क क्रांति,  प्रत्यक्षवादी दर्शन, भूगोल को मानवीय समस्याओं के समाधान से दूर रखकर इसके आधार को ही समाप्त कर रहे थे लेकिन अतिवादी भूगोल ने सामाजिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर भूगोल में नई दृष्टि का सूत्रपात्र किया।


 8. अवस्थिति विश्लेषण या स्थानीयकरण विश्लेषण (Locational Analysis)

 8. अवस्थिति विश्लेषण या स्थानीयकरण विश्लेषण

(Locational Analysis)


अवस्थिति विश्लेषण (Locational Analysis)⇒

              मानव भूगोल में अवस्थिति विश्लेषण एक महत्वपूर्ण संकल्पना है जो इस तथ्य का विश्लेषण करता है कि आर्थिक कार्यों का सकेन्द्रण किस स्थान पर किया जाना चाहिए। अवस्थिति विश्लेषण में यह कहा गया है कि सामाजिक आर्थिक कार्यों का संकेन्द्रण उसी स्थान पर होता रहा है जहाँ पर भौगोलिक परिस्थितियाँ अनुकूलित होती है। सामाजिक आर्थिक कार्यों के संकेन्द्रण पर भौगोलिक कारकों के अलावे मानवीय कारकों का भी प्रभाव पड़ता है। अगर मानवीय कारकों के आधार पर किसी स्थान पर कृत्रिम रूप से सामाजिक-आर्थिक कार्यो का सकेन्द्रण किया जाता है तो वे दीर्घकालिक नहीं हो पाते हैं। ऐसे में इन कार्यों के स्थानीकरण हेतु कई भूगोलताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। इन्हीं सम्पूर्ण गतिविधियों को स्थानीयकरण विश्लेषण कहते हैं।

                        इस प्रकार अवस्थिति विश्लेषण की अवधारणा का विकास और अनुप्रयोग भूगोल विषय में 1950 के दशक के बाद आयी मात्रात्मक क्रान्ति और स्थानिक विश्लेषण के विकास के दौरान हुआ था और इसी काल में “अवस्थिति” और “स्थान” में अंतर स्पष्ट करने पर बल काफी दिया गया था। इस अवधारणा के विकास में यी फू तुआन और पीटर हैगेट इत्यादि भूगोलवेताओं का योगदान महत्वपूर्ण रहा है।अवस्थिति विश्लेषण

             भूगोल में अब तक जितने भी स्थानीयकरण के संबंध में विचार प्रस्तुत किए गए हैं। उन्हें दो भागों में बाँट सकते

(1) द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व का विश्लेषण

(2) द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का विश्लेषण

             (1) भूगोल में द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व स्थानीयकारण के संबंध में जो विचार प्रकट किये गये वे अनुभावाश्रित विधि पर आधारित थे। जैसे वॉन थ्यूनेन महोदय के कृषि अवस्थिति का सिद्धांत अपने अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया था। उन्होंने दक्षिण जर्मनी में किये गये अध्ययन के दौरान पाया कि नगरों का प्रभाव ग्रामीण जीवन पर पड़ता है और ग्रामीण लोग नगरों में माँग के अनुरूप ही कृषि स्थानीयकरण का कार्य करते हैं।

               इसी तरह बेबर एवं हुबर महोदय ने भी औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत अपने अनुभव के आधार पर प्रस्तुत किया। बेबर महोस्य ने अपने औद्योगिक स्थानीयकरण के सिद्धांत में परिवहन लागत को ध्यान में रखते हुए यह विचार प्रकट किया कि न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान ही अधिकतम लाभ देने वाला स्थान होता है। इसलिए न्यूनतम परिवहन लागत वाला स्थान पर ही उद्योगों की स्थापना की जानी चाहिए। उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि वजन ह्रास वाले उद्योग (चीनी उद्योग, कागज उद्योग) की स्थापना कच्चे माल के क्षेत्र में, वृद्धि वाले उद्योग ( बेकरी उद्योग, विस्कुट, पॉव रोटी, फ्रूट ब्रेड) की स्थापना बाजार क्षेत्र में और समभार उद्योग (वस्त्र उद्योग) की स्थापना कहीं भी की जा सकती है।

                 द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व भी मात्रात्मक क्रान्ति के आधार पर ग्रामीण-नगरीप बस्ती के वितरण या अवस्थिति विश्लेषण किया है। इसमें उन्होंने बताया हैं कि जिन स्थानों पर द्वितीयक एवं तृतीयक कार्यों  का संकेन्द्रण अधिक का होता है। उस स्थान को केन्द्रीय स्थल कहा है। इसी केन्द्रीय स्थान के चारों ओर कई पदानुक्रम में षष्टकोणीय मॉडल के आधार पर ग्रामीण बस्तियों का वितरण होता है।

             (2) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मात्रात्मक विधि और आचारपरक विधि पर अवस्थिति विश्लेषण बड़े पैमाने पर किया जाने लगा जिनके कारण स्थानीयकारण का विश्लेषण में गत्यात्मक परिवर्तन आया। मात्रात्मक क्रांति के आगमन से भूगोल मे नवीन सिद्धांत एवं मॉडल के निर्माण का युग प्रारंभ हुआ। जैसे- गुरुत्वाकर्षण मॉडल के आधार पर ग्रामीण-नगरीय उपांत क्षेत्र, नगर प्रभाव क्षेत्र तथा नगर के अन्तर्गत विकसित होने वाले केन्द्रीय बाजार जिला का सीमांकन किया गया।

           जॉन बुश महोदय ने दूरी ह्रास मॉडल से यह बताया कि नगर केन्द्र में ज्यादा-से-ज्यादा लोग निवास करना चाहते हैं और ज्यों-2 नगर के केन्द्र से दूरी में वृद्धि होती है त्यो-2 जनसंख्या में कमी आते जाती है।

             निकटतम पड़ोसी विश्लेषण विधि के द्वारा भी बस्ती भूगोल में कई संकल्पनाएँ विकसित किए गए। सांख्यिकी विधि उपयोग कर विकसित किये गये विचारों को तीन भागों में बाँटते है जिसे (i) गुच्छेदार (ii) यत्र तंत्र और (iii) सामान्य वितरण में वर्गीकृत करते हैं।

          मात्रात्मक क्रांति के आगमन से अवस्थिति विश्लेषण में वैज्ञानिकता का आगमन तो हुआ लेकिन विश्लेषण में दृढ़ता का भी विकास हुआ। अत: इसके विरोध में आचारपरक विधितंत्र का विकास हुआ। आचारपरक विधितंत्र के आधार पर हेगर स्ट्रेन ने नव-उत्पाद विसरण का सिद्धांत, हॉटलीन, फेटर इत्यादि ने औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इस तरह भूगोल में स्थानीयकरण के विश्लेषण हेतु कई तरह के विचार प्रस्तुत किये गए।

