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5. The Concept of Sustainable Development (शाश्वत विकास की अवधारणा) 

5. The Concept of Sustainable Development

(शाश्वत विकास की अवधारणा)



        Sustainable Development

          विश्व में प्रादेशिक विकास की अवधारणा को समय-समय पर राजनीतिक विचारकों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। वर्तमान समय में प्रादेशिक विकास का जो स्वरूप उभड़ा है, वह विश्वव्यापी राजनीति से ओतप्रोत है। औपनिवेशिक राष्ट्रों का शोषण, अविकसित देशों के संसाधनों का दोहन, विनिर्माण प्रक्रिया एवं सम्पत्ति का शक्तिशाली राष्ट्रों में समूह प्रादेशिक विकास की आड़ में तथा विकास मॉडलों के अविवेकपूर्ण अध्यारोपण से प्रादेशिक विकास के परिणाम प्रभावित हुए हैं। पाकिस्तान आज भी आर्थिक विकास हेतु पराश्रित है । बंगलादेश भी स्वतंत्र होकर उसी दुश्चक्र का अंग बन गया है।

        नेपाल भारत की विरासत एक होते हुए भी नेपाल को अपने प्रच्छन्न व्यक्तित्व के प्रति आगाह करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के प्रादेशिक विकास को बाधित करने से 20वीं शताब्दी के अंत में सर्वत्र प्रादेशिक विकास एक खोखला नारा बनकर रह गया है। यही हाल ब्राजील, अर्जेण्टाइना, कैरेबियन राष्ट्र तथा अफ्रीकी देशों का है।

         विकास का अंतिम उत्पाद विनाश के रूप में प्रकट हो रहा है। इससे संसाधन विदोहन है। जन संसाधन का दुरुपयोग हुआ है। पर्यावरण की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है तथा हुआ विकास के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शाश्वत विकास या अक्षुण्ण विकास की प्रक्रिया का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है।

       शाश्वत विकास की संकल्पना भौगोलिक संकल्पना है, जिसमें मानवीय और पारिस्थितिकीय तत्त्वों के अन्तर्क्रियात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार व्यवस्थित एवं नियोजित करने पर बल दिया जाता है, जिससे आर्थिक विकास प्रतिरूप वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आगामी पीढ़ियों की आवयकताओं को पूर्ण कर सके।

       पहले यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विकास या भौगोलिक सन्दर्भ में प्रादेशिक विकास मानव और उसकी विभिन्न विशेषताओं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के तथ्यों के पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों का परिणाम है। विकास की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्रों में मानवीय क्षमता के अत्यधिक निवेश से पर्यावरण के तथ्यों का अधिकाधिक शोषण हुआ। मनुष्य ने वहाँ कम समय में चरण विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। वहाँ पुनः विकास के लिए संसाधनों की कमी सामने आने लगी है। दूसरी ओर विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों के अत्यधिक ह्रास से पारिस्थितिकीय संतुलन भी बिगड़ने लगा, जिससे मनुष्य के लिये खतरा उत्पन्न हो गया। इसी तरह दूसरे बहुत से क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक शोषण से भी पारिस्थितिकीय सन्तुलन प्रभावित होने लगा।

        इस विषम परिस्थिति से निजात पाने के लिये ही वर्तमान समय में शाश्वत विकास की संकल्पना का जन्म हुआ है। यह एक विश्वव्यापी नारे के रूप में प्रचलित होती जा रही है जिसमें पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना और जैवीय विविधता की सुरक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है। सातवें दशक के अंत में और 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस संकल्पना को व्यापक आधार मिला है।

        पारिस्थितिकीय शाश्वत विकास (Ecologically Sustainable Development) का सामान्य हिन्दी अनुवाद पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उपयुक्त दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला विकास है। अर्थात् इसमें विकास निर्वाह योग्य माना गया है, जो वर्तमान पीढ़ियों की आववश्यकता को पूर्ण करते हुए भविष्य के लिये भी बना रहे। इसके अन्तर्गत सम्मिलित पारिस्थितिकी है, जो जैव समुदाय और उनके पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन है। यह ग्रीक शब्द ‘Oikos’ से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘Living Place’ होता है।

        अर्थात् विभिन्न जैव समुदाय और पर्यावरण के बीच कैसा सन्तुलन विकसित हो, जिससे दोनों का अस्तित्व अनवरत रूप से बना रहे। यह संकल्पना भूगोल विज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में परम्परागत रूप से रही है, क्योंकि पहले से ही भूगोल मानव और प्रकृति के परिवर्तनशील अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता रहा है। इसलिये विकास हेतु विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों का मानव द्वारा इस प्रकार उपयोग किया जाय कि पारिस्थितिकीय सन्तुलन भी बना रहे और मानव अपना विकास भी करता रहे।

       दूसरा शब्द ‘शाश्वतता’ (Sustainability) है, जिसका अर्थ अनवरत रूप से दीर्घकाल तक बना रहना है अर्थात् ऐसा आर्थिक विकास जो दीर्घकाल तक जारी रहे इसे अक्षय विकास भी कह सकते हैं या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह सामाजिक-आर्थिक प्रत्यावर्तन की ऐसी प्रक्रिया है, जिसके परिणाम समान रूप से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिये उपलब्ध होते रहें, अर्थात् यह उत्पादन के कारकों और उपभोग के तत्त्वों के बीच संतुलन के स्तर की ओर इंगित करती है।

          सन्तुलन का स्तर इस प्रकार का होना चाहिये कि जिसमें विकास प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सभी चर एक साथ बिना एक-दूसरे से आगे निकले हुए एक-दूसरे के पूरक के रूप में योगदान देते रहें, जब तक क्रमिक रूप में ये चर एक-दूसरे के साथ विकासात्मक रूप से योगदान देते रहेंगे तब तक किसी भी चर का कोई ऋणात्मक प्रभाव नहीं दिखाई देगा।

       इसके विपरीत विभिन्न चरों की पारस्परिक विकासात्मक प्रवृत्ति में यदि कोई एक चर आगे निकल जायेगा अथवा अत्यधिक ह्रास होगा तो सम्पूर्ण सन्तुलन सम बिगड़ जायेगा, जिसका परिणाम भौतिक पर्यावरण पर दृष्टिगोचर होगा। इससे विकास प्रतिरूप भी दीर्घकाल तक नहीं बना रह पायेगा। अर्थात् ‘शाश्वतता’ के अन्तर्गत दो संकल्पनाएँ अन्तर्निहित हैं-

1. मूलभूत आवश्यकता की संकल्पना:-

           इसके अन्तर्गत माना जाता है कि मनुष्य की न्यूनतम मौलिक आवश्यकता को पूर्ण करना ही विकास हैं। वर्तमान समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए भावी पीढ़ियों के लिये भी संसाधनों को सुरक्षित छोड़ देना ही शाश्वत विकास है।

         यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विभिन्न क्षेत्रों के मानव समाज में कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ समान रूप से हैं, यथा- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सुविधा आदि लेकिन कई समाजों के उपभोग की परिवर्तनशील प्रवृत्ति और उसको पूरा करने के लिये संसाधनों का अंधाधुंध शोषण जारी रहने पर संसाधनों में ह्रास होगा और उनके दीर्घकालीन तक चलते रहने की संभावना भी समाप्त होगी। इसलिये उपभोग के तत्त्वों के प्रयोग पर नियंत्रण अथवा उनका परिमार्जन इस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि विकास को प्रभावित करने वाला चर समाप्त न हो या उसका कोई दुष्प्रभाव न पड़े।

          पश्चिमी देशों की उपभोक्ता संस्कृति इसका उदाहरण है। जहाँ उपभोग हेतु कई जैव प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है। इससे विश्व में जैव सन्तुलन को खतरा उत्पन्न हो गया है। या यों कह सकते हैं कि विकसित औद्योगिक देशों द्वारा ही उत्सर्जित अपशिष्टों से ओजोन परत को हानि हो रही है। इसलिये शाश्वत के अन्तर्गत मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उपभोग स्तर को भी नियोजित करना सम्मिलित है। 

2. प्राविधिक स्तर:-

       इसके अन्तर्गत विभिन्न उत्पादनों हेतु प्रयुक्त तकनीकी स्तर हैं। बहुत से देशों में तकनीकी स्तर अत्यन्त उच्च स्तरीय हैं, जिससे वे कम लागत पर विभिन्न साधनों का शोषण करके अपने उपभोग स्तर में वृद्धि करते हैं और इतना ही नहीं वे इसका विपणन भी करते हैं, जबकि अन्य देश अपनी देशी व परम्परागत तकनीक के प्रयोग से धीरे-धीरे यही कार्य करते हैं। भौगोलिक रूप में उत्पादन कार्यों के लिये इस प्रकार की तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए, जिससे विकास के अन्य चरों को हानि न पहुँचे।

        तीसरे शब्द का अर्थ है, जैसा पहले विश्लेषित किया जा चुका है कि विकास एक समन्वित प्रक्रिया है, जिससे मानव जीवन के अस्तित्व का एक निश्चित स्तर प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् इसमें मानव और प्रकृति के मध्य उत्पादक, व्यवधान रहित और शोषण मुक्त चरों का समन्वित प्रतिरूप सम्मिलित है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि शाश्वत विकास के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न चरों का संरक्षण, अभिरक्षण, सुरक्षा एवं अक्षुण्ण रूप से निर्वहन सम्मिलित है।

         इस तरह अक्षुण्ण अर्थात् शाश्वत विकास अर्थव्यव्सथा के विभिन्न प्रतिरूपों (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) में समन्वय पर बल देते हुए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र से बाँधे रखने पर बल देता है। इस तंत्र को संरक्षित एवं पोषित करने की आवश्यकता है, ताकि विकास प्रक्रिया शाश्वत रूप से जारी रहे। भूगोल में शाश्वत विकास की संकल्पना वर्तमान समय में दो कारणों से आयी है-

1. मानव और पर्यारण तंत्र के असंगत सम्बन्ध ने पारिस्थितिकीय सन्तुलन को झकझोर दिया है। वर्तमान मानव समाज के सम्मुख भोजन, जल, शुद्ध वायु और समुचित जगह आदि अनेक समस्याएँ स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र शोषण से अस्तित्व में आयी हैं। वनों और मिट्टियों का उत्पादक कार्यों में इतनी तीव्र गति से प्रयोग से हो रहा है, जिससे वे तेजी से घटते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि मनुष्य के लिये वे अनुपयोगी होते जा रहे हैं। क्योंकि प्रकृति द्वारा वे शीघ्रता से निर्मित नहीं किये जा सकते हैं। पशुचारण और अत्यधिक शस्योत्पादन से अर्थव्यवस्था का स्रोत नष्ट होता जा रहा है। ऊर्जा साधनों का औद्योगीकरण के कारण तेजी से ह्रास हो रहा है।

        आर्थिक विकास के लिये आवश्यक ये तत्त्व प्रकृति द्वारा लाखों करोड़ों वर्षों में निर्मित किये गये हैं। इनको शीघ्रता से पुनर्नवीकृत नहीं किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा से निःसृत रेडियोधर्मिता से जल व वायु प्रदूषित होकर मानव के लिये हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। अनियंत्रित कृषि और तीव्र औद्योगीकरण से धरातल, जल और वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं। महासागर जो भावी जनसंख्या के लिये भोजन के स्रोत हैं। एक तरह से कूड़े कचरे के गड्ढे में परिवर्तित हो रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के उपयोग की कोई सीमा नहीं है।

         यह अनुमान किया जा सकता है कि सन् 2050 तक विश्व की 75 प्रतिशत आबादी नगरों में निश्वस करने लगेगी। इससे वर्तमान न समस्याएँ घनीभूत होंगी तथा मलिन बस्तियों का फैलाव होगा। ये सभी तथ्य मानव पर्यावरण के असंगत सम्बन्ध के परिणाम हैं। वर्तमान विकास की संकल्पना इसलिए प्राकृतिक और मानवीय चरों के पारस्परिक विकासात्मक अन्तर्सम्बन्ध को नियोजित करने को प्रेरित करती है।

2. दूसरे कारण में विकास का मात्र उद्देश्य धन का एकत्रीकरण है क्योंकि धन या पूँजी ही मानव के तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है लेकिन वास्तव में विकास के स्थायित्व के लिये अत्यधिक धन या पूँजी प्राप्त करना ही ध्येय नहीं होना चाहिये, क्योंकि जॉन पुश्किन के अनुसार छलपूँजी (illth) जो धनसंचय का परिणाम है- एक ऋणात्मक धन है। यह एक ऐसी पूँजी है जो मानव के लिये पृथ्वी की उपयोगिता समाप्त कर देती है इसलिये प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि अथवा येनकेन राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही विकास का लक्ष्य नहीं होना चाहिये।

         इसलिए अधिक धन संचय, अधिक उत्पादन और अधिक उप का दुष्चक्र भौतिक विकास का आधार है। इस विकास की कोई अन्तिम सीमा नहीं इसकी न्यूनतम सीमा तो मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने तक मानी जा सकती लेकिन ऊपरी सीमा अदृश्य है। इसी अदृश्य सीमा को प्राप्त करने के लिये पश्चिमी समाज संसाधनों का अंधाधुंध शोषण करके पर्यावरण सन्तुलन को विकृत कर रहा है। इसके प्रतिकार के लिए ही शाश्वत विकास की संकल्पना का अस्तित्व संभव हुआ है।

प्रश्न प्रारूप 

1. शाश्वत विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

5.The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation (जल संसाधन के महत्त्व, वितरण, उपयोगिता एवं संरक्षण)

5. The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation

(जल संसाधन के महत्त्व, स्रोत, उपयोगिता एवं संरक्षण)



Importance of Water

जल संसाधन के महत्त्व

          प्राकृतिक संसाधनों में जल एक ऐसा आधारभूत संसाधन है, जिसके बिना पृथ्वी तल पर जीवन की कल्पना ही असंभव है। मनुष्य, पेड़-पौधे और जीव-जन्तु सभी के लिए जल जीवन का आधार है। पृथ्वी तल पर जल की उपस्थिति के बाद ही जीवन की कल्पना की गई है। जल की उपलब्धता और उसके उपयोग की सुविधा मानव के सांस्कृतिक विकास में सहायक तत्व रहे हैं।

