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Chapter 1 Geography as a Discipline (भूगोल एक विषय के रूप में)

Chapter 1 Geography as a Discipline

(भूगोल एक विषय के रूप में)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 1 Geography as a Discipline

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने भूगोल (Geography) शब्द (Terms) का प्रयोग किया?

(क) हेरोडोटस

(ख) गैलिलियो

(ग) इरेटास्थिनीज

(घ) अरस्तू

उत्तर- (ग) इरेटास्थिनीज

व्याख्या:

“भूगोल” (Geography) शब्द का प्रयोग सबसे पहले यूनानी विद्वान इरेटास्थिनीज (Eratosthenes) ने किया था। यह शब्द दो ग्रीक शब्दों से मिलकर बना है:

Geo = पृथ्वी,  Graphy = वर्णन या लेखन अर्थात्, Geography का अर्थ हुआ ‘पृथ्वी का वर्णन या अध्ययन’।

(ii) निम्नलिखित में से किस लक्षण को भौतिक लक्षण कहा जा सकता है?

(क) बंदरगाह

(ख) मैदान

(ग) सड़क

(घ) जल उद्यान

उत्तर- (ख) मैदान

व्याख्या:

   भौतिक लक्षण (Physical features) वे होते हैं जो प्रकृति द्वारा निर्मित होते हैं, जैसे- पर्वत, नदियाँ, मैदान, पठार आदि। जबकि अन्य विकल्प- बंदरगाह, सड़क, जल उद्यान – ये मानव द्वारा निर्मित (मानव निर्मित या कृत्रिम) लक्षण हैं।

(iii) स्तम्भ I एवं II के अंतर्गत लिखे गए विषयों को पढ़िए।

स्तम्भ I प्राकृतिक सामाजिक विज्ञान स्तम्भ II भूगोल की शाखाएँ
1. मौसम विज्ञान अ. जनसंख्या भूगोल
2. जनांकिकी ब. मृदा भूगोल
3. समाजशास्त्र स. जलवायु विज्ञान
4. मृदा विज्ञान द. सामाजिक भूगोल

सही मेल को चिह्नांकित कीजिए

(क) 1.ब, 2.स, 3.अ, 4.द

(ग) 1.अ, 2.द, 3.ब, 4.स

(ख) 1.द. 2.ब, 3.स, 4.अ

(घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

उत्तर- (घ) 1.स, 2.अ, 3.द, 4.ब

(iv) निम्नलिखित में से कौन-सा प्रश्न कार्य-कारण सम्बन्ध से जुड़ा हुआ है?

(क) क्यों

(ख) क्या

(ग) कहाँ

(घ) कब

उत्तर- (क) क्यों

व्याख्या:
   “क्यों” प्रश्न का प्रयोग किसी घटना या स्थिति के कारण (cause) को जानने के लिए किया जाता है। इसलिए यह कार्य-कारण संबंध (cause-effect relationship) से जुड़ा हुआ प्रश्न होता है।

(v) निम्नलिखित में से कौन-सा विषयकालिक संश्लेषण करता है?

(क) समाजशास्त्र

(ख) मानवशास्त्र

(ग) इतिहास

(घ) भूगोल

उत्तर- (घ) भूगोल

व्याख्या:

    भूगोल (Geography) एक ऐसा विषय है जो स्थानिक (spatial) और कालिक (temporal) दोनों प्रकार के विश्लेषण करता है।

   यह विभिन्न समय अवधियों (कालों) में पृथ्वी की सतह पर घटित परिवर्तनों का अध्ययन करता है- जैसे स्थलरूप, जलवायु, जनसंख्या, उद्योग आदि में समय के साथ होने वाले परिवर्तन।

   इसीलिए भूगोल को “विषयकालिक संश्लेषण” (Temporal Synthesis) करने वाला विषय कहा जाता है।

(vi) निम्नलिखित में से किस विद्वान द्वारा क्रमबद्ध भूगोल प्रवर्तित किया गया?

(क) इरेटॉस्थनीज

(ख) हम्बोल्ट

(ग) स्ट्रेबो

(घ) टॉलेमी

उत्तर- (ख) हम्बोल्ट

व्याख्या:
   क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) की अवधारणा अलेक्ज़ेंडर वॉन हम्बोल्ट ने दी थी। उन्होंने प्राकृतिक घटनाओं को कारण-कार्य संबंध के आधार पर व्यवस्थित रूप से अध्ययन करने की परंपरा शुरू की।

   वहीं, कार्ल रिटर (Carl Ritter) ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) की परंपरा को आगे बढ़ाया।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए:

(i) आप विद्यालय जाते समय किन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं? क्या वे सभी समान हैं अथवा असमान? उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए अथवा नहीं? यदि हाँ तो क्यों?

उत्तर- हम विद्यालय जाते समय मानव द्वारा सृजित ग्रामों, नगरों, सड़कों, रेलों, बदंरगाहों, बाजारों, मंदिर, मस्जिद, वस्त्र, भाषा एवं मानव-जनित अन्य कई महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक लक्षणों का पर्यवेक्षण करते हैं। वे सभी लक्षण असमान हैं। उन्हें भूगोल के अध्ययन में सम्मिलित करना चाहिए क्योंकि ये मानव-पर्यावरण संबंध को दर्शाते हैं।

(ii) आपने एक टेनिस गेंद, क्रिकेट गेंद, संतरा एवं लौकी को देखा होगा। इनमें से कौन-सी वस्तु की आकृति पृथ्वी की आकृति से मिलती-जुलती है? आपने इस विशेष वस्तु को पृथ्वी की आकृति को वर्णित करने के लिए क्यों चुना?

उत्तर- पृथ्वी का आकार जियोइड (Geoid) है, क्योंकि पृथ्वी ध्रुवों पर थोड़ी चपटी और विषुवत् रेखा पर उभरी होती है, इसलिए व्यवहार में इसे संतरे की तरह गोल माना जाता है।

(iii) क्या आप अपने विद्यालय में वन महोत्सव समारोह का आयोजन करते हैं? हम इतने पौधारोपण क्यों करते हैं? वृक्ष किस प्रकार पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं?

उत्तर- हाँ, हमारे विद्यालय में वन महोत्सव मनाया जाता है। हम पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधारोपण करते हैं। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर और ऑक्सीजन छोड़कर पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।

(iv) आपने हाथी, हिरण केंचुए, वृक्ष एवं घास को देखा है। ये कहाँ रहते एवं बढ़ते हैं? उस मण्डल को क्या नाम दिया गया है? क्या आप इस मण्डल के कुछ लक्षणों का वर्णन कर सकते हैं?

