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22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नगर के केन्द्र से दूरी के अनुसार निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक कारण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान पर हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

20. Concentric Zone Theory (सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)

20.  Concentric Zone Theory

(सकेंद्रित पेटी सिद्धांत)


        Concentric Zone Theory

        नगरों की सामान्य संरचना अथवा आकारिकी के सम्बन्ध में सिद्धान्त का प्रतिपादन सर्वप्रथम ई. डब्ल्यू. बर्गेस ने 1927 में किया, जिसे संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है। यह सिद्धान्त इस धारणा पर आधारित है कि एक नगर का विकास केन्द्र से बाहर की ओर संकेन्द्रित क्षेत्रों (पेटियों) की शृंखला बनाते हुए होता है। ये पेटियाँ नगर की वृद्धि के साथ-साथ बाहर की ओर खिसकती जाती है।

        यह सिद्धान्त आदर्श दशाओं में ही लागू होता है अन्यथा प्रतिक्रियात्मक कारकों जैसे, यातायात मार्गों और धरातलीय अवरोध (नदी, झील, समुद्र, हिमनद, खाइयां) के उपस्थित होने पर अपने मूल रूप में लागू नहीं होता है। इस प्रकार बर्गेस का यह सिद्धान्त एक आदर्श संकल्पना है। बर्गेस ने शिकागो का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नगर के संरचनात्मक विकास को निम्नलिखित पांच संकेन्द्रित क्षेत्र (पेटियों) द्वारा समझाया है।

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. संक्रमण क्षेत्र (Transition Zone)

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र (Zone of Workingmen’s Homes)

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र (Zone of Better Residences)

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र (Commuter’s Zone)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

         नगर के केन्द्र में प्रथम पेटी के रूप में केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र स्थित होता है। यह नगर का हृदय क्षेत्र होता है। यह नगर के वाणिज्य, व्यापार और यातायात का केन्द्र होता है। गगनचुम्बी इमारतें, प्रमुख शोरूम, एम्पोरियम, थिएटर, होटल, नाचघर, क्लब एवं वाणिज्यिक संस्थानों के कार्यालय इसी क्षेत्र में स्थित होते हैं। इसका अधिकांश भाग गैर-आवासीय कार्यों के लिए प्रयुक्त होता है।

      शिकागो में इस भाग को लूप (Loop), न्यूयार्क में डाउन टाउन (Down Town) तथा पिट्सबर्ग में गोल्डन टेम्पल (Golden Temple) कहते हैं। बर्गेस ने केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र को भी दो भागों में बांटा है- पहला क्षेत्र केन्द्र में स्थित खुदरा व्यापार क्षेत्र है जो कि वृत्ताकार होता है, दूसरा इसके चारों ओर बाहर की ओर स्थित थोक व्यापार क्षेत्र होता है।

2. संक्रमण क्षेत्र:-

        यह क्षेत्र केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। इसमें व्यापारिक, औद्योगिक और आवासीय उपयोग के क्षेत्र पाए जाते हैं अतः इसे संक्रमण क्षेत्र कहते हैं। इसके आन्तरिक भाग में व्यापारिक संस्थान एवं हल्के विनिर्माण उद्योग का क्षेत्र होता है, तो बाहर की ओर आवासीय क्षेत्र होता है। इसमें अधिकांश भवन पुराने, छोटे एवं गन्दे होते हैं तथा कुछ भागों में गन्दी बस्तियां (Slum) भी होती हैं।

      इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश लोगों का सामाजिक स्तर निम्न होता है। यह क्षेत्र अधिकांशतः आप्रवासियों द्वारा आवासित होता है।

3. कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र:-

          संक्रमण क्षेत्र को घेरे हुए कार्यशील लोगों के घरों का क्षेत्र होता है। इसमें औद्योगिक श्रमिकों की संख्या अधिक होती है। ये लोग संक्रमण क्षेत्र में तो रहना पसन्द नहीं करते हैं, लेकिन अपने कार्यस्थल की समीपता को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में रहते हैं अर्थात् इस क्षेत्र में रहने वाले अधिकांश लोग संक्रमण क्षेत्र से ही इस क्षेत्र में आते हैं। इस क्षेत्र में दूसरी पीढ़ी के आप्रवासी लोगों की संख्या अधिक पाई जाती है। शिकागो में यह क्षेत्र दो मंजिलें भवनों वाला है।

