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10. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त (Spykman’s Rimland Theory)

 10. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त

(Spykman’s Rimland Theory)



        स्पाइकमेन

       स्पाइकमेन अमेरिकी भू-राजनीतिज्ञ था। रिमलैण्ड सिद्धान्त का प्रतिपादन उसी ने किया। उसने मैकिण्डर के स्थल शक्ति सिद्धान्त को अस्वीकार किया और उसकी युद्ध नीति का खण्डन किया। उसने मैकिण्डर के हृदय-स्थल सिद्धान्त की वैधता को अस्वीकार किया, क्योंकि यह स्थल इतना शक्ति सम्पन्न व महत्वपूर्ण नहीं था जितना उसके चारों ओर का सीमान्त परिवेश था।

       स्पाइकमैन ने अपनी पुस्तक The Geography of the Peace (1944) में हार्टलैण्ड के स्थान पर यूरेशिया के तटीय क्षेत्र जो मैकिण्डर के सीमावर्ती अर्द्धवृत्त से समता रखते हैं, को अधिक शक्तिशाली व्यक्त किया। इसमें सामुद्रिक यूरोप, मध्य-पूर्व, भारत, दक्षिण-पूर्वी एशिया, चीन तथा कोरिया, आदि सम्मिलित किए जाते हैं। इनके शक्तिशाली होने का कारण जनसंख्या, प्रचुर संसाधन तथा सामुद्रिक मार्गों का उपयोग है। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को इन्होंने रिमलैण्ड के नाम से सम्बोधित किया।

     जर्मनी की बढ़ती शक्ति से स्पाइकमैन इतना प्रभावित हुआ कि उसने किसी एक शक्ति द्वारा उसे नियंत्रित करने के सिद्धान्त को अस्वीकार किया तथा कहा कि परिधीय स्थलखण्ड राज्यों को अधिक संगठित कर अपतटीय पट्टी के राज्यों के सहयोग से ही जर्मन अधिग्रहण को कमजोर बनाया जा सकता है।

       स्पाइकमैन ने यूरेशियाई हृदय-स्थल की सम्भाव्य शक्ति स्रोत के समकक्ष ही संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा का पूर्वी भाग बनाया, परन्तु विश्व नियंत्रण का आधार यूरेशियाई तटवर्ती भू-भागों को ही माना। इसी आधार पर उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यह आग्रह किया कि मित्र राष्ट्रों को मुख्यतः संयुक्त राज्य अमेरिका को अपनी भविष्यकालीन नीतियों का आधार परिधीय स्थलखण्ड के किसी भी प्रकार के संगठन को रोकने का होना चाहिए।

       मैकिण्डर के समान स्पाइकमैन ने भी अपने मत को व्यक्त करते हुए लिखा था:

” जो रिमलैण्ड को नियंत्रित करता है, वह यूरेशिया पर शासन करता है,

जो यूरेशिया पर शासन करता है, वह विश्व के भविष्य को नियंत्रित करता है।”

(“Who controls the Rimland rules Eurasia,

who rules Eurasia controls the destinies of the world.”)

      स्पाइकमैन ने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रिटिश, सोवियत व अमेरिकी जल व स्थल शक्तियों के सहयोग से परिधीय स्थलखण्ड यूरोपीय तटवर्ती क्षेत्र को नियंत्रित करेगा तथा इससे विश्व के आवश्यक शक्ति सम्बन्धों को नियंत्रित करेगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नाजी जर्मनी तथा जापानी शासक रिमलैण्ड के बड़े भाग को नियंत्रित करने में सक्षम थे, किन्तु इनका शासन तीन-चार वर्षों तक ही रहा।

      स्पाइकमैन ने व्यक्त किया कि रिमलैण्ड का क्षेत्र विश्व संघर्ष का कारण है। इसका ऐतिहासिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए यह मत व्यक्त किया कि सदैव स्थल एवं जलीय शक्तियों में संघर्ष रहा है तथा रिमलैण्ड के देश एवं रूस में संघर्ष का मूल कारण रिमलैण्ड पर अधिकार की चेष्टा है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका की नीति रिमलैण्ड पर अधिकार करने की या सोवियत संघ के विस्तार को रोकने की होनी चाहिए।

        यूरेशियाई भू-भाग का परिधीय स्थलखण्ड हृदय स्थल व सीमान्त समुद्रों के मध्य स्थित होने से इसे स्पाइकमैन स्थल शक्ति व समुद्र शक्ति के मध्य के संघर्षों का मध्यवर्ती अन्तस्थ क्षेत्र (Buffer Zone) कहता है। यूरेशिया के विश्लेषण में स्पाइकमैन ने ग्रेट ब्रिटेन व जापान को परिधीय स्थलखण्ड से बाहर राजनीतिक व सैनिक शक्ति के केन्द्र माना जो पश्चिम यूरोप तथा पूर्वी एशिया के तट से दूर स्थित हैं। अफ्रीका व आस्ट्रेलिया समुद्रस्थ अपतटीय महाद्वीप हैं।

      अफ्रीका यूरेशिया के दक्षिण-पश्चिम तट से तथा यूरोपीय भूमध्य सागर से सम्बन्धित है तथा आस्ट्रेलिया, यूरेशिया के दक्षिण-पूर्व तटों से एशियाई भूमध्य सागर से जुड़ा हुआ है। एशियाई भूमध्य सागर आस्ट्रेलिया को दक्षिण-पूर्वी एशिया से अलग करने वाला जलपुंज है और स्वाधीन एशियाई विश्व के राजनीतिक व सामरिक महत्व हेतु विशिष्टता लिए है।

       इस क्षेत्र में अनेक देश हैं जो राजनीतिक तथा प्राकृतिक विविधताओं से युक्त हैं। यहाँ की प्रजातियों एवं संस्कृति में भिन्नता है। अतः ये सभी कभी संगठित नहीं हो सके और न ही किसी एक शक्ति के नियंत्रण में रहे। इस क्षेत्र की एक कमजोरी और है कि इस क्षेत्र पर दोहरा आक्रमण किया जा सकता है- एक ओर हार्टलैण्ड की ओर से तथा दूसरी ओर बाह्य शक्तियों द्वारा।

निष्कर्ष:

     स्पाइकमैन का सिद्धान्त द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति से पूर्व प्रस्तुत किया गया था और युद्ध समाप्ति तक इस सिद्धान्त की मान्यता आधी रह गई थी। जर्मनी, इटली व जापान हार गए और समुद्री शक्ति के स्थान पर वायु शक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध हो चुकी थी। कोई भी परिधीय स्थलखण्ड (Rimland) शक्ति सम्पूर्ण परिधीय स्थलखण्ड को संगठित या नियंत्रित करने में असफल रही है, क्योंकि यह हृदय-स्थल शक्ति व अपतटीय शक्तियों द्वारा आक्रमणीय है, संगठित तटीय यूरोप को सर्वप्रथम भूमध्य सागर, उत्तरी अफ्रीका, मध्य-पूर्व, सहारा के दक्षिण अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया पर आधिपत्य स्थापित करने के पश्चात् ही परिधीय स्थलखण्ड पर नियंत्रण की कल्पना को साकार करना पड़ेगा।

