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13. Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)

13. Mercator’s Projection

(मर्केटर प्रक्षेप)



Mercator’s Projection (मर्केटर प्रक्षेप)⇒

⇒ मर्केटर एक बेलनाकार प्रक्षेप है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप को यथाकृतिक प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप की खोज गिरारडस मर्केटर नामक फ्रेंच मानचित्रकार ने किया।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप का सर्वाधिक प्रयोग नौसंचालन में होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में बनायी गई भूमध्य रेखा की लम्बाई 2πr या पृथ्वी के वास्तविक परिधि के समतुल्य होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर खींची गई अक्षांश रेखा सीधी, सामानान्तर और लम्बाई में बराबर होती है। 

⇒ देशान्तर रेखाएँ सीधी, परस्पर बराबर और समान्तर होती है तथा दो देशान्तर रेखाओं के बीच दूरी बराबर होती है।

⇒ देशान्तर रेखा और अक्षांश रेखा एक-दूसरे को समकोण पर काटती है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश रेखा की दूरी बढ़ते जाती है। इसीलिए इस प्रक्षेप में आकृति शुद्ध होती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती है क्योंकि इस प्रक्षेप में भूमध्यरेखा पृथ्वी के परिधि के बराबर होती है।

⇒ अन्य अक्षांश रेखाओं पर मापनी बढ़ी हुई होती हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर ध्रुव अनन्त पर होता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप में शुद्ध दिशा का गुण पाया जाता है। इसीलिए इसका प्रयोग नौसंचालन में करते हैं।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर क्षेत्रफल अशुद्ध होता क्योंकि भूमध्यरेखा से दूर जाने पर मापनी का मान बढ़ता जाता है।

⇒ अगर मर्केटर प्रक्षेप पर ऐसी सरल रेखा खींची जाए जो समस्त अक्षांश रेखाओं को एक नियत कोण पर काटे तो ऐसी सरल रेखा को Rhumb Lime (रम्ब लाईन) या  Loxodrome Line (लोग्जोड्रम) कहते हैं।

 

 

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ मर्केटर प्रक्षेप में Rhumb Lime (एकदिश नौपथ) होती है क्योंकि सभी देशान्तर रेखाएँ अक्षांश रेखा को एक नियत कोण पर काटती है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप पर राजनीतिक मानचित्र का निर्माण किया जाता है। इसका प्रयोग नौवहन, पवन की दिशा एवं महासागरीय जलधाराओं को प्रदर्शन में किया जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप पर संसार का दीवारी मानचित्र (Wall Map) अधिक बनाया जाता है।

⇒ मर्केटर प्रक्षेप दो बिन्दुओं के बीच की न्यूनतम दूरी को उन बिन्दुओं से होकर जाने वाले वृहत वृत्त (Great circle) के सहारे ज्ञात करते हैं।

⇒ मर्केटर पर Great circle का आकार वक्राकार होता है।

⇒ Great circle उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर की ओर और दक्षिणी गोलार्द्ध में दक्षिण की ओर मुड़ा होता है।

Mercator's Projection


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12. Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)

Zenithal Projection

(खमध्य प्रक्षेप)

Zenithal Projection (खमध्य प्रक्षेप)⇒

⇒ Zenithal प्रक्षेप में ग्लोब को किसी एक बिन्दु पर समतल कागज स्पर्श करते हुए कल्पना करके भूग्रिड प्रक्षेपित किया जाता है।

⇒ समतल कागज ग्लोब को जिस बिन्दु पर स्पर्श करता है उस बिन्दु को प्रक्षेप केन्द्र (Projection Point) कहते हैं।

⇒ ग्लोब में जिस बिन्दु पर प्रकाश स्थित होता है, उस बिन्दु को नेत्र स्थान या उत्पत्ति बिन्दु कहते हैं।

⇒ Zenithal प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है तथा सभी देशान्तर रेखाएँ केन्द्र से निकलने वाली एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ Zenithal प्रक्षेप पर पृथ्वी के केवल आधे भाग को प्रदर्शित किया जा सकता है।

⇒ नेत्र की स्थिति के आधार पर और प्रक्षेपण तल या समतल कागज के स्थिति के आधार पर इस प्रक्षेप को दो भागों में बाँटते हैं।

Zenithal Projection

Zenithal Projection

(1) नेत्र की स्थिति या प्रकाश स्रोत की स्थिति के आधार पर

          नेत्र की स्थिति के आधार पर पुन: इस प्रक्षेप को तीन भागों में बाँटते हैं।

(i) Gnomonic Porojection (केन्द्रक या नोमॉनिक प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रकाश का स्रोत ग्लोब के केन्द्र में होता है।

⇒ 60º-90° अक्षांश के बीच के क्षेत्र को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है।

⇒ अर्थात ध्रुवीय क्षेत्रों जैसे आर्कटिक और अण्टार्कटिका का प्रदर्शन के लिए उपयोगी है।

(ii) Stereographic Porojection (त्रिविम प्रक्षेप)

⇒ Stereographic प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत ग्लोब के परिधि पर स्थित माना जाता है।

⇒ यह एक ऐसा प्रक्षेप है जिनमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा दोनों को दिखाया जाता है।

⇒ चूँकि इसमें एक ही गोलार्द्ध के ध्रुव एवं विषुवत रेखा का प्रदर्शन साथ-2 होता है। इसलिए इस प्रक्षेप को त्रिविम प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ त्रिविम प्रक्षेप किसी भी गोलार्द्ध के फसलों के उत्पादन को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी मानी जाती है।

(iii) Orthographic Porojection (लम्बकोणीय प्रक्षेप)

⇒ लम्बकोणीय प्रक्षेप में प्रकाश का स्रोत अनन्त पर होता है। यह प्रक्षेप गोलीय मानचित्र के लिए तथा आकाश में तारों की स्थिति के प्रदर्शन हेतु उपयुक्त माना जाता है।

(2) प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर (Zenithal Projection)

         प्रक्षेपण तल के स्थिति के आधार पर Zenithal Projection तीन प्रकार के होते हैं-

(i) Polar Zenithal Projection (ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ Polar Zenithal Projection में समतल कागज ध्रुव को स्पर्श करते हुए रखा जाता है।

⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर समान दूरी के अन्तर पर संकेन्द्रीय अक्षांश वृत खीचे जाते हैं।

⇒ यह प्रक्षेप आर्कटिक क्षेत्रों एवं ध्रुवीय क्षेत्रों में नौसंचालन के लिए उपयोगी माना जाता है।

⇒ इसमें ध्रुव को एक बिन्दु के रूप में प्रकट किया जाता है।

⇒ प्रत्येक देशान्तर पर मापनी शुद्ध होता है।

⇒ ध्रुव से विषुवत रेखा की ओर जाने पर अक्षांश पर मापनी अशुद्ध होने लगती है।

⇒ Polar Zenithal Projection समदूरस्थ का गुण होता है।

(ii) Equatorial Zenithal Projection (विषुवतीय खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को विषुवत रेखा से स्पर्श करते हुए खींचा जाता है।

