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4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना (Nebular Hypothesis of Laplace)

4. लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

(Nebular Hypothesis of Laplace)


लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

लाप्लास की निहारिका

              फ्रान्सीसी विद्वान लाप्लास ने अपना मत सन् 1796 ई० में व्यक्त किया, जिसका वर्णन उन्होंने अपनी पुस्तक ‘Exposition of the World System’ में किया है। यह परिकल्पना काण्ट के विचार से कुछ साम्य रखती है। लाप्लास ने काण्ट की कुछ गलतियों को दूर करके अपना संशोधित विचार व्यक्त किया।

            काण्ट की परिकल्पना के मुख्य तीन दोष थे:-

(1) निहारिका अथवा आद्य पदार्थ के कणों के टकराव से पर्याप्त ताप उत्पन्न नहीं हो सकता है।

(2) कणों के टकराव से गति नहीं हो सकती है।

(3) आकार में वृद्धि के साथ गति में वृद्धि नहीं हो सकती है।

            इन अशुद्धियों को दूर करने के लिए लाप्लास ने कुछ कल्पनायें की हैं, जिन पर आधारित होकर उनका सिद्धान्त आगे चलता है:-

(1) प्रथम समस्या अर्थात् निहारिका के ताप की समस्या हल करने के लिये उन्होंने यह मान लिया कि ब्रह्माण्ड में पहले से एक विशाल तप्त निहारिका (नेबुला ) थी।

(2) यह निहारिका प्रारम्भ से ही गतिशील थी।

(3) यह निहारिका निरन्तर शीतल होकर आकार में सिकुड़ती गयी।

            इस प्रकार उपर्युक्त तीन स्वयं के माने हुये तथ्यों के अनुसार अतीत काल में ब्रह्माण्ड में एक गतिशील एवं तप्त महापिण्ड था, जिसको लाप्लास ने निहारिका नाम दिया है। निहारिका की गति के कारण विकिरण द्वारा उष्मा का ह्रास होने लगा जिस कारण इसका बहिर्भाग शीतल होने लगा।

           इस प्रकार निहारिका के निरन्तर शीतल होने के कारण उसमें संकुचन होने लगा। परिणामस्वरूप निहारिका के आकार अथवा आयतन में ह्रास होने लगा। आयतन में कमी के कारण निहारिका की गति में निरन्तर वृद्धि होने लगी। यहाँ पर काण्ट की तृतीय गलती भी दूर हो जाती है। अत्यधिक गति के कारण केन्द्रापसारित बल (centrifugal force) के कारण निहारिका के मध्यवर्ती भाग के पदार्थ भारहीन होने लगे तथा मध्य भाग बाहर की ओर उभरने लगा।

               ऊपरी भाग निरन्तर शीतल होने के कारण अत्यधिक घना हो गया, परन्तु यह ऊपरी भाग निचले भाग के साथ भ्रमण नहीं कर सका। इस प्रकार ऊपरी भाग, निरन्तर शीतल होते तथा सिकुड़ते मध्य भाग से, छल्ला के रूप में पृथक होने लगा। कुछ समय बाद यह गोल छल्ला निहारिका से अलग होकर बाहर निकल आया तथा निहारिका का चक्कर लगाने लगा।

              लाप्लास के अनुसार निहारिका से केवल एक ही छल्ला बाहर निकला तथा बाद में यह छल्ला नौ छल्लों में विभाजित हो गया। (जबकि काण्ट के अनुसार निहारिका से ही नौ छल्ले निकले थे) तथा प्रत्येक छल्ला एक-दूसरे से दूर हटता गया। प्रत्येक छल्ले के समस्त पदार्थ ने एक स्थान पर गांठ के रूप में एकत्रित होकर ‘गर्म वायव्य ग्रन्थि’ (Hot gaseous agglomeration) का रूप धारण किया, जो आगे चलकर  शीतल होकर ठोस बन कर ग्रह बन गया।

           इस प्रकार नौ ग्रहों का निर्माण हुआ। इसी क्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उपग्रहों का आविर्भाव हुआ। निहारिका का अवशिष्ट भाग सूर्य बना।

लाप्लास की निहारिका परिकल्पना

          उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में फ्रान्सीसी विद्वान रॉस “(Roche) ने लाप्लास की परिकल्पना में संशोधन प्रस्तुत किया। लाप्लास के अनुसार निहारिका से निकले एक भारी छल्ले से कई पतले छल्ले बाहर निकल गये परन्तु रॉस ने बताया कि मुख्य निहारिका से ही कई पतले छल्ले क्रमश: अलग हो गये। प्रत्येक छल्ला घनीभूत होकर ग्रह बन गया। इसी क्रम के जारी रहने से समस्त ग्रहों की उत्पति हुई।

मूल्यांकन

      अपने सरल रूप के कारण लाप्लास की परिकल्पना को प्रारम्भ में पर्याप्त समर्थन मिला तथा लगभग 150 वर्षों तक इसका समादर (आदर) होता रहा। परन्तु सौर्य-मंडल सम्बन्धी नवीन वैज्ञानिक तथ्यों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश में आने के कारण इस परिकल्पना का समर्थन जाता रहा।

          इस परिकल्पना में न केवल पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या ही हल की गयी है, वरन् उसकी रचना तथा स्वभाव का भी वर्णन किया गया है। इसके अनुसार ग्रह प्रारम्भ में मौलिक रूप में वायव्य अवस्था में थे। तत्पश्चात् शीतल होते समय तरल अवस्था में आये एवं अन्त में ठोस भूपटल (solid crust) का निर्माण हुआ। परन्तु इस मत के विपरीत कुछ विद्वानों ने यह बताया है कि पृथ्वी अपनी उत्पत्ति एवं वृद्धि-काल से ही एक ठोस रूप में रही होगी।

          अधिकांश विद्वानों के अनुसार पृथ्वी के इतिहास में एक तरल अवस्था अवश्य रही होगी। अत: ‘निहारिका परिकल्पना’ का इस सम्बन्ध में पर्याप्त महत्व है। इस परिकल्पना के विरोध में निम्नांकित तथ्य प्रस्तुत किये जा सकते हैं-

(1) सौर्य-मण्डल के विभिन्न ग्रहों का वर्तमान ‘कोणीय आवेग’ (angular momentum), जो कि प्रारम्भ में मौलिक निहारिका में व्याप्त था, भ्रमण की अधिकता से निहारिका को तोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि निहारिका के मौलिक कोणीय आवेग से पदार्थ निहारिका से अलग नहीं हो सकता था।

             ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ (laws of conservation of angular momentum) के अनुसार मौलिक निहारिका का कोणीय आवेग, वर्तमान सूर्य एवं उसके सदस्य ग्रहों के कुल कोणीय आवेग के बराबर होना चाहिये, जबकि ऐसा न होकर सम्पूर्ण कोणीय आवेग का 98 प्रतिशत भाग ग्रहों तथा शेष 2 प्रतिशत भाग वर्तमान सूर्य में है। इस प्रकार यह परिकल्पना गणितीय सूत्रों के विपरीत है।

(2) निहारिका से 9 छल्ले ही क्यों निकले? नौ से अधिक भी छल्ले निकल सकते थे। इस समस्या का निदान लाप्लास की तरफ से नहीं मिलता है। घनीभवन के कारण एक छल्ले का सारा पदार्थ एक ही गोल पिण्ड के रूप में नहीं बदल सकता है। वस्तुत: छल्ला छोटे-छोटे कई टुकड़ों में टूट जायेगा तथा एक ही छल्ले से कई छोटे-छोटे स्वतंत्र ग्रह बनेंगे।