निष्कर्ष      

         उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान समय में सामाजिक-आर्थिक कार्यों के अवस्थिति विश्लेषण मूल रूप से मात्रात्मक एवं आचारपरक विधितंत्र पर किया जा रहा है। मात्रात्मक विधितंत्र विश्लेषण से स्थानीयकरण में सैद्धांतिकरण का विकास होता है वहीं आचारपरक क्रांति उसे व्यवहारिकता प्रदान करती है।

7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास / Development of Quantitative Revolution in Geography

 7. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास




भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास⇒

भूगोल में मात्रात्मक क्र (नोट:- क्रांति ⇒ किसी भी विषय वस्तु में त्वरित परिवर्तन को क्रांति कहते है। मात्रात्मक क्रांति = परमाणीकरण)

        भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग करना मात्रात्मक क्रांति कहलाता है। मात्रात्मक क्रांति का स्रोत गणित एवं सांख्यिकी जैसे विषय है। जबकि लक्ष्य प्रारंभ में केवल मानव भूगोल था। लेकिन वर्तमान में गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों का प्रयोग मानव भूगोल के अलावे भौतिक भूगोल और Cartography (चित्रात्मक भूगोल) में किया जाने लगा है।

    भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का आगमन मूल रूप से विधितंत्र एवं विषय वस्तु में हुआ है। गणित एवं सांख्यिकी के तथ्यों के प्रयोग से त्वरित परिवर्तन हुआ जिसके कारण भूगोल में वैज्ञानिकता, तर्क, वस्तुनिष्ठता का आगमन हुआ। इस सम्पूर्ण गतिविधि को मात्रात्मक क्रांति से संबोधित करते हैं।

      भूगोल में मात्रात्मक क्रांति लाने का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने 1949 ई. में सांख्यिकी के कोटि(क्रम) आकार सह-संबंध तकनीक का प्रयोग कर USA के नगरों का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि ज्यों-2 कोटि वृद्धि होती है त्यों-2 नगरों के आकारिकी में परिवर्तन होता है। जिन क्षेत्रों में कोटि और आकार के बीच में यह संबंध पाये जाते हैं वह स्वस्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है और जहाँ पर यह संबंध नहीं पाया जाता है वह अस्वास्थ्य आर्थिक विकास का घोतक है।

                भूगोल में गणित एवं सांख्यिकी से आयात कर जिन तकनीकों का प्रयोग किया गया उसे दो भागों में बाँटते हैं-

(1) अनुमोदनात्मक तकनीक

(2) विवरणात्मक तकनीक

        अनुमोदनात्मक तकनीक के तहत किसी सिद्धांत या परिकल्पना की जाँच करते हैं। इसके तहत सांख्यिकी में प्रयोग होने वाले Simple रिग्रेशन, लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probablity), t- test, Chi- square, Index इत्यादि का प्रयोग करते हैं।

        विवरणात्मक तकनीक के अन्तर्गत सामाजिक आर्थिक आकड़ों को इकट्ठा किया जाता है और उसका औसत माध्य, मध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर सार निकालने का प्रयास करते हैं।

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

       द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका के द्वारा गिराये गये परमाणु बम ने सभी मानवीकी विषय के ऊपर प्रश्न चिह्न लगा दिए थे। कला क्षेत्र के विद्वान विज्ञान से भयभीत होने लगे थे। कई विश्वविद्यालयों में मानवीकी विषय में विद्यार्थियों की सीटें खाली रहने लगी। फलतः सामाजिक विज्ञान के विद्वानों ने 1949 ई० में अमेरिका के प्रीस्टन विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक सम्मेलन बुलवाया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानवीकी विषय के विधितंत्र को तार्किक एवं वैज्ञानिक बनाया जाय। इन विषयों में वैसे विषयवस्तु को शामिल किया जाय जो मानव के लिए उपयोगी हो।

      अगर इन उद्देश्यों को पूरा करता है तो विज्ञान से हमें डरने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसके तकनीक को मानवीकी विषय में प्रयोग करने की आवश्यकता है अर्थात इसी सम्मेलन के बाद अंतर विषयक अध्ययन पर अधिक जोर दिया जाने लगा। इसी अन्तर विषयक अध्ययन के फलस्वरूप भूगोल में मात्रात्मक क्रांति की शुरुआत हुई। भूगोल में इसके विकास के इतिहास को चार चरणों में बाँटकर अध्ययन करते हैं।

(1) प्रथम चरण (1950-58)

            प्रथम चरण का काल 1950- 58 ई० तक रहा। इस चरण में जिफ, नेल्सन, बेरी, हार्टशोन और बंगी जैसे भूगोलवेतओं ने गणितीय एवं सांख्यिकीय तकनीक का प्रयोग किया। प्रथम चरण में अवलोकन विधि, प्रश्नावली विधि, अनुसूची विधि और प्रतिदर्श / नमूना विधि से प्राथमिक आँकड़े इक्कठे किये जाने लगे। प्राप्त आँकड़ों को वर्गीकृत एवं सारणीकरण किया जाने लगा। माध्य, माध्यिका, बहुलक, मानक विचलन इत्यादि का प्रयोग कर प्राप्त आकड़ों का सार संग्रह निकालने का प्रयास किया गया।

(2) दूसरा चरण (1956-68 ई०)

          द्वितीय चरण में एकरमैन, बेरी, स्पीयर्स मैन और पीयरसन जैसे भूगोलवेताओं ने सांख्यिकी तकनीक का प्रयोग प्रारंभ किया। द्वितीय चरण में कोटि आकार सह संबंध रिग्रेशन, सूचकांक जैसे तकनीक का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया गया। इन तकनीकों के प्रयोग से भूगोल के विभिन्न घटकों के बीच सहसंबंध स्थापित कर तथ्यों का विश्लेषण किया जाने लगा।

(3) तीसरा चरण (1968-78 ई०)

         तीसरा चरण में सोर्ले, हेगेट, इबान्स, इरासी, मॉर्स जैसे भूगोलवेताओं ने भौगोलिक तथ्यों की व्याख्या हेतु बहुचरण विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि जैसे तकनीक का प्रयोग हुआ।

(4) चौथा चरण (1978 के बाद से अब तक)

