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18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

18. गंगा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र



गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र  

          गंगा तथा ब्रह्मपुत्र हिमालय से निकलने वाली उत्तर भारत की सबसे प्रमुख नदी हैं। ये नदियाँ लम्बी है तथा अनेक छोटी एवं बड़ी महत्त्वपूर्ण नदियाँ इनमें आकर मिलती हैं। इनके सम्मिलित रूप को गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र कहते हैं। इनकी चर्चा हम दो अलग-2 नदी तंत्र में कर रहे हैं।

(1) गंगा नदी तंत्र

    गंगा भारत के सबसे बड़े भाग की नदी तंत्र है। इसका विस्तार लगभग 18 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र पर है जिसका 8.6 लाख वर्ग किमी० क्षेत्र भारतीय सीमा के अन्तर्गत है। यह हिमालय के पर्वतीय भाग से लेकर मैदान तथा दक्षिण के पठारी भाग तक विस्तृत है। गंगा नदी तंत्र का विस्तार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हैं। इसका विकास हिमालय के उत्थान के बाद हुआ लेकिन इसको विकसित करने में पूर्ववर्ती का भी योगदान रहा है। इस नदी तंत्र में गंगा मुख्य नदी है।

     गंगा नदी महान हिमालय में गंगोत्री के पास गोमुख हिमानी से निकलती है। इसकी आरंभिक धारा को ‘भागीरथी’ कहा जाता है। उत्तराखण्ड के देवप्रयाग में भागीरथी में अलकनन्दा धारा आकर मिलती है। दोनों की सम्मिलित धारा को ‘गंगा’ कहते हैं। हरिद्वार तक गंगा पर्वतीय भाग से गुजरती है। इसके बाद यह मैदान में प्रवेश करती है। इलाहाबाद के निकट गंगा में यमुना नदी मिलती है। यमुना नदी महान हिमालय में यमुनोत्री हिमनद से निकलती है। यमुना की सहायक नदी चम्बल, कालीसिन्ध, बेतवा, केन आदि प्रमुख हैं। बिहार के चौसा (बक्सर) नामक स्थान पर गंगा बिहार में प्रवेश करती है और कटिहार तथा भागलपुर जिले के बाद झारखण्ड होते हुए गंगा नदी पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है।

      गंगा के दाहिने किनारे पर यमुना, टोंस, सोन, पुनपुन, किऊल इत्यादि नदियाँ आकर मिलती हैं। इसमें यमुना को छोड़कर में सभी नदियाँ प्रायद्वीपीय उच्चभूमि से निकलती हैं। गंगा के बाएँ किनारे पर हिमालय से निकलने वाली अनेक नदियाँ जैसे- रामगंगा, गोमती, घाघरा, गण्डक, बुढी गण्डक, कोसी, महानन्दा इत्यादि आकर मिलती हैं।

     दाहिने एवं बाएँ किनारे की सहायक नदियों के जल से परिपूर्ण होकर गंगा पूरब दिशा में पश्चिम बंगाल के फरक्का तक बहती है। फरक्का गंगा डेल्टा का सबसे उत्तरी भाग है। यहाँ गंगा नदी दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा हुगली के नाम से दक्षिण की तरफ बहती है तथा डेल्टा के मैदान से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिलती है।

      गंगा की मुख्य धारा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के बाद बांग्लादेश में प्रवेश करती हैं। यहाँ गंगा नदी को “पदमा” कहा जाता है तथा ब्रह्मपुत्र नदी इससे आकर मिलती है। गंगा तथा ब्रह्मपुत्र की सम्मिलित धारा को “मेघना” कहा जाता है। अन्ततः यह बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती है। इन नदियों के द्वारा बनाए गए डेल्टा को “सुन्दरवन का डेल्टा” कहते हैं।

(2) ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र

       इस नदी तंत्र की ब्रह्मपुत्र सबसे प्रमुख नदी है। बह्मपुत्र नदी तिब्बत में मानसरोवर झील के पूर्व 80 किमी० की दूरी पर स्थित हिमानी से निकलती है। इसकी लम्बाई 2900 किमी० है। यह नदी तिब्बत में सांग्पो ने नाम से हिमालय के समानान्तर पूरब की ओर बहती है। पूरब में नामचा बरबा पर्वत को काटकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है। अरुणाचल प्रदेश में बह्मपुत्र नदी को ‘दिहांग’ कहा जाता है। इसके बाद असम में ब्रह्मपुत्र के नाम से पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती है। असम के डुबरी जिले के बाद ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जमुना के नाम से प्रवेश करती है। यहाँ गंगा के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

       ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियों में दिवांग, लुहित, स्वर्णसिरी, धनसीरी, भाद्री, बण्डी, बुढ़ी दिहंग, मानस, सकोंश, तिस्ता, दिसांग, दिखो, कुलसी, कपिली, कोपिती इत्यादि हैं।