⇒ भूमध्यरेखीय क्षेत्र के वायुमार्ग और नौसंचालन से संबंधित मानचित्रों के लिए उपयोग है।

(iii) Oblique Zenithal Projection (तिर्यक खमध्य प्रक्षेप)

⇒ इसमें प्रक्षेपण तल को 60° अक्षांश रेखा से स्पर्श करते हुए रखा जाता है। अर्थात इसमें स्पर्शी बिन्दु विषुवत रेखा एवं ध्रुव के मध्य स्थित माना जाता है।

नोट: लैम्बर्ट महोदय ने ध्रुवीय खमध्य प्रक्षेप में गणितीय विधि से संशोधन कर एक ऐसा प्रक्षेप बनाया जिसमें समक्षेत्रफल का गुण था। ऐस प्रक्षेप को लैम्बर्ट प्रक्षेप भी कहते हैं। इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र बनाने हेतु उपयोगी माना जाता है।

       इस प्रकार के प्रक्षेप में ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर भूमध्य रेखा पर मापनी घटने लगती है लेकिन अक्षांश रेखा पर मापनी का मान बढ़ने लगती है। इसीलिए यह एक समक्षेत्र प्रक्षेप कहलाता है।

ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप

(Polar Zenithal Equidistant Projection)

     ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप एक Zenithal/Azimuthal प्रक्षेप है, जिसमें प्रक्षेपण तल को पृथ्वी के किसी एक ध्रुव (उत्तरी या दक्षिणी) पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है। इस प्रक्षेप में ध्रुव केंद्र का कार्य करता है। सभी अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर समान दूरी पर बनाए गए सकेंद्र (Concentric) वृत्त होते हैं, जबकि देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली सरल सीधी रेखाओं के रूप में समान कोणीय अंतराल पर अंकित की जाती हैं।

   इस प्रक्षेप द्वारा एक समय में केवल एक ही गोलार्ध (उत्तरी अथवा दक्षिणी) का प्रदर्शन किया जा सकता है। इसकी विशेषता यह है कि केंद्र (ध्रुव) से सभी स्थानों की दूरी सही (Equidistant) रहती है, इसलिए ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण में इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। इस प्रक्षेप के निर्माण की गणितीय विधि एवं आलेखी (Graphical) विधि मूलतः समान होती हैं।

उदाहरण-

उत्तरी गोलार्ध के लिए एक ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप का निर्माण कीजिए।

मापनी (Scale): 1 : 200,000,000,

रेखान्तराल (Interval): 30°, 

प्रदर्शित क्षेत्र: उत्तरी गोलार्ध (0° से 90° उत्तरी अक्षांश)

प्रक्षेप निर्माण की विधि (Method of Construction):-

     According to the given scale:

(1) Radius of the Globe (R):

R = 635,000,000/200,000,000

   = 3.17 cm

(2) Length of the Arc for 30° Latitude:

Arc Length = 2πR×30∘/360∘

(3) Radius of the 0° Latitude (Equator) in the Projection (90° Arc):

   Since the distance from the North Pole to the Equator is 90°,

r = 2πR×90∘/360∘

r =

Thus, the radius of the projection (Equator) is 4.98 cm.

Polar Zenithal Equidistant Projection

      ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप के निर्माण के लिए सबसे पहले AB तथा CD नामक दो परस्पर लम्बवत् (Perpendicular) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को प्रतिच्छेद करती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव (North Pole) को प्रदर्शित करता है।

    इसके बाद NB रेखा पर 1.66 सेमी की समान दूरी पर क्रमशः E, F तथा B बिंदु अंकित किए जाते हैं। अब N को केंद्र मानकर NE, NF तथा NB त्रिज्याओं से तीन संकेन्द्र (Concentric) वृत्त बनाए जाते हैं। ये वृत्त क्रमशः 60° उत्तरी अक्षांश, 30° उत्तरी अक्षांश तथा 0° (भूमध्य रेखा) का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार प्रक्षेप की कुल त्रिज्या (NB) 4.98 सेमी होती है।

    इसके पश्चात N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ प्रक्षेप में 30° के अंतराल पर देशांतर रेखाओं को प्रदर्शित करती हैं। अंत में सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।

पहचान (Identification):-

1. अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र वृत्त होते हैं तथा इनके बीच की दूरी समान रहती है।

2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।

3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

4. इस प्रक्षेप में ध्रुव एक बिंदु के रूप में प्रदर्शित होता है।

गुणधर्म (Properties):-

1. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर अंकित करने के कारण प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।

2. ध्रुव के निकट विकृति न्यूनतम तथा भूमध्य रेखा की ओर अधिकतम होती है।

3. यह प्रक्षेप ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

4. अक्षांश वृत्तों को वास्तविक दूरी पर प्रदर्शित किया जाता है, इसलिए प्रत्येक देशांतर रेखा पर मापनी (Scale) शुद्ध रहती है।

5. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर मापनी में क्रमिक वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, 75° अक्षांश पर लगभग 1.2%, 60° अक्षांश पर लगभग 4.5% तथा 45° अक्षांश पर लगभग 11.0% मापनी बढ़ जाती है। इससे स्पष्ट है कि भूमध्य रेखा की ओर विकृति (Distortion) क्रमशः बढ़ती जाती है।

6. यह यथाकृतिक (Orthomorphic/Conformal) प्रक्षेप नहीं है, फिर भी 90° से 60° उत्तरी अक्षांश के मध्य क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है। 60° अक्षांश से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर क्षेत्रों की आकृति पूर्व–पश्चिम दिशा में लंबी (Elongated) दिखाई देने लगती है।

7. इस प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक रूप में प्रदर्शित नहीं होता, परंतु ध्रुव (केंद्र) से विभिन्न स्थानों की दूरी तथा दिशा (Distance and Direction) सही रहती है।

8. इस प्रक्षेप में अधिकतम केवल एक गोलार्ध (ग्लोब का आधा भाग) ही प्रदर्शित किया जा सकता है।

उपयोग (Uses):-

   ध्रुवीय खमध्य समदूरस्थ प्रक्षेप मुख्यतः आर्कटिक एवं अंटार्कटिक क्षेत्रों के सामान्य उद्देश्य वाले मानचित्रों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त ध्रुवीय अन्वेषण (Polar Exploration), ध्रुवीय नौवहन (Polar Navigation), विमानन मार्गों (Air Routes) तथा ध्रुवीय वैज्ञानिक अध्ययनों से संबंधित मानचित्रों के निर्माण में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ध्रुव से दूरी (Distance) और दिशा (Direction) सही रहती है, इसलिए यह ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

Polar Zenithal Equal-Area Projection

ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप

परिचय (Introduction):

   ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Polar Zenithal Equal-Area Projection) एक समक्षेत्र (Equal-Area) अथवा असंदर्श (Non-Conformal) प्रक्षेप है, जिसमें मानचित्र पर प्रदर्शित क्षेत्रों का क्षेत्रफल वास्तविक अनुपात में बना रहता है।

    इस प्रक्षेप का विकास सर्वप्रथम प्रसिद्ध मानचित्रकार जे. एच. लैम्बर्ट (J. H. Lambert) ने किया था। इसी कारण इसे लैम्बर्ट का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप (Lambert’s Polar Zenithal Equal-Area Projection) भी कहा जाता है।

   इस प्रक्षेप में प्रक्षेपण तल को ध्रुव पर स्पर्श करता हुआ माना जाता है तथा इसका निर्माण अपेक्षाकृत सरल होता है। यह विशेष रूप से ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्रों के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।

उदाहरण (Example)-

1 : 200,000,000 की मापनी पर उत्तरी गोलार्ध का ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप बनाइए। प्रक्षेप में देशान्तर एवं अक्षांश का अंतराल 30° रखा जाए।

आलेखी विधि (Graphical Method)-

     दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास (R) निम्न प्रकार ज्ञात किया जाता है-

R = 635000000/200000000

=3.17 सेमी

    इसके लिए सबसे पहले 3.17 सेमी त्रिज्या लेकर वृत्त का एक चतुर्थांश (Quadrant) बनाया जाता है। चतुर्थांश की त्रिज्या पर 30° एवं 60° के कोण अंकित कर संबंधित बिंदुओं को वृत्त के दूसरे सिरे से मिलाया जाता है, जिससे आवश्यक जीवाएँ (Chords) प्राप्त होती हैं।

    अब दो परस्पर लम्बवत् रेखाएँ EF तथा GH खींची जाती हैं, जो N बिंदु पर एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। N बिंदु प्रक्षेप में उत्तरी ध्रुव का प्रतिनिधित्व करता है।

   इसके पश्चात N को केंद्र मानकर तथा प्राप्त जीवाओं AB, AC एवं AD को त्रिज्या मानते हुए तीन संकेन्द्र वृत्त बनाए जाते हैं। ये क्रमशः भूमध्य रेखा (0°), 30° उत्तर तथा 60° उत्तर अक्षांश को प्रदर्शित करते हैं।

   अंत में N बिंदु पर चाँदे (Protractor) की सहायता से 30° के अंतराल पर कुल 12 विकिरणीय सरल रेखाएँ खींची जाती हैं। ये रेखाएँ देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसके बाद सभी अक्षांश वृत्तों एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण किया जाता।

पहचान (Identification):-

1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त ध्रुव को केंद्र मानकर बनाए गए संकेन्द्र (Concentric) वृत्त होते हैं।

2. देशांतर रेखाएँ ध्रुव से निकलने वाली विकिरणीय (Radial) सरल रेखाएँ होती हैं, जो समान कोणीय अंतराल पर स्थित रहती हैं।

3. सभी अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

4. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों के बीच की दूरी क्रमशः कम होती जाती है, जो इस प्रक्षेप की प्रमुख पहचान है।

गुणधर्म (Properties):-

1. ध्रुव से भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर देशांतर रेखाओं की मापनी (Scale) धीरे-धीरे घटती जाती है, किंतु 60° से 90° अक्षांश के मध्य यह परिवर्तन बहुत कम होता है।

2. जहाँ देशांतर रेखाओं की मापनी घटती है, वहीं अक्षांश वृत्तों की मापनी समान अनुपात में बढ़ती है। इस संतुलन के कारण पूरे प्रक्षेप में क्षेत्रफल (Area) वास्तविक बना रहता है, इसलिए इसे समक्षेत्र प्रक्षेप (Equal-Area Projection) कहा जाता है।

3. इस प्रक्षेप में केवल एक गोलार्ध (उत्तरी या दक्षिणी) का ही मानचित्र बनाया जा सकता है।

4. अन्य खमध्य (Zenithal) प्रक्षेपों की भाँति ध्रुव से सभी दिशाएँ (Directions) सही प्रदर्शित होती हैं।

5. ध्रुवीय क्षेत्रों की आकृति अपेक्षाकृत शुद्ध रहती है, जबकि भूमध्य रेखा की ओर बढ़ने पर आकृतियों में विकृति (Distortion) धीरे-धीरे बढ़ने लगती है।

उपयोग (Uses):-

    ध्रुवीय खमध्य समक्षेत्र प्रक्षेप मुख्यतः ध्रुवीय क्षेत्रों के वितरण मानचित्र (Distribution Maps) बनाने में प्रयुक्त होता है।

   चूँकि इसमें क्षेत्रफल वास्तविक (Equal Area) रहता है तथा ध्रुवीय भागों की आकृति भी लगभग शुद्ध रहती है, इसलिए इसका उपयोग जलवायु, वनस्पति, हिमावरण, जनसंख्या वितरण, प्राकृतिक संसाधनों के वितरण तथा अन्य विषयगत (Thematic) मानचित्रों के निर्माण में व्यापक रूप से किया जाता है।

    यह प्रक्षेप ध्रुवीय अनुसंधान एवं भौगोलिक विश्लेषण के लिए भी अत्यंत उपयोगी माना जाता है।



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11. बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)

बेलनाकार प्रक्षेप

(Cylindrical Projection)


बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projection)⇒

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में प्रकाश के स्रोत को ग्लोब के केन्द्र में स्थिर रखा जाता है और कागज को ग्लोब पर खोखले बेलन के रूप में लपेटकर अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं के रेखाजाल को समतल कागज पर उतारने का प्रयास किया जाता है।

⇒ सामान्य दशा में कागज का खोखला बेलन भूमध्यरेखा को स्पर्श करता है। ऐसी स्थिति में पृथ्वी के ध्रुवीय अक्ष और खोखले बेलन का अक्ष एक ही हो जाता है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में सभी अक्षांश वृत की लम्बाई एक समान होती है तथा सीधी एवं समान्तर रेखा के रूप में होती है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप पर मध्य अक्षांशीय क्षेत्र और ध्रुवीय क्षेत्र में विवर्धन का गुण पाया जाता है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ समान लम्बाई वाली सरल एवं समान्तर रेखाओं के समान होती है तथा देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी भी एक समान होती है। 

⇒ प्रत्येक अक्षांश रेखा देशान्तर को समकोण पर काटती है।

⇒ बेलनाकार प्रक्षेप में गणितीय विधि से सुधार लाकर अलग-अलग प्रक्षेप बनाये जाते हैं। जैसे-समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप, बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप।



(1) समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप

(Cylindrical Equi-Distance Projection)


          इस प्रक्षेप में आक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ परस्पर समान दूरी के अंतर पर बनायी जाती है। इसीलिए इसे समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप के नाम से पुकारा जाता है।