उत्तर- हाथी, हिरण, केंचुआ, वृक्ष एवं घास को हमने वनों में देखा है जहाँ वे रहते हैं, एवं बढ़ते हैं। उस जगह को जैवमण्डल का नाम दिया गया है। इसमें वायु, जल और भूमि के जीवित तत्व परस्पर क्रिया करते हैं।

(v) आपको अपने निवास से विद्यालय जाने में कितना समय लगता है? यदि विद्यालय आपके घर की सड़क के उस पार होता तो आप विद्यालय पहुंचने में कितना समय लेते? आने-जाने के समय पर आपके घर एवं विद्यालय के बीच की दूरी का क्या प्रभाव पड़ता है? क्या आप समय को स्थान तथा, इसके विपरीत, स्थान को समय में परिवर्तित कर सकते?

उत्तर- मुझे अपने निवास से विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट का समय लगता है। यदि विद्यालय मेरे घर की सड़क के उस पार होता, तो मात्र 2–3 मिनट में पहुँच सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि घर और विद्यालय के बीच की दूरी आने-जाने के समय को सीधे प्रभावित करती है- दूरी जितनी अधिक होगी, समय भी उतना ही अधिक लगेगा।

    वास्तव में, दूरी और समय का गहरा संबंध है; हम दूरी को समय में और समय को दूरी में परिवर्तित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि विद्यालय 2 किलोमीटर दूर है और मैं 6 किमी/घंटा की गति से चलता हूँ, तो विद्यालय पहुँचने में लगभग 20 मिनट लगेंगे। 

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) आप अपने परिस्थान (Surrounding) का अवलोकन करने पर पाते हैं कि प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक दोनों तथ्यों में भिन्नता पाई जाती है। सभी वृक्ष एक ही प्रकार के नहीं होते। सभी पशु एवं पक्षी जिसे आप देखते हैं भिन्न-भिन्न होते हैं। ये सभी भिन्न तत्व धरातल पर पाये जाते हैं। क्या अब आप यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक क्षेत्रीय भिन्नता का अध्ययन है?

उत्तर- हाँ, हम यह तर्क दे सकते हैं कि भूगोल प्रादेशिक (क्षेत्रीय) भिन्नता का अध्ययन है, क्योंकि भूगोल का मूल उद्देश्य पृथ्वी की सतह पर पाए जाने वाले प्राकृतिक और सांस्कृतिक तत्वों की विविधता को समझना है।

     जब हम अपने आसपास के वातावरण का अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि कहीं पर्वत हैं तो कहीं मैदान, कहीं वन हैं तो कहीं रेगिस्तान। इसी प्रकार, मानव जीवन की संस्कृति, निवास, वेशभूषा, भाषा और जीवनशैली भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्न होती है।

    इन सभी भिन्नताओं का अध्ययन भूगोल करता है और यह समझने का प्रयास करता है कि इन भिन्नताओं के पीछे कौन-से प्राकृतिक कारण (जैसे जलवायु, स्थलरूप, मृदा) तथा मानवीय कारण (जैसे आर्थिक क्रियाएँ, तकनीकी विकास, संस्कृति) जिम्मेदार हैं। अतः भूगोल वास्तव में पृथ्वी की सतह पर क्षेत्रीय विविधताओं और उनके पारस्परिक संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन है।

(ii) आप पहले ही भूगोल, इतिहास, नागरिकशास्त्र एवं अर्थशास्त्र का सामाजिक विज्ञान के घटक के रूप में अध्ययन कर चुके हैं। इन विषयों के समाकलन का प्रयास उनके अंतरापृष्ठ (Interface) पर प्रकाश डालते हुए कीजिए।

उत्तर- भूगोल, इतिहास, नागरिक शास्त्र और अर्थशास्त्र ये चारों सामाजिक विज्ञान के प्रमुख घटक हैं, जो मानव समाज के विभिन्न पहलुओं को समझने में एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

     इतिहास हमें समय के साथ मानव सभ्यता के विकास और परिवर्तन की जानकारी देता है, जबकि भूगोल यह बताता है कि भौगोलिक परिस्थितियाँ मानव जीवन और समाज को कैसे प्रभावित करती हैं।

    अर्थशास्त्र संसाधनों के उत्पादन, वितरण और उपभोग का अध्ययन करता है, जो भौगोलिक संसाधनों और ऐतिहासिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

    नागरिक शास्त्र समाज में शासन, अधिकारों और दायित्वों की समझ प्रदान करता है, जो इतिहास और आर्थिक संरचना दोनों से प्रभावित होते हैं।

    इन विषयों का अंतरापृष्ठ (interface) यह दर्शाता है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय प्रक्रियाएँ परस्पर निर्भर हैं। इस प्रकार, इनका समाकलन मानव समाज की समग्र समझ विकसित करने में सहायक होता है।

34. Sound pollution and their remedial measures (ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)

Sound pollution and their remedial measures

(ध्वनि प्रदूषण और इसके उपचारात्मक उपाय)



Sound pollution and their remedialपरिचय

     ध्वनि हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। यह हमारे संचार, आनंद, संगीत और पर्यावरण का हिस्सा है। किंतु जब ध्वनि अपनी प्राकृतिक सीमा को पार कर जाती है और व्यक्ति, समाज अथवा जीव-जंतुओं के स्वास्थ्य, मानसिक शांति एवं कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव डालती है, तो उसे ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution) कहा जाता है।

   आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाहनों की वृद्धि, मशीनों एवं लाउडस्पीकरों के अत्यधिक उपयोग के कारण यह एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या बन चुकी है।

परिभाषा

     ध्वनि प्रदूषण वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता (Sound Intensity) मानव श्रवण सीमा (लगभग 60 डेसिबल) से अधिक हो जाती है और वह असहनीय या हानिकारक प्रभाव उत्पन्न करती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार –

“जब किसी क्षेत्र में ध्वनि की तीव्रता 85 डेसिबल से अधिक हो जाती है, तो वह मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानी जाती है।”

ध्वनि का मापन (Measurement of Sound)

   ध्वनि को डेसिबल (Decibel, dB) नामक इकाई में मापा जाता है। नीचे कुछ सामान्य ध्वनियों की तीव्रता दी गई है:

ध्वनि का स्रोत तीव्रता (dB)
सामान्य बातचीत 60
भारी यातायात 90
रेल इंजन 100
लाउडस्पीकर या संगीत कार्यक्रम 110-120
जेट विमान 130-140

     85 dB से अधिक ध्वनि निरंतर सुनना खतरनाक माना जाता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत (Major Sources of Sound Pollution)

(i) वाहन यातायात (Transportation Noise):-

       बसें, ट्रक, ऑटोमोबाइल, मोटरसाइकिलें, ट्रेनें, हवाई जहाज आदि निरंतर शोर उत्पन्न करते हैं। महानगरों में यह प्रमुख कारण है।

(ii) औद्योगिक स्रोत (Industrial Noise):-

     कारखानों में चलने वाली भारी मशीनें, टरबाइन, जनरेटर, प्रेस मशीनें आदि लगातार शोर उत्पन्न करती हैं।