     प्रत्येक वर्ष वर्षा ऋतु में यह नदी अपने किनारों से ऊपर बहने लगती है एवं बाढ़ के द्वारा असम तथा बांग्लादेश में अधिक क्षति पहुँचती है।

नोट :-

DAV ⇒ धौलीगंगा + अलकनंदा = विष्णुप्रयाग 

NAN ⇒ नंदाकिनी + अलकनंदा = नंदप्रयाग 

PAK ⇒ पिंडार + अलकनंदा = कर्णप्रयाग 

MAR ⇒ मन्दाकिनी + अलकनंदा = रुद्रप्रयाग 

BAD ⇒ भागीरथी + अलकनंदा = देवप्रयाग 

गंगा ब्रह्मपुत्र नदी

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय) / Drainage System

16. अपवाह तंत्र (हिमालय और प्रायद्वीपीय)

(Drainage System)



अपवाह तंत्र

           भारत एक विशाल देश है। हिमालय पर्वत, अरावली पर्वत, विन्ध्याचल पर्वत, सतपुड़ा पर्वत और पश्चिमी घाट मिलकर महान जलविभाजक रेखा का निर्माण करती है। उद्गम क्षेत्र के आधार पर भारतीय नदियों को दो प्रमुख वर्ग में बाँटा जाता है।:-

(1) हिमालय से निकालने वाली नदियाँ
(2) प्रायद्वीपीय पठार से निकलने वाली नदियाँ

       उपरोक्त दोनों स्रोतों से निकलने वाली नदियों की अलग-2 विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन नीचे किया जा रहा है:-

(i) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ सदावाहिनी/सदानीरा होती हैं और पठारीय नदियाँ सदावाहिनी नहीं होती है। क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियों का स्रोत ग्लेशियर/ हिमानी होता है। जबकि पठारी क्षेत्र की नदियों का स्रोत क्षेत्र हिमानी नहीं हैं। फिर पठारी भारत के सभी बड़ी नदियों में सालोंभर जल का प्रवाह होता है जिसका प्रमुख कारण उनके उद्गम क्षेत्र में झील या जलप्रपात का मिलना है।

(ii) हिमालय स्रोत की नदियाँ लम्बी होती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटी होती है। इसका प्रमुख कारण हिमालय की महाद्वीपीय स्थिति और दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय का होना है। हिमालय एक महाद्वीपीय पर्वत होने के कारण निकलने वाली नदियों के उद्‌गम एवं मुहाना क्षेत्र काफी पूर्व हो जाता है। इसलिए हिमालय क्षेत्र की नदियाँ लम्बी होती है। पुन: हिमालय क्षेत्र में कई ऐसे पूर्ववर्ती नदी मिलते हैं जो हिमालय के उत्थान से पूर्व से ही प्रवाहित होते आ रहे हैं। जैसे- ब्रह्मपुत्र की लम्बाई 2960 किमी०, सिन्धु की लम्बाई 2880 किमी०, गंगा नदी की लम्बाई 2525 किमी० तक पायी जाती है।

       इसके विपरीत पठारीय भारत के अधिकांश नदियों का उद्गम क्षेत्र प० घाट के पूर्वी ढाल और पश्चिमी ढाल पर पायी जाती है। पश्चिमी ढाल से निकलने वाली नदियाँ तुरंत (समुद्र) में जाकर मिल जाती है। पश्चिमी घाट के पश्चिम में बहने वाली सबसे लम्बी नदी पेरियार (80 किमी०) है। पुनः पश्चिमी घाट पूर्वी ढाल से निकलने वाली नदियों में गोदावरी, कृष्णा और कावेरी प्रमुख हैं। गोदावरी प्रायद्वीपीय पठार की सबसे लम्बी नदी है जिसकी लम्बाई 1465 किमी० है।”

अपवाह तंत्र

(iii) हिमालय क्षेत्र की नदियाँ वृहद् नदी बेसिन का निर्माण करती है जबकि पठारीय भारत की नदियाँ छोटे बेसित का निर्माण करती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र नदियों का मार्ग लम्बा होता है तथा समतलीय मैदान से होकर गुजरती है। जबकि पठारीय भारत की नदियाँ तीव्र ढाल से होकर गुजरने के कारण एवं प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण नदी बेसिन का आकार छोटा हो जाता है।

(iv) हिमालय प्रदेश के नदियों की अपरदनात्मक क्षमता तीव्र होती है क्योंकि हिमालय क्षेत्र की नदियाँ युवा अवस्था से होकर गुजर रही है। इसके विपरीत द० भारत की नदियाँ वृद्धा अवस्था से होकर गुजर रही है जिसके कारण उनके अपरदनात्मक क्षमता में जबड़स्त कमी आयी है। हिमालय क्षेत्र की नदियाँ प्राय: V-आकार की घाटी का निर्माण करती है। वहीं प्रायद्वीपीय भारत नदियाँ खुली हुई V-आकार के घाटी का निर्माण करती है।

