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Chapter 16 Biodiversity and Conversation (जैव विविधता एवं संरक्षण)

Chapter 16 Biodiversity and Conversation

(जैव विविधता एवं संरक्षण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 16 Biodiversity and Conversation

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में किसके लिए महत्वपूर्ण है

(क) जन्तु

(ख) पौधे

(ग) पौधे और प्राणी

(घ) सभी जीवधारी

उत्तर- (घ) सभी जीवधारी

व्याख्या:

     जैव-विविधता (Biodiversity) का संरक्षण सभी जीवधारियों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह पृथ्वी पर जीवन के संतुलन, पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिरता, भोजन, औषधि, जलवायु नियंत्रण और प्राकृतिक संसाधनों की निरंतरता को बनाए रखता है।

(ii) असुरक्षित प्रजातियाँ कौन-सी हैं

(क) जो दूसरों को असुरक्षा दें

(ख) बाघ व शेर

(ग) जिनकी संख्या अत्याधिक हों

(घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

उत्तर- (घ) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

(iii) राष्ट्रीय पार्क (National Parks) और अभ्यारण (Sanctuaries) किस उद्देश्य के लिए बनाये गए हैं

(क) मनोरंजन के लिए

(ख) पालतू जीवों के लिए

(ग) शिकार के लिए

(घ) संरक्षण के लिए

उत्तर- (घ) संरक्षण के लिए

व्याख्या:

     राष्ट्रीय उद्यान (National Parks) और अभ्यारण्य (Sanctuaries) वन्य जीवों, वनस्पतियों तथा उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, ताकि जैव विविधता बनी रहे और लुप्तप्राय प्रजातियों की रक्षा की जा सके।

(iv) जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं

(क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

(ख) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र

(ग) ध्रुवीय क्षेत्र

(घ) महासागरीय क्षेत्र

उत्तर- (क) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

व्याख्या:

     उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical regions) में तापमान अधिक, वर्षा प्रचुर मात्रा में तथा अनुकूल जलवायु पाई जाती है, जिसके कारण यहाँ पौधों और जीवों की विविधता सबसे अधिक होती है। इसलिए ये क्षेत्र जैव-विविधता के समृद्ध क्षेत्र कहलाते हैं।

(v) निम्न में से किस देश में अर्थ सम्मेलन (Earth summit) हुआ था

(क) यू. के. (U.K.)

(ख) ब्राजील

(ग) मैक्सिको

(घ) चीन

उत्तर- (ख) ब्राजील

व्याख्या:

     अर्थ सम्मलेन (Earth Summit) 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो (Rio de Janeiro) में आयोजित किया गया था। इसे “रियो सम्मेलन” या “United Nations Conference on Environment and Development (UNCED)” भी कहा जाता है।

(vi) प्रोजेक्ट टाईगर निम्नलिखित में से किस उद्देश्य से शुरू किया गया है।

(क) बाघ मारने के लिये

(ख) बाघ को शिकार से बचाने हेतु

(ग) बाघ को चिड़ियाघर में डालने हेतु

(घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

उत्तर- (घ) बाघ पर फिल्म बनाने हेतु

व्याख्या:

    “प्रोजेक्ट टाइगर” (Project Tiger) भारत सरकार द्वारा 1973 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य देश में तेजी से घटती हुई बाघों की संख्या की रक्षा करना और उनके प्राकृतिक आवास का संरक्षण करना है।

(vii) प्रोजेक्ट एलिफेन्ट (Project Elephent) किस वर्ष लागू किया गया?

(क) 1992

(ख) 1993

(ग) 1994

(घ) 1995

उत्तर:- (क) 1992

व्याख्या:

    प्रोजेक्ट एलिफेंट (Project Elephant) भारत सरकार द्वारा 1992 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य जंगली हाथियों का संरक्षण, उनके आवास (habitat) की रक्षा, और मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है।

(viii) होमो-सेपियंश (Homo-Speiens) प्रजाति किस से संबंधित है?

(क) पौधे

(ख) शाकाहारी जीव

(ग) मांशहारी जीव

(घ) मानव

उत्तर- (घ) मानव

व्याख्या:

     होमो-सेपियन्स (Homo sapiens) आधुनिक मनुष्य की वैज्ञानिक प्रजाति का नाम है। यह होमो वंश (Genus) की एकमात्र जीवित प्रजाति है, जो लगभग 3 लाख वर्ष पहले अफ्रीका में उत्पन्न हुई थी।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए।

(i) जैव-विविधता क्या है?

उत्तर- किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाये जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहते हैं। इसका संबंध पौधों के प्रकार, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवाणुओं से है, उनकी आनुवंशिकी और उनके द्वारा निर्मित पारितंत्र से है। जैव-विविधता सजीव सम्पदा है। 

   अर्थात इसमें सूक्ष्मजीवों से लेकर बड़े जीवों तक सभी शामिल होते हैं। यह पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और जीवन को स्थिरता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(ii) जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?

उत्तर- जैव-विविधता को तीन मुख्य स्तरों पर समझा जा सकता है-

(1) आनुवंशिक विविधता (Genetic diversity): एक ही प्रजाति के जीवों में जीन का अंतर।

(2) प्रजातीय विविधता (Species diversity): किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न प्रजातियों की संख्या।

(3) पारिस्थितिकी तंत्र विविधता (Ecosystem diversity): यह विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता को दर्शाती है, जैसे – वन, मरुस्थल, पर्वतीय क्षेत्र, नदी, झील, समुद्र आदि।

(iii) हॉट-स्पॉट (Hot spots) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- हॉट-स्पॉट (Hot Spots) वे क्षेत्र होते हैं जहाँ जैव विविधता अत्यधिक होती है, परंतु यह क्षेत्र मनुष्य की गतिविधियों से गंभीर खतरे में हैं। इन क्षेत्रों में बहुत-सी दुर्लभ एवं स्थानिक प्रजातियाँ पाई जाती हैं।  उनमें संसाधनों को उपलब्ध कराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण संघ (IUCN) ने जैव-विविधता हॉट-स्पॉट (Hot spots) क्षेत्र के रूप में निर्धारित किया गया है।

    हॉट-स्पॉट उनकी वनस्पति के आधार पर परिभाषित किये गए हैं। भारत में पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय आदि प्रमुख जैव विविधता हॉट-स्पॉट हैं।

(iv) मानव जाति के लिए जंतुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में करें।

उत्तर- जंतुओं का मानव जाति के जीवन में अत्यंत महत्त्व है। वे भोजन (दूध, मांस, अंडे), वस्त्र (ऊन, रेशम, चमड़ा) और श्रम (बैल, घोड़े) प्रदान करते हैं। अनेक जंतु औषधियों के निर्माण में उपयोगी होते हैं तथा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

(v) विदेशज प्रजातियों (Exotic species) से आप क्या समझते हैं?

