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9. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन

9. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन



एस्किमों के निवास तथा सामाजिक-आर्थिक अध्ययन

एस्किमों के निवास

                 70° या 80º के उत्तरी अक्षांश के निकट एस्किमो लोगों का निवास स्थान है। अति शीतल जलवायु का प्रभाव इनके जीवन पर प्रत्यक्ष दिखलाई पड़ता है। प्रकृति की इन कठिन परिस्थितियों में रहकर जीवन निर्वाह करने वाले मानव की कल्पना भी करना कठिन कार्य होगा। यहाँ मनुष्य ने प्रकृति की प्रतिकूलता पर विजय पाने में कमाल कर दिखाया है।

                  सैकड़ों वर्षों से ऐसे जगह एस्किमों इतनी कठोर जलवायु के प्रदेश में रहते चले आ रहे हैं। जहाँ भूमि लगभग वर्ष भर बर्फ से ढँकी रहती है। शरद ऋतु में यह बर्फ अधिक मोटी और कठोर हो जाती है। जनवरी मास का औसत तापमान -45 सेन्टीग्रड होता है। ग्रीष्म ऋतु बहुत छोटी होती है। इस ऋतु में दिन का ताप कभी-कभी 10° सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है। यहाँ मिट्टी की परत बहुत पतली है और यह भी सदैव बर्फ से ढकी रहती है।

शारीरिक बनावट:-

            एस्किमो नाम से अभिप्राय कच्चा माँस खाने वाले व्यक्ति से है। यह  नाम अमरीकन इण्डियों द्वारा दिया गया था। एस्किमो अपने आपको ‘इनुइत’ अर्थात् ‘मानव’ कहते हैं। सम्भवतः ये लोग संसार के अन्य निवासियों को मानव नहीं अपितु किसी अन्य वर्ग के जीव समझते हैं।

           एस्किमो कुछ भूरे एवं पीले रंग के होते हैं। इनका चेहरा गोल और चौड़ा होता है। किन्तु शरीर का डौल सुन्दर नहीं होता। इनका कद मध्यम होता है। शरीर मजबूत और गोश्तदार होता है। शरीर के ऊपरी भाग की अपेक्षा कमर से नीचे का भाग दुर्बल होता है। ये लोग संसार में अपनी प्रसन्नचित मुद्रा के लिए विख्यात हैं। ये लोग भूखे रह सकते हैं किन्तु बिना मुस्कराए नहीं रह सकते। यह प्रसन्नता एस्किमो के आन्तरिक सुख की सूचक है।

निवास क्षेत्र:-

          एस्किमों का निवास-क्षेत्र ग्रीनलैण्ड, बेफिन द्वीप के चारों ओर तथा कनाडा के उत्तरी भाग में मुख्यतः पाया जाता है। यह क्षेत्र लगभग 5000 किलोमीटर लम्बा है। एस्किमो की संख्या इतने विस्तृत क्षेत्र में केवल 30,000 के लगभग है। प्रकृति की क्रूरता इन लोगों को यहाँ से भगा न सकी, किन्तु ये लोग प्रकृति का सामना करते हुए अधिकाधिक बल प्राप्त कर रहें हैं। एस्किमो ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य कठोरतम वातावरण में भी अपने आपको उसके अनुकूल बना सकता है।

           इन लोगों के लिये यदि कोई कठिन कार्य है तो वह कठोर वातावरण से बाहर निकलना। विश्व के अन्य आदिवासी की भाँति इन लोगों के लिए भी सभ्य लोगों का सम्पर्क घातक सिद्ध हुआ। जिस जाति को ध्रुवीय आंधियों और कठोर शीत और भोजन की कमी विचलित न कर सकी उसे सभ्य समाज के सम्पर्क द्वारा हानि का भय प्रतीत हुआ।

         सभ्य लोगों को पहुँच के बाहर सुरक्षित निवास प्राप्त करके ही ये लोग अपने आपको बचा पाये हैं। एस्किमो जिस क्षेत्र में रहते हैं वहीं चारों ओर बर्फ ही बर्फ दिखाई पड़ती है। पेड़-पौधे कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते। कोहरा, धुन्ध और अन्धकार सदैव छाया रहता है। सूर्य के दक्षिण की ओर पलायन कर जाने के पश्चात् यह महीनों तक दिखलाई नहीं पड़ता। शीतकाल में शरीर को चुभती हुई असह्य बर्फीली आंधियाँ बहुत तीव्रगति से चलती हैं।

जीव-जन्तु:-

          यहाँ के बर्फीले वातावरण में श्वेत भालू, रेण्डियर, समूर वाले विभिन्न पशु पाये जाते हैं। समुद्र में बर्फ की तह के नीचे मछलियाँ पाई जाती हैं जैसे- वालरस, ह्वेल, सील, वेलुगा आदि। स्थल पर आर्कटिक खरगोश, कैरिबा, मुस्क और चिड़ियाँ प्राप्त होती है जिनसे भोजन प्राप्त होता है। जीव-जन्तुओं से न केवल खाने के लिये माँस किन्तु चमड़ा और खालें भी प्राप्त होती हैं जिनका प्रयोग वस्त्रों के रूप में किया जाता है।

वस्त्र:-

      आखेट की क्रिया इस प्रदेश में ग्रीष्म ऋतु में अधिक की जाती है। इसलिये एस्किमो इस ऋतु में आखेट से प्राप्त खालों द्वारा वस्त्र तैयार करते हैं। एस्किमो के वस्त्र उनकी कुशल कारीगरी को प्रदर्शित करते हैं। इनके वस्त्र बहुत ही अच्छे कटे तथा सिले होते हैं। जल और आर्द्रता से बचाव के लिये ‘वाटर प्रूफ’ वस्त्रों को तैयार किया जाता है। इनको बनाने का कार्य स्त्रियाँ करती हैं। सील, कैरिबो की खाल सील की खाल से हल्की और गर्म होती है। उत्तरी ग्रीनलैंड में कैरिबो नहीं प्राप्त होता। यहाँ ध्रुवीय भालू के रूएँ से वस्त्र बनाये जाते हैं।

            एस्किमो स्त्री-पुरुषों का पहनावा लगभग समान होता है। पुरुषों की बाहदार जर्सी को ‘तिमियार’ कहा जाता है। सिर पर एक प्रकार की टोपी पहनी जाती है। कालर और बांहों के किनारों पर कुत्ते की बालदार खाल लगी होती है। तिमियार के ऊपर एक और वस्त्र भी पहनते हैं जिसे ‘अनोराक’ कहा जाता है।

             पैरों को ढंकने के लिये ये लोग ऊनी पाजामा या सील की खाल पहनते हैं। जूते भी सील की खाल के बनाए जाते हैं जिन्हें ‘कामिर’ कहते हैं। यह जूते दोहरे बनाये जाते हैं ताकि इनमें पानी न जा सके। स्त्रियों और पुरुषों की पोशाक अवश्य एक सी होती है किन्तु स्त्रियों की पोशाक में कुछ सजावट कार्य अधिक होता है। स्त्रियों के वस्त्र रेशमी पट्टियों और रंगीन मनकों से सजाए हुए होते हैं। माताएँ एक प्रकार का वस्त्र ओढ़ती है जिसे ‘अमाउत’ कहते हैं। पीठ की ओर इनमें एक बड़ा थैला होता है जिसमें यह अपने बच्चे को रखकर काम काज करती है।

गृह:-

           जलवायु का प्रतिकूल होना, कृषि के लिए मिट्टी का अभाव और लकड़ी न प्राप्त होना एस्किमो लोगों के स्थायी गृहों के निर्माण में बहुत बाधा पहुँचाता है। इसलिए अधिकांश लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को भ्रमण किया करते हैं। स्थानान्तरण इन लोगों को अपने शिकार की तलाश में भी करना पड़ता है अथवा जब एक स्थान पर शिकार की कमी पड़ जाती है।

