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27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।

27. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।



     अमेरीका में स्कूल व कॉलेजों में भूगोल का अध्ययन मध्य उन्नीसवीं सदी में यूरोपियनों द्वारा प्रारम्भ किया गया। हार्वर्ड , डार्टमाउथ, याले, मेरी, कोलम्बिया, प्रिन्स्टन व पेंसिलवेनिया आदि विश्व विद्यालयों में गणितीय भौतिक व ऐतिहासिक भूगोल की शिक्षा वैसे 1795 से दी जाने लगी थी। आरनोल्ड गुयोट (Arnold Guyot) अमेरीका में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था।

     अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है, वे संक्षेप में इस प्रकार हैं:-

(i) मानव भूगोल (Human Geography):-

        मानव भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान है। अमेरीका में सैम्पुल (E. C. Semple), हंटिंगटन (E. Huntington), बोमैन (I. Bowman), ग्रिफिथ टेलर (G. Tailor) जैसे दिग्गज मानव भूगोलवेत्ता हुए हैं। इन्होंने मानव भूगोल की परिभाषा दी व उसका विषय-क्षेत्र निर्धारित किया।

        सैम्पुल की सबसे प्रसिद्ध पुस्तक Influence of Geographical Environment सन् 1911 में प्रकाशित हुई। यह पुस्तक वातावरण निश्चयवाद का कट्टर समर्थन करती थी। पुस्तक का प्रारम्भ ही इन शब्दों से हुआ है:-

“मनुष्य का जन्म पृथ्वी से हुआ है और वह पृथ्वी का शिशु मात्र ही नहीं है, अर्थात् वह पृथ्वी की धूल का एक पुतला मात्र ही नहीं है वरन् पृथ्वी उसकी माता है, जिसने उसे मातृत्व दिया है, उसका लालन-पालन किया है, उसको भोजन दिया है, उसके कार्यों को नियत किया है, उसके विचारों को निर्देशित किया है, उसके सामने कठिनाइयाँ प्रस्तुत की हैं, जिससे उसका शरीर सुदृढ़ हुआ है तथा उसकी बुद्धि कुशाग्र हुई है।”

      हटिंगटन की प्रसिद्ध पुस्तक Principles of Human Geography है। पुस्तक में हंटिंगटन ने मानव भूगोल की परिभाषा व विषय क्षेत्र निर्धारित करने का प्रयास किया है। साथ ही मानव भूगोल के अन्य पक्षों का भी वर्णन किया है। हंटिंगटन वातावरण निश्चयवाद के समर्थक थे।

   ग्रिफिथ टेलर को मानव भूगोल के क्षेत्र में नव-निश्चयवाद (Neo-Determinism) का प्रवर्तक माना जाता है। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बीसवीं सदी में भूगोल’ (Geography in the Twentieth Century) है।

(ii) भौतिक भूगोल (Physical Geography):-

        भौतिक भूगोल के क्षेत्र में अमेरीकी भूगोलवेत्ता डेविस (William Morris Davis) का नाम प्रसिद्ध है। डेविस ने अपरदन चक्र की संकल्पना (Concept of Cycle of Erosion) का प्रतिपादन किया। यह संकल्पना काफी समय तक आदर्श मानी जाती रही। परन्तु पेंक ने इसकी भारी आलोचना की। फिर भी इस संकल्पना के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। रोलिन सैलिसबरी, वेलेस स्टाउड भी उच्चकोटि के भौतिक भूगोलवेत्ता थे।

(iii) जलवायु विज्ञान (Climatology):-

      अमेरीका में जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में प्रमुख कार्य जलवायु के वर्गीकरण व जलवायु प्रदेशों के मानचित्र तैयार करने से सम्बन्धित रहा है। थार्नथ्वेट ने 1918 में कोपेन द्वारा प्रस्तुत जलवायु विभाजन की आलोचना की तथा नवीन जलवायु वर्गीकरण प्रस्तुत किया। जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में नए वैज्ञानिक यंत्रों से मदद ली गई।

(iv) स्थानीयकरण सिद्धान्त (Locational Theories):-

       कई अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने स्थानीयकरण सिद्धान्तों में योगदान किया है। सर्वप्रथम 1909 में व्हाइटवेक ने एक शोध पत्र के माध्यम बताया था कि चीनी मिट्टी बर्तनों के उद्योग के लिए मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता आवश्यक नहीं। वाल्डर टावर ने 1911 में औद्योगिक स्थानीयकरण को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना की । हूवर ने वेबर के सिद्धान्त में संशोधन किया।

(v) राजनीतिक भूगोल (Political Geography):-

          राजनीतिक भूगोल में भी अमेरीकी भूगोलवेत्ताओं ने विशेष रुचि प्रदर्शित की। स्कूलों व कॉलेजों में इसे स्थान दिया गया। जार्ज क्रेसी, प्रेस्टन ई. जेम्स, राबर्ट एस. प्लाट व ईसा बोमैन प्रमुख राजनीतिक भूगोलवेत्ता थे।

