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5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)

5. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration)



प्रव्रजन

         मानव का वह कार्यकलाप, जिसके द्वारा वह अपने निवास स्थान से कहीं अन्यत्र स्थान पर एक निश्चित लम्बी अवधि लिए कुछ विशेष उद्देश्य के साथ बस जाता है, तो उसे स्थानान्तरण कहते हैं।

     इसमें मानव का अस्थायी रूप से अन्य स्थान पर जाना, मौसम के अनुसार स्थान परिवर्तन करना, नगर में रोजाना अन्य नगरों व उपान्त क्षेत्रों से आना जाना, श्रमिकों का फसल मौसम में एक स्थान से दूसरे स्थानों पर जाना, नगर के भीतर निवास परिवर्तन, आदि को स्थानान्तरण की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। यह सभी अस्थाई प्रवास संचरण (Circulation) की श्रेणी में शामिल किए जाते हैं।

     जनसंख्या स्थानान्तरण की विशेषताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है:

(1) निवास स्थान व नवीन स्थान के बीच समुचित दूरी होना।

(2) नवीन स्थान पर रुकने की अवधि दीर्घकालिक होना।

(3) नवीन स्थान पर किसी विशेष उद्देश्य से जाकर बसना।

(4) नवीन बसे स्थान के कार्यकलापों का निवास-स्थान के कार्यकलापों से भिन्न होना।

(5) नवीन स्थान पर बसने वाले लोगों का अपने आपको बेहतर स्थिति में अनुभव करना।

प्रवास के प्रकार (TYPES OF MIGRATION)

     प्रवास को वर्गीकृत करने के अनेक आधार हैं। इन आधारों में समय, दूरी, स्थान, उद्देश्य उल्लेखनीय हैं।

(1) दूरी के आधार पर

⇒ जब स्थानान्तरण थोड़ी-सी दूरी के लिए होता है, तो उसे छोटी दूरी (short distance) स्थानान्तरण कहते हैं।

⇒ जब स्थानान्तरण लम्बी दूरी के प्रवास से जुड़ता है तो उसे लम्बी दूरी (long distance) स्थानान्तरण कहते है।

(2) क्षेत्र के आधार पर

1. राष्ट्रीय प्रवास:-

       इसे आन्तरिक प्रवास भी कहते हैं। यह प्रवास एक राष्ट्र के भीतर किसी भी स्थान के लिए बिना किसी रोकटोक के होता है। यह आन्तरिक प्रवास चार वर्गों में बांटा जा सकता है-

(i) गांवों से नगरों की ओर प्रवास,

(ii) नगरों से गांवों की ओर प्रवास,

(iii) गांवों से गांवों की ओर प्रवास,

(iv) नगरों से नगरों की ओर प्रवास।

        इनमें गांवों से नगरों की ओर तथा छोटे नगरों से महानगरों की ओर लोगों का प्रवास अधिक संख्या में होता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय प्रवास:-

      इसे बाह्य प्रवास भी कहते हैं। इसमें प्रवास एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के लिए होता है। यह प्रवास स्थानान्तरण किए जाने वाले राष्ट्र की प्रवास नीतियों पर निर्भर करता है।

(3) समय या काल के आधार पर

       प्रवास अध्ययन के काल पक्ष के अन्तर्गत प्रवासन या आवासन समय को महत्वपूर्ण माना गया है। इस दृष्टि से इसका अध्ययन निम्नांकित रूप में किया जा सकता है।

(i) दीर्घकालीन प्रवास:-

      इसमें प्रव्रजन की कालिक प्रवृत्ति दीर्घकालीन होती है। ऐसे प्रव्रजन प्रायः अन्तर्महाद्वीपीय व अन्तर्राष्ट्रीय हुआ करते हैं। 18-19वीं शताब्दी में यूरोप महाद्वीप से उत्तरी अमेरिका व दक्षिणी अमेरिका, आदि महाद्वीपों में जाकर बसे एवं विकास कार्य किए। कुछ देशों में भी लोग राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, आदि कारणों से दीर्घकालीन प्रवास व आवासन करते रहते हैं।

(ii) अस्थायी या मौसमी प्रवास:-

      अस्थायी प्रव्रजन अल्पकालिक होता है इसके अन्तर्गत जनसंख्या किसी देश अथवा स्थान में स्थायी रूप से बसती नहीं है। बल्कि अपने उद्देश्यों की पूर्ति के पश्चात् पुनः अपने मूल स्थान को प्रत्यावर्तित हो जाती है। इसी के अन्तर्गत एक अन्य तरह का प्रवास होता है जिसे मौसमी प्रवास (Transhumance) की संज्ञा दी जाती है। ऐसे प्रवास क्षेत्रीय उच्चावच व जलवायु से प्रभावित होते हैं।

       इस प्रकार के प्रवास का सुन्दर उदाहरण भारत के पर्वतीय क्षेत्रों के बकरवाल, भोटिया, बछी आदि पशुचारकों से लिया जा सकता है जो ग्रीष्म ऋतु में पर्वतों पर जाकर पशुचारण करते हैं तथा शीत ऋतु में मैदानी भागों की ओर वापस आ जाते हैं। ऐसे उदाहरण विश्व के अनेक क्षेत्रीय पशुचारक जन-जातियों से ग्रहण किए जा सकते हैं।