(3) निहारिका के कणों की ”अल्प पारस्परिक संलग्नता” (small degree of cohesion between the particles of nebula) के द्वारा छल्लों के निकलने का क्रम जारी रहेगा तथा उस क्रिया में अवकाश नहीं हो सकता।

(4) यदि ग्रहों की उत्पत्ति निहारिका से हुई तो प्रारम्भ में वे द्रवित अवस्था में रहे होंगे। परन्तु द्रवित अवस्था में ग्रह निर्बाध रूप से परिभ्रमण तथा परिक्रमा नहीं कर सकते क्योंकि द्रव के विभिन्न स्तरों की गति समान नहीं होती और उनमें घर्षण होता रहता है। केवल ठोस पिण्ड ही पूर्णरूपेण  परिभ्रमण तथा परिक्रमा कर सकता है।

(5) इस परिकल्पना के अनुसार सभी ग्रहों के उपग्रहों को अपने पिता ग्रहों की दिशा में ही घूमना चाहिए। इस तथ्य के विपरीत शनि तथा वृहस्पति के उपग्रह अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में भ्रमण करते हैं। सम्भवत: लाप्लास की परिकल्पना के समय तक केवल ऐसे ही उपग्रहों का पता लग पाया था जो अपने पिता ग्रह के चारों तरफ घूमते थे। बाद में चलकर ऐसे अन्य उपग्रहों की खोज हुई जो कि अपने पिता-ग्रह के विपरीत दिशा में घूमते हैं।

(6) यदि सूर्य, निहारिका का ही एक भाग है तो तरल अवस्था में होने के कारण इसके बीच में उभार होना चाहिए जिससे यह मालूम पड़ता हो कि एक नवीन छल्ला पृथक् होकर बाहर निकलने ही वाला है। पर ऐसा नहीं देखा जाता है।

(7) लाप्लास यह मानकर चलते हैं कि प्रारम्भ में एक गतिशील तथा तप्त निहारिका थी, पर यह निहारिका कहाँ से आयी? उसमें उष्मा तथा गति कैसे पैदा हुई? इन प्रश्नों का उत्तर इस परिकल्पना से नहीं मिल पाता है।

            इस प्रकार यह कहा जाता है कि लाप्लास की यह परिकल्पना कल्पना मात्र ही है। उपर्युक्त त्रुटियों के आधार पर यह प्रमाणित किया जाता है कि यह ‘निहारिका परिकल्पना’ पृथ्वी की उत्पति के विषय में गलत धारणा तो प्रस्तुत करती ही है, साथ ही साथ पृथ्वी के इतिहास तथा उसके भूगर्भ के विषय में भी गलत तथ्यों का प्रचार करती है। वर्तमान समय में यह परिकल्पना मान्य नहीं है।

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना (Kant’s Gaseous Hyphothesis)

3. काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना

(Kant’s Gaseous Hyphothesis)


काण्ट की वायव्य राशि परिकल्पना 

काण्ट की वायव्य राशि

      पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जर्मन दार्शनिक काण्ट ने सन् 1755 ई० में अपनी ”वायव्य राशि परिकल्पना” का प्रतिपादन किया जो कि न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियमों पर आधारित थी। प्रारम्भ में इस मत की सराहना हुई, परन्तु बाद में इसे तर्कहीन प्रमाणित कर दिया गया, क्योंकि यह मत गणित के गलत नियमों पर कल्पित किया गया था।

       प्रस्तुत परिकल्पना काण्ट द्वारा कल्पित अनेक तथ्यों पर आधारित है। सर्वप्रथम काण्ट ने यह मान लिया कि प्राचीन काल में (अतीत काल में) ब्रह्माण्ड में दैवनिर्मित आद्य पदार्थ (Premordial matter) बिखरे हुए थे। प्रारम्भ में ये पदार्थ अत्यन्त कठोर, शीतल तथा गतिहीन थे।

       पुनः काण्ट ने यह मान लिया कि आपसी आकर्षण के कारण ये कण (आद्य पदार्थ) एक-दूसरे से टकराने लगे। इस आपसी टकराव के कारण ताप तथा भ्रमण गति का आविर्भाव हुआ। ताप में निरन्तर वृद्धि होती गयीं, जिस कारण आद्य पदार्थ एक वायव्य राशि में परिवर्तित होने लगे। ताप तथा भ्रमण गति (Rotation) के परिणामस्वरूप प्रारम्भिक शीतल तथा गतिहीन वायव्य पदार्थ एक तप्त तथा गतिशील निहारिका (Nebula) में परिवर्तित हो गया। निहारिका ताप के आविर्भाव के साथ ही घूमने लगी, उसके आकार में वृद्धि होने लगी, जिस कारण ताप में वृद्धि से निहारिका की परिभ्रमण गति में भी वृद्धि होने लगी।

       इस प्रकार निहारिका इतनी तीव्र गति से घूमने लगी कि केन्द्रापसारित बल (केन्द्र से बाहर की ओर जाने वाला बल-Centrifugal force) के प्रभाव से निहारिका के मध्य भाग में उभार आने लगा तथा इस क्रिया की तीव्रता के कारण (अर्थात् केन्द्रापसारितबल की तीव्रता के कारण) पदार्थ का एक छल्ला निहारिका से बाहर निकल गया।

      इसी क्रिया की पुनरावृत्ति (Repetition) के कारण पदार्थ के नौ (9) गोल छल्ले निहारिका से अलग हो गये। धीरे-धीरे एक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर एकत्रित होकर एक गाँठ के रूप में शीतल होकर जमकर ठोस हो गये। इस तरह नौ छल्लों से (गाँठ के रूप में) नौ ठोस पदार्थों का निर्माण हुआ, जो कि आगे चलकर नौ ग्रह के रूप में बदल गये।

काण्ट की वायव्य राशि

            इस प्रकार काण्ट के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति, केन्द्रापसारित बल द्वारा निहारिका से अलग हुये छल्ले के पदार्थों के एक स्थान पर गाँठ के रूप में जमकर ठोस होने से हुई। मौलिक निहारिका का जो भाग अवशिष्ट रह गया, वह सूर्य के रूप में परिवर्तित हो गया।

         उपर्युक्त प्रक्रिया की पुनरावृत्ति के कारण ग्रहों से उनके उपग्रहों का निर्माण हुआ अर्थात् नव-निर्मित गतिशील ग्रहों से केन्द्रापसारित बल के प्रभाव से पदार्थों के वलयाकार छल्ले अलग हो गये, जिनमें से प्रत्येक छल्ला के सभी पदार्थ एक स्थान पर घनीभूत होकर उपग्रह (Satellite) बन गये। इस तरह सम्पूर्ण सौर्य-मंडल का आविर्भाव हुआ।

आलोचना (Criticism):-

           यद्यपि काण्ट महोदय ने पृथ्वी की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए विज्ञान के तथ्यों का सहारा लिया था तथापि इनका मत वर्तमान समय में आधारहीन प्रमाणित कर दिया गया है, क्योंकि इस पकिल्पना के निम्नलिखित कई तथ्य गणित के नियमों के विपरीत हैं:-

(1) सर्वप्रथम यह आरोप लगाया जाता है कि कणों के आपसी टकराव से भ्रमण गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इस प्रकार निहारिका की निरन्तर गति-वृद्धि त्रुटिपूर्ण है।

