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30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।

30. हिमालय के आर्थिक महत्व पर प्रकाश डालें।



हिमालय के आर्थिक महत्व

हिमालय की उत्पति:-

        हिमालय की उत्पत्ति की व्याख्या हैरीहेस के द्वारा दिया गया सिद्धांत प्लेट विवर्तनिक के सिद्धांत से करते है। प्रारंभ में सारे महाद्वीप आपस में जुड़े हुए थे और उनके चारों ओर अवस्थित महासागर पैन्थालासा कहलाया। मेसोजोइक काल में पैंजिया के धसान से टेथीस महासागर बना।

        टेथिस महासागर के उत्तरी भाग वाला प्लेट अंगारा प्लेट और दक्षिण भाग वाला प्लेट गोंडवाना प्लेट कहलाया। उन प्लेटों से होकर लाखों लाख वर्ष तक नदियाँ गुजरती रही और निक्षेपण का कार्य चलता रहा। इन निक्षेपण के परिणामस्वरूप भूपटल पर अत्याधिक मात्रा में अवसाद जमा हो गया, इन अवसादों के जमाव से भूपटल का भार बढ़ गया, गति उत्पन्न होने लगी, गोंडवाना प्लेट खिसकने लगा परिणामस्वरूप गोंडवाना का अग्रिम भाग बुल्डोजर के समान टेथिस सागर के ऊपर जमा मलवा पर दबाव बनाने लगा। जिसके कारण टेथिस सागर के मलवा के ऊपर बुल्डोजर विस्थापित हो गये, परिणामतः हिमालय की उत्पति हुई।

हिमालय का आर्थिक महत्व:

      हिमालय पर्वत के निर्माण से भारत के भौतिक, आर्थिक एवं जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ा। हिमालय का आर्थिक महत्व निम्नलिखित है:-

(1) हिमालय पर्वत साइबेरिया और रूस की ओर से आनेवाली ठण्डी एवं शुष्क पवन से रक्षा करती है। जब अत्याधिक ठंडी हवा को हिमालय रोकती है तो इसका सीधा प्रभाव हमारे देश के आर्थिक क्रियाकलाप पर पड़ता है जैसे-

       भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ के अधिकतर लोग कृषक है और जब कृषक है तो वे अपने खेत-खलीहान में कार्य करते है। जब वे कार्य करने हेतु खेत को प्रस्थान करते हैं तो मौसम को अपने ध्यान में रखते हुए यदि अत्याधिक ठंड पड़े तो कृषक लोग खेत में कैसे काम करेंगें, परिणामत: हमारे उत्पाद पर असर पड़ेगा। इसलिए हिमालय साइबेरिया से आने वाली ठंडी हवा को रोककर हमारे वातावरण को सामान्य बनाये रखता है।

(2) हिमालय पर्वत भारत के मौसम विज्ञान पर भी गहरा प्रभाव डालता है। हिमालय की उत्तंग हिम चोटियाँ उत्तरी भारत के तापमान एवं आर्द्रता को प्रभावित करती है। अपनी ऊँचाई और अवस्थिति के कारण ही यह अधिकांशत: आर्द्रता को हिम और हिम से जल रूप देती है। हिमालय के हिम क्षेत्रों से अनेक हिमानियाँ विकसित होती है। इससे ही सदानीरा नदी का उद्गम होता है, यहाँ के ढाल पर होने वाली वर्षा और झरना से मिलकर असंख्य नदियों को जन्म देती है।

         गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जन्म देकर हिमालय अपना सब कुछ उसे अर्पित कर देती है अर्थात हिमालय पर एकत्रित हिम पानी का रूप लेकर इन नदियों में प्रवाहित होकर अपने उत्तमता का प्रमाण दिलाता है। इन नदियों के साथ बहाकर लायी गयी बारीक कांप मिट्टी मैदानों में फैला देती है और यदि कांप मिट्टी जिस मैदान में मिल गया उसकी उर्वरा शक्ति को कहने क्या है? हिमालय की नदियाँ जो बहती हुई भारत के अनेक क्षेत्रों तक जाती है उसका महत्व तो अकथनीय है।

       अतः हिमालय से दूसरी बड़ी फायदा है कि यह भारत वर्ष के लिए सालों भर जल का आपूर्ति कराती है जिसमें बड़े-बड़े शहरों की जलापूर्ति की समस्या को आसानी पूर्वक हल कर देती है। बड़े-बड़े फैक्ट्री में आवश्यक जल की पूर्ती करती है। कृषि प्रधान भारतवर्ष के कृषकों के लिए सिंचाई हेतु जल उपलब्ध कराती है।