(iii) दैनिक प्रवास:-

      इस प्रकार का प्रव्रजन पूर्णरूपेण अस्थायी होता है। ऐसे प्रव्रजन के अन्तर्गत बड़े-बड़े नगरों, कस्बों, आदि में ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरी करने, दूध, शाक-सब्जी बेचने एवं अध्ययन अध्यापन व अन्य कार्यों से आना जाना होता है जिसकी अवधि मात्र दिनभर की होती है।

(4) उद्देश्य के आधार पर

       स्थानान्तरण जिस उद्देश्य से किया जाता है, वह निम्न चार प्रकार का होता है-

(i) आर्थिक प्रवास,

(ii) सामाजिक प्रवास,

(iii) धार्मिक प्रवास,

(iv) राजनीतिक प्रवास।

       एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाने वाले व्यक्ति को आप्रवासी या आगन्तुक (Immigrants) कहते हैं। जिस राष्ट्र से वह व्यक्ति दूसरे राष्ट्र को जाता है, उस राष्ट्र की दृष्टि से यह बहिर्गन्तुक (Emmigrants) या प्रवासी कहलाता है।

       ब्राइडे ने अपनी पुस्तक ‘Human Geography : Principles, Processes and Pattern’ में प्रवास को दो प्रमुख वर्गों में रखा है:

1. अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास (Inter-continental migra tion)-

      विश्व में एक देश से दूसरे देश अथवा एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप के देशों की प्रवास अन्तर्महाद्वीपीय प्रवास कहलाता है।

2. आन्तरिक प्रवास (Internal migration)-

      यह चार प्रकार के होते हैं:

(a) अन्तप्रदेशीय प्रवास (Inter-regional migration)-

      जब किसी देश के एक भाग से दूसरे भाग में लोग काम की तलाश में जाकर बस जाते हैं, तो ऐसे प्रवास को अन्तप्रदेशीय प्रवास कहते हैं। सामान्यतया कम विकसित क्षेत्रों से लोग विकसित क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

(b) सामयिक या मौसमी प्रवास (Periodic or seasonal migration)-

     जब प्रवास किसी समय विशेष पर आधारित हो। जैसे शीतकाल में चरवाहे लोग ऊंचे पहाड़ी भागों से निम्न भू-भागों में चले जाते हैं और ग्रीष्मकाल में पुनः वापस पहाड़ी भागों में आ जाते हैं।
(c) ग्रामीण-नगरीय प्रवास (Rural-urbanmigration)-

      वह प्रवास जिसमें लोग रोजगार की तलाश में ग्रामीण क्षेत्र से नगरों में जाकर बस जाते हैं।

(d) कार्य-यात्रा प्रवास (Work-travel migration)-

       जब लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को काम करने के लिए रोजाना इधर से उधर आते जाते हैं, तो इसे कार्य यात्रा प्रवास कहते हैं। सैकड़ों कार्यकर्ता रोजाना सुबह बड़े महानगरों में विभिन्न साधनों से जाते हैं और शाम वापिस अपने घरों को लौट जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रवास अथवा प्रव्रजन (Migration) किसे कहते है? प्रवास के प्रमुख प्रकारों की विवेचना कीजिये।



4. जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र

जनसंख्या भूगोल की परिभाषा एवं विषय क्षेत्र


प्रश्न प्रारूप

1. जनसंख्या भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय क्षेत्र की विवेचना कीजिये।

जनसंख्या भूगोल की

       जनसंख्या भूगोल मानव भूगोल की एक शाखा है, जिसमें मानव संख्या के मात्रात्मक एवं गुणात्मक पहलुओं का और इनके वितरण से सम्बन्धित विभिन्न पक्षों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जनसंख्या भूगोल मानव का अध्ययन है, चूंकि मानव ही किसी क्षेत्र की विशेषताएँ एवं विभिन्नताएँ प्रदान करता है, अतः जनसंख्या भूगोल में मानव संख्या के वितरण में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं का अध्ययन एवं समीक्षा कारण सहित की जाती है।

⇒ जे. आई. क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या के वितरण, संघटन, प्रवास और वृद्धि में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं का अध्ययन किया जाता है। साथ ही ये स्थानिक भिन्नताएं क्षेत्र विशेष की प्रकृति में पायी जाने वाली स्थानिक भिन्नताओं से किस प्रकार से सम्बन्धित होती हैं, का भी अध्ययन किया जाता है।

       इस प्रकार जनसंख्या भूगोल का सम्बन्ध स्थानिक भिन्नताओं के साथ-साथ क्षेत्र के भौतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक घटकों से है। क्लार्क के अनुसार जनसंख्या भूगोल जनसंख्या में प्रादेशिक अन्तरों को उसके भौतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक सन्दर्भ में समझने का प्रयास करता है।

⇒ विल्वर जेलिंस्की के अनुसार जनसंख्या भूगोल एक ऐसा विज्ञान है जो किसी क्षेत्र की जनसंख्या के विविध पहलुओं का अध्ययन उस क्षेत्र की प्राकृतिक परिस्थितियों के संदर्भ में करता है। इनके अनुसार जनसंख्या के विभिन्न लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का जनसंख्या के क्षेत्रीय वितरण में पायी जाने वाली समानताओं एवं असमानताओं हेतु उत्तरदायी कारकों का और जनसंख्या की दृष्टि से क्षेत्रों का वर्तमान भौगोलिक स्वरूप कैसे बना है, इन सभी का अध्ययन जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जे. व्युजे गारनियर ने फ्रांसीसी भाषा में लिखी गई अपनी पुस्तक जिसका अनुवाद बीवर ने Geography of Population के नाम से किया है, में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल वर्तमान वातावरण के सन्दर्भ में जनांकिकी तथ्यों का वर्णन है। साथ ही जनांकिकी तथ्यों के कारणों, मूलभूत विशेषताओं और संभावित परिणामों का अध्ययन भी जनसंख्या भूगोल में किया जाता है।