       जल की अधिकता या न्यूनता की तुलना में उसकी सामान्यता और सहज उपलब्धता अधिक आकर्षक रहे हैं। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में जहाँ सहजता के साथ जल उपलब्ध था और प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, आदि मानव बसने हेतु आकर्षित हुआ, जिससे कुछ घाटियाँ सांस्कृतिक क्रोड़ बन गई। यहाँ सिंचाई, पेय, आखेट और परिवहन के लिए जल संसाधन का प्रथम उपयोग हुआ।

      स्पष्ट है कि जल संसाधन के कारण कृषि, व्यापार और बड़े अधिवासों का विकास सबसे पहले नदी घाटियों में प्रारंभ हुआ। जल संसाधन की सुलभता के कारण समुद्र तटीय क्षेत्र भी आकर्षक रहे। नौका परिवहन का विकास वृहद् व्यापारिक शृंखला का कारण बना। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक जल परिवहन सबसे सस्ता साधन है। समुद्री मार्गों की सुलभता अनेक यूरोपीय देशों की महानता का कारण बताया जाता है।

     नीदरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे छोटे देशों के नाविक जल यातायात के माध्यम से विश्व के बड़े और शक्तिशाली देशों पर कब्जा जमाने में सफल हो गये, जबकि स्थल मार्ग से चलने के कारण सिकन्दर अपनी विशाल सेना के बावजूद ऐसी विजय पाने में असफल रहा। आज जल यातायात की सुविधा वाले देश विश्व व्यापार में अग्रणी बन गये हैं, क्योंकि जिस मात्रा में आज का जलयान माल की ढुलाई करता है वैसा किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।

            जल संसाधन का उपयोग मत्स्य उत्पादन के दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए करके मानव समुदाय ने क्रान्तिकारी कृषि और औद्योगिक विकास किया है। इन सभी लाभों की गिनती में जलीय वनस्पतियों द्वारा अपार ऑक्सीजन गैस का उत्पादन शायद सबसे महत्वपूर्ण है। पारिस्थितिकी के निर्माण में जल की भूमिका का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य एशिया में जलाभाव के कारण अदिमानव को बाध्य होकर प्रव्रजित होना पड़ा जो मानव प्रजातियों के उद्भव का कारण बना। आज भी जलाभाव के कारण पृथ्वी का आधे से अधिक भाग मानव के लिए अनाकर्षक है।

        आधुनिक मानव समाज अपने अनेक क्रियाकलापों के लिए जल संसाधन का उपयोग पहले से कहीं अधिक करने लगा है और कुछ देशों में तो जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, और कुछ क्षेत्रों में जल दोहन को लेकर तनाव पैदा हो गया है।

           आधुनिक समाज में तकनीकी विकास के कारण जल संसाधन का प्रचुर उपयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, जल यातायात आदि के लिए किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा जल की कमी है, वहाँ धरातलीय और भूमिगत जल के उपयोग से कृषि का अभूतपूर्व विकास किया गया है। पंजाब एवं हरियाणा अपने सिंचित क्षेत्रों के कारण सबसे सम्पन्न राज्य बन गये हैं, जबकि पड़ोसी राजस्थान जलाभाव के कारण अब भी विपन्न बना हुआ है।

       इसी प्रकार दक्षिणी साइबेरिया में सिंचित क्षमता के विकास के कारण उस क्षेत्र का काया पलट हो गया है। अनेक नगरीय और औद्योगिक केन्द्र जल संसाधन की कमी के कारण समस्याग्रस्त हो गये हैं। स्पष्ट है कि जल संसाधन का समुचित उपयोग मानव समाज की प्रगति का महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि जल संसाधन मानव जीवन के लिए एक आधारभूत संसाधन है। जहाँ इसकी कमी है वहाँ मानव जीवन संकटमय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पेय जल के संकट को हल करने के लिए समुद्र के खारे जल को साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है।

जल संसाधन के स्रोत एवं उपयोग (The Sources and Uses of  Water Resources)

       एक आंकलन के अनुसार पृथ्वी के समस्त जल भण्डार का 97.2 प्रतिशत समुद्रों, 2.15 प्रतिशत हिम सरिताओं, 0.62 प्रतिशत भूमिगत भण्डारों, 0.02 प्रतिशत धरातलीय स्रोतों और अवशेष नमी और आर्द्रता के रूप में पाया जाता है। प्राकृतिक संसाधन के रूप में धरातलीय जल भण्डार, भूमिगत जल भंडार और सागरीय जल का अधिक महत्व है। आर्थिक और मानवीय महत्त्व के दृष्टिकोण से धरातलीय और भूमिगत जल सर्वोपरि है।

         धरातलीय जल और भूमिगत जल वर्षा पर आधारित होता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है वहाँ इसका कुप्रभाव देखा जाता है जिसके कारण जल प्रबंधन की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निरर्थक प्रवाहित होता है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्रों में है लेकिन उसका जल खारा होने के कारण मानव के कुछ ही कामों के लिए प्रयुक्त हो पाता है। फिर भी इस भंडार से बनने वाली वाष्प और बादल धरातलीय जल को जन्म देते हैं, जो वर्षा तथा हिमपात के रूप में उसकी प्राप्ति होती है।

        पृथ्वी का लगभग दो तिहाई क्षेत्र समुद्री जल से घिरा है जबकि विश्व के विशाल मरूस्थल जल के अभाव में प्रायः मानव विहीन है। सउदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, जैसे देश हिमशिलाओं को पिघला कर पेय जल प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार जल संसाधन का क्षेत्रीय स्वरूप बिल्कुल असमान है। विषुवत रेखीय क्षेत्रों में जल की प्रचुरता है तो मरुस्थलीय प्रदेशों में जलाभाव है। वर्षा जल का ठहराव भी जल संसाधन की उपलब्धता का एक प्रमुख पक्ष है। तीव्र ढाल वाले धरातल पर वर्षा होते ही जल बहकर अन्यत्र चला जाता है।

           वर्षा जल का ह्यास, वाष्पीकरण और जल के भूमिगत होने के कारण जल संसाधन की क्षेत्रीय विभिन्नता स्वाभाविक है। विश्व के लगभग एक चौथाई क्षेत्रफल पर न्यूनतम वर्षा होती है जिसका वार्षिक औसत 20 से.मी. से कम है, जैसे- उष्ण मरुस्थलों में पृथ्वी के धरातल के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर 25-50 से.मी. वर्षा होती है जिसे अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश कहते है।

      इस प्रकार पृथ्वी के धरातल के आधे से अधिक क्षेत्रफल पर औसत वर्षा होती है (50- 150से.मी.) जबकि शेष 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अधिक वर्षा प्राप्त करता है। उपरोक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि पृथ्वी का अधिकांश धरातल वर्षा की कमी अथवा अधिकता के कारण जल संसाधन के दृष्टिकोण से असंतुलित है।