(v) हिमालय प्रदेश की नदियाँ कई प्रकार के अपवाह विशेषताओं को विकसित करती है। जैसे- पर्वतीय क्षेत्रों में वृक्षाकार अपवाह प्रणाली, मैदानी क्षेत्र में समामान्तर और मोड़ लेती हुई अपवाही प्रणाली और मुहाना पर जालीनुमा अपवाह प्रणाली का विकास करती है। यद्यपि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ प्रायः वृक्षाकार अपवाह प्रणाली विकास करती है।

         पुनः प्रायद्वीपीय भारत में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ अलग-2 प्रतिरूप का निर्माण करती है। जैसे अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ समानान्तर प्रतिरूप का निर्माण करती है क्योंकि तीव्र ढाल से प्रवाहित होने के कारण मलवा का निक्षेपण नहीं हो पाता है जबकि बंगाल की खाड़ी की ओर गिरने वाली प्रायद्वीपीय नदियाँ लम्बी दूरी तय करती है और तुलनात्मक दृष्टिकोण से मंद ढाल से प्रवाहित होती है। इसलिए वृक्षाकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

(vi) हिमालय प्रदेश की नदियाँ मुहाना पर डेल्टा का निर्माण करती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की वे नदियाँ जो अरब सागर में गिरती है वे डेल्टा के स्थान पर एश्चुरी का निर्माण करती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदी डेल्टा का निर्माण करती है।

(vii) हिमालय प्रदेश की नदियों में दो बार जलस्तर ऊपर उठता है। प्रथमत: वर्षा ऋतु में और द्वितीय ग्रीष्म ऋतु में हिम पिघलने के कारण होती। पठारीय भारत की अधिकांश नदियों में केवल एक बार जलस्तर ऊपर उठती है। लेकिन तमिलनाडु को नदियों में द०-प० मानसून और  उ०-पू० मानसून के कारण जल दो बार उठती है।

(viii) हिमालय क्षेत्र की नदी मार्ग में जलप्रपात और उच्छालिका या क्षिप्रिका केवल पर्वतीय क्षेत्रों में बनती है। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियों में इसका प्रमाण सम्पूर्ण मार्ग में देखने को मिलता है।

(ix) हिमालय स्रोत से निकलने वाली कोई भी नदी किसी भी पठारीय नदी की सहायक नदी नहीं है। जबकि पठारीय भाग से निकलने वाली नदियाँ हिमालय से निकलने वाली नदियों का सहायक नदी है। जैसे- सोन, दामोदर, किऊल, किर्मनाशा, पुनपुन, इत्यादि नदियाँ पठारीय नदी है। गंगा की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

(x) हिमालय स्रोत से निकलने वाली नदियाँ केवल दो मुहाना का निर्माण करती है। प्रथम सिन्धु नदी का मुहाना और द्वितीय गंगा-ब्रह्मपुत्र का मुहाना। जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नदियाँ अनेक मुहानों का निर्माण करती है। जैसे स्वर्णरेखा, महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, ताप्ती इत्यादि ये सभी के सभी स्वतंत्र मुहानों निर्माण करती है।

(xi) हिमालय प्रदेश की कोई भी ऐसी नदी नहीं है जो भ्रंश घाटी से प्रवाहित होती है जबकि प्रायद्वीपीय भारत की नर्मदा, ताप्ती और दामोदर ऐसी नदी है जो भ्रंश घाटी से होकर प्रवाहित होती है।

निष्कर्ष

      इस प्रकार ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत से निकलने वाली नदियों के बीच कई मौलिक अन्तर है। यह अन्तर धरातलीय विशेषताओं के कारण उत्पन्न हुआ है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के जल प्रवाह तंत्र में प्रकृति-जन्य विभिन्नता बतलाइये।

2. प्रायद्वीपीय भारत की अपवाह संबंधी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

3. हिमालय क्षेत्र के अपवाह तंत्र के उत्पत्ति एवं प्रवाह तंत्र का वर्णन कीजिए।

4. हिमालय और प्रायद्वीपीय अपवाह तंत्र के बीच अन्तर स्पष्ट कीजिए।

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी (Monsoon of Mechanism)

24. भारतीय मानसून की प्रक्रिया / क्रियाविधि / यांत्रिकी

(Monsoon of Mechanism)



भारतीय मानसून की प्रक्रिया

      भारत में मानसून की उत्पत्ति तिब्बत का पठार, हिमालय पर्वत, उत्तर का मैदानी क्षेत्र, वायु-संचरण और हिन्द महासागर के सम्मिलित प्रभाव के कारण होती है। भारत में मानसून से ग्रीष्म ऋतु में वर्षण का कार्य होती है। यहाँ द०-प० मानसून से लगभग 80% होती है जबकि 20% वर्षा उ०-पू० मानसून और पछुवा विक्षोभ से होती है।

