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37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व



      भूमि की आवश्यकतानुसार सिंचाई द्वारा पानी उपलब्ध कराने के लिए जिस प्रारूप, संयंत्र तथा तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, उसे ही सिंचाई व्यवस्था कहते हैं। देश के विभिन्न भागों में सिंचाई प्रणाली वहाँ के भू संरचना, जलवायु, जल की उपलब्धता आदि विभिन्न परिस्थितियों द्वारा निर्देशित होती है। इसलिए देश के विभिन्न भागों में सिंचाई की पद्धतियों में पर्याप्त असमानता पायी जाती है, हमारे देश में सिंचाई के जिन विविध साधनों का प्रयोग किया जाता है उनका संक्षिप्त वर्णन एवं महत्व निम्नानुसार है:-

1. कुएं एवं नलकूप

2. तालाब

3. नहरें

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ

1. कुआँ एवं नलकूप:-

       भारत में पानी के लिए कुओं का प्रयोग प्राचीन समय से ही होता आ रहा है और वर्तमान में भी यह जल प्राप्त करने या सिंचाई का एक महत्वपूर्ण साधन है। वर्तमान में हमारे देश में लगभग 89.6 लाख कुआँ हैं, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र के लगभग 21.1 प्रतिशत भाग की सिंचाई करते हैं, कुआँ प्रमुख रूप से दो प्रकार के होते हैं-

(i) कच्चा कुआँ

(ii) पक्का कुआँ,

      कच्चे कुओं को बनवाने के लिए कम खर्च करना पड़ता है, जबकि पक्के कुओं के निर्माण का खर्च अधिक है, कुआँ सिंचाई का सस्ता एवं सुगम साधन होने के कारण भारतीय किसान इसका उपयोग आमरूप में करता है, कुओं से गुजरात के कुल सिंचित क्षेत्र के 73 प्रतिशत, महाराष्ट्र के 60 प्रतिशत, राजस्थान के 46 प्रतिशत व मध्य प्रदेश के 37 प्रतिशत भाग की सिंचाई की जाती है।

      इस तरह उत्तर प्रदेश के 23.2 प्रतिशत, आन्ध्र प्रदेश के 6 प्रतिशत, तमिलनाडु 11 प्रतिशत, कर्नाटक 3 प्रतिशत तथा केरल के 4 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई कुओं के द्वारा की जाती है, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब, उड़ीसा व हरियाणा कुओं द्वारा सिंचाई करने वाले देश के अन्य राज्य हैं।

      ट्यूबवैल या नलकूप सिंचाई का एक नवीनतम साधन है, जिनका प्रयोग 1930 से आरम्भ किया गया था। यह एक अत्यधिक गहरा (30 फीट से 500 फीट तक) एवं संकरा छिद्र होता है (जिसकी खुदाई मशीन के द्वारा की जाती है) जिससे बिशेष यंत्र या विद्युत् मोटरों की सहायता से पानी निकाला जाता है।

       ये प्रायः ऐसे कुएँ होते हैं जिनसे निरन्तर जल प्राप्त होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, गुजरात नलकूपों द्वारा सिंचाई करने वाले प्रमुख भारतीय राज्य हैं। राज्यों के सिंचित क्षेत्र का 51.6 प्रतिशत उत्तर प्रदेश, 26 प्रतिशत पंजाब तथा 20.6 प्रतिशत हरियाणा में नलकूपों द्वारा सिंचाई की जाती है। इस प्रकार उत्तर प्रदेश नलकूपों से सिंचाई करने वाला देश का अग्रणी राज्य है।

         पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान नलकूपों से सिंचाई करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं। इस समय ट्यूबवैल या नलकूपों से लगभग 14.3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है, जो देश के कुल सिंचित क्षेत्र का 29.9 प्रतिशत है।

नलकूपों या ट्यूबवैलों का महत्व:-

(i) नलकूपों द्वारा कम वर्षा वाले देश के ऐसे भागों में सिंचाई की जा सकती है, जहाँ का जल स्तर नीचा हो वहाँ सिंचाई के अन्य साधन उपलब्ध न हों।

(ii) नलकूपों द्वारा किसान फसलों को इच्छित समय में पानी दे सकता है।

(iii) नलकूपों के जल में ऐसे कई रसायन होते हैं, जो फसलों के लिए उपयोगी होते हैं।

(iv) नलकूपों के संचालन व्यवस्था का व्यय कम होता है।

(v) नलकूपों द्वारा फसलों को आवश्यकतानुसार कम या अधिक जल दिया जा सकता है।

2. तालाब:-

      तालाब से आशय मानव या प्रकृति निर्मित उन जलाशयों से होता है जिसमें वर्षा का जल एकत्रित हो जाता है, तालाबों का आकार छोटे नालों या पोखरों से लेकर बड़ी-बड़ी झीलों के रूप में हो सकता है। ये दो प्रकार के हो सकते हैं-

(i) कृत्रिम तालाब,

(ii) प्राकृतिक तालाब।

      कृत्रिम तालाब भूमि खोदकर तथा बांध बनाकर वर्षा का जल एकत्र करके बनाये जाते हैं। ये अपेक्षाकृत छोटे तथा गहरे होते हैं। जब प्राकृतिक गड्ढों में जल एकत्र हो जाता है तो प्राकृतिक तालाब बन जाते हैं, ये बड़े व छिछले होते हैं।

        तालाब द्वारा देश के प्रायद्वीपीय भाग में जहाँ की भूमि पथरीली, असमतल तथा कुएँ एवं नहरों के निर्माण के लिए उपयुक्त नहीं है, इसी साधन से सिंचाई की जाती है। देश के कुल सिंचित क्षेत्र का लगभग 6.8 प्रतिशत भाग की सिंचाई तालाबों द्वारा की जाती है। तालाबों द्वारा सिंचाई करने वाले राज्यों में तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं पश्चिमी बंगाल प्रमुख हैं। इसके अलावा दक्षिणी झारखंड, दक्षिणी मध्य प्रदेश, द. छत्तीसगढ़ एवं दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के कुछ भागों में तालाबों द्वारा सिंचाई की जाती है।

       इस समय देश में लगभग 5 लाख बड़े और 60 लाख छोटे तालाब है, निजाम सागर (आन्ध्र प्रदेश), कृष्णराज सागर (कर्नाटक), जयसमन्द, उदय सागर एवं फतेह सागर (राजस्थान) आदि सिंचाई तालाबों के प्रमुख उदाहरण हैं। जयसमन्द सबसे बड़ा तालाब है।

तालाबों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) ऐसे भागों में जहाँ भूमि तल कठोर होता है, तालाब बनाना उपयुक्त रहता है।

(ii) इससे वर्षा जल का उचित उपयोग हो जाता है एवं पानी बेकार नहीं जाता।

(iii) तालाबों से सिंचाई के साथ-साथ मत्स्य पालन भी किया जा सकता है, जिससे कुछ सीमा तक खाद्य समस्या हल करने में सहायता मिल सकती है।