          जल संसाधन का उपयोग जल संसाधन का उपयोग मानव समाज विविध कार्यों क लिए करता है। धरातलीय जल नदियों, झीलों और तालाबों में संचित होता है जो प्रधानत: सिंचाई जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, परिवहन, उद्योग, पेय और मनोरंजन के लिए, उपयोग किया जाता हैं। मानव के सांस्कृतिक विकास को धरातलीय जल ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। आज भी इसकी महत्ता बनी हुई है।

         भूमिगत जल का उपयोग मुख्यत: पेय, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है। सागरीय जल का उपयोग प्रधानतः परिवहन, मत्स्य पालन और नमक प्राप्ति के लिये किया जाता है। नये खोजों से समुद्री जल के विविध उपयोग बढ़ने की संभावना है।

         वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र से भविष्य में मैगनीज, कोबाल्ट, ताँबा, ब्रोमाइड, मैगनीशियम, आयोडीन आदि की प्राप्ति की जा सकती है। इसमें सन्देह नहीं कि नयी तकनीकों के विकास के बल पर मानव सामुद्रिक जल का और अधिक उपयोग कर सकता है।

जल संसाधन के संरक्षण (The Conservation of  Water Resources)

जल अत्याधिक उपयोगी संसाधन है। इसके विविध उपयोग हैं, परन्तु यह सर्वत्र सुलभ या प्रचुर नहीं है। फलतः जल संसाधन संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस तरह इसके विभिन्न उपयोग हैं उसी तरह इसका संरक्षण भी विविध रूपों में किया जाना चाहिए।

(i) धरातलीय जल मानव जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो वर्षा द्वारा प्राप्त होता है। अतः वर्षा जल को उचित रूप में संग्रह करना और इस जल का अधिकतम उपयोग संरक्षण का मूल मंत्र है। उपयोग में आने वाला जल सदैव समुद्र की ओर जाने को उन्मुख रहता है, अतएव जल के अपवाह को नियमित करना, उसको संचय करना, सतह का निश्चित भंडार बनाना, नदियों पर बाँध बनाकर प्रवाह को नियमित करना, बाढ़ रोकना आदि कार्यों से इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(ii) जल का सदुपयोग भी जल संरक्षण का प्रमुख पक्ष है। अतः घरेलू औद्योगिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जल का सदुपयोग करके, दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

(iii) भूमिगत जल जो कि प्रधानतः संरक्षित जल है, का अत्यधिक शोषण भूमिगत जल के स्तर को नीचा कर देता है। भूमिगत जल की मात्रा क्षेत्र विशेष में सीमित होती है, इसलिये अत्यधिक दोहन से यह भी समाप्त हो सकता है।

         अतः कुओं तथा नलरूपों में जितनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी आपूर्ति भी होती रहनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल के अत्यधिक शोषण को रोकने की व्यवस्था की जाये तथा जमीन के अंदर अत्यधिक जल प्रवेश हेतु वन तथा मिट्टी से संबंधित तत्त्वों की सुरक्षा की जाये। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जलाशयों के निर्माण की नव तकनीक का विकास करके प्रेरित अन्तः स्रवण द्वारा भूमि जल संचय को बढ़ाया जा सकता है।

(iv) जल को शुद्ध रखना भी जल संरक्षण की प्राथमिक आवश्यकता है। दीर्घकाल से सीवर, उद्योगों, गैस प्लांटों, शोधन शालाओं तथा खानों आदि के विषैले रसायन, हानिकारक पदार्थ और गन्दा जल नदियों और झीलों में गिराये जाने से स्वच्छ जल की प्राप्ति कठिन हो गयी है तथा प्रदूषित जल से मानव एवं पौधों सहित समस्त जन्तु समुदाय को अकथनीय और असाध्य क्षति का सामना करना पड़ता है।

      अतएव सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वे कारखानों एवं खदानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं मल-जल को बिना शोधित किए नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित न करें।

      नगरपालिकाओं द्वारा सीवर शोधन संयन्त्रों की व्यवथा की जाये तथा इस प्रकार की तकनीक का विकास किया जाये कि उत्पादकता को प्रभावित किए बिना जल के उपयोग को कम किया जा सके। इससे गन्दे पानी के बहाव की समस्या अवश्य कम होगी। जिससे प्रदूषित जल का प्रयोग कम मात्रा में संभव हो सकेगा।

(v) भू-तापीय जल (एक प्रकार का भूमिगत जल जो काफी गहराई में होता है) का भी प्रयोग किया जाये।

(vi) जिन क्षेत्रों में मीठे जल का अभाव है, वहाँ समुद्री जल के निर्लवणीयकरण की तकनीक विकसित करके मीठे जल की कमी दूर की जा सकती है। कुवैत ने इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(vii) जल संरक्षण के लिये जनजागरुकता सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाज को सचेत करने के लिये जनजागरण अभियान चलाना सामयिक आवश्यकता है। इससे जहाँ एक ओर जल के संतुलित उपयोग की आदत विकसित होगी, वहीं दूसरी ओर जल के दुरुपयोग की आदत में सुधार होगा।

6. The Concept of Regional Development (प्रादेशिक विकास की अवधारणा)

6. The Concept of Regional Development

(प्रादेशिक विकास की अवधारणा)



        Regional Development

             भूगोल की संकल्पना में प्रदेश अन्तर्निहित है। वास्तव में प्रदेश भूगोल की आत्मा है। प्रदेश का गठन, उसका संगठन, गत्यात्मकता और विकास ऐसे शब्द हैं, जिनकी उल्लेख भूगोल की प्रत्येक शाखा में किया गया है। कहीं यह उल्लेख प्रत्यक्ष होता है, तो कहीं परोक्ष।

         एक क्षेत्रीय विज्ञान के नाते तथा पृथ्वी सतह से सम्बन्धित होने के कारण भूगोल में मनुष्य एवं पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है। कहीं प्रदेश विधि अथवा उपागम के रूप में स्पष्ट होता है, कहीं किसी प्रदेश का क्रमबद्ध विधि से अध्ययन होता है अथवा क्रमबद्ध अध्ययन का आधार ही प्रदेश है। अतः भूगोल एवं प्रादेशिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

         पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों के विस्तृत विवरण का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सभी भौतिक तथ्य धरातल पर असमान रूप में वितरित है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक तथ्य मानव निवास के अनुकूल हैं, उन्हीं क्षेत्रों में मानव सृजित वातावरण के तथ्य आसानी से केन्द्रित हो जाते हैं। इस तरह वहाँ मानवीय और भौतिक तथ्यों के बीच अल्पावधि में अन्तर्क्रिया सम्पन्न होती हैं। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विकास वहाँ पहले दृष्टव्य होता है।

            इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, वहाँ विकास प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होगी, ऐसे क्षेत्रों में भी मानवीय कारकों की प्रधानता रहने पर विकास प्रक्रिया प्रारम्भ अवश्य होगी लेकिन संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों की तुलना में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होगी।