(iii) निर्माण कार्य (Construction Activities):-

     इमारतें, पुल, सड़कें, मेट्रो आदि निर्माण कार्यों में ड्रिलिंग मशीन, क्रेन और अन्य उपकरण शोर करते हैं।

(iv) सामाजिक और धार्मिक कार्यक्रम (Social and Religious Functions):-

   विवाह, जुलूस, त्यौहारों, राजनीतिक रैलियों और धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकरों और पटाखों का अत्यधिक प्रयोग होता है।

(v) घरेलू उपकरण (Domestic Appliances):-

    टेलीविजन, मिक्सर, वैक्यूम क्लीनर, कूलर, वॉशिंग मशीन आदि भी शोर का कारण बनते हैं।

(vi) विमानन क्षेत्र (Aviation Noise):-

    एयरपोर्ट के आसपास लगातार विमान उड़ान भरने और उतरने की आवाज से वातावरण अत्यधिक शोरग्रस्त रहता है।

ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Sound Pollution)

1. मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

⇒ श्रवण क्षमता में कमी: लगातार ऊँची आवाज़ सुनने से कान की नसें क्षतिग्रस्त होती हैं और स्थायी बहरापन आ सकता है।

⇒ मानसिक तनाव और अनिद्रा: निरंतर शोर मानसिक अशांति, चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, चिंता और अवसाद उत्पन्न करता है।

⇒ रक्तचाप में वृद्धि: अत्यधिक ध्वनि से हार्मोनल असंतुलन और रक्तचाप बढ़ता है।

⇒ हृदय रोग: निरंतर शोर से हृदय गति बढ़ती है और हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

⇒ एकाग्रता में कमी: छात्रों और कर्मचारियों में एकाग्रता और उत्पादकता कम होती है।

2. पशु-पक्षियों पर प्रभाव

⇒ पक्षियों की दिशा निर्धारण क्षमता प्रभावित होती है।

⇒ शोर के कारण कई पक्षी अपने प्रजनन स्थल छोड़ देते हैं।

⇒ जलीय जीव भी सोनार तरंगों से प्रभावित होते हैं।

3. पर्यावरण पर प्रभाव

⇒ शोर प्रदूषण से प्राकृतिक पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ता है।

⇒ वन्यजीव क्षेत्रों में प्रजनन दर घटती है।

⇒ पेड़ों की वृद्धि और पौधों की संवेदनशीलता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत में ध्वनि प्रदूषण की स्थिति

    भारत में ध्वनि प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियंत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के अनुसार, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना और लखनऊ जैसे महानगरों में औसतन ध्वनि स्तर 80 से 100 डेसिबल तक पहुँच गया है।

    यह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा निर्धारित मानक (55 dB – दिन में, 45 dB – रात में) से कहीं अधिक है।

कानूनी प्रावधान (Legal Provisions)

(i) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986:-

  ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए इसे पर्यावरण प्रदूषण के दायरे में शामिल किया गया है।

(ii) Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000:-

    औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और मौन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग ध्वनि सीमा निर्धारित की गई है। रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर या ध्वनि यंत्रों के उपयोग पर प्रतिबंध है।

(iii) भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 268, 290, 291:-

    सार्वजनिक उपद्रव या असुविधा उत्पन्न करने वाले शोर को दंडनीय अपराध माना गया है।

ध्वनि प्रदूषण के उपचारात्मक उपाय (Remedial Measures for Sound Pollution)

1. तकनीकी उपाय :-

⇒ ध्वनि अवरोधक (Sound Barriers): सड़कों और उद्योगों के आसपास दीवारें, वृक्ष पंक्तियाँ लगाकर ध्वनि अवरोध बनाए जाएँ।

⇒ ध्वनि अवशोषक सामग्री: भवन निर्माण में ध्वनि अवशोषक सामग्री जैसे रबर, फोम, ग्लास वूल का प्रयोग।

⇒ मशीनों की नियमित मरम्मत: पुरानी और शोर करने वाली मशीनों की मेंटेनेंस से ध्वनि कम होती है।

⇒ वाहन नियंत्रण: साइलेंसर यंत्रों का उचित रखरखाव और पुराने वाहनों पर नियंत्रण।

2. नीतिगत और प्रशासनिक उपाय

⇒ ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण क्षेत्र निर्धारण: स्कूल, अस्पताल और कोर्ट के आसपास “Silence Zone” बनाना।

⇒ ध्वनि मानक पालन: औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों में निर्धारित डेसिबल सीमा का पालन।

⇒ कानूनी प्रवर्तन: लाउडस्पीकर, पटाखों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में ध्वनि सीमा उल्लंघन पर दंड।

⇒ शहरी योजना: आवासीय और औद्योगिक क्षेत्रों का अलग-अलग नियोजन।

3. सामाजिक और व्यक्तिगत उपाय

⇒ जन-जागरूकता: ध्वनि प्रदूषण के दुष्परिणामों के बारे में शिक्षण संस्थानों और मीडिया द्वारा प्रचार-प्रसार।

⇒ व्यक्तिगत अनुशासन: लाउडस्पीकर, टीवी, रेडियो आदि की आवाज़ सीमित रखें।

⇒ त्यौहारों और समारोहों में संयम: पटाखों और तेज ध्वनि वाले उपकरणों का सीमित प्रयोग।

⇒ पेड़-पौधों का रोपण: वृक्ष ध्वनि अवरोधक की तरह कार्य करते हैं, जिससे ध्वनि तीव्रता कम होती है।

4. वैज्ञानिक उपाय

⇒ Noise Mapping: शहरों के विभिन्न हिस्सों में ध्वनि स्तर का वैज्ञानिक मापन और मानचित्रण।

⇒ Noise Monitoring Systems: निरंतर ध्वनि मापन के लिए ऑटोमेटिक उपकरणों का प्रयोग।

⇒ Green Belt Development: औद्योगिक क्षेत्रों के चारों ओर हरित पट्टी विकसित करना।

⇒ Soundproof Technology: शोर नियंत्रित मशीनों और वाहनों का विकास।

सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास

⇒ CPCB और SPCB (State Pollution Control Board) द्वारा नियमित ध्वनि सर्वेक्षण।

⇒ NGO द्वारा जनजागरूकता अभियान और ध्वनि सीमाओं का पालन सुनिश्चित कराने हेतु कार्य।

⇒ स्वच्छ भारत अभियान और ग्रीन सिटी प्रोग्राम में ध्वनि प्रदूषण को शामिल करना।

अंतरराष्ट्रीय प्रयास

⇒ WHO और UNEP ने ध्वनि प्रदूषण को वैश्विक स्वास्थ्य समस्या के रूप में स्वीकार किया है।

