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6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व


भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

         भारत में विभिन्न भूगर्भिक काल में निर्मित अनेक प्रकार की चट्टानें पायी जाती हैं। इसका संबंध पैलियोजोइक महाकल्प के कार्बोनीफेरस कल्प से लेकर मीसोजोइक कल्प के मध्य रहा है।

भारत में गोण्डवाना क्रम की चट्टानें

        ‘गोंडवाना’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1872 ई० में एच०बी० मेडलीकॉट और 2876 ई० में ओ० फीस्टमेंटल महोदय ने किया था। इस शब्द की उत्पत्ति मध्य प्रदेश के गोंड क्षेत्र से हुआ है क्योंकि सबसे पहले गोण्ड जनजातियों के निवास क्षेत्र से ही गोंडवानाक्रम की चट्टानों की खोज की गई थी। बाद में इस प्रकार की चट्टानें जहाँ कहीं भी प्राप्त हुआ उसे गोडवाना क्रम के चट्टानों से सम्बोधित किया।

         वस्तुत: विन्ध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण हो जाने के बाद प्रायद्वीपीय भारत का भूखण्ड लम्बे समय तक भूगर्भिक हलचल/भूकंप से मुक रहा है। लेकिन, कार्बोनीफेरस के पूर्वार्द्ध में भयंकर भूसंचलन हुआ जिसे हर्सीनियन भू-संचलन के नाम से जानते हैं।

      हर्सीनियन भू-संचलन भूसंचलन का प्रभाव लगभग सम्पूर्ण पृथ्वी पर पड़ा। इस समय जल और स्थल के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ। +जैसे: पेन्जिया रूपी विशालकाय भूखण्ड के मध्यवर्ती भाग में धंसान की क्रिया से एक विशाल टेथिस सागर का निर्माण हुआ। इसका विस्तार पश्चिम में भूमध्यसागर से लेकर पूरब में प्रशान्त महासागर तक था। टेथिस सागर के उतरी भाग अंगारालैण्ड कहलाया जबकि दक्षिणी भाग गोण्डवानालैण्ड कहलाया।

भारत में गोण्डवानाक्रम

         कार्बोनीफेरस कल्प में ही पृथ्वी पर कुछ क्षेत्रों में हिमयुग का आगमन हुआ था। पर्वतीय क्षेत्रों / पर्वतों के ऊँचाई वाले भाग में हिम के जमने और हिमस्खलन के कारण पर्वतीय क्षेत्रों का अपरदन होने लगा। अपरदित सामाग्री गोंडवाना भूखण्ड के विभिन्न नदी घाटियों और गर्तों में जमा कर दिये जाने से उपजाऊ समतल मैदान का विकास हुआ है। उस वक्त मानवीय उद्भव नहीं होने के कारण सभी मैदानी क्षेत्र सघन वनस्पतियों से ढक गये। इन वनस्पतियों में ग्लोसोप्टेरिस और टीलोफाइलम समूह की वनस्पत्ति अधिक थी। भूसंचलन के कारण ये वनस्पति गिरकर यत्र-तत्र जमने लगे।

         पुन: अत्याधिक ताप एवं दाब के कारण ये वनस्पति कोयले में रूपान्तरित हो गये। जगह-2 पर आज भी इन वनस्पतियों के परतों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। चूँकि कार्बोनीफेरस कल्प में इन वनस्पतियों का विकास एवं भूमि के अन्दर दबने की क्रिया नदी घाटी क्षेत्रों में हुआ था। इसीलिए आज भी कोयला की पेटियाँ नदी घाटी क्षेत्रों में मिलती है।

वितरण

      भारत में गोंडवनाक्रम की चट्टानें प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपीय भारत के बाहरी क्षेत्रों में देखा जा सकता है। जैसे-

झारखण्ड- दामोदर नदी घाटी, उत्तरी कोल क्षेत्र, डाल्टेनगंज क्षेत्र।

बिहार- ललमटिया ये लेकर राजमहल की पहाड़ी तक।

उड़ीसा- महानदी घाटी क्षेत्र में।

आन्ध्रप्रदेश- गोदावरी एवं उनके सहायक नदी घाटी क्षेत्र में।

छतीसगढ़ एवं मध्य प्रदेश- सोन नदी घाटी क्षेत्र।

महाराष्ट्र- वर्दा नदी घाटी क्षेत्र।

पश्चिम बंगाल- दामोदर और बराकर नदी घाटी क्षेत्र में।

         उपरोक्त क्षेत्रों के अलावे कश्मीर, असम, सिक्कीम और दार्जलिंग में भी गोंडवाना प्रकार की चट्टानें पायी जाती है।

भारत में गोण्डवानाक्रम

चित्र: गोंडवाना समूह की चट्टानों का वितरण

आर्थिक महत्व

(1) भारत का 96% एन्थ्रासाइट और बिटुमिनस कोपला गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलता है। थोड़ा-बहुत लिग्नाइट कोयला इस समूह की चट्टान से प्राप्त होता है।

(2) गोंडवानाक्रम की चट्टानों से बलुआ पत्थर मिलता है जिसका उपयोग भवन निर्माण में किया जाता है।

(3) कोयले की खानों ने चिका मिट्टी और फायर क्ले प्राप्त किये जाते हैं जिसका प्रयोग ईट और बर्तन के निर्माण में किया जाता है।

(4) गोंडवानाक्रम की चट्टानें, सीमेन्ट और रासायनिक उर्वरक के निर्माण में काफी उपयोगी माने जाते हैं।

(5) गोंडवाना क्रम की चट्टानों से मिलने वाला कंक्रीट का प्रयोग, नाभिकीय भट्टी के निर्माण में किया जाता है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत में मिलने वाला गोडवानाक्रम की चट्टान से कोयला जैसे ऊर्जा संसाधन के लिए विश्व प्रसिद्ध है जिसकी महत्ता अपने आप में सर्वविदित है।

प्रश्न प्रारूप

Q. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व की विवेचना कीजिए।

25. सूर्यातप (Insolation)

