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Indian Geography Capsule15

Indian Geography Capsule15

भारत का भूगोल 


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एक नजर इसे भी जरुर पढ़ें

1. भारत में हीरे की ‘पन्ना’ खान किस राज्य में स्थित है-

उत्तर- मध्य प्रदेश में

2. भारत मे तांबा की खान ‘खेतड़ी’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- राजस्थान में

3. भारत मे सोना की खान ‘हट्टी’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- कर्नाटक में

4. भारत में सोना की खान ‘कोलार’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- कर्नाटक में

5. भारत मे जस्ता की खान ‘जावर’ कहाँ स्थित है।

उत्तर- राजस्थान में

6. भारत में कोयला की खान ‘झरिया’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- झारखंड में

7.  आर्मी एयर डिफेंस कॉलेज, गोपालपुरा किस राज्य में स्थित है-

उत्तर- ओडिशा

8. ‘समुद्री राष्ट्रीय पार्क’ अवस्थित है-

उत्तर- कच्छ की खाड़ी में

9. विश्व मौसम संगठन का मुख्यालय कहाँ स्थित है-

उत्तर- जेनेवा (स्विटजरलैंड)

10. राष्ट्रीय कृषि वानिकी अनुसंधान केन्द्र स्थित है-

उत्तर- झांसी (उत्तर प्रदेश) में

11. उत्तर प्रदेश में नवाबगंज पक्षी विहार कहाँ स्थित है-

उत्तर- उन्नाव (उत्तर प्रदेश) में

12. पहला ग्रीन सोलर एनर्जी प्लांट कहाँ स्थापित किया गया-

उत्तर- सिक्किम में

13. भारत की सबसे बड़ी तेल कंपनी कौन-सी है-

उत्तर- इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड

14. देश का पहला ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट कौन-सी है-

उत्तर- मथुरा रिफाइनरी (उत्तर प्रदेश)

15. हरित हाइड्रोजन आधारित परिवहन परियोजना को लागू करने वाला देश का पहला शहर-

उत्तर- लेह (लद्दाख)

16. भारत में हीरा की खान ‘गोलकुंडा’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- आन्ध्रप्रदेश में 

17. भारत का परमाणु रिएक्टर ‘कामिनी’ कहाँ स्थित है-

उत्तर- कलपक्कम (तमिलनाडु) में

18. कैगा नाभिकीय संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- कर्नाटक में

19. कोटा नाभिकीय संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- राजस्थान में

20. तारापुर नाभिकीय संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- महाराष्ट्र में

21. नरौरा नाभिकीय संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- उत्तर प्रदेश में

22. रावत भाटा (चित्तौड़गढ़) संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- राजस्थान में

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रावत भाटा

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23.नेशनल वुड फॉसिल पार्क कहाँ स्थित है-

उत्तर- जैसलमेर (राजस्थान) में

24. संघ शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव भारत के किन राज्यों के बीच स्थित है-

उत्तर- गुजरात व महाराष्ट्र

25. दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव पश्चिमी भारत में स्थित एक केंद्रशासित प्रदेश है जिसकी स्थापना पहले के दादर और नगर हवेली तथा दमन और दीव के विलय द्वारा हुई। यह  कब से अस्तित्व में आया-

उत्तर- 26 जनवरी 2020 से

26. दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव की राजधानी स्थित है-

उत्तर- दमन में

27. विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ की ऊँचाई कितनी है-

उत्तर- 182 मीटर

28. राष्ट्रीय जैव उर्वरक विकास केन्द्र स्थित है-

उत्तर- गाजियाबाद में

29. विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान स्थित है-

उत्तर- अल्मोड़ा (उत्तराखंड) में

30. विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ किस देश में स्थित है-

उत्तर- भारत में

31. ISRO (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) का मुख्यालय कहाँ स्थित है-

उत्तर- बेंगलुरु (कर्नाटक) में

32. मुप्पान्दल (कन्याकुमारी) संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- तमिलनाडु में

33. कुडनकुलम नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- तमिलनाडु में

34. सतारा पवन ऊर्जा संयंत्र के लिए प्रसिद्ध है-

उत्तर- महाराष्ट्र में

35. भारत में प्रथम न्यूक्लियर ऊर्जा स्टेशन संयंत्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- तारापुर (महाराष्ट्र) में