         यही कारण है कि विकास में क्षेत्रीय असमानता मिलती है। भूगोल में इसलिए विकास या आर्थिक विकास को प्रादेशिक विकास कहा जाता है। भौगोलिक रूप में इसको परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि “प्रादेशिक विकास मानवीय क्षमता और प्राकृतिक तथ्यों के गत्यात्मक अन्तर्क्रियात्मक अन्तर्सम्बन्धों के परिणामस्वरूप घटित क्षेत्रीय संरचनात्मक प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित हैं।” यह प्रत्यावर्तन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तरों पर घटित होता है।

           स्पष्ट है कि क्षेत्रीय पक्ष प्रादेशिक आर्थिक विकास का मौलिक पक्ष है। इसलिये यह भौगोलिक अध्ययन का विषय है। लेकिन 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भूगोलवेत्ताओं ने इस ओर कोई रुचि नहीं ली थी। वास्तव में उस समय भूगोल का उद्देश्य विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों की विशिष्टताओं को स्पष्ट करना ही था। इसी विशिष्ट वर्णनात्मक उपागम के कारण भूगोलवेत्ताओं का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विभिन्नता का वर्णन करना था। भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास का अध्ययन द्वितीय महायुद्ध के बाद करना प्रारम्भ किया।

       इस समय लगभग साम्राज्यवाद और औपनिवेशीकरण समाप्त हो गया था। विभिन्न स्वतंत्र देश अपने संसाधनों के आधार पर आर्थिक विकास कर रहे थे। यूरो-अमेरिकी देश अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो रहे थे, जबकि नये स्वतंत्र देश विकास प्रक्रिया को प्रारम्भ कर रहे थे।

          ऐसे समय ही विकसित देश विश्व का ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ वर्गों में विभाजन करके विभिन्न विषयों का अध्ययन करने लगे। तत्कालीन भूगोलवेत्ताओं ने भी विकसित और अवकिसित देशों के मध्य विकास प्रतिरूप में अन्तर के कारणों को जानने हेतु आर्थिक विकास का अध्ययन प्रारम्भ किया।

          डडले स्टैम्प, नार्टन गिन्सबर्ग आदि भूगोलवेत्ताओं ने सर्वप्रथम आर्थिक विकास और प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत किया। कालान्तर में नार्टन गिन्सबर्ग ने ‘भूगोल एवं आर्थिक विकास’ (Essays on Geography and Economic Development) नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया। यह विभिन्न चरों पर आधारित विश्वस्तरीय आर्थिक विकास का प्रादेशिक वर्गीकरण था।

        इसी तरह अन्य भूगोलवेत्ताओं ने प्रारम्भिक स्तर पर आर्थिक विकास पर पर्यावरण के समग्र प्रभाव का भी वर्णन किया। आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले विभिन्न चरों के वितरण प्रकृति के आधार पर सामान्यीकरण एवं सिद्धान्त निरूपण केवल कुछ ही भूगोलवेत्ताओं ने किया, जिसमें गिन्सबर्ग, उलमान और हार्टशोर्न उल्लेखनीय हैं। तदुपरांत भारत के भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास के विभिन्न आयामों का भौगोलिक वर्णन करके सामान्यीकरण और मॉडल निर्माण करना प्रारम्भ किया है।

      भारतीय भूगोलवेत्ताओं में आर० पी० मिश्रा, के० वी० सुन्दरम, वी० एल०एस० प्रकाशराव, मुनीस रजा, एल० के० सेन, डी० के० सिंह, जे०के० राउतराय, सुधीर वनमाली, पी०आर० चौहान, वी० के० श्रीवास्तव, नंदेश्वर शर्मा आदि ने भी आर्थिक विकास के विभिन्न पक्षों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया है।

आर्थिक विकास एवं प्राकृतिक- मानवीय तथ्य

       आर्थिक विकास का अध्ययन करते समय भूगोलवेत्ताओं का उद्देश्य उन कारकों का वर्णन करना होना चाहिये, जिससे विकास में असमानता होती है। ऐसे तत्त्वों में सर्वप्रथम प्राकृतिक तत्त्वों यथा- भूमि, जलवायु, खनिज, ऊर्जा संसाधन, वनस्पति आदि में क्षेत्रीय अन्तर मिलता है। ये सभी प्राकृतिक तत्त्व किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिये उत्तरदायी हैं लेकिन मात्र इन्हीं के क्षेत्रीय वर्णन से विकास की असमानता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

        विश्व में क्षेत्रीय आधार पर वितरित विभिन्न संस्कृति और सभ्यताएँ तंत्र और संसाधनों के दोहन का उद्देश्य प्राकृतिक तत्त्वों की अपेक्षा अधिक सशक्त रूप से विकास की असमानता को स्पष्ट करते हैं। बल्कि भौगोलिक रूप से सच यह है कि प्राकृतिक तत्त्व तो निर्जीव रूप से स्थिर हैं। मानवीय विशेषताएँ ही इन तत्त्वों के दोहन का प्रतिरूप निर्धारित करके विकास प्रतिरूप को अस्तित्व में लाती है। इसलिये भूगोल में आर्थिक विकास के निर्धारकों में प्राकृतिक तत्त्वों से अधिक महत्त्व मानवीय तत्त्वों को दिया जाना चाहिये।

       हार्टशोर्न के अनुसार क्षेत्रीय आधार पर अन्तर इन्हीं तत्त्वों के कारण उत्पन्न होता है। यही कहा जा सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की भौतिक स्थिति, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठन, वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या की क्षमता को उसकी आवश्यकताओं और उद्देश्यों को पूरा करने के लिये निर्देशित करते हैं। इसलिये भूगोल में विकास का अध्ययन उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में न करके उत्पादन और जनसंख्या के सन्दर्भ में ही करना चाहिये, क्योंकि आर्थिक विकास का अन्तिम उद्देश्य भी मानव कल्याण हैं।

      विकास प्रतिरूप का भौगोलिक अध्ययन करते समय प्राकृतिक तत्त्वों के साथ-साथ मानव की भौतिक आवश्यकताओं और उनके प्रति उसके दृष्टिकोण का भी अध्ययन होना चाहिए। क्षेत्रीय आधार पर मानव समूहों की कुछ समान आवश्यकताएँ हैं, जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आदि। इनकी पूर्ति मानव के हर कार्य का मुख्य उद्देश्य है। इसको प्राप्त करने के लिये मनुष्य संसाधनों से अन्तर्क्रिया करता है। इससे विकास घटित होता है। चूँकि मानव की इच्छाओं, आवश्यकताओं और उसकी क्षमताओं में पर्याप्त वैभिन्य है। इसलिये विकास प्रतिरूप में भी विभिन्नता का मिलना स्वाभाविक है।

       अतः अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय अथवा मानवीय समूह यहाँ तक कि नितान्त व्यक्तिगत स्तर पर विकास का अर्थ अलग-अलग होना अपरिहार्य है। मालकम आदिशेषैया ने सही कहा है कि एक पूर्ण विकसित औद्योगिक समाज में और पारम्परिक समाज में विकास का अभिप्राय अलग-अलग होना निश्चित है क्योंकि दोनों समाजों के मनुष्यों की आवश्यकताएँ, इच्छाएँ, जीवनयापन का ढंग, प्राविधिक स्तर अलग-अलग प्रकार के हैं। आवश्यकताओं एवं इच्छाओं में यह अन्तर विकास हेतु भी विभिन्न प्रकार की तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक भी क्षेत्र विशेष की भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित होती है।