          चौथा चरण में भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रयोग अपने चरम अवस्था में पहुँच गया। इस चरण में भौगोलिक तथ्यों का विश्लेषण, वर्गीकरण, चित्र निर्माण करने में कम्प्यूटर, कृत्रिम उपग्रह, सुदूर संवेदन प्रणाली इंटरनेट, वायु फोटोग्राफी इत्यादि का प्रयोग किया जाने लगा। इन आधुनिक तकनीकों के माध्यम से प्राप्त किये गये आँकड़ों को विश्लेषण करने हेतु GIS (भौगोलिक सूचना तंत्र) का विकास किया गया है। ब्रिटिश भूगोलवेता डडले स्टम्प ने सही कहा है कि “वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति का सुनहरा बछड़ा कम्प्यूटर है।”

भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का महत्व / प्रभाव

          मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल पर कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:-

(1) मात्रात्मक कांति के प्रयोग से भूगोल में तार्किकता एवं वैज्ञानिकता का आगमन हुआ। इनके आगमन से भौगोलिक तथ्यों की वस्तुनिष्टता का आगमन हुआ।

(2) भूगोल में प्राथमिक आँकड़ों, संग्रहण, विश्लेषण और सार संग्रह निकला जाने लगा।

(3) मात्रात्मक क्रांति के पूर्व भूगोल का अध्ययन अनुभावाश्रित, वर्णात्मक और चित्रात्मक भा लेकिन मात्रात्मक कांति से भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन प्रत्यक्ष रूप से किया जाने लगा। भूगोल में चित्र द्विआयामी से त्रिआयामी बनने लगे।

(4) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी के ज्ञान होने के कारण इनकी माँग नियोजन एवं विकास कार्यों में होने लगा।

(5) सांख्यिकी के प्रयोग से भौगोलिक तथ्यों बीच सह-संबंध स्थापित कर उनका प्रदेशीकरण किया जाने लगा। जैसे- कृषि भूगोल में बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन प्रदेश का निर्धारण किया। सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग कर अलीगढ़ विश्वविद्यालय के प्रो० एम.एस. सफी ने भारत के फसल संयोजन का निर्धारण किया।

(6) मात्रात्मक क्रांति के प्रयोग से भूगोल में मॉडल का निर्माण, सिद्धांतों का निर्माण और परिकल्पनाओं का निर्माण किया जाने लगा। हैगेट एवं सोर्ले को मॉडल निर्माण का चैम्पियन कहा जाता है। बेबर महोदय ने औद्योगिक स्थानीयकरण का सिद्धांत सांख्यिकी के नियमों पर ही प्रस्तुत किया था।

(7) नगरीय भूगोल में जनसंख्या भूगोल में, आर्थिक भूगोल में, परिवहन भूगोल में, आपदा प्रबंधन में, मौसम पूर्वानुमान में आज सांख्यिकी विधियों का प्रयोग बड़े पैमाने पर किया जा रहा हैं।

आलोचना

          मात्रात्मक क्रांति का कई भूगोलवेताओं ने आलोचना किया है। जैसे:-

(1) डडले स्टम्प महोदय ने कहा है कि भूगोल का अध्ययन वर्णात्मक एवं चित्रात्मक विधि से करना उपयुक्त है न कि मात्रात्मक विधि से अध्ययन किया जाना चाहिए।

(2) कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि मात्रात्मक क्रांति का प्रारंभ 1950 ई० से नहीं हुआ है बल्कि भूगोल में सांख्यिकी तथ्यों का प्रयोग इसके पूर्व काल से होता रहा है। हार्वे महोदय ने अपने पुस्तक Explanation in Geography में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था में पहुँच चुका है। अत: इसमें धीरे-2 ह्रास की प्रवृति प्रारंभ हो चुकी है।

(3) 1950 ई० में ‘आर्थिक भूगोल’ नामक पत्रिका USA से प्रकाशित होती थी। इस पत्रिका में बेरी महोदय ने सांख्यिकी के प्रयोग का समर्थन किया जबकि स्पेट महोदय ने आलोचना करते हुए कहा कि भूगोलवेताओं में सांख्यिकी सोच-विचार का अभाव होता है। ऐसे में अगर सांख्यिकी के कम जानकार व्यक्ति इसका प्रयोग करता है तो नाकारात्मक परिणाम आ सकते हैं।

(4) मात्रात्मक क्रांति के माध्यम से मानव के भावनात्मक पहलू, व्याहारिकतावाद, मानवतावाद, कल्याणकारी भूगोल के तथ्यों का विश्लेषण संभव नहीं है।

(5) वर्तमान समय में मात्रात्मक क्रांति वाहक कम्प्यूटर एवं इंटरनेट है। आज इनके माध्यम से सूचना प्रदूषण फैलाने का दौर प्रारंभ हो चुका है।

निष्कर्ष

           इन सीमाओं के बाबजूद मात्रात्मक क्रांति एक वैज्ञानिक विषय बना दिया है। यह उपलब्धि कुछ खामियों के बावजूद क्रान्ति के समतुल्य है।



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति पर उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



भूगोल में मात्रात्मक क्रांति

(Quantitative Revolution in Geography)

(नोट: क्रांति = त्वरित परिवर्तन, उत्परिवर्तन = अचानक परिवर्तन, आंदोलन = मंद परिवर्तन)

प्रारूप

1. परिचय

2. मात्रात्मक क्रांति का उद्देश्य / लक्ष्य

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

  3.1 विवराणात्मक तकनीक

  3.2 अनुमोदनात्मक तकनीक

4. मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव / महत्त्व

6. आलोचना

7. निष्कर्ष

1. परिचय

         मात्रात्मक क्रांति दो शब्दों के मिलने से बना है। प्रथम-मात्रा और द्वितीय क्रांति। मात्रा का तात्पर्य गणित या सांख्यिकी ये है। जबकि क्रांति का तात्पर्य त्वरित परिवर्तन से है। अतः भूगोल में सांख्यिकी के आगमन से उसके तथ्यों में जो वैज्ञानिक एवं त्वरित परिवर्तन हुआ उस परिवर्तन को ही मात्रात्मक क्रांति कहते है।

           द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की विधि परम्परागत थी जिसके तहत भौगोलिक तथ्यों का अध्ययन अनुभव और मानचित्र के आधार पर किया जाता था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मात्रात्मक क्रांति के आगमन ने भौगोलिक तथ्यों के अध्ययन की पद्धति को ही बदल दिया है। इस विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मात्रात्मक क्रांति का स्रोत क्षेत्र गणित का उपभाग सांख्यिकी रहा है जबकि लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल रहा है।