(iv) तालाबों द्वारा बिना मोटरों या पम्पों के बिना ही कुछ सीमा तक सिंचाई की जा सकती है।

(v) तालाबों का निर्माण ऐसे भागों में भी किया जा सकता है जहां कुएँ खोदना एवं नहर निकालना सम्भव नहीं होता।

      तालाबों द्वारा सिंचाई केवल वर्षा पर निर्भर रहती है, किसी-किसी वर्ष जब वर्षा कम होती है तो तालाब सूख जाते हैं और फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती है।

3. नहरें

       नहरें भारत में सिंचाई का सबसे बड़ा व प्रमुख साधन हैं, जिससे देश की लगभग 35.7 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र की सिंचाई की जाती है। इस समय देश में लगभग 1 लाख 50 हजार किमी लम्बी नहरें हैं जिससे 163.9 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जाती है। भारत की नहर प्रणाली विश्व की सबसे बड़ी नहर प्रणाली है। नहरों का विस्तार देश में प्रमुख रूप से उत्तरी भारत में मिलता है।

        सिंचित क्षेत्रफल की दृष्टि से 20 प्रतिशत नहरों द्वारा सिंचाई केवल उत्तर प्रदेश में होती है। आन्ध्र प्रदेश 10 प्रतिशत, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ 9.8 प्रतिशत, राजस्थान 8.3 प्रतिशत, पंजाब 8 प्रतिशत तथा हरियाणा 8 प्रतिशत, नहरों द्वारा सिंचाई प्राप्त करने वाले देश के अन्य प्रमुख राज्य हैं।

      भारत में नहरें तीन प्रकार की पायी जाती हैं:-

(i) बारहमासी नहरें- ये वे नहरें हैं जो पूरे वर्ष बहती हैं। इनका निर्माण नदियों में बांध बनाकर किया जाता है।

(ii) बरसाती नहरें- इन नहरों में पानी केवल बरसात में ही रह पाता है। इनका निर्माण मुख्य रूप से नदियों में बाढ़ के अतिरिक्त जल की निकासी के लिए किया जाता है।

(iii) स्टोरेज वर्क्स- इस प्रकार की नहरें पहाड़ी घाटियों में बांध बनाकर वर्षा का पानी एकत्र करके निकाली जाती हैं। इन नहरों का उपयोग तालाबों की तरह ही किया जाता है। इन्दिरा गांधी नहर (राजस्थान), सरहिन्द नहर (पंजाब), ऊपरी गंगा नहर, निचली गंगा नहर, मध्य गंगा नहर, पूर्वी यमुना नहर आदि सिंचाई नहरों के उदाहरण हैं।

नहरों द्वारा सिंचाई से लाभ-

(i) नहरों द्वारा खेतों को पानी देना सस्ता एवं सरल है।

(ii) बाढ़ के समय नदियों के पानी को नहरों में छोड़ा जा सकता है और बाढ़ से उत्पन्न संकट से निपटा जा सकता है।

(iii) नहरों को आन्तरिक परिवहन के साधन के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।

(iv) नहरों के किनारे वृक्षारोपण करके मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।

(v) भारत की अधिकांश नहरें बारहमासी हैं, अतः किसान आवश्यकतानुसार कभी भी अपने खेत में सिंचाई कर सकता है।

        नहर सिंचाई से जहाँ एक ओर अनेक लाभ हैं वहीं दूसरी और सिंचित क्षेत्र के जलमग्न होने का भय भूमि की क्षारीयता, अन्तिम छोर में पानी की कमी, पानी सम्बन्धी आपसी विवाद जैसी कई समस्याएँ भी हैं।

4. बहुउद्देशीय सिंचाई परियोजनाएँ-

         भारत में विभिन्न उद्देश्यों जैसे- सिंचाई, बाढ़ नियन्त्रण, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन, नहर परिवहन, पर्यटन और वन्यजीव संरक्षण इत्यादि की पूर्ति बहुउद्देशीय परियोजनाओं के तहत् की जाती है। इसलिए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने इन परियोजनाओं को “आधुनिक भारत का मंदिर” की संज्ञा दी है।

          भारत की प्रमुख बहुउद्देशीय परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं-

(i)  कोसी परियोजना 

(ii) दामोदर घाटी परियोजना 

(iii) रिहन्द बाँध परियोजना

(iv) हीराकुण्ड बाँध

(v) भाखड़ा नांगल परियोजना

(vi)  गंडक परियोजना

(vii) तुंग भद्रा परियोजना इत्यादि।

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है?



       वर्षा के अभाव में खेतों को कृत्रिम ढंग से जल पिलाने की क्रिया को सिंचाई करना कहा जाता है। भारत एक उष्ण कटिबन्धीय देश है जिसमें कृषि मुख्यतः मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है, किन्तु इस वर्षा की प्रकृति एवं उसके वितरण में कई दोष पाये जाते हैं। इन दोषों को दूर करने एवं नियमित कृषि करने का सर्वोत्तम उपाय सिंचाई की व्यवस्था करना है।

सिंचाई की आवश्यकता के कारण

(1) वर्षा की अनिश्चितता (Uncertainty of Rainfall):-

         भारत में वर्षा समय एवं स्थान की दृष्टि से अनिश्चित होती है तथा विभिन्न क्षेत्रों में उसकी मात्रा भी भिन्न होती है। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि प्रत्येक 7 वर्ष में दो बार सूखा पड़ जाता है। अकाल सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को क्षत-विक्षत कर देते हैं। कभी तो समय से बहुत पहले ही वर्षा हो जाती है और कभी लम्बे अन्तराल पर इसी कारण नियमित रूप में कृषि करने के लिए सिंचाई अनिवार्य है।

(2) वर्षा का असमान वितरण (Unequal Distribution of Rainfall):-

      यद्यपि देश में वर्षा का औसत 100 सेण्टीमीटर है, किन्तु इसका क्षेत्रीय वितरण असमान है। उदाहरण के लिए पश्चिमी तटीय क्षेत्रों और असम प्रदेश में 250 सेण्टीमीटर से भी अधिक वर्षा होती है। उत्तरी मैदान और प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में यह 100 से 200 सेण्टीमीटर ही होती है। पंजाब के मैदान और दक्षिण प्रायद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भागों में वर्षा की मात्रा केवल 25 से 100 सेण्टीमीटर होती है।

        गंगा नदी के पूर्वी मैदान तथा पश्चिमी समुद्री तट को छोड़ कर अन्य सभी भागों में वर्षा की कमी से सदैव अकाल का संकट बना रहता है। राजस्थान, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब में तो बहुत कम वर्षा होने से सिंचाई के बिना खेती करना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार दक्षिणी पठार के मध्यवर्ती एवं आन्तरिक भागों में कृषि बिना समुचित सिंचाई के सम्भव नहीं है, क्योंकि इन प्रदेशों में या तो सूखा पड़ता है या फिर वर्षा बहुत कम होती है।