         ईसा बोमैन की पुस्तक The New World में विभिन्न देशों के आपसी राजनीतिक सम्बन्धों की चर्चा थी। डी. व्हिटलसी ने एक पुस्तक The Earth and State प्रकाशित कराई। वाल्केनबर्ग की पुस्तक Elements of Political Geography में राजनीतिक भूगोल के विषय क्षेत्र की व्याख्या की गई थी।

(vi) कृषि भूगोल (Agricultural Geography):-

      कृषि भूगोल के क्षेत्र में अमेरीका में विशेष कार्य हुआ है। इस दिशा में सर्वप्रथम बरनर सी. फिंच और ओ. ई. वेकर ने महत्वपूर्ण प्रयास किए। 1917 में इन्होंने ‘संसार का कृषि भूगोल’ एटलस प्रकाशित की। वेकर ने 1921 में ‘संयुक्त राज्य अमेरिका के कृषि उत्पादन के अन्तर पर भौतिक कारकों के प्रभाव का महत्व’ लेख प्रकाशित किया।

1936 में व्हिटलसी ने संसार को कृषि प्रदेशों में विभक्त किया। कृषि व डेरी उद्योग से सम्बन्धित अनेक शोध कार्य किए गए।

(vii) नगरीय-भूगोल (Urban Geography):–

      मार्क जैफरसन (Mark Jafferson) प्रथम अमेरीकी-भूगोलवेत्ता थे जिन्होंने नगरों की स्थिति (Location) व जनसंख्या पर कार्य किया। उनकी “प्रधान नगर नियम’ संकल्पना” (Law of Primate City, 1939) ने अनेक विद्वानों को आकर्षित किया। सी. डी. हैरिस तथा उल्मान ने अमरीकी नगरों का कार्यात्मक वर्गीकरण किया।

प्रश्न प्रारूप

1. अमेरिकन भौगोलिक विचारधाराओं पर प्रकाश डालिए।


40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक



       उद्योगों की स्थापना केवल उन्हीं स्थानों पर होती है, जहाँ इसके विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उपस्थित हों। उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों में भौगोलिक, आर्थिक तथा राजनीतिक कारक महत्वपूर्ण हैं। अतः उद्योगों को प्रभावित करने वाले कारकों को दो वर्गों में बाँटा जाता जा सकता है:-

(क) भौगोलिक कारक तथा,

(ख) गैर-भौगोलिक कारक।

(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)

      उद्योगों को प्रभावित करने वाले मुख्य भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. कच्चे माल की उपलब्धता:-

       सामान्यतः उद्योग उन्हीं स्थानों पर स्थापित किए जाते हैं, जहाँ कच्चा माल उपलब्ध होता है। कच्चा माल उद्योगों के लिए चुम्बक का कार्य करता है। भारत में लोहा इस्पात उद्योग केवल उन्हीं स्थानों पर स्थापित किया गया है जहाँ इसमें प्रयोग होने वाला कच्चा माल, जैसे-लौह-अयस्क, कोयला, मैंगनीज आदि प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश तथा बिहार में गन्ने के कारण चीनी उद्योग, महाराष्ट्र तथा गुजरात में कपास के कारण सूती वस्त्र उद्योग, पश्चिम बंगाल में पटसन उद्योग स्थापित किए गए हैं। नाशवान (Perishable) / अल्पकालिक कच्चा माल प्रयोग करने वाले उद्योग तो कच्चे माल के स्रोत से दूर स्थापित हो ही नहीं सकते।

2. शक्ति के साधन:-

     उद्योगों में मशीनें चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है। शक्ति के प्रमुख साधन कोयला, पेट्रोलियम, जल-विद्युत्, प्राकृतिक गैस तथा परमाणु ऊर्जा हैं। लौह-इस्पात उद्योग कोयले पर निर्भर करता है, इसलिए यह उद्योग कोयले की खानों के पास ही स्थापित किया जाता है। दामोदर घाटी का प्रमुख लोहा-इस्पात केन्द्र जमशेदपुर अपनी शक्ति की आवश्यकता झरिया तथा रानीगंज से प्राप्त किए गए कोयले से पूरी करता है।

        पंजाब में औद्योगिक विकास का मुख्य कारण भाखड़ा से प्राप्त की गई जल-विद्युत् ही है। ऐलुमिनियम उद्योग के लिए प्रचुर मात्रा में विद्युत् शक्ति की आवश्यकता होती है, इसलिए यह उद्योग जल-विद्युत अथवा ताप-विद्युत् के स्रोत के निकट ही स्थापित किया जाता है। छत्तीसगढ़ का कोरबा तथा उत्तर प्रदेश का रेनूकूट ऐलुमिनियम उद्योग विद्युत् शक्ति की उपलब्धता के कारण ही स्थापित हुआ है।

3. सस्ते दर पर कुशल श्रमिकों की उपलब्धता:-

    यद्यपि आधुनिक युग में स्वचालित मशीनों तथा कम्प्यूटरों जैसे यंत्रों का प्रचलन बढ़ा है फिर भी औद्योगिक विकास में श्रम का महत्व बराबर बना हुआ है। सस्ते तथा कुशल श्रम की प्रचुर मात्रा में उपलब्धता औद्योगिक विकास का मुख्य कारक है। कुछ उद्योग श्रम पर ही आधारित होते हैं। फिरोजाबाद में शीशा उद्योग, कानपुर में चर्म उद्योग, लुधियाना में हौजरी तथा जालन्धर एवं मेरठ में खेलों का सामान बनाने का उद्योग मुख्यतः सस्ते, कुशल तथा प्रचुर श्रम पर ही निर्भर हैं।