(2) काण्ट की यह परिकल्पना कि आद्य पदार्थ में गति कणों के आपसी टकराव से हुई, जो कि ”कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त” (Laws of conservation of angular momentum) के विपरीत है, क्योंकि आपसी टकराव से गति नहीं उत्पन्न हो सकती है।

(3) काण्ट की यह धारणा कि निहारिका के आकार में वृद्धि के साथ गति भी बढ़ती गयी जो कि इस सिद्धान्त के विपरीत है, क्योंकि ‘कोणीय आवेग की स्थिरता के सिद्धान्त’ के अनुसार यदि किसी पिंड का आकार बढ़ता है तो गति घटती है और यदि आकार बढ़ता है तब गति घटती है।

निष्कर्ष:

          निष्कर्षत: कहा जा सकता है की वह मूल आधार ही, जिस पर काण्ट की परिकल्पना आधारित है, गलत प्रमाणित किया जाता है। काण्ट की परिकल्पना का महत्व इस बात में है कि उन्होंने इस क्षेत्र में प्रयास करके आगे आने वाले विद्वानों के लिए मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह परिकल्पना आगे चलकर लाप्लास की निहारिका परिकल्पना की आधारशिला बनी।

1. Nature and Scope of ​​Geomorphology (भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

Nature and Scope of ​​Geomorphology  

(भू-आकृति विज्ञान की प्रकृति और विषय क्षेत्र)

     स्थलमण्डल के दृश्य भागों अर्थात् स्थलरूपों का वैज्ञानिक अध्ययन भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है, इसलिए भू-आकृति विज्ञान को स्थलरूपों का विज्ञान कहते हैं। भू-आकृति विज्ञान के लिए अंग्रेजी में प्रयुक्त किये जाने वाले Geomorphology शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ (Geo-पृथ्वी, morphi-रूप और logos-वर्णन) भी स्थलरूपों के अध्ययन से सम्बन्धित है।

Nature and Scope of ​​Geomorphology

      इस विज्ञान के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले उच्चावचनों को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) प्रथम श्रेणी के उच्चावचन-

        इसके अन्तर्गत महाद्वीप तथा महासागरीय बेसिन को सम्मिलित करते हैं। इनके वितरण, वर्तमान प्रारूप तथा उत्पत्ति का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय श्रेणी के उच्चावचन–

       इसके अन्तर्गत पृथ्वी के अन्तर्जात बलों द्वारा उत्पन्न रचनात्मक स्थलाकृतियों यथा पर्वत, भ्रंश, पठार, मैदान तथा झीलों का अध्ययन सम्मिलित है। इन स्थलाकृतियों के अध्ययन के लिए पृथ्वी के अन्तर्जात बलों तथा प्रक्रमों के स्वरूप तथा क्रियाविधि का अध्ययन भी आवश्यक होता है।

(iii) तृतीय श्रेणी के उच्चावचन-

      इसके अन्तर्गत बहिर्जात प्रक्रमों (वायुमंडल से उत्पन्न यथा– जल, सरिता, सागरीय जल, भूमिगत जल, पवन, हिमनद एवं परिहिमानी) द्वारा अपक्षय, अपरदन एवं निक्षेपण द्वारा जनित स्थलरूपों की आकारिकी, उत्पत्ति एवं विकास का गहन अध्ययन किया जाता है इन स्थलरूपों को निर्मित्त, प्रभावित एवं परिमार्जित करने वाले प्रक्रमों को सम्मिलित रूप में अनाच्छादनात्मक प्रक्रम (Denudational Processes) कहते है जिसके अंतर्गत अपक्ष्य (Weathering) तथा अपरदन (Erosion, निक्षेपण भी) को सम्मिलित करते है।

थार्नबरी के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलरूपों का विज्ञान है, परन्तु इसमें अन्तः सागरीय रूपों के अध्ययन को सम्मिलित किया जाता है।

स्ट्राहलर के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान भौतिक भूगोल का एक प्रमुख अंग है जो सभी प्रकार के स्थलरूपों की उत्पत्ति तथा उनके व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध विकास की व्याख्या करता है।

ए. एल. ब्लूम के अनुसार- भू-आकृति विज्ञान स्थलाकृतियों तथा उन्हें परिवर्तित करने वाले प्रक्रमों का क्रमबद्ध वर्णन एवं विश्लेषण करता है।

बारसेस्टर महोदय ने इसे पृथ्वी के उच्चावचों का व्याख्यात्मक वर्णन करने वाला विज्ञान कहा है। यह भू-पटल के विभिन्न रूपों, उनकी उत्पत्ति, इतिहास तथा विकास की व्याख्या करता है।

       निष्कर्षतः भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसमें न केवल स्थलरूपों के आकार (आकृति) का अध्ययन किया जाता है अपितु इन स्थलरूपों पर क्रियाशील अपरदनात्मक एवं निक्षेपणात्मक प्रक्रमों की भी व्याख्या समयानुसार क्रमबद्ध विकास के आधार पर की जाती है।

           ज्ञातव्य है कि भू-आकृति विज्ञान में पृथ्वी सतह पर विद्यमान स्थलरूपों का, उनके ऐतिहासिक विकास क्रम का तथा उन प्रक्रमों का अध्ययन किया जाता है जिनसे स्थलरूपों का निर्माण होता है। इन प्रक्रमों में विवर्तनिक शक्तियाँ (उत्थान, अवतलन) अपक्षय, अपरदन, परिवहन और निक्षेपण महत्वपूर्ण हैं।

          भौतिक भूगोल और भूविज्ञान (Earth Sciences) दोनों से ही भू-आकृति विज्ञान घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों का स्थानिक पैमाने पर (उर्मिकाओं से लेकर पर्वतों तक) और कालिक पैमाने पर (सैकण्ड से लेकर लाखों वर्षों तक) अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः स्थलरूप, जिन पदार्थों से बने हैं (शैल और आवरण सामग्री) तथा जो प्रक्रम एवं बल इन पदार्थों पर क्रियाशील रहते हैं, के बीच सन्तुलन के प्रतीक हैं।

           अपक्षय और अपरदन के प्रक्रम सम्मिलित रूप से क्रियाशील रहकर जहां एक ओर स्थलरूपों का विनाश करते हैं वहीं दूसरी ओर वे स्थलरूपों का सृजन अथवा निर्माण करते हैं। उल्लेखनीय है कि पृथ्वी सतह पर तल शैल अथवा आधार प्रस्तर (Bedrock) और मिट्टी जैसे निष्क्रिय पदार्थों पर जलवायु और भूपृष्ठीय गतियां (Crustal Dynamics) जैसे क्रियाशील कारकों के सक्रिय होने से स्थलरूपों का निर्माण होता है। विभिन्न प्रकार के भू-आकृति प्रक्रमों में गुरुत्व बल महत्वपूर्ण चालक शक्ति होती है।

           गुरुत्व बल के अतिरिक्त सूर्यताप तथा पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भी भू-आकृतिक प्रक्रमों के संचालन में सहायक होती है। पृथ्वी के आन्तरिक भाग में विद्यमान ऊर्जा भ्रंशन क्रिया को जन्म देती है। इस दृष्टि से पृथ्वी की उत्पत्ति, आकार, सौरमण्डलीय सम्बन्धों, गतियों, शक्तियों तथा प्रक्रियाओं का अध्ययन भी भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