⇒ कई देशों में “Noise Abatement Policies” और “Quiet City Zones” लागू हैं।

⇒ यूरोपीय देशों ने “Environmental Noise Directive (END)” लागू कर नागरिकों के लिए शांत वातावरण सुनिश्चित किया है।

शिक्षा और अनुसंधान की भूमिका

⇒ उच्च शिक्षण संस्थानों में पर्यावरणीय शिक्षा के अंतर्गत ध्वनि प्रदूषण को विशेष रूप से पढ़ाया जाए।

⇒ अनुसंधान संस्थान ध्वनि नियंत्रण की नई तकनीकों का विकास करें।

⇒ स्थानीय निकायों को प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे नियमों का पालन करा सकें।

निष्कर्ष

    ध्वनि प्रदूषण एक अदृश्य लेकिन गंभीर पर्यावरणीय खतरा है जो मानव स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और पारिस्थितिक तंत्र को गहराई से प्रभावित करता है। इसका समाधान केवल कानूनों या तकनीकी उपायों से नहीं बल्कि जन-सहयोग और जागरूकता से संभव है।

     हमें यह समझना होगा कि शांति ही प्रगति का आधार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए ध्वनि सीमा का पालन करना चाहिए। जन-जागरूकता, कानूनी नियंत्रण और तकनीकी सुधार के माध्यम से हम एक “Noise-Free India” का निर्माण कर सकते हैं।

33. International Standard of Drinking Water (पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)

International Standard of Drinking Water

(पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक)



International Standard of Drinking Water

परिचय

       जल जीवन का मूल स्रोत है। पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व के लिए जल का शुद्ध एवं सुरक्षित होना अत्यंत आवश्यक है। मानव शरीर का लगभग 70 प्रतिशत भाग जल से निर्मित है, अतः इसका सेवन शुद्ध, स्वच्छ तथा रोगाणु रहित होना चाहिए।

     किंतु आधुनिक युग में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण जल प्रदूषण की समस्या तेजी से बढ़ी है। ऐसे में यह आवश्यक हो गया कि पेयजल के लिए कुछ निश्चित मानक निर्धारित किए जाएँ, ताकि प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित जल मिल सके।

    इसी उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization – WHO) तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने पेयजल की गुणवत्ता से संबंधित मानक निर्धारित किए हैं, जिन्हें “अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानक (International Drinking Water Standards)” कहा जाता है।

परिभाषा

    पेयजल (Drinking Water) वह जल है जो मनुष्य द्वारा पीने, भोजन तैयार करने तथा घरेलू उपयोग के लिए उपयुक्त हो। यह जल भौतिक, रासायनिक और जैविक दृष्टि से शुद्ध होना चाहिए। इसमें कोई हानिकारक तत्व, सूक्ष्मजीव या प्रदूषक नहीं होना चाहिए जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करें।

अंतरराष्ट्रीय पेयजल मानकों की आवश्यकता

(i) स्वास्थ्य सुरक्षा हेतु – दूषित जल अनेक जलजनित रोगों जैसे टाइफाइड, हैजा, पेचिश, हेपेटाइटिस आदि का कारण बनता है।

(ii) वैज्ञानिक तुलना हेतु – विभिन्न देशों में जल की गुणवत्ता का तुलनात्मक मूल्यांकन करने हेतु।

(iii) विकासशील देशों में नीति निर्माण हेतु – स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के कार्यक्रमों और योजनाओं में दिशा देने हेतु।

() औद्योगिक नियंत्रण हेतु – उद्योगों द्वारा उत्सर्जित अपशिष्ट से जल स्रोतों की रक्षा करने हेतु।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल मानक

    WHO ने अपने “Guidelines for Drinking-water Quality” में पेयजल के लिए विभिन्न मानदंड निर्धारित किए हैं, जो मुख्यतः तीन श्रेणियों में बाँटे गए हैं –

1. भौतिक मानक (Physical Standards)

2. रासायनिक मानक (Chemical Standards)

3. जैविक मानक (Biological Standards)

भौतिक मानक (Physical Standards)

     भौतिक मानक जल के बाह्य गुणों से संबंधित होते हैं जैसे रंग, गंध, स्वाद, तापमान, और मटमैलापन।

मानक तत्व WHO अनुशंसित सीमा विवरण
रंग (Colour) 15 TCU (True Colour Unit) से अधिक नहीं अधिक रंग होने पर जल अस्वच्छ प्रतीत होता है।
गंध (Odour) अप्रिय गंध नहीं होनी चाहिए जैविक या रासायनिक पदार्थों के कारण गंध उत्पन्न होती है।
स्वाद (Taste) सामान्य और प्राकृतिक होना चाहिए क्लोरीन या अन्य रसायनों की अधिकता स्वाद को प्रभावित करती है।
मटमैलापन (Turbidity) 5 NTU से कम अधिक मटमैलापन रोगाणुओं की उपस्थिति का संकेत हो सकता है।
तापमान (Temperature) 25°C से कम अधिक तापमान वाले जल का स्वाद खराब हो जाता है।

रासायनिक मानक (Chemical Standards)

      रासायनिक मानक जल में उपस्थित विभिन्न रासायनिक तत्वों एवं यौगिकों की सीमा निर्धारित करते हैं। इन तत्वों की अधिकता स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है।

तत्व स्वीकार्य सीमा (WHO) प्रभाव
pH मान 6.5 – 8.5 बहुत अम्लीय या क्षारीय जल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
कुल घुलित ठोस (TDS) 500 mg/L स्वाद और उपयोगिता पर प्रभाव डालता है।
क्लोराइड (Chloride) 250 mg/L अधिक मात्रा में खारापन बढ़ाता है।
सल्फेट (SO₄) 250 mg/L अधिक मात्रा दस्त या उल्टी का कारण बन सकती है।
नाइट्रेट (NO₃) 50 mg/L बच्चों में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” का कारण बनता है।
फ्लोराइड (F⁻) 1.0 mg/L कम मात्रा में दाँतों के लिए लाभदायक, अधिक मात्रा में फ्लोरोसिस।
आयरन (Fe) 0.3 mg/L अधिक मात्रा जल का स्वाद बदलती है, पाइपों में जंग लगाती है।
मैंगनीज (Mn) 0.1 mg/L तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव डालता है।
आर्सेनिक (As) 0.01 mg/L कैंसरजनक तत्व, दीर्घकालीन सेवन से त्वचा रोग।
सीसा (Pb) 0.01 mg/L तंत्रिका तंत्र को क्षति पहुँचाता है।
पारा (Hg) 0.001 mg/L गुर्दों और मस्तिष्क को नुकसान।
कैडमियम (Cd) 0.003 mg/L हड्डियों और किडनी पर प्रतिकूल प्रभाव।

जैविक मानक (Biological Standards)