4. परिवहन एवं संचार के साधन:-

      यातायात मार्ग वे शिराएं हैं, जिनमें से होकर उद्योग की धमनियों का रक्त संचार होता है। कच्चे माल को उद्योग केन्द्र तक लाने तथा निर्मित माल को खपत के क्षेत्रों तक ले जाने के लिए सस्ते तथा कुशल यातायात का प्रचुर मात्रा में होना अनिवार्य है। सड़कों तथा रेलों के जंक्शन तथा सागरीय बन्दरगाह अच्छे औद्योगिक केन्द्र बन जाते हैं। मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली जैसे महानगरों में औद्योगिक विकास मुख्यतः यातायात के साधनों के कारण ही हुआ है।

       परिवहन की भांति संचार के साधन, जैसे-डाक, तार टेलीफोन, कम्प्यूटर भी औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें उद्योग सम्बन्धी सूचनाएँ जल्दी मिलती हैं।

5. विस्तृत बाजार की उपलब्धता:-

     उद्योग का सारा विकास तब तक व्यर्थ है। जब तक निर्मित माल की खपत के लिए बाजार की उपलब्धता न हो। बाजार की निकटता से यातायात का खर्च कम हो जाता है और उपभोक्ता को औद्योगिक उत्पाद सस्ते दाम पर मिल सकते हैं। शीघ्र नष्ट होने वाली वस्तुओं को तो अधिक दूर तक ले जाना असम्भव ही होता है। 

6. सस्ती भूमि तथा जलापूर्ति:-

      उद्योगों की स्थापना के लिए सस्ती भूमि का होना भी आवश्यक है। दिल्ली में भूमि का अधिक मूल्य होने के कारण ही इसके उपनगरों में सस्ती भूमि पर उद्योगों ने द्रुत गति से प्रगति की है। लोहा-इस्पात, वस्त्र-निर्माण तथा रसायन कुछ ऐसे उद्योग हैं, जिनको पर्याप्त मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। इसलिए ये उद्योग जल के स्रोत पर स्थापित किए जाते हैं।

7. अनुकूल जलवायु:-

       उद्योग धन्धों में काम करने वाले श्रमिकों की कार्यकुशलता के लिए जलवायु का स्वास्थ्यवर्द्धक होना आवश्यक है। अधिक उष्ण अथवा आर्द्र एवं कठोर शीत जलवायु श्रमिकों के कार्य में बाधा डालती है। उत्तर-पश्चिमी भारत की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में अत्यन्त गर्म तथा शीत ऋतु में ठण्डी होती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसके विपरीत, पश्चिमी तटीय भाग की जलवायु वर्ष भर सम रहती है, जिससे श्रमिकों की कार्य-कुशलता बनी रहती है। यही कारण है कि देश के 24% आधुनिक कारखाने तथा 30% श्रमिक अकेले महाराष्ट्र-गुजरात क्षेत्र में हैं।

        कुछ उद्योगों के लिए तो जलवायु का विशेष महत्व है। उदाहरणतया, सूती वस्त्र उद्योग के लिए आर्द्र जलवायु चाहिए, क्योंकि शुष्क जलवायु में धागा बार-बार टूटता रहता है। इसलिए सूती वस्त्र बनाने वाली अधिकांश मिलें महाराष्ट्र तथा गुजरात में ही हैं। आजकल कृत्रिम आर्द्र-यन्त्रों (Artificial Humidifiers) की सहायता से देश के अन्य भागों में भी सूती वस्त्र उद्योग लगाए गए हैं, परन्तु यह प्रणाली महंगी है।

(ख) गैर-भौगोलिक कारक (Non-Geographical Factors)

      वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिकी विकास के साथ, उद्योग-धन्धों की अवस्थिति में भौगोलिक कारकों की भूमिका पहले की भांति अधिक दृढ़ नहीं रही। अतः कुछ गैर-भौगोलिक कारक भी महत्वपूर्ण बन गए हैं, जिनमें आर्थिक, राजनीतिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक कारक उल्लेखनीय हैं। कुछ महत्वपूर्ण गैर-भौगोलिक कारक निम्नलिखित हैं:-

1. पर्याप्त पूंजी:-

      कोई भी उद्योग बिना पूंजी के नहीं पनप सकता। बिना पूंजी के उद्योगों की स्थापना की कल्पना  बड़े-बड़े नगरों में पूंजीपति उद्योगों में पूंजी लगाते हैं, जिससे उद्योगों का विकास होता है। इसी कारण मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई, दिल्ली, आदि बड़े-बड़े नगरों में उद्योग लगे हुए हैं। मोदीनगर में उद्योग स्थापित होने का मुख्य कारण ही मोदी सेठ द्वारा पूँजी निवेश है।