         भूदृश्य या दृश्यभूमि के मानव कल्याणकारी उपयोग हेतु स्थलरूपों का अध्ययन एवं उनका सम्यक ज्ञान एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई है, विशेषकर वर्तमान समय में जबकि भूदृश्य में होने वाले कुछ परिवर्तन मानव एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए विपत्तिकारक बन चुके हैं। इसी कारण से वर्तमान में मानवीय कार्यों के भू-आकृतिक प्रक्रमों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन भी इसके अन्तर्गत किया जाने लगा है।

विषय क्षेत्र:-

         विकासवादी भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों के विकास क्रम का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। इसी के अन्तर्गत क्षेत्र के भू-आकृतिकीय विकास की प्रमुख घटनाओं का तिथिकरण किया जाता है।

         डेविस ने स्थलरूपों के विकास क्रम को अपरदन चक्र के द्वारा समझाया है, जिसमें तीव्र ढाल समय के साथ अन्ततः धीमे ढाल वाले पेनीप्लेन में बदल जाता है। अन्य भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं, जिन्हें अनाच्छादन कालक्रम विज्ञानवेत्ता (Denudation Chronologists) कहा जाता है, ने बताया है कि किस तरह प्रादेशिक स्थलरूप समय के साथ हुए अपरदन एवं भूपृष्ठीय सतह के उत्थान की तीव्रता अथवा दर के अनुरूप विकसित हुए हैं। इन्होंने भूतकाल की अपरदनात्मक सतहों पर तिथिकरण द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाने का प्रयास किया।

         कुछ भू-आकृति विज्ञानवेत्ताओं ने परिवर्तित जलवायु के प्रभावों द्वारा स्थलरूपों के विकास को समझाया है। जलवायवीय भू-आकृति विज्ञान में स्थलरूपों और उनके ऊपर क्रियाशील भू-आकृतिक प्रक्रमों को प्रादेशिक जलवायवीय दशाओं से सम्बन्धित कर अध्ययन किया जाता है। जैसे ठण्डे क्षेत्रों में विद्यमान जलवायवीय दशाओं में हिमनद एक प्रभावी भू-आकृतिक प्रक्रम है जो भूदृश्य में परिवर्तन लाता है। इसी प्रकार वनस्पति विहीन रेगिस्तानी क्षेत्रों में पवन प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रम है।

           चट्टानों के प्रकार और भूगर्भिक संरचना (जैसे भ्रंश और वलन) के स्थलरूपों पर प्रभावों का अध्ययन संरचनात्मक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। अधिकांश भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाशीलता चट्टानों की कठोरता और कोमलता से प्रभावित होती है। इसी तरह अधिकांश ढाल रूप चट्टानों की कठोरता और विन्यास (Disposition) के अनुरूप विकसित होते हैं। स्थलरूपों पर क्रियाशील प्रक्रमों (जैसे अपक्षय, अपरदन) की तीव्रता और प्रकृति का अध्ययन प्रक्रम भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है। इसी में नदी बेसिनों और पहाड़ी ढालों पर होने वाले शैल पुंज प्रवाह (Mass Wasting) का अध्ययन किया जाता है। इन गतिशील प्रक्रमों की क्रियाविधि पर मानव के क्रियाकलापों से उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन जैव-भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        मानव ने अपनी गतिविधियों के द्वारा विभिन्न भू-आकृतिक प्रक्रमों की क्रियाविधि में परिवर्तन ला दिया है। भूमि उपयोग में परिवर्तन तथा वन विनाश से मृदा अपरदन बढ़ा है। इसी प्रकार अम्ल वर्षा से शैलों के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हुई है। मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए भू-आकृति विज्ञान के व्यावहारिक ज्ञान के उपयोग का अध्ययन व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान में किया जाता है।

        आज सम्पूर्ण विश्व में तटीय भागों में अपरदन, हिमनदों का पिघलना और उनकी गति का तीव्र होना, भूस्खलन, जल संयोजकों का अपरदन, बांधों में अवसादों का जमाव, मरुद्यानों और परिवहनों मार्गों पर बालुका स्तूपों का विस्तार, उत्खात भूमि का विस्तार, आदि जैसे समस्याओं की मॉनीटरिंग, पहचान और प्रबन्धन में व्यावहारिक भू-आकृति विज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-आकृति विज्ञान को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

11. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ


संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएँ

संथाल जनजाति

                   भारतीय जनजातियों में संथाल अपने परम्परावादी सामाजिक संगठन, हिन्दू रीती-रिवाज के अनुसार मृतक एवं शादी संस्कार और अनेक प्रकार के आर्थिक कार्यों के कारण अपनी पहचान बनाये हुए हैं। ये कृषि, पशुपालन, वन, वस्तु-संग्रह, आखेट और नौकरी अनेक आर्थिक कार्य करते हैं। श्रमिक के रूप में इनका मौसमी स्थानान्तरण दूर-दराज के मैदानी भागों में होता है जहाँ वे कृषि और अन्य निर्माण कार्यों में काम करते हैं और पुनः अपने क्षेत्र में लौट आते हैं। इससे प्रकट होता है कि इन्हें अपनी मिट्टी से बहुत लगाव होता है।

            संथाल बारह गोत्रों में बँटे हुए हैं यथा-हल्डाक, विस्कृ, भरमू, हेमब्रायी, भारण्डी, सरेन, टूड, बैसर, वास्के, बेडिंम, चोरे तथा पैरिया। प्रत्येक गोत्र की अपनी परम्परा होती है और बहुधा एक गोत्र के लोग एक गाँव में रहते हैं। अनुमानतः संथालों की संख्या 30 लाख से अधिक है जिसका अधिकांश झारखंड के संथाल परगना में निवास करते हैं। अपने रूप-रंग भाषा और परम्परा से ये मलाया, जावा और हिंदेशिया के आदिवासियों से मिलते जुलते हैं। कहा जाता है कि संथाल यहाँ के आदिवासी हैं।

               इनका काला रंग, औसत कद, सामान्य नाक-नक्शा द्रविड़ प्रजाति के निकट है जिसे कोल के नाम से जाना जाता है। ये शरीर से चुस्त और मन से भोले-भाले किन्तु सच्चे और सहिष्णु होते हैं। यही कारण है कि मैदानी भागों में आसानी से खप जाते हैं। अपनी रोटी के लिए संथाल बड़ी संख्या में बिहार, बंगाल, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में स्थानान्तरण करते हैं। इनका पूरा परिवार साथ-साथ प्रवास करता है।

निवास क्षेत्र:-

            संथाल जनजाति के लोग बंगाल की वीर-भूमि उड़ीसा के कटक और झारखंड के पलामू, हजारीबाग, राँची और संथाल परगना आदि जनपदों में पाये जाते हैं। इनके निवास का प्रमुख क्षेत्र बिहार का संथाल परगना राँची पठार का भाग है जिसकी औसत ऊँचाई 200 से 250 मी० के मध्य है। यह पठारी भाग उत्तर एवं दक्षिण में राजमहल की पहाड़ियों से घिरा हुआ है।

          पठार लावा निक्षेपण के कारण लगभग समतल है। लेकिन बीच-बीच में पहाड़ियों और नदी घाटियों के कारण एकबद्ध नहीं हैं। ब्राह्मणी, युआनी, अजय एवं मोर प्रमुख नदियाँ हैं जिनकी तलहटी जलोढ़ के कारण काफी उपजाऊ है। पठार एवं पहाड़ी ढाल वनों से आच्छादित है क्योंकि वहाँ पर्याप्त वर्षा होती है जिसका औसत 150 से०मी० से अधिक है। ऐसे भौगोलिक परिवेश में संथाल उपयुक्त भूमि पर कृषि करते हैं जहाँ कृषि भूमि नहीं है वहाँ वन वस्तु-संग्रह आखेट और पशुपालन से अपना जीवन-यापन करते हैं।