4. बेहतर आवासीय भवनों का क्षेत्र:-

       बेहतर आवासीय भवनों अथवा मध्यम या उच्च-मध्यम श्रेणी के लोगों का यह निवास क्षेत्र कार्यशील लोगों के घरों के क्षेत्र के चारों ओर फैला हुआ होता है। यह एक उपनगरीय क्षेत्र जैसा होता है। अधिकांश व्यक्ति व्यावसायिक कार्यों में संलग्न होते हैं। इस क्षेत्र में होटल, एक परिवार वाले आवासीय भवन तथा उच्च श्रेणी के फ्लेट वाले भवन मिलते हैं। सभी भवनों में पर्याप्त खुला क्षेत्र होता है।

5. अभिगमनकर्ताओं का क्षेत्र:-

       नगर की बाह्य सीमा पर तीव्र यातायात सुविधाओं के कारण उपनगरीय क्षेत्रों तथा अनुषंगी नगरों का एक क्षेत्र बन जाता है। इसमें उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र नियमित न होकर बिखरे हुए रूप में होते हैं। यह क्षेत्र नगर के आवासीय क्षेत्रों से हरित पट्टी (Green Belt) द्वारा पृथक् होता है। यह पूर्ववर्ती गाँवों का ही क्षेत्र होता है जो कार्यात्मक दृष्टि से नगरीय विशेषताओं से युक्त होता है। इस क्षेत्र में निवास करने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन में काम करने के लिए केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र में जाते हैं तथा रात्रि में पुनः यहां लौट आते हैं अतः इन्हें शयन नगर (Bed-Room Town) भी कहते हैं।

आलोचना

        बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की कुछ सामान्य विशेषताएं शिकागो तथा कुछ अन्य नगरों (भारतीय नगरों में मुजफ्फरपुर का नगर संकेन्द्रित सिद्धान्त के अनुरूप है) में पाई गईं जो कि सिद्धान्त को पुष्ट करती हैं, किन्तु कई विद्वानों ने अधिकांश नगरों पर सिद्धान्त लागू न होने के कारण इसकी आलोचना की है। सिद्धान्त में रही कमियों को आलोचना के रूप में स्पष्ट किया गया है। ये कमियां निम्नलिखित हैं :

(i) एक मात्र संक्रमण क्षेत्र में स्थित कुछ हल्के उद्योगों के अतिरिक्त संकेन्द्रित सिद्धान्त में किसी भी क्षेत्र में उद्योगों एवं औद्योगिक पेटी की स्थिति नहीं बताई गई है। आशय यह है कि औद्योगिक क्रियाकलाप किसी भी पेटी में मिल सकते हैं।

(ii) केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र गोलाकार न होकर प्रायः अनियमित या आयताकार अधिक होता है। आर. ई. डिकिन्सन ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पेरिस, आदि नगर वृत्ताकार प्रतिरूप नहीं रखते हैं। इसी प्रकार थोक व्यापार क्षेत्र कुछ मात्रा में ही केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के किनारे पर मिलते हैं। अधिकांशतः इनकी स्थिति रेलमार्गों के निकट होती है।

(iii) नगर में खुदरा व्यापार का एकमात्र क्षेत्र ही नहीं होता है बल्कि नगर के विस्तार एवं तीव्र परिवहन साधनों के कारण अन्यत्र भी छोटे-छोटे व्यापारिक केन्द्र विकसित हो जाते हैं।

(iv) निम्न आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र एवं गन्दी बस्तियां भी मात्र संक्रमण क्षेत्र में केन्द्रित न होकर नगर के विभिन्न भागों जैसे- औद्योगिक इकाइयों एवं रेलमार्गों के निकट अधिक पाई जाती हैं।

(v) भूमि उपयोग स्वरूप के निर्धारण में परिवहन मार्गों की भूमिका की सिद्धान्त में उपेक्षा की गई है। नगर से निकलने वाली मुख्य सड़कों के किनारे विकसित हुए व्यापार तथा उसके साथ बढ़ते हुए भूमि मूल्यों को बर्गेस ने अपने सिद्धान्त में कोई स्थान नहीं दिया है।