2. सरकार की नीति:-

     सरकार की नीतियाँ उद्योग-धन्धों की अवस्थिति को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। सरकार प्रादेशिक असन्तुलन दूर करने के कई प्रयास कर रही है, जैसे- पिछड़े हुए क्षेत्रों में उद्योग-धन्धों की स्थापना करके, जल, वायु और भूमि के प्रदूषण की रोकथाम द्वारा पर्यावरण का संरक्षण तथा कुछ विकसित प्रदेशों में उद्योग-धन्धों के अतिकेन्द्रण को विकेन्द्रण प्रक्रम द्वारा रोकना आदि। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के नियोजन में इन प्रारूपों का विशेष ध्यान रखा गया है। मथुरा के निकट तेल शोधनशाला, कपूरथला में कोच फैक्ट्री तथा जमशेदपुर में उवर्रक संयन्त्र की स्थापना सरकारी नीतियों का ही परिणाम है।

3. औद्योगिक जड़त्व अथवा प्रारम्भिक संवेग (Industrial Inertia or Momentum of Early Start):-

        कुछ उद्योग भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्थापित हो जाते हैं, परन्तु जब वे भौगोलिक सुविधाएँ वहाँ पर समाप्त हो जाती हैं तब भी वे उद्योग वहाँ पर बने रहते हैं। अलीगढ़ में ताला तथा जबलपुर में बीड़ी बनाने के उद्योग इसके उदाहरण हैं।

4. बैंकिंग सुविधा:-

      उद्योग-धन्धों में रोज करोड़ों रुपए का लेन-देन होता है जो बैंकों द्वारा ही सम्भव है। अतः जिन क्षेत्रों में बैंकों की सुविधा हो, वहाँ उद्योग-धन्धों के विकास में सहायता मिलती है।

5. बीमा की सुविधा:-

     बड़े-बड़े उद्योगों में भारी मशीनों को अचानक क्षति पहुंचने का भय रहता है। इसके अतिरिक्त, श्रमिकों की औद्योगिक दुर्घटना से मृत्यु हो जाती है। इन सब परिस्थितियों को देखते हुए बीमे की सुविधा का होना आवश्यक है।

6. राजनीतिक स्थिरता:-

       उद्योगपति उन्हीं प्रदेशों में उद्योग स्थापित करना पसन्द करते हैं जहाँ राजनीतिक स्थिरता हो।

प्रश्न प्रारूप

1. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।


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1. सिन्धु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान (The Indus-Ganga-Brahmaputra Plain)

2. भारत के जनसंख्या वितरण एवं घनत्व (Distribution and Density of Population of India)

3. भारत के प्रमुख जलप्रपात

4.नदियों के किनारें बसे प्रमुख नगर

5. भारत की भूगर्भिक संरचना का इतिहास

6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

22. मानसून उत्पत्ति का जेट स्ट्रीम सिद्धांत

23. एलनीनो सिद्धांत

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

35. भारतीय कृषि की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश

36. भारत में सिंचाई की आवश्यकता क्यों है? 

37. भारत में सिंचाई के विभिन्न साधनों एवं उनके महत्त्व

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

40. उद्योग स्थापना की अवस्थिति को प्रभावित करने वाले कारक

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली (उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)

39. प्रायद्वीपीय भारत और प्रायद्वीपेत्तर भारत की प्रवाह प्रणाली

(उत्तर और द० भारत की प्रवाह प्रणाली)



       भौतिक दृष्टिकोण से भारत एक विशालकाय देश है। उत्तर में हिमालय, पश्चिम भारत में अरावली पर्वत, मध्य भारत में विन्ध्याचल और सतपुड़ा। पुनः प० भारत में पश्चिमी घाट पर्वत जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। जिसे नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।

प्रायद्वीपीय भारत और

       यह महान जलविभाजक रेखा भारतीय नदियों को दो भागों में विभक्त कर देती हैं।-

(1) अरब सागार में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- सिन्धु, नर्मदा, ताप्ती, माण्डवी, ज्वारी, शरावती, पेरियार, गायत्री इत्यादि।

(ii) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ

जैसे- गंगा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि।

        प्रश्नानुसार उत्तर भारत और द० भारत के बीच जल विभाजक का कार्य विन्ध्याचल और सतपुड़ा पर्वत करती है। उत्तर भारत एवं द० भारत के वदियों में निम्नलिखित अन्तर दृष्टिगत होता है-

विशेषता प्रायद्वीपेत्तर भारत की नदी तंत्र या उ० भारत की नदियाँ  प्रायद्वीपीय भारत की नदी तंत्र या द० भारत की नदियाँ 
1. उद्गम क्षेत्र  (i) हिमालय पर्वत तथा 