25. सूर्यातप (Insolation)


 सूर्यातप

        वायुमण्डल तथा पृथ्वी की ऊष्मा (Heat) का प्रधान स्रोत (सूर्य) है। सौर्यिक ऊर्जा को ही ‘सूर्यातप’ कहते हैं।

          दूसरे शब्दों में “लघु तरंगों के रूप में संचालित लगभग 3 लाख किमी० प्रति सेकेण्ड की गति से भ्रमण करती हुई प्राप्त सौर्यिक ऊर्जा को ‘सौर्य विकिरण’ या ‘सूर्यातप’ कहते हैं”। सूर्य धधकता हुआ गैस का वृहद् गोला है, जिसकी व्यास पृथ्वी से 100 गुना तथा उसके आयतन से 100,000 गुना अधिक है। सूर्य के धरातल जिसे फोटोस्फेयर कहते है, का तापक्रम 6000 डिग्री सेल्सियस तथा केन्द्रीय भाग का 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस बताया जाता है। पृथ्वी के वायुमण्डल का औसत तापक्रम 15.2°C होता है।

       सूर्य की ऊर्जा का प्रधान स्रोत उसका आन्तरिक भाग जहाँ पर अत्यधिक दबाव तथा उच्च तापमान के कारण नाभिकीय संलयन के कारण हाइड्रोजन का हीलियम में रूपान्तर होने से ऊष्मा का उत्सर्जन होता है। यह ऊष्मा परिचालन तथा संवहन द्वारा सूर्य की बाहरी सतह तक पहुँचती है। सूर्य की वाह्य सतह से निकलने वाली ऊर्जा को फोटान कहते हैं। इसी तरह सूर्य की वाह्य सतह को फोटोस्फीयर कहते हैं। इस सतह से ऊर्जा का विद्युत् चुम्बकीय तरंग द्वारा विकिरण होता है।

        सूर्य के धरातल के प्रत्येक वर्ग इंच से विकीर्ण ऊर्जा 100,000 अश्व शक्ति के बराबर होती है, सूर्य की वह्य सतह (फोटोस्फीयर) से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः स्थिर रहती है। इस तरह पृथ्वी की सतह के प्रति इकाई क्षेत्र पर सूर्य से प्राप्त ऊर्जा प्राय: स्थिर रहती है। इसे सौर्यिक स्थिरांक (Solar constant) कहते हैं।

      इस तरह सौर्यिक स्थिरांक सूर्य के विकिरण की दर को प्रदर्शित करता है जो प्रति वर्ग सेण्टीमीटर प्रति मिनट 2 ग्राम कैलरी है। सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर स्थित पृथ्वी सौर्यिक ऊर्जा का केवल 1/2×109 भाग ही प्राप्त कर पाती है। परन्तु यह स्वल्प मात्रा भी 23×1012 अश्व शक्ति के बराबर हो जाती है। सूर्य से प्राप्त इस न्यून ऊर्जा के कारण ही भूतल पर सभी प्रकार के जीवों का अस्तित्व सम्भव हो सका है। इसी कारण धरातल पर पवन संचार, सागरीय धाराओं का प्रवाह तथा मौसम एवं जलवायु का आविर्भाव होता है।

         प्रत्येक वस्तु, जिसमें ऊष्मा होती है, विकिरण करती है। नियमानुसार जो वस्तु जितनी अधिक गर्म होती है, उसकी तरंगें उतनी ही छोटी होती हैं। इसी कारण से सूर्य विकिरण द्वारा निकली ऊष्मा लघु तरंगों के रूप में होती है तथा प्रति सेकेण्ड 300000 किमी० की गति से भ्रमण करती है। इसके विपरीत अपेक्षाकृत कम तापक्रम वाली वस्तु से विकिरण तो कम होता है, परन्तु दीर्घ तरंग के रूप में होता है। उदाहरण के लिए पृथ्वी से विकीर्ण ऊर्जा दीर्घ तरंगों के रूप में होती है।

धरातल पर सूर्यातप का वितरण

         सूर्यातप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है क्योंकि यहाँ पर दिन-रात की लम्बाई बराबर होती है तथा सूर्य की किरणें लगभग लम्बवत् होती हैं। परन्तु सूर्य के दक्षिणायन तथा उत्तरायण की स्थितियों के कारण अत्यधिक सूर्यताप मण्डल विषुवत रेखा के दोनों ओर सरकता रहता है। विषुवत रेखा से सूर्यातप ध्रुवों की ओर कम होता जाता है। ध्रुवों पर यह ताप इतना कम हो जाता है कि विषुवत रेखा का केवल 40 प्रतिशत ही प्राप्त हो पाता है।

        इस तरह ध्रुवीय क्षेत्र न्यूनतम सूर्यातप प्राप्त करते हैं। ‘इक्वीनाक्स (Equinox-विषुव) के समय दोनों गोलाद्धों में सूर्यातप का वितरण प्राय: समान रहता है। इसके विपरीत कर्क तथा मकर संक्रांति (Solstices) के समय दोनों गोलार्द्ध में ध्रुवों के बीच सूर्यातप के वितरण में पर्याप्त असमानता होती है।

         यहाँ पर यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि सूर्यातप के वितरण पर वायुमण्डल के परावर्तन, शोषण तथा प्रकीर्णन आदि प्रभावों का पर्याप्त असर होता है। इसी कारण से कर्क संक्रान्ति के समय सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में कर्क रेखा पर लम्बवत् होता है, ध्रुवों पर दिन की अवधि सर्वाधिक लम्बी होने पर भी सूर्यातप सर्वाधिक नहीं हो पाता है, अपितु अधिकतम सूर्यातप 40° अक्षांश के आस-पास ही प्राप्त होता है। धरातलीय तापक्रम निम्न मध्य अक्षांश वाले भागों में सर्वाधिक होता है, न कि भूमध्य रेखा के पास।