       भौगोलिक विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक तत्त्वों के अतिरिक्त विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं। भौतिक (पदार्थगत) तत्त्वों में परिवहन, वित्त, शक्ति के साथ-साथ संसाधन (कच्चे माल) हैं, जबकि अभौतिक तत्त्वों में श्रम, विपणन, उद्यम आदि हैं। ये सभी एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होकर ही विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं।

      यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि किन्हीं एक या दो तत्त्वों के अभाव से क्षेत्र का विकास प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे तत्त्वों को आयात करके या उनका विकल्प खोलकर विकास किया जा सकता है। इसीलिये हार्टशोर्न का मत है कि विकास में अन्तर का मिलना प्राकृतिक संसाधनों में अन्तर का ही परिणाम नहीं है बल्कि मानवीय या अभौतिक कारक इस अन्तर के लिये अधिक उत्तरदायी है।

      उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भूगोल में आर्थिक विकास की संकल्पना क्षेत्रीय संदर्भ लेकर ही की जा सकती है। इस तरह प्रादेशिक विकास के रूप में आर्थिक विकास का एक मात्र उद्देश्य भूगोल में प्रति व्यक्ति आय अथवा राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही नहीं है बल्कि इसमें भौतिक और अभौतिक कारकों द्वारा समन्वित रूप में मानव के सन्दर्भ में किया जाने वाला आर्थिक विकास सम्मिलित है। भूगोल का उद्देश्य इन कारकों के वितरण अन्तर, अन्तर्सम्बन्ध और पारस्परिक अन्तरक्रिया का विश्लेषण करके विकास के सम्बन्ध सामान्यीकरण करना होना चाहिये।

निष्कर्ष

      विकास की प्राचीन अवधारणा से लेकर द्वितीय महायुद्धोत्तरकालीन संकल्पना और भूगोल में विकास की संकल्पना के उपर्युक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं:-

(i) विकास अन्तर्विषयक, अन्तरप्रखण्डीय और बहुआयामी शब्द हैं।

(ii) मौलिक रूप में विकास का अभिप्राय आर्थिक विकास ही है। यह आर्थिक विकास भी क्षेत्रीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय और सहभागिता की विशेषता से युक्त है।

(iii) विकास की संकल्पना आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों में एक देश से दूसरे देश, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक समाज से दूसरे समाज अथवा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के सन्दर्भ में अलग-अलग होती हैं।

(iv) विकास के सन्दर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि किसी क्षेत्र का संसाधन आधार ही उसके विकास का एक मात्र कारण नहीं है बल्कि मानवीय तत्त्व की प्रकृति एवं प्रतिरूप अधिक उत्तरदायी हैं।

(v) क्षेत्र विशेष में विद्यमान राजनीतिक तंत्र विकास को निश्चित दिशा देकर उसे नियोजित करते हैं।

(vi) विकास का सर्वप्रमुख उद्देश्य मानव कल्याण है और यह मानव कल्याण भी सम्पूर्ण मानव समुदाय के सन्दर्भ में होना चाहिये इसलिये विकास तभी तक  उपयुक्त एवं प्रासंगिक है, जब तक कि उसमें असमानता न्यूनतम स्तर पर रहती है।

(vii) विकास की संकल्पना गत्यात्मक है। अविकसित और पिछड़े समाज या क्षेत्र के विपरीत विकसित अथवा औद्योगिक समाज के सन्दर्भ में, इसकी संकल्पना अलग-अलग है, क्योंकि दोनों की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर मिलता है। इसलिये सामाजिक प्रत्यावर्तन के साथ ही साथ विकास की संकल्पना भी परिवर्तित होती जाती है।

प्रश्न प्रारूप

 1. प्रादेशिक विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

 4. The problem of regional imbalances into India (भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)

4. The problem of regional imbalances into India

(भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)       problem of regional

           भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन बड़े पैमाने पर पाया जाता है, हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है किन्तु इससे भी बुरी बात है-आय का असमान वितरण, आर्थिक विकास प्रयत्नों ने जहाँ आय की विषमता को बढ़ाया है, वहीं नियोजित विकास के द्वारा असंतुलन को कम करने के प्रयास भी किये हैं।

        योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य समाजवाद की स्थापना करना, किन्तु योजनाओं के कार्यक्रमों का आधार क्रियान्वयन की विधि व संगठन तंत्र इस प्रकार के रहे कि सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि सम्भव न हो सकी, प्रमुख असफलता आय के वितरण के रूप में सामने आयी, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षण अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निम्नतम 20 प्रतिशत जनसंख्या की कुल आय का 9 प्रतिशत प्राप्त होता है, जबकि 5 प्रतिशत की कुल आय का 17 प्रतिशत, जनसंख्या के उच्चतम अर्द्धभाग को कुल आय का 60 प्रतिशत, जबकि निम्नतम अर्द्धभाग को कुल आय का केवल 31 प्रतिशत प्राप्त होता है।

      हमारे देश में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है, यहाँ जनसंख्या घनत्व में भी बहुत असमानता है। देश का जनघनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनघनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल प्रथम स्थान पर है, जहाँ जनघनत्व 903 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में जनघनत्व 13 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी भाँति यहाँ जनसंख्या का लिंगानुपात तथा साक्षरता में भी बहुत असमानता पायी जाती है।

       लिंगानुपात की दृष्टि से प्रथम स्थान पर केरल है, जहाँ लिंगानुपात 1058 है, जबकि राजस्थान में लिंगानुपात सबसे कम है, जो 922 है, साक्षरता की दृष्टि से केरल प्रथम स्थान पर है, जहाँ साक्षरता 90.92 प्रतिशत है, इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता वाला राज्य बिहार है, जहाँ साक्षरता 47.0 प्रतिशत है।

        यहाँ कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि में भी पर्याप्त असन्तुलन पाया जाता है। देश में व्याप्त असन्तुलनों से अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती है, जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

सामाजिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो अग्रलिखित हैं-

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानता:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से ग्राम एवं नगरों के मध्य आय तथा सम्पत्ति वितरण में असमानता बहुत है। यह असमानता राज्यों में भी बहुत है। अखिल भारत की प्रति व्यक्ति आय 29,642 (वर्तमान कीमतों पर) रुपये है, जबकि गोवा 70,112 रुपये, दिल्ली में 61,676 रुपये, महाराष्ट्र में 37,081 रुपये है।

       राष्ट्रीय औसत से अधिक आय वाले राज्य केन्द्रशासित गोआ, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हाराष्ट्र मिजोरम एवं पंजाब, चण्डीगढ़, केरल आदि राज्य है, जबकि शेष राज्यों के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि जब लोग समाजिक नहीं होते हैं अर्थात् उनमें ऊँच-नीच दिखाई देती है, तो स्वाभाविक है कि असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