      वस्तुतः द्वितीय विश्व के दौरान हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया बम न केवल दो नगरों पर गिराया गया बम था बल्कि सम्पूर्ण मानवीय चिंतन पर किया गया अद्यात था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानविकी विषय के विद्वानों ने देखा कि अगर विज्ञान चाहे तो सम्पूर्ण दृष्टि का विनाश कुछ ही क्षण में कर सकता है। इस वैज्ञानिक और तकनीकी विकास पर आधारित चिन्तव ने विश्व के सभी सामाजिक विज्ञान के समक्ष उपयोगिता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया।

      अतः 1949 ई०  में USA के प्रीस्टन विश्वविद्यालय ने सभी मानविकी एवं वैज्ञानिक विषयों से सम्बंधित विद्वानों का सम्मेलन आयोजित किया। इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि मानविकी विषय को विज्ञान की विषय से डरना नहीं चाहिए बल्कि सामाजिक विज्ञान के विधितंत्र में परिवर्तन लाकर उसे वैज्ञानिक तथा विश्वसनीय बनाया जाना चाहिए। इसी निर्णय का परिणाम था कि मानव भूगोल में सांख्यिकी के तकनीक के उपयोग पर जोर दिया गया और भूगोल को ‘अन्तरविषयक’ विषय बनाने का प्रयास किया गया।

         भूगोल में मात्रात्मक तकनीक का प्रयोग करने का प्रथम श्रेय अमेरिकी भूगोलवेता जे.के.जिफ को जाता है क्योंकि इन्होंने ही 1949 ई० में सांख्यिकी के ‘कोटि-आकार-सह-संबंध‘ तकनीक का प्रयोग कर यू.एस.ए. के नगरों का अध्ययन किया।

 2. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का प्रमुख उद्देश्य / लक्ष्य

(i) वर्णात्मक भूगोल को वैज्ञानिक बनाना।

(ii) भौगोलिक तथ्यों की वैज्ञानिक तथा तार्किक व्याख्या करना।

(iii) साहित्यिक भाषा की जगह गणितीय भाषा का उपयोग।

(iv) अवस्थिति वर्ग के बारे में परिशुद्ध कथन करना।

(vi) परिकल्पना के लिए मॉडल, नियमों तथा सिद्धांतों का सूत्रण करना।

(vii) भूगोल की क्रिया पद्धति को वस्तुनिष्ठ तथा वैज्ञानिक बनाना।

3. मात्रात्मक क्रांति में प्रयुक्त तकनीक

            मानव भूगोल में मात्रात्मक क्रांति से संबंधित अपनायी तकनीक को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

3.1  विवराणात्मक तकनीक

      इसमें सामाजिक-आर्थिक आंकडों का संग्रह कर निष्कर्ष निकाला जाता है और उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। यह औसत, माध्य, माध्यिका, बहुलक, अपसरण, मानक विचलन जैसे सांख्यिकीय तकनीक पर किया जाता है।

3.2  अनुमोदनात्मक तकनीक  

     इस तकनीक के द्वारा मानव भूगोल में विकसित किया गया सिद्धांत या परिकल्पना की वैज्ञानिक जाँच की जाती है। जैसे: इसके लिए सिम्पल रिग्रेशन (प्रतिगमन), लीनियर रिग्रेशन, संभाव्यता (Probability) जैसे तकनीक प्रयोग करते हैं।

4. भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का इतिहास

            भूगोल में मात्रात्मक क्रांति का विकास अचानक नहीं हुआ बल्कि कई अवस्थाओं से गुजरने के बाद हुआ है।

चरण काल प्रयुक्त सांख्यिकीय तकनीक प्रमुख विद्वान एवं एजेंसी
पहला 1950-58 नमूना विधि, मानक विचलन, माध्य, माध्यिका, बहुलक बेरी, बंगी, हार्टशोन, जिफ, हार्वे, एकरमैन एवं नेल्सन
दूसरा 1958-68 को-रिलेशन, रिग्रेशन, सूचकांक बेरी, स्पीयर्समैन, पीयर्सन
तीसरा 1968-78 बहुचर विधि, विश्लेषण विधि, नजदीकी पड़ोसी सांख्यिकी विधि चोर्ले, हैगेट, इबान्स, मोसर, एल.सी.किंग, इराशी, स्कॉट
चौथा 1978 से अबतक कम्प्यूटर, GIS, एरियल फोटोग्राफी पर आधारित तकनीक IRS नासा, इसरो, यूरोपीय स्पेस एजेंसी

5. मात्रात्मक क्रांति का प्रभाव एवं महत्व

         भूगोल में मात्रात्मक क्रांति के आगमन से कई प्रकार के प्रभाव पड़े। जैसे:

(i) भूगोलवेता स्वंय प्राथमिक आंकड़ों का संग्रहण तथा उसका विश्लेषण करने लगे।

(ii) मानव भूगोल में कई नवीन सिद्धांत, परिकल्पना एवं मॉडल का विकास किया गया।

(iii) मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बना दिया।

(iv) भूगोलवेताओं में सांख्यिकी का ज्ञान होने के कारण नियोजन के कार्यों में इनकी माँग बढ़ गयी।

(v) मानचित्र के गुणों एवं स्तर में वृद्धि हुई।

(vi) प्रदेश एवं नगरों का वर्गीकरण, प्रादेशिकरण एवं नियोजन में वैज्ञानिकता का आगमन हुआ।

(vii) जटिल आर्थिक-सामाजिक चरो विश्लेषण कर भूगोल में भविष्यवाणी की जाने लगी।

(viii) भूगोल में ‘रैंक साइज’ नियम के आधार पर जनसंख्या भूगोल, नगरीय भूगोल का अध्ययन किया गया।

(ix) स्टैण्डर्ड डिविएशन के आधार पर बीबर एवं डोई ने फसल संयोजन, केन्द्रीय स्थल सिद्धांत और कई स्थानीयकरण के सिद्धांत विकसित किये गये।

6. आलोचना

        मात्रात्मक  क्रांति ही आलोचना कई भूगोलवेताओं द्वारा की गई है। जैसे:-

(i) स्पेट महोदय ने कहा कि एक भूगोलवेता में सांख्यिकी पर आधारित सोच और विचार का अभाव होता है। ऐसी स्थिति में अगर वह प्रयोग करता है तो परिणाम गलत आ सकते हैं।

(ii) डडले स्टाम्प महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि “कम्प्यूटर मात्रात्मक क्रांति का सुनहला बछड़ा है।”  पुन: उन्होंने कहा कि भूगोल के परम्परागत तकनीक ही सर्वोत्तम तकनीक है।

(iii) व्यावहारवादियों ने इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मात्रात्मक क्रांति भावात्मक पहलू एवं मानवीय मूल्यों के विश्लेषण करने में सक्षम नहीं हैं।