उत्तर- वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं, लेकिन उस तंत्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें ‘विदेशज प्रजातियाँ’ कहा जाता है।

    अर्थात विदेशज प्रजातियाँ (Exotic species) वे जीव हैं जिन्हें किसी अन्य देश या क्षेत्र से लाकर नए स्थान पर बसाया जाता है। ये वहाँ की प्राकृतिक प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर पारिस्थितिक संतुलन बिगाड़ सकती हैं। उदाहरण- भारत में जलकुंभी (Water Hyacinth) और नीलगिरी (Eucalyptus) पेड़।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें

उत्तर- प्रकृति के संतुलन और स्थायित्व को बनाए रखने में जैव-विविधता (Biodiversity) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैव-विविधता का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी प्रकार के जीवों की विविधता, जिसमें पौधे, जन्तु, सूक्ष्मजीव तथा उनके पारस्परिक संबंध शामिल हैं। यह प्रकृति की स्थिरता, पारिस्थितिक संतुलन तथा मानव जीवन के अस्तित्व की आधारशिला है।

     प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना विशिष्ट स्थान और कार्य होता है। उदाहरण के लिए, पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन प्रदान करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, जिससे वातावरण शुद्ध रहता है। शाकाहारी और मांसाहारी जीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए भोजन श्रृंखला और जाल (food chain and web) का निर्माण करते हैं। यदि किसी एक प्रजाति का विनाश हो जाए, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है।

    जैव-विविधता मिट्टी की उर्वरता, परागण, जल चक्र और अपघटन जैसी प्रक्रियाओं को भी बनाए रखती है। यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में मदद करती है और प्राकृतिक आपदाओं से पारिस्थितिक तंत्र की पुनर्बहाली में सहायक होती है। इसके अतिरिक्त, जैव-विविधता मानव को औषधि, भोजन, ईंधन और वस्त्र जैसे अनेक संसाधन उपलब्ध कराती है।

    इस प्रकार, जैव-विविधता न केवल पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक है, बल्कि यह पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता और मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला भी है। इसलिए, जैव-विविधता का संरक्षण हमारी प्राथमिक जिम्मेदारी है, ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ भी स्वस्थ और संतुलित प्रकृति का आनंद ले सकें।

(ii) जैव-विविधता के विनाश के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।

उत्तर- जैव-विविधता (Biodiversity) का अर्थ है- पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के पौधों, प्राणियों और सूक्ष्मजीवों की विविधता। वर्तमान समय में मानव गतिविधियों के कारण जैव-विविधता में तीव्र गति से कमी आ रही है।

जैव-विविधता के विनाश के प्रमुख कारक:

1. वनों की कटाई:-

     कृषि विस्तार, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के कारण वनों का नाश हो रहा है।

2. प्रदूषण:-

      जल, वायु और भूमि प्रदूषण से अनेक जीव प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं।

3. जनसंख्या वृद्धि:-

    बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डाल रही है।

4. अवैध शिकार और व्यापार:-

     बाघ, हाथी, गैंडा जैसी प्रजातियाँ शिकार और अवैध व्यापार से प्रभावित हैं।

5. विदेशी (Exotic) प्रजातियाँ:-

     बाहरी प्रजातियों के आगमन से स्थानीय प्रजातियाँ प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रही हैं।

6. जलवायु परिवर्तन:-

     तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव से प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।

रोकथाम के उपाय:

⇒ वनों की सुरक्षा और वृक्षारोपण को बढ़ावा देना।

⇒ प्रदूषण नियंत्रण और स्वच्छ तकनीकों का उपयोग।

⇒ वन्यजीव संरक्षण कानूनों का कठोर पालन।

⇒ राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारणों का विस्तार।

⇒ जनजागरूकता और पर्यावरण शिक्षा को प्रोत्साहन देना।

⇒ जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष:

    जैव-विविधता का संरक्षण पृथ्वी पर जीवन के संतुलन और मानव अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है।

Chapter 1 India Location (भारत-स्थिति)

Chapter 1 India Location

(भारत-स्थिति)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) भारत के विस्तार के संबंध कौन-सा कथन सही है

(क) 8°41’N-35°5’N

(ख) 8°4’N-35°6’N

(ग) 8°4’N-37°6’N

(घ) 6°45″N-35°6’N

उत्तर- (ग) 8°41’N-37°6’N

व्याख्या:

   भारत 8°4′ उत्तरी अक्षांश से 37°6′ उत्तरी अक्षांश तथा 68°7′ पूर्वी देशांतर से 97°25′ पूर्वी देशांतर तक फैला है।

⇒ भारत का अक्षांशीय विस्तार लगभग 29° है।

⇒ भारत का देशांतरिक विस्तार लगभग 30° है।

⇒ भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है।

⇒ 82°30′ पूर्व देशांतर को भारतीय मानक समय (IST) के रूप में अपनाया गया है।

(ii) भारत के साथ किस देश की स्थल सीमा सबसे लम्बी है

(क) बंग्लादेश

(ख) पाकिस्तान

(ग) चीन

(घ) म्यांमार

उत्तर- (क) बंग्लादेश

  भारत की सबसे लंबी स्थल सीमा बांग्लादेश के साथ है, जिसकी लंबाई लगभग 4096 किलोमीटर है।

(iii) कौन-सा देश क्षेत्रफल में भारत से अधिक बड़ा है

(क) चीन

(ख) फ्रांस

(ग) मिस्र

(घ) ईरान

उत्तर- (क) चीन

(iv) निम्नलिखित याम्योत्तर में से कौन-सा भारत का मानक याम्योत्तर है?

(क) 69°30’E

(ख) 75°30’E

(ग) 82°30’E

(घ) 90°30’E

उत्तर- (ग) 82°30’E

(v) यदि आप एक सीधी रेखा में राजस्थान से नागालैंड की यात्रा करें तो निम्नलिखित नदियों में से किसको आर-पार नहीं करेंगे?

(क) यमुना

(ख) सिंधु

(ग) ब्रह्मपुत्र

(घ) गंगा

उत्तर- (ख) सिंधु

(vi) क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में भारत का स्थान है।

(क) तीसरा

(ख) चौथा

(ग) पांचवाँ

(घ) सातवाँ

उत्तर- (घ) सातवाँ

   भारत का क्षेत्रफल लगभग 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है, और क्षेत्रफल की दृष्टि से यह विश्व में सातवाँ सबसे बड़ा देश है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) क्या भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है? यदि हाँ, तो आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

उत्तर- हाँ, भारत को एक से अधिक मानक समय की आवश्यकता है क्योंकि देशांतर रेखाओं के मानों से स्पष्ट होता है कि इनमें लगभग 30 डिग्री का अंतर है जो हमारे देश के सबसे पूर्वी व सबसे पश्चिमी भागों के समय में लगभग 2 घंटों का अंतर पैदा करता है। कुछ ऐसे देश हैं जिनमें अधिक पूर्व-पश्चिम विस्तार के कारण एक से अधिक मानक देशांतर रेखाएँ हैं। उदाहरण : संयुक्त राज्य अमेरिका में छह समय कटिबंध हैं।

(ii) भारत की लम्बी तटरेखा के क्या प्रभाव है?