(3) हिमालय के हिम आच्छादित शिखर का दर्शन तो ना जाने कैसे कैसे कौतुहल पैदा करता है। उन हिम आच्छादित शिखर और प्राकृतिक सुन्दरता के कारण इस हिमालय का महत्व बहुत अधिक है। उन स्थानों पर भ्रमण करने के लिए लाखों लाख की संख्या में लोग पहुँचते हैं विशेषकर हिमालय के निचले भागों में आते है।

          यहाँ ग्रीष्मावकाश में तो लोग शिमला, कुल्लू, मनाली, कांगड़ी, नैनीताल, मसूरी, देहरादून, चकराता, चम्बा, मुक्तेश्वर, अलमोड़ा, रानी खेत, भुवाली, कसौली, पहलगाँव, लेह, श्रीनगर, दार्जिलिंग का सैर करते हो।

       यहाँ स्थित प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक व सामाजिक वातावरण का लुत्फ उठाते है और ये सब एक दिन में संभव नहीं है। इसके लिए वे होटल में रहते है अर्थात यहाँ का प्रमुख व्यवसाय होटल, ढाबा, परिवहन के साधन, आवश्यक चीज की पूर्ति हेतू छोटे-छोटे दुकान अपनी प्राकृतिक छटा बिखेरती हिमालय ना जाने कितने लोगों को रोजगार मुहैया कराता है। इससे यहाँ के स्थापित व्यवसाय से कर के रूप में सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(4) हिमालय की घाटियों में जहाँ वृक्षों की सीमा समाप्त और हिम रेखा आरंभ होती है वहाँ छोटे-छोटे चारागाह पाये जाते है जिसे कश्मीर मे मर्ग जैसे- सोनमर्ग, गुलमर्ग और कुमायूँ में बुग्याल या प्यामार कहते हैं। इसमें कश्मीरी और लामा गड़ेरिये, भेड़े, बकरी चराते हैं। अर्थात इन चारागाह स्थल की अवस्थिति है हिमालय में जहाँ भेड़, बकरी के चारागाह उपलब्ध है और इन्हें पालने वाले ऊन, मांस, चमड़े आदि को बेच देते है। जिससे यहाँ के लोगों को जीविकोपार्जन होता है।

(5) पुराण को यदि माने तो हिमालय को देवता स्वरूप माना गया है। इसी के पर्वत श्रेणी में कैलाश, अमरनाथ, मानसरोवर, केदारनाथ, बद्रीनाथ, वैष्णों देवी, तारादेवी, उत्तरकाशी, लक्ष्मण झुला, हरिद्वार आदि प्रमुख तीर्थ स्थल है जहाँ दर्शन हेतु अनेक लोग आते है और इससे भारत सरकार को राजस्व की प्राप्ति होती है।

(6) जलवायु की विभिन्नता और ऊँचाई के कारण हिमालय पर्वत पर विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति पायी जाती है। हिमालय पर्वत के ऊँचे ढालों पर सिल्वर फ्रूट, स्प्रूस, देवदार, बर्च, लार्च, चीड़ आदि वृक्ष मिलते हैं। यहाँ पर अनेक प्रकार के जड़ी-बूटी, कच्चा माल एवं वन्य प्राणियों का आजायबघर है। इन सब उत्पाद से हमारे आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है।

         यहाँ वैसे-वैसे जड़ी-बूटी मिलते है जो शायद ही दूनियाँ में कहीं मिल सके। ऐसे जड़ी-बूटी का उपयोग आज के प्रचलित दवा में मिश्रित कर के हो रहा है। यहाँ अनेक प्रकार के वन्य जीव देखने को मिलते हैं और उन्हें आजायबघर में रखा जाता है लोग इसे देखते है।

(7) बाहरी हिमालय श्रेणी पर असम से लेकर हिमाचल प्रदेश तक चाय और फल की खेती होती है। दार्जीलिंग असम के चाय के कहने क्या है? यहाँ के लोगों के जीविका के मुख्य साधन में से एक है। यह चाय निर्यात किया जाता है जिससे भारत को काफी मात्रा में विदेशी मुद्रा अर्जित होता है।