सूर्यातप के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक

         सूर्यातप के उपर्युक्त वितरण से स्पष्ट हो गया है कि भूतल के विभिन्न भागों पर सूर्यातप की मात्रा समान नहीं हुआ करती है, सूर्य की किरणों को वायुमण्डल की एक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, अत: वायुमण्डल का प्रभाव सूर्यातप की मात्रा पर पड़ना स्वाभाविक ही है। इसके अलावा सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन, दिन की अवधि, पृथ्वी से सूर्य की दूरी, सौर कलंक इत्यादि कारक किसी भी स्थान पर (वायुमण्डल की अनुपस्थिति में) सूर्यातप की मात्रा को प्रभावित करते हैं।

(i) सूर्य की किरणों का सापेक्ष्य तिरछापन:-

           पृथ्वी के गोलाकार रूप के कारण सूर्य की किरणें सर्वत्र समान कोण पर नहीं पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् होती हैं क्योंकि सूर्य सर्वाधिक ऊँचाई पर होता है, परन्तु ध्रुवों की ओर किरणों का कोण कम होता जाता है अर्थात् वे तिरछी होती जाती हैं। यद्यपि किरणों के सापेक्ष्य तिरछापन में कुछ परिवर्तन होता रहता है, उदाहरण के लिए 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है, जिस कारण पहली स्थिति में दक्षिणी गोलार्द्ध में किरणें अधिक तिरछी होती हैं, तथापि साधारण रूप में भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर किरणों का तिरछापन बढ़ता जाता है।

(ii) दिन की अवधि

          यदि अन्य दशाएं समान हों तो दिन की अवधि जितनी अधिक होगी, सूर्यातप की मात्रा उतनी ही अधिक होगी। पृथ्वी अपनी कक्षा पर 66.5° का कोण बनाती हुई लगभग 24 घण्टे में अपनी धुरी पर एक परिक्रमा पूरा करती है तथा साथ ही सूर्य के चारों तरफ भी वर्ष में एक बार चक्कर लगाती है।

        यदि पृथ्वी भी अपनी जगह पर स्थिर होती तो वर्तमान स्थिति के विपरीत दशा होती, परन्तु पृथ्वी की दैनिक तथा वार्षिक गति के कारण भूमध्य रेखा को छोड़कर शेष भागों पर दिन की अवधि में अन्तर आता रहता है। भूमध्य रेखा पर दिन सदैव 12 घण्टे का इसलिए होता है कि प्रकाश वृत्त भूमध्य रेखा को दो बराबर भागों में काटता है।

        सूर्य की उत्तरायण स्थिति के समय (जब सूर्य कर्क रेखा पर होता है) भूमध्य-रेखा से उत्तर की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है तथा उत्तरी ध्रुव पर 6 मास का दिन होता है। इसके विपरीत भूमध्य रेखा से दक्षिण जाने पर दिन की अवधि कम हो जाती है, जबकि द० ध्रुव पर केवल रात (6 मास) ही होती है।

        सूर्य की दक्षिणायन स्थिति में (जबकि सूर्य मकर रेखा पर होता है) भूमध्य रेखा से दक्षिण की ओर दिन की अवधि बढ़ती जाती है और उत्तर की ओर घटती जाती है। केवल 21 मार्च तथा 23 सितम्बर को, जबकि सूर्य की स्थिति भूमध्य रेखा पर होती है, सर्वत्र दिन-रात बराबर होते हैं। स्मरणीय है कि किरणों के तिरछेपन तथा दिन की अवधि के प्रभाव सापेक्ष्य हुआ करते हैं। उच्च अक्षांशों में (21 जून, उत्तरी गोलार्द्ध) दिन की अवधि 6 मास होने पर भी सूर्यातप न्यूनतम इसलिए होता है कि सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिरछी होती हैं। जहाँ पर दिन की अवधि अधिक होती है तथा साथ ही साथ किरणें सीधी पड़ती हैं वहाँ पर निश्चित रूप से ताप अधिक प्राप्त होता है। 

(iii) पृथ्वी से सूर्य की दूरी

     पृथ्वी अण्डाकार कक्ष के सहारे सूर्य की परिक्रमा करती है, जिस कारण उसकी सूर्य से दूरी में परिवर्तन होता रहता है। औसत रूप में पृथ्वी सूर्य से लगभग 15 करोड़ किमी० दूर है, परन्तु निकटतम दूरी 14.70 करोड़ किमी० है। इस स्थिति को उपसौर (Perihelion) कहते हैं। यह स्थिति 3 जनवरी को होती है। इसके विपरीत 4 जुलाई को अपसौर (Aphelion) की स्थिति होती है, जबकि पृथ्वी सूर्य से 15.20 करोड़ किमी० दूर होती है। साधारण नियम के अनुसार जब पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उस समय अधिकतम ताप तथा अधिकतम दूरी पर होने पर न्यूनतम ताप मिलना चाहिए। परन्तु वास्तविकता ठीक उसके विपरीत होती है।

       जनवरी के महीने में जबकि पृथ्वी सूर्य से निकटतम दूरी पर होती है, उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रीष्म काल होने के बजाय शीत काल होता है। इसी तरह 4 जुलाई के समय शीत काल के बजाय ग्रीष्मकाल होता है। वास्तव में दिन की अवधि तथा सूर्य की किरणों के तिरछेपन के प्रभाव के आगे यह कारक नगण्य हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य होता है कि जनवरी में उ० गोलार्द्ध में जितनी सर्दी होनी चाहिए, उसकी अपेक्षा 7 प्रतिशत कम होती है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में गर्मियां 7 प्रतिशत अधिक तीव्र होती हैं। अपसौर की स्थिति में उत्तरी गोलार्द्ध में (4 जुलाई) गर्मियां 7 प्रतिशत कम तीव्र तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में शीतकाल 7 प्रतिशत अधिक तीव्र हो जाता है।  

सूर्यातप

 