      क्षेत्रीय असन्तुलनों से किसी क्षेत्र विशेष की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ने लगता है, जिससे भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की समस्या, जलापूर्ति समस्या, बिजली की समस्या तथा गन्दी बस्ती समस्या उत्पन्न होती है। सभी लोगों को रोजगार न मिलने से उनमें रोष व्याप्त होता है, जिससे असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

         क्षेत्रीय असन्तुलन होने से किसी क्षेत्र विशेष में औद्योगीकरण अधिक होता है, जबकि किसी में बहुत कम। ऐसी स्थिति में जहाँ औद्योगीकरण अधिक होता है, वहाँ प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। प्रदूषण वाले क्षेत्रों में निवास करने वाले श्रमिकों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होने लग जाती हैं, जिसके उपचार हेतु अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है।

आर्थिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्न प्रकार की आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं-

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि इससे देश के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसका कारण यह है कि जहाँ विकास होता है, वहाँ के संसाधनों का उपयोग हो जाता है किन्तु अनेकानेक दुर्गम क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग नहीं हो पाता है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

       सभी क्षेत्रों में सन्तुलित विकास न होने से कुछ क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसर अच्छे होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में रोजगार का अभाव पाया जाता है। यदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो तो रोजगार के अवसर भी समान रूप से मिलेंगे, फलतः बेरोजगारी कम होगी।

(3) साधनों का अनुचित उपयोग:-

       प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में होते हैं। अतः उनका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए तथा उनके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए। औद्योगिक विकास होने से संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग हो जाता है, जिससे संसाधनों के समाप्त होने की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(4) जीवन स्तर में भिन्नता:-

     क्षेत्रीय असन्तुलन से कुछ क्षेत्रों के लोगों की आय अधिक होती है, जबकि अन्य बहुत कम आय वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जीवन-स्तर में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। क्षेत्रीय असन्तुलन होने से यह बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है।

राजनैतिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्नांकित राजनैतिक समस्याएँ उत्पन होती हैं-

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से राजनीति में भी स्थिरता नहीं है। जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, वहाँ असन्तुलन है, इस प्रकार दोनों का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

(2) क्षेत्रवाद की समस्या:-

      जब किसी क्षेत्र का विकास अधिक तथा किसी का कम होता है तो विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें क्षेत्रवाद की समस्या भी बहुत बड़ी है। ऐसे में क्षेत्रीय भावना जागृत होती है, जो किसी-न-किसी रूप में हानिकारक है।

(3) सुरक्षात्मक समस्या:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो क्षेत्र अधिक विकसित हो जाते हैं, उन पर अन्य पिछड़े क्षेत्रों के गरीब व बेरोजगार हमला बोल देते हैं, वहाँ से धन प्राप्त करते हैं। इससे वहाँ का जन-जीवन असुरक्षित हो जाता है।

4. Major Agriculture Systems in The World (विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)

4. Major Agriculture Systems in The World

(विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)



        Major Agriculture  

         मिट्टी को जोतने-गोड़ने तथा फसल उगाने एवं पशुपालन की कार्यप्रणाली, कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं। कृषि मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है, क्योंकि इससे समस्त संसार के भोजन, वस्त्र तथा आवास की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। विद्वानों का विचार है कि कृषि का आरम्भ दक्षिण-पश्चिमी एशिया में लगभग 4000 ईसा पूर्व हुआ।

          कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य कृषि कार्य पाषाण युग से ही करता आया है।

         कृषि ने मनुष्य को स्थायी आवास की सुविधा दी। कृषि का मशीनीकरण हो जाने से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि उत्पादों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा रूस बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं जबकि ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, डेनमार्क तथा जापान इन वस्तुओं का आयात करते हैं।

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Systems):-

          भूतल पर विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की भौतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जिस कारण अलग-अलग भागों में अलग-अलग कृषि पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि

(Subsistence Agriculture)

2. आधुनिक कृषि

(Modern Agriculture)

3. विस्तृत कृषि

(Extensive Agriculture)

4. वाणिज्य कृषि

(Commercial Farming)

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन

(Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock)

6. डेरी फार्मिंग

(Dairy Farming)

7. ट्रक कृषि

(Truck Farming)

8. उद्यान कृषि

(Horticulture)

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि (Subsistence Agriculture):-

         इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

2. आधुनिक कृषि (Modern Agriculture):-

        इस कृषि में आधुनिक ढंग से फसलें उगाई जाती हैं। कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है। विस्तृत कृषि, वाणिज्य कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग उद्यान कृषि,आदि आधुनिक ढंग से की जाती है। 

3. विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture):-

      विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेअर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबन्धीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है। यह कृषि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुई।

        इस कृषि का विकास कृषि-यन्त्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

       विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है:

(i) खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेअर तक होता है।

(ii) बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 

(iii) खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेशर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं।

(iv) मुख्य फसल गेहूँ हैं। अन्य फसलें हैं- जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन।

(v) खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवेटर्स कहते हैं। 

(vi) यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है।

(vii) प्रति हेक्टेअर उपज कम तथा प्रति-व्यक्ति उपज अधिक होती है।

      जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसे घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

4. वाणिज्य कृषि (Commercial Farming):-

      इस कृषि में फसलों को बेचने के लिए पैदा किया जाता है। अतः उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण इसकी मुख्य विशेषता है। विश्व में यह दो रूपों में पाई जाती है-

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि तथा

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि।

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि:-

        मध्य अक्षांशों में गेहूँ के उत्पादन में विशिष्टीकरण इस कृषि का मुख्य उदाहरण है। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, यूक्रेन क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, अर्जेण्टीना, आस्ट्रेलिया के दक्षिणी भागों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

      इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों से किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूँ के कृषि क्षेत्रों में कृषक बाहर से आते जाते हैं। इनके लिए साइडवाक कृषक तथा सूटकेस कृषक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भारत में वाणिज्य कृषि बड़े पैमाने पर तो नहीं, परन्तु किसी हद तक की जाती है। यहाँ पर मशीनीकरण भी सीमित ही हुआ है।

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि:-

       रोपण कृषि का विकास उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को वे कृषि उपजें उपलब्ध कराना था जो केवल उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में ही होती हैं। अतः यह एक व्यापारिक कृषि बन गई जिसमें फसलों का विक्रय किया जाता है। भारत में असम व दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय बागान, मलेशिया के रवर बागान, ब्राजील के कॉफी बागान इस कृषि के मुख्य उदाहरण हैं।

       प्रारम्भ में पूँजी निवेश उपनिवेशी देशों द्वारा किया गया था। बागानों का प्रबन्ध भी उपनिवेशी देशों के हाथों में ही था, परन्तु बड़े पैमाने पर श्रम स्थानीय मजदूरों या बाहर से लाए गए भाड़े या बन्धुआ मजदूरों द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस कृषि में उत्पाद को भी बागान पर ही संसाधित किया जाता है। क्योंकि रोपण कृषि की उपजें मुख्यतः निर्यात के लिए ही होती हैं इसलिए इस कृषि के विकास के लिए सस्ते परिवहन का होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि विश्व की अधिकांश रोपण कृषि तटीय भागों में विकसित हुई है या वह सस्ते परिवहन द्वारा तट से जुड़ी हुई है।