(vi) नगर के बहिवर्ती भाग में जनसंख्या का जमाव प्रमुख मार्गों के सहारे होता है फलतः नगर का आकार संकेन्द्रित न होकर तारानुमा होता है।

(vii) धरातलीय अवरोधों के कारण संकेन्द्रित क्षेत्रों के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। बर्गेस का सिद्धान्त बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक की दशाओं पर आधारित है तथा आदर्श दशाओं के अन्तर्गत ही लागू होता है।

         अतः इस सिद्धान्त को अत्यधिक सामान्यीकृत रूप में ही देखा जाना चाहिए। तीव्र परिवहन साधनों का विकास एवं नगरों में पुनर्विकास जैसी योजनाओं के कारण भी नगरों के भूमि उपयोग स्वरूप में अत्यधिक परिवर्तन आया है। अत्यधिक आलोचना के उपरान्त भी नगरों की आन्तरिक संरचना के सम्बन्ध में प्रथम सिद्धान्त होने के कारण इसका अपना महत्व है।

प्रश्न प्रारूप 

1. नगर की आकारिकी अथवा सामान्य संरचना के संबंध में प्रतिपादित सकेंद्रित क्षेत्र/पेटी सिद्धांत (Concentric Zone Theory) की विवेचना कीजिये।

29. Minerals (खनिज) तथा खनिजों और चट्टानों के बीच अंतर

29. Minerals (खनिज)



खनिजMinerals

    खनिज निश्चित अनुपात में रासायनिक एवं भौतिक विशिष्टताओं के साथ निर्मित एक प्राकृतिक पदार्थ है। दूसरे शब्दों में, खनिज निश्चित रासायनिक संयोजन एवं विशिष्ट आंतरिक परमाणविक रचना वाले ठोस प्राकृतिक पदार्थ को कहा जाता है। संक्षेप में खान से निकाले गए पदार्थ को खनिज कहते है। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम, सोना, लौह अयस्क, अभ्रक, जिप्सम इत्यादि।

      इस प्रकार पृथ्वी में खनिज घटक शामिल हैं जो या तो अकेले या अनेकों प्रकार के संयोजनों में मौजूद हैं जिन्हें यौगिक कहा जाता है। एक खनिज एक परमाणु या अणु से बना होता है जो प्राकृतिक रूप से पाया जाता है एवं इसकी एक विशिष्ट रासायनिक संरचना व संगठित परमाणु संरचना होती है।

खनिजों की विशेषताएँ-

⇒ खनिजों का वितरण असमान होता है।

⇒ अधिक गुणवत्ता वाले खनिज कम तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

⇒ खनिज समाप्य संसाधन है। एक बार उपयोग करने के बाद पुन: उपयोग नहीं किया जा सकता है।

खनिजों के प्रकार

      खनिज मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

(i) धात्विक खनिज-

    वैसे खनिज जिसमें धातु होती है, उसे धात्विक खनिज कहा जाता है। जैसे लौह अयस्क, ताँबा, निकेल, मैंगनीज आदि। पुनः इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(क) लौहयुक्त खनिज- 

     जिन धात्विक खनिज में लोहे का अंश अधिक पाया जाता है उसे लौहयुक्त खनिज कहते हैं, जैसे- लौह अयस्क, निकेल, टंगस्टन।
(ख) अलौहयुक्त खनिज-

     जिन धात्विक खनिज में लोहे की मात्रा न्यून होती है या नहीं होती है, अलौहयुक्त खनिज कहलाते हैं। जैसे- सोना, चाँदी, शीशा, बॉक्साइट ताँबा।

(ii) अधात्विक खनिज-

      वैसे खनिज जिसमें धातु की  मात्रा  नहीं होती है उसे  अधात्विक खनिज कहते है। जैसे-चूना पत्थर, अभ्रक, जिप्सम आदि। अधात्विक खनिज भी दो प्रकार के होते हैं-

(क) कार्बनिक खनिज-

   इसमें जीवाश्म होते हैं, ये पृथ्वी में दबे प्राणी, पादप जीवों के परिवर्तन से बनते हैं। जैसे-कोयला, पेट्रोलियम इत्यादि।

(ख) अकार्बनिक खनिज-

   इसमें जीवाश्म नहीं होते हैं। जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट।