उत्तर- भारत की लंबी तटरेखा के कारण देश को अनेक लाभ प्राप्त हैं, जैसे- समुद्री व्यापार और मत्स्य पालन का विकास, बंदरगाहों की स्थापना, पर्यटन उद्योग का विस्तार, तटीय कृषि व खनिज संपदा का उपयोग, तथा विदेशी देशों से सांस्कृतिक और आर्थिक संपर्क सुदृढ़ होना।

(iii) भारत का देशंतारीय फैलाव इसके लिए किस प्रकार लाभप्रद है?

उत्तर- भारत का देशांतरिक फैलाव लगभग 30° है, जो देश के पूर्व से पश्चिम तक समय, जलवायु और कृषि विविधता प्रदान करता है। यह फैलाव विभिन्न फसलों की खेती, विविध उद्योगों के विकास और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देने में लाभप्रद है। इससे क्षेत्रीय संतुलित विकास संभव होता है।

(iv) जबकि पूर्व में उदाहरणत: नागालैंड में सूर्य पहले उदय होता है और पहले ही अस्त होता है, फिर कोहिमा और नई दिल्ली में घड़ियाँ एक ही समय क्यों दिखाती है?

उत्तर- भारत में संपूर्ण देश के लिए एक ही समय निर्धारित है, जिसे भारतीय मानक समय (IST) कहते हैं। यह समय रेखा प्रयागराज के निकट 82°30′ पू. देशांतर से गुजरती है। इसलिए नागालैंड (कोहिमा) और नई दिल्ली, दोनों जगहों पर घड़ियाँ एक ही समय दिखाती हैं, भले ही सूर्य उदय-अस्त का समय अलग हो।

Chapter 1 India Location

Chapter 2 Structure and Physiography (संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

Chapter 2 Structure and Physiography

(संरचना तथा भू-आकृति विज्ञान)

(भाग – 2 : भारत- भौतिक पर्यावरण)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 Structure and Physiography

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) हिमालय के किस भाग में करेवा मिलते हैं

(क) उत्तर-पूर्वी हिमालय

(ख) पूर्वी हिमालय

(ग) हिमाचल-उत्तरांचल हिमालय

(घ) कश्मीर हिमालय

उत्तर- (घ) कश्मीर हिमालय

व्याख्या:

   करेवा (Karewas) कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले मोटे झील- अवसाद (lake deposits) हैं। ये उपजाऊ मिट्टी से बने होते हैं और इनमें केसर की खेती प्रसिद्ध है। करेवा हिमालय के कश्मीर भाग की एक विशिष्ट भौगोलिक विशेषता है।

(ii) लोटक झील किस राज्य में स्थित है

(क) केरल

(ख) मनीपुर

(ग) उत्तरांचल

(घ) राजस्थान

उत्तर- (ख) मनीपुर

व्याख्या:

     लोटक झील (Loktak Lake) मणिपुर राज्य में स्थित है। यह उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है, जो अपने तैरते द्वीपों (फुमदी) के लिए प्रसिद्ध है।

(iii) अंडमान द्वीप तथा निकोबार द्वीप को कौन-सी रेखा पृथक् करती है

(क) 11° चैनल

(ख) 10° चैनल

(ग) मन्नार की खाड़ी

(घ) अंडमान सागर

उत्तर- (ख) 10° चैनल

व्याख्या:

      10° चैनल अंडमान द्वीप समूह और निकोबार द्वीप समूह को एक-दूसरे से पृथक् करता है। यह रेखा लगभग 10 डिग्री उत्तरी अक्षांश पर स्थित है।

(iv) डोडावेटा चोटी निम्नलिखित में से कौन-सी पहाड़ी शृखंला में स्थित है?

(क) नीलगिरी

(ख) कार्डामम

(ग) अनामलाई

(घ) नल्लामाला

उत्तर- (क) नीलगिरी

व्याख्या:

      डोडाबेट्टा (Doddabetta) चोटी नीलगिरी पर्वत शृंखला में स्थित है। यह तमिलनाडु राज्य में ऊटी (उधगमंडलम) के पास स्थित है और नीलगिरी की सबसे ऊँची चोटी है, जिसकी ऊँचाई लगभग 2637 मीटर है।

(v) हिमालय किस प्रकार का पर्वत है?

(क) ज्वालामुखी

(ख) मोड़दार

(ग) अविशष्ट

(घ) भ्रन्शोथ

उत्तर- (ख) मोड़दार

व्याख्या:

     हिमालय पर्वत का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के आपस में टकराने से हुआ है। इस टकराव से टेथिस सागर की मलवा मुड़कर ऊपर उठीं, जिससे हिमालय जैसे मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) बने।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर 30 शब्दों में दीजिए

(i) यदि एक व्यक्ति को लक्षद्वीप जाना हो तो वह कौन-से तटीय मैदान होकर जायेगा और क्यों?

उत्तर- लक्षद्वीप जाने वाला व्यक्ति केरल के मालाबार तटीय मैदान होकर जाएगा, क्योंकि यह तट अरब सागर के किनारे स्थित है और यहीं से लक्षद्वीप द्वीपसमूह (280 किलोमीटर से 480 किलोमीटर) के लिए मार्ग मिलता है।

(ii) भारत में ठण्डा मरुस्थल कहाँ स्थित है ? इस क्षेत्र की मख्य श्रेणियों के नाम बताएँ।

उत्तर- भारत में ठण्डा मरुस्थल लद्दाख क्षेत्र में स्थित है, जो केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख (पूर्व में जम्मू-कश्मीर का भाग) का हिस्सा है।

इस क्षेत्र की मुख्य पर्वत श्रेणियाँ हैं –

⇒ कराकोरम पर्वत श्रेणी

⇒ लद्दाख पर्वत श्रेणी

⇒ जास्कर पर्वत श्रेणी

    यह क्षेत्र ऊँचाई, अत्यधिक ठंड और कम वर्षा के कारण “ठण्डा मरुस्थल” कहलाता है।

(iii) पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा क्यों नहीं है?