        यहाँ फल की खेती में सेब, बादाम, अंगूर, चेरी, खूवानी, आडू, अखरोट, नाशपाती आदि की खेती होती है। चाय के बाद सेब, अंगूर, चेरी, पूरे भारतवर्ष को उपलब्ध कराता है। इससे भी आय होते हैं।

     इन क्षेत्र में जहाँ कहीं भी समतल भूमि मिल गई वहाँ चावल, गेहूँ, मिर्च, अदरक की खेती होती है। जिससे यहाँ के लोग अपने खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग करते है।

(8) यहाँ पर पेट्रोलियम, सीसा, ताँबा, निकिल, जस्ता, चाँदी, सोना, टंगस्टन, एंटीमनी, मैग्नेसाइट, चूना-पत्थर, बहुमूल्य-पत्थर, रत्न भंडार आदि खनिज पदार्थ के मिलने से इन पर्वतों का आर्थिक महत्व और भी बढ़ गया है। असम में खनिज तेल, भूटान एवं सिक्किम में ताम्बा अयस्क व कोयले के भण्डार पाये गये है।

         यहाँ की जो खनिज की क्षमता है वह भी हिमालय की विशेषता को ही बताता है। इन खनिज की उपलब्धता से भारत दुनिया में अपना सर उठा कर बात करता है। इन खनिज के निष्कासन के लिए बड़ी संख्या में लोगों की आवश्यकता पड़ती है जिससे रोजगार की खाली होती संभावना को यह क्षेत्र पुर्ण करता है। इन खनिज उत्पाद से भारत तरह-तरह के समान बनाता है। अपना आवश्यकता पूरा करता है और अधिशेष को निर्यात कर विदेशी मुद्रा भी अर्जित करता है।

(9) हिमालय से निकलने वाली नदियों के मार्गों में पड़ने वाले जल-प्रपातो से सस्ती जल-विद्युत उत्पन्न की जाती है। सतलज पर भाखड़ा नांगल बाँध परियोजना अंतर्गत बाँध बनाकर जल विद्युत उत्पादन किया जाता है जिससे हमें विद्युत आपूर्ति होती है। इससे बड़ी मात्रा में कोयले का जलना बंद हो जाता है। सीमित संसाधन के वचाव का एक तरीका इन नदियों की उपस्थिति से ही संभव है।

      टोंस, शारदा, गंडक, कोसी आदि नदियों का उपयोग भी जलशक्ति उत्पादन के लिए किया गया है।

    अतः हम कह सकते है कि हिमालय भारत की रक्षा के लिए वचनबद्ध है। रक्षा के साथ-साथ आर्थिक उपयोगिता दर्शाते हुए भारतवर्ष विकास के किए तत्पर है। हमें आवश्यकता है सही तकनीक दृष्टि डालकर उपयोग करने का।


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9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

9. हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश


हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

            हिमालय एक नवीन मोड़दार पर्वत है जो भारत के उत्तर में एक चाप के रूप में अवस्थित है। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज/दर्रा से लेकर  ब्रह्मपुत्र गॉर्ज(नामचा बरबा) के मध्य हुआ है। इसकी लम्बाई लगभग 2500Km है। कश्मीर में इसकी चौड़ाई सबसे अधिक (450Km) और अरुणाचल प्रदेश में इसकी चौड़ाई सबसे कम (150 Km ) है। इस पर्वत में विश्व की कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। ये चोटियाँ सालोंभर हिम से आच्छादित रहती है। इसलिए इसे हिमालय कहते हैं।

          हिमालय का निर्माण अल्पाइन भूसंचलन से तृतीयक काल में हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इसमें तीन प्रमुख श्रृंखलाएँ मिलती हैं। लेकिन पश्चिम से पूर्व की ओर जाने पर स्थलाकृतिक विशेषता के आधार पर इसे चार भागों में वर्गीकृत करते हैं। जैसे-

(1) पंजाब हिमालय / कश्मीर हिमालय / हिमाचल हिमालय

(2) कुमायूँ हिमालय

(3) नेपाल हिमालय

(4) असम हिमालय

हिमालय के स्थलाकृतिक

चित्र: हिमालय के स्थलाकृतिक प्रदेश

(1) पंजाब हिमालय:- 

        इसे “कश्मीर हिमालय” हिमालय भी कहते हैं। इसका विस्तार सिन्धु गॉर्ज से लेकर सतलज गॉर्ज (शिपकिला दर्रा) के मध्य हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 560 Km है। यह हिमालय का सबसे चौ० भाग है। चौड़ा होने का प्रमुख कारण हिमालय के साथ-2 ट्रांस हिमालय का पाया जाना है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर क्रमश: काराकोरम, जास्कर श्रेणी, महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय पायी जाती है।