             एस्किमों का जीवन भौगोलिक वातावरण द्वारा पूर्णतया सीमित है। अपने गृह निर्माण के लिए इन लोगों को लकड़ी तथा अन्य उपयुक्त पदार्थ प्राप्त नहीं होते। समुद्र की लहरों द्वारा बहकर आई लकड़ी तथा स्थानीय पत्थर का ये लोग गृहनिर्माण में प्रयोग करते हैं। पशुओं की हड्डी तथा चमड़े का भी प्रयोग गृह-निर्माण में किया जाता है।

             जाड़े की भयानक ऋतु से बचाव के लिये बड़े-बड़े गुम्बजनुमा घर बनाए जाते हैं जिन्हें ‘इग्लू’ कहते हैं। बर्फ की शिलाएं काटकर इन्हें ईंटों के पत्थरों की तरह एक-दूसरे पर रखकर गुम्बज जैसी आकृति की एक गुफा बना ली जाती है। मकान में एक ही बड़ा कमरा होता है। कमरे में लोग बर्फ की शिलाओं पर ही खालों की कई परतें बिछाकर सोते व उठते-बैठते हैं। इग्लू में से निकलने तथा घुसने के लिए एक ही लम्बा सुरंग जैसा ढकाँ हुआ मार्ग होता है।

               इग्लू में प्रकाश तथा गर्मी के लिए दिन-रात चर्बी के दिये जलाये जाते हैं। सील की चर्बी का एक टुकड़ा जिसे ‘ब्लवर’ कहते हैं, दीपक की शिखा के ऊपर लटका दिया जाता है ताकि पिघलकर लटकी हुई चर्बी दीपक की शिखा को प्रज्ज्वलित करती रहे। दीपक का पात्र पत्थर से बनाया जाता है।

औजार:-

         शरद ऋतु में एस्किमो बर्फ के ऊपर और ग्रीष्म ऋतु में टुन्ड्रा की चिकनी काई के ऊपर अपनी स्लेज नामक गाड़ी और कुत्ते को साथ लेकर चलते हैं। स्लेज गाड़ी या तो व्हेल मछली की हड्डी की बनायी जाती है या जहाँ लकड़ी पायी जाती है वहाँ उसके निर्माण में लकड़ी का उपयोग किया जाता है। इस गाड़ी को कुते खींचते हैं जो कि बहुत मजबूत होते हैं।

           ग्रीष्मकाल में जब ये लोग नदियों, झीलों और तटीय जल की ओर मुड़ते हैं उस समय कयाक नामक गाड़ी का उपयोग करते हैं। व्हेल मछली की हड्डी या लकड़ी के बने ढाँचों को जो लम्बी संकरी नाव के समान होते हैं, सील मछली के चमड़े से बने तांतों द्वारा बांधा जाता है, जो कि ढक्कन का कार्य करता है।

व्यवसाय:-

         शीतकाल के होते-होते एस्किमो परिवार तट के समीप एकत्र होने लगते हैं। यहाँ ये लोग मार्च-अप्रैल तक रहते हैं ये लोग तट के निकट सील मछली को पालते हैं। तैरते हुये बर्फ के टुकड़ों में ये लोग छिद्र बना देते हैं जिसके द्वारा सील मछली सांस लेती है। जब यह छिद्र बर्फ की पतली पर्त से ढँक जाती है तो इनके कुत्ते सूँघते हुये यहाँ पहुँचकर इसे खुरच देते हैं।

      एस्किमी शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हारयून से उसके मुख को काट देता है और इस प्रकार आखेट करता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो ‘माउपाक’ कहते हैं। सील मछली के माँस को खाया जाता है, साथ ही साथ इसकी चर्बी को जलाकर शीतकाल में मकानों को गर्म करते हैं एवं रोशनी भी प्राप्त करते हैं।

        ग्रीष्मकाल में बेरी, कन्दमूल तथा अन्य प्रकार की वनस्पति उपयोग के लिये स्त्रियाँ एकत्रित करती हैं। ग्रीष्म ऋतु के अन्त में एस्किमो पुनः तटवर्ती भागों में आ जाते हैं। मार्च के आते-आते जब दिन बड़े होने लगते हैं तो एस्किमो परिवार सील मछली के आखेट के लिये निकल पड़ते हैं। जब सील मछली साँस लेने के लिये अपने छिद्र से बाहर आकर धूप लेने लगती हैं तो उसका शिकार बहुत ही आसानी से किया जाता है। एस्किमी शिकारी अपनी स्लेज गाड़ी और अपनी पार्टी को छोड़कर एवं शिकारी कुत्ते के साथ आगे बढ़ता है और सील मछली के झुण्डों का शिकार करता है।

          ग्रीष्म ऋतु के मध्य जब बर्फ पिघलती है और नाना प्रकार की वनस्पतियाँ उगने लगती है उस समय वहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय जंगली जानवरों का शिकार होता है। जब ये प्रदेश के भीतर की ओर अग्रसर होते हैं तो कैरिबाऊ के बड़े-बड़े झुण्डों और रेण्डियर के झुण्डों को ढूँढते हुये आगे बढ़ते हैं। कभी-कभी एस्किमो इन शिकारों की तलाश में 300-300 किमी० तक दक्षिणी प्रदेश की ओर बढ़ जाते हैं। कैरिबाऊ और रेन्डियर के अतिरिक्त गीदड़ एवं खरगोश भी जालों द्वारा पकड़े जाते हैं। वैसे मछली पकड़ना ही यहाँ के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है। सामन एवं ट्राउन मछलियाँ विशेष रूप से पकड़ी जाती है।

भोजन एवं शिकार:-

             एस्किमी का भोजन सील, ह्वेल, बालरस आदि जल जीव हैं। इनको ये लोग शिकार करके प्राप्त करते हैं। कैरिबो नामक बारहसिंगा का भी शिकार किया जाता है। काफी मांस तो एस्किमो लोग कच्चा ही खा जाते हैं। कभी-कभी मांस को उबालकर तथा सुखाकर खाते हैं। समुद्री वनस्पति भी खाये जाते हैं।

              भोजन की अधिक तंगी के समय तम्बुओं की खाल के टुकड़े उबाल कर शोरधा पी जाते हैं। एस्किमो के भोजन का निश्चित समय नहीं होता है। जब भी इन्हें भूख लगती है तभी खाने बैठ जाते हैं। एस्किमी का उत्तम भोजन समुद्री जीवों पर निर्भर होता है। इसलिये ये लोग आखेट की खोज में समुद्रतट पर जाते हैं। आर्कटिक सागर में आखेट ग्रीष्म ऋतु में किया जाता है। सागर में कायक (Kayak) नामक नौकाओं का प्रयोग आखेट के लिए किया जाता है।

               शीत ऋतु में कुत्ता या बारहसिंगा द्वारा खींची जाने वाली स्लेज गाड़ी पर ये बर्फीले भागों में आखेट की खोज करते हैं। कायक नाव का प्रयोग केवल शिकार के लिए होता है। इस पर पुरुष ही बैठते हैं बाकी लोग साधारण नावों पर ही चढ़े होते हैं। नावें समुद्रों में पाई गई लकड़ी से बनाई जाती हैं। इनके ऊपर खाल मढ़ी होती है जिससे इनके अन्दर पानी न घुसे।

            आखेट के लिए हार्पून (Harpoon) या बर्छी का प्रयोग करते हैं। ये शस्त्र सील व अन्य पशुओं की हड्डियों से बने होते हैं। सागरों में प्रयोग करने के लिए एस्किमों के शस्त्र ऐसे होते हैं कि पानी पर दूर फेंके जाने पर शिकार के साथ खो न जाएँ। हथियारों में डोरी बँधी होती है। उसके एक छोर पर पशु की खाल की हवा भरी तुम्बी बँधी होती है ताकि वह पानी पर तैरती रहे और हथियार डूब न सके।