उत्तर- पश्चिमी तटीय मैदान पर कोई डेल्टा नहीं है क्योंकि यहाँ नदियाँ छोटी, तीव्र ढाल वाली हैं और सीधे अरब सागर में गिरती हैं, जिससे गाद जमने का अवसर नहीं मिलता।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 125 शब्दों में दीजिए

(i) अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूहों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत करें।

उत्तर- अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीप समूह भौगोलिक, संरचनात्मक तथा उत्पत्ति की दृष्टि से भिन्न हैं।

    अरब सागर में स्थित लक्षद्वीप द्वीप समूह प्रवाल (Coral) उत्पत्ति के हैं। ये छोटे, समतल एवं लैगूनयुक्त द्वीप हैं, जो मुख्यतः प्रवाल भित्तियों से बने हैं। इनकी संख्या लगभग 36 है और ये केरल तट के समीप स्थित हैं। यहाँ जलवायु उष्णकटिबंधीय तथा आर्द्र है।

    बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह ज्वालामुखीय और पर्वतीय उत्पत्ति के हैं। ये द्वीप ऊँचे, वनाच्छादित तथा श्रृंखलाबद्ध हैं। इनकी संख्या 572 के लगभग है। यहाँ सक्रिय ज्वालामुखी बैरन द्वीप भी स्थित है।

    इस प्रकार, लक्षद्वीप प्रवाल उत्पत्ति के निम्न द्वीप हैं, जबकि अंडमान-निकोबार ज्वालामुखीय उत्पत्ति के ऊँचे द्वीप हैं।

(ii) नदी घाटी मैदान में पाए जाने वाली महत्त्वपूर्ण स्थालाकृतियाँ कौन-सी हैं? इनका विवरण दें।

उत्तर- नदी घाटी मैदानों में कई प्रकार की स्थलाकृतियाँ पाई जाती हैं, जो नदी के अपरदन, परिवहन और निक्षेपण क्रियाओं से निर्मित होती हैं। प्रमुख स्थलाकृतियों में बालू के टीले (Natural levees), बाढ़ का मैदान (Flood plains), गोखुर झीलें (Oxbow lakes), मोड़दार धाराएँ (Meanders) और डेल्टा प्रमुख हैं।

    नदी अपने प्रवाह के दौरान किनारों को काटती और तलछट जमा करती है, जिससे मोड़दार धाराएँ बनती हैं। जब नदी का मोड़ टूट जाता है तो वहाँ अर्द्धचंद्राकार झीलें बनती हैं जिन्हें गोखुर झीलें कहते हैं।

    बाढ़ के समय जमा तलछट से बाढ़ का मैदान बनते हैं जो अत्यंत उपजाऊ होते हैं। नदी के मुहाने पर निक्षेपण से डेल्टा बनता है। इन स्थलाकृतियों के कारण नदी घाटी मैदान कृषि, बसावट और मानव विकास के लिए अत्यंत उपयुक्त बनते हैं।

(iii) यदि आप बद्रीनाथ से संदर वन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ चलते हैं तो आपके रास्ते में कौन-सी स्थलाकृतियाँ आएंगी?

उत्तर- यदि हम बद्रीनाथ से सुंदरवन डेल्टा तक गंगा नदी के साथ-साथ यात्रा करें, तो हमारे मार्ग में विभिन्न प्रकार की स्थलाकृतियाँ दिखाई देंगी। बद्रीनाथ हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ से गंगा की सहायक धाराएँ जैसे अलकनंदा उत्पन्न होती हैं। अलकनंदा और भागीरथी देवप्रयाग में मिलकर गंगा नदी के नाम से जानी जाती है।

     यहाँ स्थलाकृति पर्वतीय और दुर्गम होती है, जहाँ गहरी घाटियाँ और जलप्रपात मिलते हैं। आगे बढ़ने पर नदी तराई क्षेत्र में प्रवेश करती है, जहाँ भूमि अपेक्षाकृत समतल होती है और जलोढ़ मिट्टी से भरपूर होती है। इसके बाद गंगा गंगा मैदान में प्रवेश करती है। यह उपजाऊ जलोढ़ मैदान भारत का सबसे बड़ा समतल क्षेत्र है।

     यहाँ अनेक सहायक नदियाँ जैसे घाघरा, गंडक, यमुना इत्यादि मिलती हैं। अंततः गंगा दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए पश्चिम बंगाल के सुंदरवन क्षेत्र में पहुँचती है, जहाँ यह अनेक शाखाओं में बँटकर विस्तृत सुंदरवन डेल्टा का निर्माण करती है। यह विश्व का सबसे बड़ा नदी डेल्टा है।

Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents (महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

Chapter 4 Distribution of Oceans and Continents

(महासागरों और महाद्वीपों का वितरण)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 4 Distribution of Oceans

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्न में से किसने सर्वप्रथम यूरोप, अफ्रीका व अमेरिका के साथ स्थित होने की संभावना व्यक्त की?

(क) अल्फ्रेड वेगनर

(ख) अब्राहम आरटेलियस

(ग) एनटोनियो पेलग्रिनी

(घ) एमंड हैस

उत्तर- (ख) अब्राहम आरटेलियस

व्याख्या:

    अब्राहम आरटेलियस (Abraham Ortelius) ने सन् 1596 में सर्वप्रथम यह विचार प्रस्तुत किया कि यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे, परंतु बाद में वे अलग हो गए।

    यह विचार आगे चलकर अल्फ्रेड वेगनर (1912) के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का आधार बना।

(ii) पोलर फ्लिंग बल (Polar fleeing force) निम्नलिखित में से किससे सम्बन्धित है?

(क) पृथ्वी का परिक्रमण

(ख) पृथ्वा का घूर्णन

(ग) गुरुत्वाकर्षण

(घ) ज्वारीय बल

उत्तर (ख) पृथ्वा का घूर्णन

व्याख्या:

    पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force) या अपकेन्द्रीय बल (Centrifugal Force) पृथ्वी के घूर्णन (Rotation) से उत्पन्न होता है।

    जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तो इसके कारण भूमध्य रेखा (Equator) पर वस्तुओं को बाहर की ओर धकेलने वाली एक काल्पनिक बल उत्पन्न होती है। इस बल का प्रभाव ध्रुवों पर न्यूनतम और भूमध्य रेखा पर अधिकतम होता है। इसी कारण पृथ्वी का आकार थोड़ा चपटा (Oblate Spheroid) है।

(iii) इनमें से कौन सी लघु (Minor) प्लेट नहीं है?

(क) नाजका

(ख) फिलिप्पिन

(ग) अरब

(घ) अंटार्कटिक

उत्तर- (घ) अंटार्कटिक

व्याख्या:

     पृथ्वी की प्लेटों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है-

1. मुख्य (Major) प्लेटें

2. लघु (Minor) प्लेटें

मुख्य प्लेटें हैं-

→ प्रशांत (Pacific)

→ उत्तर अमेरिकी (North American)

→ दक्षिण अमेरिकी (South American)

→ अफ्रीकी (African)

→ यूरेशियन (Eurasian)

→ अंटार्कटिक (Antarctic)

→ इंडो-ऑस्ट्रेलियाई (Indo-Australian)

लघु प्लेटें हैं —

→ नाजका (Nazca)

→ अरब (Arabian)

→ फिलिप्पिन (Philippine)

→ कोकोस (Cocos) आदि

     इसलिए अंटार्कटिक प्लेट लघु नहीं बल्कि मुख्य प्लेट है।

(iv) सागरीय तल विस्तार सिद्धांत की व्याख्या करते हुए हेस ने निम्न से किस अवधारणा को नहीं विचारा?