             लघु हिमालय को कश्मीर में पीरपंजाल के नाम से जानते हैं। कश्मीर हिमालय अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस हिमालय में कई क्षेत्रीय विशेषताएं भी पायी जाती हैं। जैसे- ट्रांस हिमालय का निर्माण मुख्य हिमालय के निर्माण से पहले हुआ है। ट्राँस हिमालय पर सालोभर बर्फ, जमी रहती है। हिमानी के अपरदन से सीढ़ीनुमा स्थलाकृति का विकास हुआ है। यह पूर्णत शीतोष्ण अर्द्धमरुस्थल का भूदृश्य प्रस्तुत करता है।

            कश्मीर हिमालय में अवस्थित सभी श्रृंखलाओं का उत्तरी ढाल मंद और दक्षिणी ढाल तीव्र है। महान हिमालय और लघु हिमालय के बीच में कश्मीर की घाटी अवस्थित है जिसमें डल वुलर झील से होकर झेलम नदी प्रवाहित होती है। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मुलायम घास के क्षेत्र मिलते हैं जिसे सोनमर्ग  और गुलमर्ग कहते हैं। पीरपंजाल हिमालय पूर्णतिः वनस्पतियों, जंगलों से ढका हुआ है। इसी पर्वत में पीरपंजाल दर्रा पायी जाती है जिस दर्रे से होकर कुलगाँव से कोठी पहुंचा जाता है।

            बनिहाल दर्रे जम्मू को श्री नगर से जोड़ता है। इसी दर्रा में जवाहर सुरंग का निर्माण किया गया है। महान हिमालय में बुर्जिला और जोजिला जैसे प्रमुख दर्रे मिलते हैं। ट्रांस हिमालय और महान हिमालय में कई हिमानी का प्रमाण मिलता है। जैसे-  काराकोरम श्रेणी का सियाचीन हिमानी सबसे प्रमुख हैं।

(2) कुमायूँ हिमालय:-

        इसका विस्तार सतलज गॉर्ज से लेकर काली नदी के बीच हुआ है। इसका विस्तार हिमाचल प्रदेश और उतराखण्ड में देखा जा सकता है। इसकी लम्बाई मात्र 320Km है। यह हिमालय का सबसे कम लम्बाई वाला हिस्सा है। यहाँ पर महान हिमालय, लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय तीनों स्पष्ट रूप से पायी जाती है। महान हिमालय में माना और नीति दो प्रसिद्ध कॉल पाये जाते हैं। इसके अलावे नदियों के द्वारा निर्मित कई दर्रे पाये जाते हैं। जैसे थागला दर्रा, लिपुलेख, पिथौरागढ़ दर्रा सबसे प्रमुख है। महान हिमालय में यमुनोत्री, गंगोत्री, मिलाम, पिण्डारी जैसे प्रसिद्ध हिमानी पाले जाते हैं।

          कुमायूँ हिमालय में नंदादेवी (7817m) और कामेट (7756m) जैसे ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिणी ढाल पर मिलने वाले वनस्पति को बुग्याल और पैय्यार कहते हैं। लघु हिमालय को इस क्षेत्र में धौलाधर, मसूरी पहाड़ी और कुमायूँ पहाड़ी के नाम से भी जानते हैं। लघु हिमालय पर नैनीताल, मसूरी, अल्मोड़ा जैसे प्रसिद्ध पर्यटक स्थल पायी जाती है। लघु हिमालय के दक्षिण से शिवालिक हिमालय अवस्थित है जिसकी ऊँचाई बहुत कम है।

         लघु हिमालय और शिवालिक हिमालय के बीच में मिलने वाले घाटी को दून के नाम से पुकारते हैं जिसमें ‘देहरादून की घाटी’ सबसे प्रसिद्ध है। यह अनुदैर्ध्य घाटी का अच्छा उदाहरण है। पीरपंजाल और धौलाधर पर्वत एक ही क्रम में स्थित है। इन दोनों के बीच में कुल्लू और मनाली की घाटी अवस्थित है जो अनुप्रस्थ घाटी का उदहारण है।

नोट: नन्दादेवी (7817m) कुमायूँ हिमालय की सर्वोच्च चोटी है। गंगा और यमुना नदी कुमायूँ हिमालय से ही निकलती है।