             भोजन एकत्रित करने का कार्य पुरुषों द्वारा होता है। घर और बच्चों की देखभाल स्त्रियाँ करती हैं। शिकार को काटना व बनाना भी स्त्रियों द्वारा होता है। खाल तैयार करना, सुखाना, चमड़े की पोशाक बनाना और झोपड़ी बनाने का कार्य स्त्रियाँ ही करती हैं।

           पुरुष तो सुबह होते ही आखेट की खोज में घर से बाहर चल देते हैं। कौन-सा आखेट कहाँ मिलता है इसका एस्किमो को बहुत ज्ञान होता है। वे लोग अपने शिकार को बाँट कर खाते हैं। कुछ अस्त्र और वस्त्रों को छोड़कर एस्किमो की अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं होती। ये लोग अतिथि सत्कार बहुत करते हैं।

           सील मछली का आखेट और उसका भोजन एस्किमो लोगों को बहुत रुचिकर होता है। ये लोग बर्फ में छेद बना देते हैं जिनके द्वारा सील मछली श्वास लेने आती है। जब यह छेद पतली बर्फ से ढक जाता है तो एस्किमो का कुत्ता इसे सूंघ कर ढूँढ़ लेता है और फिर खुरच कर छेद को खोल देता है। एस्किमो शिकारी सील मछली के आने की आहट पाकर अपने हार्पून से उसके मुँह को नाथ देता है और इस प्रकार आखेट पकड़ लिया जाता है। इस प्रकार के आखेट को एस्किमो लोग ‘मउपाक’ कहते हैं।

प्रश्न प्रारूप @

1. एस्किमों के निवास तथा सामाजिक आर्थिक कार्यकलापों का वर्णन करें।

अथवा, एस्किमों के सामाजिक- सांस्कृतिक, निवास एवं आर्थिक पक्षों को प्रस्तुत कीजिए।

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

8. बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन



बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन

बुशमैन की शारीरिक

                    दक्षिणी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल के निवासी बुशमैन मरुस्थल में ही भ्रमण करने वाली एक खानाबदोश जनजाति है। इन लोगों को बुशमैन नाम से सम्बोधन हालैंड निवासियों ने 17वीं शताब्दी में किया था। उस समय यह लोग दक्षिणी-पश्चिमी संघ के उत्तरी-पश्चिमी भाग की बंजर भूमि में विस्तारपूर्वक फैल हुए थे। इनका विस्तार वास्तव में उत्तर तथा पूर्व में बसूटोलैंड, नैटाल और दक्षिण रोडेशिया तक था। इनका जीवन-निर्वाह आखेट पर पूर्णतया आधारित था।

              हालैंड वासियों ने इनके क्षेत्र पर आक्रमण करके इनको निश्चित भू-भागों में बसने के लिए बाध्य किया। इन प्रदेशों पर धीरे-धीरे अफ्रीका में अन्य लोगों का अधिकार हो गया। बांटू भाषा वाले नीत्री लोगों ने इन्हें पूर्वी तटीय प्रदेश, रोडेशिया, ट्रांसवाल और बेचुआनालैंड के मध्य पठारों से हटाया। दक्षिण-पश्चिम से होटेनटोट लोगों ने इन्हें उत्तर की ओर खदेड़ दिया। बांटू जाति की प्रगति एवं यूरोपीय निवासियों के आवास के कारण बुशमैन लोगों की संख्या बहुत कम रह गई है।

जलवायु:-

        यहाँ तापमान प्रायः ऊँचा रहा करता है। जनवरी का तापमान 30º से 32º सेंटीग्रेड तक रहता है। शीतकाल में तापमान 15° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है। मरुस्थल होने के कारण यहाँ दैनिक तापमान में काफी अन्तर होता है। दिन के समय तापमान 45° सेंटीग्रेड तक पहुँच जाता है और रात्रि के समय तापमान गिरकर केवल 10° सेंटीग्रेड रह जाता है। इस प्रकार तापान्तर 30º सेंटीग्रेड या 35° सेंटीग्रेड देखा जाता है। यहाँ ग्रीष्मकाल का मौसम अधिक लम्बा होता है और शीतकाल का मौसम छोटा होता है। शीतकाल में रात्रि के समय ठण्ड इतनी अधिक पड़ती है जो कि बुशमैन को भी असह्ज होती है।

         इस क्षेत्र के उत्तरी किनारे पर स्थित गामी झील के निकट वर्षा लगभग 30 से०मी० होती है। दक्षिण में मोलामो नदी के निकट वर्षा होती है। साधारण वर्षा के फलस्वरूप यहाँ की कुछ भूमि वनस्पति से ढँक जाती है, जो कि पशुओं के लिए उत्तम चराने के स्थान होते हैं। कुछ चारागाहों में घास एक-एक मीटर से भी लम्बी होती है। वन यहाँ बिल्कुल नहीं पाये जाते हैं। दक्षिण में वनस्पति का बहुत अभाव है। यहाँ के निवासियों में मलेरिया और पेचिस की बीमारियाँ अधिक प्रचलित हैं। वर्षा की ऋतु छोटी होने के कारण यहाँ के लोगों को विभिन्न चरागाहों में प्रवास करना पड़ता है।

शारीरिक लक्षण:-

            बुशमैन देखने में नीग्रोइड जाति से मिलते-जुलते हैं किन्तु इनका जबड़ा उनके समान बाहर को निकला हुआ नहीं होता और न ही इनके होठ बाहर की ओर उलटे हुए होते हैं। इनकी आँखें चौड़ी होती हैं जो कि नीग्रो एवं नेग्रीटो के मुख्य लक्षण हैं। इनकी स्त्रियों की शारीरिक रचना में एक विशेषता होती है। इनके नितम्ब पर वसा होने की प्रवृति होती है। इस कारण इनके नितम्ब काफी मोटे और विकसित होते हैं। इन्हें आंग्ल भाषा में ‘स्टीटो पिगमी’ कहते है।

आखेट:-

        बुशमैन आखेट करने में बहुत निपुण होते हैं। इस प्रदेश में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के पशु पाये जाते हैं। गामी और औकाबांगो क्षेत्रों में वर्षा के पश्चात् कीचड़ हो जाती है तथा कहीं-कहीं जल पाया जाता है। इन आर्द्र भू-भागों के समीप बहुत से पौधे उग आते हैं जो कि पशुओं की भोजन पूर्ति करते हैं। शाकाहारी पशु एन्टीलोप, ब्लेसवाक, जेन्सबाक, जेब्रा, जिराफ आदि यहाँ भोजन की खोज में घूमते हैं। इन पशुओं पर आधारित मांसाहारी पशु मिलते हैं जैसे शेर, चीता, जंगली बिलाउ, लिंक्स, हैना, गीदड़ आदि।

             यहाँ हर प्रकार की दीमक पाई जाती है जिसे ‘बुशमैन का चावल’ कहा जाता है जो कि इन लोगों के भोजन का मुख्य अंग है। बुशमैन का यदि घायल शिकार किसी दूसरे क्षेत्र में पहुँच जाता है तो उसे यहाँ हिस्सा देना पड़ता है।

गृह एवं परिवार:-

            बुशमैन एक खानाबदोश जाति है। इसलिये इनके निवास स्थान स्थायी नहीं होते। इनके गृह झोपड़े होते हैं जो कि डेढ़ मीटर ऊँचे खम्भों पर तैयार किये जाते हैं। झोपड़ों का निर्माण स्त्रियाँ करती है। झोपड़ों की दीवारें घास की बनायी जाती हैं। फर्श पर भी घास के गद्दे बनाकर बिछाये जाते हैं। झोपड़ों के निर्माण की व्यवस्था गामी क्षेत्र के निकट उत्तम मिलती है। झोंपड़े का दरवाजा सुरक्षा के उद्देश्य से छोटा रखा जाता है। सर्दियों में मौसम से बचने के लिए बुशमैन गुफायें बनाकर रहते हैं। इन गुफाओं के ऊपर घास या चमड़े के छप्पर डालते हैं। गुफा के मुख के समीप रात्रि के समय आग जलती रहती है ताकि हिंसक पशुओं से सुरक्षा हो सके।