⇒ चूँकि समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप को सर्वप्रथम प्लेट कैरी ने बनाया था। इसलिए इसे प्लेट कैरी प्रक्षेप भी कहा जाता है। 

⇒ यह एक बेलनाकार प्रक्षेप का उदाहरण है, इसलिए इसमें सभी समदूरस्थ का गुण होता है।

⇒ अक्षांश वृत और देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी नियत रहती है। जिसके कारण दो क्रमबद्ध अक्षांश और दो क्रमबद्ध देशांतर रेखाओं के बीच का क्षेत्र एक वर्ग के समान दिखाई देती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा के बराबर होती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ सीधी एवं समान्तर होती है। 

⇒ देशान्तर रेखाएँ भी सीधी एवं समान्तर होती है। लेकिन देशान्तर रेखाओं की लम्बाई भूमध्यरेखा की आधी होती है।

⇒ खोखला बेलनाकार कागज केवल विषुवत रेखा को स्पर्श करता है। इसलिए उस पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ इसमें ध्रुव भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ भूमध्यरेखा से ध्रुव की ओर जाने पर अक्षांश वृत्तों की लम्बाई वास्तविक लम्बाई से बढ़ती जाती है।

⇒ सम्दूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप न तो यथाकृति और न ही समक्षेत्र  का गुण होता है। 

⇒ विषुवत रेखा के आस-पास क्षेत्रों को प्रदर्शित करने के लिए उपयोगी है अर्थात् इस पर विषुवतीय प्रतिरोधी जलधारा, विषुवतीय पछुवा हवा इत्यादि प्रदर्शित कर सकते है।

उदाहरण 1. 1:370,000,000 मापनी एवं 30º अंतराल पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए एक समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप बनाइए।

रचना विधि :

प्रश्न के अनुसार,

1. पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास,

R(RR) = 635000000/370000000 = 1.72cm

2. भूमध्यरेखा की लंबाई = 2πR = 2 x 22 x 1.72/7 = 10.81 cm

3. दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी

= 2πR x अंतराल (अंश)/360 = 10.81×30/360 = 0.90 cm

   अब 10.81 cm लंबी AB सरल रेखा खींचिए। यह प्रक्षेप में भूमध्यरेखा होगी। इस रेखा के A बिन्दु पर CD तथा B बिन्दु पर EF लंब उठाइए। अब 0.90 cm दूरी के अंतराल पर AB रेखा को 12 समान भागों में विभाजित कीजिए तथा विभाजक बिन्दुओं से CD के समान भूमध्य रेखा के दोनों ओर लंब खीचिए। ये लंब प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे। A बिन्दु के दोनों ओर CD रेखा पर 0.90 cm के अंतर पर 3-3 चिह्न लगाइए एवं इन चिह्नों से भूमध्यरेखा के समानांतर रेखाएँ खींचकर आक्षांश वृत्त पूर्ण कीजिए।

उदाहरण 2. 1:300,000,000 मापनी एवं 15º अंतराल पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए एक समदूरस्थ बेलनाकार प्रक्षेप बनाइए।

रचना विधि :

प्रश्न के अनुसार,

1. पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास,

R(RR) = 635000000/300000000 = 2.1cm

2. भूमध्यरेखा की लंबाई = 2πR = 2 x 22 x 2.1/7 = 13.2 cm

3. दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी

= 2πR x अंतराल (अंश)/360 = 13.2×15/360 = 0.55 cm

पहचान (Identification):-

1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त एवं देशांतर रेखाएँ समान दूरी पर स्थित होती हैं, जिससे पूरा रेखाजाल वर्गाकार (Grid Pattern) दिखाई देता है।

2. सभी अक्षांश वृत्तों की लंबाई भूमध्य रेखा के बराबर होती है। इसलिए सभी अक्षांश वृत्त सरल, सीधी एवं समानांतर रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं।

3. देशांतर रेखाएँ भी सीधी एवं समानांतर होती हैं तथा वे सभी अक्षांश रेखाओं को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

4. इस प्रक्षेप में प्रत्येक देशांतर रेखा की लंबाई भूमध्य रेखा की आधी होती है, जो इसकी एक विशिष्ट पहचान है।

गुणधर्म (Properties):-

1. सभी अक्षांश वृत्त भूमध्य रेखा से वास्तविक दूरी पर अंकित किए जाते हैं, इसलिए देशांतर रेखाओं पर मापनी (Scale) सही रहती है।

2. भूमध्य रेखा (Equator) वह मानक अक्षांश है जहाँ प्रक्षेपण बेलन (Cylinder) पृथ्वी को स्पर्श करता है, इसलिए भूमध्य रेखा पर मापनी पूर्णतः शुद्ध होती है।

3. भूमध्य रेखा को छोड़कर अन्य सभी अक्षांश वृत्त अपनी वास्तविक लंबाई से अधिक बड़े प्रदर्शित होते हैं। परिणामस्वरूप उन पर मापनी अशुद्ध हो जाती है। यह अशुद्धता भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर क्रमशः बढ़ती जाती है, अर्थात् उच्च अक्षांशों में विकृति अधिक होती है।

4. इस प्रक्षेप में दोनों ध्रुवों को भूमध्य रेखा के बराबर लंबी सीधी रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किया जाता है, जिससे उच्च अक्षांशों पर मापनी एवं आकृति की विकृति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

उपयोग (Uses):-

     यह प्रक्षेप न तो यथाकृतिक (Conformal) है और न ही समक्षेत्र (Equal-Area) है। फिर भी भूमध्य रेखा के समीप स्थित क्षेत्रों की आकृति एवं क्षेत्रफल अपेक्षाकृत कम विकृत दिखाई देते हैं। इसलिए इसका उपयोग मुख्यतः भूमध्यरेखीय क्षेत्रों के सामान्य मानचित्रों के निर्माण में सीमित रूप से किया जाता है।

    उच्च अक्षांशों में विकृति अधिक होने के कारण ध्रुवीय क्षेत्रों तथा संपूर्ण विश्व के मानचित्र (World Maps) बनाने के लिए यह प्रक्षेप उपयुक्त नहीं माना जाता।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप में भूमध्य रेखा पर मापनी शुद्ध, जबकि ध्रुवों की ओर विकृति क्रमशः बढ़ती जाती है, इसलिए इसका उपयोग केवल निम्न अक्षांशीय (Equatorial) क्षेत्रों के मानचित्रण तक ही सीमित रहता है।



(ii) बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप

(Cylindrical Equal Area Projection)


⇒ बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप को सर्वप्रथम लैम्बर्ट महोदय ने बनाया था। इसलिए इसे लैम्बर्ट या Equal Area Projection भी कहते हैं।