(ii) प्रायद्वीपीय भारत का उत्तरी क्षेत्र 

(i) प्रायद्वीपीय भारत के प० घाट पर्वत
2. स्रोत  (i) हिमालय क्षेत्र से निकलने वाली नदियों का स्रोत कोई न कोई हिमानी है। जैसे- गंगोत्री से गंगा, यमुनोत्री से यमुना (i) सभी नदियों का स्रोत क्षेत्र झील या तालाब या वर्षा जल से है।
3. जल ग्रहण क्षेत्र बहुत बड़ा-बड़ा है। अपेक्षाकृत छोटा है।
4. मुहानों की संख्या (i) केवल दो मुहानों का निर्माण करती है:- सिन्धु नदी का मुहाना और गंगा नदी का मुहाना (i) प्रत्येक नदी अलग-अलग मुहाना का निर्माण करती है।
5. ज्वारनदमुख (i) यह ज्वारनदमुख का निर्माण नहीं करती है। (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ ज्वारनद मुख का निर्माण नहीं करती है लेकिन अरब सागर में गिरने वाली नदी ज्वारनद मुख का निर्माण करती है।
6. डेल्टा का निर्माण (i) डेल्टा का निर्माण करती है। गंगा, ब्रह्मपुत्र नदी मिलकर विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा का निर्माण करती है। (i) यद्यपि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा बनाती है जबकि अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ डेल्टा नहीं बनाती है।
7. नदी की लम्बाई एवं चौडाई  (i) लम्बाई और चौडाई अधिक होती है। (i) लम्बाई और चौडाई कम होती है।
8. मार्ग का परिवर्तन (i) उ० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन के लिए प्रसिद्ध है। (i) द० भारत की नदियाँ मार्ग परिवतन नहीं करती है।
9. सहायक नदियाँ (i) उ० भारत की नदियाँ सिन्धु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नामक प्रमुख नदियों में आकर सहायक नदी मिल जाती है।  (i) अलग-अलग नदियों के कई सहायक नदी मिलते है।
10. उच्छलिका और जलप्रपात (i) उ० भारत की नदियों में केवल स्रोत में झरना एवं उच्छलिका मिलती है। (i) द० भारत की नदियों के पुरे मार्ग में इसका प्रमाण मिलता है।
11. सदा वाहनीयता (i) उ० भारत की नदियाँ प्राय: सदावाहिनी होती है। (i) यह लगभग सभी प्रकार की नदियाँ बरसाती प्रकार की होती है।
12. जल का स्तर बढना  (i) मानसून के आगमन के दौरान तथा जून मान में बर्फ के पिघलने से जलस्तर में वृद्धि होती है। (i) प्रायद्वीपीय नदियों का जलस्तर द०-प० मानसून और लौटती हुई मानसून के कारण बढ़ती है।
13. अवस्था (i) सभी नदियाँ युवावस्था से गुजर रही है। (i) यहाँ की नदियाँ प्रौढावस्था और वृद्धावस्था से गुजर रही है।
14. अपरदन एवं निक्षेपण की क्षमता  (i) बड़े पैमाने पर अपरदन और निक्षेपण का कार्य होती है। (i) यह कार्य अति अल्प होती है।
15. अपवाहतंत्र का प्रतिरूप (i) यहाँ की नदियाँ पर्वतीय क्षेत्र में वृक्षाकार प्रतिरूप, मैदानी क्षेत्री में समानांतर प्रतिरूप और मुहानों पर जाली प्रतिरूप का निर्माण करती है। (i) बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ वृक्षाकार प्रतिरूप और अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है।
16. भ्रंश घटी का निर्माण (i) उ० भारत कि कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है।  (i) नर्मदा और ताप्ती नदी को छोडकर कोई भी नदी भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित नहीं होती है। 
17. गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण  (i) उ० भारत की नदियाँ गॉर्ज एवं दर्रा का निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। (i) गोदावरी को छोडकर कोई भी नदी गॉर्ज का निर्माण नहीं करती है।

निष्कर्ष :

        उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत की नदियों पर भौगोलिक कारकों के अलग-अलग प्रभाव के कारण अलग-अलग विशिष्टताएँ पायी जाती है। 


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6. भारत में गोण्डवानाक्रम के चट्टानों के निर्माण का आधार, वितरण एवं आर्थिक महत्व

7. प्राचीनतम कल्प के धारवाड़ क्रम की चट्टानों का आर्थिक महत्त्व

8. भारत के उच्चावच/भू-आकृतिक इकाई

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

10. उत्तर भारत का विशाल मैदानी क्षेत्र

11. गंगा का मैदान

12. प्रायद्वीपीय भारत की संरचना

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

14. प्रायद्वीपीय भारत के पठार

15. भारत का तटीय मैदान एवं द्वीपीय क्षेत्र

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत) / Drainage System

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

18. गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

20. मानसून क्या है?

21. मानसून उत्पत्ति के सिद्धांत

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23. एलनीनो सिद्धांत

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25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

26. मानसून के विकास में हिमालय तथा तिब्बत के पठार का योगदान

27. भारत के आर्थिक जीवन पर मानसून का प्रभाव

28. भारत में शीतकालीन वर्षा का आर्थिक जीवन पर प्रभाव

29. पश्चिमी विक्षोभ क्या है? भारतीय कृषि पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

31. भारत में उष्णकटिबंधीय चक्रवात

32. भारत में बाढ़ के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

33. भारत में सूखा के कारण, प्रभावित क्षेत्र एवं समाधान

34. भारत की प्राकृतिक वनस्पति

33. अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल (Endogenetic and Exogenetic Forces)

33. भू-आकृति विज्ञान में अन्तर्जात एवं बहिर्जात बल

(Endogenetic and Exogenetic Forces)