⇒ जी. जे. डैम्को ने अपने द्वारा सम्पादित पुस्तक Population Geography : A Reader में लिखा है कि जनसंख्या भूगोल, भूगोल की वह शाखा है जिसमें किसी क्षेत्र के जनांकिकी लक्षणों के क्षेत्रीय वितरण का विश्लेषण किया जाता है। इसके अतिरिक्त क्षेत्रीय दशाओं की आपसी क्रिया-प्रतिक्रिया से उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक प्रतिफलों का अध्ययन भी किया जाता है। इन सभी पक्षों पर चूंकि समय का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है इसलिए समयानुसार जनसंख्या वितरण के क्षेत्रीय प्रारूप को प्रभावित करने वाली प्रक्रियाओं का भी अध्ययन किया जाता है। डैम्को ने ऐसे मॉडल विकसित करने पर भी जोर दिया। जिनके द्वारा किसी क्षेत्र के समस्त जनसंख्या लक्षणों को निर्धारित करने वाली प्रक्रियाओं को भली-भांति समझा जा सके।

      निष्कर्षतः जनसंख्या का अध्ययन भौगोलिक अध्ययन का मुख्य केन्द्र बिन्दु है। वस्तुतः मानव (जनसंख्या) वह संदर्भ बिन्दु अथवा केन्द्र बिन्दु है जिसको केन्द्र में रखते हुए क्षेत्रीय लक्षणों का अवलोकन और निर्धारण किया जाता है। ज्ञातव्य है। कि मानव (जनसंख्या) से ही अन्य भौगोलिक तत्वों को अर्थ एवं महत्व मिलता है।

       उदाहरण के लिए मानव के संदर्भ में ही किसी स्थान विशेष की जलवायु को अर्थपूर्ण नाम एवं महत्व मिल पाता है। इसी प्रकार से किसी भी प्राकृतिक पदार्थ की संसाधनता भी मानव उपयोगिता के संदर्भ में ही अस्तित्व में आ पाती है। जनसंख्या भूगोल में जनांकिकी प्रक्रियाओं और इन प्रक्रियाओं के परिणामों का अध्ययन पर्यावरणीय संदर्भ में किया जाता है।

     स्पष्टतः जनसंख्या भूगोल में जनसंख्या की संरचना, वृद्धि और स्थानान्तरण में मिलने वाली स्थानिक विभिन्नताओं (Spatial Variation) का अध्ययन और इन स्थानिक विभिन्नताओं के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।

जनसंख्या भूगोल का अध्ययन क्षेत्र (Scope of Population Geography)

       जनसंख्या भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

⇒ भूतकाल की जनसंख्या सम्बन्धी विशेषताओं का अध्ययन।
⇒ जनसंख्या के वितरण के अध्ययन के अन्तर्गत महाद्वीपों तथा उसके विभिन्न क्षेत्रों में जनसंख्या वितरण प्रतिरूप, विश्व में बसे हुए और बिना बसे हुए क्षेत्रों का वितरण, जनसंख्या का अन्तर्प्रदेशीय और अन्तर्सामयिक वितरण, बस्तियों का आकार, वितरण एवं उनमें परस्पर दूरियों का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के घनत्व के अध्ययन में विभिन्न प्रकार के घनत्व, स्थानीय स्तर से लेकर विश्व स्तर तक जनघनत्व की विशेषताएं, घनत्व वितरण का स्थानिक प्रतिरूप तथा उनको प्रभावित करने वाले कारक, प्रवास के नियम एवं परिणाम तथा शिक्षित एवं योग्य मानव श्रम का कम विकसित देशों से अधिक विकसित देशों को स्थानान्तरण आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या वृद्धि के अन्तर्गत जनसंख्या वृद्धि का मापन, जन्म-दर, मृत्यु-दर, जनसंख्या वृद्धि पर प्रभाव डालने वाले कारक, वृद्धि प्रतिरूप का वितरण, जनसंख्या वृद्धि के सिद्धान्त तथा जनसंख्या वृद्धि भावी अनुमान आदि का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के संघटन के अन्तर्गत जाति, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, कार्यकर्ता-आश्रित तथा कार्यशील जनसंख्या की व्यावसायिक संरचना का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या के लक्षणों के अन्तर्गत जनसंख्या की साक्षरता एवं साक्षरता के स्तर को प्रभावित करने वाले कारकों तथा विश्व में साक्षरता का प्रतिरूप आदि का अध्ययन।

⇒ ग्रामीण एवं नगरीय जनसंख्या की सभी प्रकार की विशेषताएँ एवं लक्षण, नगरीकरण की प्रक्रिया एवं उस पर प्रभाव डालने वाले कारक तथा विश्व एवं उसके राष्ट्रों में नगरीकरण का प्रतिरूप का अध्ययन।