(iv) हार्वे महोदय ने कहा कि मात्रात्मक क्रांति अपने चरम अवस्था को प्राप्त कर चुका है। अब धीरे-2 इसमें ह्रास की प्रवृत्ति देखी जा रही है।

7. निष्कर्ष

           उपरोक्त सीमाओं के बावजूद मात्रात्मक क्रांति ने मानव भूगोल को एक वैज्ञानिक विषय बनाने में अभूतपूर्व योगदान दिया है। अवः भूगोल में विकसित अन्य चिन्तन को इसकी आलोचना न कर इसके विश्लेषणात्मक क्षमता को देखा जाना चाहिए।

 6. New Determinism (नवनियतिवाद)

New Determinism

 नवनियतिवाद



नवनियतिवाद

नोट : नवनियतिवाद = नव पर्यावरणवाद (New-Environmentalism) = संभावनावाद (Probabilism)

       नवनियतिवाद संकल्पना को विकसित करने का श्रेय अमेरिकी भूगोलवेत्ता ग्रिफिथ टेलर को जाता है। उन्होंने अपनी ही संकल्पना को 1920 ई० में प्रकाशित पुस्तक ’20वीं शताब्दी का भूगोल’ में प्रस्तुत किया। इस संकल्पना को ‘वैज्ञानिक निश्चयवाद’ या ‘रुको और जाओ नियतिवाद’ भी कहा जाता है। नव नियतिवाद के बड़े समर्थक O.H.K. स्पेट हुए जिन्होंने “भारत-पाकिस्तान का भूगोल” नामक पुस्तक में नवनियतिवाद को ‘लगभग संभववाद’ (Near Possibilism) से संबोधित किया।

        अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्लसावर ने टेलर की संकल्पना को “वर्तमान का संभववाद” और टैथम महोदय ने “क्रियात्मक संभववाद” से संबोधित किया है।

       नियतिवादी संकल्पना में जहाँ मानव को प्रकृति का दास या गुलाम बताया गया था वहीं संभववाद में मानव को स्वछंद प्राणी माना गया। इससे भूगोल में विभाजन के समस्या उत्पन्न हो गयी। इन स्थिति में ग्रिफिथ टेलर ने दोनों की आलोचना करते हुए नवनियतिवाद की संकल्पना प्रस्तुत की।

          नवनियतिवाद की संकल्पना में यह बताया गया कि प्रकृति एवं मानव दोनों श्रेष्ठ है और दोनों ही एक-दूसरे के पूरक है। मानव के बिना प्रकृति अपने आप में अर्थहीन है जबकि प्रकृति के बिना मानव का अस्तित्व संभव नहीं है।

New Determinism

         टेलर के नवनियतिवाद को आज काफी व्यवहारिक माना जाता है क्योंकि इसमें एक ओर मानव के सृजन शक्ति को स्वीकार किया गया तो वहीं दूसरी ओर मानव के ऊपर प्राकृतिक प्रभाव को स्वीकार किया गया। उनका मानना था कि मानव प्रकृति के गोद में ही बैठकर तथा उसके साथ अनुकूलन स्थापित कर अपना संवर्द्धन एवं संरक्षण करता है।

उदाहरण / तर्क

           टेलर ने नवनियतिवाद संकल्पना को कई उदाहरण से पुष्ट करने का प्रयास किया है। जैसे उन्होंने कहा कि अगर मानव कठोर श्रम एवं विशाल पूँजी खर्च करके अण्टार्कटिका जैसे क्षेत्र में उष्ण कटिबंधीय पौधा उगा ले तो यह व्यवहारिक होगा क्या? कोई भी सामान्य व्यक्ति इसके उत्तर में नाकारात्मक जबाव देगा। अतः मानव के लिए विकास का कार्य करना वहीं पर उपयुक्त होगा जहाँ पर प्रकृति उसे सहयोग करती है।

           टेलर महोदय नियतिवादी संकल्पना की पुष्टि हेतु आस्ट्रेलिया का उदाहरण दिया। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया को दो भागों में बाँटा- उन्होंने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया को निर्जन ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया को आर्थिक ऑस्ट्रेलिया से संबोधित किया। निर्जन आस्ट्रेलिया वह है जहाँ मनुष्य प्रकृति के सामने विवश है क्योंकि प्रकृति मानव अधिवास के लिए यहाँ समर्थन नहीं करती है। वहीं आर्थिक आस्ट्रेलिया में मानव बड़े पैमाने पर आधिवासित होते हैं क्योंकि प्रकृति उन्हें समर्थन प्रदान करती है।

              टेलर महोदय के इस बुद्धिमत्तापूर्ण तर्क एवं उदाहरण की भूरी-2 प्रशंसा पूरी दूनियाँ में की गई क्योंकि उन्होंने यह भी कहा था कि मानव को सर्वप्रथम प्रकृति का अवलोकन करना चाहिए उसके बाद योजनाओं का निर्माण करना चाहिए तथा अन्त में प्रकृति को प्रतिष्ठा देते हुए आगे बढ़‌ना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर उनकी संकल्पना को “रुको और जाओ नियतिवाद” भी कहते हैं। आज पूरे विश्व में नवनियतिवाद की अवधारणा पर ही टिकाऊ विकास या सतत् विकास या संपोषणीय विकास की अवधारणा विकसित हुई।

निष्कर्ष

        इस तरह उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि टेलर के कार्यों के कारण भूगोल नियतिवाद एवं सम्भववाद नामक दो विचारधाराओं में बंटने से बच गया और नवनियतिवाद की नई संकल्पना ने पूरे विश्व के भूगोलवेताओं को समन्ययवादी दृष्टिकोण विकसित करने में मदद किया।



नवनियतिवाद पर नोट्स दूसरे तरीके से भी इस प्रकार लिखा जा सकता है



नवनियतिवाद (New Determinism)

         मानव और पर्यावरण के बीच में सदियों से संतुलित संबंध रहा है। इन संबंधों की व्याख्या करने हेतु चिन्तन भूगोल में नियतिवाद, संभववाद और नवनियतिवाद की संकल्पना विकसित की गई है। प्रकृति और मानव के बीच संबंधों की व्याख्या करते हुए नियतिवादियों ने यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव की तुलना में प्रकृति श्रेष्ठ है। मानव प्रकृति का दास या गुलाम है। वहीं संभववादियों ने मानव को श्रेष्ठ बताते हुए यह मत प्रतिपादित किया कि मानव के सामने प्रकृति बौना है।