⇒ इसमें अक्षांश वृत्त सीधा एवं समान्तर रेखा के समान होता है।

⇒ सभी अक्षांश वृत की लम्बाई भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर होता है। लेकिन भूमध्यरेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी कम होते जाती है।

⇒ देशान्तर रेखाएँ सीधी, समान्तर और समान दूरी पर स्थित होती है।

⇒ इसमें भी ध्रुव को भूमध्यरेखा के लम्बाई के बराबर प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ भूमध्यरेखा पर मापनी शुद्ध होती हैं लेकिन अक्षांश रेखाओं पर अशुद्ध होती है।

⇒ बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप में देशान्तर रेखाओं को पृथ्वी ध्रुवीय व्यास के बराबर बनायी जाती है। जिसके कारण देशान्तर रेखाओं के मापनी अशुद्ध हो जाते हैं।

⇒ विषुवत रेखा से ध्रुवा की ओर जाने पर आकृति विकृत होने लगता है।

⇒ इसका प्रयोग कभी-2 वितरण मानचित्र को प्रदर्शित करने में किया जाता है।

⇒ विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाने पर आकृति विकृत होने के कारण इसे “Wrinkal Projection” भी कहते हैं।

बेलनाकार प्रक्षेपउदाहरण (Example)-

1 : 350,000,000 की मापनी तथा 30° के अक्षांश–देशांतर अंतराल पर संसार का एक बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप (Cylindrical Equal-Area Projection) निर्मित कीजिए।

आलेखी विधि (Graphical Method):

   दिए गए पैमाने के अनुसार पृथ्वी के लघुकृत गोले का अर्द्धव्यास (R) होगा-

(1) R = 635000000/350000000

          =1.8 सेमी

(2) भूमध्य रेखा की लंबाई = 2πR

                  = 2×22/7×1.8

                  = 11.3 सेमी

(3) 30° के अंतराल पर दो क्रमागत देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी

                  = 11.3×30/360

    अब सबसे पहले किसी सुविधाजनक बिंदु O को केंद्र मानकर 1.8 सेमी त्रिज्या का एक अर्द्धवृत्त (ABC) बनाइए। इसमें AC रेखा वृत्त का ध्रुवीय व्यास (Polar Diameter) होगी।

    इसके बाद O और B बिंदुओं को मिलाकर रेखा को आगे बढ़ाइए तथा इस बढ़ी हुई रेखा पर B से 11.3 सेमी लंबाई लेकर D बिंदु निर्धारित कीजिए। BD रेखा प्रक्षेप की भूमध्य रेखा (Equator) होगी।

   अब B तथा D बिंदुओं पर BD के लंबवत क्रमशः EF तथा GH रेखाएँ खींचिए। ये दोनों रेखाएँ प्रक्षेप में 180° पश्चिम तथा 180° पूर्व देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी। 

   अब O बिंदु से 30° के अंतराल पर ऊपर की ओर OI तथा OJ तथा नीचे की ओर OK एवं OL रेखाएँ खींचिए।

    इसके बाद A, J, I, K, L तथा C बिंदुओं से BD के समानांतर रेखाएँ खींचिए। ये रेखाएँ क्रमशः- 90° N, 60° N, 30° N, 30° S, 60° S, तथा 90° S अक्षांश वृत्तों को प्रदर्शित करेंगी।

    BD रेखा को 0.94 सेमी के समान अंतराल पर विभाजित कीजिए। वैकल्पिक रूप से इसे 360° ÷ 30° = 12 समान भागों में भी विभाजित किया जा सकता है।

   इन सभी विभाजन बिंदुओं से EF के समानांतर लंबवत रेखाएँ खींचिए। यही रेखाएँ 30° के अंतराल पर देशांतर रेखाओं का प्रतिनिधित्व करेंगी।

    अंत में सभी अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं पर उनके संबंधित अंश (Degrees) अंकित कर प्रक्षेप को पूर्ण कीजिए।

Cylindrical Equal Area Projection

पहचान (Identification):-

1. इस प्रक्षेप में अक्षांश वृत्त सीधी एवं समानांतर रेखाओं के रूप में प्रदर्शित किए जाते हैं तथा प्रत्येक अक्षांश वृत्त की लंबाई भूमध्य रेखा के बराबर होती है।

2. अक्षांश वृत्तों के बीच की दूरी भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर क्रमशः कम होती जाती है, जिससे यह प्रक्षेप आसानी से पहचाना जा सकता है।

3. देशांतर रेखाएँ भी सीधी एवं परस्पर समानांतर होती हैं तथा उनके बीच की दूरी पूरे प्रक्षेप में समान रहती है।

4. सभी अक्षांश एवं देशांतर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (90°) पर प्रतिच्छेद करती हैं।

5. ध्रुव, जो पृथ्वी पर एक बिंदु होता है, इस प्रक्षेप में भूमध्य रेखा के बराबर लंबी सीधी रेखा के रूप में प्रदर्शित किया जाता है।

गुणधर्म (Properties):-

1. भूमध्य रेखा (Equator) अपनी वास्तविक लंबाई के बराबर प्रदर्शित होती है, इसलिए भूमध्य रेखा पर मापनी (Scale) पूर्णतः शुद्ध रहती है।

2. भूमध्य रेखा को छोड़कर अन्य सभी अक्षांश वृत्त अपनी वास्तविक लंबाई से बड़े बनाए जाते हैं, जिसके कारण उन पर मापनी शुद्ध नहीं रहती।

3. इस प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं की लंबाई पृथ्वी के लघुकृत गोले के ध्रुवीय व्यास के बराबर रखी जाती है। परिणामस्वरूप वे अपनी वास्तविक लंबाई से छोटी हो जाती हैं, जिससे देशांतर रेखाओं पर मापनी में अशुद्धि उत्पन्न होती है।

4. यह समक्षेत्र (Equal-Area) प्रक्षेप है, इसलिए क्षेत्रफल सही प्रदर्शित होता है, किंतु भूमध्य रेखा से दूर जाने पर आकृतियों (Shapes) में विकृति (Distortion) तेजी से बढ़ने लगती है।

उपयोग (Uses):-

     यद्यपि इस प्रक्षेप का उपयोग कभी-कभी विश्व के वितरण मानचित्र (World Distribution Maps) तैयार करने में किया जाता है, फिर भी यह भूमध्य रेखा के निकट स्थित क्षेत्रों के वितरण मानचित्रों के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

    जलवायु, वनस्पति, मृदा, कृषि तथा जनसंख्या वितरण जैसे विषयगत (Thematic) मानचित्रों में इसका प्रभावी उपयोग किया जाता है, विशेषकर जब क्षेत्रफल की शुद्धता (Equal Area) आवश्यक हो।

परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण तथ्य: इस प्रक्षेप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि क्षेत्रफल (Area) शुद्ध रहता है, जबकि भूमध्य रेखा से दूर जाने पर आकृतियों में विकृति बढ़ती जाती है। यही इसकी प्रमुख पहचान एवं उपयोगिता है।