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियों का होना।

(ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु।

उत्तर- (ग) विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण

व्याख्या:

    हेस (Harry H. Hess) ने सागरीय तल विस्तार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory) में यह बताया कि महासागरीय मध्य कटकों (Mid-Oceanic Ridges) से नए बेसाल्टिक पदार्थ निकलते हैं, जिससे समुद्री तल दोनों ओर फैलता है।

   उन्होंने अपने सिद्धांत में निम्न अवधारणाओं पर विचार किया था-

(क) मध्य-महासागरीय कटकों के साथ ज्वालामुखी क्रियाएँ

(ख) महासागरीय नितल की चट्टानों में सामान्य व उत्क्रमण चुम्बकत्व क्षेत्र की पट्टियाँ

(घ) महासागरीय तल की चट्टानों की आयु में भिन्नता

    लेकिन विभिन्न महाद्वीपों में जीवाश्मों का वितरण का विचार अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) से संबंधित है, न कि हेस के सिद्धांत से।

(v) हिमालय पर्वतों के साथ भारतीय प्लेट की सीमा किस तरह की प्लेट सीमा है?

(क) महासागरीय-महाद्वीपीय अभिसरण

(ख) अपसारी सीमा

(ग) रूपांतर सीमा

(घ) महाद्वीपीय अभिसरण

उत्तर (घ) महाद्वीपीय अभिसरण

व्याख्या:

   हिमालय पर्वतों का निर्माण भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट के टकराव (अभिसरण) से हुआ है। दोनों ही महाद्वीपीय प्लेटें हैं।

    जब भारतीय प्लेट उत्तर की ओर बढ़ते हुए यूरेशियन प्लेट से टकराई, तो इस टक्कर से पृथ्वी की परतें मुड़कर ऊपर उठीं और हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। इसलिए यह एक महाद्वीपीय-अभिसरण (Continental Convergent) सीमा का उदाहरण है।

(vi) महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया?

(क) वेगनर

(ख) बेकन

(ग) टेलर

(घ) हेनरी हेस

उत्तर- (क) वेगनर

व्याख्या:

      महाद्वीपीय विस्थापन का सिद्धांत (Continental Drift Theory) अल्फ्रेड वेगनर (Alfred Wegener) ने सन् 1912 में प्रस्तुत किया था।

    उन्होंने यह विचार दिया कि सभी महाद्वीप पहले एक साथ जुड़े हुए थे और एक महाद्वीप पैंजिया (Pangaea) के रूप में अस्तित्व में था, जो बाद में टूटकर वर्तमान महाद्वीपों में विभाजित हो गया।

(vii) निम्नलिखित में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?

(क) हिन्द महासागर

(ख) आर्कटिक महासागर

(ग) अटलांटिक महासागर

(घ) प्रशांत महासागर

उत्तर- (ख) आर्कटिक महासागर

व्याख्या:

    आर्कटिक महासागर (Arctic Ocean) पृथ्वी का सबसे छोटा और सबसे उथला महासागर है। यह उत्तरी ध्रुव के चारों ओर स्थित है और अधिकांश भाग वर्षभर बर्फ से ढका रहता है।

(viii) निम्नलिखित में से कौन-सा पटल विरूपण से संबंधित नहीं है?

(क) पर्वत बल

(ख) प्लेट विवर्तनिक

(ग) महादेश जनक बल।

(घ) संतुलन

उत्तर- (घ) संतुलन।

व्याख्या:

     पटल विरूपण (Crustal deformation) से तात्पर्य पृथ्वी की भूपर्पटी में होने वाले मोड़, भ्रंश, उत्थान आदि परिवर्तनों से है, जो मुख्यतः अंतर्जात बलों जैसे- पर्वत निर्माण बल (ओरोजेनी), प्लेट विवर्तनिकी आदि के कारण होते हैं।

    जबकि “संतुलन” (Isostasy) पृथ्वी के पर्पटीय द्रव्यमान के संतुलित स्थिति से संबंधित है, न कि विरूपण से।

(ix) समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब कितना होता है?

(क) 1031.25 मिलीबार

(ख) 1013.25 मिलीबार

(ग) 1013.52 मिलीबार

(घ) 1031.52 मिलीबार

उत्तर- (ख) 1013.25 मिलीबार

व्याख्या:

   समुद्रतल पर सामान्य वायुमंडलीय दाब को मानक वायुमंडलीय दाब (Standard Atmospheric Pressure) कहा जाता है, जिसका मान 1013.25 मिलीबार (या 1 वायुमंडल, 760 mm Hg) माना जाता है।

(x) लवणता को प्रति, समुद्र तल में घुले हुए नमक (ग्राम) को मात्रा से व्यक्त किया जाता है

(क) 10 ग्राम

(ख) 100 ग्राम

(ग) 1000 ग्राम

(घ) 10,000 ग्राम

उत्तर- (ग) 1000 ग्राम

व्याख्या:

      समुद्र जल की लवणता (Salinity) को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है-

       “1000 ग्राम (अर्थात् 1 किलोग्राम) समुद्री जल में घुले हुए नमक की मात्रा (ग्राम में)”।

    उदाहरण: औसत लवणता ≈ 35‰ (प्रति हजार) होती है, अर्थात् 1000 ग्राम समुद्री जल में लगभग 35 ग्राम नमक घुला होता है।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपों के प्रवाह के लिए वेगनर ने निम्नलिखित में से किन बलों का उल्लेख किया?

उत्तर- वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए दो बलों का उल्लेख किया- ज्वारीय बल (Tidal Force) और पोलर फ्लिंग बल (Polar Fleeing Force), जो पृथ्वी के घूर्णन व चंद्रमा के आकर्षण से उत्पन्न होते हैं।

(ii) मैंटल में संवहन धाराओं के आरम्भ होने और बने रहने के क्या कारण हैं?

उत्तर- मैंटल में संवहन धाराओं (Convection Currents) के आरम्भ होने और बने रहने के मुख्य कारण हैं-

1. पृथ्वी के अन्दर ऊष्मा का असमान वितरण:-

     पृथ्वी के भीतरी भाग (कोर) में अत्यधिक ताप होता है, जबकि ऊपर के भाग अपेक्षाकृत ठंडे होते हैं।

2. गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव:-

     गर्म, हल्का पदार्थ ऊपर उठता है और ठंडा, भारी पदार्थ नीचे की ओर जाता है।

3. रेडियोधर्मी तत्त्वों का अपक्षय:-

    यूरेनियम, थोरियम आदि तत्त्वों के अपघटन से निरंतर ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो संवहन को बनाए रखती है।

    परिणामस्वरूप, यह ऊष्मा प्रवाह मैंटल में निरंतर ऊपर-नीचे की गति पैदा करता है, जिसे संवहन धाराएँ कहते हैं।

(iii) प्लेट की रूपांतर सीमा, अभिसरण सीमा और अपसारी सीमान्त में मुख्य अन्तर क्या है?