प्रश्न प्रारूप

1. स्पाइकमेन का रिमलैण्ड सिद्धान्त (Spykman’s Rimland Theory) का विवरण दीजिए।


 

9. मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त (Mackinder’s Theory of Heartland)

9. मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त

(Mackinder’s Theory of Heartland)



      मैकिण्डर का हृदय स्थल

        मैकिण्डर का सर्वप्रमुख सिद्धान्त हृदय-स्थल सिद्धान्त (Heartland Theory) है जो Natural Seat of Power एवं Pivot Area पर आधारित है। मैकिण्डर का विचार था कि समुद्री यात्राओं द्वारा नवीन देशों की खोज का समय तो समाप्त हो गया अतः ब्रिटेन के लिए नौसेना में वृद्धि करना राजनीतिक प्रभुसत्ता के लिए आवश्यक नहीं है।

        विश्व के अधिकांश द्वीपों एवं महाद्वीपों की खोज हो चुकी है, किन्तु साइबेरिया प्रदेश ऐसा क्षेत्र है जिसे अभी तक पूर्णतः खोजा नहीं गया है। यह पुरानी दुनिया (एशिया, यूरोप एवं अफ्रीका) का अभेद्य प्रदेश है। यह समुद्र से दूर है अतः यहाँ जलीय शक्ति का प्रभाव नहीं है। इसके उत्तर में आर्कटिक महासागर है जो बर्फ से जमा रहता है जिसके कारण उत्तर से भी जल शक्ति का प्रवेश नहीं हो सकता है। मैकिण्डर ने इसे अभेध प्रदेश माना। इस अभेद्य प्रदेश को ही उन्होंने हृदय स्थल (Heartland) कहा। उनका विचार था कि जो इस हृदय स्थल पर अधिकार कर लेगा उसे नौसेना शक्ति परास्त नहीं कर पाएगी।

       मैकिण्डर ने विश्व के सबसे बड़े स्थल खण्ड को पुरानी दुनिया में बताया। उसने यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका को विश्व द्वीप (World Island) माना। विश्व का 9/12 भाग जल एवं 3/12 भाग स्थल है। विश्वद्वीप ग्लोब के 2/12 भाग को और दोनों अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड तथा अन्य छोटे-मोटे द्वीप शेष 1/12 भाग को घेरे हुए हैं। स्थल खण्ड की दृष्टि से विश्व द्वीप में एकता है। विश्व द्वीप में विश्व की 14/16 जनसंख्या बसती है, अन्य 1/16 जनसंख्या दोनों अमेरिका व आस्ट्रेलिया में तथा शेष 1/16 समुद्रस्थ अन्य द्वीपों में निवास करती है।

     मैकिण्डर ने हृदय स्थल के चारों ओर चन्द्राकार पेटी में ईरान, अफगानिस्तान, मध्य पूर्व के देश तथा मंगोलिया, आदि अविकसित देश बताए तथा बाहरी चन्द्राकार पेटी में ब्रिटेन, फ्रांस, जापान तथा अमेरिका जैसी नौसैनिक शक्तियाँ बताईं। प्रारम्भिक अवस्था में उन्होंने हृदय स्थल के अन्तर्गत ईरान की अधिकांश उच्च भूमि, अफगानिस्तान, पश्चिमी चीन, साइबेरिया तथा मंगोलिया माना, किन्तु बाद में इसमें पूर्वी यूरोप को भी सम्मिलित कर लिया।

      इस प्रकार इसका विस्तार पूर्वी यूरोप में एल्ब नदी तक कर दिया गया। 1904 में धुरी क्षेत्र सिद्धान्त में कैस्पियन सागर से श्वेत सागर तक खींची जाने वाली रेखा को सीमा स्वीकार किया गया था, परन्तु 1919 में हृदय स्थल में वाल्टिक सागर, मध्य व निम्न नाव्य डेन्यूब, काला सागर, एशिया माइनर, आर्मीनिया, पर्सिया, तिब्बत व मंगोलिया सम्मिलित कर लिया गया और अनातोलिया के पठार, पिण्डस पर्वत, दिनारिक आल्पस, मध्य डेन्यूब, मध्य जर्मनी, डेनमार्क व स्केण्डेनेवियाई प्रायद्वीप से होकर गुजरने वाली रेखा से परिवृत्त क्षेत्र में सीमा पश्चिमी क्षेत्र को स्थानान्तरित कर दी गई। मैकिण्डर के इस सिद्धान्त में हृदय स्थल को पश्चिम, दक्षिण व पूर्व में घेरे हुए जल-स्थल राज्यों की एक आन्तरिक तटीय सीमान्त क्षेत्र पड़ी है।

      मैकिण्डर के हृदय स्थल की सीमा में परिवर्तन किया गया, किन्तु उन्होंने बड़ी दृढ़ता से यह मत व्यक्त किया कि जो हृदय-स्थल पर शासन करेगा, वह विश्वद्वीप को नियंत्रित करेगा और अन्ततः विश्व पर राज्य करने में सफल होगा। उन्होंने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए:

“जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, ‘हृदय क्षेत्र’ को नियंत्रित करता है।

जो ‘हृदय क्षेत्र’ पर शासन करता है, वह विश्वद्वीप पर नियंत्रण रखता है।

जो विश्वद्वीप पर शासन करता है, वह विश्व पर नियंत्रण रखता है।”

चित्र : मैकिंडर का ह्रदय-स्थल

     मैकिण्डर पूर्वी यूरोप को हृदय-स्थल का द्वार मानते थे। उनका विचार था कि हृदय स्थल में पूर्वी यूरोप के देशों से होकर ही प्रवेश किया जा सकता है। इसीलिए इन देशों की सामरिक महत्ता है। शक्ति सन्तुलन पूर्वी एवं पश्चिमी यूरोप के हाथों में रहेगा। शक्ति सन्तुलन बनाए रखने के लिए उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि पश्चिमी यूरोपीय देशों की महान शक्तियों को पूर्वी यूरोपीय देशों एवं हृदय-स्थल क्षेत्रों के साधनों को संगठित करने वाली शक्तियों का विरोध करना चाहिए।

     जर्मनी द्वारा पूर्वी यूरोप के खुले मार्ग द्वारा सोवियत संघ पर 1917 एवं 1942-43 में दो बार हमले किए गए। जर्मन भू-राजनीतिज्ञ हृदय-स्थल द्वारा विश्वद्वीप पर प्रभुत्व स्थापित करने तथा नई दुनिया के आधिपत्य को जर्मन नेतृत्व में ही सम्भव मानते रहे तथा जर्मनी के सभी प्रयास भी इसी नीति पर आधारित रहे। जर्मन भू-राजनीतिज्ञ स्थल शक्ति को समुद्री शक्ति से श्रेष्ठ व लाभप्रद मानते रहे तथा मैकिण्डर के हृदय-स्थल हेतु संघर्ष को नीतिगत स्वीकार किया।