(3) नेपाल हिमालय:-

            इसका विस्तार नेपाल और सिक्कीम में काली नदी से तिस्ता नदी के बीच में हुआ है। यह हिमालय का सबसे लम्बा भाग है जिसकी लम्बाई 800km है। इसमें भी हिमालय की तीनों श्रृंखलाएँ स्पष्ट रूप से पायी जाती हैं। महान हिमालय के दक्षिण में तिब्बत का पठार स्थित है। महान हिमालय के दक्षिण में लघु हिमालय स्थित है। जिसे महाभारत श्रेणी के नाम से जानते हैं।

             महान हिमालय और महाभारत श्रेणी के बीच में काठमाण्डु की घाटी अवस्थित है। जो अनुद्धैर्य घाटी का एक उदा० प्रस्तुत करता है। इन क्षेत्र में महान हिमालय पर कई ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती हैं। जैसे- माउण्ट एवरेस्ट (8850m), कंचनजंघा (8598m) इत्यादि। ये क्रमश: हिमालय के प्रथम एवं द्वितीय सबसे ऊँची चोटियाँ हैं। इसके अलावे धौलागिरी, अन्नापूर्णा, मनसालू, गौरीशंकर और मकालू जैसे भी ऊँची-2 चोटियाँ पायी जाती है।

            मध्य हिमालय के दक्षिण में शिवालिक हिमालय स्थित है। अपरदन क्रिया के कारण इसकी ऊँचाई बहुत कम हो चुकी है। यह एक विखण्डित श्रृंखला है। नेपाल और बिहार के सीमा पर शिवालिक पर्वत को ही ‘सोमेश्वर की पहाड़ी’ (874- मी0) कहते हैं। 

(4) असम हिमालय:-

           इसका विस्तार असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान में हुआ है। इसका सीमांकन तिस्ता नदी से नामचा बरबा गॉर्ज के बीच किया जाता है। इसकी इसकी लम्बाई 750 km है। यहाँ महान हिमालय लगभग 9 महीने तक बर्फ से शिवालिक ढका रहता है और मध्य हिमालय ही पायी जाती है। यहाँ शिवालिक हिमालय की श्रृंखला विलुप्त हो चुकी है। लघु हिमालय को मिश्मी और डाफला नाम से जानते हैं। लघु हिमालय यहाँ पर कई भागों में विभक्त हो चुकी है। लघु हिमालय के दक्षिण में धँसान क्रिया के फलस्वरूप ब्रह्मपुत्र रेम्प घाटी का विकास हुआ है।

निष्कर्ष

      इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय की प्रत्येक स्थलाकृतिक प्रदेश अपने-2 विशिष्ट लक्षणों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस प्रदेश में मानवीय हस्तक्षेप के कारण भू-दृश्य में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। अतः आवश्यकता है कि इस प्रदेश के भूदृश्य को विश्व धरोहर में शामिल कर इसे अक्षुण्ण बनाये रखा जाए।

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय को स्थलाकृतिक प्रदेशों में विभक्त कीजिए और प्रत्येक प्रदेश के विशिष्ट लक्षणों का वर्णन कीजिए।

11. गंगा का मैदान

11. गंगा का मैदान


गंगा का मैदान

          गंगा भारत की सबसे प्रमुख नदी है जो गंगोत्री हिमानी से निकलती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। गंगा हरिद्वार के पास मैदानी क्षेत्र में प्रविष्ट करती है। और उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और बांगलादेश से होते हुए बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। गंगा नदी की कई सहायक नदियाँ हैं जो हिमालय और प्रायद्वीपीय भारत से आकर गंगा नदी में मिल जाती है। गंगा का मैदान मूलतः जलोढ़ मिट्टी के निक्षेपण से बना है। इस मैदान में जलोढ़ मिट्टी की गहराई 20oo m है।

          बुर्राड के अनुसार इस मैदान का निर्माण रिफ्ट घाटी में मलवा के निक्षेपण से हुआ है। यह मान्यता आज भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्थानीय स्तर पर यह मैदान कई भागों में बँटा है। जैसे:-

उत्तरी गंगा का मैदान

(1) रोहिल खण्ड का मैदान

(2) अवध का मैदान

(3) गोरखपुर-देवरिया का मैदान

(4) मिथलांचल के मैदान के रूप में विभक्त है।

         जबकि दक्षिणी गंगा का मैदान–

(1) बुंदेलखण्ड

(2) इलाहाबाद

(3) भोजपुर

(4) मगध और

(5) अंग के मैदान के रूप विभक्त है।

            भूगोलवेताओं ने गंगा के मैदान को प्रादेशिक स्तर पर तीन भागों में वर्गीकृत करके अध्ययन करने का प्रयास किया है।:-
(1) ऊपरी गंगा का मैदान