         ग्रीष्म ऋतु के बाद दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के आगमन से वर्षा ऋतु की शुरुआत होती है। भारत में सबसे पहले द०-प० मानसून 29 मई को अण्डमान & निकोबार द्वीप समूह में 1 जून को केरल के तट पर पहुँचती है।

          केरल के तट पर पहुंचकर द०-प० मानसून पश्चिमी घाट पर्वत से टकराती है और संघनित होकर अचानक मूसलाधार वर्षा करती है जिसे “मानसून विस्फोट” कहा जाता है। 15 जून तक द.-प. मानसून मध्य भारत के आन्तरिक भागों में पहुँच जाती है जिससे 5° से 8°C तापमान में गिरावट दर्ज की जाती है। द०-प० मानसून की दो प्रमुख शाखा है।

(1) अरब सागर की मानसूनी पवन

(2) बंगाल की खाड़ी की मानसूनी पवन

          अरब सागर के मानसून की उत्पत्ति अरब सागर में होती है। जब यह भारत के तट पर पहुंचती है तो यह तीन शाखाओं में बंट जाती है।

(i) पहली शाखा पश्चिमी घाट से टकराकर पश्चिमी तटीय मैदान में 250 cm वर्षा करती है। पश्चिमी घाट से टकराने के बाद‌ यह हवा पूर्वी ढाल के सहारे नीचे उतरती है। लेकिन पूर्वी ढाल के सहारे उतरने वाली इस हवा के कारण वर्षा बहुत कम होती है जिसके कारण पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टिछाया प्रदेश का निर्माण होता है।

(ii) अरब सागरीय मानसून की दूसरी शाखा नर्मदा और ताप्ती नदी घाटी के सहारे भारत के मध्यवर्ती क्षेत्र में प्रविष्ट करती है जिसके कारण नर्मदा एवं ताप्ती नदी घाटी क्षेत्र पर्याप्त मात्रा वर्षा प्राप्त करते हैं।

(iii) तीसरी शाखा अरावली पर्वत के समानान्तर राजस्थान में प्रवेश करती है। रास्ते में कोई रुकावट नहीं मिलने के कारण यह राजस्थान के ऊपर से गुजर जाती है जिससे वहाँ वर्षा नहीं हो पाती है। यह शाखा राजस्थान से होते हुए कूल्लू और मनाली के पास जाकर यह हिमालय से टकराती है और वर्षा करती है।

(2) बंगाल की खाड़ी से चलने वाली मानसूनी हवा भी कई छोटे-छोटे शाखाओं में बंट जाती है। इनमें से दो शाखा प्रमुख है-

(i) पहली शाखा बंगलादेश से होते हुए उ०-पूर्वी भारत में प्रवेश करती है।

⇒ इसकी एक शाखा बराक और सूरमा नदी घाटी से गुजरती है जिससे मिजोरम, मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है।

⇒ एक शाखा गारो, खासी, जयंतिया पर्वत से टकराकर विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान मासिनराम ग्राम  का निर्माण करती है।

(ii) बंगाल की खाड़ी की दूसरी सबसे प्रमुख शाखा उड़ीसा और प. बंगाल के सहारे भारत में सीधे प्रविष्ट करती है। यह शाखा कोसी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जाकर असम से आने वाली मानसूनी हवा से मिलकर अत्याधिक वर्षण का कार्य करती है।

         धीरे-2 ये दोनों शाखाएँ सम्मिलित रूप से पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होने लगती है जिससे गंगा के उतरी मैदानी क्षेत्र पर्याप्त वर्षा प्राप्त करती है। यह शाखा कुल्लू के पास जाकर अरेबियन शाखा से मिलती है जिसके कारण यहाँ “बादल फटने की घटना” होती है।

          ग्रीष्म ऋतु में गया से प्रयागराज के बीच ITCZ या तीव्र निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाने के कारण बंगाल की खाड़ी की मानसूनी शाखा को अपनी ओर आकर्षित करती है। इसी अक्ष के सहारे धीरे-2 मानसूनी हवा दक्षिण गंगा के मैदान में पूरब से पश्चिम दिशा की ओर अग्रसारित होती है। ज्यों-2 पूरब से पश्चिम की ओर जाती है त्यों-2 आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की मात्रा में कमी देखी जाती है।

      पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के आँख का विकास होता है जिसके चारों ओर तीव्र गति से हवाएँ चक्र के रूप में घुमकर पूर्वी तटीय क्षेत्रों में वर्षण कार्य करती है।