36. भारत में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध महत्वपूर्ण नाभिकीय ईंधन है-

उत्तर- थोरियम

37. परमाणु विद्युत संयंत्र काकरापारा स्थित हैं-

उत्तर- सूरत (गुजरात) में

38. पोर्ट ब्लेयर कहाँ स्थित है

उत्तर- दक्षिणी अण्डमान में

39. दुधवा राष्ट्रीय उद्यान कहाँ स्थित है-

उत्तर- लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश) में

40. घना पक्षी अभ्यारण्य किस राज्य में स्थित है-

उत्तर- राजस्थान में

41. गोलकोण्डा किला कहाँ स्थित है-

उत्तर- हैदराबाद (तेलंगाना) में

42. कोशिकीय व आण्विक जीव विज्ञान केन्द्र कहाँ स्थित है-

उत्तर- हैदराबाद (तेलंगाना) में

43. महुआडार अभ्यारण्य अवस्थित है-

उत्तर- झारखण्ड में

44. देश की प्रथम चालक रहित मेट्रो ट्रेन का परिचालन किया गया है-

उत्तर- जनकपुरी पश्चिम को बॉटनिकल गार्डन मेटो स्टेशन, नोएडा

45. ताप विद्युत संयंत्र बदरपुर अवस्थित है-

उत्तर- दिल्ली में

46. ताप विद्युत संयंत्र हरदुआगंज अवस्थित है-

उत्तर- उत्तर प्रदेश में

47. ताप विद्युत संयंत्र उतारन अवस्थित है-

उत्तर- गुजरात में

48. राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान स्थित है-

उत्तर- जयपुर (राजस्थान) में

49.राष्ट्रीय खरपतवार विज्ञान अनुसंधान केंद्र स्थित है-

उत्तर- जबलपुर (मध्य प्रदेश) में

50. केन्द्रीय बागवानी संस्थान स्थित है-

उत्तर- नागालैंड में



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Indian Geography Capsule 1

Indian Geography Cpasule 2

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नोट :  मैं आशा करता हूँ कि भारत का भूगोल से सम्बंधित सभी Capsule आपके परीक्षा के लिए नींव का पत्थर साबित होंगे। अगर किसी भी प्रश्न के उत्तर को लेकर आपके मन में कोई संदेह हो तो हमसे Contact With us के माध्यम से, Comment या Email से Contact कर सकते है। मैं हमेशा आपके मंगल भविष्य की कामना करता हूँ।

Thank You @ By Dr. Amar Kumar


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10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद / Behavioral Revolution

10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद




आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद

          द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था। आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था।

     अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

       भूगोल में मनोविज्ञान के तथ्यों का अध्ययन भौगोलिक संदर्भ में करना ही आचारपरक क्रांति कहलाती है। इस क्रांति का स्रोत विषय मनोविज्ञान और लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल था। अमेरिकी भूगोलवेता ओलसन ने कहा है कि “आचारपरक क्रांति मानव भूगोल या सामाजिक भूगोल की पूँजी है।” व्यवहारात्मक क्रांति प्रारंभ करने का श्रेय अमेरिका के गेस्टोल्ट समप्रदाय को जाता है। लेकिन भूगोल में आचारपरक क्रांति को मान्यता दिलाने का कार्य डब्लू. किर्क महोदय ने किया।

       आचारपरक क्रांति में इस तथ्य का अध्ययन किया जाता है कि मानव के व्यवहार पर पर्यावरण का प्रभाव और पर्यावरण पर मानव का प्रभाव कैसे पड़ता है? आचारपरक भूगोलवेताओं का कहना है कि वास्तविक पर्यावरण और आचारपरक पर्यावरण दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जैसे वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया जाता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधरों के द्वारा किया जा सकता है।

     वास्तविक पर्यावरण के अन्तर्गत जैविक घटक, अजैविक घटक और उन दोनों के बीच चलने वाला ऊर्जा का प्रवाह का अध्ययन करते हैं जबकि आचारपरक क्रांति में एक व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। आचारपरक क्रांति एक ऐसी क्रांति है जो मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के गर्भ से उत्पन्न हुआ है। भूगोल में आचारपरक क्रांति के विकास के चरण को चार भागों में बाँटते है:-