⇒ जनसंख्या संसाधन अनुपात में जनसंख्या वृद्धि तथा संसाधन विकास, जनसंख्या का बढ़ता दबाव, संसाधन एवं जनसंख्या अनुपात, संसाधनों पर आधारित जनसंख्या के सिद्धान्त, संसाधन एवं जनसंख्या प्रतिरूप, जनसंख्या क्षमता, अधिकतम जनसंख्या, अल्प जनसंख्या, अनुकूलतम जनसंख्या आदि का अध्ययन।


30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।

30. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


           भूगोल एक ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) है, भूगोल के इस स्वरूप को प्रतिपादित करने का मुख्य श्रेय जर्मनी के दो प्रमुख निम्न भूगोलवेत्ताओं को जाता है:

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen)

2. अल्फ्रेड हैटनर (A. Hettner)

     इन दोनों भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के अध्ययक्ष क्षेत्र (scope) की व्याख्या भी की थी और अन्य क्रमबद्ध विज्ञानों (systematic science) के साथ भूगोल के सम्बन्धों का विश्लेषण (analysis) और संश्लेषण (synthesis) भी किया था।

1. वॉन रिचथोफेन (Von Richthofen 1833-1905):-

        यद्यपि रिचथोफेन की शिक्षा भूगर्भ विज्ञान या भौमिकी (Geology) में हुई थी, परन्तु यह एक प्रसिद्ध भौतिक भूगोलवेत्ता (Physiographer) थे और साथ ही उन्होंने भूगोल के मानवीय पक्ष का भी ध्यान रखा था। वे बोन, लीपजिंग तथा बर्लिन विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे थे। सर्वप्रथम उनके अन्वेषण आल्पस क्षेत्र में आस्ट्रिया के टिरोल (Tyrol) प्रदेश में हुए थे तत्पश्चात् वह ट्रांसिल्वानिया तक बढ़ा और पूर्वी चीन में जाकर रहा।

        चीन में उसने व्यापक विस्तृत क्षेत्र अध्ययन करके सन् 1882 में ‘चीन का भूगोल’ नामक पुस्तक तथा उसकी मानचित्रावली (Atlas) प्रकाशित की। रिचथोफेन ने चीन के शान्टुग और किआओचाऊ क्षेत्रों में कोयले के भण्डारों को बताया था। वह संयुक्त राज्य अमेरिका में कैलीफोर्निया भी गया था जहाँ उसने सोने के भण्डारों की भी खोज की थी।

     रिचथोफेन चीन में भू-विज्ञानी (Geologist) होकर गया था और वहाँ से भूगोलवेत्ता (Geographer) बनकर लौटा था। चीन के भूगोल पर रिचथोफेन की ग्रन्थमाला कुछ उसके जीवनकाल में और कुछ उसकी मृत्यु के बाद सन् 1877 से 1912 तक प्रकाशित हुई थी उसमें 5 ग्रन्थ थे। इस ग्रन्थमाला के प्रकाशन से रिचथोफेन विश्वविख्यात हो गया था। प्रथम ग्रन्थ पर ही उसको ‘Royal Geographical Society’ के संस्थापक का पदक मिला था। जर्मनी में वापस आने के बाद बोन विश्वविद्यालय में और फिर लीपजिग विश्वविद्यालय में भूगोल के प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई। तत्पश्चात् वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए थे।

    कई वर्षों तक वह ‘Berlin Geographical Society’ के अध्यक्ष भी रहे थे। उन्होंने महासागरीय संस्थान (Oceanographical Institute of Berlin) को ठोस वैज्ञानिक आधार पर स्थापित किया था।

       रिचथोफेन का मुख्य कार्य भौतिक भूगोल में विशेष भू-आकृति विज्ञान (Geomorphology) के क्षेत्र में है। सर्वप्रथम उसने रिया तटों (Ria Coasts) और फियोर्ड (Fiord Coasts) का अन्तर समझाया था। बाद में उसने प्रदेशों का अध्ययन करके सामान्य तुलनात्मक भूगोल (General Comparative Geography) की स्थापना की थी।

      जर्मनी में रिचथोफेन का निकटतम शिष्य अल्ब्रेट पेंक (Albrecht Penck) था। जर्मनी से बाहर उसके ग्रन्थों की प्रशंसा ब्लाश ने बहुत अधिक की, परन्तु उसका सबसे अधिक प्रमुख सहायक कार्यकर्ता अमेरिकन भौतिक भूगोलशास्त्री डेविस (W. M. Davis) था।

     वॉन रिचथोफेन ने भूगोल को ‘क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान’ (Chorological Science) सिद्ध किया था अर्थात् भूगोल में पृथ्वीतल की क्षेत्रीय विभिन्नताओं (Areal Variations) का अध्ययन होता है। उसने अपने लेखों में कहा था कि भूगोल की अध्ययन सामग्री में अनेक प्रकार के तथ्यों की बहुत बड़ी संख्या होती है, उस सब तथ्यों को मिलाकर एक विषय के अन्तर्गत अध्ययन करने के लिए अध्ययन की विधि को तय करना बहुत अधिक आवश्यक है। इस दृष्टिकोण से भूगोल क्षेत्रीय भिन्नता (Areal diversity) का विषय है। रिचथोफेन के अनुसार भौगोलिक अध्ययन में क्षेत्रीय सिद्धान्त (Areal principle) अनिवार्य था।