मानसून का लौटना

        15 अक्टूबर के बाद भारत से मानसून के लौटने की प्रक्रिया शुरू होती है। मानसून लौटने के दौरान वायु स्थल से समुद्र की ओर चलती है। इसे उत्तर-पूरब मानसून की संज्ञा देते हैं। इस शाखा की एक भाग बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता ग्रहण कर तमिलनाडु में वर्षण का कार्य करती है।

निकर्ष

       इस तरह ऊपर के तथ्यों के स्पष्ट है कि भारतीय मानसून की यांत्रिकी काफी जटिल है। इसे नीचे के मानचित्र से भी समझा जा सकता है।

भारतीय मानसून की प्रक्रि

चित्र: द०-प० मानसून की क्रियाविधि

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

25. भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना



भारतीय मानसून की प्रमुख विशेषताएँ तथा मानसून की उत्पत्ति संबंधी कारकों की विवेचना

          भारत एक मानसूनी प्रदेश है। यहाँ ही जलवायु मानसूनी है। मानसून एक मौसमी हवा है। ‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ (Mausim) अथवा मलायन भाषा के मोनसिन (Monsin) शब्द से हुई है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है- मौसम के अनुसार हवाओं का उलट-फेर।

        ब्रिटिश भूगोलवेता हैली महोदय ने बताया कि मानसून एक ऐसी वायु प्रवाह है जो छ: महीने द०-प० से उ०-पू० की ओर (15 मई से 15 नवम्बर तक) तथा अगले छ: महीने (15 नवम्बर से 15 मई तक) उ०-पू० से द०-प० की ओर प्रवाहित होती है। इन्हें चित्रों से समझा जा सकता है:

भारतीय मानसून

मानसून का प्रकार

     भूगोलवेत्ताओं ने मानसून का अध्ययन वैश्विक स्तर पर करते हुए इसे दो भागों में बाँटा है:- उष्ण कटिबंधीय मानसून और शीतोष्ण प्रदेश की मानसून।

        भारत में उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र की मानसून है। इसे भी दो भागों में बाँटा गया है :-

(i) द०-प० मानसून,

(ii) उ०-पू० मानसून

             द०-प० मानसून को ग्रीष्मकालीन मानसून तथा उ०-पू० मानसून को शीतकालीन मानसून कहा जाता है। द०-प० मानसून ही भारत की प्रमुख मानसून है। भारत की 80% वर्षा इसी द०-प० मानसून से होती है। यह मानसून अरब सागर से भारतीय उपमहाद्वीप पर जलवाष्प लाकर वर्षा करती है। जबकि उ०-पूर्वी मानसून बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प लाकर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है। द०-प० मानसून की तुलना समुद्री समीर से और उ०-पूर्वी मानसून की तुलना स्थलीय समीर से की जा सकती है।

भारतीय मानसून की विशेषताएँ

        भारतीय मानसून की कई विशेषताएँ हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) भारतीय मानसून अपने अनिश्चितताओं के लिए विश्व विख्यात है। अर्थात इनकी आने और जाने की तिथि अनिश्चित है।

(2) भारतीय मानसून भारत का वास्तविक बजट निर्माता है।

(3) मानसून मौसम विशेष की हवा है।

(4) मानसून के कारण भारत में मुख्यत: प्रकार की वर्षा होती है-

(i) पर्वतीय वर्षा

(ii) चक्रवातीय वर्षा।

(5) मानसूनी वर्षा का वितरण अत्यन्त अनियमित है।

(6) मानसूनी वर्षा की मात्रा काफी अनिश्चित है। 

(7) मानसून की विश्वसनीयता संदिग्ध है।

(8) मानसून की वर्षा निरंतर नहीं होती, बल्कि कुछ दिनों के अन्तराल पर रुक-रुक कर होती है।

(9) मानसूनी वर्षा मूल रूप से धरातलीय वर्षा है।

(10) मानसूनी वर्षा भारतीय उपमहाद्वीप के तापमान में कमी लाती है।

          इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भारतीय मानसून कई विशेषताओं से युक्त हैं।

भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक:-

       भारतीय मानसून को अनेक कारक प्रभावित करते हैं जिनमें मुख्य निम्नवत हैं:-

(1) स्थिति एवं अक्षांशीय विस्तार:-

        भारत मोटे तौर पर 8°4’N से 37°6’N अक्षांशों के मध्य स्थित है। कर्क रेखा भारत के मध्य से होकर गुजरती है। विषुवत रेखा के पास होने के कारण दक्षिणी भागों में वर्ष भर उच्च तापमान रहता है। दूसरी उतरी भाग गर्म शीतोष्ण पेटी में स्थित है।