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 10. बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षेप (Bonne’s and Polyconic Projection)

10. बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षेप

(Bonne’s and Polyconic Projection)



बोन प्रक्षेप ⇒

⇒ बोन प्रक्षेप की रचना सर्वप्रथम रिगोवर्ट बोन ने किया था।

⇒ बोन प्रक्षेप एक ऐसा शंकु प्रक्षेप है जिसमें सभी अक्षांश एवं देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है। इसलिए इसे समक्षेत्र प्रक्षेप कहा जाता है।

⇒  सभी अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी एक समान तथा संकेन्द्रीय होती है।

⇒ अक्षांश रेखा वक्राकार होती है।

⇒ शुद्ध क्षेत्रफल प्राप्त करने हेतु इसमें देशान्तर रेखाओं का भी वक्र बनाया जाता है। लेकिन केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ बोन प्रक्षेप में ध्रुव को एक बिन्दु के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

⇒ अलग-2 अक्षांश रेखाओं पर दो देशान्तरों के बीच की दूरी अलग-2 होती है।

⇒ चूँकि केन्द्रीय मध्याहन रेखा पूर्णत: एक सरल रेखा होती है। इसलिए शेष देशान्तर रेखाओं के तुलना में इस रेखा पर मापनी सर्वाधिक शुद्ध होती है।

⇒ बोन प्रक्षेप में अधिक से अधिक एक गोलार्द्ध को दिखाया जा सकता है। यह प्रक्षेप वैसे देशों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है जिनका लम्बाई एवं चौड़ाई एक समान है। जैसे- फ्रांस, स्वीट्जरलैण्ड, बेल्जियम इत्यादि।

⇒ बोन प्रक्षेप वैसे देशों के लिए उपयोगी है जिनका देशान्तरीय विस्तार कम है। जैसे- चिली।

⇒ बोने प्रक्षेप वितरण मानचित्र के लिए काफी उपयोगी है।

बोन तथा बहुशंकुक प्रक्षे


बहुशंकुक प्रक्षेप (Polyconic Projection)


⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप की रचना सर्वप्रथम फर्डिनेण्ड हेस्लर ने किया था।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में प्रत्येक अक्षांश मानक अक्षांश होता है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप को यह मानकर बनाया गया है कि प्रक्षेप में प्रदर्शित वाले अक्षांश वृतों पर अलग-अलग कागज के शंकु रखे गये है। इसीलिए इसे बहुशंकु प्रक्षेप कहते हैं।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखा संकेन्द्रीय नहीं होती है।

⇒ बहुशंकुक में अक्षांश एवं देशान्तर रेखाएँ वक्राकार होती है। लेकिन भूमध्यरेखा को अगर प्रदर्शित किया जाता है तो वह एक सीधी रेखा होती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा एक सीधी रेखा होती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा सभी अक्षांश रेखा को समकोण पर काटती है। जबकि अन्य देशान्तर रेखाएँ 90° पर नहीं काटती है।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याहन रेखा पर और सभी अक्षांश रेखा पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ अक्षांश वृतों के संकेन्द्रीय न होने के कारण न तो यह समक्षेत्र प्रक्षेप है और न ही यथाकृति प्रक्षेप।

⇒ बहुशंकुक प्रक्षेप वैसे देशों के लिए उपयोगी है जिनका पूरब-पश्चिम के विस्तार कम तथा उत्तर-दक्षिण के विस्तार अधिक होता है। जैसे- आर्जेन्टिना, चिली, जापान, इटली वियतनाम, भारत का NH-7।

बहुशंकुक प्रक्षेप


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 9. शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)

शंकु प्रक्षेप

(Conical Projection)

शंकु प्रक्षेप (Conical Projection)⇒

  शंकु प्रक्षेप

⇒ ग्लोब को कागज के शंकु द्वारा इस प्रकार ढँका जाता है कि कागज के शंकु किसी एक अक्षांश पर ही ग्लोब को चारों ओर स्पर्श करता हो।

⇒ ग्लोब पर अंकित भूग्रिड को कागज के  शंकु पर स्थानान्तरित करके एवं स्थानांतरण के बाद शंकु वाले कागज को फैला दिया जाता है।

⇒ शंकु प्रक्षेप में कागज का शंकु विषुवत रेखा और ध्रुव को कभी नहीं छूता।

⇒ शंकु प्रक्षेप में कागज का शंकु ग्लोब के जिस अक्षांश को स्पर्श करता है उस अक्षांश को मानक अक्षांश (Standard Parallel) कहते हैं।

⇒ शंकु प्रक्षेप में अक्षांश की आकृति वृत के चाप (Arc of Circle) के समान होता है तथा दो अक्षांशों के बीच की दूरी समान होती है।

⇒ देशान्तर रेखा ध्रुव से बाहर निकलता हुआ प्रतीत होता है तथा एक सरल रेखा के समान होती है।

⇒ विषुवत रेखा से ध्रुव की ओर जाने पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी घटती जाती है।

⇒ शंकु प्रक्षेप पर विषुवतीय एवं ध्रुवीय क्षेत्र को कभी भी प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है।

⇒ शंकु प्रक्षेप में अक्षांश और देशान्तर रेखा एक-दूसरे को समकोण पर काटती है।

⇒ मानक अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है, शेष अक्षांश रेखाओं पर नहीं।

⇒ शंकु प्रक्षेप पर शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र या मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी माना जाता है। जबकि ध्रुव और विषुवत रेखा के लिए अनुपयोगी माना जाता है।

शंकु प्रक्षेप कई प्रकार के होते हैं-

(i) एक मानक अक्षांश वाला शंकु प्रक्षेप (One Standard Parallel Parallel Projection या Simple Conical Projection with one Standard Parallel)

⇒ इस प्रक्षेप में ध्रुव को केन्द्र मानकर अक्षांश रेखाओं का चाप खींचा जाता है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ संकेन्द्रीय होती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाएँ एक चाप के समान होती है जबकि देशान्तर रेखाएँ सरल रेखा के समान होती है।

⇒ इसमें ध्रुव को एक चाप के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। 

⇒ सभी देशान्तर रेखाएँ ध्रुवों पर आकर मिल जाती है।

⇒ सभी अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी समान रहती है। लेकिन देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी ध्रुव की ओर जाने पर घटती है जबकि विषुवत रेखा की ओर जाने पर बढ़ती है।

⇒ केवल मानक अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ सभी देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है, इसलिए इसे समदूरस्थ मानचित्र प्रक्षेप (Equidistance Conical Projection) कहते हैं।

⇒ मानक अक्षांश रेखा पर आकृति एवं क्षेत्रफल बहुत सीमा तक शुद्ध रहती है। लेकिन मानक अक्षांश रेखा से दूर जाने पर आकृति एवं क्षेत्रफल में विकृति आती-जाती है।