       “इस प्रकार भूगोल को ‘क्षेत्रीय विज्ञान’ का स्वरूप देने का मुख्य श्रेय वॉन रिचथोफेन को ही है।”

2. अल्फ्रेड हैटनर (Alfred Hettner 1859-1941):-

      हैटनर महोदय बीसवीं शती के अग्रगण्य रीति-विधायक (Methodologist) माने जाते हैं। हैटनर ने अन्य भूगोलवेत्ताओं की अपेक्षा सबसे अधिक मात्रा में भूगोल को दार्शनिक तथा वैज्ञानिक आधार प्रदान किया था। उसने भूगोल की एक प्रमुख अनुसन्धान पत्रिका (Research Journal) को प्रकाशित किया था। साथ ही कई ग्रन्थ भी लिखे, जिनमें प्रमुख ग्रन्थ भूगोल के विधि तंत्र (Methodology) पर और प्रादेशिक भूगोल पर थे और लगभग 30 व्यक्तियों को डाक्ट्रेट की उपाधि के लिए शोधकार्य कराया था।

भूगोल एक क्षेत्र
      हैटनर भूगोल के ही विद्यार्थी थे। वे रिचथोफेन तथा रेटजेल के शिष्य थे। उनकी नियुक्ति हाइडिलबर्ग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर थी। वह मूलतः भौतिक भूगोलवेत्ता तथा प्रादेशिक भूगोलवेत्ता थे। उन्होंने बहुत सी भौगोलिक यात्राएं भी की थीं।

        भौतिक भूगोल पर उसके बहुत से शोध पत्र (Research papers) भी प्रकाशित हुए थे जो 1919 से आगे के वर्षों में 4 खण्डों में छपे थे। यूरोप के भूगोल की पुस्तक 1907 में छप चुकी थी, परन्तु उसका संशोधित संस्करण शेष विश्व के भूगोल के साथ सन् 1923 में प्रकाशित हुआ था। हैटनर की विशेष ख्याति भौगोलिक विधि तंत्र(Geographical methodology) पर लिखे गए ग्रन्थ द्वारा हुई थी जो सन् 1927 में प्रकाशित हुआ था।

      हैटनर ने अपने लेखों में काण्ट द्वारा प्रस्तुत भूगोल की परिभाषा का पुनरावर्तन किया और उस ढांचे के अन्दर हम्बोल्ट, रेटजेल एवं पेशेल के द्वारा लिखे गए क्रमबद्ध अध्ययन (Systematic Study) को तथा रिचथोफेन, रिटर एवं मार्थे के द्वारा लिखे गए प्रादेशिक अध्ययनों को परस्पर शामिल करके भूगोल को एक समबद्ध पूर्ण (Coherent whole) विषय बना दिया है।

     उसने एक भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zeitschrift’ सन् 1895 में प्रकाशित की थी। वास्तव में हैटनर की विचारधारा का प्रकाशन उस पत्रिका की प्रस्तावना में, उसके बाद सन् 1898 में भूगोल का प्रोफेसर होने के प्रारम्भिक भाषण में, तत्पश्चात् भौगोलिक विधि-तंत्र पर प्रकाशित पुस्तक में हुआ है।      

   अलफ्रेड हैटनर के अनुसार भूगोल सामान्य भू-विज्ञान नहीं है, वरन् पृथ्वी तल का क्षेत्रीय विज्ञान है। “Geography is a Chorological Scinece of the earth’ Surface.”

      इसका सम्बन्ध प्रमुख रूप से प्रकृति और मनुष्यों के बीच पारस्परिक क्रियाओं से होता है इसके अन्तर्गत स्थानिक सम्बन्धों का मूल्यांकन भी होता है। भूगोल का प्राथमिक रूप से उद्देश्य क्षेत्रों या प्रदेशों का अध्ययन करना है। हैटनर ने सामान्य भूगोल एवं विशेष भूगोल अथवा प्रादेशिक भूगोल के अन्तर को भी समझाया है। सामान्य भूगोल के अन्तर्गत भूतल पर विभिन्न भौगोलिक परिघटनाओं (Phenomena) के वितरण का क्रमबद्ध (Systematic) वर्णन होता है। दूसरे विशेष या प्रादेशिक भूगोल (Landerkunde) के अन्तर्गत प्रदेशों के भौगोलिक तत्वों का अध्ययन होता है।

       सन् 1905 में हैटनर ने भूगोल की परिभाषा में कहा, कि भूगोल पृथ्वी का क्षेत्रीय विज्ञान है, जिसमें क्षेत्रों का अध्ययन उनकी विभिन्नताओं और स्थानिक सम्बन्धों के प्रसंग में होता है।

       क्षेत्रों (Area) के अध्ययन में हैटनर ने प्रकृति और मनुष्य दोनों को सम्मिलित किया है। इन दोनों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

   अलफ्रेड हैटनर के भौगोलिक विधि तंत्र (Methodology) पर लिखे गए शोध प्रबन्ध, जिनको वह विधि विहार (Methodological rambles) कहकर सम्बोधित करते थे तथा जलवायु एवं उच्चावचन (relief) पर उनके विवेचन आज भी भौगोलिक ज्ञान और प्रस्तुतीकरण (Presentation) में उच्च स्थान पर हैं। उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका ‘Geographische Zetschrift’ का लेखन सम्पादन निरन्तर नियमित रूप से किया था। सन् 1905 में सोवियत संघ के भूगोल पर एक श्रेष्ठ पुस्तक, सन् 1907 में यूरोप का भूगोल और सन् 1915 में ब्रिटेन का मूल्यांकन हैटनर महोदय ने प्रकाशित कराया था।