खनिजों के संरक्षण के उपाय:-

    खनिज क्षयशील एवं अनवीकरणीय संसाधन है। इनकी मात्रा सीमित है। इनका पुनर्निर्माण असंभव है। खनिज उद्योगों का आधार है, किन्तु औद्योगिक विकास के लिए खनिजों का अतिशय दोहन एवं उपयोग उनके अस्तित्व के लिए संकट है। अतः खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। खनिज संसाधन के विवेकपूर्ण उपयोग तीन बातों पर निर्भर है-

(i) खनिजों के निरंतर दोहन पर नियंत्रण,

(ii) उनका बचतपूर्वक उपयोग एवं

(iii) कच्चे माल के रूप में सस्ते विकल्पों की खोज।

    खनिजों पर नियंत्रण के अलावे उनके विकल्पों को खोजना, खनिजों के अपशिष्ट पदार्थों को बुद्धिमतापूर्ण उपयोग, पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले कुप्रभाव पर नियंत्रण, खनिज निर्माण के लिए चक्रीय पद्धति को अपनाना प्रबंधन कहलाता है। अगर खनिजों के संरक्षण के साथ-साथ प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो खनिज संकट से निबटा जा सकता है।

धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच अंतर एवं तुलना

  धात्विक एवं अधात्विक खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर एवं तुलना किया जा सकता है:-

धात्विक अधात्विक
1. धात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ होती हैं। अधात्विक खनिजों की रासायनिक संरचना में धातुएँ नहीं होती है।
2. ये कठोर एवं चमकदार होते हैं। ये चमकदार नहीं होते हैं।
3. ये आग्नेय एवं रूपांतरित चट्टानों में पाए जाते हैं। ये तलछटी चट्टानों में पाए जाते हैं।
4. धात्विक खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त की जा सकती है। इन खनिजों को पिघलाकर/गलाकर धातुएँ प्राप्त नहीं की जा सकती है।
5. ये खनिज लचीले होते हैं। ये खनिज लचीले और भंगुर नहीं होते हैं।
6. धात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के अच्छे संवाहक होते हैं। अधात्विक खनिज ऊष्मा और विद्युत के कुचालक होते हैं।
7. इन खनिजों का गलनांक उच्च होता है। इन खनिजों का गलनांक बहुत कम होता है।
8. लोहा, एल्युमीनियम, सोना, चाँदी आदि के अयस्क धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं। हीरा, स्लेट, पोटाश आदि गैर-धात्विक खनिजों के उदाहरण हैं।
9. इन्हें पीटकर तार बनाया जा सकता है। ये पीटने पर टूटते नहीं हैं। ये पीटने पर चूर-चूर हो जाते हैं।
10. इन्हें खानों से निकालने के बाद साफ करने की आवश्यकता होती है। इन्हें साफ करने की आवश्यकता नहीं होती है।
11. ये प्रायः अयस्क (ore) के रूप में पाए जाते है। ये अयस्क के रूप में नहीं पाए जाते हैं

♣ चट्टानों और खनिजों के बीच निम्नलिखित अंतर है-

क्र.सं. चट्टानों खनिजों
1. चट्टानों को उस ठोस द्रव्यमान के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौगोलिक सामग्रियों से बना होता है। दूसरी ओर, खनिजों को अकार्बनिक रासायनिक यौगिकों के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से बनते हैं।
2. चट्टानें खनिजों से बनी होती हैं। खनिज चट्टानों से नहीं बनते।
3. चट्टानें अपनी बनावट में एक समान नहीं होती हैं। खनिज अपनी बनावट में एक समान होते हैं।
4. जेडाइट, रेड बेरिल, ब्लैक ओपल, मसग्रेवाइट आदि चट्टानें कुछ दुर्लभ चट्टानें हैं। पेनाइट एक दुर्लभ खनिज है।
5. चट्टानें सूक्ष्म अर्थात् प्रकृति में छोटी होती हैं। खनिज सूक्ष्मदर्शी नहीं होते और इन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।
6. पृथ्वी पर चट्टानें ठोस रूप में मौजूद हैं। खनिज पदार्थ पृथ्वी पर खनिज भंडार के रूप में मौजूद हैं।
7. चट्टानों की एक परमाणु संरचना होती है। खनिजों में क्रिस्टलीय और रासायनिक संरचना होती है।
8. चट्टानों का उपयोग सड़क, भवन आदि निर्माण कार्यों के लिए किया जाता है। खनिजों का उपयोग विभिन्न उद्देश्यों जैसे प्रौद्योगिकी, फैशन, निर्माण आदि के लिए किया जाता है।
9. चट्टानों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ चट्टानों