      1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला कर दिया तो उसका विरोध जर्मन भू-राजनीतिज्ञों ने किया। 1943 में मैकिण्डर ने ‘The Round World and the Winning of the Peace’ नामक लेख प्रकाशित किया एवं अपने हृदय-स्थल सिद्धान्त को नवीन अभिव्यक्ति प्रदान की। उन्होंने समुद्र पार स्थित शक्तियों को यह सुझाव भी दिया कि समुद्रपारीय शक्तियों को फ्रांस, इटली, मिस्र एवं भारत, आदि से सम्बन्ध सुदृढ़ रखने चाहिए। ये सम्बन्ध हृदय-स्थल क्षेत्रों के देशों को अपनी स्थलीय शक्तियों का विकास करने पर बाध्य करेंगे।

     मैकिण्डर ने हृदय-स्थल सिद्धान्त को महत्वपूर्ण माना था तथा वह हृदय स्थल के सन्दर्भ में जर्मनी की सैनिक स्थिति की महत्ता को भी मानता था।

    मैकिण्डर का हृदय स्थल सिद्धान्त उस समय तक अधिक मान्य रहा जब तक स्थल या जल से ही गमनागमन होता था। मैकिण्डर ने जब अपना सिद्धान्त प्रस्तुत किया तब रेलों व समुद्री आवागमन के साधनों में प्रतिस्पर्द्धा थी एवं हवाई शक्ति का विकास अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था। आज परिस्थितियाँ 1919 जैसी नहीं हैं, अब उपनिवेशवाद बहुत कुछ समाप्त हो गया है।

       मैकिण्डर ने 1943 में वायुशक्ति के महत्व को स्वीकार किया था, किन्तु वह इतना सन्तुष्ट नहीं था और सोचता था कि यह आने वाले समय में जल-स्थल शक्तियों की तुलना में इतना अधिक श्रेष्ठ साबित नहीं होगा, किन्तु वर्तमान समय में वायुयानों का इतना अधिक विकास हो चुका है कि इनके द्वारा पूरे विश्व में जाया जा सकता है। इस समय के परमाणु युग में प्रक्षेपास्त्रों एवं रॉकेटों का प्रयोग होने लगा है।

      1943 के संशोधन से उनके हृदय स्थल सिद्धान्त में कमियाँ दिखाई देने लगी थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्त तक इस सिद्धान्त की महत्ता और भी कम हो गई थी। इसका प्रमुख कारण हवाई हमलों का होना था। वे दुर्गम क्षेत्र जहाँ जाना सम्भव नहीं था अब आसानी से पहुंचा जा सकता है। इससे तो पूरी ग्लोबीय राजनीति ही बदल गई।

      इस आलोचना से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि उनका हृदय-स्थल सिद्धान्त का विचार महत्व नहीं रखता है। उनके विचार आज भी विश्व सामरिकता के सम्बन्ध में महत्व रखते हैं।  

8. सीमान्त एवं सीमाएँ क्या हैं?

8. सीमान्त एवं सीमाएँ क्या हैं?



  सीमान्त एवं सीमा

     सीमान्त एवं सीमाओं का अध्ययन राजनीतिक भूगोल का महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि राजनीतिक भूगोल में राज्यों का अध्ययन किया जाता है। राज्यों के समुचित अध्ययन के लिए आवश्यक हो जाता है कि उनकी निश्चित सीमाएँ हों।

     सीमान्त तथा सीमाओं का प्रयोग सदैव समानार्थक अर्थों में होता रहा है तथा इसके अन्तर के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं रहे हैं। सीमा तो एक रेखा के रूप में है जबकि सीमान्त एक क्षेत्र होता है। सीमा रेखा सीमान्त के अन्दर होती है जो राज्यों के मध्य सम्प्रभुता को अलग करती है। सीमाएँ राज्य की अभिन्न अंग हैं, अतः राजनीतिक भूगोल में इन्हें अधिक महत्व दिया गया है।

सीमान्त (Frontiers)

      सीमान्त के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द Frontier की उत्पत्ति लैटिन भाषा के Frons अथवा Frontis तथा फ्रेंच भाषा के Front शब्द से हुई है, जिसका अर्थ ‘सम्मुख भाग’ या ‘अग्र भाग’ से है। सीमान्त (Frontier) के लिए Foreland, Borderland, Marchland, आदि समानार्थी शब्दों का प्रयोग भी किया जाता है। इन सभी का आशय ‘एक ही राज्य के पृष्ठप्रदेश के क्षेत्रयुक्त अग्रिम भाग से है।’

     हिन्दी शब्द सीमान्त का आशय भी राज्य के सीमावर्ती क्षेत्र से ही है।

प्रेसकाट के अनुसार, “सीमान्त क्षेत्र दो राज्यों के मध्य का राजनीतिक भाग है जो एक ही राज्य के सघन बसे हुए और विकसित मूल क्षेत्र (Core Area) से दूर सीमा के निकट निर्जन और अविकसित क्षेत्र होता है।””

गोबलेट के अनुसार, “सीमान्त वह भौगोलिक स्थिति है, जहाँ उसके विस्तार के विरुद्ध प्रतिरोधक शक्तियाँ तटस्थ हो जाती हैं।” अर्थात् सीमान्त राज्य के बहिर्वर्ती क्षेत्रों में विद्यमान क्षेत्रीय विस्तार है, यहाँ पर राज्य की प्रभुसता अपेक्षाकृत शिथिल हो जाती है।

मुडी के अनुसार, “एक सीमान्त का स्वरूप चाहे प्राकृतिक, भाषायी, धार्मिक या जातीय हो, उसे स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता है। इसके लक्षण परिवर्तित हो सकते हैं अथवा इसके सीमान्त सम्बन्धी कार्य समाप्त हो सकते हैं, परन्तु सीमान्त यथावत ही बना रहता है।”

डी ब्लिज ने सीमान्त का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि “सीमान्त राजनीतिक इकाई के एकीकृत क्षेत्र के बाहर का राजनीतिक भौगोलिक क्षेत्र है और इसमें राजनीतिक इकाई का विस्तार सम्भव है।”

क्रिस्टोक के अनुसार, “सीमान्त एक विस्तृत क्षेत्र है जो राज्य के पृष्ठ प्रदेश का अग्र भाग है।”

कर्जन के अनुसार, “सीमान्त यथार्थ में तीक्ष्ण धार है, जिस पर आधुनिक युद्ध अथवा शान्ति सम्बन्धी परिणाम अथवा राष्ट्रों का जीवन-मरण अवलम्बित है।” यद्यपि यह मान्यता अब समाप्त सी हो गई है, क्योंकि सीमान्तों का स्थान सीमा रेखाओं ने और सीमा रेखाओं का स्थान अतिरिक्त राष्ट्रीय सीमाओं ने ग्रहण कर लिया है। राज्यों के मध्य अनियंत्रित क्षेत्र अब समाप्त हो गए हैं, फिर भी