अन्तर्जात बल (Endogenetic Forces):-

     पृथ्वी के आन्तरिक भाग अथवा भूगर्भ में सक्रिय बलों को अन्तर्जात बल कहते हैं। इन्हें निर्माणकारी शक्तियाँ (Constructional Forces) भी कहा जाता है। ये बल पृथ्वी में गुप्त रूप से कार्य करते हैं। इनकी उत्पत्ति पृथ्वी के आन्तरिक भाग में होने के कारण इनके विषय में बहुत कम ज्ञान प्राप्त है।

       सम्भवतः इन बलों की उत्पत्ति उष्ण पृथ्वी के क्रमशः शीतल होकर संकुचन, परिभ्रमण गति से ह्रास, रेडियो ऐक्टिव पदार्थों के विघटन से उत्पन्न ताप, संवाहनिक धाराओं, आदि के कारण होती है। पृथ्वी के भीतर उच्च तापमान ही कदाचित भू-पटल में उत्पन्न परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी है। तापीय अन्तर के कारण शैलों में प्रसार एवं संकुचन होता है, इससे शैलें स्थानान्तरित होती हैं। परिणामतः अनेक स्थलरूप उत्पन्न होते हैं।

     अन्तर्जात बल दो प्रकार के होते हैं-

(i) क्षैतिज (Horizontal) अन्तर्जात बल तथा

(ii) ऊर्ध्वाधर/लम्बवत (Vertical) अन्तर्जात बल।

        इनके कारण दो प्रकार की संचलन (Movements) या घटनाएँ होती हैं-

(i) आकस्मिक घटनाएँ या ज्वालामुखी एवं भूकम्प (Volcanism and Earthquakes)

       इस बल से भूपटल पर ऐसी आकस्मिक घटनाओं का आगमन होता है जो विनाशकारी परिणाम वाली होती हैं। इसके प्रमुख उदाहरण हैं- भूकम्प, भूस्खलन, एवलांश तथा ज्वालामुखी।

(ii) पटलविरूपणकारी घटनाएँ (Diastrophism)            

       ये बल पृथ्वी के आन्तरिक भाग में अत्यन्त धीमी गति से क्षैतिज तथा लम्बवत दोनों रूपों में क्रियाशील होते हैं जिससे धरातल पर हजारों वर्षों बाद किसी बड़े स्थलरूप का निर्माण हो जाता है। क्षेत्रीय विस्तार की दृष्टि से ये पुन: दो प्रकार के होते हैं-

(अ) महादेशीय संचलन (Epierogenetic Movement)-

        यह संलचन भू-गर्भ में लम्बवत दिशा में क्रियाशील रहता है। इस लम्बवत् संचलन को उत्पन्न करने वाले बल को अरीय बल (Radial Force) कहते हैं, क्योंकि यह पृथ्वी की त्रिज्या की दिशा में ही कार्य करता है। इस संचलन से महाद्वीपीय भागों का निर्माण एवं उसमें उत्थान, निर्गमन तथा निमज्जन की क्रियाएं घटित होती हैं।

        जब महाद्वीपीय भाग या उसका कोई क्षेत्र अपनी सतह से ऊपर उठ जाता है तब उस पर लगने बाले बल को उपरिमुखी संचलन (Upward movement) कहते हैं तथा ऊपर उठने की क्रिया, उभार (Upliftment) के नाम से जानी जाती है।

        इसके विपरीत, जब महाद्वीपीय भागों में धंसाव हो जाता है तो उस पर क्रियाशील बल को अधोमुखी संचलन (Downward Movement) तथा धंसाव की क्रिया को अवतलन (Subsidence) कहा जाता है। धंसाव के दूसरे रूप में स्थलखण्डों का सागरीय जल के नीचे निमज्जन (Submergence) हो जाता है। यह क्रिया तटीय या सागरीय भागों में ही घटित होती है।

(ब) पर्वतीय संचलन (Orogenetic Movement)-

       पृथ्वी के आन्तरिक भाग से क्षैतिज रूप में पर्वतों के निर्माण में सहायक संचलन बल को पर्वतीय संचलन के नाम से जाना जाता है। इस बल को स्पर्शरेखीय बल (Tangential Force) भी कहते हैं। यह बल प्रायः दो रूपों में क्रियाशील होता है-

(i) जब यह बल दो विपरीत दिशाओं में क्रियाशील होता है तो तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसे तनावमूलक बल कहा जाता है। इस बल के परिणामस्वरूप धरातल में भ्रंश (Fault), दरार (Fracture), चटकनें (Cracks), आदि का निर्माण होता है।

(ii) जब पर्वतीय संचलन बल आमने-सामने क्रियाशील होता है तो उससे चट्टानें संपीडित हो जाती हैं। इस बल को संपीडनात्मक बल (Compressional Forces) कहा जाता है। इसके कारण धरातल पर संवलन (Wrap) तथा वलन (Fold) पड़ जाते है।

बहिर्जात बल (Exogenetic Forces):-

        भू-पटल पर अन्तर्जात बलों के सक्रिय होने से अनेक विषमताएँ पैदा हो जाती हैं। इन विषमताओं को दूर करके धरातल को सपाट बनाने की क्रिया भी प्रकृति में सम्पन्न होती रहती है। यह कार्य बहिर्जात बलों द्वारा किया जाता है जिन्हें विध्वंसकारी बल (Destructional Forces) भी कहते हैं। धरातल पर मौजूद स्थलरूपों को काट छांट तथा घिसकर क्षीण बनाने के कारण इन बलों को विनाशकारी बल कहा गया है।