शारीरिक लक्षण:-

          संथाल जनजाति का कद औसतन कम, इनका मुँह बड़ा, मोटे होठ, लम्बा सिर, चौड़ी नाक तथा बाल घुंघराले होते हैं।

अर्थव्यवस्था:-

      आदिवासी लोग आज के विज्ञान के युग में भी अधिकांशतया प्रकृति पर  ही आश्रित हैं। हजारों वर्षों से उनकी सम्पत्ति के मुख्य स्रोत जंगल, पहाड़, घाटियाँ एवं नदियाँ ही रही हैं। जंगलों तथा पहाड़ों से खाद्य-संग्रह करना, नदियों तथा तालाबों से मछली पकड़ना तथा कहीं-कहीं घाटियों व अन्यत्र पहाड़ी ढालों पर कृषि करना ही उनकी आजीविका के प्रमुख साधन रहे हैं।

       संथाल लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। कृषि उत्पादन की कमी को आखेट द्वारा पूरा किया जाता है। ये मुख्यतः मोटे अनाजों की फसलें उगाते हैं। ये लोग वनों को काटकर खेती योग्य भूमि प्राप्त करते हैं तथा उनका प्रयोग बसने के रूप में भी करते हैं। पूर्णतः कृषि से जीवन-निर्वाह न चलने के कारण ये लोग चाय के बागों, मिलों तथा खानों में मजदूरी करते हैं।

संथाल जनजाति में विवाह:-

          संथालों में विवाह शब्द ‘बाप्ला’ नाम से जाना जाता है। अपने हो वंश में विवाह इन लोगों में निषेध है। ये किसी भी अन्य वंश में विवाह कर सकते हैं। यह प्रचलित प्रथा है कि तीन पीढ़ी के बाद आपस में विवाह सम्पन्न किया जा सकता है। लेकिन कभी-कभी कुछ वंशों में विवाह परम्परागत संघर्षो की वजह से निषिद्ध माना जाता है, जिसका ये लोग आज भी पालन करते हैं। अक्सर विवाह में लड़कियों को वरण का अवसर मिलता है।

          विवाह विशिष्ट दो प्रकारों से ही सम्पन्न होता है। प्रथम, वह जिसमें विवाह ‘रैबर’ (Marriage Maker) के द्वारा तय किया जाता है, जिसका प्रचलन आजकल बढ़ गया है। दूसरी प्रथा, जिसमें विवाह बिना ‘रैबर’ की सहायता के लड़के तथा लड़की के माता-पिता अथवा स्वयं लड़के-लड़की निश्चय करते हैं।

धर्म एवं जादू:-

         संथालों में धर्म का महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है, जिसने सम्पूर्ण जनजाति को सामाजिक एकता के सूत्र में रखने का प्रयत्न किया है। जादू के द्वारा उस अज्ञात रहस्यमय शक्ति पर नियंत्रण तथा प्रभुत्व रखा जाता है जो कि हानिकारक सिद्ध हो सकती है। विभिन्न प्रकार के धार्मिक प्रकार्यों के लिये अलग-अलग व्यक्ति होते हैं जिन्हें भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है जैसे- ओझा, जगुरु, कामरुगुरु, रेरेनिक, अतोनेक, कुदामनेक तथा देहरी।

            प्राकृतिक कारणों से बीमार व्यक्ति का उपचार करने वाला व्यक्ति रेरेनिक कहलाता है अथवा जड़ी-बूटी वाला डाक्टर कहा जाता है। जब यह व्यक्ति उपचार करने में सफलता नहीं प्राप्त कर सकता है तो फिर उन लोगों को उपचार करने के लिये बुलाया जाता है जिन्हें ‘बोंगा’ का समर्थन प्राप्त होता है तथा जनगुरु अथवा ओझा को भी बुलाया जाता है, जो जड़ी-बूटी के अतिरिक्त जादुई शक्ति से बीमार व्यक्ति को ठीक करने का प्रयत्न करते हैं।

 

प्रश्न प्रारूप

1. संथाल जनजाति के वास स्थान, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप

10. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप



 गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलाप

गोंड जनजाति

          गोंड मध्य प्रदेश की सबसे महत्त्वपूर्ण जनजाति है जो प्राचीनकाल में उस क्षेत्र में रहती थी जिसे गोंडवानालैण्ड कहते हैं। यह एक स्वतंत्र जनजाति थी।

निवास क्षेत्र:-

           गोंड जनजाति के वर्तमान निवास स्थान मध्य प्रदेश के पठारी भाग (जिसमें छिन्दवाड़ा, बैतूल, सिवनी और मांडला के जिले सम्मिलित है) छत्तीसगढ़ मैदान के दक्षिणी दुर्गम क्षेत्र (जिसमें बस्तर जिला सम्मिलित है), छत्तीसगढ़ और गोदावरी एवं वेनगंगा नदियों के पर्वतीय क्षेत्रों के अतिरिक्त बालाघाट, बिलासपुर, दुर्ग, रायगढ़ एवं रायसेन जिलों में है। इनका सर्वाधिक जमाव मध्य प्रदेश में मध्यवर्ती पहाड़ी एवं वनाच्छादित पठारों तथा सतपुड़ा पर्वत के पूर्वी और दक्षिणी अगम्य क्षेत्रों में पाया जाता है। इनका निवास क्षेत्र 17°46′ से 23°22′ उत्तरी अक्षांश और 80°15′ तथा 82°15′ पूर्वी देशान्तरों के बीच है।

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ:-

           गोंडों का निवास क्षेत्र पूर्णतः पहाड़ी और वनाच्छादित है। ऊँची-नीची भूमि, वनस्पति एवं पशुओं का गोंडों के जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। एकान्त में रहने से ये पिछड़े हुए किन्तु ईमानदार और सरल चित्त, उदार, साहसी एवं चतुर और स्पष्टवादी होते हैं। ये आलसी नहीं होते किन्तु परिस्थितियों ने इन्हें निष्क्रिय अवश्य बना दिया है। वनों से जंगली कन्दमूल फल, गृह निर्माण और टोकरियाँ बनाने के लिए अनेक प्रकार की बेंते एवं शराब बनाने के लिए महुआ, ताड़, खजूर आदि का रस प्राप्त किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में लोहा मिलने से ये उसे पिघलाकर सामान्य औजार भी बना लेते हैं।

शारीरिक गठन:- 

            गोंड लोग काले तथा गहरे रंग के होते हैं। उनका शरीर सुडौल होता है किन्तु अंग भद्दे होते हैं। बाल मोटे, गहरे और घुंघराले, सिर गोल, चेहरा अण्डाकार, आँखे काली, नाक चपटी, ओठ मोटे, मुँह चौड़ा, नथुने फैले हुए, दादी एवं मूँछ पर बाल कम कद 165 सेमी० होता है। गोंडों की स्त्रियाँ पुरुषों की तुलना में कद में छोटी, शरीर सुगठित एवं सुन्दर रंग पुरुषों की अपेक्षा कुछ कम काला, होठ मोटे, आँखें काली और बाल लम्बे होते हैं। 

 

बस्तियाँ और घर:-

           गोंडों के घर और बस्तियों के बसाव में सामान्यतः दो बातों का ध्यान रखा जाता है-भौगोलिक अनुकूल स्थिति एवं जल प्राप्ति की सुविधा।