        उसने अपनी भौगोलिक पत्रिका में, पुस्तक के रूप में अपने भू-प्राकृतिक अध्ययन- महाद्वीपों की स्थलाकृति (The terrain Features of the continents) और विश्व के सांस्कृतिक भूगोल (The march of culture over the world) की पुस्तकें भी छपवाई थीं।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल एक क्षेत्र-वर्णनी विज्ञान (Chorological Science) है। विवेचना कीजिये।


29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना

 29. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना



            क्षेत्रीय विभेदन भूगोल की आत्मा स्वरूप है। अन्तर्सम्बन्ध की प्रक्रिया तो मात्र यह स्पष्ट करती है कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले तथ्य कैसे एक जैविक इकाई की तरह परस्पर ससंजित एवं क्रियाशील हैं, लेकिन इन तथ्यों की जिनमें प्राकृतिक वातावरण एवं मनुष्य आते हैं, अपनी अलग विशेषताएँ होती हैं।

     यदि हम पृथ्वी की सतह को देखें तो पृथ्वी की सतह का दो-तिहाई हिस्सा जल है एवं एक-तिहाई भाग थल है। थल पर मिट्टी की असमान परत है तथा अनेक भू-आकृतियाँ हैं, जैसे-पर्वत, पठार, मैदान, घाटियाँ एवं उसके विविध रूप। जल भी अनेक छोटे-बड़े सागरों, नदियों, झीलों में विभक्त है। थल पर नदियाँ, हिमानी, झरने, भूमिगत जल, अन्तरादेशीय प्रवाह प्रणालियाँ, जंगल, घास के मैदान, पशुजीवन, मरुस्थल, कृषि क्षेत्र आदि दृष्टव्य हैं।

       जल की सतह पर कोरल रीफ, जल से प्राप्त पदार्थ, थल से प्राप्त पदार्थ, जलीय वनस्पतियाँ, मछलियाँ, कछुए आदि अनेक जीव हैं। वायुमण्डल भी पृथ्वी की सतह का अंग है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 23°30′ अंश झुकी है एवं सूर्य की परिक्रमा करती है। वायुमण्डल भी उसके साथ घूमता है। पृथ्वी की सतह पर सूर्यताप का वितरण असमान है जो सूर्य से सापेक्ष स्थिति के अनुसार बदलता है। इससे पृथ्वी की जलवायु में विविधता आती है। इस तरह वैभिन्न्य पृथ्वी की सतह की मूल विशेषता है।

      दूसरी ओर मनुष्य हैं। मनुष्य अकेला नहीं होता। वह वस्तुतः समाज में रहता है। आज भी पृथ्वी की सतह पर आदिवासी जनजातियाँ हैं जो परस्पर युद्धरत रहती हैं। पशुचारण करने वाले समूह भी हैं। उन्नत समाज स्थायी कृषि करते हैं और उद्योग, व्यापार परिवहन में रत रहते हैं। उनके अधिवास हैं जो कहीं बिखरे हैं तो कहीं सघन हैं, ग्राम एवं नगर हैं, ये सब भी स्थान घेरते हैं।

     उपरोक्त दोनों तथ्य कैसे एक-दूसरे से एक जीव की तरह अन्तर्सम्बन्धित हैं, यह ऊपर विवेचित है। इस तरह यह अन्तर्सम्बन्धित वैविध्य पृथ्वी की सतह पर पहचाना जा सकता है तथा इसके छोटे-बड़े क्षेत्र दृष्टव्य होते हैं। उदाहरणार्थ ध्रुवीय क्षेत्र के एस्किमों निवासियों को अपना स्पष्ट क्षेत्र है, तो अफ्रीका के पिग्मी एवं कलाहारी के बुशमैन का अपना रहन-सहन एवं स्पष्ट क्षेत्र है।

        इतना ही नहीं असम घाटी में धान की खेती, कनाडा में गेहूँ की खेती के विस्तृत क्षेत्र, अर्जेन्टाइना में पशुचारक प्रदेश, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं जापान में औद्योगिक प्रदेश सब वैभिन्य से परिपूर्ण होते हुए भी क्षेत्रीय इकाइयों के रूप में पहचाने जाते हैं। इस तरह, समाज एवं वातावरण के अन्तर्सम्बन्ध की परिणति क्षेत्रीय इकाई में होती है। ऐसी क्षेत्रीय इकाइयों का अध्ययन भूगोल का उद्देश्य है।

    यहीं से भूगोल में प्रदेश (Region) की संकल्पना का समावेश होता है। पृथ्वी की सतह के क्षेत्रीय वैभिन्न्य का विषम स्वरूप पृथ्वी को विभिन्न प्रखण्डों में बांट देता है। उदाहरण के लिए, गंगा के मैदान का धरातल, जलप्रवाह, मिट्टियाँ, मानव अधिवास, आदि मिलकर एक विशिष्ट जीवन पद्धति का गठन करते हैं। यह कृषि प्रधान क्षेत्र कहा जा सकता है, सीमांकित किया जा सकता है, क्योंकि इस प्रदेश में जीवन पद्धति की एकरूपता या समरूपता मिलती है। इस समरूपता के आधार पर इसे गंगा-यमुना प्रदेश के नाम से जाना जाता है।