⇒ आकार

⇒ रंग

⇒ आभा

⇒ नमूना

⇒ बनावट

खनिजों के मौलिक गुण हैं:-

⇒ रंग

⇒ क्रिस्टल

⇒ कठोरता

⇒ भंग

⇒ तप

⇒ गुरुत्वाकर्षण

10. चट्टानों का कोई निश्चित आकार या रंग नहीं होता है। खनिजों का एक निश्चित रंग और आकार होता है।
11. उदाहरण:-

⇒ रेत

⇒ कंकड़

⇒ टुकड़े टुकड़े

⇒ गोले

उदाहरण:-

⇒ जीवाश्म ईंधन

⇒ कोयला

⇒ पेट्रोलियम


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7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन

7. आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक एवं इसके प्रकारों का वर्णन



      आन्तरिक प्रवास 

      आन्तरिक प्रवास एक राष्ट्र के भीतर स्थान परिवर्तन करने को कहते हैं। इसमें जनसंख्या अपने राष्ट्र की राजनीतिक सीमा को पार नहीं करती है, बल्कि वह अपने मूल स्थान से अन्य सुविधाजनक या इच्छित स्थान पर रहने लगती है, तो ऐसा प्रवास आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

प्रो. डोनाल्ड बोग के अनुसार, “जब कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सीमाओं के अन्तर्गत अपने मूल निवास को छोड़कर दूसरे स्थान पर रहने लगता है, तो ऐसे प्रवास को आन्तरिक प्रवास कहते हैं। यह अन्तर्गमन अन्तर्प्रवास या अन्तर-देशान्तरण (In-migration) कहलाता है।

आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING THE INTERNAL MIGRATION)

        आन्तरिक प्रवास प्रमुखतया आन्तरिक विषमताओं का परिणाम होता है। जब किसी राष्ट्र में आर्थिक स्तर पर असमानताएँ, भौगोलिक व सामाजिक परिस्थितियों में भिन्नता स्थापित हो जाती हैं, तो आन्तरिक प्रवास को प्रोत्साहन मिलने लगता है। लोगों की आर्थिक व सामाजिक दशा प्रवास की यात्रा व दिशा को प्रभावित करती है। आन्तरिक प्रवास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारक महत्वपूर्ण है:

1. भूमि पर जनसंख्या का असामान्य दबाव (Abnormal pressure of population on land):-

       देश के जिन भागों में जनसंख्या का अत्यधिक दबाव होता है, तो उन क्षेत्रों के निवासी ऐसे क्षेत्रों में जाकर बसना पसन्द करते हैं, जहाँ जनसंख्या का कम दबाव हो तथा भूमि उत्पादन के लिए सुलभ हो। जहाँ भूमि सुधार की सम्भावना हो, लोग वहाँ जाकर रहने लगते हैं।

2. भूमि मूल्य (Land value):-

       जिन भागों में भूमि का मूल्य इतना अधिक हो जाए, कि वह लोगों की वहन शक्ति से अधिक हो जाए तो ऐसी दशा में लोग सस्ती भूमि वाले भू-भागों की ओर प्रवास कर जाते हैं। नगर के भीतरी भाग में जब रिहाइशी भूमि का मूल्य लोगों की क्रय शक्ति के बाहर हो जाता है, तो लोग नगर के बाहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं।

3. सामाजिक परिस्थितियां एवं जाति, धर्म संपर्क (Social conditions and caste, religion conflict):-

       देश के वह भाग जहाँ छुआछूत, वर्ग संघर्ष, जाति संघर्ष, धार्मिक भिन्नता, व्यक्तिगत दुश्मनी, आदि बुराइयों के कारण लोगों का रहना कठिन हो जाता है तो यहाँ से लोग उन क्षेत्रों की ओर प्रवास कर जाते हैं जहाँ यह नफरत करने वाली सामाजिक बुराइयाँ नही होती अथवा इन सामाजिक बुराइयों का प्रभाव बहुत कम होता है। ग्रामीण क्षेत्रों से लोग ग्रामीण रूढ़िवादिता के कारण नगरों में जाकर बस जाते हैं।