(3) वर्षा का कुछ ही महीनों में सीमित होना (Restriction of Rainfall to few months):-

       भारत के सभी भागों में एक ही मौसम में वर्षा नहीं होती। शीतकाल में केवल दक्षिण-पूर्वी भाग में ही वर्षा होती है और शेष भाग सूखे रहते हैं। वर्षा का 74% जून से सितम्बर के महीनों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून द्वारा प्राप्त होता है, शेष का एक भाग शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी मानसून द्वारा एवं उत्तर-पश्चिमी भारत में शीतकालीन चक्रवातों द्वारा ऐसी स्थिति में वनस्पति अथवा कृषि उत्पादन के लिए लम्बे शुष्क काल में सिंचाई आवश्यक हो जाती है।

(4) जनसंख्या में वृद्धि (Growth in Population):-

      भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 121 करोड़ है। प्रतिवर्ष बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अधिकाधिक मात्रा में खाद्यान्नों की आवश्यकता पड़ती है। देश में इनका उत्पादन कम होने से अभाव के वर्षों में अनाज आयात करना पड़ता है।

           अतः आयात बन्द करने के लिए अतिरिक्त उत्पादन, गहरी खेती और प्रति हेक्टेअर एक से अधिक फसले उगाने से ही सम्भव है। इसके लिए सिंचाई करना अनिवार्य है। ऐसा अनुमान है कि यदि गेहूँ और धान उत्पादक क्षेत्रों में सिंचाई की समुचित व्यवस्था बराबर की जा सके तो इन अनाजों का अतिरिक्त उत्पादन प्रतिवर्ष 1 करोड़ से 1.5 करोड़ टन तक बढ़ाया जा सकता है।

(5) विशेष फसलों के लिए अधिक जल की आवश्यकता (Some Special Crops Require more Water):-

       चावल, गन्ना, जूट, मिर्ची, प्याज, लहसुन, आलू, आदि फसलों के लिए नियमित रूप से अधिक जल की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार ग्रीष्म काल की फसलें और बरसीम आदि के लिए प्रतिवर्ष 90 सेण्टीमीटर, रसदार फलों के लिए 100 सेण्टीमीटर तथा कठोर फलों के लिए 75 सेण्टीमीटर अतिरिक्त वर्षा की आवश्यकता पड़ती है। अतः अतिरिक्त जल की पूर्ति सिंचाई द्वारा की जाती है।

(6) मिट्टी की प्रकृति (Nature of Soil):-

       उत्तरी मैदान तथा नदियों के डेल्टाओं में उपजाऊ कांप मिट्टी पायी जाती है। जिससे थोड़ी सिंचाई करने से ही उत्पादन बढ़ जाता है। अन्य भागों में बलुई और दोमट मिट्टी अधिक समय तक जल रोकने में असमर्थ रहती है, अतः उसे कृषि योग्य बनाए रखने के लिए बार-बार सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

(7) चारागाहों के विकास के लिए (For Development (of Pastures):-

        पशु पालन और दुग्ध व्यवसाय को प्रोत्साहन देने के लिए प्राकृतिक चारागाहों की रक्षा करना आवश्यक है तथा नए चारागाहों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल की उपलब्धता होना आवश्यक है।

(8) व्यावसायिक फसलों में वृद्धि के लिए (For Increas- ing Commercial Crops):-

         कृषि के अन्तर्गत कुल क्षेत्र के 20% पर व्यावसायिक फसलें पैदा की जाती हैं, जिनसे कृषि उत्पादन के कुल मूल्य का 35% प्राप्त होता है। इन फसलों के अन्तर्गत केवल 16% भाग को ही सिंचाई की सुविधाएँ उपलब्ध हैं। चूंकि व्यावसायिक फसलों के निर्यात द्वारा भारत को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 9% विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है और देश के उद्योगों के लिए कच्चा माल मिलता है, अतः इनके उत्पादन में वृद्धि करने के लिए सिंचाई की विशेष आवश्यकता पड़ती है।

(9) भारत में वर्षा प्रायः तेज बौछारों के रूप में होती है जो कृषि के लिए हितकर नहीं है। इससे वर्षा का जल भूमि में रिस नहीं पाता और भूमि प्यासी रह जाती है। निरन्तर फसलों के उत्पादन के लिए तब सिंचाई करना अनिवार्य हो जाता है।


प्रश्न प्रारूप

1. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? विवेचना कीजिये।

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश



        भारत एक कृषि प्रधान देश है, परन्तु यहाँ कृषि की दशा संतोषजनक नहीं है। भारत की जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि कार्य में लगा हुआ है लेकिन इसके उपरान्त भी भारतीय कृषक की दशा अच्छी नहीं है। निम्न स्तर पर सीमित विकास के बावजूद आज भी भारतीय कृषक परम्परावादी हैं।

        भारतीय किसान कृषि कार्य को एक व्यवसाय के रूप में नहीं करता है, बल्कि जीविकोपार्जन के लिए करता है। कृषि की पुरानी विधियों, पूँजी की कमी, भूमि सुधार की कमी, विपणन एवं वित्त सम्बन्धी कठिनाइयों आदि के कारण भारतीय कृषि की उत्पादकता अत्यन्त न्यून है। अब नई पीढ़ी में शिक्षा एवं कृषि को कमाई का साधन मानने की प्रवृत्ति से भी कृषि एवं कृषक की आर्थिक दशा में कुछ सुधार आने लगा है। भारतीय कृषि की कुछ प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं, जिनसे भारतीय कृषि शताब्दियों से पीड़ित है-

(1) भूमि पर जनसंख्या का निरन्तर बढ़ता हुआ भार:-

     भारत में जनसंख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, अतः भूमि पर जनसंख्या का भार निरन्तर बढ़ता जा रहा है। जनसंख्या वृद्धि के कारण प्रतिव्यक्ति उपलब्ध भूमि का औसत कम होता जा रहा है। 1921 में यह 0.8 हेक्टेयर था, 1931 में 0.72, 1941 में 0.64, 1951 में 0.75 तथा 1981 में घटकर यह 0.18 एवं 2011 में 0.12 हेक्टेयर हो गया, जबकि विश्व का यह औसत 0.2 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है। विश्व के कुछ देशों में जैसे- कनाडा में 2.12 है, अर्जेन्टाइना में 1.25 है, रूस में 1.03 है, सं. रा. अमेरीका में 0.89 तथा आस्ट्रेलिया में 3.39 हेक्टेयर प्रति व्यक्ति है।