(1) प्रथम चरण (1955-60) ⇒ प्रथम चरण में डब्लू. किर्क, जे.के. राइट,  गिलबर्ट व्हाइट और हैगर स्टैंड का मुख्य योगदान है। हैगर स्टैंड ने अपने नव उत्पाद सिद्धांत के माध्यम से कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसमें यह बताया कि कृषि के स्थानीयकरण पर मानव व्यवहार का प्रभाव पड़ता है। फेटर और हॉटली महोदय ने अमेरिका के म्यामी बिच पर साफ्टी (आईसक्रीम ) उद्योग विकसित होने के पीछे मानव के व्यवहार को ही उत्तरदायी माना है।

(2) दूसरा चरण (1960-65) ⇒ दूसरा चरण में किट्स, वोल्पर्ट, डेविडहफ और लोवेंथल जैसे भूगोलवेताओं का योगदान है। इस चरण में प्रथम चरण की तुलना में और अधिक मनोविज्ञान के तथ्यों का प्रयोग भूगोल में किया गया है। ओल्पर्ट महोदय ने बताया कि मानवीय जनसंख्या के स्थानान्तरण पर आचारपरक क्रांति का प्रभाव पड़‌ता है। जैसे उन्होंने कहा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों का प्लायन पंजाब की ओर होना व्यावहारात्मक क्रान्ति का परिणाम है।

(3) तीसरा चरण (1965-71)⇒ तीसरा चरण में एलेन व्रेड, मरफी और पीटर गोल्ट, बोल्डिंग जैसे भूगोलवेताओं का योगदान प्रमुख है।

         बोल्डिंग महोदय ने आचारपरक क्रांति को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है। 

आचारपरक क्रांति

   एलेन प्रेड महोदय ने व्यावहारात्मक क्रांति समझाने के लिए निम्नलिखित मैट्रिक्स चर का विकास किया।

आचारपरक क्रांति

(4) चौथा चरण (1971ई० के बाद से)⇒ चौथा चरण में डाउन्स और सोनेन फील्ड जैसे भूगोलवेताओं का विशेष योगदान है। सोनेन फील्ड ने व्यावहारात्मक क्रान्ति को समझाने के लिए एक संकेन्द्रीय मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

              पर्यावरण और व्यावहार को समझने के लिए डाउन्स महोदय ने भी एक मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

          उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में व्यवहारात्मक क्रांति का विकास कई चरणों में हुआ है और मनोविज्ञान के तथ्यों के आधार पर उद्योगों के स्थानीयकरण, कृषि स्थानीकरण, जनसँख्या स्थानान्तरण के संबंध में कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए है। 

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

           भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय ने अपनी पुस्तक “Explanation in Geography” में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मानव का व्यवहार एक जटिल तंत्र है। इसे इतनी सफलता पूर्वक समझा नहीं जा सकता।

(ii) मानव का आचरण यदि सूचनाओं से नियंत्रित होता है तो यह संभव है कि गलत सूचना देकर मानव के व्यवहार को प्रभावित किया जाय इसके चलते गुलत परिणाम भी आ सकते हैं।

(iii) इसी संदर्भ में स्किनर महोदय ने कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से प्रदूषित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिन्तन विकसित हो सकता है।

निष्कर्ष

      उपरोक्त सीमाओं के बावजूद व्यावहारात्मक क्रान्ति की शुरुआत भूगोल में एक नयी पहल थी जिसके चलते भूगोल के विषयस्तु और विधितंत्र में स्पष्ट परिवर्तन हुए।



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति (Behavioral Revolution)

            द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भूगोल के विधितंत्र में कई क्रांतियों का आगमन हुआ। उनमें से एक व्यवहारात्मक क्रांति था। इस क्रांति का आगमन मात्रात्मक क्रांति के विरुद्ध माना जाता है क्योंकि मात्रात्मक क्रांति के अन्तर्गत मानवीय मूल्यों का अध्ययन संभव नहीं था।

           प्रिस्टन विश्वविद्यालय (USA) में मानविकी विषयों के विद्वानों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था कि अन्तरविषाक अध्ययन पर विशेष जोर दिया जाय। इसी चिन्तन का परिणाम था कि कई भूगोलवेताओं ने दूसरे विषय के तथ्यों को भूगोल में आयात किया। मानव भूगोल में मनोविज्ञान के जो तथ्य आयात किये गये उससे मानवीय भूगोल के चिन्तन में त्वरित परिवर्तन हुआ। उसी त्वरित परिवर्तन को आचारपरक क्रांति / व्यवहारात्मक क्रांति से संबोधित किया गया।