⇒ यह प्रक्षेप मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में स्थित छोटे-छोटे आकार वाले देशों का मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी है। जैसे- स्वीट्जरलैण्ड 

⇒ दूसरे शब्दों में यह प्रक्षेप उन देशों के मानचित्र बनाने के लिए उपयोगी है जिनका अक्षांशीय विस्तार कम है।

    इस प्रकार के प्रक्षेप में विषुवत रेखा और देशान्तर रेखा की मानचित्र पर दूरियों का अनुपात π के बराबर होता है।

शंकु प्रक्षेप

उदाहरण 1. निम्नलिखित विवरण के आधार पर एक मानक अक्षांश वाला साधारण शंकु प्रक्षेप बनाइए :

मापनी: 1:250,000,000; मानक अक्षांश – 60º N, क्षेत्र का विस्तार – 30º N से 75º N अक्षांश तथा 60º W से 60º E देशांतर, अंतराल – 15º

Construct a Simple Conical Projection with One Standard Parallel based on the following data:

  • Scale: 1 : 250,000,000
  • Standard Parallel: 60° N
  • Extent of the Area: 30° N to 75° N Latitudes and 60° W to 60° E Longitudes
  • Interval: 15° for both Latitudes and Longitudes.

हल : दी गई मापनी के अनुसार,

R = पृथ्वी का वास्तविक अर्द्धव्यास / निरूपक भिन्न का हर

RR = 250000000/250000000 = 1″

     अब 1″ अर्द्धव्यास लेकर वृत्त का चतुर्थांश ABO खींचिए। OB रेखा के O बिन्दु पर 15º अंतराल के बराबर कोण DOB तथा मानक अक्षांश के बराबर कोण COB बनाइए। C बिन्दु पर लंब उठाइए जो बढ़ायी गयी OA रेखा को P बिन्दु पर काटता है। अब O को केन्द्र मानकर BD अर्द्धव्यास से वृत्तांश खींचिए जो OC रेखा को E बिन्दु पर काटता है। E बिन्दु से OA रेखा पर EF लंब खीचिए।

     प्रक्षेप बनाने के लिए एक लंबवत् सरल रेखा P’G खींचिए जो इस प्रक्षेप में केन्द्रीय मध्याह्न रेखा होगी तथा प्रश्न के अनुसार इसका मान 0º देशांतर होगा। अब PC के बराबर दूरी लेकर P’ बिन्दु से एक वृत्तांश खींचिए जो प्रक्षेप में 60º N की मानक अक्षांश रेखा को प्रकट करेगा। अन्य अक्षांश वृत्त बनाने के लिए केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर BD दूरी के अंतर पर मानक आक्षांश रेखा से P’ की ओर को एक चिह्न तथा G की ओर को दो चिह्न लगाइए। P’ बिन्दु को केन्द्र मानकर इन चिह्नों से होते हुए वृत्तों के चाप खींचिए तथा इन चापों पर आक्षांश रेखाओं के अंशों में मान लिखिए।

     अब EF दूरी के अंतर पर मानक अक्षांश में केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दोनों ओर को चार-चार चिह्न लगाइए। इन चिह्नों को P’ बिन्दु से मिलाते हुए सरल रेखाएँ खींचिए। ये सरल रेखाएँ प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे। देशांतर रेखाओं पर उनके मान लिखकर प्रक्षेप पूर्ण कीजिए।

SIMPLE CONICAL PROJECTION

WITH

ONE STANDARD PARALLEL

उदाहरण 2. निम्नलिखित विवरण के आधार पर एक मानक अक्षांश वाला साधारण शंकु प्रक्षेप बनाइए :

मापनी: 1:125,000,000; मानक अक्षांश – 60º N, क्षेत्र का विस्तार – 0º N से 75º N अक्षांश तथा 60º W से 60º E देशांतर, अंतराल – 15º

Construct a Simple Conical Projection with One Standard Parallel based on the following data:

  • Scale: 1 : 125,000,000
  • Standard Parallel: 45° N
  • Extent of the Area: 0° N to 75° N Latitudes and 60° W to 60° E Longitudes
  • Interval: 15° for both Latitudes and Longitudes.

हल : दी गई मापनी के अनुसार,

R = पृथ्वी का वास्तविक अर्द्धव्यास / निरूपक भिन्न का हर

RR = 635000000/125000000 = 5.08 cm

पहचान (Identification):-

    एक मानक अक्षांश वाले साधारण शंकु-प्रक्षेप को निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है-

1. समस्त अक्षांश वृत्त शंकु के शीर्ष को केन्द्र मानकर खींचे गए संकेन्द्र वृत्तों के चाप होते हैं तथा इनके बीच की दूरी एक समान होती है।

2. समस्त देशान्तर रेखाएँ सरल रेखाओं के रूप में होती हैं, जो शंकु के शीर्ष पर परस्पर मिल जाती हैं।

3. प्रक्षेप में ध्रुव एक चाप के द्वारा प्रदर्शित होता है।

4. अक्षांश वृत्त तथा देशान्तर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।

5. ध्रुव से भूमध्यरेखा की ओर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी बढ़ती जाती है, परन्तु किसी भी एक अक्षांश वृत्त पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी समान होती है।

गुणधर्म (Properties):-

    एक मानक अक्षांश वाले साधारण शंकु-प्रक्षेप के प्रमुख गुणधर्म निम्नलिखित हैं-

1. मानक अक्षांश पर मापनी शुद्ध होती है, परन्तु शेष अक्षांश वृत्तों पर मापनी शुद्ध नहीं रहती।

2. समस्त देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है। अतः इस प्रक्षेप को समदूरस्थ शंकु प्रक्षेप (Equidistant Conic Projection) भी कहा जाता है।

3. इस प्रक्षेप पर बने मानचित्र में कोई स्थान मानक अक्षांश से जितना अधिक दूर स्थित होगा, उतनी ही उस स्थान के अक्षांश वृत्त की मापनी अधिक अशुद्ध होती जाएगी। अतः मानक अक्षांश से दूरी बढ़ने के साथ-साथ प्रदेशों की आकृति एवं क्षेत्रफल में विकृति (Distortion) भी बढ़ती जाती है।

4. मानक अक्षांश पर आकृति एवं क्षेत्रफल का बहुत सीमा तक सही-सही प्रदर्शन हो जाता है।

5. इस प्रक्षेप पर केवल एक गोलार्ध (उत्तरी अथवा दक्षिणी) का मानचित्र बनाया जा सकता है।

उपयोग (Uses):-

     मध्य अक्षांशों में स्थित छोटे-छोटे देशों के मानचित्र बनाने के लिए इस प्रक्षेप का प्रायः प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, ऐसे प्रदेशों के मानचित्र बनाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है जिनका अक्षांशीय विस्तार कम होता है।