(2) भूमि का असमान वितरण:-

       भारत में भूमि का वितरण बहुत ही असमान एवं असन्तुलित है। देश में आज भी 62 प्रतिशत कृषि भूमि केवल 10 प्रतिशत किसानों के पास है तथा शेष 38 प्रतिशत भाग ही 90 प्रतिशत किसानों के पास है। इस तरह एक ओर जहाँ बड़े किसान अपनी भूमि क्षमता का समुचित उपयोग नहीं कर पाते वहीं दूसरी ओर छोटे किसान अपनी गुजर बसर करने में असमर्थ रहते हैं। यद्यपि भारत में 1952 में जमींदारी प्रथा का उन्मूलन किया जा चुका है, लेकिन स्थिति में आशाजनक सुधार अभी तक नहीं हो पाया है।

(3) कृषि जोतों का बिखराव एवं भूमि का विभाजन:-

       भारत में उत्तराधिकार के नियमों के कारण भूमि का बंटवारा होता रहता है। इस कारण खेतों का आकार बहुत छोटा हो गया है। छोटे-छोटे खेत एक स्थान पर न होकर अनेक स्थानों पर बिखरे हुए रहते हैं। इस कारण आधुनिक यंत्रों के द्वारा उन्नत कृषि नहीं की जा सकती है।

(4) कृषि की न्यून उत्पादकता:-

       1970 तक देश के अधिकांश भागों में औसत उत्पादन स्तर अधिकांश विकसित व कई विकासशील देशों (मैक्सिको, ब्राजील, फिलीपीन्स) से भी काफी कम रहा, लेकिन अब हरित क्रांति एवं सरकारी प्रयत्नों से स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। गेहूँ, चावल, तिलहन, दलहन आदि फसलों के प्रति हेक्टेयर उत्पादन में वृद्धि हुई है।

(5) सिंचाई के साधनों की कमी:-

       भारतीय कृषि अधिकतर मानसूनी वर्षा पर ही निर्भर है और मानसून हमेशा अनियमित बना रहता है। ऐसी स्थिति में सिंचाई के साधनों की अत्यधिक आवश्यकता होती है, किन्तु दुर्भाग्य है कि आज भी सिंचाई के पर्याप्त साधनों का अभाव है। सिंचाई के साधनों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि कार्य करना कठिन होता है। अतः आज भी भारतीय कृषि की दशा में सुधार नहीं हो सकी।

(6) कृषि आदानों का अभाव:-

       भारतीय कृषकों के पास कृषि आदानों (कृषि सामाग्रियों) का हमेशा अभाव बना रहता है, जिससे वे अच्छे बीज, खाद, सिंचाई, कृषि यंत्र आदि का उपयोग नहीं कर पाते हैं। इन साधनों के अभाव में कृषि कार्य करने पर प्रति हेक्टेयर उत्पादन कम होता है।

(7) साख सुविधाओं की कमी:-

        भारतीय कृषकों की आर्थिक स्थिति कमजोर है, इस कारण उनके सामने हमेशा आर्थिक संकट बना रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में साख-सुविधाओं का आज भी अभाव है। अतः कृषकों को वित्त पूर्ति के लिए गांव के महाजन एवं साहूकारों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहूकार ऊँची ब्याज दर वसूल करता है एवं कृषकों के साथ धोखाधड़ी करता रहता है। इस प्रकार एक बार जो कृषक साहूकार के चंगुल में फंस जाता है फिर उसका बाहर निकलना कठिन होता है। ये देशी महाजन बड़ी मात्रा में कृषकों का शोषण करते हैं, फलतः कृषक अपनी दीन-हीन दशा के कारण कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दे पाता।

(8) मृदा अपरदन:-

        मृदा अपरदन के कारण कृषि भूमि को क्षति पहुंचती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। जहां प्रतिवर्ष विस्तृत क्षेत्रों में भूमि का ह्रास हो जाता है वहां भूमि कृषि योग्य नहीं रहती है।

(9) धार्मिक एवं सामाजिक कारण:-

      भारतीय कृषक भाग्यवादी एवं अंधविश्वासी होता है। वह कृषि के विकास पर व्यय करने की अपेक्षा शादी, मृत्यु-भोज, सामाजिक रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। इस प्रकार कृषि के विकास की ओर ध्यान नहीं दिया जाता है।

(10) कृषि बीमा का अभाव:-

        भारत में कृषि बीमा का अभाव है। किसानों को किसी-किसी वर्ष बाढ़, सूखा एवं विभिन्न प्रकार के कृषि रोगों से कृषि उत्पादन में भारी क्षति उठानी पड़ती है, यहाँ तक कि उस आय से वह उत्पादन का खर्च भी प्राप्त नहीं कर पाता और उनकी स्थिति इतनी दयनीय हो जाती है कि वे आत्महत्या तक के लिए विवश हो जाते हैं। ऐसी अनिश्चितताओं के कारण भारतीय किसान फसलों का व्यावसायिक उत्पादन करने से डरता है, यदि देश में कृषि बीमा का सर्वव्यापीकरण हो जाए तो कृषि उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।

(11) विपणन व्यवस्था का अभाव:-

        विपणन व्यवस्था का अभाव भारतीय किसान की एक महत्वपूर्ण समस्या है, क्योंकि इसके अभाव में किसान को अपने फसल उत्पादों का उचित मूल्य प्राप्त नहीं हो पाता है। विपणन की व्यवस्था नगरों या कस्बों तक सीमित है, जबकि फसलों का अधिकांश उत्पादन गाँव में ही होता है। अतः उसे अपना माल मण्डियों तक ले जाने के लिए अतिरिक्त परिवहन व्यय की आवश्यकता पड़ती है, विवश होकर वह अपना माल गाँव में कम मूल्य पर ही बिचौलियों को बेच देता है जिससे उसे कम लाभ प्राप्त होता है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार भारतीय कृषि अनेक समस्याओं से ग्रस्त है, और आज भी विकसित देशों की तुलना में काफी पिछड़ी स्थिति में है, इसके विकास के लिये अनेकानेक कारगर कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश पर प्रकाश डालिए।


32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



      राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार “बाढ़ वह स्थिति है जब नदी का जल खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती है।” खतरे का निशान स्तर 50 वर्षों के औसत प्रवाह का स्तर है। संपूर्ण भारत में 80 नदियों के जलस्तर के गहन अध्ययन के बाद खतरे का निशान का निर्धारण किया गया है।

      बाढ़ के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है जिसकी चर्चा नीचे के शीर्षक में किया जा रहा है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

          मानसून अपने अनिश्चिता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। अति अनुकूल मानसून के स्थिति में भारी वर्षा होती है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। मानसून के अनिश्चितता की व्याख्या करने के लिए तापीय सिद्धांत, पछुआ हवा सिद्धांत, जेट स्ट्रीम सिद्धांत और एल-नीनो सिद्धांत दिया गया है। लेकिन अंतिम दो सिद्धांत ज्यादा प्रासंगिक है।