उत्तर- रूपांतर सीमा में प्लेटें एक-दूसरे के समानांतर सरकती हैं, अभिसरण सीमा में प्लेटें टकराती हैं, जबकि अपसारी सीमा में प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं।

(iv) दक्कन ट्रैप के निर्माण के दौरान भारतीय स्थलखण्ड की स्थिति क्या थी?

उत्तर- दक्कन ट्रैप के निर्माण के समय भारतीय स्थलखण्ड गोंडवाना भूभाग का हिस्सा था और भूमध्यरेखीय क्षेत्र के दक्षिण में स्थित था। लगभग 6.5 करोड़ वर्ष पूर्व, जब भारत अंटार्कटिका और ऑस्ट्रेलिया से अलग होकर उत्तर की ओर बढ़ रहा था, तब इस क्षेत्र में तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियाँ हुईं।

   इन्हीं विस्फोटों से विशाल मात्रा में बेसाल्ट लावा निकला, जिसने परत-दर-परत फैलकर दक्कन ट्रैप का निर्माण किया। उस समय भारतीय प्लेट तेजी से यूरेशियाई प्लेट की ओर बढ़ रही थी, जिससे इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत के पक्ष में दिये गये प्रमाणों का वर्णन करें?

उत्तर-  अल्फ्रेड वेगनर ने सन् 1912 में महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, आज के सभी महाद्वीप एक समय में “पैंजिया” नामक एक महाद्वीप के भाग थे, जो बाद में टूटकर वर्तमान स्थिति में आ गए।

         इस सिद्धांत के समर्थन में वेगनर ने कई वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत किए-

1. भौगोलिक प्रमाण:-

      अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के तटरेखाएँ पज़ल के टुकड़ों की तरह एक-दूसरे से मिलती हैं, जिससे पता चलता है कि ये कभी जुड़े हुए थे।

2. जीवाश्म प्रमाण:-

     विभिन्न महाद्वीपों जैसे दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, भारत और ऑस्ट्रेलिया में एक ही प्रकार के जीवाश्म (जैसे ग्लॉसोप्टेरिस पौधा और मेसोसॉरस जन्तु) पाए गए, जो यह दर्शाते हैं कि ये स्थलखंड पहले जुड़े हुए थे।

3. भूगर्भिक संरचना:-

     एक जैसे पर्वत शृंखलाएँ और चट्टानों की बनावट अलग-अलग महाद्वीपों पर पाई जाती हैं, जैसे उत्तरी अमेरिका और यूरोप की अपलाचियन तथा कैलिडोनियन पर्वतमालाएँ।

4. जलवायु प्रमाण:-

     आज ठंडे क्षेत्रों में कोयले की परतें और गर्म क्षेत्रों में हिमनदीय अवशेष मिलते हैं, जो पूर्व की जलवायु में परिवर्तन का संकेत देते हैं।

     इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि महाद्वीप वास्तव में अतीत में एक साथ जुड़े थे और धीरे-धीरे अलग हुए।

(ii) महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत व प्लेट विवर्तनिक सिद्धान्त में मूलभूत अंतर बताइए।

उत्तर- महाद्वीपीय विस्थापन सिद्धांत (Continental Drift Theory) का प्रतिपादन 1912 में अल्फ्रेड वेगनर ने किया था।

    इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी के सभी महाद्वीप एक समय “पैंजिया” नामक एक ही भूखंड का भाग थे, जो लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले टूटकर विभिन्न दिशाओं में खिसक गए और वर्तमान स्थिति में आ गए। वेगनर ने महाद्वीपों के प्रवाह के लिए “ज्वारीय बल” और “पोलर फ्लिंग बल” को कारण बताया।

    यद्यपि उनके सिद्धांत ने महाद्वीपों के समान तट रेखाओं, जीवाश्मों और शैल संरचनाओं में समानता का उल्लेख किया, परंतु इसमें महाद्वीपों के विस्थापन के वास्तविक बलों की वैज्ञानिक व्याख्या का अभाव था, इसलिए इसे पूर्णतः स्वीकार नहीं किया गया।

     दूसरी ओर, प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत (Plate Tectonic Theory) 1960 के दशक में विकसित हुआ, जो सागरीय तल विस्तार (Seafloor Spreading) और महाद्वीपीय विस्थापन दोनों को समाहित करता है। इस सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी का बाहरी कठोर भाग कई बड़ी और छोटी लिथोस्फेरिक प्लेटों में विभाजित है, जो पृथ्वी की दुर्बल मंडल (Asthenosphere) पर तैरती हैं। इन प्लेटों की गति के कारण ही पर्वत निर्माण, भूकंप, ज्वालामुखी और महासागरीय गर्त जैसी भौगोलिक घटनाएँ होती हैं।

      इस प्रकार, मुख्य अंतर यह है कि वेगनर का सिद्धांत केवल महाद्वीपों की गति तक सीमित था, जबकि प्लेट विवर्तनिक सिद्धांत सम्पूर्ण पृथ्वी की प्लेटों की गति और उनसे जुड़ी भौगोलिक प्रक्रियाओं की वैज्ञानिक व्याख्या करता है।

(iii) महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत के उपरान्त की प्रमुख खोज क्या है, जिससे वैज्ञानिकों ने महासागर वितरण के अध्ययन में पुनः रुचि ली?

उत्तर- अल्फ्रेड वेगनर के महाद्वीपीय प्रवाह सिद्धांत (Continental Drift Theory) के उपरांत 20वीं शताब्दी के मध्य में वैज्ञानिकों ने कई महत्वपूर्ण खोजें कीं, जिनसे महासागर के वितरण और संरचना के अध्ययन में पुनः गहरी रुचि उत्पन्न हुई।

      इनमें सबसे प्रमुख खोज थी “सागरीय तल प्रसार सिद्धांत (Sea Floor Spreading Theory)”, जिसे 1960 के दशक में हैरी हेस (Harry Hess) ने प्रस्तुत किया।

   इस सिद्धांत के अनुसार, महासागरों के मध्य में स्थित मध्य-महासागरीय पर्वतमालाओं (Mid-Oceanic Ridges) से नये भू-पटल का निर्माण होता है, और यह धीरे-धीरे दोनों ओर फैलता जाता है।