           बुशमैन सामाजिक टुकड़ियों अथवा दलों में रहते हैं जिसमें 20 से लेकर 100 व्यक्ति तक होते हैं। इनमें विवाह-सम्बन्ध एक अन्य टुकड़ी के मध्य होते हैं। बुशमैन उष्ण प्रदेश का प्राणी है, इसके उपर वातावरण का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है। ये लोग भोजन और जल के अभाव में कई दिनों तक बिना भोजन और जल के रह सकते हैं। पुरुष का मुख्य कार्य आखेट करना है जिससे इन लोगों को भोजन प्राप्त होता है। घूमते-फिरते समय पुरुष अपने साथ हथियार सदैव रखते हैं क्योंकि उसे शिकार की सदैव चिन्ता रहती है। स्त्रियाँ बोझा ढोने का कार्य करती हैं और बच्चों को पीठ पर लाद लेती हैं।

वस्त्र:-

          ये लोग वस्त्रों का बहुत कम प्रयोग करते हैं। वस्त्र पशुओं के चमड़े से बने होते हैं। पुरुष एक तिकोना लंगोट पहनते हैं स्त्रियाँ भी चमड़े के टुकड़ों को पहनती हैं जो कि कमर से लेकर पैर तक लटका रहता है। इनके सिर खुले रहते हैं। स्त्रियाँ चमड़े या छाल के जूतों का प्रयोग करती हैं। स्त्रियों के वस्त्र का मुख्य भाग एक चोगा होता है जिसे ‘कारोस’ कहा जाता है। यह चोगा वस्त्र एवं होल्ड दोनों के काम आता है। इस कारोस द्वारा स्त्रियाँ भोजन की सामग्री और नवजात शिशुओं को लपेटे रहती है। बुशमैन के कुछ दल चमड़े की टोपी और जूते भी पहनते हैं।

भोजन-संग्रह:-

         प्रायः सभी आदिवासियों की तरह बुशमैनों को भी अपना अधिकांश समय भोजन-संग्रह में ही लगाना पड़ता है। प्रत्येक परिवार को अपना भोजन स्वयं संग्रह करना पड़ता है। स्त्रियाँ कन्दमूल, मेढक, छिपकली, गोह और कछुवों आदि का संग्रह करती हैं। पुरुष बड़े पशुओं का शिकार करते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें नित्य बाहर जाना पड़ता है। वे लोग या तो अकेले जाते हैं या कभी-कभी अपने सम्बन्धी अथवा पुत्र को साथ ले जाते हैं जिसे शिकार की शिक्षा देनी होती है।

               ये लोग शिकार में पालतू कुत्तों की भी सहायता लेते हैं। शिकार प्रायः तीर-कमान से किया जाता है। इनके तीर विष बुझे होते हैं। विष या तो साँपों की विषैली थैली से निकालते हैं या विषैले वृक्षों के रस से प्राप्त करते हैं। इसी विष में तीरों को डूबोकर उन्हें विषैला बनाते हैं, लेकिन यह विष इतना तीव्र नहीं होता है कि किसी पशु के बाण लगते ही वह तुरन्त मर जाय। इसका परिणाम यह होता है कि शिकार के घायल हो जाने के बाद बुशमैन को शिकार का मीलों पीछा करना पड़ता है।

           बुशमैनों में जो व्यक्ति खाद्य सामग्री के स्रोतों का पता लगा लेता है, उन पर उसका विशेषाधिकार हो जाता है। बुशमैनों के लिए पानी की समस्या प्रायः बनी रहती है। पानी लेने के लिए उन लोगों को डेरे से प्रायः मीलों दूर जाना पड़ता है। पानी लाने का कार्य प्रायः औरतें करती हैं।

 

बुशमैनों का शिल्प:–

          बुशमैन शिल्प और कला-कौशल की दृष्टि से बहुत ही सामान्य स्तर पर होते हैं। उनके क्षेत्र में जो साधन उपलब्ध हैं, उनका भी वे समुचित उपयोग नहीं जानते हैं। उनके हथियार और औजार मुख्य रूप से लकड़ी के बने होते हैं। लकड़ी से धनुष, भाले, आग जलाने की अरणी बनाते हैं। घास की रस्सियाँ बनाना भी जानते हैं।

             जब पानी का अभाव हो जाता है और पानी जमीन से निकालना होता है, तो वे नर कुल की पीली नली के एक सिरे पर काफी घास बाँध देते हैं और इस घास वाले हिस्से को ऐसी जमीन में घुसा देते हैं, जहाँ पानी मिलने की सम्भावना होती है, जिससे नीची सतह का पानी घास में (फिल्टर) साफ होकर मुँह में आता है।

बुशमैनों का सामुदायिक संगठन-

            बुशमैन छोटे-छोटे सामाजिक समूहों में रहते हैं। प्रत्येक समूह में 20 से लेकर 100 तक व्यक्ति हो सकते हैं। ये लोग रक्त से सम्बन्धित होते हैं। एक समूह का अपना क्षेत्र निर्धारित होता है। इसी के अन्तर्गत वह अपना शिकार करता है। किसी समूह का व्यक्ति दूसरे समूह के क्षेत्र में शिकार करने नहीं जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति पहुँच जाता है, तो दूसरे समूह के व्यक्ति उस पर आक्रमण करते हैं।

             यदि कभी कोई घायल शिकार दूसरे के क्षेत्र में पहुँच जाय तो शिकारी को इस बात की सूचना दूसरे समूह के सदस्यों को देनी होती है और उसे शिकार से उन लोगों को हिस्सा भी देना पड़ता है। कई समूह परस्पर बहुत कम मिलते हैं। जब जाड़े के दिनों में शिकार बहुत मिलता है, तब दो या तीन समूह मिलकर सामूहिक रूप से कभी-कभी शिकार करते हैं।

               एक समूह के व्यक्ति की शादी दूसरे समूह में हो सकती है और वह व्यक्ति अपने बच्चों और स्त्री को लेकर अपने सास-ससुर से मिलने कुछ दिन के लिए जा सकता है। वस्तुओं की अदला-बदली के लिए भी कभी-कभी एक समूह के व्यक्ति दूसरे समूह में जा सकते हैं।

बुशमैनों का राजनीतिक संगठन:-

              बुशमैनों का कोई राजनीतिक संगठन नहीं होता, और न राजनीतिक इकाई होती है। उनका न कोई शासन होता है, और न कोई शासन करने वाला। इस प्रकार बुशमैन कला, व्यवसाय, राजनीति और संस्कृति की दृष्टि से पर्याप्त पिछड़े हुए लोग हैं। लेकिन इसके लिए इनकी भौगालिक परिस्थितियाँ ही उत्तरदायी हैं। इन्हें ऐसी विषम परिस्थितियों में रहना पड़ता है, जिनमें इनका सारा समय और शक्ति केवल भोजन-संग्रह में ही नष्ट हो जाती है और अन्य किसी कार्य के लिए अवसर ही नहीं मिल पाता है।