(iv) सौर कलंक

       चन्द्रमा के समान सूर्य-तल पर कलंक या धब्बे मिलते हैं। इनका कोई स्थायी रूप नहीं होता है, वरन् ये बनते-बिगड़ते रहते हैं तथा इनकी संख्या घटती-बढ़ती रहती है। यह अन्तर चक्रीय रूप में सम्पन्न होता है। औसत रूप में एक चक्र ग्यारह वर्ष में पूरा होता है।

        जब सौर कलंकों की संख्या अधिक हो जाती है तो सूर्यातप की मात्रा भी अधिक हो जाती है, परन्तु इनकी मात्रा में कमी हो जाने के कारण प्राप्त होने वाला सूर्यातप कम हो जाता है। इस कारण की सत्यता अभी तक संदिग्ध है। सौर कलंकों के कारण सूर्य विकिरण में अन्तर आता रहता है। विश्व स्तर पर मौसम तथा जलवायु में कभी-कभी विश्वव्यापी अनियमितता होती रहती है। सौर कलंकों के कारण होने वाला अनियमित सूर्यातप इस विश्वव्यापी मौसम सम्बन्धी अनियमितता का कारण हो सकता है, परन्तु इसे निश्चितता के साथ स्वीकार नहीं किया जा सका है।

(v) वायुमण्डल का प्रभाव

         सूर्यातप वितरण को प्रभावित करने वाले उपर्युक्त कारकों की विवेचना के समय वायुमण्डल के प्रभाव को ध्यान में नहीं रखा गया था, वास्तव में (सूर्य की) प्रकाश किरणों को वायुमण्डल की पारदर्शक मोटी परत से होकर गुजरना पड़ता है, जिस कारण उसका प्रकीर्णन (Scattering), परावर्तन (Reflection) तथा अवशोषण (Absorption) होता रहता है। प्रकीर्णन के अन्तर्गत सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग पारदर्शक वायुमण्डल में स्थित अदृश्य कणों तथा अणुओं के कारण बिखर कर फैल जाता है।

       प्रकीर्णन मुख्य रूप से वरणात्मक (Selective) होता है, अर्थात् यह उस समय होता है जबकि अदृश्य कणों (धूलकण आदि) की व्यास विकिरण तरंग से छोटी होती है। इस तरह लघु तरंगों का प्रकीर्णन सर्वाधिक होता है, जिस कारण विभिन्न प्रकार के रंगों का आविर्भाव होता है। उदाहरण के लिए आकाश का नीला रंग, सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य की लालिमा आदि प्रकीर्णन के कारण ही सम्भव हो पाती है।

      जब वायुमण्डल में अदृश्य कणों की व्यास विकिरण तरंग से बड़ी होती है तो विसरित परावर्तन (diffuse reflection) की क्रिया होती है। इस क्रिया के कारण सौर्यिक शक्ति का कुछ भाग परावर्तित होकर वापस लौट जाता है, जबकि कुछ भाग वायुमण्डल में चारों तरफ छिटक जाता है। पृथ्वी की सतह से भी कुछ ताप शक्ति का परावर्तन आकाश में हो जाता है। पृथ्वी के इस परावर्तन के कारण ही चन्द्रमा का अंधेरा भाग भी आसानी से दृष्टिगत हो जाता है।

           प्रकीर्णन तथा परावर्तन के कारण वायुमण्डल से कुछ सौर्यिक ऊर्जा पृथ्वी की सतह पर पहुँच जाती है। इसे आकाश का विसरित नीला प्रकाश (diffuse blue light of sky) कहते हैं अथवा विसरित दिवा प्रकाश (diffuse day light) की संज्ञा प्रदान की जाती है। इसी प्रकाश के कारण पूर्ण बदली के दिन अथवा किसी भी स्थान के वे भाग जहाँ पर सूर्य की किरणें नहीं पहुँच पाती हैं, आसानी से देखें जा सकते हैं।

         अवशोषण की क्रिया मुख्य रूप में जलवाष्प तथा गौण रूप में आक्सीजन एवं ओजोन गैसों द्वारा सम्पादित होती है। अवशोषण भी वरणात्मक होता है अर्थात् सभी विकिरण तरंगों का अवशोषण न होकर केवल दीर्घ तरंगों का ही हो पाता है। प्रकीर्णन, परावर्तन तथा अवशोषण द्वारा सूर्यातप की नष्ट होने वाली मात्रा मुख्य मुख्य रूप से सूर्य की किरणों के कोण तथा वायुमण्डल के पारदर्शक तत्व पर आधारित होती है।

         सूर्य से विकीर्ण समस्त सूर्यातप का लगभग 35 प्रतिशत भाग परावर्तन तथा प्रकीर्णन द्वारा आकाश में वापस लौट जाता है तथा इसका उपयोग न ही वायुमण्डल को गर्म करने में हो पाता है और न ही पृथ्वी को सूर्यातप के 14 प्रतिशत भाग का वायुमण्डल द्वारा अवशोषण हो जाता है।

       इस तरह सूर्यातप का केवल 51 प्रतिशत भाग पृथ्वी को प्राप्त हो पाता है, जिससे वायुमण्डल का निचला भाग गर्म होता है। किसी भी सतह से विकिरण ऊर्जा के परावर्तित भाग को अलबिडो (Albedo) कहा जाता है। पृथ्वी की सतह का औसत अलबिडो 24 से 34 प्रतिशत के बीच बताया जाता है।


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7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर

7. बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त/ महाविस्फोट सिद्धांत-जॉर्ज लैमेण्टर


बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त

बिग बैंग

              ब्रह्माण्ड तथा आकाशगंगा तथा उनके सदस्य तारों तथा ग्रहों की उत्पत्ति की समस्या के समाधान के लिए ब्रह्माण्ड के अदृश्य घटकों अर्थात् काले पदार्थों के अस्तित्व के आधार पर प्रयास किये गये हैं। आकाश गंगा के निर्माण के विषय में वैज्ञानिकों के दो वैकल्पिक विचार हैं- काले पदार्थों का अस्तित्व ‘गर्म’ या ‘ठंडे’ (Hot or cold forms) रूप में रहा होगा।