     इसके समर्थन में चुंबकीय अनियमितताओं (Magnetic anomalies), समुद्री तल की आयु, तथा गहराई के सर्वेक्षणों से प्राप्त प्रमाण मिले। यह भी पाया गया कि महासागरों का तल अपेक्षाकृत नया है और इसका निरंतर पुनर्निर्माण होता रहता है। इस खोज से यह स्पष्ट हुआ कि महाद्वीप वास्तव में गतिशील हैं और पृथ्वी की सतह प्लेटों में विभाजित है जो आपस में गतिमान हैं।

   इस प्रकार, सागरीय तल प्रसार सिद्धांत तथा प्लेट विवर्तनिकी (Plate Tectonics) के विकास ने वेगनर के विचारों को वैज्ञानिक आधार दिया और पृथ्वी के महाद्वीपों व महासागरों के वितरण, गति तथा उनके विकास को समझने का नया दृष्टिकोण प्रदान किया।

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth (पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

Chapter 2 The Origin and Evolution of the Earth

(पृथ्वी की उत्पत्ति एवं विकास)

(भाग – 1 : भौतिक भूगोल के मूल सिद्धांत)

बिहार बोर्ड तथा NCERT कक्षा 11वीं के भूगोल का सम्पूर्ण प्रश्नोत्तर



Chapter 2 The Origin and Evolution

1. बहुवैकल्पिक प्रश्न एवं उनके उत्तर

(i) निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या पृथ्वी की आयु को प्रदर्शित करती है?

(क) 46 लाख वर्ष

(ख) 4600 मिलियन वर्ष

(ग) 13.7 अरब वर्ष

(घ) 13.7 खरब वर्ष

उत्तर- (ख) 4600 मिलियन वर्ष

व्याख्या:

    वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष (यानी 4600 मिलियन वर्ष) मानी जाती है। यह अनुमान रेडियोधर्मी तत्वों जैसे यूरेनियम और सीसा के विश्लेषण द्वारा लगाया गया है।

(ii) निम्न में कौन-सी अवधि सबसे लम्बी है

(क) इओन (Eons)

(ख) कल्प (Period)

(ग) महाकल्प (Era)

(घ) युग (Epoch)

उत्तर- (क) इओन (Eons)

व्याख्या:

    भूवैज्ञानिक समय को विभिन्न इकाइयों में बाँटा गया है-

1. इओन (Eon) – सबसे बड़ी और सबसे लंबी समय इकाई।

2. महाकल्प (Era) – इओन का उपविभाग।

3. कल्प (Period) – महाकल्प का उपविभाग।

4. युग (Epoch) – कल्प का उपविभाग।

अतः क्रम होगा: Eon > Era > Period > Epoch

       इसलिए सबसे लंबी अवधि इओन (Eon) होती है।

(iii) निम्न में कौन सा-तत्त्व वर्तमान वायुमण्डल के निर्माण व संशोधन में सहायक नहीं है?

(क) सौर पवन

(ख) गैस उत्सर्जन

(ग) विभेदन

(घ) प्रकाश संश्लेषण

उत्तर- (ग) विभेदन 

व्याख्या:

  सौर पवन, गैस उत्सर्जन, और प्रकाश संश्लेषण ये तीनों तत्त्व पृथ्वी के वायुमण्डल के निर्माण और संशोधन में योगदान देते हैं।

सौर पवन ने प्रारम्भिक वायुमण्डल की गैसों को प्रभावित किया।

गैस उत्सर्जन (Volcanic emission) ने नए गैसों को वायुमण्डल में जोड़ा।

प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) ने ऑक्सीजन बढ़ाकर वायुमण्डल की संरचना बदली।

जबकि विभेदन (Differentiation) पृथ्वी के आन्तरिक भागों के अलग-अलग स्तरों (कोर, मेंटल, क्रस्ट) में विभाजन से सम्बन्धित है, न कि सीधे वायुमण्डल के निर्माण या संशोधन से।

(iv) निम्नलिखित में से भीतरी ग्रह कौन से हैं

(क) पृथ्वी व सूर्य के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

(ग) वे ग्रह जो गैसीय हैं।

(घ) बिना उपग्रह वाले ग्रह।

उत्तर- (ख) सूर्य व क्षुद्र ग्रहों की पट्टी के बीच पाए जाने वाले ग्रह।

व्याख्या:

    भीतरी ग्रह (Inner Planets) वे हैं जो सूर्य और क्षुद्र ग्रहों की पट्टी (Asteroid Belt) के बीच स्थित हैं।

   इनमें चार ग्रह शामिल हैं-

1. बुध (Mercury)

2. शुक्र (Venus)

3. पृथ्वी (Earth)

4. मंगल (Mars)

    ये ग्रह छोटे, ठोस तथा चट्टानी होते हैं, जबकि बाहरी ग्रह गैसीय होते हैं।

(v) पृथ्वी पर जीवन निम्नलिखित में से लगभग कितने वर्षों पहले आरम्भ हुआ।

(क) 1 अरब 37 करोड़ वर्ष पहले

(ख) 460 करोड़ वर्ष पहले

(ग) 38 लाख वर्ष पहले

(घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

उत्तर- (घ) 3 अरब, 80 करोड़ वर्ष पहले।

व्याख्या:

   वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार, पृथ्वी पर जीवन का आरंभ लगभग 3.8 अरब (380 करोड़) वर्ष पहले हुआ था। प्रारंभिक जीवन सूक्ष्म जीवों (micro organisms) के रूप में समुद्रों में उत्पन्न हुआ था।

2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

(i) पार्थिव ग्रह चट्टानी क्यों हैं?

उत्तर- ये ग्रह पृथ्वी की भाँति ही शैलों और धातुओं से बने हैं और अपेक्षाकृत अधिक घनत्व वाले ग्रह हैं। अर्थात पार्थिव ग्रह चट्टानी हैं क्योंकि ये सूर्य के निकट बने, जहाँ उच्च तापमान के कारण हल्की गैसें उड़ गईं और केवल भारी तत्व जैसे लोहा, सिलिका आदि रह गए, जिनसे ठोस सतह बनी।

   ये ग्रह छोटे होने के कारण उनकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी कम रही जिसके फलस्वरूप इनसे निकली हुई गैस इन पर रुकी नहीं रह सकी।

(ii) पृथ्वी की उत्पत्ति संबंधित दिये गए तर्कों में निम्न वैज्ञानिकों के मूलभूत अंतर बताएँ-

(क) कान्ट व लाप्लेस (ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन

उत्तर-

(क) कान्ट व लाप्लेस: कान्ट व लाप्लेस की परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण धीमी गति से घूमते हुए पदार्थों के बादल से हुआ जो कि सूर्य की युवा अवस्था से संबद्ध थे।

(ख) चैम्बरलेन व मोल्टेन: चैम्बरलेन व मोल्टेन ने कहा कि ब्रह्मांड में एक अन्य भ्रमणशील तारा सूर्य के पास से गुजरा। इसके परिणामस्वरूप तारे के गुरुत्वाकर्षण से सूर्य-सतह से सिगार के आकार का कुछ पदार्थ निकलकर अलग हो गया।

    यह पदार्थ सूर्य के चारों तरफ घूमने लगा और यहीं पर धीरे-धीरे संघनित होकर ग्रहों के रूप में परिवर्तित हो गया।

(iii) विभेदन प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?