       अत: यहाँ विशेषकर शीतकाल में निम्न तापमान रहता है। इसके कारण स्थल और समुद्र पर मिलने वाले वायुदाब में अन्तर आ जाता है। फलत: मध्य मई से मध्य नवम्बर तक द०-प० मानसून सागर से भारतीय उपमहाद्वीप की ओर और मध्य नवम्बर से मध्य मई तक उ०-पूर्वी मानसून भारतीय उपमहाद्वीप से सागर की ओर अग्रसारित होती है और वे वर्षा करते है।

(2) समुद्र से दूरी:-

        प्रायद्वीपीय भारत अरब सागर, हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है। अत: भारत के तटीय प्रदेशों की जलवायु सम है। इसके विपरीत जो प्रदेश देश के आन्तरिक भागों में स्थित हैं, वे समुद्री प्रभाव से अछूते हैं। फलस्वरूप उन प्रदेशों की जलवायु अति विषम या महाद्वीपीय है। समुद्र से निकटवर्ती क्षेत्रों में मानसूनी वर्षा अधिक और जैसे-2 इससे दूरी बढ़ती जाती है वैसे- वर्षा की मात्रा भी घटती जाती है।

(3) उत्तरी पर्वतीय श्रेणियाँ:-

       हिमालय तथा उसके साथ की श्रेणियाँ जो उत्तर-पश्चिम में कश्मीर से लेकर उ०-प० में अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई हैं। ये भारत को शेष एशिया से अलग करते हैं। ये श्रेणियाँ शीतकाल में मध्य एशिया से आने वाली अत्याधिक ठण्डी व शुष्क पवनों से भारत की रक्षा करती हैं। साथ ही वर्षादायिनी द०-पश्चिम मानसून पवनों के सामने एक प्रभावी अवरोध बनाती हैं, ताकि वे भारत की उत्तरी सीमाओं को पार न कर सकें। इस प्रकार ये श्रेणियाँ उपमहाद्वीप तथा मध्य एशिया के बीच एक जलवायु विभाजक का कार्य करती है।

(4) स्थलाकृति:-

          देश के विभिन्न भागों में स्थलाकृतिक लक्षण वहाँ के तापमान, वायुमण्डलीय दाब, पवनों की दिशा तथा वर्षा की मात्रा को प्रभावित करते हैं। उत्तर में हिमालय पर्वत नमीयुक्त मानसून पवनों को रोककर समूचे उत्तरी भारत में वर्षा का कारण बनता है। मेघालय पठार में पहाड़ियों की कीपनुमा आकृति से मानसून पवनों द्वारा विश्व की सबसे अधिक वर्षा होती है। अरावली पर्वत मानसून पवनों की दिशा के समानान्तर है।

       अत: यह मानसूनी पवनों को रोकने में असफल होता है। फलस्वरूप वहाँ वर्षा नहीं हो पाती और लगभग सम्पूर्ण राजस्थान एक विस्तृत मरूस्थल में बदल गया है। पश्चिमी घाट द०-प० मानसून पवनों के मार्ग में दीवार की भाँति खड़ा है जिसके कारण इस पर्वत के पश्चिमी ढालों तथा पश्चिमी तटीय मैदान में भारी वर्षा होती है। इसके पूर्व में पवनें नीचे उत्तरती है और ठण्डी व शुष्य हो जाती है। अतः इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है और यह “वृष्टि छाया क्षेत्र” कहलाता है।

(5) मानसूनी पवनें:-

        द०-प० पश्चिमी ग्रीष्मकालीन पवनें समुद्र से स्थल की ओर चलती है और समस्त देश को प्रचुर वर्षा प्रदान करती हैं। इसके विपरीत शीतकालीन उ०-पूर्वी मानसून पवनें स्थल से समुद्र की ओर चलती है और वर्षा करने में असमर्थ होती है। बंगाल की खाड़ी से कुछ जलवाष्प प्राप्त करने के पश्चात ये पवनें तमिलनाडु के तट पर थोड़ी सी वर्षा करती है।

(6) ऊपरी वायु परिसंचरण:-

        भारत में मानसून के अचानक विस्फोट का एक अन्य कारण भारतीय भाग के ऊपर वायु परिसंचरण में होने वाला परिवर्तन भी है। ऊपरी वायुतंत्र में बहने वाली जेट वायुधरायें भारतीय जलवायु को निम्न प्रकार से प्रभावित करती है। जैसे:-

(i) पश्चिमी जेट वायुधारा-

       शीतकाल में, समुद्र तल से लगभग 8Km की ऊँचाई पर पश्चिमी जेट वायुधारा अधिक तीव्र गति से समशीतोष्ण कटिबंध के ऊपर चलती है। यह जेट वायुधारा हिमालय की श्रेणियों द्वारा दो भागों में विभाजित हो जाती है। इस जेट वायुधारा की उत्तरी शाखा इस अवरोध के उत्तरी सिरे के सहारे चलती है। दक्षिणी शाखा हिमालय श्रेणियों के दक्षिण में 25°N अक्षांश के ऊपर पूर्व की ओर चलती है।