प्रश्न प्रारूप

 1. बुशमैन जाति के निवास क्षेत्र, अर्थव्यवस्था तथा सामाजिक जीवन का विवरण दीजिए। 

अथवा, बुशमैन की शारीरिक तथा सामाजिक-आर्थिक विशेषताओं का वर्णन करें।

अथवा, बुशमैन के जीवन शैली का वर्णन कीजिए।

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

7. मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन


  मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन

मानसून क्षेत्र           

       मानूसन क्षेत्र की निम्न विशेषताएँ होती हैं:-

अक्षांशीय स्थिति:-

       मानसूनी जलवायु का विस्तार भूमध्य रेखा के दोनों ओर 5º से 36° अक्षांशों के मध्य पाया जाता है। वास्तव में ये प्रदेश व्यापारिक हवाओं की पेटी में आते हैं, जिनमें ऋतुवत उत्तर तथा दक्षिण की ओर खिसकाव होता रहता है; जिस कारण मानूसन प्रकार की विशिष्ट जलवायु की उत्पत्ति होती है, जिसमें 6 महीने तक हवायें सागर से स्थल की ओर तथा शेष 6 महीने में स्थल से सागर की ओर चला करती हैं। इस जलवायु के अन्तर्गत पाकिस्तान, भारत, बांगलादेश, बर्मा, थाइलैण्ड, कम्बोडिया, लाओस, उ० तथा द० वियतनाम, पू० द्वीप समूह, आस्ट्रेलिया के उत्तरी भाग आदि को शामिल किया जाता है।

तापक्रम:-

        तापक्रम वर्ष भर ऊँचा बना रहता है, परन्तु सूर्य की उत्तरायण तथा दक्षिणायन की स्थितियों की वजह से ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल का आविर्भाव होता है। कुल मिलाकर यहाँ पर तीन मौसम होते हैं-

(i) ग्रीष्मकाल

(ii) वर्षाकाल और

(iii) शीतकाल

        इनमें ग्रीष्मकाल मार्च से जून, वर्षाकाल जुलाई से अक्टूबर और अन्तिम शीतकाल नवम्बर से फरवरी तक रहता है। ग्रीष्मकाल का औसत तापक्रम 80° से 90° फ० रहता है, परन्तु मई तथा जून में तापक्रम कई स्थानों पर 105° से 120° फा० तक पहुँच जाता है। उत्तरी भारत में तो मई और जून में कई बार गर्म हवायें चलने लग जाती हैं। तटीय भागों में तापक्रम 80° से 950 फ० के बीच आंका जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उच्च तापक्रम पर धरातलीय प्रभाव की छाप है।

        शीतकाल में औसत तापक्रम 50º से 80º फा० के बीच होता है। सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है, जिस कारण वह मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है, परिणामस्वरूप इस भाग का तापक्रम गिर जाता है। इस तरह वार्षिक तापान्तर अधिक हो जाता है। वार्षिक तापान्तर पर सागर से दूरी तथा वर्षा की मात्रा का पर्याप्त प्रभाव होता है। तट से दूर शुष्क भागों में वार्षिक तापान्तर बढ़ता जाता है। दैनिक तापान्तर 10° से 20° फा० के बीच रहता है। वर्षाकाल में तापक्रम ग्रीष्मकाल की अपेक्षा कुछ कम हो जाता है।

वायु दाब तथा हवायें:-

        ग्रीष्म तथा शीतकाल के कारण मानसूनी प्रदेश क्रमशः निम्न तथा उच्च दाब से प्रभावित होता रहता है। ग्रीष्म काल में 21 मार्च से सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा 21 जून को कर्क रेखा पर लम्बबत् चमकता है, परिणामस्वरूप उच्च तपक्रम के कारण निम्न वायुदाब का निर्माण हो जाता है जिस कारण सागर से स्थल की ओर हवायें चलने लगती है जो द०-पू० मानसून होती है।

        23 सितम्बर के बाद सूर्य की स्थिति दक्षिणायण हो जाती है और वह 24 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण उत्तरी गोलार्द्ध के मानसूनी प्रदेशों में शीतकाल के कारण उच्च वायुदाब का निर्माण होता है। परिणामस्वरूप स्थल से सागर की और हवायें चलने लगती है। ये हवायें ‘उ०-पू० मानसून’ कही जाती है।

          वास्तव में उ०-पू० मानसूनी हवायें व्यापारिक हवायें होती है, जो कि सूर्य की दक्षिणामण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के द० की ओर खिसकाव के कारण द०-पू० एशिया आदि पर स्थापित हो जाती है। चूँकि ये हवायें स्थल से होकर आती है, अतः ये शुष्क होती हैं, परन्तु जहाँ कहीं भी ये सागर के ऊपर से चलती हैं, नमी धारण कर लेती है तथा वर्षा कर बैठती हैं। मानसून की तापीय उत्पत्ति के सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार द०-प० मानसूनी हवायें भी द०-पू० व्यापारिक हवायें ही होती है।

          सूर्य की उत्तरायण स्थिति के कारण वायुदाब की पेटियों के उत्तर दिशा में खिसकने के कारण द०-पू० व्यापारिक हवायें भूमध्य रेखा को पार कर लेती हैं तथा ‘फेरल के नियम’ के अनुसार उनकी दिशा द०-प० हो जाती है, चूँकि ये हवायें सागर से होकर आती है। अतः आर्द्र होने के कारण वर्षा करती हैं।

             मानसून की गतिक उत्पत्ति के समर्थकों के अनुसार सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय डोलड्रम की पेटी का द०-पू० एशिया पर विस्तार हो जाता है तथा उसमें प्रवावित होने वाली विषुवत रेखीय पछुवा ही द०-पू० मानसून हवा होती है। डोलड्रम के साथ द०-पू० एशिया पर चक्रवातीय दिशायें व्याप्त हो जाती है। ये उष्ण कटिबन्धीय चक्रवात प्रायः पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर चलते हैं तथा पर्याप्त वर्षा प्रदान करते हैं। विभिन्न स्थानों पर इन्हें “टाइफून” चक्रवात तथा “हरीकेन” नाम से पुकारा जाता है।

वर्षा:

      मानसून प्रदेशों में वर्षा मुख्यतः चक्रवातीय तथा पर्वतीय प्रकार की होती हैं। परन्तु कुछ वर्षा संवहनीय प्रकार की होती है। अर्द्ध मानसून हवायें जब पर्वतीय अवरोध का सामना करती हैं तो उन्हें ऊपर उठना पड़ता है परिणामस्वरूप पर्याप्त वर्षा हो जाती है। हिमालय के दक्षिणी ढाल पर आसम से लेकर काश्मीर तक इन हवाओं से पर्याप्त वर्षा होती है परन्तु जैसे-जैसे ये हवायें आगे बढ़ती जाती है वर्षा की मात्रा घटती जाती है। जून से अक्टूबर तक द०-पू० मानसून हवाओं से वर्षा प्राप्त होती है। शरद काल में पश्चिम से आने वाले चक्रवातों से कुछ वर्षा होती है।

         वर्षा के वार्षिक वितरण में पर्याप्त विषमता पाई जाती है। वर्षा का अधिकांश भाग केवल चार महीनों (जून, जुलाई, अगस्त, सितम्बर) में प्राप्त हो जाता है। यहाँ वर्षा भी लगातार नहीं होती है। बीच-बीच में सूखा भी पड़ जाता है। वर्षा के प्रादेशिक वितरण में भी पर्याप्त अन्तर होता है। उदाहरणार्थ भारत के चेरापूँजी में वार्षिक वर्षा 426″ तक होती है जबकि थार के रेगिस्तान में 10″ से भी कम होती है। इस तरह मानसून वर्षा की मात्रा, वितरण, समय आदि सभी अनिश्चित होते हैं जिस कारण कृषि कार्य भी अनिश्चित हो जाती है।

वनस्पति:-

       मानसूनी प्रदेशों में वर्षा की मात्रा में विषमता के कारण कई प्रकार की वनस्पति मिलती है। 200 से० मी० से अधिक वर्षा वाले भागों में सदाबहार वन मिलते हैं। उदाहरणार्थ भारत के पश्चिमी घाट क्षेत्र में 100 से 200 से० मी० वर्षा वाले क्षेत्रों में पतझड़ वृक्ष मिलते हैं। 50 से 100 सेमी० वर्षा वाले भागों में घास पर्णपाती वन मिलते हैं। शुष्क भाग में झाड़ियाँ आदि  मिलती है।