      प्रवाही जल, पवन एवं हिम इसके प्रमुख कारक या साधन (Agents) हैं। इन साधनों को सक्रिय बनाने में तीन प्रमुख कारकों का योगदान हैं-

(i) सूर्यातप (Insolation),

(ii) गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) एवं

(iii) पृथ्वी का घूर्णन (Earth’s Rotation)।

      सूर्यातप ही धरातल पर तापमानों के विषम वितरण का कारण है। तापीय भिन्नताओं से वायुदाब में अन्तर आता है तथा वायु विक्षोभ, पवन, आदि उत्पन्न होते हैं। यही नहीं, शैलों के अपक्षय में भी सूर्यातप प्रभावकारी होता है। गुरुत्व तथा पृथ्वी का घूर्णन पवन तथा हिम के प्रवाह को नियंत्रित करते हैं।

          बहिर्जात बलों को सक्रिय बनाने में किसी न किसी गतिशील साधन का योगदान अवश्य होता है। प्रवाही जल, हिम, पवन, आदि गतिशील साधन ही धरातल पर काट-छांट का कार्य करते हैं। शैलों की काट-छांट, घिसने तथा क्षीण बनाने की क्रिया को अनाच्छादन (Denudation) कहते हैं।

मोन्कहाउस (Monkhouse) के अनुसार- “अनाच्छादन में उन सभी साधनों के कार्य सम्मिलित हैं जिनसे भू-पटल के किसी भाग का पर्याप्त विनाश, अपव्यय तथा हानि होती है। इस उपलब्ध पदार्थ का अन्यत्र निक्षेप होता है तथा इनसे अवसादी शैलों का निर्माण होता है।”

    भूपटल के अनाच्छादन में दो प्रक्रम अथवा शक्तियां मुख्य हैं-

(i) स्थैतिक प्रक्रम एवं

(ii) गतिशील प्रक्रम।

1. स्थैतिक प्रक्रम (Static processes):-

       स्थैतिक प्रक्रिया से अभिप्राय शैलों की अपने ही स्थान पर (in situ) टूट-फूट से है। इसके द्वारा शैलें ढीली पड़ती हैं तथा चट्टानों का चूर्ण बनता है। इस क्रिया को अपक्षय (Weathering) कहते हैं। अपक्षय भी दो प्रकार होता है-

         यांत्रिक अपक्षय में चट्टानों के स्वरूप में विघटन होता है और रासायनिक अपक्षय में चट्टानें वियोजन द्वारा परिवर्तित होती हैं।

2. गतिशील प्रक्रम (Mobile Processes):-

      गुरुत्व प्रवाही जल (वर्षा जल, नदी, भूमिगत जल), पवन, हिमानी, लहरें, आदि साधन शैल पदार्थों को तोड़ते-फोड़ते हैं तथा अपक्षयित पदार्थ उठाकर अन्यत्र ले जाकर निक्षेपित कर देते हैं। इस क्रिया के अन्तर्गत वृहत् क्षरण (Mass Movement) तथा अपरदन (Erosion) सम्मिलित हैं। परिवहन एवं निक्षेप भी अपरदन से सम्बद्ध हैं।


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38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव

38. भारत में हरित क्रान्ति का प्रभाव



         हरित क्रांति शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम डब्लू. एस. गौड ने खाद्यान्न उत्पादन में आई क्रांति, जो कि गेहूँ के HYV (High Yielding Varieties- उच्च उत्पादकता किस्में) प्रकार के आविष्कार से संभव हुई थी, के लिए किया था। यह क्रांति भारत, पाकिस्तान एवं विकासशील देशों में विद्यमान खाद्यान्न संकट को दूर करने में अत्यन्त मददगार रही। भारत में मुख्य रूप से भारतीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन द्वारा निर्देशित थी, जो नॉर्मन ई. बोरलॉग की बड़ी हरित क्रांति पहल का हिस्सा थी, जिसने अविकसित देशों में कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि अनुसंधान और प्रौद्योगिकी का उपयोग किया था।

      उन्नत किस्म के बीज के अलावा अच्छी सिंचाई की व्यवस्था, आधुनिक यंत्रों का उपयोग, अच्छे उर्वरक का वैज्ञानिक प्रयोग इत्यादि हरित क्रांति के आधार थे। इसमें सस्ते मूल्य पर बिजली उपलब्ध कराने के साथ-साथ अन्य बैंकिंग एवं बाजार की सुविधा उपलब्ध करायी गयी। हरित क्रांति की सफलता के दो पक्ष रहे, एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक।

सकारात्मक पक्ष

     इस क्रांति से खाद्यान्न की उपज में काफी बढ़ोत्तरी हुई। 1950 में भारत में 50 मिलियन टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था, जो बढ़कर अब 200 मिलियन टन हो चुका है। गेहूँ के उत्पादन में 177 प्रतिशत, चावल में 76 प्रतिशत तथा मक्के में 56 प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई। खाद्यान्न में वार्षिक वृद्धि 2.62 प्रतिशत हो गयी, जो पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर से अधिक थी अर्थात् खाद्यान्न संकट दूर हुआ।