       मौसम वैज्ञानिकों का ऐसा विश्वास है कि यह शाखा भारत की शीतकालीन मौसमी दशाओं को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह जेट वायुधारा भूमध्य सागरीय प्रदेशों से पश्चिमी विक्षोभों को भारतीय उपमहाद्वीप में लाने के लिए उत्तरदायी है। उत्तर पश्चिम मैदानों में होने वाली शीतकालीन व ओलावृष्टि तथा पहाड़ी प्रदेशों में कभी-2 होने वाली भारी हिमपात इन्हीं विक्षाओं का परिणाम है। इसके बाद सम्पूर्ण उतरी मैदानों में शीत लहरें चलती है।

(ii) पूर्वी जेट वायुधारा-

        ग्रीष्मकाल में, उतरी गोलार्द्ध में सूर्य के उत्तरायण के कारण ऊपरी वायु परिसंचरण में परिवर्तन हो जाता है। पश्चिमी जेट वायुधारा के स्थान पर पूर्वी जेट वायुधारा चलने लगती है, जो तिब्बत के पठार के गर्म होने से उत्पन्न होती है। इसके परिणामस्वरूप पूर्वी गर्म जेट वायुधारा विकसित होती है जो 15°N अक्षांश के आस-पास प्रायद्वीपीय भारत के ऊपर चलती है। यह द०-पश्चिमी मानसून पवनों के अचानक आने में सहायता करती है।

(7) एलनीनो प्रभाव:-

        भारत में मौसमी दशाएँ एलनीनो से भी प्रभावित होती है, जो संसार के उष्णकटिबंधीय प्रदेशों में विस्तृत बाढ़ों और सूखों के लिए उत्तरदायी है। एलनीनो एक सतही उप गर्म जलधारा है। यह कभी-2 द० अमेरिका के पेरू तट से कुछ दूरी पर दिसम्बर के महीने में दिखाई देती है। कई बार पेरू की ठंडी धारा के स्थान पर अस्थायी धर्म धारा के रूप में बहने लगती है। कभी-2 अधिक तीव्र होने पर यह समुद्र के ऊपरी जल के तापमान को 10ºC तक बढ़ा देती है।

         उष्ण कटिबंधीय प्रशान्त महासागरीय जल के गर्म होने से भूमण्डलीय दाब व पवन तंत्रों के साथ-2 हिन्द महासागर में मानसून पवनें भी प्रभावित होती है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि 1987 ई. में भारत में भयंकर सूखा एलनीनो का ही परिणाम था।

(8) दक्षिणी दोलन:-

        दक्षिणी दोलन मौसम विज्ञान से संबंधित वायुदाब में होने वाली परिवर्तन का प्रतिरूप है, जो हिन्द व प्रशांत महासागरों के मध्य प्राय: देखा जाता है। ऐसा देखा गया है कि जब वायुदाब हिन्द महासागर में अधिक होता प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र पर अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है अथवा इन दोनों महासागरों पर वायुदाब की स्थिति एक-दूसरे के उलटा होती है। जब वायुदाब प्रशांत महासागरीय क्षेत्र पर  अधिक होता है तथा हिन्द महासागर पर कम होता है तो भारत में दक्षिण-पश्चिम मानसून अधिक शक्तिशाली होती है। इसके विपरीत परिस्थिति में मानसून के कमजोर होने की संभावना अधिक होती है।

     उपरोक्त कारकों के अलावे पश्चिमी विक्षोभ, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात, पृथ्वी की परिभ्रमण गति, उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब का खिसकाव इत्यादि भारतीय मानसून को प्रभावित करने वाले कारक हैं।

निष्कर्ष

        उपरोक्त तथ्यों विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मानसून एक मौसमी हवा है। इसकी कई विशेषताएँ होती हैं। ये विशेषताएँ मानसून को प्रभावित करने वाले कारकों द्वारा निर्धारित होती हैं, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है।

19. भारतीय जल विभाजक रेखा

19. भारतीय जल विभाजक रेखा


भारतीय जल विभाजक रेखा

             जल विभाजक दो भौगोलिक प्रदेश के बीच वह उत्थित स्थलाकृति है, जो दो अपवाह प्रदेशों को अलग-अलग विभाजित करती है। अर्थात् यह दो विपरित ढाल वाले प्रदेश के मध्य उच्च भूमि है।

      भारत में प्रमुख चार जल विभाजक रेखाएँ है। उसके आधार पर भारत को चार अपवाह प्रदेशों में विभाजित किया गया है। भारतीय जल विभाजक रेखा को मानचित्र में देखा जा सकता है-