         ये पठारों, मैदानों, ऊँचे-नीचे पहाड़ी ढालों तथा निम्न मैदानी भागों में बनाये जाते हैं जहाँ प्राकृतिक रूप से सुरक्षा मिल सके। इनके खेतों के निकट ही जल के स्रोत उपलब्ध हों। गाँव की स्थिति में वनों की निकटता का महत्व अधिक होता है क्योंकि इसी से इन्हें लकड़ियों, कन्द-मूल फल एवं शिकार की प्राप्ति करने की सुविधा होती है।

         गोंडों की सभी झोंपड़ियाँ आँगन के चारों ओर बनायी जाती हैं। नयी झोपड़ियाँ फसल कटाई के बाद और पुरानी झोंपड़ियों की मरम्मत वैशाख महीने में की जाती है।

भोजन:-

            गोंड अपने वातावरण द्वारा प्रस्तुत भोजन-सामग्री पर अधिक निर्भर रहते हैं। इनका मुख्य भोजन कोदों और कुटकरी मोटे अनाज होते हैं जिन्हें पानी में उबालकर झोल (Broth) या राबड़ी अथवा दलिये के रूप में दिन में तीन बार खाया जाता है-प्रातःकाल, मध्यान्ह और राधि में।

          रात्रि में चावल अधिक पसन्द किये जाते हैं। कभी-कभी कोदों और कुटकी के साथ सब्जी एवं दाल का भी प्रयोग किया जाता है। कोदों के आटे से रोटी (गोदाला) भी बनायी जाती है। महुआ, टेंगू और चर के ताजे फल भी खाये जाते हैं। आम, जामुन, सीताफल और आँवला तथा अनेक प्रकार के कन्द-मूल भी खाने के लिए काम में लाये जाते हैं। रोटी को तेल से चुपड़ते हैं। सब्जियों में कद्दू, ककड़ी, चने की पत्तियाँ, रतालू, इमली तथा आम मुख्य होते हैं। बाँस की कॉपल कुकरमुत्ता, प्याज, लहसुन, मिर्च आदि का भी उपयोग किया जाता है। चावल, उबली हुई दाल और मसाले मुख्यतः उत्सवों व दावतों के अवसर पर ही अधिक काम में लेते हैं। कन्द-मूल और लाल चीटियाँ इनके प्रिय खाद्य पदार्थ हैं।

          मैदानी क्षेत्रों में शिकार से प्राप्त सुअर, गाय, बकरी, बतख, कुत्ते, हिरण, मगरमच्छ, साँप, कबूतर आदि का माँस बड़े शौक से खाया जाता है। ये लोग चूहे, गोह, गिलहरी का माँस भी खाते हैं। जिन क्षेत्रों में मछलियाँ मिल जाती हैं, वहाँ मछलियाँ भी खायी जाती हैं। ये लोग भोजन में कन्द-मूल, पशु-पक्षी, सभी का उपयोग करते हैं। इनमें मद्यपान का प्रचलन अधिक है। विवाह और उत्सवों के अवसर पर विशेष रूप से शराब पी जाती है।

             महुआ के फूलों से मंडिया, ताड़ और खजूर के रस से ताड़ी (Toddy) और चावल से लोंगा शराब का प्रचलन अधिक है। गाँजा, भाँग, तम्बाकू, पान, सुपारी खाने का भी काफ रिवाज है। तम्बाकू मिट्टी या पत्तों से बनी चिलम से पी जाती है। गाय, भैंस और बकरी का दूध भी पिया जाता है। वनों से प्राप्त शहद का भी प्रयोग करते हैं।

वस्त्राभूषण:-

        आरम्भ में गोंड लोग या तो पूर्णतः नंगे रहते थे अथवा पत्तियों से अपने शरीर को ढँक लेते थे। अब वे वस्त्रों का प्रयोग करने लगे हैं किन्तु वस्त्र कम ही होते हैं। अधिकांश पुरुष लंगोटी से अपने गुप्तांगों एवं जांघों को ढँक लेते हैं। कभी-कभी सिर पर एक अंगोछे प्रकार का कपड़ा भी बाँध लेते हैं। कुछ लोग पेट और कमर ढँकने के लिए अलग से पिछ लपेट लेते हैं। स्त्रियाँ धोती पहनती हैं जिससे शरीर के ऊपर और नीचे का भाग ढँक जाता। ये चोली नहीं पहनतीं छातियाँ खुली रहती हैं। 7-8 वर्ष तक के बालक नंगे रहते हैं तथा 5-6 साल की लड़कियाँ लंगोटी बाँधे रहती हैं। वर्षा से बचाव के लिए बरसाती कोट और टोप भी उपयोग किया जाता है जो पतियों और बाँस की खपच्चियों का बना होता है।

                सर्दियों में शरीर को ढँकने के लिए ऊनी कम्बल काम में लाया जाता है। अपने शरीर को सजाने के लिए राख तथा रंगों से इसे पोत लेते हैं। अनेक प्रकार के पशुओं और बतखों के पंखों को सिर पर लगा लेते हैं। पुरुषों के बाल लम्बे होते हैं। बैलों के सींगों से भी सिर को सजाया जाता है। पुरूष गले में सफेद या लाल मोतियों की माला और कानों में बालियाँ पहनते हैं तथा बालों में कंघी खोंसे रहते हैं। स्त्रियाँ अपने चेहरे, जाँघों तथा हाथों पर गोदने गुदवाती हैं। ये नकली बालों के जूड़े में फूल लगाती हैं तथा उसमें सीगों की कंघियाँ अनिवार्य रूप से लगाती हैं। कमर में पीतल की छोटी-छोटी घण्टियों वाली कमरधनी पहनी जाती है, कानों में बालियाँ पहनी जाती हैं। हाथों में काँच की चूड़ियाँ या चाँदी के दस्तबन्द पहने जाते हैं।

           उत्सव अथवा पर्व के समय स्त्री-पुरुष आकर्षक रूप से अपने शरीर को प्राकृतिक वस्तुओं द्वारा सजाते हैं। नृत्य के समय विशेष प्रकार की पोशाक पहनी जाती हैं। ढोल, नगाड़े, बाँसुरी इनके प्रमुख वाद्य यंत्र होते हैं।

आर्थिक क्रियाकलाप:-

            गोंडों का प्राचीन व्यवसाय शिकार करना और मछली मारना था किन्तु अब पशुओं के शिकार पर रोक लगा दिये जाने से चोरी-छिपे शिकार किया जाता है। पहले चीतों, जंगली भैसों, हिरणों और चिड़ियों का शिकार अधिक किया जाता था, अब प्रायः हिरणों, खरगोशों और जंगली भैसों का ही शिकार अधिक किया जाता है। सामान्यतः शिकार के लिए विष बुझे तीरों का प्रयोग किया जाता है, केवल खरगोश आदि के लिए जालों और फन्दों का उपयोग किया जाता है। गोंडों को जंगली पशु-पक्षियों के विभिन्न रूपों और आदतों का पूरा ज्ञान होता है। अतः उन्हें शिकार में पूरी सफलता मिलती है। स्त्रियाँ शिकार को शोर-गुल मचाकर नदियों की घाटियों में खदेड़ लाने का काम करती हैं।