फिशर ने स्पष्ट किया है कि, “सीमान्त राज्य का वह अंग है जो सीमा रेखा के भीतर की ओर विस्तार लिए हुए होता है एवं अप्रत्यक्ष रूप से अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में विलीन हो जाता है।”

वेगेट और प्रियर्स ने दो राज्यों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के लिए सीमान्त शब्द को प्रयुक्त किया है, इसे वे सीमान्त स्थल (Borderland) भी कहते हैं।

      उपरोक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सीमान्त क्षेत्र राज्यों के मध्य का संक्रमण क्षेत्र है जो राज्य के मूल क्षेत्र से दूर स्थित रहता है और जो सीमा रेखा के रूप में न रहकर एक क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में रहता है। यह प्राकृतिक रूप से निर्मित क्षेत्र होता है और राज्य की सीमाओं की परिधि में किसी भी प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन या युद्ध आदि को सबसे पहले सहन करता है। चूंकि सीमान्त दो राज्यों के मध्य संक्रमण क्षेत्र के रूप में है अतः दोनों राज्यों की राजनीतिक विचारधारा का प्रवाह इसी क्षेत्र से होकर जाता है।

सीमाएँ (Boundaries)

      शब्दकोश के अनुसार सीमा का अर्थ क्षेत्र विशेष को घेरकर परिसीमित करना अथवा आबद्ध करना है। राजनीतिक भूगोल में सीमा दो राज्यों के बीच वह रेखाएँ हैं जो एक राज्य की प्रभुसत्ता को पड़ोसी राज्य से पृथक करती हैं। ये मानचित्र पर एक रेखा के रूप में चिह्नित की जाती हैं। मानचित्र एवं धरातल पर रेखात्मक रूप में ये सीमाएँ दो संलग्न राज्यों के पृथक-पृथक अस्तित्व को स्पष्ट करती हैं। साथ ही आकाशीय सीमा और भौमिकीय तल को भी ये सीमा रेखाएँ दो राज्यों के मध्य अलग कर देती हैं।

     सीमा रेखाओं का अध्ययन राजनीतिज्ञों, तिथि विशेषज्ञों, सैन्य विशेषज्ञों, भूगोलवेत्ताओं और इतिहासवेत्ताओं द्वारा किया जाता रहा है। भूगोलवेत्ता सीमा रेखाओं का अध्ययन इसलिए करता है कि वे सांस्कृतिक दृश्यावली के तत्व हैं तथा राजनीतिक प्रभुसत्ता की सीमाएँ भी। भौगोलिक तथ्य सीमा की स्थिति तथा उसके प्रकार के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और एक बार सीमा निर्धारण के पश्चात् ये राज्य की भू-दृश्यावली पर भी प्रभाव डालते हैं।

एन्सेल (Ancel, J.) ने “सीमा को दो राज्यों के मध्य दबाव का परिणाम बताते हुए, इनके मध्य की साम्यावस्था रेखा को सीमा रेखा कहा है।” स्पष्ट है कि सीमा रेखा द्वारा पृथक किए गए राज्य अपनी स्वतंत्र विचारधारा एवं कार्यात्मक इकाई का विकास कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में दोनों राज्यों की प्रभुसत्ता का दबाव सीमाओं पर पड़ता है। इस दबाव के मध्य जहाँ सन्तुलन की स्थिति रहती है, वहीं से होकर सीमा रेखा खींची जाती है।

स्पाइकमेन ने भी “सीमा रेखाओं को उन रेखाओं की संज्ञा दी है जहाँ राज्य दबाव शक्तियाँ प्रायः तटस्थ या निष्क्रिय रहती हैं।”

प्रेसकॉट (Prescott) के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय व संघीय सीमा रेखाएँ सामान्यतः द्विपक्षीय या बहुपक्षीय समझौते द्वारा अंकित की जाती हैं।”

बोग्ज (Boggs) के अनुसार, “सीमा के दोनों ओर प्रत्येक राज्य, प्रशासन, व्यापार, सुरक्षा, आर्थिक विकास और अपने अन्य अधिकारों का प्रयोग करता है।” अर्थात् सीमा रेखा के दोनों ओर अलग-अलग स्वरूप वाली राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पद्धति विकसित होती है और सम्पूर्ण क्षेत्रीय इकाई में इन पद्धतियों का प्रसार होता है।

       सीमा में पृथक्कीकरण कार्य से सम्बन्धित बोग्ज के निम्नलिखित विचार विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, “सीमा की स्थिति लाखों लोगों के लिए इस बात को निर्धारित करेगी कि विद्यालय में बच्चों को कौन-सी भाषा तथा विचार दिए जाएंगे अथवा लोग कौन-सी पुस्तकें तथा समाचार-पत्र खरीद सकेंगे या पढ़ेंगे, वे किस मुद्रा का प्रयोग करेंगे, किन बाजारों में वस्तुओं को खरीदेंगे या बेचेंगे। साथ ही सीमा यह भी निश्चित करेगी कि लोग किस प्रकार की राष्ट्रीय संस्कृति से सम्बन्धित होंगे अथवा किस सेना के अन्तर्गत सेवा करने के लिए बाध्य होंगे तथा किस भूमि की रक्षा अपने जीवन का बलिदान देकर करेंगे चाहे वे इस बात के इच्छुक हो या नहीं।”

मूडी (Moodie) के अनुसार, “सीमा-रेखा उस क्षेत्र का निर्धारण करती है जिसके अन्तर्गत राज्य की आन्तरिक व्यवस्था विकसित होती है एवं इसी के सहारे विभिन्न राज्य प्रणालियाँ एक-दूसरे के सम्पर्क में आती हैं अतः यह भौगोलिक लक्षण नहीं होकर राजनीतिक है।”

पाउण्ड्स (Pounds) के अनुसार, “सीमाएँ राज्य की सार्वभौमिकता को पड़ोसी राज्य से पृथक करती है।”

     स्पष्ट है कि सीमा रेखाएँ वस्तुतः जहाँ एक ओर तो दो राज्यों के मध्य विभाजक की भूमिका निभाती हैं वहीं दूसरी ओर एक राज्य क्षेत्र की बाहरी सीमा को निर्धारित करती हैं।

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास

7. भू-राजनीति का अर्थ तथा इसका विकास



राजनीति का अर्थ     

   भू-राजनीति मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाख है। वर्तमान राजनीतिक भूगोल इसी का पूर्ण विकसित रूप है। इसके अन्तर्गत राज्य की अवस्थिति, संसाधन व समाज क उसकी राजनीतिक प्रक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया जाता है, जिससे राज्य की शक्ति व नीति निर्धारित होती है और उस पर राज्य की प्रगति व कल्याण निर्भर करता है।