           भूगोल में आचारपरक क्रांति का शुरुआत करने का श्रेय डब्लू. किर्क महोदय को जाता है। इनके कार्यों के बाद USA के गेस्टॉल्ड सम्प्रदाय ने भूगोल में आचारपरक क्रांति को विकास करने में विशेष भूमिका निभायी।

          आचारपरक क्रांति इस तथ्य का अध्ययन करता है कि मानव के द्वारा विकसित सामाजिक आर्थिक भूदृश्य पर मानव के आचारपरक वातावरण का प्रभाव पड़ता है। ओल्सन महोदय ने कहा है कि आचारपरक क्रांति सामाजिक आर्थिक भूगोल की कूंजी है।

आचारपरक क्रांति का विश्लेषण

       आचारपक क्रांति के समर्थक भूगोलवेताओं ने कहा है कि पर्यावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(1) वास्तविक पर्यावरण – प्रत्यक्ष साधन

(2) आचारपरक पर्यावरण – अप्रत्यक्ष साधन

             वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों या तकनीक के द्वारा किया जा सकता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया का जा सकता है। आचारपरक क्रांति वास्तविक पर्यावरण की तुलना में एक व्यक्ति के आचारपरक पर्यावरण के अध्ययन पर विशेष जोर देता है। भूगोल में आचारपरक क्रांति का विकास निम्नलिखित चार चरणों में हुआ है।

चरण  काल (ई० में) प्रमुख भूगोलवेता
प्रथम चरण 1955-60 जे.के.राइट, डब्लू. किर्क, हैगरस्टैंड, गिल्वर्ट व्हाइट
दूसरा चरण  1960-65 वालपर्ट, कीट्स,डेविड हफ
तीसरा चरण 1965-71 एलेन प्रेड, मर्फी, पीटर गॉल्ड, बोल्डिंग,
चौथा चरण 1971 से आगे डाउन्स, सोनेनफील्ड

आचारपरक भूगोल के मॉडल

                आचारपरक भूगोलवेताओं में अलग-अलग मॉडल से समझने का प्रयास किया है। जैसे-

(1) बोल्डिंग महोदय ने मानव और पर्यावरण के बीच मिलने वाला संबंध को निम्नलिखित मॉडल से प्रस्तुत किया है। जैसे- 

चित्र: बोल्डिंग के अनुसार मानव-वातावरण संबंध का एक पम्परागत मॉडल (1956)

(2) एलेनप्रेड ने व्यवहारात्मक क्रांति को समझाने के लिए मैट्रिक्स मॉडल का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि मानव के व्यवहार पर सूचनाओं का प्रभाव पड़ता है। जैसे- इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है।

चित्र : एलेन प्रेड  का आचारपरक मैट्रिक्स (1969)

(3) डाउन्स महोदय ने पर्यावरण बोध और मानव के व्यवहार को निम्नलिखित मॉडल से समझाने का प्रयत्न किया है।

चित्र: पर्यावरण बोध तथा व्यवहार (1970)     

(4) सोनेनफील्ड ने आचारपरक क्रांति को समझने के लिए निम्नलिखित मॉडल को प्रस्तुत किया है-

चित्र: सोनेनफील्ड का सकेंद्रीय मॉडल (1972)

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

          भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय के इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मानव का व्यवहार एक जटिलतंत्र है। इसे सफलता पूर्वक नहीं समझा जा सकता है।

(ii) मानव का आचारण प्राप्त सूचनाओं से नियंत्रित होता है। अगर ऐसा मान लिया जाय तो किसी को गलत सूचना देकर उससे गलत कार्य भी करवाया जा सकता है।

(iii) स्किनर महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से सामाजिक आर्थिक चिन्तन प्रदूषित हो सकता है। ऐसे आचारपरक क्रांति का अध्ययन सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

        उपरोक तथ्यों से स्पष्ट है कि आचारपरक क्रांति की कई सीमाएँ हैं। इन सीमाओं के बावजूद आचारपरक क्रांति ने भूगोलवेताओं को सोचने/चिन्तन के लिए एक नवीन विचार प्रस्तुत किया है।