      रोपण कृषि के बागान प्रायः बड़े आकार के होते हैं और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पनपते हैं। सामान्यतः इनका आकार 4 से 40 हेक्टेअर तक होता है, परन्तु कहीं-कहीं ये बागान बहुत बड़े होते हैं। उदाहरणतः लाइबेरिया में हरबल नामक स्थान पर फायस्टोन कम्पनी का रबर का बागान 54.4 हजार हेक्टेअर भूमि पर फैला हुआ है।

      उपनिवेशवाद की समाप्ति पर उपनिवेश स्वतन्त्र हो गए और रोपण कृषि की विशेषताओं में परिवर्तन आ गया। उदाहरणतः बागानों का स्वामित्व तथा प्रबन्ध उपनिवेशी देशों से हटकर स्थानीय अधिकारियों के हाथों में आ गया। अब ये बागान अपनी उपजों को निर्यात करने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी बेचते हैं।

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन (Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock):-

        इस कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। यह मिश्रित बुआई से भिन्न है। मिश्रित बुआई में एक ही खेत में एक ही समय पर कई फसलें बोई जाती हैं जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप में आयरलैण्ड से रूस तक, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

      संयुक्त राज्य अमेरिका का मिश्रित कृषि क्षेत्र मक्के की पेटी है। मक्का खिलाकर पशुओं को मोटा किया जाता है। इसके अतिरिक्त जई, गेहूँ तथा घास भी पैदा की जाती है। अब यहाँ पर सोयाबीन की फसल भी पैदा की जाने लगी है। यह एक प्रोटीनयुक्त फसल है जिसका विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की जाती है जिससे इसकी उपजों की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती। उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन, शहरी बाजार की निकटता तथा विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

6. डेरी फार्मिंग (Dairy Farming):-

      डेरी फार्मिंग कृषि का वह विशिष्ट ढंग है जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन, पशुचारण और नस्ल सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुधारू पशुओं, विशेषतया गायों को पाला जाता है। दूध तथा दुग्ध पदार्थ, जैसे- मक्खन, पनीर, क्रीम, संघनित दूध और पाउडर दूध इस कृषि के मुख्य उत्पाद हैं।

डेरी फार्मिंग के क्षेत्र:-

     डेरी फार्मिंग यूरोप (ब्रिटेन, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड्स, बेल्जियम, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैण्ड, फ्रांस, यूक्रेन, लाटविया, लिथुआनिया तथा एस्टोनिया), उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों का क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में विकसित है।

     भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। | गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

डेरी फार्मिंग की विशेषताएँ

(i) दुधारू पशुओं को पालना डेरी फार्मिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी नस्ल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। होलिस्टीन, रेनडेन, जर्सी, गोर्नसे तथा आयर शायर जैसी उच्चकोटि की नस्लों वाली गायें पाली जाती हैं।

(ii) पशुओं की देखभाल वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।

(iii) दूध दोहने और उसे संसाधित करने की क्रियाओं को मशीनों द्वारा किया जाता है।

(iv) डेरी फार्मिंग घने औद्योगिक नगरों की मांग पर आश्रित है इसलिए अधिकांश डेरी फार्मिंग शहरी क्षेत्रों के निकट ही पनपा है।

(v) दूध और दुग्ध पदार्थों को मांग के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए तीव्र यातायात का प्रयोग किया जाता है।

(vi) नियोजित आवास, मशीन, चारे की मिलों, प्रशीतन तथा संचयन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. ट्रक कृषि (Truck Farming):-

     यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि की जाती है। इन वस्तुओं को प्रतिदिन ट्रकों में भरकर निकटवर्ती नगरीय बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बाजार से कृषि क्षेत्र की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि ट्रक द्वारा रात-भर चलने में कितनी दूरी तय होती है। इसीलिए इस कृषि का नाम ट्रक कृषि रखा गया है।

प्रदेश- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, डेनमार्क, बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, जर्मनी और फ्रांस), संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तर-पूर्वी भाग, केलीफोर्निया, फ्लोरिडा प्रायद्वीप तथा पूर्वी तटीय भाग) एवं कनाडा के पूर्वी भाग में की जाती है। इन प्रदेशों के शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में ताजी सब्जियों की भारी मांग रहती है और ये वस्तुएँ इन प्रदेशों को ट्रक कृषि से ट्रकों द्वारा प्राप्त होती हैं। अतः इस कृषि का नगरीकरण से गहरा सम्बन्ध है।

      भारत में वातावरण अनुकूल तथा वर्धनकाल लम्बा होने के कारण लगभग सभी भागों में सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यहां पर अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और मांस का मूल्य अधिक होने के कारण सब्जियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए इस कृषि पर अधिक बल दिया जाता है।

विशेषताएँ- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) ट्रक एवं उद्यान कृषि के खेत छोटे होते हैं।

(ii) परिवहन की सुविधा अच्छी रहती है।

(iii) गहन कृषि की जाती है।

(iv) सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होती है।

(v) खादों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

(vi) अधिकांश कार्य हाथों से किया जाता है।

(vii) पेड़ों तथा पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए दवाइयों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

8. उद्यान कृषि (Horticulture):-

        यह लगभग ट्रक कृषि जैसी ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें साग-सब्जी के स्थान पर फलों तथा फूलों की कृषि की जाती है। फलों और फूलों की मांग नगरों में बहुत होती है।

फल-

       नगरीय क्षेत्रों में फलों की मांग बहुत होती है जिससे कृषक को पर्याप्त आय हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में केला, आम, जामुन, नारियल, काजू, आदि। शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सेब, आडू, अखरोट, नाशपाती एवं रसबेरी, आदि तथा भूमध्यसागरीय देशों में खट्टे फल, जैसे- सन्तरा, मौसमी, नीबू, आदि मुख्य फल हैं।

फूल-

      फलों की भांति फूलों की भी नगरीय क्षेत्रों में काफी मांग रहती है और फूलों की बिक्री से कृषक को काफी धन प्राप्त होता है। फूलों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी होता है। जार्जिया तथा आर्मीनिया में पैदा किए गए गुलाब के फूल मास्को तथा रूस के अन्य नगरों में भेजे जाते हैं।

        शीत ऋतु में इथोपिया प्याज के फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों को करता है। नीदरलैण्ड्स में ट्यूलिप की कृषि विशेष रूप से की जाती है। यहाँ से इनका निर्यात वायुयानों द्वारा यूरोप तथा अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों को किया जाता है। भारत में गुलाब तथा गेंदे के फूल अधिक पैदा किए जाते हैं।

       अजमेर के निकट पुष्कर घाटी गुलाब की कृषि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती की जाती है। कश्मीर घाटी में विभिन्न प्रकार के फूल उगाए जाते हैं। यहाँ कटेवा भूमि पर केसर की खेती होती है। कन्नौज, जौनपुर तथा लखनऊ में फूलों पर आधारित सुगन्धित तेल बनाए जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियों (Agriculture Systems) का वर्णन करें।

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