           आज वैज्ञानिक युग में चारों ओर मानवीय विजयी की पताका लहराया जा रहा है। भूगोल के विषय वस्तु में इस प्रकार के अतिवादी विचारधारा से भूगोल में विभाजन की खतरा उत्पन्न हो गई। ऐसी स्थितियों में भूगोल विभाजित न हो जाये इसलिए ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेता ने नवनियतिवाद जैसे संकल्पना को जन्म दिया।

            टेलर के द्वारा प्रस्तुत नवनियतिवाद के विचारधारा को नव निश्चयवाद या वैज्ञानिक निश्चयवाद या रुको और जाओ निश्चयवाद के नाम से जानते हैं। टेलर ने अपना विचारधारा 1920 ई० में “20वीं शताब्दी का भूगोल” में प्रस्तुत किया। टेलर के द्वारा प्रतिपादित यह विचारधारा समझौतावाद पर आधारित है। लेकिन वर्तमान समय में प्रकृति तथा मानव के बीच संबंधों का व्याख्या करने वाला यह सर्वोत्तम सिद्धांत है।

          नवनियतिवाद में नियतिवादियों और संभववादियों दोनों के स्वतंत्र उड़ान को रोकने का प्रयास किया गया है। इस सिद्धांत में मानव की सृजन शक्ति को एक ओर स्वीकार किया गया है तो वहीं दूसरी ओर मानव के उपर प्राकृतिक प्रभाव को भी स्वीकार किया गया है।

         टेलर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि मानव और प्रकृति एक-दूसरे के विरोधी नहीं है बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। टेलर ने अपनी पुस्तक में अनेक तर्कों के द्वारा अपने विचारों को पुष्ट करने का प्रयास किया है। जैसे उनकी मान्यता यह रही है कि मानव प्राकृतिक परिवेश में रहते हुए अपने आपको अनुकूलित करता है तथा दूसरी ओर अनुकूलन में प्रकृति मानव का सहयोग देता है।

         दूसरी ओर संभवादियों पर उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि मानव कठोर श्रम एवं विशाल पूँजी खर्च करके अण्टार्कटिका में उष्ण कटिबंधीय पौधा उत्पन्न कर ले तो क्या यह सामान्य जनता के लिए व्यावहारिक होगा। अतः मानव के विकास की सीमाएँ होती हैं। प्राकृतिक परिवेश उन्हें अवश्य रुप से प्रभावित करती है और मानव प्रकृति को सहयोग देती है।

           टेलर ने ऑस्ट्रेलिया की व्याख्या करते हुए कहा है कि ऑस्ट्रेलिया मूल रूप से दो भागों मे विभक्त है।

1. निर्जन आस्ट्रेलिया

2. विकसित आस्ट्रेलिया

           आस्ट्रेलिया का पश्चिमी भाग निर्जन क्षेत्र है क्योंकि प्रकृति मानव को अधिवास के लिए सहयोग नहीं करती है। वहीं दूसरी ओर अस्ट्रेलिया का पूर्वी भाग विकसित है क्योंकि प्रकृति वहाँ पर मानव को अधिवास के लिए सहयोग करती है। इससे स्पष्ट होता है कि मानव अपने विवेक का प्रयोग करते हुए प्रकृति के साथ सामांजस्य बनाने का प्रयास करती है।

         टेलर के नवनियति विचारधारा को “रुको और जाओ विचारधारा” भी कहते हैं क्योंकि इसके तहत उन्होंने कहा है कि विवेक युक्त व्यक्ति सबसे पहले रुककर प्रकृति का अवलोकन करता है उसके बाद प्रकृति को प्रतिष्ठा देते हुए योजनाओं का निर्माण कर आगे बढ़ने का प्रयास करती है।

          टेलर के इस विचारधारा को भूरी-भूरी प्रशंसा की गई। स्पेट महोदय ने अपनी पुस्तक “भारत और पाकिस्तान का भूगोल” में इनके विचारधारा को ‘लगभग संभववाद’ से सम्बोधित किया। इसी तरह अमेरिकी भूगोलवेत्ता कार्ल सावर ने ‘वर्तमान का नियतिवाद’ से सम्बोधित किया।

        टैथम जैसे अमेरिकी भूगोलवेत्ता ने नवनियतिवाद का समर्थन करते हुए “क्रियात्मक संभववाद” से संबोधित किया है। इस विचारधारा के उत्पन्न होने के बाद USA के क्लार्क विश्वविद्यालय में इस विचार को सर्वाधिक मान्यता प्रदान किया गया क्योंकि यह एक ऐसी विचारधारा थी जो मानव और प्रकृति को एक-दूसरे का पूरक मानता है। अत: आधुनिक संदर्भ में नवनियतिवाद को ही सर्वाधिक मान्यता प्राप्त है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार नवनियतिवाद एक व्यावहारिक (Practical) सिद्धांत है जो मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध को दर्शाता है। यह आधुनिक भूगोल में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह सतत विकास (Sustainable Development) की अवधारणा से जुड़ा है।



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 5. Determinism vs Possibilism (नियतिवाद बनाम सम्भववाद)

 Determinism vs Possibilism

नियतिवाद बनाम सम्भववाद 




नियतिवाद बनाम सम्भववाद (Determinism vs Possibilism)

          नियतिवाद बनाम सम्भववाद भूगोल में तृतीय चरण का द्वैतवाद है जो विषय वस्तु से जुड़ा हुआ है। नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ और मनुष्य को प्रकृति का दास माना गया है। दूसरी ओर नियतिवाद के विरोध में संभववाद का उदय हुआ है। संभववाद में मानव को श्रेष्ठ माना गया है और कहा गया है कि मानव प्रकृति का दास नहीं है बल्कि वह प्रकृति के अन्दर रहकर संभावनाओं का सृजन करता है।

Determinism vs Possibilism

नियतिवाद का विकास

              मानव सभ्यता के प्रारंभ से लेकर हजारों वर्षों तक इसी विचारधारा का वर्चस्व रहा। नियतिवाद के विकास का श्रेय हम्बोल्ट और रीटर को जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि भूगोल में नियतिवादी चिन्तन का विकास ग्रीक और रोमन भूगोल के विकास के समय में हुआ था।

⇒ इस संदर्भ में हिप्पोक्रेटस का कार्य सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इनके द्वारा लिखित पुस्तक “Airs, Waters & Places” में यह बताया गया कि मैदानी प्रदेश मानवीय अधिवास के लिए अधिक अनुकूल है जहाँ जल एवं वायु उपलब्ध हो।

⇒ मध्ययुगीन चिंतकों में बेदिन तथा माण्टेस्क्यू ने नियतिवाद का समर्थन करते हुए कहा है कि जलवायु, उच्चावच एवं मिट्टी मानवीय संस्कृति के विकास का आधार है।