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप

16. रूढ़ प्रक्षेप, मॉलवीड प्रक्षेप, सिनुस्वायडल प्रक्षेप



रूढ़ प्रक्षेप (Conventional Projection)⇒

⇒ किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु स्वेच्छा के अनुसार छाटे गये सिद्धांतों पर निर्मित प्रक्षेप को रूढ़ प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप पर समस्त संसार की मानचित्र बनायी जाती है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप इतना संशोधित प्रक्षेप है कि इसे न तो शंकु, न बेलनाकार, न खमध्य प्रक्षेप के वर्ग में रखते हैं। अत: यह पूर्णतः गणितीय विधि पर आधारित है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं:-

(1) मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सिनुस्वायडल प्रक्षेप

(1) मॉलवीड प्रक्षेप  (Mollweide’s Projection)

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप का निर्माण 1805 ई० में जर्मन मानचित्रकार ब्रेडन मॉलवीड ने किया था।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण पाया जाता है।

⇒ रूढ़ प्रक्षेप में समक्षेत्र प्रक्षेप का गुण उत्पन्न करने के लिए दो प्रकार के संशोधन किये जाते हैं:

(i) मॉलवीड प्रक्षेप में 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा को एक वृत्त मानते हुए दिखाया जाता है जिसका अर्द्धव्यास (त्रिज्या) √2 x R होता है।

(ii) भूमध्यरेखा की लम्बाई केन्द्रीय मध्याहन रेखा की दुगनी होती है अर्थात् प्रक्षेप में बनाये गये वृत्त के अर्द्धव्यास का चार गुणा (4 x√2 x R) के बराबर भूमध्यरेखा होती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप पृथ्वी के वास्तविक अर्द्धव्यास को भी घटाकर निर्मित होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत्त सरल और समान्तर रेखाओं की तरह होते हैं। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होती जाती है।

⇒ 90° पूर्वी और 90° पश्चिमी देशान्तर रेखा केन्द्रीय मध्याहन रेखा होती है। यही रेखा एक सरल देशान्तर रेखा होती है। जबकि शेष देशान्तर देखा दीर्घवृताकार होती है।

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा अक्षांश को समकोण पर काटती है, शेष देशान्तर रेखा अक्षांश को तिरछी काटती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी रहती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा से पूरब या पश्चिम की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटते जाती है।

⇒ मॉलवीड प्रक्षेप विश्व मानचित्र बनाने हेतु, फसलों के उत्पादन दिखाने हेतु उपयोगी होता है। अत: यह संसार के वितरण मानचित्र बनाने के लिए सबसे उपयोगी है।

रूढ़ प्रक्षेप

मॉलवीड प्रक्षेप

(2) सैन्सन-फ्लैम्स्टीड या सिनुस्वायडल प्रक्षेप (Sanson-Flamsteed or Sinusoidal Projection)

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप का निर्माण 1650 ई० में निकोलस सैन्सन ने किया तथा बाद में जॉन फ्लैम्स्टीड ने इसमें संशोधन किया।

⇒ इसीलिए इसे सैन्सन-फ्लैम्स्टीड प्रक्षेप कहते है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप वास्तव में शंक्क्वाकार प्रक्षेप या बोन प्रक्षेप का एक भाग है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर क्षेत्रफल शुद्ध होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 2πR के बराबर रखा जाता है। इसलिए भूमध्यरेखा पर लम्बाई शुद्ध होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर भूमध्यरेखा की लम्बाई πR के बराबर होता है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना में Sine Curve (ज्या वक्र) का प्रयोग होता है। इसलिए इसे ज्यावक्रीय या सिनुस्वायडल प्रक्षेप भी कहते हैं।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखायें सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होते हैं।

⇒ विषुवत रेखा मानक अक्षांश रेखा का कार्य करता है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक लम्बवत एवं सरल रेखा होती है। लेकिन शेष सभी देशान्तर रेखाएँ मिश्रित वक्र होती है।

⇒ लेकिन एक ही अक्षांश रेखा पर दो देशान्तर रेखा के बीच की दूरी नियत रहती हैं। 

⇒ केवल केन्द्रीय मध्याहन रेखा विषुवतीय अक्षांश को समकोण पर काटती है और शेष को तिरछे काटती है।