         गर्म काले पदार्थों (Hot dark matter) की स्थिति में आकाशगंगायें (Galaxies) दूर-दूर होंगी जबकि ठंडे पदार्थों की स्थिति में वे झुण्ड में होंगी (वर्तमान समय में विभिन्न आकाशगंगायें पास-पास समूह में स्थित हैं)।

         बिग बैंग सिद्धान्त के अनुसार ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति आज से लगभग 15 बिलियन वर्ष (15 अरब वर्ष) पहले घने पदार्थों वाले विशाल अग्निपिण्ड (fireball) के आकस्मिक जोरदार विस्फोट तथा उससे जनित विकिरण के कारण हुई।

           इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मुख्यतः जॉर्ज लैमेण्टर द्वारा 1950-60 तथा 1960-70 दशक में किया गया (इस सिद्धान्त के अनुसार आज से 15 अरब वर्ष पहले एक विशाल अग्निपिण्ड था जिसकी रचना भारी पदार्थों से हुई थी। इस विशालकाय अग्निपिण्ड का अचानक विस्फोट हुआ जिस कारण पदार्थों का बिखराव हो गया। इन पदार्थों को प्रारम्भिक सामान्य पदार्थ (Normal matter) कहा गया। शीघ्र ही सामान्य पदार्थों के अलगाव के कारण (काले पदार्थों का सृजन हुआ। इन काले पदार्थों का आपस में समेकन होने से (अनेकों पिण्डों का निर्माण हुआ। इन पिण्डों के चारों ओर सामान्य पदार्थों का जमाव होने लगा। जिस कारण इनका आकार बढ़ता गया। इन पिण्डों के आकार में वृद्धि होने से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ।

 

            ज्ञातव्य है कि प्रारम्भ में ब्रह्माण्ड अत्यधिक छोटा था परन्तु इसमें त्वरित गति से फैलाव होने लगा। परिणामस्वरूप आकाशगंगायें, जो प्रारम्भ में पास-पास थीं वे निरन्तर दूर होती गयीं। आज से लगभग 15 अरब वर्ष पहले अपने निर्माण-काल से आज तक ब्रह्माण्ड आकार में लगातार फैलता रहा है तथा उसके पदार्थ शीतल होते रहे हैं। आकाशगंगाओं का भी भयंकर विस्फोट हुआ तथा विस्फोट से निकले पदार्थों के समेकन से बने असंख्य पिण्डों द्वारा प्रत्येक आकाशगंगा के तारों (stars) का निर्माण हुआ। इसी तरह प्रत्येक तारे, के विस्फोट के कारण जनित पदार्थों के समूहन द्वारा ग्रहों (Planets) का निर्माण हुआ।

          अमेरिकन वैज्ञानिक अलन गुथ (Alan Guth) ने 1980 में बिग बैंग सिद्धान्त को ब्रह्माण्ड (आकाशगंगा, तारों तथा ग्रहों) की उत्पत्ति की समस्या को सुलझाने में असमर्थ पाया। अत: इन्होंने स्फीति सिद्धान्त (inflationary theory) का प्रतिपादन किया। अलन गुथ की अवधारणा है कि ब्रह्माण्ड के दृश्य द्रव्यमान (visible mass) के घनत्व की तुलना में उसका वास्तविक घनत्व बहुत अधिक है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्माण्ड में अदृश्य काले पदार्थों का अस्तित्व है। यद्यपि बिग बैंग तथा स्फीति सिद्धान्त लगभग एक जैसे हैं क्योंकि उनकी कई मान्यतायें उभयनिष्ठ हैं। उनमें अन्तर मात्र इस बात से सम्बन्धित है कि विशालकाय अग्निपिण्ड के विस्फोट के एक सेकेण्ड के अन्दर किस प्रकार की घटनायें घटीं।

          स्फीति सिद्धान्त के अनुसार विशालकाय अग्निपिण्ड के जोरदार विस्फोट के बाद अति अल्प काल में ब्रह्माण्ड का असाधारण त्वरित गति से फैलाव (स्फीति, rapaid, expansion or inflation) हुआ। इस प्रक्रिया के दौरान एक सेकेण्ड के अल्पांश के अन्तर्गत ही ब्रह्माण्ड के आकार में कई गुना वृद्धि हो गयी। काले पदार्थों के समूहन से आकाशगंगाओं का निर्माण हुआ। इनके विस्फोट से जनित पदार्थों के समूहन से निर्मित पिण्डों द्वारा तारों का निर्माण हुआ तथा तारों के विस्फोट से उत्पन्न पदार्थों के एकत्रित एवं संगठित होने से निर्मित पिण्डों से ग्रहों (पृथ्वी इत्यादि) का निर्माण हुआ।

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना (Binary Star Hypothesis of Russell)

6. रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

(Binary Star Hypothesis of Russell)


रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

रसेल की द्वैतारक

              जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना से निम्नलिखित दो बातें प्रमाणित नहीं हो पा रहीं थीं-

(i) सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी और

(ii) ग्रहों के वर्तमान कोणीय आवेग (Angular momentum) की अधिकता।

       इन दो समस्याओं के समाधान हेतु रसेल ने द्वैतारक परिकल्पना का प्रतिपादन किया।

           आदिकाल में सूर्य के पास ही दो तारे थे। सर्वप्रथम सूर्य का एक साथी तारा था जो सूर्य के चारों ओर परिक्रमा कर रहा था। आगे चलकर एक विशालकाय तारा साथी तारे के समीप आया, किन्तु इसकी परिक्रमा की दिशा साथी तारे के विपरीत थी।