(2) मध्य गंगा का मैदान

(3) निम्न गंगा का मैदानगंगा का मैदान(1) ऊपरी गंगा का मैदान

          इसका विस्तार पश्चिम में अरावली पर्वत से लेकर पूरब में इलाहाबाद तक हुआ है। इस मैदान में उत्तर से दक्षिण की ओर गंगा और यमुना नदी प्रवाहित होती है जबकि दक्षिण से उत्तर की ओर और पुनः पश्चिम से पूरब की ओर चम्बल नदी प्रवाहित होती है। इस मैदान के उत्तर में भावर, बाँगर, तराई जैसी संरचनाएँ मिलती है। जबकि दक्षिणी भाग में उत्खात भूमि का निर्माण करता है। यह क्षेत्र पश्चिम उत्तर प्रदेश का भाग है। उपजाऊ मिट्टी का क्षेत्र होने के कारण यह क्षेत्र अन्न भण्डार के रूप में प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र की सबसे प्रमुख आर्थिक गतिविधि कृषि कार्य हैं। गंगा और यमुना के दोआब क्षेत्र सदियों से कृषि के लिए प्रसिद्ध रही है।

(2) मध्य गंगा का मैदान

         इसका विस्तार इलाहाबाद से राजमहल की पहाड़ी तक हुई है। पूर्वी उतर प्रदेश और संपूर्ण बिहार मध्य गंगा के मैदान में स्थित है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 50-100 m तक है। इस क्षेत्र में नदियाँ मोड़ लेकर प्रवाहित होती है जिसके कारण नदियों के किनारे पर गोखुर झील का निर्माण होती है। जगह-2 पर दियारा क्षेत्र का विकास हुआ है। मध्य गंगा के मैदान में पटना सिटी के पास जल्ला क्षेत्र का विकास हुआ है। पुन: बाढ़ से मोकामा के बीच में टाल क्षेत्र का विकास हुआ है। 

        कोशी, बागमती, गण्डक जैसी नदियाँ हमेशा मार्ग बदलने के लिए प्रसिद्ध है। इन नदियों के पुराने मार्गों को चौर कहा जाता है। उत्तर बिहार के लोग मछली पालन, तालमखाना की खेती करते हैं।

           मध्य गंगा का मैदान कृषि के लिए प्रसिद्ध है। नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र में धान की खेती की जाती है। तराई वाले क्षेत्र में गन्ना की खेती की जाती है। गंगा नदी के उत्तरी किनारे पर केला, परबल, तरबूज, खीरा, ककड़ी इत्यादि की खेती की जाती है। पुन: चौर क्षेत्र में मछली और तालमखाना की खेती होती है। पुर्णिया, कटिहार, किशनगंज के क्षेत्र जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। मध्यवर्ती गंगा के मैदान का दक्षिणी भाग चावल, गेहूँ, दलहन, तेलहन, सब्जी इत्यादि के उत्पादन हेतु प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में बरौनी एक मात्र औद्योगिक नगर

(3) निम्नगंगा का मैदान

          इसका विस्तार राजमहल की पहाड़ी से गंगा-ब्रह्मपुत्र के डेल्टा तक हुआ है। इस मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण की ओर है। यह मूलत: पश्चिम बंगाल और बांगलादेश में विस्तृत है। इस मैदान का ऊपरी भाग ‘बारिन्द क्षेत्र’ के नाम से जाना जाता है। जबकि इसका दक्षिण भाग डेल्टा के लिए प्रसिद्ध है। इसी मैदान में विश्व का सबसे बड़ा गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा स्थित है। इसका निर्माण खादर मिट्टी के निक्षेपण से हुआ है। इस क्षेत्र में नदियाँ कई वितरिकाओं (शाखाओं) में बँटकर प्रवाहित होती है। समुद्री ज्वार के कारण डेल्टाई क्षेत्रों में दलदली भूमि का भी विकास हुआ है।