⇒ केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर मापनी शुद्ध होती है लेकिन अन्य देशान्तर रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप पर सीमावर्ती भागो में आकृति काफी विकृत हो जाती है।

⇒ सिनुस्वायडल प्रक्षेप वैसे महाद्वीपों के लिए उपयोगी है जो विषुवत रेखा के दोनों ओर स्थित है। जैसे- अफ्रीका, द० अमेरिका।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक सिनुस्वायडल प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1:250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 30० हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) भूमध्य रेखा की लम्बाई = 2πR

= 2× 22/7 × 1″

= 6.28″

(iii) केन्द्रीय मध्याह्न रेखा की लम्बाई = 2πR/2

= 6.28″/2

= 3.14″

रूढ़ प्रक्षेप

सिनुस्वायडल प्रक्षेप

         उपरोक्त  चित्र A के अनुसार 1″ का अर्द्धव्यास लेकर वृत्त के चतुर्थांश ABO की रचना करते हैं। OB रेखा के O बिन्दु पर 30० के अन्तराल पर कोण बनाती हुई OC तथा OD रेखायें खींचते हैं।

    फिर BC की चापीय दूरी से O बिन्दु से एक चाप लगाते हैं जो OC तथा OD कोणिक रेखाओं को क्रमशः E तथा F बिन्दुओं पर काटता है। E तथा F बिन्दुओं से OA रेखा पर EE’ तथा FF’ लम्ब डालते हैं (अर्थात् OB के समान्तर रेखा खींचते हैं)। यही क्षैतिज दूरियाँ प्रक्षेप में सम्बन्धित अक्षांशों पर देशान्तरों के मध्य की दूरी को प्रकट करेंगी।

   अब चित्र B के अनुसार 6.28″ लम्बी क्षैतिज रेखा खींचते हैं जो भूमध्यरेखा कहलाती है। इस रेखा को BC की चापीय दूरी 2πR x Interval/360 से 360/ 30 = 12 समान भागों में विभाजित करते हैं।

   तत्पश्चात् इस रेखा के मध्यवर्ती बिंदु से ऊपर तथा नीचे दोनों ओर NS लम्ब डालते हैं, जिसकी लम्बाई भमध्यरेखा की आधी होती है। अर्थात् NS रेखा पर BC की चापीय दूरी से भूमध्यरेखा के ऊपर तथा नीचे तीन-तीन चिह्न अंकित करते हैं तथा इन चिन्हों से भूमध्यरेखा के समान्तर रेखायें खींचते हैं। ये समान्तर रेखायें क्रमशः 30० तथा 60० उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्त होंगे और N व S बिन्दु क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव होंगे।

     देशान्तर रेखायें बनाने के लिए 30° तथा 60० उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश वृत्तों पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दायें-बायें दोनों ओर क्रमशः EE’ एवं FF’ दूरी से छः छः चिह्न लगाते हैं।

     तदुपरान्त अक्षांश वृत्तों पर अंकित समान देशान्तरीय मान वाले इन चिन्हों को ध्रुवों (N तथा S बिन्दुओं) से फ्रेंच कर्व द्वारा मिला कर देशान्तर रेखाओं की रचना पूर्ण करते हैं। चित्र की भांति केन्द्रीय मध्याह्न रेखा को 0° की देशान्तर मान कर शेष देशान्तर रेखाओं पर उनके अंशों में मान अंकित करते हैं।



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15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना (Comparison Between Mercator’s and Gall Projection)

15. मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना



मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप में तुलना⇒

मर्केटर प्रक्षेप  गॉल प्रक्षेप 
(1) मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr होती है। (1) गॉल प्रक्षेप में भूमध्यरेखा की लम्बाई 45° अक्षांश के बराबर होती है।
(2) मर्केटर प्रक्षेप में ध्रुव को नहीं दिखाया जा सकता। (2) गॉल प्रक्षेप में ध्रुव को दिखाया जा सकता है।
(3) मर्केटर प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत केन्द्र पर होता है। (3) गॉल प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत विषुवत रेखा के ठीक  180० पर होता है।
(4) इसमें आकृति और दिशा शुद्ध होता है। (4) गॉल प्रक्षेप में आकृति, दिशा और क्षेत्रफल तीनों अशुद्ध होती है।
(5) सभी देशान्तर रेखाएँ Great Circle होती है। (5) इसमें यह गुण नहीं होता है।
(6) मर्केटर में रम्ब लाइन खींचा जाता है। (6) गॉल में रम्ब लाइन नहीं खींचा जाता है।
(7) मर्केटर प्रक्षेप नौसंचालन के लिए उपयुक्त है। (7) गॉल प्रक्षेप राजनीतिक मानचित्र के लिए उपयुक्त है।