(ii) वनों का विनाश और मृदाक्षरण-

        वनों के विनाश से सतह की मिट्टी कमजोर होती है और कमजोर होने की स्थिति में वर्षा के बाद मिट्टी का तेजी से अपरदन होता है जिससे चट्टानें नग्न अवस्था में आ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप नग्न चट्टानों में ग्राहय क्षमता निम्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में जब पुनः वर्षा होती है तो बहाव तेज हो जाता है और बेसिन क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। शिवालिक प्रदेश में और मुख्यतः हिमाचल प्रदेश में जलस्तर का गिरना और पंजाब में बाढ़ आने की समस्या इससे जुड़ी हुई है।

       उत्तर-पूरब भारत और गढ़वाल क्षेत्र में भी इसी के कारण गंभीर समस्या उत्पन्न हुई है। हाल के वर्षों में राजस्थान और गुजरात आदि जैसे राज्यों में भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती रही है। यह निम्न वर्ष का क्षेत्र है लेकिन जब आकस्मिक तीव्र वर्षा होती है तो नग्न चट्टानों पर जल का बहाव तेजी से होता है और आकस्मिक बाढ़ की स्थिति को उत्पन्न करता है।

(iii) नदी के ताली में मालवों का जमाव-

          खास करके मैदानी भारत में नदियों का ढाल अत्यंत ही निम्न है। ऐसी स्थिति में चौड़ी घाटी के तली पर मलवे का जमा हो जाता है और मानसून ऋतु में जलस्तर तेजी से ऊपर उठ जाता है और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले बाढ़ इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।

(iv) नदियों के स्रोत क्षेत्र में भारी वर्षा का होना-

      हिमालय का दक्षिणी ढाल पर वर्षा अत्यधिक होती है। इसका परिणाम यह है कि मैदानी क्षेत्र में कम वर्षा के बावजूद बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। जैसे वर्षा नेपाल में होने के कारण उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(v) नदियों के मोड़दार प्रवाह-

       मोड़दार नदियों के प्रवाह से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। यह स्थिति मुख्यत: पूर्वी गंगा के मैदान में देखने को मिलती है। पश्चिमी पंजाब और हरियाणा में समानांतर बहने वाली नदियों का जल वृहत क्षेत्र में नहीं फैलता है जबकि पूर्वी भारत की मोड़दार नदियां जल को बहुत क्षेत्र में फैला देती है।

(vi) उच्च ज्वार-

      तटवर्ती क्षेत्रों में चक्रवात के साथ आने वाले उच्च ज्वार भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। ऐसी स्थिति में नदी का मुहाना बंद हो जाता है और नदी का जल पीछे धकेला जाने लगता है जिससे नदियों के जलस्तर में उछाल आता है। उठता हुआ जल वृहत क्षेत्र में फैल जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। इसी प्रक्रिया से गोदावरी, महानदी, कृष्ण, कावेरी आदि के बेसिन क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(vii) भूस्खलन-

       उत्तरी-पूर्वी भारत के हिमाचल प्रदेश में भू-स्खलन से भी बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसमें बड़े-बड़े चट्टानी टुकड़े भूस्खलित होकर नदियों में चली जाती है और मार्गों को अवरुद्ध कर देती है जिससे नदियों के ऊपरी भाग में पानी फैल कर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है। हिमाचल प्रदेश में तिब्बत की ओर से आने वाली पारछु नदी के कारण कुछ वर्ष पहले ही गंभीर बाढ़ की समस्या उत्पन्न हुई थीपरिछु नदी

(viii) नदियों के द्वारा मार्ग परिवर्तन-

          पृथ्वी के घूर्णन गति के प्रभाव के कारण मैदानी भारत की नदियां मार्ग परिवर्तन करती रहती है क्योंकि उत्तर भारत की नदियां प्राय: उत्तर से दक्षिण की तरफ बहती है लेकिन घूर्णन गति पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। ऐसी स्थिति में बड़ी नदियों के जाल में घूर्णन के विपरीत दिशा में प्रवाह की प्रवृत्ति विकसित होती है, जिसे नदियों के पश्चिमी तट का अपरदन अधिक होता है। ऐसी स्थिति में नदी में स्थानांतरण की प्रवृत्ति होती है जिससे कई नदियों के द्वारा पुराना मार्ग का निर्माण हो जाता है। वहां वर्षा के दिनों में जल जमाव की स्थिति होती है जो की बाढ़ की स्थिति का दो तक द्योतक है।

(ix) पठारीय स्थित-

        पठारीय क्षेत्रों से निकलने वाली नदियों में भी बाढ़ आती है। यहां धरातल पर अगम्य चट्टानों की उपस्थिति तथा तीव्र वर्षा के कारण बार की स्थिति उत्पन्न होती है। लेकिन बाढ़ की अवधि लंबी नहीं होती है। नदियों के ढाल तीव्र होते हैं, इसलिए पानी तुरंत बह जाती है।

(x) गंगा द्वारा सहायक नदी के जल स्रोतों में अवरोध-

         गंगा मैदानी भारत की रीढ़ के समान एक विशाल नदी है जिसमें उत्तर एवं दक्षिण दिशा से आकर अनेक नदियां मिलती है। जब गंगा का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर रहा होता है, ठीक उसी समय अगर सहायक नदियों का भी जलस्तर ऊपर उठने लगता है तो सहायक नदी के जल को गंगा ग्रहण नहीं कर पाती है जिसके परिणामस्वरुप सहायक नदियों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी तरह नदियों के संगम वाले स्थान पर सहायक नदी गंगा के स्वतंत्र जल के प्रवाह को बाधित करती है, जिसके कारण ऊपरी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

(xi) उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र की बनावट-

         उत्तर भारत का मैदानी क्षेत्र हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत के बीच कभी टेथिस सागर का गर्त रहा है। इसी में मालवा के जमाव से मैदानी क्षेत्र का यहाँ निर्माण हुआ है। यह क्षेत्र आज भी टेथिस सागर के छाड़न क्षेत्र के रूप में जो वर्षा ऋतु में अस्थाई समुद्र में बदलकर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करती है।

(xii) मानवीय कारण-

         मानव निर्मित बड़े-बड़े बांधों का जलस्तर जब ऊपर उठने लगता है तो अचानक जल को छोड़ दिया जाता है जिसके कारण निम्न मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है। फरक्का बांध के कारण बांग्लादेश में बाढ़ आती है। मैटूर डैम के कारण कावेरी के डेल्टाई क्षेत्रों में बाढ़ आती है। टिहरी के कारण उत्तर प्रदेश और बिहार में बाढ़ आने की संभावना रहती है।