प्रश्न प्रारूप

1. मानसूनी भूमि की स्थिति, जलवायु तथा वनस्पति के विषय में आप क्या जानते हैं? संक्षेप में लिखिये।

अथवा, मानसून क्षेत्र की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

6. समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप


 समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलाप

समशीतोष्ण घास

                 प्रकृति के विस्तृत आँगन पर अनेकों प्रकार की वनस्पतियाँ सृष्टि के आरम्भ से ही उगती बढ़ती आई हैं। इन वनस्पतियों का समय विशेष पर विनाश हो जाता है और उसके स्थान पर पुनः उसी तरह की वनस्पति उग आती है। संसार के ग्लोव पर नजर डालने पर हमें ज्ञात होता है कि वनस्पति चारों ओर एक सी नहीं है। कहीं पर विस्तृत सघन वन है तो कहीं पर घास के मैदान, कहीं कांटेदार झाड़ियाँ हैं, तो कहीं फूलदार वनें।

                 अतः स्थान-स्थान पर तरह-तरह की वनस्पतियाँ दिखाई देती हैं। इन विभिन्नता के कारण तापमान की दशा, वर्षा की मात्रा, मिट्टी की प्रकृति, प्रकाश प्राप्ति, पवन आदि की प्राप्ति की विभिन्नता है। संसार में घास के मैदानों को प्राकृतिक दशाओं के अनुसार दो भागों में विभक्त कर सकते हैं।:-

1. उष्ण घास के मैदान तथा

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान।

1. ऊष्ण घास के मैदान:-

         भूमध्य रेखा के उत्तर व दक्षिण में 10° से 20° अक्षांशों के बीच भूमध्य रेखीय वनों को घेरे हुए विस्तृत घास के मैदान फैले हुए हैं। ये घास के मैदान उष्ण मरुस्थलों और मानसूनी प्रदेशों के बीच फैले हैं। इस प्रकार की जलवायु अफ्रीका के सूडान राज्य में अधिक होने से इन प्रदेशों को सूडान तुल्य जलवायु वाले प्रदेश कहते हैं। वेनेजुएला में इन घास के मैदानों में ‘लानोज’, ब्राजील में कम्पास तथा इन्हीं अक्षांशों के बीच मध्य आस्ट्रेलिया के भाग शामिल हैं।

अफ्रीका के सवाना प्रदेश:

          अफ्रीका में भूमध्य रेखा के उत्तर और दक्षिण में ये घास के मैदान फैले हैं। इन घास के मैदानों की घास 3 मीटर तक लम्बी है। यहाँ प्रमुख धंधा पशुपालन है। सूडान का सबसे प्रसिद्ध नगर तुम है। अधिक वर्षा वाले भागों में गाय, बैल और शुष्क भागों में भेड़, बकरियां और ऊँट पाले जाते हैं।

          नील और श्वेत नील के दोआब कपास के लिये प्रसिद्ध है। खजूर, मूंगफली और बाजरा तथा बबूल के पेड़ों से अरबी गोंद प्राप्त होता है। पश्चिमी सूडान का प्रसिद्ध नगर टिम्बकटू है।

           दक्षिणी अफ्रीका के सवाना प्रदेश में न्यासालैंड, उत्तर रोडेशिया और अंगोला सम्मिलित हैं। इन घास के मैदानों में अन्य जानवर बहुत रहते हैं। अतः यहाँ के लोग अपने निवास के चारों ओर ऊँचे-ऊँचे बाड़े बनाकर उनके बीच में अपनी भेड़, बकरियाँ और अन्य पशुओं को रात के समय रखते हैं।

             यहाँ टिसीटिसी मक्खी, जो जहरीली होती है पाई जाती है, जो घोड़ों और पशुओं को हानि पहुँचाती है। यहाँ की घास लम्बी और सघन होने के कारण यहाँ तापमान और वर्षा की अधिकता है। यहाँ घास नदियों के पास तो बहुत ही सघन और लम्बी-लम्बी होती है।

दक्षिणी अमरीका के सवाना प्रदेश

ओरिनिको बेसिन के लानोज:

         ओरिनिको के बेसिन में विस्तृत घास के मैदान मिलते हैं। इन्हें बेनेजुएला के ‘लानोज’ कहा जाता है। पशुपालन भी यहाँ अधिक होता है। गायें यहाँ खूब पाली जाती हैं। यहाँ मच्छरों की भरमार है और जलवायु गर्म है अतः यहाँ पशुओं की दशा अच्छी नहीं हैं। यहाँ मांस का व्यापार घरेलू खपत के लिये हैं।

ब्राजील के कैम्पास:

           इस क्षेत्र में भी पशु पाले जाते हैं, परन्तु गर्म जलवायु परिवहन की कठिनाई और मांस के जल्दी खराब होने के कारण यहाँ पशुपालन महत्वपूर्ण नहीं हैं। कहबे की कृषि के कारण इस भाग की बहुत उन्नति हुई है। साओपाली और रियोडिजेनेरी कहवा की उपज के मुख्य क्षेत्र हैं। इस प्रदेश का पूर्वी भाग लोहा, ताँबा, हीरे, सोना, मैगनीज आदि खनिज पदार्थों से सम्पन्न है।

आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश:

            आस्ट्रेलिया का सवाना प्रदेश उत्तरी प्रान्त और क्वीसलैंड के मध्य में फैला हुआ है। इस प्रदेश के उत्तर में मानसूनी खण्ड, दक्षिण में शुष्क मरुस्थल और पूर्व में ग्रेट डिवाइडिंग रेंज पर्वत है। इस प्रदेश का प्रमुख धन्धा पशुपालन है। पानी की कमी के कारण यहाँ भेड़ें अधिक पाली जाती है।

            जहाँ कहीं पानी की सुविधा है, वहीं गेहूँ की कृषि की जाती है। सवाना घास के मैदानों में वार्षिक मध्यमान 30° सेन्टीग्रेड और वार्षिक ताप परिसर 120° सेन्टीग्रेड है। ये घास के मैदान ध्रुवों की ओर तो मरुस्थलों में बदलकर झाड़ियाँ मात्र रह जाते हैं और भूमध्य रेखा की ओर वनों में परिणत हो जाते हैं। इन प्रदेशों में ग्रीष्म ऋतु में वर्षा होती है।

2. समशीतोष्ण/शीतोष्ण घास के मैदान:-

           ये घास के मैदान 30° से 45° अक्षांशों के बीच महाद्वीपों के मध्य भागों में पाये जाते हैं। इस प्रदेश के भाग विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से पुकारे जाते हैं। ये भाग पूर्णतया घास के मैदान हैं।

        समशीतोष्ण घास के मैदान में छोटी-छोटी झकड़ेदार घासों की हरीतिमा सर्वव्याप्त होती है। कम तापमान और साधारण नमी से इस क्षेत्र में घास के विकास के लिए आदर्श परिस्थिति उपलब्ध होती है। यहाँ की अधिकांश वर्षा ग्रीष्म काल में होती है तथा शीतकाल ठण्डा और कम आर्द्र होता है। घासों के साथ झाड़ियाँ और बौने वृक्ष भी उगते हैं। ऐसे परिवेश में शाकाहारी और मांसाहारी जीव-जन्तुओं का साम्राज्य पाया जाता है। मानव के लिए ये आदर्श पशुपालन की स्थिति है। यही कारण है कि युगों से यहाँ पशुपालन मुख्य पेशा रहा है।

                मध्य एशिया के किरगीज न जाने कब से इस पेशे से अपना जीवन-यापन करते चले आ रहे हैं। इनकी अधिकांश आवश्यकताएँ पशु उत्पादों से पूरी हो जाती हैं। पर्वतों के ऊँचे भागों पर भी इस प्रकार की घास पाई जाती है, जहाँ पशुपालन प्रचलित पेशा है।