     भू-राजनीति की अवधारणा रैटजेल की जैविक राज्य संकल्पना तथा जेलेन की ज्योपोलिटिक संकल्पनाओं पर आधारित है। प्रथम विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के पश्चात् जर्मनी के विद्वानों, विचारकों व सैन्य अधिकारियों द्वारा पराजय के कारणों का विश्लेषण किया गया। इस प्रक्रिया में विस्तारवादिता की नीति से जर्मनी की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने के प्रयास किए गए।

      भू-राजनीति शब्द जर्मन भाषा के Geopolitik से व्युत्पन्न अंग्रेजी के Geopolitics से लिया गया है।

परिभाषा (Definition)- भू-राजनीति को विद्वानों ने इस प्रकार परिभाषित किया है:-

रूडोल्फ जेलेन के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य के प्राकृतिक पर्यावरण से सम्बन्धित है। यह स्पष्ट करता है कि राज्य ऐतिहासिक एवं यथार्थ वास्तविकता में गहराई से प्रविष्ट है। यह जीव की भांति विकसित होता है और जीवधारी रचना का एक प्रमुख प्रकार है। जिस प्रकार एक मनुष्य होता है।”

हॉशोफर के अनुसार, “भू-राजनीति ‘क्षेत्र’ को राज्य के रूप में देखता है अर्थात् इसका समस्त अध्ययन ‘क्षेत्र’ पर ही केन्द्रित रहता है।”

ओटोमाल के अनुसार, “भू-राजनीति राज्य की क्षेत्रीय आवश्यकताओं से सम्बन्धित है, जबकि राजनीतिक भूगोल केवल राज्य की स्थानिक पारिस्थितियों का परीक्षण करता है।”

भूराजनीति का विकास-

       भूराजनीति के विकास में मुख्यतः जर्मन भूगोलवेत्ताओं का विशेष योगदान रहा है। इनके अनुसार राज्य एक भूराजनीतिक जीव है तथा इसे जीवित रखने के लिए क्षेत्र की आवश्यकता होती है। राज्य के विकास के अनुसार क्षेत्र विस्तार की आवश्यकता में वृद्धि होती जाती है। फ्रेडरिक रैटजेल इस विचार के जनक रहे हैं।

     स्वीडिश विद्वान जेलेन ने रैटजेल के विचारों को स्पष्ट भी किया है और इनकी पुष्टि भी की है। जेलेन के अनुसार राज्य रूपी जीव का शरीर क्षेत्र है, सीमाएं अंतस्थ अंग हैं, उत्पादन क्षेत्र भुजाएं हैं, परिवहन के साधन रक्त तन्त्र है तथा राजधानी उसका मस्तिष्क, हृदय तथा फेफड़ा हैं। भूराजनीति में इन विचारों को और अधिक विकसित करने में जर्मन भूराजनीतिज्ञ होशोफर का भी सक्रिय एवं व्यावहारिक योगदान रहा है।

रैटजेल का योगदन (1844-1904)-

      यदि काण्ट को राजनीतिक भूगोल का जनक कहा जा सकता है तो रैटजेल को इसके पोषक एवं पालनकर्ता के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। यद्यपि रेटजेल जर्मन विदेश नीति से सम्बन्धित समस्याओं से पृथक रहे और उन्होंने केवल राज्य-विकास सम्बन्धी सैद्धान्तिक विचार प्रस्तुत किए फिर भी इनके विचारों ने न केवल राजनीतिक भूगोल के अध्ययन में राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण को जन्म दिया अपितु अप्रत्यक्ष रूप में भू-राजनीतिक विचारों को भी जन्म दिया।

    रैटजेल के अनुसार राज्य के पोषण क्षेत्र को ही लैबेन्स् रॉम अर्थात् निर्वाह क्षेत्र कहा जाता है। जिसे प्राप्त करने के लिए राज्य को सदैव संघर्षरत रहना पड़ता है तथा अस्तित्व के लिए किया गया संघर्ष क्षेत्र संघर्ष में परिवर्तित हो जाता है। इतिहास में संघर्ष सदैव प्रभावकारी कारक रहा है। राज्य विकास के लिए क्षेत्र चेतना एवं राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से उपयोगी क्षेत्रों पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। उसने बताया कि राज्य क्षेत्र के प्रसारण तथा संकुचन के अनुसार सीमान्त परिवर्तित होते रहते हैं और ये राज्य प्रसार, शक्ति तथा परिवर्तन को प्रतिबिम्बित करते हैं।

      सीमान्त की चौड़ाई संलग्न राज्यों की प्रकृति पर निर्भर करती है अर्थात् यदि विकसित एवं कम विकसित राज्यों के मध्य सीमान्त की चौड़ाई सर्वाधिक होती है तो समान रूप से विकसित राज्यों के मध्य न्यनूतम । साथ ही सीमावर्ती समुदाय अपनी परिधीय स्थिति के कारण स्वतन्त्रता की अभिलाषा रखते हैं। रैटजेल के अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है जो मानवीय एवं धरातलीय अंशों से निर्मित है। राज्य का प्रारम्भिक क्षेत्र नाभि क्षेत्र कहलाता है तथा इसी क्षेत्र से राज्य का क्षेत्रीय प्रसार होता है।

जेलेन का योगदान-

      जेलेन ने रैटजेल के विचारों को और अधिक स्पष्ट किया तथा भूराजनीति शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया। जेलेन ने राज्य के अध्ययन हेतु भूराजनीति, जनसंख्या राजनीति, आर्थिक संसाधन राजनीति, समाज राजनीति और राज्य प्रशासन विषयों का विश्लेषण आवश्यक माना। रैटजेल की भांति इन्होंने राज्य को न केवल एक जैविक इकाई ही माना अपितु नैतिक तथा बौद्धिक गुण सम्पन्न चेतन सत्ता के रूप में देखा। रैटजेल के अनुरूप जेलेन की भी यह मान्यता थी कि राज्य विकास का अन्तिम उद्देश्य शक्ति संग्रहण है। इनकी यह भी मान्यता थी कि शक्ति संग्रहण केवल क्षेत्रीय प्रसार के सरल जैविक नियमों के अनुसार ही नहीं होता है अपितु इसके लिए आधुनिक प्रगति एवं तकनीकी विकास की भी आवश्यकता होती है।

    राज्य शक्ति के विकास हेतु बाह्य दृष्टिकोण से प्राकृतिक सीमान्त एवं आन्तरिक दृष्टिकोण से समन्वित एकता प्राप्त करना आवश्यक है। विश्व राजनीति के क्षेत्र में भविष्यवाणी करते हुए इन्होंने कहा था कि सामुद्रिक शक्ति पर आधारित साम्राज्यों की सत्ता के स्थान पर महाद्वीपीय शक्ति पर आधारित साम्राज्य अधिक शक्ति सम्पन्न हो जाएंगे जो कालान्तर में समुद्रों पर भी नियन्त्रण करेंगे। इनके साथ ही इन्होंने यह भी कहा कि अन्त में कुछ विशालकाय राज्यों का उद्भव एवं विकास होगा जिनमें यूरोप, अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के क्षेत्र में जर्मनी महान शक्ति के रूप में उभरेगा।