     जल में उपस्थित सूक्ष्मजीव रोगों के प्रमुख स्रोत हैं। अतः WHO ने जैविक मानकों के लिए विशेष दिशा-निर्देश दिए हैं।

सूक्ष्मजीव WHO अनुशंसा
E. coli (Escherichia coli) 0 प्रति 100 ml जल में
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया 0 प्रति 100 ml
वायरस, प्रोटोजोआ, हेल्मिंथ्स अनुपस्थित होने चाहिए

     यदि जल में उपर्युक्त किसी भी प्रकार के रोगाणु पाए जाते हैं, तो वह पेयजल के लिए अनुपयुक्त माना जाता है।

भारत में पेयजल मानक (BIS – IS 10500:2012)

    भारत में पेयजल की गुणवत्ता मानक भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। ये मानक अधिकांशतः WHO के दिशा-निर्देशों पर आधारित हैं।

तत्व स्वीकार्य सीमा अधिकतम अनुमेय सीमा
pH 6.5 – 8.5 –
कुल कठोरता (Hardness) 200 mg/L 600 mg/L
TDS 500 mg/L 2000 mg/L
फ्लोराइड 1.0 mg/L 1.5 mg/L
नाइट्रेट 45 mg/L –
आयरन 0.3 mg/L –
आर्सेनिक 0.01 mg/L –
सीसा 0.01 mg/L –

     भारत सरकार द्वारा “जल जीवन मिशन”, “स्वच्छ भारत मिशन”, और “राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम” के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानकों के अन्य संगठन

1. यूएस एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी (USEPA) – अमेरिका में पेयजल की गुणवत्ता के लिए मानक निर्धारित करती है।

2. यूरोपीय संघ (European Union Drinking Water Directive) – यूरोपीय देशों के लिए गुणवत्ता मानक तय करता है।

3. ISO (International Organization for Standardization) – जल गुणवत्ता के मापदंडों के लिए तकनीकी दिशा-निर्देश प्रदान करता है (ISO 10500 आदि)।

4. FAO/UNESCO संयुक्त आयोग – जल संसाधनों के संरक्षण और गुणवत्ता मानकों पर कार्य करता है।

पेयजल गुणवत्ता के मूल्यांकन के प्रमुख पैरामीटर

(i) भौतिक पैरामीटर – रंग, गंध, मटमैलापन, तापमान।

(ii) रासायनिक पैरामीटर – pH, TDS, नाइट्रेट, फ्लोराइड, भारी धातुएँ।

(iii) जैविक पैरामीटर – बैक्टीरिया, वायरस आदि।

(iv) रेडियोधर्मी पदार्थ – ट्रिटियम, रेडियम आदि की उपस्थिति नहीं होनी चाहिए।

पेयजल प्रदूषण के प्रमुख स्रोत

⇒ औद्योगिक अपशिष्ट और रासायनिक कारखाने।

⇒ कृषि में प्रयुक्त कीटनाशक और उर्वरक।

⇒ घरेलू सीवेज और अपशिष्ट जल।

⇒ भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड या नाइट्रेट की प्राकृतिक अधिकता।

⇒ असुरक्षित जल भंडारण और पाइपलाइन लीक।

पेयजल की गुणवत्ता सुधार के उपाय

(i) जल का शोधन (Treatment)- क्लोरीनीकरण, उबालना, फिल्ट्रेशन, रिवर्स ऑस्मोसिस (RO)।

(ii) स्रोत संरक्षण – नदी, झील, भूमिगत जल स्रोतों का प्रदूषण से बचाव करना।

(iii) जनजागरूकता – स्वच्छता और जल संरक्षण के प्रति लोगों को शिक्षा देना।

(iv) नियमित परीक्षण – समय-समय पर जल की गुणवत्ता की जांच करना।

(v) नीति निर्माण – सरकार द्वारा कठोर मानक और निगरानी तंत्र की स्थापना करना।

निष्कर्ष:

     पेयजल के अंतरराष्ट्रीय मानक मानव स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के संरक्षण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। WHO और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा निर्धारित दिशानिर्देश यह सुनिश्चित करते हैं कि जल में किसी भी प्रकार का रासायनिक, जैविक या भौतिक प्रदूषण मानव जीवन को प्रभावित न करे।

     भारत जैसे विकासशील देशों के लिए इन मानकों का पालन करना न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का प्रश्न है बल्कि सतत विकास का भी आधार है। इसलिए प्रत्येक नागरिक, संस्था और सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति को स्वच्छ, सुरक्षित और मानक के अनुरूप पेयजल उपलब्ध हो।

42. Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau (छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)

Balanced Landform Description of Chhotanagpur Plateau

(छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण)



Description of Chhotanagpur Plateauपरिचय

     छोटानागपुर पठार भारत के पूर्वी भाग में स्थित एक अत्यंत प्राचीन भू-आकृतिक इकाई है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के भूगर्भीय विकास का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है।

    यह पठार न केवल अपने खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी स्थलाकृति, संरचना, नदियों की व्यवस्था, और मानव-भू-संबंधों के कारण यह भारत के भौतिक भूगोल में विशेष स्थान रखता है। छोटानागपुर पठार को भारतीय भू-रचना का “खनिज हृदय” (Mineral Heart of India) भी कहा जाता है।

भौगोलिक स्थिति एवं विस्तार

     छोटानागपुर पठार का विस्तार मुख्यतः झारखंड राज्य में है, जबकि इसके कुछ भाग छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक फैले हुए हैं।

⇒ इसका भौगोलिक विस्तार लगभग 22° से 25° उत्तर अक्षांश तथा 83° से 87° पूर्व देशांतर तक है।

⇒ पठार का औसत ऊँचाई स्तर 700 मीटर से 1100 मीटर के बीच है।

⇒ इसके उत्तर में गंगा समतलभूमि, दक्षिण में महानदी बेसिन, पूर्व में संथाल परगना की पहाड़ियाँ और पश्चिम में बघेलखंड पठार स्थित है।

भूगर्भीय संरचना

     छोटानागपुर पठार भारतीय भू-गर्भ के अरावली-धारवाड़ प्रणाली का हिस्सा है। यह क्षेत्र अत्यंत प्राचीन प्री-कैम्ब्रियन शैलों (Pre-Cambrian rocks) से निर्मित है।

⇒ यहाँ नीश, ग्रेनाइट, शिस्ट, क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट और ट्रैप जैसी रूपांतरित शिलाएँ प्रमुख हैं।

⇒ पठार की चट्टानें कठोर और अग्निय प्रकृति की हैं, जिनके बार-बार अपक्षय और अपरदन से वर्तमान स्थलाकृति बनी है।

⇒ भूगर्भीय दृष्टि से यह क्षेत्र स्थिर शील्ड क्षेत्र (Stable Shield Area) है, जहाँ भूकंपीय गतिविधियाँ सीमित हैं।