भारतीय जल(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा।

(i) उत्तर भारतीय जल विभाजक रेखा-

        उत्तर भारत में उत्तर का पर्वतीय क्षेत्र जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। इसका विस्तार काराकोरम हिमालय से मणिपुर मिजो पहाड़ी तक है। काराकोरम हिमालय व पूर्वांचल हिमालय के श्रृंखलाओं में अवस्थित हिमयुक्त शिखर जल विभाजक रेखा का कार्य करती है। जिसकी औसत ऊँचाई काराकोरम से नामचा बरबा तक 6000 मी० है।

    ब्रह्मपुत्र गार्ज के पास पर्वतीय श्रृंखला दक्षिण कि ओर मुड जाती है जिसकी औसत ऊँचाई 2600 मी० से 3000 मी० तक हैं। इसमें पटकोई बुम, नागा हिल, मणिपुर एवं मिजो पहाड़ियाँ शामिल हैं। मूलत: पूर्वांचल हिमालय, म्यानमार और पूर्वोत्तर भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। जबकि हिमालय पर्वत चीन एवं भारत के बीच जल विभाजक रेखा का कार्य करता है।

(ii) अरावली जल विभाजक रेखा-

        इस जल विभाजक रेखा का विस्तार गुजरात के “इन आफ कच्छ” से लेकर अम्बाला सिटी तक हुआ है। इसकी दिशा दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर हैं। जिसकी औसत लम्बाई 600 मी० से 1000 मी० तक है। यह सिंधु नदी तंत्र एवं गंगा यमुना नदी तंत्र के बीच जल विभाजक का कार्य करती है। यह एक प्राचीनतम श्रृंखला है। जो कि एक अवशिष्ट पहाड़ी का रूप धारण कर लिया है। इसका भौगोलिक विस्तार गुजरात, राजस्थान, हरियाणा व दिल्ली जैसे राज्यों तक हुआ है।

(iii) विन्ध्यन सतपुड़ा जल विभाजक रेखा-

         इसका विस्तार मध्य भारत में हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इस जल विभाजक रेखा का निर्माण विन्ध्यन, सतपुड़ा, महादेव, मैकाल आदि पर्वत श्रृंखलाओं के मिलने से हुआ है। यह जल विभाजक रेखा प्रायद्वीपीय भारत और उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र में बहने वाली नदी अपवाह तंत्र के बीच में जल विभाजक रेखा का कार्य करती हैं। इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर बिहार व बंगाल की सीमा पर राजमहल छोटी जल विभाजक रेखा का निर्माण हुआ है, जिसका विस्तार उत्तर से दक्षिण कि ओर हैं।

           इसी जल विभाजक रेखा का कुछ भाग टूटकर गारो, खासी, जयन्तिया जल विभाजक रेखा का भी निर्माण हुआ है। यह जब विभाजक रेखा के दक्षिण से निकलने वाली नदियां बांग्लादेश में नई अपवाह तंत्र को जन्म देती हैं, जबकि उत्तर की ओर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का निर्माण करती हैं।

(iv) पश्चिमी पर्वतीय घाट जल विभाजक रेखा-

          इसकी औसत लम्बाई 1600 किमी० है, इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण दिशा में है। इसकी औसत ऊँचाई 910 मी० हैं। पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट परस्पर नीलगिरी के पास मिलकर एक गाठ का निर्माण करते हैं। और एक सम्मिलित श्रृंखला के रूप में मिलकर क्रमश: अनामलाई, कोर्डेमम, पालनी नागर कोयल, श्रृंखला के रूप मे उत्तर से दक्षिण दिशा ने प्रक्षेपित हो गई हैं।

       चुकिं यह जल विभाजक रेखा पश्चिमी समुद्र स्तर से काफी नजदीक है, साथ ही इसका पश्चिमी किनारा एक भ्रन्शोथ पर्वत के समान हैं। इसलिए अरब सागर में गिरने वाली नदियों की लम्बाई कम हो जाती है। जबकि बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली नदियाँ लम्बी दूरी को तय करने के बाद सागर में गिरती है।

महत्व:

           चूंकि जल विभाजक रेखाएं दो भौगोलिक अपवाह प्रदेशों के बीच की उत्थित भूमि है, जिसके कारण नदी मार्ग मे ढाल तीव्र हो जाता है, जिसके कारण वर्षा का जल तेजी से बहते हुए समुद्र में चला जाता है। लेकिन जल विभाजक रेखा को प्राकृतिक सीमा मानते हुए “जल संभर प्रबंधन (WSM)” के माध्यम से जल संसाधन का उपयोग, संरक्षण एवं उचित संवर्धन किया जा सकता है। इससे कृषि, पशुपालन, मत्स्यन, सामाजिक वानिकी सिंचाई, विद्युत उत्पादन एवं अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देकर पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कई आर्थिक समस्याओं से निपटा जा सकता है। 

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