         आधुनिक युग में नगरीय बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होने लगी है जो पूर्ण रूपेण मानवीय कर्ण के कारण उत्पन्न होती है। जैसे नगरों में मकानों के जंगल कंक्रीट के द्वारा खड़ा किया जा रहा है। जल रिचार्ज वाले क्षेत्रों पर मकान बना दिए गए हैं। नालियों में पॉलिथीन के जमाव के कारण प्रवाह रुक जाने से आकस्मिक वर्षा होने पर बाढ़ की स्थिति उत्पन्न होती है।

बाढ़ वाले क्षेत्रों का वितरण

        राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार भारत में 342 मिलियन हेक्टेयर भूमि बाढ़ से प्रभावित है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्र मुख्यतः पूर्वी भारत में स्थित है। गहनता के दृष्टि से असम सर्वाधिक प्रतिकूल क्षेत्र है लेकिन वास्तविक हानी के दृष्टि से उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य प्रमुख है।

     राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम और आंध्र प्रदेश ऐसे राज्य है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ आते हैं। कुल हानि का दो-तिहाई भाग उत्तर प्रदेश, बिहार और आंध्र प्रदेश में होता है। 60% बाढ़ प्रभावित क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र में स्थित है और बाढ़ के विभिषका के लिए कभी कोसी, दामोदर, ब्रह्मपुत्र आदि नदियां प्रसिद्ध थी। कभी कोसी बिहार का शोक तो दामोदर को बंगाल का शोक कहा जाता था लेकिन वर्तमान समय में कुछ नवीन नदियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को विस्तार दिए हैं जिसमें महानदी और तीस्ता नदी प्रमुख है।

          बाढ़ के प्रभाव का समय सभी क्षेत्रों में एक समान नहीं होता है। सबसे लंबी अवधि ब्रह्मपुत्र के मैदान में होती है जहां प्रतिवर्ष बाढ़ का प्रभाव 6 सप्ताह तक या अधिक रहता है। उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में इसका प्रभाव 4 से 6 सप्ताह होते होता है।

       पूर्वी तटवर्ती मैदानी और डेल्टाई क्षेत्रों में इसका प्रभाव 1 से 3 सप्ताह तक रहता है तथा पंजाब, नर्मदा और ताप्ती के घाटियों में सामान्यत: इसका प्रभाव एक सप्ताह होता है और आकस्मिक बाढ़ वाले क्षेत्रों में गुजरात, राजस्थान और पूर्व के पर्वतीय क्षेत्र में इसका प्रभाव एक सप्ताह से कम होता है। लेकिन उत्तर-पूर्वी भारत में बाढ़ के बारंबारता अधिक होने के कारण कुल प्रभाव का समय 4 सप्ताह से अधिक हो जाता है। बाढ़ प्रणव क्षेत्र को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।-

भारत में

समाधान हेतु किया गया प्रयास-

           आजादी के पूर्व इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया था। जो भी प्रयास हुए हैं वह आजादी के बाद के हैं। इन प्रयासों में नदी घाटी प्रदेश के विकास की एकीकृत योजना सबसे प्रमुख है। इसके अंतर्गत बहुउद्देशीय नदी घाटी योजना सबसे प्रमुख है। यह ऐसी योजना है जो बाढ़ और सुखे दोनों ही समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। दामोदर पर डीवीसी और कोसी पर हनुमान नगर में, गंडक पर भैंसा लोटन में बांध बनाकर बाढ़ की समस्या एवं प्रभाव को कम किया गया है।

         इस योजना के साथ वनों का विकास, वृक्षारोपण तथा मृदा संरक्षण जैसी भी एकत्रित योजनाएं चल रही है। सामाजिक वानिकी का कार्यक्रम संपूर्ण भारत में चलाया जा रहा है। वन रोपण कार्यक्रम में नदी के स्रोत क्षेत्र में प्रमुख रूप से वृक्ष लगाए जा रहे हैं ताकि मृदा कटाव को रोककर बार की समस्या को कम कर सके।

      बाढ़ नियंत्रण के लिए अनेक विशिष्ट कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। ऐसे कार्यक्रमों में मृदा संरक्षण हेतु बेडिंग तथा कंटूर कृषि का विकास किया जा रहा है। बेडिंग के तहत छोटी-छोटी सरिताओं के प्रवाह को बाधित करने का प्रयास किया जाता है जबकि कन्टूर कृषि के तहत पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च रेखा के सहारे जुताई का कार्य किया जाता है ताकि मृदा का अपरदन न हो सके।

      भारत में पर्वतीय क्षेत्रों एवं वन्य क्षेत्रों में झूम कृषि के द्वारा वनों का विनाश हो रहा है। अतः इसे रोकने के लिए 1976 ई० में ही “झूम प्रीवेंशन फार्मिंग एक्ट” का निर्माण किया गया था। इससे वनों का संरक्षण होगा और बंजर भूमि का विकास नहीं होगा इससे बाढ़ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।

       बाढ़ के प्रभाव को रोकने के लिए बाढ़ के पूर्व सूचना देने का भी प्रयास किया जा रहा है और इस दिशा में विशेष कार्य भारतीय बाढ़ आयोग और भारतीय मौसम विज्ञान ने किया है। वर्तमान समय में कृत्रिम उपग्रहों का सहारा लेकर सात केन्द्रों पर बड़े और 147 स्थानों पर छोटे भविष्यवाणी केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनका 57% भविष्यवाणी सही रहता है। बड़े केंद्र के रूप में है- भुवनेश्वर में महानदी पर, दिल्ली में यमुना नदी पर, गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी पर, जलपाईगुड़ी में तीस्ता नदी पर, लखनऊ में गोमती नदी पर, पटना में गंगा पर और सूरत में ताप्ती नदी पर स्थापित किया गया है।

          बाँध, तटबंध, विशिष्ट प्रकार के खुले पूल और जल निकासी का विकास कार्य भी वृहत स्तर पर किया गया है। जिसका मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा है। इन बचाव कार्यक्रम के तहत 1954 से 1987 के बीच 14511 किलोमीटर तटबंधों का निर्माण किया गया था। 2838 किलोमीटर जल निकासी का विकास किया गया था।

          नदी के तली से मलवों को निकालने का कार्यक्रम बहुत खर्चीला है। सामान्यत: यह कार्य उन क्षेत्रों में किया जा रहा है जहाँ नदी का उपयोग नावों के लिए किया जाता है।

        ऊपर वर्णित कार्यक्रमों के लिए प्रत्येक पंचवर्षीय योजनाओं में बाढ़ हेतु विशिष्ट राशियों का आवंटन होता है। जैसे प्रथम पंचवर्षीय योजना में 13.77 करोड रुपए आवंटित किए गए थे। जबकि आठवीं में 1623 करोड रुपए जारी किए गए थे।

        बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई तात्कालिक कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं। इसके लिए पैसों का आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवीं वित्त आयोग के अनुसार हानि की समीक्षा का कार्य केंद्र सरकार का होगा। केंद्र द्वारा समीक्षा कर केंद्रीय सहयोग शुरू किया जाएगा। सरकार बाढ़ संभावित वाले क्षेत्र से बचाकर सुरक्षित स्थानों पर ले जाती है।