       इन दो तारों के बीच की दूरी सम्भवतः 48 से 64 लाख किमी० के बीच रही होगी। इस तरह विशालकाय तारा सूर्य से और अधिक दूर (साथी तारा तथा विशालकाय तारा के बीच की दूरी का कई गुना) रहा होगा जिस कारण विशालकाय तारे के ज्वारीय बल का प्रभाव सूर्य पर नहीं पड़ा, परन्तु साथी तारे पर ज्वारीय बल के कारण पदार्थ विशालकाय तारे की ओर आकर्षित होने (उभार) लगा। जैसे-जैसे विशालकाय तारा साथी तारे के करीब आता गया, आकर्षण बल बढ़ता गया और उभार अधिक होने लगा।

        जब विशालकाय तारा साथी तारे की निकटतम दूरी पर आ गया तो अधिकतम आकर्षण के कारण कुछ पदार्थ साथी तारे से अलग होकर विशालकाय तारे की दिशा में घूमने (साथी तारे की विपरीत दिशा) लगे। आगे चलकर इन पदार्थों से ग्रहों का निर्माण हुआ। प्रारम्भ में ग्रह करीब रहे होंगे तथा आपसी आकर्षण के कारण ग्रहों से पदार्थ निकलकर उनके उपग्रह बन गये होंगे जिसे निम्नांकित चित्रों में देखा जा सकता है-

रसेल की द्वैतारक

रसेल की द्वैतारक परिकल्पना

         इस तरह युग्म तारे की कल्पना करके तथा सूर्य के स्थान पर साथी तारे से पदार्थ निस्सृत कराके ग्रहों तथा पृथ्वी की उत्पत्ति मानकर रसेल ने सूर्य तथा ग्रहों के बीच की वर्तमान दूरी तथा उनके कोणीय आवेग की समस्या का वैज्ञानिक स्तर पर समाधान कर दिखाया है।

आलोचना

(i) रसेल ने साथी तारे से निकले पदार्थ से ग्रहों की उत्पत्ति को समझाया है, परन्तु साथी तारे के अवशिष्ट भाग पर प्रकाश नहीं डाला है। अवशिष्ट भाग का क्या हुआ? कोई संतोषजनक हल नहीं दिया गया है।

(ii) निर्माण के समय ग्रह सूर्य से दूर थे तथा एक-दूसरे दूर फैले थे, परन्तु विशालकाय तारे के भ्रमण पथ पर से आगे निकल जाने पर सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, जबकि उसके सबसे करीब साथी तारे का अवशिष्ट भाग सूर्य के आकर्षण में नहीं आ सका। इस तरह विरोधाभास की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रसेल ने इस समस्या का समाधान नहीं किया है।

(iii) यदि यह मान भी लिया जाय कि सभी ग्रह सूर्य की आकर्षण परिधि में आ गये, तो भी रसेल विशद रूप में यह नहीं समझा पाते हैं कि किस प्रक्रिया द्वारा यह सम्भव हुआ।

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना (Tidal Hypothesis of James Jeans)

5. जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पना

(Tidal Hypothesis of James Jeans)


जेम्स जीन्स की ज्वारीय परिकल्पनाजेम्स जीन्स की ज्वारीय

            सौर्य-मण्डल की उत्पत्ति से सम्बन्धित ”ज्वारीय परिकल्पना” का प्रतिपादन अंग्रेज विद्वान सर जेम्स जीन्स (Sir James Jeans) ने सन् 1919 में किया तथा जेफरीज (Jeffreys) नामक विद्वान ने उक्त परिकल्पना में सन् 1929 में कुछ संशोधन प्रस्तुत किया जिससे इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ गया।

             यह ज्वारीय परिकल्पना आधुनिक परिक्लपनाओं तथा सिद्धान्तों में से एक है, जिसे अन्य की अपेक्षा अधिक समर्थन प्राप्त है। अपनी संकल्पना की पुष्टि के लिए जीन्स कुछ तथ्यों को स्वयं मानकर चले हैं।

        इस प्रकार ‘ज्वारीय परिकल्पना’ प्रतिपादक द्वारा कुछ निम्नलिखित कल्पित तथ्यों पर आधारित है।

1. सौर्य-मण्डल का निर्माण सूर्य तथा एक अन्य तारे के संयोग से हुआ।

2. प्रारम्भ में सूर्य गैस का एक बहुत बड़ा गोला था।

3. सूर्य के साथ ही साथ ब्रह्माण्ड में एक दूसरा विशालकाय तारा था।

4. सूर्य अपनी जगह पर स्थिर था तथा अपनी जगह पर ही घूम रहा था।

5. साथी तारा एक पथ के सहारे इस तरह घूम रहा था कि वह सूर्य के निकट आ रहा था।

6. साथी तारा आकार तथा आयतन में सूर्य से बहुत अधिक विशाल था।

7. पास आते हुए तारे द्वारा ज्वारीय शक्ति का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ा था।

ज्वारीय परिकल्पना के अनुसार ग्रहों का निर्माण 

          इस प्रकार उपर्युक्त स्वयं-कल्पित तथ्यों के आधार पर जीन्स ने बताया है कि साथी तारा निरन्तर एक पथ के सहारे सूर्य की ओर अग्रसर हो रहा था, जिस कारण साथी तारे की आकर्षण शक्ति द्वारा वायव्य ज्वार का प्रभाव सूर्य के वाह्य भाग पर पड़ने लगा। फलस्वरूप सूर्य में ज्वार उत्पन्न होने लगा। यह ज्वारीय क्रिया सूर्य में उसी प्रकार सम्भव हो सकी, जिस प्रकार वर्तमान समय में पृथ्वी के निकट चन्द्रमा के आ जाने से पृथ्वी के महासागरों में ज्वार उत्पन्न हो जाता है। ज्यों-ज्यों विशालकाय तारा सूर्य के पास आता गया, त्यों-त्यों उसकी आकर्षण शक्ति बढ़ती गयी तथा ज्वार की तीव्रता बढ़ती गयी।

          जब तारा सूर्य से निकटतम दूरी पर आया तो उसकी आकर्षण शक्ति सूर्य से अधिक हो गयी, जिस कारण हजारों किलोमीटर लम्बा सिगार के आकार का ज्वार सूर्य के वाह्य भाग में उठा। सिगार के आकार वाले इस भाग को फिलामेन्ट (Filament) कहा गया है। सूर्य के निकटतम दूरी पर पहुँचने के कारण तारे की अधिकतम आकर्षण शक्ति के प्रभाव से एक विशाल फिलामेन्ट सूर्य से हटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ। जीन्स के अनुसार पास आने वाला तारा सूर्य के मार्ग पर नहीं था, अत: यह सूर्य से आगे बढ़ने लगा।

           इस प्रकार तारे के दूर निकल जाने के कारण फिलामेन्ट तारे के साथ न जा सका, वरन् वह सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण करने लगा। यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि इस स्थिति में जब कि तारा अधिक दूर चला गया तो फिलामेन्ट सूर्य के पास पुन: वापस क्यों नहीं आ गया?