(ii) दो मानक अक्षांश वाला शंकु प्रक्षेप (Two Standard Parallel Conical Projection)

⇒ इस प्रक्षेप की रचना में यह कल्पना की जाती है कि कागज का शंकु ग्लोब को दो अक्षांश वृतों को स्पर्श करती है।

⇒ सभी अक्षांश वृत संकेन्द्रीय वृत्तों के समान होते हैं और उनके बीच की दूरी भी समान रहती है।

⇒ दोनों मानक अक्षांश रेखा पर और समस्त देशान्तर रेखा पर मापनी शुद्ध होती है।

⇒ इस प्रक्षेप पर न आकृति शुद्ध रहती है और न क्षेत्रफल शुद्ध रहती है।

⇒ लेकिन ट्रांस साइबेरियन रेलवे, NH-2 भारत की उतरी सीमा, उत्तरी अटलांटिक जलमार्ग प्रदर्शित करने के लिए दो मानक अक्षांश वाला प्रक्षेप उपयोगी है।

उदाहरण 1. 40º N से 80º N आक्षांश तथा 40º W से 40ºE देशांतर के मध्य स्थित क्षेत्र का 10º अंतराल तथा 1:125,000,000 मापनी पर मानचित्र बनाने के लिए दो मानक आक्षांश वाले शंकु प्रक्षेप की रचना कीजिए। प्रक्षेप में 50ºN तथा 70º N आक्षांश वृत्तों को मानक आक्षांश मानिए।

Construct a Two Standard Parallel Conical Projection on a scale of 1 : 1,250,000,000 for the area extending from 40° N to 80° N latitude and 40° W to 40° E longitude, with meridians and parallels drawn at 10° intervals. In the projection, take 50° N and 70° N as the standard parallels.

हल: दी गई मापनी के अनुसार,

RR= 250,000,000/125,000,000= 2″

SIMPLE CONICAL PROJECTION

WITH

TWO STANDARD PARALLEL

     अब 2″ अर्द्धव्यास लेकर वृत्त का चतुर्थांश ABO खींचिए। OB रेखा के O बिन्दु पर अंतराल के बराबर कोण EOB तथा 50ºN व 70ºN के मानक अक्षांशों के बराबर 10º कोण COB तथा कोण DOB बनाइए। EB चाप दूरी से O बिन्दु पर वृत्त का चतुर्थांश खींचिए जो OC तथा OD रेखाओं को क्रमशः F तथा G बिन्दुओं पर काटता है। F तथा G बिन्दुओं से OA रेखा पर क्रमशः FI तथा GH लंब गिराइए।

     अब एक लंबवत् सरल रेखा खींचिए तथा इस रेखा में CD के बराबर C’D’ दूरी काटिए। C’ तथा D’ बिन्दुओं पर FI तथा GH के बराबर क्रमशः C’I’ तथा D’H’ लंब गिराइए। I’ तथा H’ बिन्दुओं को मिलाते हुए एक सरल रेखा खींचिए जो बढ़ायी गयी C’D’ रेखा को P बिन्दु पर काटती है।

    अब प्रक्षेप बनाने के लिए P’G’ एक लंबवत् सरल रेखा खींचिए। P’ को केन्द्र मानकर PC’ तथा PD’ अर्द्धव्यासों से क्रमशः 50º व 70º N मानक अक्षांश खीचिए। केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर दोनों मानक अक्षांशों का मध्यवर्ती बिन्दु ज्ञात कीजिए, जिसकी मानक अक्षांशों से दूरी EB के बराबर होगी तथा इससे होकर जाने वाले संकेन्द्र वृत्त का चाप 60° N अक्षांश को प्रकट करेगा। अन्य अक्षांश वृत्त बनाने के लिए EB दूरी के अंतर पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा पर 70º N मानक अक्षांश से उत्तर की ओर एक तथा 50º N मानक अक्षांश से दक्षिण की ओर एक चिह्न लगाइए।

     अब P’ को केन्द्र मानकर इन बिन्दुओं से होते हुए वृत्तों के चाप खींचिए। अब 70º N मानक अक्षांश पर GH लंब दूरी अथवा 50º N मानक आक्षांश पर FI लंब दूरी के अंतर पर केन्द्रीय मध्याह्न रेखा के दोनों ओर 4-4 चिह्न लगाइए। इन चिह्नों से P’ को मिलाते हुए सरल रेखाएँ खींचिए जो प्रक्षेप में देशांतर रेखाओं को प्रकट करेगी।

पहचान (Identification):

     इस प्रक्षेप को निम्नलिखित लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है-

1. समस्त अक्षांश वृत्त संकेन्द्र वृत्तों के समान दूरी के अंतर पर खींचे गए चाप होते हैं।

2. सभी देशान्तर रेखाएँ शंकु के शीर्ष से खींची गई सरल रेखाओं के रूप में होती हैं।

3. प्रक्षेप में ध्रुव एक चाप द्वारा प्रदर्शित होता है।

4. अक्षांश वृत्त तथा देशान्तर रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण पर काटते हैं।

5. प्रत्येक अक्षांश वृत्त पर देशान्तर रेखाओं के बीच की दूरी समान होती है।

गुणधर्म (Properties):

    दो मानक अक्षांश वाले शंकु प्रक्षेप के प्रमुख गुणधर्म निम्नलिखित हैं-

1. दोनों मानक अक्षांशों पर मापनी शुद्ध होती है, जबकि अन्य अक्षांश वृत्तों पर मापनी शुद्ध नहीं रहती।

2. समस्त देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होती है।

3. केवल मानक अक्षांशों और देशान्तर रेखाओं पर मापनी शुद्ध होने के कारण यह प्रक्षेप न तो यथाकृतिक (Conformal) है और न ही समक्षेत्र (Equal-area)।

4. इसमें दो मानक अक्षांश होने के कारण यह एक मानक अक्षांश वाले साधारण शंकु प्रक्षेप की तुलना में अधिक शुद्ध होता है।

5. इस प्रक्षेप पर समस्त संसार का मानचित्र नहीं बनाया जा सकता।

6. चूँकि इसमें ध्रुव एक चाप के रूप में प्रदर्शित होता है, इसलिए यह ध्रुवीय क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए उपयुक्त नहीं है।

उपयोग (Uses):-

    इस प्रक्षेप में मानक अक्षांशों से दूरी बढ़ने के साथ आकृति तथा क्षेत्रफल की विकृति बढ़ती जाती है। इसलिए अधिक अक्षांशीय विस्तार वाले देशों के मानचित्र बनाने के लिए इसका उपयोग सामान्यतः नहीं किया जाता।

    इसका उपयोग विशेष रूप से यूरोप तथा ऑस्ट्रेलिया की मानचित्रावलियों में अलग-अलग देशों अथवा राज्यों के मानचित्र बनाने के लिए किया गया है।



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