4. पारिवारिक व्यवस्था (Family system):-

        जब परिवार बड़े-बड़े हो जाते हैं तथा उनका एक स्थान पर मिलकर रहना सम्भव नहीं होता है, तब परिवार के कुछ लोग अन्य स्थानों पर रहना प्रारम्भ कर देते हैं। वर्तमान समय में बड़े ग्रामीण परिवारों के वह लोग जो शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने के लिए नगरों में जाते हैं, वहीं जाकर बस जाते हैं। पारिवारिक कलह के कारण भी बड़े-बड़े परिवार टुकड़ों में बंट जाते हैं तथा परिवार के कुछ लोग अन्यत्र जाकर बस जाते हैं।

5. विवाह (Marriage):-

        भारतीय समाज में विवाह आन्तरिक प्रवास का एक प्रबल कारक है। विवाह के बाद लड़की को लड़के के पैतृक निवास स्थान पर रहना पड़ता है, अतः लड़कियाँ निश्चित तौर पर विवाह के बाद पैतृक निवास स्थान को छोड़कर अपने पति के घर पर जाकर रहने लगती हैं, तो ऐसा प्रवास भी आन्तरिक प्रवास कहलाता है।

6. ऋणग्रस्तता एवं निम्न आर्थिक स्तर (Indebtness and low economic standard):-

       जिन ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास की सम्भावनाएँ कम होती हैं, लोगों पर ऋण काफी अधिक हो जाता है, रोजगार में स्थायित्व नहीं होता है, तो ऐसे लोग आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न क्षेत्रों में जाकर बस जाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों से नगरों की ओर पलायन इसी प्रवास का परिणाम है।

7. औद्योगिक नगरों का स्थापन (Establishment of industrial towns):-

        नई-नई औद्योगिक इकाइयों के स्थापन के कारण, जहाँ एक ओर नगरों का विस्तार होने लगता है वहीं दूसरी ओर नए-नए नगर व उपनगर बस जाते हैं और लोग ऐसे स्थानों पर अन्य क्षेत्रों से आकर बसने लगते हैं। मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता के उपनगरों तथा नए-नए औद्योगिक नगरों के स्थापन जैसे मोदीपुरम्, रानीपुर के कारण लोग अन्यत्र स्थानों से आकर वहाँ रहने लगते हैं।

8. प्राकृतिक आपदाएं, मानव निवास की विपरीत परिस्थितियां बन जाना:-

      आँधी, तूफान, भूकम्प, ज्वालामुखी का फटना, सूखा पड़ जाना, अति वृष्टि के कारण बाढ़ आ जाना, आदि प्राकृतिक आपदाएँ लोगों को अन्यत्र बसने को मजबूर कर देती है। यह स्थान मानव निवास के अनुकूल नहीं रह पाते है और लोग सुरक्षित स्थानों में जाकर बसना पसन्द करते हैं। मई 2000 में गुजरात में सूखे के प्रभाव से लोगों को अपने स्थानों को छोड़ना पड़ा।

आन्तरिक प्रवास के प्रकार (TYPES OF INTERNAL MIGRATION)

       भारत में होने वाले आन्तरिक प्रवास को आधार मानकर इसको छः प्रकारों में रखा जा सकता है:-

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास (Inter state migration)

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास (Migration from rural to rural)

3. ग्राम से नगर को प्रवास (Migration from rural to urban)

4. नगर से नगर को प्रवास (Migration from urban to urban)

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास (Migration from urban to adjoining rural areas)

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास (Interrelated migration)

1. अन्तर्राज्यीय प्रवास:-

        जब एक देश की सीमाओं के भीतर उस देश के नागरिक अपना राज्य छोड़कर अन्य किसी राज्य में रोजगार, सुरक्षा या विवाद सम्बन्धी कारणों से जाकर बस जाते हैं तो ऐसा प्रवास अन्तर्राज्यीय प्रवास कहलाता है। राजस्थान से अनेक मारवाड़ी परिवार व्यापार के कारण पश्चिम बंगाल और असम में जाकर बस गए। यह इस प्रवास का एक उदाहरण है।