⇒ आधुनिक समय में हम्बोल्ट तथा रीटर क्रमश: ‘Cosmos’ एवं ‘Erdkunde’ नामक पुस्तकों के माध्यम से इस चिन्तन को विकसित किया।

⇒ हम्बोल्ट ने ‘Cosmos’ में मानव को एक भौतिक कारक माना है और कहा कि “Physical geography is general Geography”

⇒ यद्यपि रीटर के प्रादेशिक उपागम के अन्तर्गत मानवीय अध्ययन को अनिवार्य बताया। लेकिन वे स्वतंत्र अध्ययन को भूगोल की आवश्यकता नहीं बताया। वे मूलतः ईश्वरवादी और प्रकृतिप्रेमी थे।

⇒ इस प्रकार दोनों ने उपागम के मतभेद के बावजूद नियतवादी चिन्तन का समर्थन किया।

⇒ ब्रिटिश इतिहासकार बकेल द्वारा भी अपनी “History of Civilisation in England” पुस्तक में सभ्यता के विकास का आधार वातावरण को मानते हुए कहा है कि वे भौगोलिक प्रदेश आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न है जहाँ जलवायु, खाद्य संसाधन तथा मृदा माननीय आवश्यकताओं के दृष्टि से अनुकूल है।

⇒ ब्रिटिश भूगोलवेता लेप्ले ने स्थान, कार्य और संस्कृति की संकल्पना प्रस्तुत की। इनके अनुसार स्थान अर्थात् वातावरण मानवीय कार्यो का निर्धारण करता है और कार्य ही लोकसंस्कृति का।

Place → Work → folk

(स्थान)    (कार्य)   (संस्कृति)

         जैसे- गंगाघाटी में मनुष्य मुख्यतः कृषि कार्य ही कर सकता है, वह चाह कर भी यहाँ खनन नहीं कर सकता क्योंकि यहाँ खनिज तो है ही नहीं।

⇒ अमेरिकी भूगोलवेता में डेविस, हटिंग्टन तथा मिस सेम्पल नियतिवाद के महान समर्थकों में थे।

⇒ हटिंग्टन और मिस सेम्पल वातावरणीय नियतिवाद पर जोर दिया। जैसे- मानवीय क्रियाओं पर पर्वतीय वातावरण का प्रभाव पड़ता है न कि मनुष्य का प्रभाव पर्वत पर पड़ा हैं।

⇒ मिस सेम्पल ने “Influences of Geopraphic Environment” में लिखा है “Man is the Product of Environment”

⇒ मिस सेम्पल के कार्य को नियतिवाद के क्षेत्र में अन्तिम महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है क्योंकि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से ही फ्रांसीसी भूगोल का उदय हो चुका था, जो संभववादी संकल्पना के पक्षधर थे। इस तरह नियतिवादी संकल्पना का आलोचना प्रारंभ हो गया क्योंकि प्राकृतिक शक्तियों के साथ-2 मानवीय क्रियाओं का भी महत्व बढ़ गया।

आलोचनाएँ

⇒ नि:संदेह यह सत्य है कि वातावरण मानव को प्रभावित करता है। परन्तु, मानव भी वातावरण में परिवर्तन ला सकता है।

⇒ मनुष्य की शारिरीक गुणों पर वातावरण की अपेक्षा वंशानुगत प्रभाव होता है।

⇒ समान वातावरण में भी जीवनशैली में विभिन्नता पायी जाती है।

⇒ मनुष्य ने विज्ञान में प्रगति कर प्रकृति के कई क्षेत्रों पर विजय पाई है।

⇒ वातावरण की प्रतिकूलता के बावजूद कृषि मनुष्य उत्पादन कर रहा है। जैसे-पंजाब व कैलीफोर्निया में चावल की खेती।

⇒ मनुष्य ने प्रतिकूलता के बावजूद जापान को औद्योगिक राष्ट्र बनाया। यह औद्योगिक क्रांति मनुष्य की श्रेष्ठता स्थापित करता है और यही श्रेष्ठता संभववाद का आधार है।

       इस प्रकार नियतिवाद को 20वीं शताब्दी में नकार दिया गया तथा इसके स्थान पर संभववाद का प्रतिपादन हुआ जिसमें प्रकृति के प्रभावों को भी दिखाया गया। इसे पूर्णतः नहीं नकारा गया क्योंकि मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है और प्रकृति पर भी मनुष्य के कुछ हस्तक्षेप है। दोनों के बीच एक संक्रमण रेखा है मगर विभाजक रेखा नहीं।

सम्भववाद का विकास

     सम्भववाद का उदय नियतिवाद के विरोध में हुआ। सम्भववाद में जहाँ मानव को श्रेष्ठ बताया गया है वहीं नियतिवाद में प्रकृति को श्रेष्ठ बताया गया है। नियतिवाद में मानव को प्रकृति का दास बताया गया तथा मोम का पुतला कहा गया है। इतना ही नहीं प्रकृति मानव को अपनी इच्छानुसार ढाल सकती है। वहीं सम्भववाद में कहा गया है कि मानव प्रकृति पर विजय पा सकता है। मानव प्रकृति को नियंत्रित कर सकता है। मानव प्रकृति के द्वारा खड़ा किए गए अवरोधों को पार कर सकता है। प्रकृति ज्यादा-से-ज्यादा सलाहकार हो सकता है, इससे ज्यादा कुछ भी नहीं।

सम्भववाद के उदय का कारण

      नियतिवाद का उद‌य जर्मनी में हुआ जबकि संभववाद का उदय फ्रांस में हुआ। फ्रांस में संभववाद के उदय के कई कारण है। जैसे-

(i) औद्योगिक क्रांति का प्रभाव⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं पर औद्योगिक क्रांति का प्रभाव था जिसमें भूगोलवेताओं ने देखा कि मानव बड़े-2 कलकारखाने स्थापित कर बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन करता है।

(ii) इतिहास के घटनाओं का प्रभाव⇒ फ्रांस में अधिकांश भूगोलवेताओं इतिहास के घटनाओं के प्रभाव में थे जिसके कारण लोगों में उन्होंने मानवीय श्रेष्ठता की संकल्पना विकसित किया।

(iii) महानगरों का विकास⇒ फ्रांसीसी विद्वानों ने देखा कि मानव सामूहिक अधिवास करते हुए महानगरों को विकसित कर लिया है। इन महानगरों में सर्वत्र मानवीय श्रेष्ठता दिखाई देती है न कि प्रकृति। द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्व ही पेरिस और लंदन जैसे नगर महानगरों में बदल चुके थे।