स्थलाकृति (Relief Features)

    छोटानागपुर पठार की स्थलरूप विशेषताएँ अत्यंत विविध हैं। इसे मोटे तौर पर तीन भागों में बाँटा जा सकता है—

(i) उत्तर छोटानागपुर पठार

⇒ यहाँ की ऊँचाई लगभग 300-700 मीटर तक है।

⇒ प्रमुख पहाड़ियाँ हैं- हजारीबाग, गिरिडीह, कोडरमा आदि।

⇒ इस भाग में नदियों द्वारा गहरी घाटियाँ काटी गई हैं।

(ii) मध्य छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का सबसे विस्तृत क्षेत्र है।

⇒ राँची, लोहरदगा, गुमला और खूंटी जिले इसी भाग में हैं।

⇒ औसत ऊँचाई 700-900 मीटर है।

⇒ यहाँ की सबसे ऊँची चोटी पारसनाथ (1366 मीटर) है।

(iii) दक्षिण छोटानागपुर पठार

⇒ यह पठार का उच्चतम भाग है, जहाँ ऊँचाई 900-1100 मीटर तक पहुँचती है।

⇒ नेतरहाट, लुपुंग, टोटो और रायरंग जैसे पठारी क्षेत्र इसी भाग में हैं।

⇒ इसे “छोटानागपुर का पठारी प्रांगण” भी कहा जाता है।

नदी तंत्र (River System)

    छोटानागपुर पठार से अनेक प्रमुख नदियाँ निकलती हैं जो भारत की पूर्वी दिशा की ओर बहती हैं।
मुख्य नदियाँ –

(i) दामोदर नदी – “बंगाल का शोक” कही जाती है, क्योंकि यह बार-बार बाढ़ लाती थी।

(ii) सुवर्णरेखा नदी – राँची से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

(iii) कोएल, बराकर, शंख, दक्षिण कोएल, ब्रह्मणी और बैतरणी ये सभी पठार की जल निकासी में सहायक हैं।

       नदियाँ प्रायः पूर्ववाहिनी (East-flowing) हैं। जल निकासी का स्वरूप डेंड्राइटिक पैटर्न (Dendritic Pattern) का है। नदियों ने घाटियाँ काटकर कई जगह गॉर्ज और जलप्रपात बनाए हैं –

जैसे – हुंडरू फॉल्स, दशम फॉल्स, जोंरी फॉल्स, हिरनी फॉल्स आदि।

जलवायु (Climate)

     पठार की जलवायु उष्ण कटिबंधीय मानसूनी प्रकार की है, परन्तु ऊँचाई के कारण यहाँ तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है।

⇒ ग्रीष्म ऋतु: अप्रैल से जून तक, तापमान 35°C–40°C तक जाता है।

⇒ वर्षा ऋतु: जून से सितंबर तक, औसत वार्षिक वर्षा 1200–1500 मिमी।

⇒ शीत ऋतु: नवम्बर से फरवरी तक, तापमान 10°C–15°C तक गिर जाता है।

    राँची और नेतरहाट जैसे स्थानों में जलवायु अत्यंत सुखद है, इसलिए इन्हें “भारत के छोटे शिमला” कहा जाता है।

मृदा (Soil)

    पठार की मृदाएँ मुख्यतः अपक्षय से बनी हैं-

⇒ लाल और पीली मृदा (Red and Yellow Soil) – सबसे अधिक क्षेत्र में पाई जाती हैं।

⇒ लेटराइट मृदा (Laterite Soil) – उच्च पठारी भागों में, लौह ऑक्साइड से युक्त।

⇒ काली मृदा – कुछ दक्षिणी क्षेत्रों में, ज्वालामुखीय चट्टानों के कारण।

⇒ ये मृदाएँ पोषक तत्वों में गरीब हैं, इसलिए कृषि उत्पादकता कम है।

वनस्पति और जीव-जंतु

    छोटानागपुर पठार में घने वन पाए जाते हैं, जो मुख्यतः उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वनों (Tropical Deciduous Forests) के रूप में हैं।

मुख्य वृक्ष- साल, सागौन, बांस, अर्जुन, बेल, महुआ, तेंदू, और पलाश।

वन्यजीव- हाथी, बाघ, भालू, लोमड़ी, और कई प्रकार के पक्षी।

      यह क्षेत्र भारत का एक जैव-विविधता हॉटस्पॉट माना जाता है।

खनिज संपदा (Mineral Resources)

    छोटानागपुर पठार को भारत का “खनिज भंडार गृह” कहा जाता है। यहाँ से भारत के कुल खनिज उत्पादन का लगभग 40% प्राप्त होता है।

मुख्य खनिज-

⇒ लौह अयस्क (सिंहभूम, चिरिया, गोवा)

⇒ कोयला (दामोदर घाटी, गिरिडीह, झरिया, बोकारो)

⇒ अभ्रक (गया, हजारीबाग, कोडरमा)

⇒ बॉक्साइट, तांबा, मैंगनीज, क्रोमाइट आदि।

    खनिज संसाधनों ने यहाँ के औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित किया है।

मानव बसावट एवं आर्थिक गतिविधियाँ

    पठार की आबादी अपेक्षाकृत विरल है, किन्तु संसाधनों की प्रचुरता ने यहाँ उद्योगों और नगरों के विकास को बढ़ावा दिया है।

मुख्य नगर- राँची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग।

मुख्य उद्योग-

⇒ इस्पात उद्योग (जमशेदपुर, बोकारो, रौरकेला)

⇒ कोयला और बिजली उद्योग

⇒ खनन और परिवहन

⇒ कुटीर उद्योग और वन आधारित उद्योग।

    कृषि की दृष्टि से यह क्षेत्र अपेक्षाकृत पिछड़ा है, क्योंकि मृदा उर्वरता कम और वर्षा अस्थिर है।

भू-आकृतिक विकास की प्रक्रिया

       छोटानागपुर पठार की भू-आकृति का निर्माण दीर्घकालिक अपक्षय, अपरदन और उत्थान की प्रक्रियाओं से हुआ है।

⇒ प्रारंभिक काल में यह एक विशाल पेनिप्लेन (Peneplain) था।

⇒ बाद में टेक्टोनिक उत्थान के कारण इसमें दरारें (faults) बनीं, जिससे पठारी रूप प्राप्त हुआ।

⇒ नदियों ने समय के साथ घाटियाँ और जलप्रपात बनाए।

⇒ वर्तमान में यह अपक्षय की परिपक्व अवस्था में है।

संतुलित भूआकृतिक दृष्टि से विश्लेषण

      “संतुलित भूआकृतिक विवरण” का अर्थ है- क्षेत्र की प्राकृतिक संरचना, स्थलरूप, जलवायु, जैविक तत्वों और मानव क्रियाओं के बीच संतुलन की व्याख्या।