                 जिन भागों में कृषि का विस्तार हुआ है, वहाँ समशीतोष्ण घास के मैदान लुप्त हो गये हैं, जैसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका के पूर्वी और मध्यवर्ती भागों में ऐसे घास के मैदानों पर अब व्यापारिक पशुपालन का विकास भी किया गया है, जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी भाग, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और साइबेरिया में। यहाँ सिंचाई और उर्वरक का प्रयोग कर घास के मैदानों को अधिक उपजाऊ बनाया गया है।

            ये क्षेत्र आज पशु उत्पादों के प्रधान क्षेत्र हैं। आल्पस और रॉकी क्षेत्रों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के क्षेत्र हैं। हिमालय में कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड की पहाड़ियों में अल्पाइन घास के मैदान आदर्श पशुपालन के आधार हैं।

         समशीतोष्ण घास के मैदानों में आदिवासी जातियों का अर्थतंत्र पशुपालन पर आधारित होता है। पशुओं से प्राप्त दूध, मांस उनका भोजन, ऊन, चमड़ा, हड्डी उनका वस्त्र, तम्बू और हथियार और कुछ पशु उत्पाद व्यापार के आधार होते हैं, जिन्हें बेचकर वे अपनी आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं।

              पशुओं के साथ घूमते रहने के कारण तम्बू इनके गृह का काम करता है। कभी-कभी ये अपनी बस्ती भी बनाते हैं, जहाँ बहुधा जाड़े के मौसम में निवास करते हैं। अब विकसित चारागाहों पर स्थायी निवास भी बनाये गये हैं और अतिरिक्त पेशा के रूप में कृषि करने का रिवाज भी बढ़ता जा रहा है। रूसी सरकार द्वारा किरगीज चरवाहों के लिए इस प्रकार की व्यवस्था की गई है।

               व्यावसायिक पशुपालन वाले घास के मैदानों में विशेषकर आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, आस्ट्रिया, स्विट्जरलैण्ड, अर्जेण्टाइना आदि में विकसित नस्ल के पशु और रोपित घास का प्राधानता पाया जाता है। रूस के साइबेरिया क्षेत्र में भी ऐसे घास फार्मों का विकास किया गया है। स्पष्ट है कि जीवन-पद्धति के निर्धारण में घास की भूमिका प्रधान है। ऐसे क्षेत्रों में आदिवासी, जीवन-पद्धति का आदर्श रूप साइबेरिया के किरगीज में पाया जाता है।

            जनवरी का मध्यमान 10° सेन्टीग्रेट और जुलाई का 20° सेन्टीग्रेड है। उन भागों में बर्फ पिघलने से घास और फूलों के उगने के लिए पर्याप्त आर्द्रता मिल जाती है। यहाँ बौछार के रूप में थोड़ी वर्षा भी हो जाती है जो घास के लिये पर्याप्त है। संसार में इन घास के मैदानों का वितरण निम्नलिखित प्रकार है-

यूरेशिया के स्टेपीज:

         अजरबेजान, जोर्जिया और जार्मिनिया तीन एशियायी राज्य जो कैस्पियन, अरब सागर तटीय भाग सम्मिलित है। यहाँ शीत ऋतु में तापमान गिर जाता है और वर्षा नहीं होती है। ग्रीष्म ऋतु में पठार के गर्म हो जाने पर दोनों सागरों पर अपेक्षाकृत अधिक दबाव होता है, जिससे वर्षा होती है। काकेशस पर्वत उत्तर की ओर से आने वाली बर्फीली पवनों को रोक लेते हैं। वर्षा पश्चिम से पूर्व की ओर घटती जाती है। यह भाग रूस के लिये बड़े महत्त्व का है।

           क्यूबान के स्टैपी प्रदेश में मुख्यतः गेहूँ उगाया जाता है, जलवायु मृदु होने के कारण काले सागर के सामने वाली पर्वत श्रेणियों के निचले ढलानों पर अंगूरों और चाय के वृक्ष लगे हैं। ग्रीष्म ऋतु गर्म होती है। पूर्वी भाग में पशुचारण का काम होता है। सम्पूर्ण रूस का 90 प्रतिशत तेल यूरेशिया के इन्हीं भागों से प्राप्त होता है।

उत्तरी अमेरिका के प्रेरीज:

            उत्तरी अमेरिका में प्रेरीज प्रदेश का विस्तार मिसीसिपी नदी और उसकी सहायक नदियों के बेसिन में फैला है। यदि ओहियो और मिसीसिपी नदियों के संगम स्थान को दक्षिण आकोटा राज्य की ब्लैक पर्वत श्रेणियाँ और मेक्सिको देश के सियरा मोद्र पर्वत के पूर्वी भाग की तली पर स्थित मोन्टेरे नगर से मिला दिया जाये तो इस प्रदेश की सीमा बन जायेगी।

          यहां वर्षा थोड़ी बहुत वर्ष के हर माह में हो जाती है। अधिकतम वर्षा 70 सेन्टीमीटर और न्यूनतम 5 सेन्टीमीटर होती है। मुख्य उपज घास है, पश्चिम की ओर से ग्रेट प्लेन में घास भी कम पाई जाती है। आजकल इन प्रदेश का मुख्य धन्धा कृषि हो चला है। गेहूँ की प्रधानता है। यहाँ संसार का सबसे अधिक तेल निकाला जाता है।

दक्षिणी अमेरिका के पैम्पाज:

            अर्जेन्टाइना में घास के समतल मैदानों को पैम्पाज कहते हैं। आरम्भ में चमड़ा और चर्बी बिक्रय धन्धा बहुत उन्नति कर गया था वहाँ से आज भी संसार का सबसे अधिक गोमांस निर्यात होता है। यहाँ गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम के शुष्क भाग में भेड़ें पाली जाती हैं, जिनसे ऊन और चमड़ा प्राप्त हो जाता है।

आस्ट्रेलिया के डार्लिंग डाउन्स:

           डार्लिंग नदी के पूर्वी पर्वतों तक के चरागाहों को आस्ट्रेलिया में डाउन्स कहते हैं। इस मैदान के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा पर्याप्त होती है, जिससे गेहूँ की कृषि पर्याप्त होती है। पश्चिम की ओर का भाग शुष्क होने से भेड़ों के चराने योग्य है।

अफ्रीका के वेड:

             अफ्रीका में इन घास के मैदानों को ‘बेल्ड’ कहा जाता है। यहाँ भी पशुचारण का महत्व अधिक है। अब कृषि का भी पर्याप्त विस्तार हो चला है। इन घास के मैदानों में घास की कम सघनता और कृषि के उपयुक्त जलवायु होने से घास के मैदानों को साफ करके कृषि की जाने लगी है।

प्रश्न प्रारूप

1. उष्ण घास एवं शीतोष्ण घास प्रदेश में आर्थिक विकास की सम्भावनाओं का परीक्षण कीजिए।

अथवा, समशीतोष्ण घास के मैदानों में मानवीय क्रिया-कलापों की विवेचना करें।

अथवा, शीतोष्ण घास के मैदान में मानवीय कार्यकलापों का परीक्षण कीजिए।

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

5. विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप


विषुवतरेखीय प्रदेशों में मानवीय क्रिया-कलाप

विषुवतरेखीय प्रदेश

                      भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाओं का अध्ययन करने से पूर्व निम्न तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।

भौगोलिक स्थिति:-

          यह जलवायु प्रदेश भूमध्यरेखा के दोनों तरफ 5º उत्तरी व 5º दक्षिणी अक्षाशों के मध्य फैला हुआ है। यहाँ दिन में सूर्य की सीधी एवं तीव्र गर्मी से वायु हल्की होकर ऊपर उठती है। वायु ऊपर उठकर फैल जाती है, जिससे उसमें जलवाष्प ग्रहण करने की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात् वायु ठण्डी हो जाती है। वायु ठण्डी होने से वर्षा होने लगती है। यह वर्षा कम समय के लिए परन्तु प्रतिदिन होती है।