मर्केटर एवं गॉल प्रक्षेप


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14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)

14. गॉल प्रक्षेप (Gall’s Projection)



गॉल प्रक्षेप⇒

⇒ गॉल एक संशोधित बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ इसे गॉल का त्रिविम प्रक्षेप भी कहते हैं क्योंकि इसमें प्रकाश के स्रोत विषुवत रेखा के ठीक 180० पर रहता है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में समतल कागज का खोखला बेलन इस प्रकार रखा जाता है कि ग्लोब के 45ºN और 45°S अक्षांश को एक साथ काटता है। अतः इसमें भूमध्यरेखा की लम्बाई पृथ्वी की 45º अक्षांश रेखा के बराबर बनायी जाती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप में अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान, सीधी एवं समानान्तर होती है।

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45º अक्षांश वृत्त के लम्बाई (2πR Cos45०) के बराबर होती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी बढती है, लेकिन मर्केटर प्रक्षेप के तुलना में कम बढ़ती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई 45° अक्षांश रेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ सीधी और समानान्तर होती हैं।

⇒ देशान्तर और अक्षांश रेखाएँ एक-दूसरे के समकोण पर काटती है।

⇒ केवल 45ºN से 45ºS अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ 45º अक्षांश से विषुवत रेखा की ओर जाने पर मापनी छोटी और ध्रुव की ओर जाने पर मापनी बढ़ी हुई होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर आकृति, क्षेत्रफल और दिशा तीनों अशुद्ध होती है।

⇒ गॉल प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र या दीवारी मानचित्र का निर्माण विशेष तौर पर किया जाता है।

उदाहरण 1. विश्व का मानचित्र बनाने के लिए एक गॉल्स प्रक्षेप की रचना कीजिए जिसकी मापनी 1 : 250000000 तथा प्रक्षेपान्तर 15० हो।

रचना विधि-

(i) मापनी के अनुसार आंकलित ग्लोब का अर्द्धव्यास, अर्थात

RR = 250000000/2500000000

= 1″

(ii) 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई = 2πR Cos45०

= 2× 22/7 × 1″ x 0.71

= 4.46″

(iii) Interval Distance (अन्तरालीय दूरी)

= 45º अक्षांश वृत्त की लम्बाई x Interval ÷ 360

= 4.46″ x 15 ÷ 360

= 4.46″ / 24

= .186″

     RF के अनुसार Reduce Radius (RR) = 1″ पर वृत्त NESQ खींचा। केन्द्र O से EQ पर क्रमशः 15°, 30°, 45°, 60°, 75° के कोण बनाती हुई रेखाएं खींची। 45° की रेखा तथा परिधि के कटाव बिन्दु से ध्रुवीय अक्ष से समानान्तर रेखा खींची। सभी अक्षांशों व परिधि व कटान बिन्दु से E को मिलाया। ये रेखाएं अथवा इनके बढ़ाये हुए भाग जहाँ अक्ष के समानांतर खींची गई रेखा से मिलते हैं वह विषुवत रेखा से अक्षांशों की दूरी हुई।

    अतः विषुव अक्ष EQ को आगे बढ़ाया तथा 45° की रेखा पर अन्तरालीय दूरी (.186″) के अनुसार इस पर 24 भाग काट लिए। बिन्दुओं से विषुवत रेखा पर लम्बवत रेखाएं खींचा तथा पूर्व निर्मित रेखा पर प्राप्त कटान बिन्दुओं से विषुवत रेखा के समानान्तर रेखाएं खींचीं जो अक्षांश रेखाएं हैं। इस प्रकार रेखा-जाल तैयार हो जायेगा।

गॉल प्रक्षेप

गॉल प्रक्षेप



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