        निम्नगंगा के मैदान आर्थिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। जैसे डेल्टाई क्षेत्र मैंग्रोव/ सुन्दरवन / ज्वारीय वनस्पति के लिए प्रसिद्ध है। इसमें सुंदरी, बेंत इत्यादि वृक्ष बड़े पैमाने पर मिलते हैं। हुगली नदी घाटी के किनारे वाला भाग जूट उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध है जबकि शेष भाग चावल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पुन: इस मैदान का ऊपरी क्षेत्र (दार्जलिंग वाला क्षेत्र) उत्तम किस्म के चाय बाँस उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

निष्कर्ष:

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि भारत के उत्तर में अवस्थित गंगा का मैदान अपने विशिष्ट भौतिक एवं आर्थिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है।

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास

17. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास



हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास 

        कई पर्वत निर्माणकारी भूसंचलन के कारण प्राचीन टेथिस सागर में नदियों के द्वारा लाकर मलवा जमा किये जाने तथा उनमें पड़े वलन की क्रिया से हिमालय जैसे पर्वत का निर्माण हुआ है। भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय पर्वत का निर्माण केनोजोइक महाकल्प के तृतीयक काल में हुए अल्पाइन भूसंचलन से हुआ है। पुन: भूवैज्ञानिकों के अनुसार ओलीगोसीन में महान हिमालय, मायोसीन में मध्य हिमालय तया प्लायोसीन एवं प्लीस्टोसीन कल्प में शिवालिक हिमालय का निर्माण हुआ।

       हिमालय पर्वतीय क्षेत्र के उत्पान और विकास का स्पष्ट प्रभाव नदी के प्रतिरूप पर पड़ा है। जैसे:-   

    कई प्रसिद्ध भूवैज्ञानिकों का मत है कि तृतीयक काल में लघु हिमालय के दक्षिण में उसके समानान्तर एक विशालकाय नदी थी जो पूरब से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती थी। यह नदी उत्तर-पश्चिम भारत में जाकर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर मुड़ जाती थी। पैस्को और पिल्ग्रीम जैसे भूगोलवेताओं ने इस प्राचीन नदी का नाम शिवालिक नदी या ‘इण्डो ब्रह्मा नदी’ दिया है।

       जब इस नदी में हिमालय के नदियों द्वारा मलवा का लगातार निक्षेपण होता रहा तो इसकी तली में दबाव की क्रिया के कारण इस मलवा में पुन: उत्थान की क्रिया सम्पन्न हुई। इस उत्थान से शिवालिक नदी का जल ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने से कई अनुवर्ती नदियों का जन्म हुआ। ये नदियाँ काफी छोटी-2 हैं और मे उत्तर भारत की मुख्य नदियों की सहायक नदी के रूप में प्रवाहित होती है।

       सिन्धु, सतलज, कोसी और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियाँ पूर्ववर्ती नदी के उदाहरण है। पूर्ववर्ती नदी तात्पर्य वैसे नदी से है जिसका निर्माण किसी भी प्रदेश के उत्थान के पूर्व से ही नदी की प्रवाह जारी है। उपरोक्त पूर्ववर्ती नदी के बारे में भूवैज्ञानिकों का मत है कि हिमालय के उत्थान का दर नदी के अपरदन के दर से कम था जिसके कारण उपरोक्त पूर्ववर्ती नदियों ने हिमालय पर्वत को जगह-2 पर अपरदित करके गहरे गॉर्ज और दर्रों का निर्माण की हैं।

         जैसे- सिन्धु नदी नंगा पर्वत के पास काटकर विश्व का सबसे गहरा गॉर्ज सिन्धु गॉर्ज 5200 मी० गहरा का निर्माण करती है। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी नामचा बरबा के पास गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है। सतलज नदी महान हिमालय को काटकर शिपकीला दर्रा का निर्माण करती है।

        शिवालिक पर्वतीय क्षेत्र के दक्षिण में ‘बोल्डर क्ले’ के जमाव से भावर प्रदेश का विकास हुआ है। इसका निर्माण की प्रक्रिया भी हिमालय के विकास से जुड़ा हुआ है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ जब भावर प्रदेश से गुजरती हैं तो मे विलुप्त हो जाती है जिससे ‘खण्डित अपवाह तंत्र’ का निर्माण करती है। पुनः ये नदियाँ मैदानी क्षेत्र में दृष्टिगत होने लगती है और ढाल के अनुरूप प्रवाहित होने की प्रवृति रखती हैं जिसके कारण “समानान्तर प्रतिरूप” का विकास करती हैं। पुनः हिमालय से निकलने वाली नदियाँ समुद्र में मिलने से पहले कई वितरिकाओं में विभक्त हो जाती है जिससे गुंफिट या जालीदार प्रतिरूप का विकास होता है।