(iv) महाद्वीपीय रेलवे का विकास⇒ फ्रांसीसी भूगोलवेताओं के ऊपर महाद्वीपीय रेलवे का भी प्रभाव था। जैसे-लोगों ने यह देखा था कि प्रकृति ने दूरी और अनेक प्रकार के अवरोध खड़ा कर दिया। मानव को मानव से अलग कर दिया था लेकिन मानव दूरियों को पाटने के लिए सभी अवरोधों को पार कर महाद्वीपीय रेलवे का विकास किया जो प्रकृति पर विजय का अद्‌भूत उदाहरण है।

(v) वाणिज्य एवं व्यापार⇒ मानव अपने बलबूते कई देशों को गुलाम बनाने में सफल हुआ था वैश्विक वाणिज्य एवं व्यापार का विकास कर भावन ने अपनी श्रेष्ठता साबित कर दो।

       उपरोक्त कारणों के ही कारण 19वीं शताब्दी के अन्त आते-आते नियतिवादी चिन्तन पर प्रश्न चिन्ह लगने लगा। भौगोलिक चिन्तन के क्षेत्र में संभववाद का उदय 1900-20ई० तक हुआ। सम्भववाद को व्यवस्थित रूप से विकसित करने का श्रेय फेब्रे, ब्लाश, ब्रूंश, डिमांजिया, किरचॉफ, जिमरमैन, कार्लसावर, टैथम, ईसा बोमेन जैसे भूगोलवेताओं से जाता है।

          “सम्भववाद” शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग इतिहासकार फेब्रे महोदय ने किया था उन्होंने अपनी पुस्तक “इतिहास की भौगोलिक प्रस्तावना” में लिखा है कि “मानव एक पशु के समान नहीं है बल्कि मानव एक भौगोलिक रूप है वह अपनी सोच के आधार पर प्रकृति के नियमों में एवं रचनाओं की विवेचना करता है तथा उसमें परिवर्तन लाता है।”

             भूगोल में सम्भववाद के सबसे बड़े समर्थक विडॉल डी ला ब्लाश हुए। ब्लाश न केवल मानव को श्रेष्ठ बताया बल्कि यह भी कहा कि प्रकृति की भूमिका अधिक-से-अधिक सलाहकार की हो सकती है। मानव प्रकृति की सलाह मान भी सकता या नहीं भी। ब्लाश के इस चिन्तन का इतना व्यापक प्रभाव फ्रांसीसी भूगोलवेता पर पड़ा था कि वहाँ डीमोरटोनी को छोड़कर कोई भी विद्वान नियतिवाद समर्थक नहीं निकला।

                पॉल वाइडल डि लॉ ब्लाश के एक शिष्य जीन ब्रूंश महोदय थे। उन्होंने ‘डकैत अर्थव्यवस्था‘ की संकल्पना (Robber Economy) प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने सम्भववाद का समर्थन करते हुए कहा कि मानव दिन-दहाड़े पृथ्वी के गर्भ से खनिज को बाहर निकाल लेता है और पृथ्वी मूक बनी रहती है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव भूतल पर निवास करता है तथा अपने परिवेश में रहकर कार्य करता है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मानव प्रकृति का दास है।

              ब्लाश के दूसरे शिष्य डिमांजिया थे जिन्होंने ऑस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में विकसित मानवीय गतिविधि जैसे कृषि, उद्योग को देखकर यह तर्क प्रस्तुत किया कि मानव आस्ट्रेलिया और इजराइल के शुष्क प्रदेशों में भी अपनी परचम (विजयी पताका) लहरा चुका है।

         दो अन्य भूगोलवेता किरचॉफ एवं ब्लेंचार्ड ने सम्भववाद का समर्थन किया। किरचॉफ ने यहाँ तक कहा कि मानव कोई मशीन नहीं है कि उसे रिमोट कंट्रोल के द्वारा नियंत्रित किया जा सके। इसी तरह ब्लेंचार्ड महोदय ने नगरीय भूगोल पर शोध करके यह बताया कि नगरों पर ज्यादा मानवीय इच्छाओं का प्रभाव होता है।

       अमेरिका में जिमरमैन कार्लसावर और ईसा बोमैन जैसे संभववादी भूगोलावेता जन्म लिये। जिमरमैन ने कहा कि “संसाधन होते नहीं, बनते हैं।” इनके ही तर्कों का समर्थन करते हुए जापान के पूर्व प्रधानमंत्री टनाका ने कहा कि “जापान का सबसे बड़ा संसाधन उसके पास कोई भी प्राकृतिक संसाधन न होना है।”

          अमेरिकी भूगोल‌वेता ईसा बोमेन ने भी जिमरमैन के समान तर्क प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि विकास कर रहे मानव और उसके समाज के स्वरूप भौतिक कारक सुनिस्चित नहीं करता बल्कि मानव अपने प्रयास से उसके स्वरूप के निर्धारण करता है।

          अमेरिकी भूगोलवेता कार्लसावर ने कहा कि पृथ्वी के तल पर सांस्कृतिक भूदृश्य के विकास में प्रकृति का योगदान नहीं होता है बल्कि मानव स्वयं सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण करता है। लेकिन उन्होंने “Morphology and Lamd Soap” नामक शोध लेख में यह स्वीकार किया कि प्राकृतिक परिवेश जनित शक्तियाँ मानव को सामान्य रूप से प्रभावित करती है। इसीलिए उन्होंने कहा था कि सम्भववाद के स्थान पर सांभाव्यवाद की संकल्पना विकसित किया जाए।

            इनके संकल्पना को समर्थन करते हुए प्रसिद्ध पारिस्थैतिक वैज्ञानिक बोरो ने “मानव पारिस्थतिकी” (Human Ecology) की संकल्पना विकसित किया जिसमें बताया गया कि “प्रकृति मानव को प्रभावित करता है और मानव प्रकृति को प्रभावित करता है।”

निष्कर्ष

        इस प्रकार फ्रांसीसी चिन्तकों ने जर्मन चिन्तकों के समक्ष एक नवीन चिन्तन प्रस्तुत किया अर्थात नियतिवादी के विरोध में सांभाव्यवाद की संकल्पना प्रस्तुत किये। जिसके कारण भूगोल में द्विविभाजन का संकट उत्पन्न हो गया है। बाद में ग्रिफिथ टेलर जैसे भूगोलवेताओं के प्रयास से इस विभाजन को रोका गया और यह बताया गया कि नियतिवाद और सम्भववाद की संकल्पना को दो अलग-अलग संकल्पना नहीं माना जाय बल्कि दोनों को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाय। इनके प्रयास से भूगोल में नियतिवाद बनाम सम्भववाद नामक द्वैतवाद का उदय हुआ।

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