       इसी तरह, पहाड़ी प्रदेश, पर्वतीय क्षेत्र, भूमध्यसागरीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय प्रदेश आदि सब एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी अपने आन्तरिक क्षेत्रीय विस्तार में एक रूप होते हैं। इसलिए इन्हें प्रदेश कहते हैं।

     प्रदेश की संकल्पना भूगोल का क्रोड है। प्रदेश की परिभाषा, प्रदेश की पहचान एवं सीमांकन आदि सब अपने आप में विवेचना की विषय-वस्तु हैं। प्रदेश भौगोलिक भी होते हैं तथा प्रदेश की पहचान कराने वाले एक या अधिक तत्वों पर आधारित भी होते हैं। इस तरह प्रदेश अतिव्यापित भी हो सकते हैं।

     भूगोल के सैद्धान्तिक स्वरूप के उपरोक्त दोनों तत्व एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। अन्तर्सम्बन्ध पृथ्वी की सतह के तथ्यों को संसंजित करता है तथा क्षेत्रीय वैभिन्न्य भौगोलिक तथ्यों के स्थानिक प्रसार एवं उनके भौगोलिक व्यक्तित्व एवं अन्तर्निहित समरूपता को स्थापित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. भूगोल में क्षेत्रीय विभेदन अथवा विभिन्नता (Areal Differentiation) की संकल्पना को विवेचित कीजिए।

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना

28. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना



        मानव समाज के स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन का अध्ययन आर्थिक एवं सामाजिक भूगोल में अध्ययन की मुख्य विषय-वस्तु है। पृथ्वी सतह पर या उसके साथ विभिन्न मानव समाजों की होने वाली अन्तर्क्रिया ही स्थानिक व्यवस्था का आधार है। स्थानिक विश्लेषण का मुख्य उद्देश्य इस स्थानिक व्यवस्था की संरचना और क्रियाविधि का परीक्षण करते हुए मानवीय गतिविधियों के स्थानिक प्रारूपों एवं प्रक्रियाओं को पहचानना है।

         मानवीय गतिविधियों के फलस्वरूप उत्पन्न स्थानिक प्रारूपों को तीन वर्गों में रखा जा सकता है, यथा:

(i) अवस्थिति- जो पृथ्वी सतह पर बिन्दु के रूप में है।

(ii) अन्तर्क्रिया- जो संचरण की रेखाएँ हैं जिनके सहारे माल, मनुष्य, विचारों और सेवाओं का वहन होता है।

(iii) प्रदेश- जो पृथ्वी सतह के समरूपी विशेषता वाले स्वरूपी या कर्मोपलक्षी क्षेत्र हैं।

      इन प्रारूपों को जन्म देने वाली स्थानिक प्रक्रियाएँ बड़ी जटिल हैं जिन्हें स्थानिक अन्तर्क्रिया द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन स्थानिक अन्तर्क्रियाओं में माल और सेवाओं का प्रवाह, प्रवसन, अल्पकालीन संचरण (जैसे- खरीददारी, वासस्थल से कार्यस्थल तक की यात्रा), सामाजिक संचरण, सूचनाओं का प्रसरण, आदि को सम्मिलित किया जाता है।

      इन प्रक्रियाओं के स्पष्टीकरण में मानवीय व्यवहार के अध्ययन पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विशेषकर इस बात पर कि मानव व्यवहार उन माध्यमों से कैसे प्रभावित होता है। जिन माध्यमों से उसने अपने स्थान का अवबोध या प्रत्यक्षीकरण किया है। इस प्रकार के प्रारूप एवं प्रक्रियाएँ स्थानिक पर्यावरण में उत्पन्न होते हैं, जो बढ़ती दूरी के साथ घटते प्रभाव के कारण स्थानिक अन्तर्क्रिया को बाधित या नियंत्रित करते हैं, लेकिन जिस स्थान में मानव अपनी गतिविधियों को संचालित करता है, वह स्थान सापेक्षिक है, क्योंकि यह स्थान दूरियों पर आधारित है और दूरी सापेक्षिक होती है तथा निरन्तर परिवर्तनशील है।

        स्थानिक संगठन एक जटिल प्रक्रिया है। मानव प्रतिदिन अपने आवास स्थल से अपने कार्यस्थल को जाता है। यह कार्यस्थल खेत हो सकता है, कार्यालय हो सकता है, कोई कारखाना या शिक्षण संस्थान या व्यावसायिक प्रतिष्ठान आदि हो सकता है। इस संचरण (Movement) के फलस्वरूप मार्गों का निर्माण होता है। इस प्रकार, मनुष्य के आवास एवं कार्यस्थल में पारस्परिक रूप से कर्मोपलक्षी अन्तर्प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। कृषि कार्य का क्षैतिज प्रसार अधिक होता है अतः ग्रामीण क्षेत्रों का स्थानिक संगठन ग्रामीण संस्कृति से प्रभावित होता है। उद्योग या व्यापार केन्द्राधारित (Nodal) होते हैं। इन केन्द्रों पर मनुष्य का गमनागमन एक भिन्न प्रतिरूप को जन्म देता है। मार्ग संगम बिन्दुओं पर केन्द्रस्थलों (Central Places) की स्थापना होती है।