           अन्य बड़े जंगली पशुओं को फँसाने के लिए कई तरकीबें की जाती हैं। खेतों के चारों ओर बाँस का घेरा खींच दिया जाता है और एक स्थान पर मुख्य द्वार छोड़ देते हैं और दूसरे स्थान पर सँकरा रास्ता जिसके सामने एक लम्बा गड्ढ़ा खोदकर उसे टहनियों, पत्तियों, घास-फूस से पाटकर उस पर बालू मिट्टी डाल देते हैं। रात्रि में जब पशु खेत में घुस जाता है तो रक्षा करते हुए खेत का मालिक चिलाता है जिससे पशु घबड़ाकर सँकरे मार्ग की ओर भागता है और वहाँ बने गढ्ढे में गिर जाता है। चूहों और बन्दरों को भी मारा जाता है।

          मछलियाँ सामान्यतः तालाबों और नदियों में मुख्यतः मारिया गोंड़ों द्वारा टोकरियों, जाल और बाँसों के सहारे पकड़ी जाती हैं। मछली पकड़ने का कार्य सभी वयस्कों द्वारा व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से किया जाता है। अनेक बार नदियों के जल को जहरीला कर दिया जाता है जिससे मछलियाँ मर जाती हैं और स्त्रियाँ उन्हें निकाल लेती हैं।

            वनों से जंगली कन्द-मूल, फल, गाँठदार सब्जियाँ, जड़ी-बूटियाँ, शहद, फूल-पत्तियाँ, गूलर, महुआ, सेमल की रूई, चिरौंजी, कचनार, अमलतास, हारसिंगार, खजूर, ताड़ के फल, लाख, इमली, जामुन, साबूदाना एकत्रित कर उसे निकटवर्ती बाजारों में बेच दिया जाता है। इन्हें खाया भी जाता है। वनों से पशुओं की खालें भी एकत्रित की जाती हैं। गोंड लोग दूध के लिए गाय, भैंस, बकरी, बोझा ढोने के लिए बैल तथा माँस के लिए सुअर, बतखें और कबूतर भी पालते हैं।

      अब अधिकांश गोंड़ खेती भी करते हैं जिसे स्थानान्तरित कृषि कहा जाता है। इस प्रकार की खेती में वृक्षों अथवा झाड़ियों को काटकर जला दिया जाता है, फिर 2-3 वर्ष उस पर खेती करने के बाद अन्यत्र दूसरे खेत तैयार किये जाते हैं। इस प्रकार की कृषि को डिप्पा (Dippa) या परका (Parka) कहा जाता है। परका कृषि में वृक्ष जलाये जाते हैं, जबकि डिप्पा में झाड़ियाँ। इस प्रकार की कृषि में फावड़े से खोदकर बीज बोया जाता है। बीज बो देने पर वन देवी एवं देवताओं को अच्छी फसल की प्राप्ति हेतु पशुओं की बलि चढ़ायी जाती है।

         जब पहाड़ी ढालों पर सीढ़ीनुमा आकार के खेत बनाकर कृषि की जाती है तो उसे पेंडा कृषि कहते हैं। यह सामान्यत: बस्तर में की जाती है। इसमें खेत बिना जोते ही बोये जाते हैं। दो-चार फसलें लेने के उपरान्त खेत खुले छोड़ दिये जाते हैं जिससे उन पर जब पुनः घास-फूस उग आती  है तो उसे जला दिया जाता है। ढाल के निचले भागों की ओर लट्ठों या मिट्टी-पत्थर की मेंड़ बनाकर मिट्टी रोकी जाती है।

          स्थानान्तरण खेती आज भी मांडला के वैगाचाक, बस्तर के अबूझमाड़, सरगुजा, बिलासपुर और रायगढ़ के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में की जाती है। खेती करने के ढंग पुराने हैं। लोहे के कुदाली और कुल्हाड़ी ही उनके औजार होते हैं। खाद, अच्छे बीज और सिंचाई की सुविधा न होने से उत्पादन कम होता है।

        खेती सामान्यतः घरों के पास ही की जाती है। खेती में स्त्री-पुरुष सभी का सहयोग मिलता है। अनाज मांडने, उड़ाने और साफ करने का कार्य पुरूष और लड़के करते हैं। स्त्रियाँ खेतों को तैयार करने का कार्य करती हैं। खेती हेर-फेर के साथ भी की जाती है। यह क्रम इस प्रकार होता है-मोटे अनाज, मक्का, दाल और फलियाँ। घर के निकट कुछ ऊँची सामने वाली भूमि पर बाड़ियाँ होती हैं जिसमें पशुओं के गोबर तथा विष्टा का खाद देकर उसमें तम्बाकू, ककड़ी, चना, कद्दू आदि सब्जियाँ पैदा की जाती हैं।

           खेती के अतिरिक्त गोंड लोग निर्माण कार्यों में मजदूरी, लकड़ी काटने, ग्वाले, कुम्हार, बढ़ई, लुहार, पालकियाँ उठाने तथा अन्य प्रकार के कार्य करते हैं। कुछ गोंड स्त्रियाँ टोकरियाँ और रस्सियाँ बनाती हैं। ये अन्य घरेलू काम भी करती हैं।

सामाजिक व्यवस्था:-

            गोंड लोग अनेक छोटे-छोटे समूहों में विभक्त होते हैं। समूहों का वर्गीकरण सामान्यतः उस क्षेत्र के नाम पर होता है जिसमें गोंड लोग रहते हैं। बस्तर जिले में इन्हें मुरिया या मारिया कहते हैं। मुरिया तीन विभागों में बाँटें गये हैं- जगदलपुर मुरिया, झोरिया मुरिया और घोटुल मुरिया।

         मुरिया(मारिया) लोगों के दो उप-विभाग हैं- पहाड़ी मारिया (Hill Marias) तथा सॉंग लगाने वाले मारिया (Bisan Horn Marias)। मण्डला जिले में गोंडों के चार उप-विभाग पाये जाते है-देव गोंड, राज गोंड, सूर्ववंशी देवगाड़िया गोंड और रावणवंशी गोंड। अन्तिम प्रकार के गोंडों का समाज व्यवस्था में सबसे निम्न स्थान होता है, जबकि अन्य तीन अपने को क्षत्रियों के समवर्ती मानते हैं।

        झारखण्ड में तीन उप-विभाग हैं-राजगोंड, जो उच्च वर्ग की श्रेणी में आते हैं; धूरगोंड, जो कृषक श्रेणी अथवा सामान्य श्रेणी के होते हैं और कमिया जो श्रमिक श्रेणी के होते हैं।

       राजगोंडों के अन्तर्गत मालगुजार, पटेल और गाँव की भूमि के स्वामी, गाँव का प्रधान मण्डल आते हैं। कृषक वर्ग पहले वर्ग से भूमि किराये या लगान पर लेकर खेती करता है, तीसरे वर्ग में श्रमिक आते हैं, इसमें ओझा, बैगा, गुनिया, लोहार आदि आते हैं जो विभिन्न वर्गों की सेवा करते हैं।

गोत्र:-

       अधिकांश गोंड गोत्र पर आधारित होते हैं जो बहिर्विवाही हैं अर्थात् ये लोग अपने मित्र समूह के बाहर ही विवाह करते हैं। गोंडों के गोत्र पशुओं अथवा वृक्षों के नाम पर होते हैं। उदाहरणार्थ, तुमरीहावीका गोत्र तेंदू के वृक्ष से, टीकम गोत्र टीकम वृक्ष से, नाग से सम्बन्धित नागवान, बकरी से सम्बन्धित किटीमरबी, सुअर से सम्बन्धित पडीमरबी।