       ग्रेट ब्रिटेन के वयोवृद्ध अनुभवी तथा बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न भूगोलवेत्ता मेकिण्डर ने सार्वभौम स्तर पर राज्यशक्ति विकास की व्याख्या हेतु महाद्वीपीय शक्ति सम्बन्धी नवीन विचार प्रस्तुत किए। मेकिण्डर ने 1919 में अपनी हृदय स्थल सम्बन्धी अवधारणा को निम्न शब्दों में प्रस्तुत किया-

जो पूर्वी यूरोप पर शासन करता है, वही हृदय स्थल को नियंत्रित करेगा।

जो हृदय स्थल पर शासन करेगा, वही विश्व द्वीप को नियंत्रित करेगा।

जो विश्व द्वीप पर शासन करेगा, वही विश्व को नियंत्रित करेगा।

      मेकिण्डर के समकालीन जर्मन भूराजनीतिज्ञ कार्ल होशोफर मेकिण्डर के विचारों से न केवल प्रभावित हुए अपितु उन्होंने अपने भूराजनीतिक विचारों की पुष्टि हेतु इनके विचारों का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि मेकिण्डर ने अपने विचारों द्वारा जर्मन भूराजनीति को पर्याप्त मात्रा में प्रभावित किया।

       दो विश्वयुद्धों के मध्य के काल को भूराजनीति के विकास का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। इस काल में जेलेन द्वारा स्थापित भूराजनीति को कार्ल होशोफर और उनके अनुयायियों ने और भी अधिक सुदृढ़ बनाया। होशोफर के विचारों ने जर्मन विदेश नीति को प्रभावित करने के साथ हिटलर की युद्ध एवं प्रसार नीति को भी प्रभावित किया। भूराजनीति किसी एक विद्वान के विचारों की उपज नहीं है, अपितु अनेक विद्वानों के विचारों का फल है।

       रैटजेल, महान, मेकिण्डर जेलेन, आदि विद्वानों ने भूराजनीति सम्बन्धी विचार सैद्धान्तिक स्तर पर प्रस्तुत किए तो कार्ल होशोफर ने उन विचारों को शाब्दिक अभिव्यक्ति एवं व्यावहारिक सन्दर्भ प्रदान करने के साथ-साथ उनका प्रचार एवं प्रसार भी किया। फलस्वरूप जर्मन भूराजनीति के रूप में यह राजनीतिक भूगोल से अलग हटकर राज्य के क्षेत्रीय विस्तार के अधिकार को दर्शाने वाली संकल्पना के रूप में विकसित हुई।

कार्ल होशोफर का योगदान (1869-1946)-

      होशोफर जेलेन तथा मेकिण्डर के समकालीन थे। भूराजनीति के क्षेत्र में इनका चिन्तन यद्यपि जापान प्रवास काल से ही प्रारम्भ हो गया। था फिर भी म्यूनिख विश्वविद्यालय में जाने के पश्चात् ही इनका भूराजनीतिक अध्ययन परिपक्वता प्राप्त कर सका। यहाँ इन्होंने Institut fur Geopolitik नामक संस्था की स्थापना की एवं 1924 में ओटोमोल एवं एरिक ओबस्ट के साथ Zeitschrift fur Geopolitik नामक मासिक पत्रिका का सम्पादन प्रारम्भ किया। कार्ल होशोफर के भूराजनीति सम्बन्धी विचार निष्कर्ष रूप में निम्नांकित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किए जा सकते हैं-

⇒ उनके अनुसार राज्य एक जैविक सत्ता है। राज्य के लिए क्षेत्र अथवा रॉम प्रथम आवश्यकता है।

⇒ निर्वाह क्षेत्र (लैबेन्स् रॉम) का विचार होशोफर द्वारा विकसित भूराजनीति का केन्द्र बिन्दु माना जाता है।

⇒ राज्य शक्ति के उपार्जन हेतु क्षेत्र विस्तार अपरिहार्य है तथा जर्मनी के लिए क्षेत्र विस्तार पूर्व दिशा में स्लाव क्षेत्र में ही सम्भव है।

⇒  राज्य के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता (ओटोरकी) आवश्यक है जिसकी प्राप्ति क्षेत्रीय प्रसार द्वारा ही सम्भव है।

⇒ भूराजनीतिक दृष्टि से प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

⇒ जर्मनी के लिए ग्रेट ब्रिटेन की शक्ति का विनाश आवश्यक है। पूर्वी गोलार्द्ध में अमेरिकी हस्तक्षेप अवांछनीय है। जर्मनी के नेतृत्व में सोवियत संघ, भारत, चीन तथा जापान के मध्य मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध वांछनीय है तथा सोवियत संघ से जर्मनी का संघर्ष अनुचित है।

⇒ मेकिण्डर द्वारा वर्णित धुरी क्षेत्र के कारण भी जर्मनी का सोवियत संघ से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रखना आवश्यक है, क्योंकि वह क्षेत्र शक्ति आधार रूप में है।

⇒ जर्मन भूराजनीतिज्ञों ने हृदय स्थल में आर्थिक और सैन्य समझौतों के माध्यम से मैत्रीपूर्ण ढंग से प्रवेश करने और उसके क्षेत्रों को जर्मन प्रभुत्व में लाने पर बल दिया।

      होशोफर के अनुसार भूराजनीति एक गतिक विज्ञान है जो राज्य के असीमित प्रसार की इच्छा को व्यक्त करता है तथा विश्वव्यापी परिवर्तनशील अवस्थाओं का क्षेत्र अनुप्राणित दृष्टि से अध्ययन करता है। इसके विपरीत राजनीतिक भूगोल स्थितिक एवं विवरणात्मक अध्ययन मात्र ही है। उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट होता है कि होशोफर के भूराजनीतिक विचार जर्मन राष्ट्रहित को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत किए गए थे।

     यह उल्लेखनीय है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी की पराजय के साथ ही होशोफर और उनके साथियों द्वारा परिश्रम से निर्मित भूराजनीति का प्रासाद ध्वस्त हो गया एवं पर्याप्त समय तक भूगोलवेत्ता तथा राजनीतिशास्त्रियों द्वारा इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

    ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन अमेरिकी राजनीति शास्त्री स्पाइकमेन एवं ब्रिटिश भूगोलवेत्ता फेअरग्रीव ने मेकिण्डर के हृदय स्थल सिद्धान्त के सन्दर्भ में प्रस्तुत किया। जेम्स फेअरग्रीव ने अपनी पुस्तक The Geography of World Power के प्रथम संस्करण में अपने विचार प्रस्तुत किए एवं कुछ समय पश्चात् अपने विचारों में संशोधन करते हुए हृदय स्थल, सामुद्रिक शक्ति एवं इन दोनों के मध्य सन्तुलन मण्डल का उल्लेख किया।