        बाढ़ आ जाने पर बाढ़ राहत कार्यक्रम चलती है। हेलीकॉप्टर, गोताखोरों, प्लास्टिक बोट का सहारा लेती है। भोजन के पैकेट का वितरण करती है। पेयजल हेतु जलापूर्ति किया जाता है। मवेशियों हेतु चारा उपलब्ध कराए जाते हैं। बाढ़ समाप्त होने पर अनेक संक्रामक बीमारियों से बचाव हेतु टीका, दवा का प्रबंध करती है। जल निकासी, संचार व्यवस्था और परिवहन आदि का प्रबंध किया जाता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावे स्वंय सेवी संस्थाओं का भी सहारा लिया जाता है।

सुझाव-

        यद्यपि बाढ़ की समस्या से निपटने हेतु कई प्रयास किया जा रहा है फिर भी समस्या लगभग यथावत है। अतः इस समस्या से निपटने हेतु और अधिक पेनिट्रेटिव योजनाओं की जरूरत है। पुनः टिकाऊ विकास नीति के अंतर्गत ऐसी योजनाओं की जरूरत है जिसमें पर्यावरण के असंतुलन किए बगैर इन समस्याओं का समाधान किया जा सके।

      बाढ़ एवं जल जमाव वाले क्षेत्रों में ऐसी कृषि का विकास किया जाए जो बाढ़ के स्थिति में भी उग सके। जैसे चावल के ऐसे किस्म विकसित किए जाए जो 15 से 20 दिन तक चल मग्न रहने पर भी स्वस्थ रहें। द्वितीय जल कृषि का विकास किया जाए। इसके लिए मखाने, सिंघाड़े की खेती किया जा सकता है तथा बड़े पैमाने पर मछली का पालन किया जा सकता है।

        बाढ़ वाले क्षेत्रों में निर्माण तकनीक को विकसित किया जाए। बाढ़ वाले क्षेत्रों में सीमेंट एवं ईट से मकान निर्माण की गतिविधि को प्रोत्साहित किया जाए।

       बाढ़ वाले क्षेत्रों में ऐसे पुल निर्माण तकनीक पर बल दिया जाए जिससे जल ऊपर एवं नीचे दोनों से आसानी से बह सके। इसके लिए खुला पुल का निर्माण सर्वाधिक उपयोगी होगा। इसके साथ ही वानिकी कार्यक्रम और अन्य विकास कार्यक्रम को भी तीव्रता से लागू करने की आवश्यकता है।

         भारत में बाढ़ नियंत्रण में सबसे बड़ी बाधा नेपाल से आने वाली नदियों के जल को रोका जाना है। अतः इस कार्य के लिए भारत को अंतर्राष्ट्रीय कानून को पालन करना पड़ता है। ऐसे में भारत सरकार एवं राज्य सरकारें नेपाल से आने वाली नदियों को अनेक चैनलों में विभाजित कर गंगा नदी में जल को गिराकर समाधान का प्रयास करना चाहिए।

      बाढ़ प्रणव वाले क्षेत्रों में कृत्रिम उपग्रह के माध्यम से सूचना तंत्र को और प्रभावी बनाए जाने की आवश्यकता है।

       भूमि जल रिचार्ज करने वाले तकनीक को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। इसके लिए जोहार, आहरा, कच्चे कुआं एवं तालाब, पाइन इत्यादि को पुर्नोद्धार किया जाए।

        बाढ़ राहत कार्यक्रम को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सही तरीके से चलाया जाए। अंततः क्रांति के तहत नदी जोड़ो कार्यक्रम को अतितीव्र गति से कार्य रूप दिया जाए। जहां आवश्यक हो वहां पर बड़े बांध और छोटे बांधों का निर्माण किया जाए। नगरों में “वाटर हार्वेस्टिंग” को अनिवार्य गतिविधि के रूप में शामिल किया जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र, समाधान के दिशा में किया गया प्रयास एवं सुझाव की चर्चा करें।

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान



परिभाषा- 

          भारतीय मौसम आयोग (IMO) ने सूखा को परिभाषित करते हुए बतलाया है की मई माह के मध्य से अक्टूबर माह के मध्य लगातार 4 सप्ताह तक वर्षा की मात्रा 5 सेमी० या उससे कम हो, सूखा की स्थिति कहलाएगी। यही समयावधि मानसून के आगमन का है, इसीलिए इसे सूखा का पैमाना बनाया गया है। यानी मानसून के कमजोर होने पर सूखा की स्थिति लगभग तय है।

कारण-

       सूखे की स्थिति के लिए अनेक भौगोलिक कारक जिम्मेदार है-

(i) मानसून की अनिश्चिता-

        इसे फ्लोन का विषुवतीय पछुआ सिद्धांत, जेट स्ट्रीम व एल-नीनो से स्पष्ट किया जा सकता है।

(ii) वनों की कटाई व मृदा का अपरदन-

        वनों की कटाई से वायुमंडलीय आर्द्रता में कमी और तापमान में वृद्धि होती है, जिससे बादल निर्माण की प्रक्रिया बाधित होती है और वर्षा के अभाव में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

       मृदा अपरदन से मिट्टी का ऊपरी सतह अपरदित हो जाता है और नग्न चट्टाने दृष्टिगत होने लगती है। नग्न चट्टानों की जल ग्राहय क्षमता कम होती है। इससे प्रदेश का भूमिगत जलस्तर नीचे चला जाता है और सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है।

       पुन: मिट्टी के नमी में कमी आने से फसल मारी जाती है। ऐसी समस्या झारखंड के चतरा और पलामू बिहार के भभुआ और नवादा आदि जिलों में पाई जाती है। ऐसी ही समस्या चंबल, बेतबा और केन नदी के बेसिनों में भी मिलती है।

(iii) तापमान में वृद्धि-

        यह कारक मूलत: जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है। इससे वायुमंडलीय तापमान में लगातार वृद्धि की स्थिति है। नग्न चट्टानें सूर्याताप के प्रभाव में आ जाती है और वाष्पोत्सर्जन की क्रिया तेजी से होने लगती है और अधिक ताप के ही वाष्प संघनित नहीं हो पाते हैं, जिससे वर्षा नहीं हो पाती है। उत्तर भारत के पठारीय क्षेत्रों में सूखे के स्थिति का प्रमुख कारण यही है। साथ ही चंबल घाटी से लेकर झारखंड के चतरा जिला के बीच सूखा के लिए यही कारण प्रमुख है।

(iv) असमान वर्षा का वितरण-

          संपूर्ण भारत में वर्षा का वितरण असमान होने के कारण भी सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। न्यून वर्षा क्षेत्रों में इसकी प्रबलता तत्काल दृष्टिगोचर होती है।