      कृषि क्षेत्र में 1961 से 1999 के बीच 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 1960-61 में यह कुल कृषि क्षेत्र का 72 प्रतिशत था, जो 1970-71 में 78 प्रतिशत हो गया, 1980-81 में 81 प्रतिशत और अब 82 प्रतिशत के करीब है। पिछले तीन दशकों में गेहूँ के क्षेत्र में 150 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसमें 82 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है तथा 95 प्रतिशत HYV के अंतर्गत आता है। चावल क्षेत्र में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

       भारतीय कृषि पहली बार बाजार में लाभदायक व्यापार के रूप में आई क्योंकि अब किसानों के पास अतिरिक्त अन्न मौजूद था। कृषि उत्पादों पर आधारित उद्योगों का विकास हुआ तथा कृषि में प्रयुक्त होने वाले यंत्रों के निर्माण में भी लौह एवं यांत्रिक उद्योग को बढ़ावा मिला। भारतीय किसानों के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ, भारतीय किसान बढ़ी पैदावार को देखते हुए नवीन कृषि प्रणाली को अपनाने को तुरंत तैयार हो गये और कृषि सहायता से लाभदायक वाणिज्यिकी में परिणत हो गये।

     खाद्यान्न का आयात रुका तथा भारतीय मुद्रा का विदेश गमन भी नियंत्रित हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में यह मुद्रा अधः संरचना के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। ग्रामीण रोजगार के भी शुभ अवसर पैदा हुए। घरेलू उद्योग धंधों का भी विकास हुआ तथा मजदूरी में बढ़ोतरी हुई।

नकारात्मक पक्ष

     परंतु हरित क्रांति के नकारात्मक पक्ष भी उभर का सामने आये हैं। हरित क्रांति ने उसी क्षेत्र में सफलता पाई, जहाँ पर पूर्व से ही अधः संरचना का विकास हुआ था, किसान बड़े एवं धनी थे, कुल जोत अधिक थी तथा दूसरी भौगोलिक एवं सामाजिक शर्तें पूरी हो रही थीं। अतः यह पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में तो सफल रही, परन्तु उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि में असफल रही, जिससे आर्थिक विकास में असमानता आयी।

     उत्तर प्रदेश के अंदर ही पूर्वी एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में विकास की विषमता दिखती है। इसी तरह कृष्णा, गोदावरी क्षेत्र एवं तेलंगाना और रायल सीमा क्षेत्र में विषमता दिखती है।

        अंतर्वैयक्तिक विषमता का भी जन्म हो गया। क्योंकि बड़े किसान ही इसका भरपूर फायदा उठा सके जबकि छोटे किसान आर्थिक रूप से असफल ही रह गये। गेहूँ और चावल की उपज एवं उपज क्षेत्र में तो बढ़ोत्तरी हुई, परंतु तिलहन एवं दलहन की उपज एवं उपज क्षेत्र दोनों ही घट गये। अंतर्वैयक्तिक विषमता ने बड़े किसानों के समाज में प्रभुत्व को पूर्वस्थापित कर दिया। छोटे किसान अपनी जमीन को बढ़ी कीमत में बेचने पर प्रलोभित हो गये तथा उनकी आर्थिक दुर्गति बढ़ गयी। कृषि में यांत्रिकी के प्रवेश से रोजगार के अवसर भी घट गये।

         हरित क्रांति के सर्वाधिक दुष्परिणाम पर्यावरणीय दृष्टि से उभर कर सामने आये। कृषि में HYV किस्म की आवश्यकता अधिक रहती है। हरित क्रांति के क्षेत्र में अपवाह प्रणाली बेहद खराब है। अतः नहरों से सिंचित क्षेत्र में जल जमाव एवं कूप तथा नलकूप क्षेत्र में लवणता की समस्या का जन्म हो गया। हरियाणा एवं पंजाब के अर्द्धशुष्क भौगोलिक दशा में लवणता को और बढ़ावा मिला।

        कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए वनस्पति का विनाश हुआ, अधिक उर्वरक के प्रयोग से प्राकृतिक उर्वरता का ह्रास तथा कृषि प्रणाली में परिवर्तन (जैसे दलहन का न बोया जाना) आदि प्रयोगों एवं कार्यों से मृदा अपरदन एवं प्रदूषण दोनों बढ़े। एकल कृषि तथा कृषि पारिस्थितिकी पर प्रभाव भी नकारात्मक पड़े। एक ही फसल उपजाने से कृषि पारिस्थतिकी का विनाश हो रहा है।

       रासायनिक खादों के उपयोग से तथा खाद्यान्नों में सीसा, तांबा, जस्ते आदि की मात्रा बढ़ने से यकृत संबंधी रोग तथा जल जमाव से मलेरिया, डेंगू आदि रोग बढ़े। डीडीटी और कीटनाशक दवाओं का दुधारू जानवरों के दूध में पाया जाना भी घातक संकेत है। इस तरह एक तरफ तो हरित क्रांति से खाद्यान्न उत्पादन में आशानुरूप वृद्धि हुई तो दूसरी तरफ इसने पर्यावरणीय एवं सामाजिक दुर्व्यवस्था को भी जन्म दे दिया।


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