     व्याख्या सरल है। जब फिलामेन्ट टूटकर तारे की तरफ अग्रसर हुआ, उस परिस्थिति में यह सूर्य की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र से बाहर (Neutral point) हो गया था, अत: वह सूर्य का ही चक्कर लगाने लगा, वापस नहीं आ सका।

     कुछ समय पश्चात् तारा सूर्य से इतना दूर चला गया कि पुन: कोई वायव्य भाग (फिलामेण्ट) सूर्य से अलग नहीं हो सका। आगे चलकर सूर्य से निकला हुआ ज्वारीय पदार्थ सिगार के आकार में अधिक लम्बा हो गया, जिसका मध्य भाग अधिक मोटा या चौड़ा तथा दोनों किनारे वाले भाग अत्यधिक पतले थे। किनारों के पतला होने का मुख्य कारण तारे तथा सूर्य की आकर्षण शक्ति का प्रभाव ही बताया जाता है। फिलामेंट में गति या परिभ्रमण का आविर्भाव दूर होते हुये (Receding) तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के खिंचाव (Gravitational pull) के कारण हुआ था।

फिलामेन्ट से ग्रहों की उत्पत्ति:-

          सूर्य से अलगाव के बाद फिलामेन्ट शीतल होने लगा, जिस कारण उसके आकार में संकुचन प्रारम्भ हो गया। इस संकुचन के कारण फिलामेन्ट कई टुकड़ों में टूट गया तथा प्रत्येक भाग घनीभूत होकर ग्रह (Planet) के रूप में बदल गया। इसी क्रिया से फिलामेन्ट से नौ ग्रहों की रचना सम्भव हुई। इसी प्रक्रिया के अनुसार सूर्य की आकर्षण शक्ति के प्रभाव से ग्रहों पर ज्वार उत्पन्न होने से उनके कुछ पदार्थ अलग हो गये, जो घनीभूत होकर उपग्रह बने।

          अब यह प्रश्न उठता है कि ग्रह से उपग्रह बनने का क्रम कब तक चलता रहा? जब तक ग्रहों से निकले हुये ज्वारीय पदार्थ बड़े आकार वाले थे तथा उनकी केन्द्रीय आकर्षण शक्ति अधिक थी, तब तक उपग्रह बनते रहे। परन्तु जब उनका आकार इतना छोटा होने लगा कि उनकी केन्द्रीय आकर्षण-शक्ति उन्हें संगठित रखने में असमर्थ हो गयी, उपग्रहों की रचना समाप्त हो गयी। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों की संख्या ग्रहों के आकार के अनुसार निश्चित हुई।

          इस परिकल्पना द्वारा पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही साथ सौर्य-मंडल की अनेक समस्याएँ भी सुलझी-सी प्रतीत होती हैं-

(1) ग्रहों का क्रम तथा आकार-

        सूर्य से निस्सृत ज्वारीय फिलामेन्ट बीच में चौड़ा तथा किनारों की तरफ पतला था। इस प्रकार जब फिलामेन्ट के टूटने से ग्रहों का निर्माण हुआ तो बड़े ग्रह बीच में तथा छोटे ग्रह किनारे की ओर बने। ग्रहों का यह क्रम वर्तमान सौर्य मंडल के ग्रहों से पूर्णतया सामंजस्य रखता है।

            सूर्य की ओर से प्रारम्भ करने पर बुध ग्रह सबसे पहले है। यह अधिक छोटा है। इसके बाद शुक्र, पृथ्वी, मंगल (यह पृथ्वी से छोटा है) आदि एक-दूसरे से बड़े होते जाते हैं तथा बीच में बृहस्पति सबसे बड़ा ग्रह है । इसके बाद पुनः ग्रहों का आकार घटता जाता है तथा अन्त में कुबेर अत्यन्त छोटा ग्रह है। यह तथ्य निम्न तालिका से पूरी तरह प्रमाणित हो जाता है।

         जीन्स ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन कुबेर ग्रह( Pluto) की खोज के पहले किया था। बाद में अत्यन्त लघु ग्रह कुबेर की खोज ने इस परिकल्पना का महत्व और अधिक बढ़ा दिया क्योंकि यह परिकल्पना सौर्य-मंडल के सदस्यों के क्रम को पूर्णतया सिद्ध करती है। केवल मंगल की स्थिति इसके अनुसार ठीक नहीं बैठती है।

(2) उपग्रहों का क्रम-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के उपग्रहों का निर्माण ग्रहों से निकले हुए ज्वारीय पदार्थ से उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार सूर्य से निकले ज्वारीय पदार्थ से ग्रहों की रचना हुई। इस प्रकार ग्रहों के उपग्रहों का भी वही क्रम है जो कि ग्रहों का। अर्थात् एक ग्रह के यदि कई उपग्रह हैं तो सबसे बड़ा उपग्रह बीच में तथा छोटा उपग्रह किनारे की ओर पाया जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान उपग्रहों की स्थिति तथा क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि ग्रहों तथा उपग्रहों की रचना एक ही प्रणाली द्वारा हुई होगी।