निकोलस जे. स्पाइकमेन (1893-1943)-

       इन्होंने मेकिण्डर की हृदय स्थल अवधारणा का खण्डन अपने परिधीय स्थल-खण्ड (Rimland) सिद्धान्त के माध्यम से किया। स्पाइकमेन ने अपने सिद्धान्त की व्याख्या निम्नांकित शब्दों में अभिव्यक्त की-

जो परिधीय स्थल खण्ड पर नियंत्रण करता है,

वही यूरेशिया पर शासन करेगा,

जो यूरेशिया पर शासन करेगा, वही विश्व निर्यात को नियंत्रित करेगा।

   स्पाइकमेन राष्ट्र शक्ति एवं विदेशी नीति की दृष्टि से विश्व में राज्य की स्थिति का अध्ययन आवश्यक मानते हैं। इसी कारण से कहा जाता है कि स्पाइकमेन के विचार राष्ट्र शक्ति दृष्टिकोण पर आधारित होने के साथ-साथ भूराजनीतिक भी हैं, क्योंकि ये विचार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर प्रकट किए गए हैं।

      स्पाइकमेन की इस भूराजनीतिक अवधारणा का अभिप्राय यह था कि हृदय स्थल के आन्तरिक पेटी के समुद्रीय राष्ट्र अधिक महत्वपूर्ण हैं। इन पर नियंत्रण करने वाला राज्य ही अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर महान शक्तिशाली बन सकता है। स्पाइकमेन की यही अवधारणा आगे चलकर संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति का आधार बनी।

     स्पष्ट है कि जर्मन भूराजनीति का संकल्पनात्मक विकास रैटजेल की राज्य विकास की जैवीय अवधारणा, जेलेन की भूराजनीति और लैबेन्स् रॉम एवं खिसकते सीमान्त की विचारधाराओं तथा मैकिण्डर की हृदय स्थल के सिद्धान्त को आधार मानकर ही हुआ।

     द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् भूराजनीति की पुनर्स्थापना के अतिरिक्त ग्लोबीय सम्बन्धों का भूराजनीतिक अध्ययन ईस्ट, मीनिंग, डाल, डीसेवेरस्की, ईस्ट एवं मूडी, सूजन, आदि विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किया गया। इन विद्वानों द्वारा किया गया अध्ययन मुख्य रूप से मेकिण्डर तथा स्पाइकमेन द्वारा प्रतिपादित हृदय स्थल एवं परिधीय स्थल-खण्ड सिद्धान्तों के पुनरावलोकन के रूप में है। भूराजनीति के अध्ययन में शक्ति विश्लेषण उपागम का प्रयोग अधिक किया गया।

      इस उपागम के अनुसार राज्य के आन्तरिक एवं बाह्य सम्बन्ध शक्ति उपार्जन एवं संगठन से सम्बन्धित हैं तथा राज्य को शक्ति क्षेत्र की दृष्टि से देखा जाता है। राज्य संगठन ही राज्य शक्ति है एवं राज्य शक्ति ही संगठन है। इस उपागम के प्रतिपादकों ने राज्य के विकास की जैवीय प्रक्रिया का अनुकरण करते हुए सामाजिक डार्विनवाद को अपनाया और यह माना गया कि सबसे शक्तिशाली राज्य ही अपने अस्तित्व को बनाए रख सकता है। इसके लिए राज्य के विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय तत्वों का शक्ति के निर्धारक रूप में वर्णन किया जाने लगा। इस उपागम के परिणामस्वरूप जर्मन भू-राजनीति और ब्रिटिश तथा अमेरिकी विद्वानों ने अपने-अपने देश के सन्दर्भ में भूराजनीतिक दृष्टिकोणों की परिकल्पना की।

प्रश्न प्रारूप

1. भू-राजनीति का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके विकास को समझाइए।



6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

6. प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारक

प्रवास अथवा प्रव्रजन

     प्रवास को प्रभावित करने वाले अनेक कारक हैं। इनमें समय, स्थान व परिस्थितियों के अनुसार कभी कोई तत्व प्रभावशाली रहता है, तो कभी कोई दूसरा। वास्तव में प्रवास को प्रभावित करने में आकर्षण व प्रत्याकर्षण का महत्व होता है। एक स्थान से लोग दूसरे स्थान को तभी प्रवास करते हैं, जब उनके अपने स्थान में कोई आकर्षण नहीं होता है। इस प्रकार प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों को मुख्य रूप से निम्नलिखित दो श्रेणियों में रखा जा सकता है-

(1) आकर्षक कारक (Pull factors)

(2) प्रत्याकर्षण कारक (Push factors)

(1) आकर्षक कारक

       लोगों का कम विकसित क्षेत्रों, ग्रामों, आदि से ऐसे क्षेत्रों में जाना, जहाँ उनको उन्नति के अधिक अवसर मिलते हैं। ऐसे अवसरों को आकर्षक कारक के रूप में रखा जाता है। यह अवसर निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

(i) आर्थिक प्रगति के अधिक अवसर,

(ii) रोजगार के अवसर,

(iii) उच्च शिक्षा प्राप्ति का अवसर,

(iv) वैज्ञानिक व सांस्कृतिक परम्पराओं के अवसर,

(v) सुरक्षा व न्याय के अवसर,

(vi) जीवन स्तर सुधारने के अवसर,

(vii) राजनीतिक स्थायित्व होना,

(viii) स्वास्थ्यप्रद वातावरण में रहने के अवसर।

       प्रवास को आकर्षित करने वाले कारकों में प्रवाहित क्षेत्र की विकसित होती हुई अर्थव्यवस्था, अनुकूल आवास कानून, कृषि भूमि की उपलब्धता, आदि महत्वपूर्ण हैं। जापान में श्रमिकों की कमी ने बड़ी संख्या में प्रवासियों को अपने यहाँ आवासित होने के लिए आकर्षित किया है। इन आवासियों में अधिकांश लोग कम वेतन पर ऐसे खतरे वाले काम करते हैं जिन कामों को जापान के मूल निवासी नहीं करते हैं।

(2) प्रत्याकर्षण कारक

    जब लोग अपने निवास स्थान में रहना नहीं चाहते। वहाँ उन्हें अपना जीवन निराशाजनक लगता है। ऐसा निम्नलिखित परिस्थितियों में सम्भव होता है।
(i) रोजगार सुविधाओं का अभाव,