सूखा जनित समस्याएँ

⇒ कृषि कार्य हेतु जलजमाव की समस्या

⇒ तापमान वृद्धि की समस्या

⇒ वन ह्रास व मृदा अपरदन की समस्या

⇒ पेय जल की समस्या

⇒ जलस्तर में गिरावट व भू-आर्द्रता में कमी

⇒ संक्रमण व बिमारियों के प्रकोप में वृद्धि

⇒ सरकारी व निजी कार्यों के संचालन में बाधा

वितरण-

       भारत में सुखा प्रभावित क्षेत्र मुख्यत: पश्चिम भारत में स्थित है। IMO के अनुसार 13 राज्यों के 67 जिलों में लगभग स्थायी तौर पर सूखे की स्थिति उत्पन्न होती है। भारत का मध्यवर्ती राज्य व पठारीय भाग इसके अंतर्गत आते है। लेकिन भौगोलिक वितरण के दृष्टि से अगर देखा जाए तो 50 सेमी० वार्षिक वर्षा से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में लगभग प्रत्येक वर्ष सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। भारत के सिंचाई अयोजनानुसार यह दायरा 75 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्र तक है। 75 सेमी० वर्षा रेखा भारत को सुखा व आर्द्र दो भागों में बांटता है। सूखा आगमन की बारंबारता के दृष्टिगत 100 सेमी० से कम वर्षा वाला क्षेत्र सूखे की सबसे अधिक संभावित क्षेत्र है।

भारत में सूखा के कारण

चित्र: भारत में वर्षा का सामान्य वितरण

         100 सेमी० से 150 सेमी० के बीच वाले क्षेत्रों में एक विशिष्ट स्थिति होती है। यहां कभी बाढ़, कभी सुखाड़ या बाढ़ एवं सुखाड़ की वैकल्पिक स्थिति देखने को मिलती है। उदाहरण के तौर पर बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल का उल्लेख किया जा सकता है। प्राय: 150 सेमी० से अधिक वर्षा वाला क्षेत्र अधिक वर्षा के बाद जद में क्षेत्र की लहलहाती फसलों को डूबो देती है और अंतत: सूखे की स्थिति उत्पन्न कर देती है।

सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए किए गए विकास कार्य:-

     इस दिशा में पहली योजना भारत में 1863 ई० में बनी थी जो आकाल आयोग के रिपोर्ट पर आधारित थी। इसके अंतर्गत नदियों से कुछ प्रत्यक्ष नहर निकले गए जिसमें सरहिंद नहर प्रमुख था। पंजाब राज्य में संप्रति नहर। परंतु, सुख से निजात हेतु वास्तविक प्रयास स्वतंत्रता के बाद किए गए। जिसके तहत दो महत्वपूर्ण स्वीकृत प्रयास थे- 

1. बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना

2. वानिकी व बंजर भूमि सुधार योजना

      बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजना में कावेरी जल कमान एरिया और भाखड़ा नांगल परियोजना प्रमुख था। कावेरी जल कमान एरिया तमिलनाडु के तंजौर जिला में स्थित है। पहले यह जिला सूखाग्रस्त था लेकिन आज हरित क्रांति का क्षेत्र बन चुका है। इस प्रकार भाखड़ा नांगल परियोजना से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कृषि कार्य में तेजी आई।

        वानिकी एवं बंजर भूमि की योजना द्वारा तापीय प्रभाव को कम किया गया है जिससे आर्द्रता में वृद्धि हुई। वानिकी एवं बंजर भूमि विकास योजना के द्वारा मिट्टी के नमी क्षमता में वृद्धि करने का प्रयास किया जा रहा है। 1967 ई० के सूखे के बाद सिंचाई संदर्भ को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है। 

       पांचवीं पंचवर्षीय योजना में “कमांड क्षेत्र विकास योजना” और “सूखाग्रस्त क्षेत्र विकास योजना” (DPADP) प्रारंभ की गई। प्रथम के तहत 97 कमांड क्षेत्र चिह्नित किए गए जैसे चंबल कमांड क्षेत्र, सोन कमांड क्षेत्र, इंदिरा कमांड क्षेत्र आदि। इसके अंतर्गत 189 लाख हैक्टेयर भूमि सिंचाई की व्यवस्था है।     

        DPADR संपूर्ण भारत में चलाए जा रहे हैं। शुष्क कृषि विकास, स्थानीय जल संसाधन का उचित प्रबंध, वैज्ञानिक भू-उपयोग पद्धति का विकास, ग्रामीण स्तर पर वानिकी व पशुपालन को प्रोत्साहन इस योजना के प्रमुख लक्ष्य है। सूखे की स्थिति में भी फसल कम से कम प्रभावित हो इसके लिए विशेष किस्म के बीज तैयार किया जा रहे हैं। जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उगाने हेतु कपास के PRS72, PRS73, PRS74 नमक बीज विकसित किया गया है। राजस्थान के लिए 100 दिन में उपजा लिए जाने वाले चावल के बीच तैयार किए गए हैं। इस क्षेत्र में नित नए शोध कार्य जारी है।

       सूखे से निजात हेतु आपातकालीन कार्यक्रम भी चलाए गए हैं। जिसका आवंटन वार्षिक बजट में किया जाता है। आठवें वित्त आयोग के अनुसार सूखाग्रस्त क्षेत्र में हुए हानि का जायजा व सहायतार्थ कार्य केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।

सुझाव-

     यद्यपि सूखाग्रस्त की समस्या के समाधान हेतु कई स्तरों पर प्रयास किए गए हैं, लेकिन यह समस्याएं आज राष्ट्रीय समस्या के रूप में कायम है। आज अधिक पेनेट्रेटिव योजनाओं, पर्यावरण हितैषी टिकाऊ विकास नीति, मानसून का सही आंकलन पर विशेष जोर देने की जरूरत है। नदी जोड़ योजना कार्य में तेजी लाने की आवश्यकता है।

⇒ बड़ी परियोजनाओं पर पुनः विचार करने की जरूरत है क्योंकि गहन आंकलन के बाद जयपुर पर्यावरण अध्ययन केंद्र ने संकेत दिया था की बड़ी परियोजनाएं मानसूनी जलवायु को बदल सकती है।

⇒ सूखाग्रस्त इलाकों में पशुपालन कृषि को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, क्योंकि चारा उत्पादन हेतु अधिक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है। यह कार्यक्रम राजस्थान में सफल भी हो रहे हैं। स्थानीय जल सुविधा व वर्षा जल संरक्षण पर विशेष ध्यान व जागरूकता लाने की जरूरत है।

⇒ बिहार राज्य पर विश्व बैंक की रिपोर्ट है कि यहां नहर के बदले ट्यूबवेल सिंचाई अधिक समीचीन है।

          अंततः सुखा का सामना सामूहिक प्रयास से ही संभव है। 

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