(क) भौतिक संतुलन

    पठार की ऊँचाई, ढाल और नदियों की दिशा में प्राकृतिक संतुलन दिखाई देता है। नदियाँ पूर्व की ओर प्रवाहित होकर जल निकासी संतुलित करती हैं।

(ख) जैविक संतुलन

   वनस्पति और मृदा का पारस्परिक संबंध क्षेत्रीय पारिस्थितिकी को संतुलित बनाए रखता है। जहाँ वन नष्ट हुए हैं, वहाँ मृदा अपरदन बढ़ा है।

(ग) मानव-प्राकृतिक संतुलन

     खनन, उद्योग और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव से यह संतुलन कुछ हद तक बिगड़ा है, किंतु वन संरक्षण, पुनर्वनीकरण और पर्यावरणीय योजनाओं से संतुलन पुनः स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ

⇒ खनन और औद्योगीकरण से मृदा एवं जल प्रदूषण।

⇒ वनक्षेत्र में कमी और जैव विविधता का ह्रास।

⇒ जल स्रोतों का क्षरण एवं नदियों में गाद जमाव।

⇒ आदिवासी समुदायों का विस्थापन।

⇒ भूमि अपरदन और मरुस्थलीकरण की प्रवृत्ति।

संरक्षण और विकास के उपाय

⇒ सतत खनन नीति अपनाना।

⇒ वन पुनर्जीवन और वृक्षारोपण कार्यक्रम।

⇒ मृदा संरक्षण तकनीकें – सीढ़ीदार खेती, कंटूर बंडिंग।

⇒ जल निकासी का नियोजन।

⇒ पर्यावरण-अनुकूल औद्योगिक नीति।

⇒ स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

    इस प्रकार छोटानागपुर पठार भारतीय भू-आकृति का एक जीवंत उदाहरण है, जहाँ प्रकृति और मानव दोनों ने मिलकर भू-दृश्य को आकार दिया है। इसकी कठोर चट्टानें, जलप्रपात, खनिज संपदा, और वन इसे विशेष पहचान देते हैं।

     यह पठार न केवल भारत की औद्योगिक शक्ति का आधार है, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन का भी महत्वपूर्ण क्षेत्र है। अतः आवश्यक है कि इसके संसाधनों का दोहन संतुलित एवं सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित हो, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस भू-आकृतिक धरोहर का लाभ उठा सकें।

प्रश्न प्रारूप

1. छोटानागपुर पठार का सन्तुलित भूआकृति विवरण प्रस्तुत करें।

नोट: डेंड्राइटिक पैटर्न– डेंड्राइटिक पैटर्न वह जल निकासी आकृति है जो किसी पेड़ की शाखाओं जैसी दिखती है और समान रूप से अपक्षयित भू-भाग पर विकसित होती है।

32. Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake (प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)

Natural disaster: Drought, Flood and Earthquake

(प्राकृतिक आपदाएँ: सूखा, बाढ़ और भूकंप)



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परिचय

     प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन के लिए एक गंभीर चुनौती हैं। ये ऐसी घटनाएँ हैं जो प्राकृतिक शक्तियों के कारण अचानक घटित होती हैं और जिनका प्रभाव पर्यावरण, समाज, अर्थव्यवस्था तथा जनजीवन पर व्यापक रूप से पड़ता है। आधुनिक विज्ञान और तकनीकी प्रगति के बावजूद मानव आज भी प्रकृति के प्रकोपों से पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो पाया है।

     सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ न केवल भौतिक विनाश करती हैं बल्कि मानव जीवन की संरचना, संसाधनों और विकास प्रक्रिया को भी बाधित करती हैं। भारत जैसे विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों अत्यधिक हैं।

1. सूखा (Drought)

     भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

    अर्थात सूखा एक ऐसी प्राकृतिक आपदा है जिसमें किसी क्षेत्र में वर्षा की कमी लंबे समय तक बनी रहती है। इसके परिणामस्वरूप भूमि की नमी घट जाती है, फसलें नष्ट हो जाती हैं, जलस्रोत सूख जाते हैं और पशु-पक्षी तथा मनुष्य दोनों ही जीवन संकट में पड़ जाते हैं।

सूखे के प्रकार

(i) मौसमी सूखा (Meteorological Drought):-

     जब किसी क्षेत्र में औसत वर्षा से 25% या अधिक कमी हो जाती है, तो इसे मौसमी सूखा कहते हैं।

(ii) कृषि सूखा (Agricultural Drought):-

    जब मिट्टी की नमी इतनी कम हो जाती है कि फसलों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होता है।

(iii) जलवैज्ञानिक सूखा (Hydrological Drought):-

       जब जलाशयों, नदियों, तालाबों और भूजल स्तर में असामान्य कमी हो जाती है।

(iv) सामाजिक-आर्थिक सूखा (Socio-economic Drought):-

    जब सूखे के कारण मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।

सूखे के कारण

⇒ अनियमित या असमान वर्षा वितरण

⇒ वनों की कटाई और भूमि का अत्यधिक दोहन

⇒ जल संसाधनों का अनुचित प्रबंधन

⇒ जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग

⇒ भूजल का अत्यधिक दोहन

सूखे के प्रभाव

(i) कृषि पर प्रभाव:-

      फसलों की उपज घट जाती है, पशुधन मर जाते हैं और खाद्य संकट उत्पन्न हो जाता है।

(ii) सामाजिक प्रभाव:-

     पलायन, बेरोजगारी, गरीबी और भूखमरी जैसी स्थितियाँ बढ़ती हैं।

(iii) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     भूमि बंजर हो जाती है, वनस्पतियाँ सूख जाती हैं और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाता है।

(iv) आर्थिक प्रभाव:-

     किसानों की आय घटती है, उत्पादन लागत बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

सूखा प्रबंधन

⇒ जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन

⇒ सूखा प्रतिरोधी फसलों की खेती

⇒ वनीकरण और भूमि संरक्षण

⇒ सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सरकार द्वारा राहत पैकेज और रोजगार योजनाएँ (जैसे मनरेगा)

2. बाढ़ (Flood)

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

   अर्थात बाढ़ वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में जल की मात्रा इतनी अधिक हो जाती है कि वह अपनी सामान्य सीमाओं को पार कर मानव बस्तियों, कृषि भूमि और सड़कों को डुबो देती है। यह सबसे सामान्य और व्यापक प्राकृतिक आपदा है।

बाढ़ के प्रकार

(i) नदी बाढ़:

       जब नदियाँ अपने तटों से बाहर निकल जाती हैं, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र, कोसी आदि की बाढ़।

(ii) शहरी बाढ़:-

    जब शहरों में जल निकासी की कमी के कारण वर्षा जल जमा हो जाता है।

(iii) फ्लैश फ्लड (अचानक बाढ़):-

     पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र वर्षा या ग्लेशियर पिघलने से अचानक उत्पन्न बाढ़।