              जलवायु के इस कटिबन्ध को शान्त कटिबन्ध भी कहते हैं- यह जलवायु अमेजन बेसिन, कांगो बेसिन, घाना व जंजीबार का तट, दक्षिणी-पूर्वी एशिया के द्वीपों (हिन्देशिया व मलेशिया) सहित एशिया महाद्वीप के कुछ भाग व आस्ट्रेलिया के कुछ भागों में पायी जाती है। इस जलवायु प्रदेश में हर ऋतु में दिन व रात बराबर होते हैं। सालो भर गर्मी पड़ती है लेकिन तापक्रम अधिक नहीं होता। वर्षा प्रत्येक महीने में होती है।

जलवायु:-

      भूमध्य रेखा पर स्थित होने के कारण यहाँ वर्ष भर सूर्य की किरणें लगभग सीधी पड़ती हैं। यहाँ औसत वार्षिक तापक्रम 27° सेन्टीग्रेड रहता है। ताप में मौसमी परिवर्तन बहुत कम होता है इसलिए वार्षिक ताप परिसर अधिक-से-अधिक 3º सेन्टीग्रेड रहता है। औसत वार्षिक वर्षा 200 सेमी० से अधिक होती है। यहाँ किसी-किसी क्षेत्र में 250 से 500 सेमी० तक वार्षिक वर्षा नापी जाती है।

प्राकृतिक वनस्पति:-

          विषुवतीय प्रदेश की उष्णार्द्र जलवायु में घने वन पाये जाते हैं। वनों में वृक्ष की इतनी अधिक सघनता होती है कि सूर्य का प्रकाश भी आसानी से भूमि पर नहीं पहुँच पाता है। इन वृक्षों के अतिरिक्त लताएँ व झाड़ियाँ भी उगती हैं। इन वनों से होकर गुजरना बहुत कठिन है। जंगली जानवरों के लिए यह उपयुक्त क्षेत्र हैं। इन वनों में महोगनी, सिनकोना, गटापार्चा, सीडर, चन्दन, रोजवुड, आबनूस, ताड़, रबड़, बाँस व बेंत आदि प्रमुख वृक्ष पाये जाते हैं।

मिट्टियाँ:-

         यहाँ पुरानी लाल रंग की मिट्टी पायी जाती है। यह मिट्टी कम उपजाऊ होती है। इस क्षेत्र में वर्षा की अधिकता के कारण खनिज पदार्थ भूमि के नीचे की ओर खिसक जाते हैं। इस प्रकार मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है। यहाँ की मिट्टियों में लोहे व ऐल्यूमिनियम के कण अधिक पाये जाते हैं।

जीव-जन्तु:-

       यहाँ के वनों में अनेक प्रकार के पशु-पक्षी व कीड़े-मकोड़े पाये जाते हैं। खुले जंगलों में हाथी, गैंडा, भैंस, हिरन, जंगली सुअर आदि पाये जाते हैं। नदियों में मगर, घड़ियाल व दरयाई घोड़े पाये जाते हैं। पेड़ों पर रहने वाले जीवों में चिड़ियाँ, साँप, बन्दर, छिपकली गिरगिट आदि प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त भी असंख्य जहरीले कीड़े-मकोड़े व जीव पाये जाते हैं।

भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियायें:-

          कांगो बेसिन के ‘पिग्मी’ लोगों की अर्थव्यवस्था से यह स्पष्ट होता है कि कांगो तथा अमेजन बेसिन क्षेत्र में घने जंगलों की प्रतिकूल जलवायु में मानवीय विकास रूक गया है। इस क्षेत्र में बीमारियों के कारण यहाँ के लोगों की लम्बाई 90 से०मी० से 150 से०मी० तक होती है।

             ये लोग आखेट करने में बहुत चतुर होते हैं। जंगली जानवरों के मांस, मछलियाँ, फल, कन्दमूल व पत्तियाँ आदि इनका भोजन है। ये लोग तोड़ की पत्तियों या वृक्षों की छाल को कमर से नीचे लटकाये रहते हैं। इन लोगों का स्थायी निवास नहीं होता, ये घूमते-फिरते रहते हैं।

            इस क्षेत्र में लकड़ी-व्यवसाय अधिक उन्नति इसलिये नहीं कर पाया है। क्योंकि यहाँ प्रतिकूल जलवायु परिवहन मार्गों की कमी, उपयोगी वृक्षों का असमान वितरण एवं वनों को काटने के लिये साधनों की कमी आदि की सुविधा नहीं है। लकड़ी-व्यवसाय ने उन्नति केवल समुद्र तटीय भागों में की है।

            इन वनों में महत्त्वपूर्ण वृक्षों के अतिरिक्त रबड़, गोंद, आइवरी नट, ताड़, तेल, कुनेने आदि वस्तुओं को भी एकत्र किया जाता है। दलदली भूमि, घने जंगलों में प्रतिकूल जलवायु के कारण ये क्षेत्र शक्तिहीन प्रदेश कहलाते हैं। इस क्षेत्र में विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग निवास करता है। इस क्षेत्र में वनों को साफ करके आदिम ढंग से मकई, ज्वार व बाजरा आदि की खेती की जाती है।

           इण्डोनेशिया व मलेशिया के द्वीपीय क्षेत्रों में जलवायु अनुकूल पायी जाती है। इस क्षेत्र में यूरोपीय लोग पहाड़ी ढालों और समुद्र तटीय भागों के वनों को साफ करके रबड़, ताड़, कहवा, चाय, नारियल व गन्ने आदि की बागानी कृषि करते हैं।

          इस क्षेत्र में बागानी कृषि वैज्ञानिक ढंग से की जाती है, इसलिए बागानी फसलों के उत्पादन में यह क्षेत्र विश्व प्रसिद्ध है। संसार की कुल रबड़ उत्पादन का लगभग दो-तिहाई रबड़ इसी क्षेत्र से उत्पादित किया जाता है। रबड़ के अतिरिक्त इस क्षेत्र में गन्ना, कहवा व चावल आदि खाद्यान्न फसलों का भी उत्पादन किया जाता है।

        मलेशिया व इण्डोनेशिया में टिन व पेट्रोलियम का उत्पादन भी किया जाता है। संसार का लगभग 50% दिन उत्पादन इस क्षेत्र में किया जाता है। इस प्रदेश में जावा द्वीप का विकास अन्य द्वीपों की में अधिक हुआ है। यहाँ मत्स्यपालन भी समुद्र तटीय भागों में अधिक विकसित हुआ है।

          इक्वेडोर तुल्य उच्च पठारी क्षेत्रों में कृषि, पशुचारण, उत्खनन, लकड़ी काटना आदि प्रमुख व्यवसाय हैं। यहाँ की प्रमुख फसलें चावल, गन्ना, कपास, गेहूँ, तम्बाकू, फल, चाय व कहवा आदि हैं। इक्वेडोर व कोलम्बिया के पठारी क्षेत्र में सोने-चाँदी, मैगनीज व ताँबे की खानें पायी जाती हैं।

           सोने, चाँदी, ताँबे, नमक, ग्रेफाइट व टिन आदि के भण्डार पूर्वी अफ्रीका के पठारी क्षेत्रों में मिलते हैं। इस क्षेत्र में परिवहन के साधन भी अच्छी तरह से विकसित हैं।

           इस प्रदेश के अधिकांश नगर तटीय क्षेत्रों में समुद्री मार्गों पर बसे हुए हैं। मनाओस, बेलमपारा, बगोटा, नैरोबी, एका, लैगोस, स्टेनलेविले, लियोलिविले, लियोपोल्डविले, जकार्ता व सिंगापुर आदि प्रमुख नगर हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व के विषुवतरेखीय प्रदेशों या भूमध्य रेखीय प्रदेशों के मानवीय कार्य-कलापों का विवरण दीजिये।

अथवा, विषुवतरेखीय क्षेत्रों में मानवीय क्रियाकलापों का परीक्षण कीजिए। 

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