        गोत्र का निर्धारण पिता के गोत्र से होता है। एक गोत्र के समस्त सदस्यों में एक सम्बन्ध माना जाता है तथा पारस्परिक विवाह निषिद्ध होता है। प्रायः एक गाँव में एक ही गोत्र के लोग रहते हैं।

          गोंडों में संयुक्त परिवार और वैयक्तिक परिवार दोनों ही प्रथाएँ मिलती हैं। संयुक्त परिवार को भाईबन्द कहा जाता है। एक भाईबन्द में पति पत्नी, उनके अवयस्क लड़के-लड़कियाँ, विवाहित पुत्र एवं उनकी पत्नियाँ और बच्चे होते हैं। ये सब मिलकर एक सामाजिक और आर्थिक इकाई बनाते हैं। कृषि, शिकार, गृहनिर्माण आदि कार्यों में सभी सदस्य सामूहिक रूप से काम करते हैं। इनका मुखिया सरदार कहलाता है। इसके निर्देशानुसार सारी क्रियाएँ की जाती हैं और इसी का पारिवारिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

        इस परिवार की सम्पत्ति संयुक्त सम्पत्ति मानी जाती है। वैयक्तिक परिवार में पति, पत्नी और उनके अवयस्क पुत्र-पुत्रियाँ सम्मिलित होते हैं। परिवार पितृसतात्मक होती है। स्त्री-पुरुष का कार्य विभाजन स्पष्ट होता है। स्त्रियाँ घरेलू कार्य (सफाई झांडू-पोंछा, भोजन बनाना, पशुओं की देखभाल करना), कृषि कार्यों में सहयोग देना तथा वन से लकड़ियाँ और अन्य वस्तुएँ एकत्रित कर लाने का काम करती हैं। पुरुष खेती, शिकार, व्यापार आदि करने का कार्य करते हैं।

विवाह:-

         गोंडों में विवाह पद्धति विकसित अवस्था में पायी जाती है। बाल-विवाह प्रायः नहीं होते। जब तक लड़की रजस्वला न हो और जब तक उसने यौन-क्रियाओं का आनन्द न लिया हो, सामान्यतः विवाह नहीं किया जाता। लड़का 24-25 वर्ष की उम्र में विवाह करता है। जीवन-साथी का चुनाव वयस्क लड़के-लड़कियाँ स्वयं करते हैं। सामान्यतः एक विवाह की प्रथा प्रचलित है किन्तु सम्पन्न गोंड एक से अधिक पत्नियाँ रख सकते हैं। बहु-पत्नी प्रथा बाँझपन से छुटकारा पाने के लिए, यौन शक्ति का अतिरिक्त आनन्द उठाने के लिए तथा सम्पन्नता और सामाजिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए प्रचलित है।

        गोंडों में मामा, बुआ की लड़की से विवाह करना (Cross-cousin marriage) सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ऐसे विवाह को ‘दूध लौटाना’ कहते हैं। यदि किसी कारणवश ऐसा न हो तो दोषी पक्ष को हर्जाना देना पड़ता है जिसे ‘दूध बुँदा’ कहा जाता है। विवाह की दूसरी प्रथा पारस्परिक सम्पत्ति द्वारा विवाह करने की है जिसमें लड़की अपनी पसन्द के लड़के पर कुछ व्यक्तियों की मौजूदगी में हल्दी घोलकर डाल देती है और तब लड़का उसे घर ले जाकर बिरादरी को भोज दे देता है। जिससे विवाह वैध हो जाता है। विवाह की तीसरी प्रथा सेवा द्वारा पत्नी प्राप्त करने (लमसेना, लमना) की होती है जिसमें लड़का, लड़की के पिता के यहाँ 5 वर्षों तक खेती-बाड़ी और घर का काम करता है। इसके बाद दोनों का विवाह हो जाता है।

             कभी-कभी लड़का अपने साथियों के साथ, अवसर पाकर लड़की को उसके गाँव से भगा लाता है और वह उस पर हल्दी का पानी घोलकर डाल देता है जिससे लड़की उसकी पत्नी बन जाती है। बाद में अन्य रस्में लड़के के दरवाजे पर पूरी की जाती हैं। एक अन्य पद्धति में लड़की अपने पसन्द के लड़के के घर में जा बैठती है, विशेषतः जब वह उससे गर्भवती हो जाती है।

             इस प्रकार गोंडों के विवाह में इतनी विभिन्नता और लचीलापन पाया जाता है कि यह कहना प्रायः कठिन होता है कि कौन-सा विवाह नियमित और कौन-सा अनियमित और अस्वीकृत है। सभी प्रकार के विवाह के रूप यौन क्रियाओं के बाद पूरे हो जाते हैं और बिरादरी को दावत देकर स्त्री-पुरूष के सभी प्रकार के यौन सम्बन्धों को वैध बना दिया जाता है। विवाह की क्रियाओं में खम्भे के चारों ओर घूमना, लड़के-लड़की पर हल्दी का पानी डालना, तेल लगाना, नाच-गाना, मदिरापान करना मुख्य होते हैं।

          पति या पत्नी दोनों में कोई भी विवाह विच्छेद कर सकता है किन्तु सामान्यतः तलाक बहुत ही कम होते हैं। चरित्रहीनता, झगड़ालूपन, यौन व्याधियाँ आदि तलाक के मुख्य कारण होते हैं। तलाक में गाँव पंचायत के समक्ष यदि पत्नी तलाक देती है तो नये पति को उसके पूर्व पति को पर्याप्त हर्जाना तथा बिरादरी को भोज देना पड़ता है। एक वर्ष बाद विधवा दूसरा विवाह कर सकती है। प्रायः बड़े भाई की विधवा पत्नी का विवाह छोटे भाई के साथ ही होता है किन्तु यदि विधवा किसी अन्य पुरुष को चाहे तो उस पर हल्दी और तेल लगा देती है और पुरूष उसे माला पहना देता है या अँगूठी अथवा चूड़ियाँ किन्तु उस पुरुष को बिरादरी को भोज देना आवश्यक होता है।

ग्रामीण संस्थाएँ:-

          प्रत्येक गाँव में एक पंचायत अथवा अनेक गाँवों को मिलाकर (एक पंचायत) होती है जिसके प्रमुख को मण्डल पटेल या मुकद्दम कहते हैं। पंचायत का कार्य गाँव की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना, समस्याओं और विवादों को सुलझाना है। पंचायत के अन्य पदाधिकारी प्रमुख पुजारी (भूमा-गैत), जाति के पुजारी (वदाई) और गुनिया या वैध होते हैं। पुजारी का काम धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करना होता है। गुनिया जड़ी-बूटियों से गाँव के लोगों की चिकित्सा करता है तथा झाड़-फूंक द्वारा भूत-प्रेत सम्बन्धी व्याधियों को दूर करता है।

नोट:

निवास क्षेत्र (Residential area)

वातावरण सम्बन्धी परिस्थितियाँ (Environmental conditions)

शारीरिक गठन (Physical structure)

बस्तियाँ और घर (Settlements and houses)

भोजन (Food)

वस्त्राभूषण (Clothes and ornaments)

आर्थिक क्रियाकलाप (Economic activities)

सामाजिक व्यवस्था (Social system)

गोत्र (Clan)

विवाह (Marriage)

ग्रामीण संस्थाएँ (Rural institutions)

प्रश्न प्रारूप @

1. गोंड जनजाति के निवास तथा आर्थिक-सामाजिक क्रिया-कलापों पर प्रकाश डालें।

अथवा गोंड के अधिवास, सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताओं की विवेचना कीजिए।


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