(iv) तटीय बाढ़:-

     चक्रवात या समुद्री तूफानों के कारण समुद्र का जल तटवर्ती क्षेत्रों में फैल जाता है।

बाढ़ के कारण

⇒ अत्यधिक वर्षा और बादलों का फटना

⇒ नदियों का तल भर जाना और अवैध अतिक्रमण

⇒ जल निकासी प्रणाली का अभाव

⇒ वनों की कटाई और भूमि का क्षरण

⇒ बांधों या तटबंधों का टूटना

बाढ़ के प्रभाव

(i) मानव जीवन पर प्रभाव:-

     जन-धन की हानि, बीमारियों का फैलाव, विस्थापन और पलायन।

(ii) कृषि पर प्रभाव:-

     फसलों का नष्ट होना, मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत का बह जाना।

(iii) आर्थिक प्रभाव:-

     बुनियादी ढाँचे, सड़कें, पुल, घर आदि का भारी नुकसान।

(iv) पर्यावरणीय प्रभाव:-

     जल प्रदूषण, मृदा अपरदन और जैव विविधता पर विपरीत असर।

बाढ़ प्रबंधन उपाय

⇒ बांध, नहरें और तटबंध निर्माण

⇒ वर्षा जल संचयन और जल निकासी सुधार

⇒ नदी तटों पर निर्माण प्रतिबंध

⇒ सटीक मौसम पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणाली

⇒ पुनर्वास और राहत कार्य

    भारत सरकार ने राष्ट्रीय बाढ़ नियंत्रण नीति (National Flood Control Programme) के तहत कई योजनाएँ लागू की हैं, जैसे – गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग, ब्रह्मपुत्र बोर्ड आदि।

3. भूकंप (Earthquake)

    भूकंप पृथ्वी की सतह के भीतर स्थित टेक्टोनिक प्लेटों के आपसी घर्षण या टकराव के कारण उत्पन्न होने वाली एक प्राकृतिक आपदा है। इसमें धरती की सतह अचानक हिलने लगती है, जिससे इमारतें, पुल, सड़कें और जनजीवन प्रभावित होता है।

भूकंप के प्रकार

(i) टेक्टोनिक भूकंप:-

    पृथ्वी की प्लेटों की गति और टकराव के कारण उत्पन्न होते हैं। ये सबसे सामान्य और शक्तिशाली होते हैं।

(ii) ज्वालामुखीय भूकंप:-

     ज्वालामुखी विस्फोट के साथ उत्पन्न होने वाले भूकंप।

(iii) संवेदनशील भूकंप (Collapse Earthquake):-

    भूमिगत खानों या गुफाओं के धंसने से उत्पन्न।

(iv) कृत्रिम भूकंप:-

     विस्फोट या परमाणु परीक्षणों के कारण होने वाले भूकंप।

भूकंप की तीव्रता का मापन

    भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल और मर्काली स्केल से मापी जाती है। रिक्टर पैमाने पर 2 से कम भूकंप सामान्य होता है जबकि 7 या उससे अधिक तीव्रता वाला भूकंप विनाशकारी होता है।

भूकंप के प्रभाव

    भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है जो पृथ्वी की सतह के भीतर ऊर्जा के अचानक विस्फोट के कारण होती है। इसके प्रभाव व्यापक और विनाशकारी होते हैं।

    सबसे पहले, भूकंप से इमारतें, पुल, सड़कें और अन्य संरचनाएँ ढह जाती हैं, जिससे भारी जन-धन की हानि होती है।

    भूकंप के कारण भूमिगत पाइपलाइनें टूट जाती हैं, जिससे गैस और पानी की आपूर्ति बाधित हो जाती है। कई बार आग लगने और विस्फोट जैसी घटनाएँ भी होती हैं।

    भूकंप से पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन (landslide) की समस्या उत्पन्न होती है, जिससे सड़कें और गाँव नष्ट हो जाते हैं। तटीय क्षेत्रों में यह सुनामी (tsunami) का रूप ले सकता है, जो समुद्री लहरों के रूप में तटीय बस्तियों को पूरी तरह डुबो देती है।

    सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी इसके गहरे प्रभाव पड़ते हैं- लोग बेघर हो जाते हैं, रोजगार के साधन नष्ट हो जाते हैं, तथा प्रभावित क्षेत्रों में भय और असुरक्षा का माहौल फैल जाता है।

    इसके अतिरिक्त, भूकंप पर्यावरणीय संतुलन को भी प्रभावित करता है। नदियों का मार्ग बदल सकता है और भूमिगत जल स्रोतों में परिवर्तन आ सकता है। अतः भूकंप न केवल मानव जीवन के लिए बल्कि सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।

भारत में भूकंप संभावित क्षेत्र

      भारत को पाँच भूकंपीय जोनों में बाँटा गया है-

⇒ जोन V : अत्यधिक संवेदनशील (जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड, उत्तर-पूर्वी राज्य)

⇒ जोन IV : उच्च संवेदनशील (दिल्ली, बिहार, हिमाचल प्रदेश)

⇒ जोन III : मध्यम (गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश)

⇒ जोन II एवं I : कम संवेदनशील क्षेत्र

भूकंप प्रबंधन

⇒ भूकंप प्रतिरोधी भवन निर्माण

⇒ आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और पूर्व चेतावनी प्रणाली

⇒ सुरक्षित निकासी मार्ग और राहत केंद्र

⇒ जनजागरूकता अभियान

भारत में प्राकृतिक आपदा प्रबंधन

    भारत में प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए 2005 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अधिनियम (Disaster Management Act) लागू किया गया। इसके तहत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) का गठन किया गया है।
इसके अतिरिक्त-

⇒ प्रत्येक राज्य में राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (SDMA)

⇒ जिला स्तर पर जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) कार्यरत हैं।

     इन संस्थाओं का कार्य आपदा पूर्व तैयारी, राहत एवं पुनर्वास कार्यों का संचालन तथा जन-जागरूकता बढ़ाना है।

निष्कर्ष:-

     इस प्रकार प्राकृतिक आपदाएँ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, जिन्हें पूर्णतः रोका नहीं जा सकता, लेकिन इनके प्रभाव को वैज्ञानिक तकनीक, सुविचारित नीति और जनसहभागिता से अवश्य कम किया जा सकता है। सूखा, बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर ही सतत् विकास संभव है।

     जल संरक्षण, वनीकरण, आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, आपदा प्रबंधन शिक्षा और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से हम इन आपदाओं के दुष्प्रभावों को न्यूनतम कर सकते हैं। अतः आवश्यकता है कि हम “आपदा को आपदा न बनने दें, बल्कि उसे सीख और सुधार का अवसर बनाएँ।”

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