उत्तर-  विभेदन प्रक्रिया से तात्पर्य है- जब पृथ्वी के निर्माण के दौरान भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र में और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एल्युमिनियम) ऊपर की ओर आ गए, जिससे परतें बनीं।

विस्तार से व्यख्या- पृथ्वी की उत्पत्ति के दौरान और उत्पत्ति के तुरंत बाद अत्यधिक ताप के कारण, पृथ्वी आंशिक रूप से द्रव अवस्था में रह गई और तापमान की अधिकता के कारण ही हल्के और भारी घनत्व के मिश्रण वाले पदार्थ घनत्व के अंतर के कारण अलग होना शुरू हो गए ।

     इसी अलगाव से भारी पदार्थ (जैसे लोहा), पृथ्वी के केन्द्र में चले गए और हल्के पदार्थ पृथ्वी की सतह या ऊपरी भाग की तरफ आ गए। समय के साथ यह और ठंडे हुए और ठोस रूप में परिवर्तित होकर छोटे आकार के हो गए।

    अंततोगत्वा यह पृथ्वी की भूपर्पटी के रूप में विकसित हो गए। हल्के व भारी घनत्व वाले पदार्थों के पृथक होने की इस प्रक्रिया को विभेदन (Differentiation) कहा जाता है।

(iv) प्रारंभिक काल में पृथ्वी के धरातल का स्वरूप क्या था?

उत्तर- प्रारंभ में पृथ्वी, चट्टानी गर्म और वीरान ग्रह थी जिसका वायुमण्डल विरल था जो हाइड्रोजन व हीलीयम से बना था।

    अर्थात प्रारंभिक काल में पृथ्वी का धरातल अत्यंत गर्म, अस्थिर और पिघले हुए पदार्थों से बना था। इसमें ठोस भू-पर्पटी नहीं थी तथा ज्वालामुखीय क्रियाएँ निरंतर होती रहती थीं।

(v) पृथ्वी के वायुमंडल को निर्मित करने वाली प्रारम्भिक गैसें कौन-सी थीं?

उत्तर- हाइड्रोजन व हीलीयम।

3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

(i) बिग बैंग सिद्धांत का विस्तार से वर्णन करें।

उत्तर- बिग बैंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्मांड का विस्तार निम्न अवस्थाओं में हुआ है-

1. आरम्भ में वे सभी पदार्थ, जिनसे ब्रह्मांड बना है, अति छोटे गोलक (एकाकी परमाणु) के रूप में एक ही स्थान पर स्थित थे। जिसका आयतन अत्यधिक सूक्ष्म एवं तापमान तथा घनत्व अनंत था ।

2. बिग बैंग की प्रक्रिया में इस अति छोटे गोलक में भीषण विस्फोट हुआ। इस प्रकार की विस्फोट प्रक्रिया से वृहत् विस्तार हुआ। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि बिग बैंग की घटना आज से 13.7 अरब वर्षों पहले हुई थी।

    ब्रह्मांड का विस्तार आज भी जारी है। विस्तार के कारण कुछ ऊर्जा पदार्थ में परिवर्तित हो गई। विस्फोट (Bang) के बाद एक सेकेंड के अल्पांश के अंतर्गत ही वृहत् विस्तार हुआ। इसके बाद विस्तार की गति धीमी पड़ गई। बिग बैंग होने के आरम्भिक तीन मिनट के अंतर्गत ही पहले परमाणु का निर्माण हुआ।

3. बिग बैंग के कारण 3 लाख वर्षों के दौरान, तापमान 4500° केल्विन तक गिर गया और परमाणवीय पदार्थ का निर्माण हुआ। ब्रह्मांड पारदर्शी हो गया। ब्रह्मांड के विस्तार का अर्थ है आकाशगंगाओं के बीच की दूरी में विस्तार का होना।

    हॉयल (Hoyle) ने इसका विकल्प ‘स्थिर अवस्था संकल्पना’ (Steady State Concept) के नाम से प्रस्तुत किया । इस संकल्पना के अनुसार ब्रह्मांड किसी भी समय में एक ही जैसा रहा हैं। यद्यपि ब्रह्मांड के विस्तार संबंधी अनेक प्रमाणों के मिलने पर वैज्ञानिक समुदाय अब ब्रह्मांड विस्तार सिद्धांत के ही पक्षधर हैं।

(ii) पृथ्वी के विकास संबंधी अवस्थाओं को बताते हुए हर अवस्था या चरण को संक्षेप में वर्णित करें।

उत्तर- पृथ्वी के विकास की प्रक्रिया अत्यंत दीर्घ और जटिल रही है, जो लगभग 4.6 अरब वर्ष पूर्व सौरमंडल के निर्माण के साथ आरंभ हुई। इस विकास को विभिन्न अवस्थाओं या चरणों में विभाजित किया जा सकता है-

1. निहारिका अवस्था (Nebular Stage):-

    सौरमंडल प्रारंभ में गैसों और धूल कणों के विशाल बादल के रूप में था। गुरुत्वाकर्षण बल के प्रभाव से यह निहारिका सिमटने लगी और इसके केंद्र में सूर्य का निर्माण हुआ, जबकि परिक्रमा करती धूल और गैस से ग्रहों की उत्पत्ति हुई।

2. प्रोटो-पृथ्वी अवस्था (Proto-Earth Stage):-

     संकुचन और संलयन के परिणामस्वरूप धूल और गैस के कण आपस में मिलकर प्रोटो-पृथ्वी का निर्माण करने लगे। इस समय पृथ्वी अत्यंत गर्म और अस्थिर अवस्था में थी।

3. विभेदन अवस्था (Differentiation Stage):-

     पृथ्वी के भीतर तापमान बढ़ने के कारण भारी तत्व (जैसे लोहा, निकेल) केंद्र की ओर चले गए और हल्के तत्व (जैसे सिलिका, एलुमिनियम) ऊपर की ओर आ गए। परिणामस्वरूप पृथ्वी का आंतरिक ढांचा – कोर, मेंटल और क्रस्ट बना।

4. वायुमंडल और महासागर निर्माण अवस्था:-

     ज्वालामुखीय गैसों और जलवाष्प के उत्सर्जन से प्रारंभिक वायुमंडल बना। जलवाष्प के संघनन से वर्षा हुई और महासागरों का निर्माण हुआ।

5. जैविक विकास अवस्था:-

     लगभग 3.8 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर जीवन का उद्भव हुआ, जिसने धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल और पर्यावरण को परिवर्तित कर वर्तमान स्वरूप दिया।

     इस प्रकार, पृथ्वी का विकास एक सतत भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रिया का परिणाम है।

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