(ii) स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव,

(iii) गरीबी, निम्न जीवन स्तर का होना,

(iv) सुरक्षा व न्याय की कम सुविधाएं,

(v) राजनीतिक अलगाववाद का प्रभाव और गृह भूमि पर युद्ध की आशंका,

(vi) उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा सुविधा का अभाव,

(vii) परम्परावादी व रूढ़िवादी संस्कृति का प्रभाव,

(vii) रोजगार की कठिन परिस्थितियों का होना,

(viii) प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव (सूखा एवं अकाल)।

     1929-1939 की अवधि में संयुक्त राज्य अमेरिका में आया महान मंदी का दौर (Great Depression) प्रत्याकर्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है। इस दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका में आवासन की अपेक्षा प्रवसन अधिक हुआ। इसी प्रकार 1980-90 के दशक में अकाल एवं युद्ध के कारण हजारों अफ्रीकन लोग अपने मूल स्थान से प्रवासित होकर पड़ोसी देशों में आवासित होने को मजबूर हुए।

     सामान्य तौर पर प्रवास को प्रभावित करने वाले कारकों में निम्नलिखित महत्व होते है:-

1. प्राकृतिक कारक (Natural Factors)-

       प्राकृतिक आपदाएँ जैसे भूकम्प, ज्वालामुखी, बाड़, सूखा, तूफान, भूस्खलन, जलवायु की कठोरता, आदि के कारण लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास कर जाते हैं। विश्व के विभिन्न भागों में मौसमीय प्रवास (Transhumance) मानवीय समूहों द्वारा जलवायु की कठोरता के दुष्प्रभाव से बचने तथा रोजगार जुटाने के उद्देश्य से किया जाता है। समुद्रतटीय भागों में तूफान से प्रभावित क्षेत्रों तथा नदियों के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से लोग सुरक्षित स्थलों पर प्रवास कर जाते हैं। वास्तव में वह क्षेत्र जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा की आशंका से ग्रस्त होते हैं, लोग सुरक्षित क्षेत्रों पर प्रवास कर जाते हैं।

2. आर्थिक कारक (Economic Factors)-

      विश्व के अधिकांश प्रवासों को प्रभावित करने में आर्थिक कारकों का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा है। नए-नए क्षेत्रों में कृषि का विस्तार, नई-नई खानों का पता लगना, उद्योग धन्धों का विस्तार होना, यातायात सुविधाओं में सुधार होना, आदि विशेषताएं रोजगार के नए-नए अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। इसी कारण लोग रोजगार के नए क्षेत्रों में आकर बस जाते हैं। पिछली तीन शताब्दियों में यूरोपीय लोगों का विश्व के विभिन्न भागों में रोजगार की तलाश में वहाँ जाकर बसना, वर्तमान में अनेक भारतीयों का अमेरीका तथा विश्व के अन्य भागों में रोजगार के कारण बस जाना, बिहार के श्रमिकों का पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश में मजदूरी कार्यों के लिए प्रवास करना, आर्थिक कारकों का ही परिणाम है।

3. सामाजिक व सांस्कृतिक कारक (Social and Cultural Factors)-

      सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक व सामाजिक स्वतंत्रता, सामाजिक व सांस्कृतिक सम्पर्क, धर्म प्रचार, आदि ऐसे सामाजिक कारक हैं, जिनके कारण लोग अपना जन्म स्थान छोड़ने को बाध्य हो जाते हैं। धार्मिक श्रद्धा लोगों को धर्म स्थल पर बसने के लिए प्रेरित करती है। धार्मिक आयोजन मेले व विशेष पर्व पर लोग प्रवास करते हैं।

       लाखों हज यात्री प्रतिवर्ष मक्का व मदीना धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। उच्च व तकनीकी शिक्षा की प्राप्ति, उच्च चिकित्सा हेतु भी लोग प्रवास करते हैं। खेलों का आयोजन, जैसे क्रिकेट, हॉकी टूर्नामेन्ट, कुम्भ मेला, विशेष तिथि पर लगने वाले बड़े-बड़े मेले, नौचन्दी मेला, वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए प्रतिवर्ष लाखों भक्तजनों का जाना, आदि ऐसे कारक हैं, जो किसी न किसी रूप में अस्थायी प्रवास के साथ-साथ स्थायी प्रवास को बढ़ावा देते हैं।

4. राजनीतिक कारक (Political Factors)-

      इतिहास इस बात का गवाह है कि राजनीतिक कारकों ने प्रवास को सबसे अधिक प्रभावित किया है तथा प्रवास की आवश्यक मजबूरी बनाया है। भारत-पाक विभाजन, दो देशों के बीच युद्ध की स्थिति, पड़ोसी देश से राजनीतिक सम्बन्धों में बिगाड़ के कारण सीमा क्षेत्र पर युद्ध स्थिति बने रहना, आदि तत्व जनसंख्या प्रवास को प्रभावित कर रहे हैं।

       वर्तमान में लंका में जातीय संघर्ष के कारण श्रीलंकाई तमिल भारत के तमिलनाडु तट में आकर बस रहे हैं। तिब्बत से बौद्ध लोगों का भारत आकर बसना भी राजनीतिक प्रवास का उदाहरण है। 18वीं व 19वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमेरीका व ब्रिटेन के लोगों ने दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड, आदि देशों के मूल निवासियों को बलपूर्वक वहाँ से खदेड़ दिया तथा वहाँ पर नए राष्ट्रों की स्थापना की।

     कई बार सरकारी नीतियाँ भी प्रवास को आकर्षित करती हैं। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व के देशों ने आवास को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया में आवासीय लोगों को मुफ्त में कृषि योग्य भूमि प्रदान की गई है। 1990 में जापान ने लेटिन अमेरिका से आए लोगों को रोजगार के अधिकार एवं आवासीय सुविधाएं प्रदान की।

5. जनांकिकी कारक (Demographic Factors)-

      इसके अन्तर्गत कृषि भूमि पर बढ़ता हुआ जनसंख्या का दबाव, कृषि क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बेरोजगारी की समस्या, नगर के भीतरी भाग से नगर के बाहरी छोरों पर लोगों का बसना, उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों से कम घनत्व वाले क्षेत्रों की ओर लोगों का जाकर बसना, आदि तत्व शामिल हैं। इनके अलावा साक्षरता की दर, विशेष जाति या धर्म के लोगों को कहीं अधिक प्रोत्साहन मिलना, असन्तुलित लिंग अनुपात, आदि बातें भी प्रवास को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से प्रभावित करती हैं। आस्ट्रेलिया व दक्षिण अफ्रीका की रंग भेदी नीतियों ने काले लोगों के प्रवास पर रोक लगा दी थी।

       वर्तमान में रूस व यूक्रेन के बीच युद्ध, इजराइल व फिलीस्तीन के बीच मतभेद, आदि जनांकिकी प्रवास को किसी न किसी रूप में प्रभावित कर रहे हैं। एक राज्य का दूसरे राज्य के लोगों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार भी जनसंख्या प्रवास को प्रभावित करता है।

प्रश्न प्रारूप

1.  प्रवास अथवा प्रव्रजन को प्रभावित करने वाले कारकों की विवेचना कीजिये।



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