           केन्द्रस्थल तृतीयक क्रियाकलापों के केन्द्र होते हैं तथा भूवैन्यासिक संगठन में इनकी प्रमुख भूमिका होती है। गमनागमन के मार्ग पगडंडी, कच्ची सड़क, पक्की सड़क, राज्य मार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग, आदि स्तरों के होते हैं। इनके संगम बिन्दुओं पर स्थापित केन्द्र स्थल भी अपने कर्मोपलक्षी रूप में छोटे एवं बड़े होते हैं। इसे केन्द्र स्थलों का पदानुक्रम (Hierarchy) कहते हैं। यह स्थानिक संगठन की संरचना का आधार होता है। उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार किसी केन्द्र स्थल पर आता-जाता है। इसे उपभोक्ता व्यवहार कहते हैं।

           उपभोक्ता किसी केन्द्र स्थल के चयन का निर्णय मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टिकोण से करता है। इसके साथ ही निवास या कार्यस्थल से केन्द्र स्थल की दूरी का प्रभाव भी उपभोक्ता व्यवहार एवं गमनागमन प्रतिरूप पर पड़ता है। यह सार्वभौमिक प्रवृत्ति होती है कि मानव न्यूनतम श्रम (लागत) से अधिकतम लाभ प्राप्त करना चाहता है। साथ ही बढ़ती दूरी के अनुरूप ही केन्द्र स्थलों का प्रभाव घटता भी जाता है। इस प्रकार स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन के मूल तत्व कार्यस्थल, गमनागमन, परिवहन मार्ग, अन्तर्सम्बन्ध, केन्द्र स्थल, पदानुक्रम, दूरी क्षय, आदि हैं।

     स्थानिक संगठन की संरचना गमनागमन की बारम्बारता, केन्द्र स्थल के पदानुक्रमीय वर्ग एवं इनके बीच होने वाली अन्योन्याश्रित प्रक्रिया से सम्बन्धित है। उल्लेखनीय है कि केन्द्र स्थल कर्मोपलक्षी रूप से छोटे एवं बड़े होते हैं। केन्द्र स्थलों का पदानुक्रमीय महत्व गमनागमन प्रतिरूप एवं बारम्बारता को प्रभावित करता है। इसी आधार पर प्रत्येक केन्द्र स्थल के प्रभाव क्षेत्र का निर्धारण किया जाता है। केन्द्र स्थल सिद्धान्त के अनुसार ये कर्मोपलक्षी प्रदेश षटकोणीय होते हैं तथा न्यूनतम श्रम से अधिकतम लाभ के सिद्धान्त का अनुपालन करते हैं। किसी भी क्षेत्र का स्थानिक संगठन वहाँ की भूमि के मूल्य से प्रभावित होता है।

      स्थानिक संगठन की प्रथम अवस्था में कोई गाँव या नगर दूरी पर स्थित होता है। धीरे-धीरे जनसंख्या बढ़ने से उसका प्रमुख कार्यक्षेत्र नगर के मध्य में स्थित होता है तथा जनसंख्या का बहाव बाहर की तरफ बढ़ता जाता है। इससे संलग्न ग्रामीण क्षेत्र की भूमि का उपयोग नगरीय कार्यों में होने लगता है, अतः इसका मूल्य बढ़ने लगता है। मानव अपनी बुद्धि चातुर्य के द्वारा परिवहन और संचार साधनों का विकास कर स्थानिक पर्यावरण को विशिष्टता प्रदान करता है।

        परिवहन और संचार साधनों के विकास द्वारा पृथ्वी सतह पर माल, सेवाओं, मनुष्यों और सूचनाओं के वहन में वृद्धि हुई है। समय और लागत दूरी को कम करके आपूर्ति एवं माँग के क्षेत्रों को समीप लाकर आर्थिक स्थानों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है। इसी प्रकार दूरसंचार और शिक्षा द्वारा स्थान के सम्बन्ध में किए गए अवबोधों में विद्यमान अन्तरों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

     इस प्रकार भूवैन्यासिक संगठन के संकल्पना सूत्र से भौगोलिक चिन्तन को न केवल सुनिश्चित दिशा मिली वरन् भौगोलिक अध्ययन मात्र वर्णनात्मक न रहकर प्रक्रिया विश्लेषण, सामान्यीकरण तथा सिद्धान्त प्रतिपादन के सोपानों से बढ़ता हुआ भविष्य के प्रक्षेपण (Projection) तथा पुनर्गठन के स्तर तक पहुँच गया। सभी गुण किसी विषय के सही अर्थ में वैज्ञानिक होने के दावे को स्थापित करते हैं। स्वाभाविक है कि इस स्तर तक पहुँचने में परम्परागत मानचित्र विवेचन के साथ-साथ सशक्त सांख्यिकीय विश्लेषण एवं प्रक्रियात्मक विवेचन की विधि बड़े पैमाने पर अपनाई गई। अतएव भूगोलवेत्ता क्षेत्रीय आयामयुक्त व्यावहारिक समस्याओं का निराकरण तथा समन्वित क्षेत्रीय विकास में अन्य विशेषज्ञों के साथ हाथ बंटाने में अधिक आत्मविश्वास के साथ अग्रसर हुए।

प्रश्न प्रारूप

1. स्थानिक या भूवैन्यासिक संगठन (Spatial Organisation) की संकल्पना का संक्षिप्त में विवरण दीजिए।


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