(3) उपग्रहों की संरचना तथा आकार-

         इस ‘ज्वारीय परिकल्पना’ के अनुसार बड़े ग्रह ब्रह्माण्ड में अधिक समय तक गैस के रूप में रहे, क्योंकि आकार की विशालता के कारण उसके शीतल होने में अधिक समय लगा होगा। इस कारण बड़े ग्रहों के उपग्रह अधिक संख्या में बने, परन्तु अपेक्षाकृत ये छोटे आकार वाले थे। मध्यम आकार वाले (बड़े ग्रहों के समीपवर्ती ग्रह) ग्रहों से कम संख्या में उपग्रह (Satellites) बने, परन्तु इनका आकार बड़ा रहा। किनारे वाले ग्रह आकार में छोटे होने के कारण शीघ्र शीतल हो गये होंगे। परिणामस्वरूप उनसे उपग्रहों की रचना नहीं हो पायी होगी।

            यह तथ्य वर्तमान सौर्य-मंडल के उपग्रहों के क्रम से पूर्णतया मेल खाता है। शनि तथा बृहस्पति जैसे सबसे बड़े ग्रहों के छोटे आकार वाले अनेक उपग्रह हैं, जबकि बुध तथा शुक्र के पास एक भी उपग्रह नहीं है।

(4) ग्रहों का परिभ्रमण कक्ष-

        इस परिकल्पना के अनुसार ग्रहों के परिभ्रमण कक्ष (Orbit) अथवा ग्रह पथ को सूर्य के कक्ष (orbit) से मेल नहीं खाना चाहिये, बल्कि ग्रह-कक्ष को सूर्य कक्ष से एक निश्चित कोण पर झुका होना चाहिये, क्योंकि सूर्य की आकर्षण शक्ति से ग्रह झुक जाता है। यह तथ्य भी वर्तमान ग्रहों के कक्ष से पूर्णतया मेल खाता है, क्योंकि प्रत्येक ग्रह-कक्ष झुका हुआ है। 

प्रत्येक ग्रह का कोणीय झुकाव

ग्रह झुकाव
बुध 7°
शुक्र 3.5°
पृथ्वी 23.5°
मंगल 2° 
बृहस्पति 1° 
शनि 2.5° 
अरुण 0° 
वरुण 2°
कुबेर 17°

(5) निस्सृत वायव्य पदार्थ का आकार-

        पास आते हुये तारे की ज्वारीय शक्ति से सूर्य से जो फिलामेन्ट निकला वह सिगार के आकार का क्यों हो गया? इसका मुख्य कारण पास आते हुये तारे की आकर्षण शक्ति में विभिन्नता का होना ही बताया जाता है। अर्थात् तारा दूर था तो कम आकर्षण के कारण कम पदार्थ बाहर निकला तथा तारा ज्यों-ज्यों पास आता गया, बढ़ती आकर्षण शक्ति से पदार्थ की मात्रा बढ़ती गयी तथा तारे के सूर्य से निकटतम दूरी पर आने पर निस्सृत पदार्थ सबसे अधिक था।

           पुन: तारे के दूर जाने से आकर्षण शक्ति में कमी के कारण निस्सृत पदार्थ की मात्रा घटती गयी। इस प्रकार कहा जा सकता है कि निस्सृत पदार्थ (Ejected matter) तारे की आकर्षण शक्ति के अनुपात में थे।

परिकल्पना में संशोधन

       सन् 1929 ई. में हेरोल्ड जेफरीज महोदय ने इस परिकल्पना को संशोधित करते हुए बताया कि ग्रहों की उत्पत्ति फिलामेंट बनने से नहीं हुई है, वरन् साथी तारा और सूर्य के आपस में टकराने से हुई है। साथी तारा और सूर्य के बीच जब टक्कर होती है तो कुछ पदार्थ सूर्य से बाहर निकल आते हैं और बाद में संगठित एवं शीतल होकर 9 ग्रहों का निर्माण करते हैं।      

     जेफरीज के इस संशोधन के मानने पर ग्रहों के परिभ्रमण (Rotation) सम्बन्धी अनेक कठिनाईयां सुलझ जाती हैं।

मूल्यांकन

         जीन्स द्वारा प्रतिपादित तथा जेफरीज द्वारा संशोधित एवं परिवर्द्धित ‘ज्वारीय परिकल्पना’ को बहुत समय तक समर्थन प्राप्त होता रहा तथा लोगों में इसके प्रति अधिक विश्वास हो गया था क्योंकि जीन्स को यह विश्वास था कि ब्रह्माण्ड की ग्रह-प्रणाली का निर्माण एक अनुपम विधान है।

         परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इस विचारधारा की कटु आलोचनाएँ की गयी हैं तथा वर्तमान वैज्ञानिकों को जीन्स की यह परिकल्पना मान्य नहीं है। यदि कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों के इस परिकल्पना में संशोधन मान लिये जाय तो सचमुच यह परिकल्पना बड़ी हद तक पृथ्वी की उत्पत्ति के विषय में सही ज्ञान दे सकती है।

आलोचनाएँ

      इस परिकल्पना के निम्नलिखित आलोचनाएँ बतायी जा सकती हैं:-

⇒ एक तारे से दूसरे तारे इतना दूर है कि वो एक-दूसरे के समीप आ ही नहीं सकता।

⇒  रसेल का कहना है कि इस सिद्धांत के आधार पर इतना विशालकाय सौरमण्डल का निर्माण नहीं हो सकता।

⇒ सूर्य का आंतरिक भाग अत्यधिक गर्म है इसके कारण सूर्य के आंतरिक भाग से पदार्थ स्वंय ही निकलने की स्थिति में होती है। विशालकाय तारा सूर्य के पास से होकर गुजरा होगा तो तापमान में वृद्धि हुई होगी, ऐसी स्थिति में सूर्य से अलग हुए पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाने की प्रवृति रखेंगें न कि ठंडा होकर ग्रह का निर्माण करेंगें।

⇒ यह सिद्धांत ग्रहों के कोणीय वेग की व्याख्या नहीं करता।

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