2. ग्राम से ग्राम को प्रवास:-

        ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रवास वर्तमान में काफी महत्व रखता है। छोटे-छोटे गांवों से लोग अपने निकट के उन गांवों, जो केन्द्रीय सुविधाजनक स्थिति होने के कारण अनेक प्रकार की सेवाएँ व सुविधाएँ एकत्रित कर लेते हैं, आकर रहने लग जाते हैं। धीरे-धीरे यह गाँव ग्रामीण सेवा केन्द्र का रूप ले लेते हैं। भारत के ग्रामीण भूदृश्य पर ऐसे केन्द्रों का तेजी से विकास हो रहा है।

3. ग्राम से नगर को प्रवास:-

      वर्तमान समय की एक महत्वपूर्ण घटना नगरीकरण है, जिसका एक कारण ग्रामीण जनसंख्या का रोजगार की सुविधा तथा जीवनोपयोगी सेवाओं का लाभ मिलने की वजह से नगरों में आकर बसना है। वर्तमान में देश के बड़े-बड़े बृहत् महानगरों में जनसंख्या की आकार वृद्धि में इस तरह के प्रवास का महत्वपूर्ण योगदान है।

4. नगर से नगर को प्रवास:-

        भारत के कुल आन्तरिक प्रवास में नगर से नगर की ओर प्रवास का योगदान लगभग 12% रहता है। इस प्रकार का प्रवास प्रायः छोटे नगरों से बड़े नगरों की ओर होता है। लोग बड़े-बड़े नगरों में नौकरी, व्यापार, प्रशासकीय कार्यालयों की सुविधा, आदि के कारण, वहाँ आकर बस जाते हैं। दिल्ली, मुम्बई, बंगलौर, कोलकाता, हैदराबाद, चेन्नई जैसे महानगरों में लोग अनेक छोटे-छोटे नगरों से आकर बस गए हैं। चण्डीगढ़ नगर इसी प्रकार के प्रवास का उदाहरण है। यहाँ की सारी जनसंख्या आन्तरिक प्रवास के फलस्वरूप बसी है। अनेक समीपवर्ती नगरों से लोग यहाँ आकर बस गए।

5. नगर से समीपवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों को प्रवास:-

     नगरों में जब जनसंख्या इतनी बढ़ जाती है कि लोगों का वहाँ रहना दूभर हो जाता है, क्योंकि वहाँ पर्यावरण का प्रदूषित होना, भूमि व मकानों की कीमतों में भारी वृद्धि होना, आदि समस्याएँ पनप जाती हैं। जिनके कारण नगर के लोग नगर की बाहरी सीमा पर स्थित ग्रामीण क्षेत्र के खुले वातावरण में रहना पसन्द करते हैं। यह क्षेत्र नगर के समीप भी होते हैं तथा समस्या रहित होते हैं। लोग यहाँ भूमि सस्ती होने के कारण मकान बनाकर रहने लगते हैं। धीरे-धीरे ऐसे मकानों का समूह एक उपनगर का रूप ले लेता है और समय के साथ नगर का अंग बन जाता है।

6. सम्बद्धताजन्य प्रवास:-

        जब एक व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगर में जाकर बस जाता है तो वह अपने आश्रितों को अपने पास बुला लेता है। यह आश्रित तथा उसके परिवार से सम्बन्धित सभी सदस्य नगर में शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, परिवहन, मनोरंजन, आदि की सुविधा के कारण वहाँ रहने लगते हैं, तो ऐसे प्रवास को सम्बद्धताजन्य प्रवास कहते हैं।

      भारत में कृषि के विकास ने कृषक परिवारों में इस प्रकार की भावना उत्पन्न कर दी है कि उनके एक परिवार का मुखिया नगर में मकान बनाकर रहने लगता है तथा अन्य मुखिए गाँव में खेती का कार्य देखते हैं। इन सब मुखियों के आश्रित नगर में उपरोक्त आकर्षण के कारण रहने लगते हैं। इस प्रकार के प्रवास का प्रचलन वर्तमान में तीव्र गति के साथ बढ़ रहा है।

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