         हिमालय पर्वत का अक्ष एक चाप के समान है जो पूरब से पश्चिम दिशा की ओर स्थित है। हिमालय पर्वत की दक्षिणी ढाल तीव्र और उत्तरी ढाल मंद है। वलन की क्रिया से हिमालय पर्वत में कई अनुप्रस्थ एवं अनुद्धैर्य घाटियों का विकास हुआ है। अनुद्धैर्य घाटियों से होते हुए नदियाँ प्रवाहित होती थीं लेकिन जब हिमालय का विकास या उत्थान होने लगा तो अनुद्धैर्य घाटियों में प्रवाहित होने वाली जल प्रवाह बाधित हो गई, जिसके कारण इन अनुद्धैर्य घाटियों में कई बड़े-2 झीलों का निर्माण हुआ।

          इन झीलों में जब जल की मात्रा अधिक हो गई तो पहाड़ों के ऊपर से प्रवाहित होने लगी। जिसके फलस्वरूप बहते हुए जल से कई स्थानों पर हिमालय पर्वत को काटकर अनुप्रस्थ घाटियों का निर्माण कर ली। इन संपूर्ण परिघटना से हिमालय पर्वतीय क्षेत्रों में समान आयताकार अपवाह तंत्र का विकास हुआ है। जैसे- कोसी नदी अपने उद्‌गम क्षेत्र में आयताकार प्रतिरूप का निर्माण करती है।

        हिमालय के उत्थान के पूर्व कई ऐसी नदियाँ थी जो भिन्न-2 दिशाओं से आकर टेथिस सागर में आकर गिरती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के बाद बड़ी-बड़ी नदियों ने छोटी-2 नदियों के जल को अपहरण कर लिया जिससे क्रमहीन अपवाह तंत्र का विकास हुआ। जैसे- ब्रह्मपुत्र नदी ने लोहित एवं दिवांग नदी के जल को अपहृत कर ‘क्रमहीन अपवाह तंत्र’ का विकास किया है।

       भूगर्भशास्त्रियों का अनुमान है कि प्राचीन काल में सतलज और यमुनी नदी राजस्थान से होकर बहती थी। पुन: सरस्वती नामक पौराणिक नदी प्रयागराज के पास आकर गंगा से मिलती थी। लेकिन हिमालय के उत्थान के दौरान उ०-प० भारत में हुए उत्थान से सतलज नदी का अपवाह क्षेत्र खिसक कर उ०-प० की तरफ चला गया और सरस्वती एवं यमुना नदी आपस में मिलकर एक नदी के रूप में प्रवाहित होकर मिलने लगी। इस तरह हिमालय के उत्थान एवं विकास से उ०-प० भारत के नदी तंत्र में कई परिवर्तन हुए।

निष्कर्ष

     उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि हिमालय से निकलने वाली नदियों के ऊपर हिमालय के उत्थान एवं विकास का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। यही कारण है कि हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में नदी के अनेक प्रतिरूप दिखाई देते है।

हिमालय के विकास के संदर्भ

चित्र: हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास

प्रश्न प्रारूप

1. हिमालय के विकास के संदर्भ में जल प्रवाह प्रतिरूप/विन्यास की विवेचना करें।

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

13. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य



प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य

        दक्षिण भारत को प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है क्योंकि इसके तीन ओर से समुद्र का विस्तार हुआ है। जैसे- पश्चिम में अरब सागर, पूरब में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर अवस्थित है। प्रायद्वीपीय भारत के किनारे-2 तटीय मैदान का विस्तार हुआ है। सम्पूर्ण प्रायद्वीपीय भारत का क्षेत्रफल 7 लाख वर्ग किमी. है। इसका आकार एक त्रिभुज के समान है। यह 1600 किमी० हिन्द महासागर में प्रक्षेपित है। इसका औसत ऊँचाई 300-750 मी० मानी गयी है।

          प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में अरावली, विन्ध्याचल, राजमहल, गारो, खाँसी, जयन्तिया की पहाड़ी सीमा का निर्माण करती है। जबकि पश्चिमी सीमा का निर्माण पश्चिमी घाट और पूर्वी सीमा का निर्माण पूर्वी घाट करती हैं। ये दोनों श्रृंखलाएँ दक्षिण की ओर मिलकर नीलगिरि के पास में एक त्रिभुज का आकार दे देती है। प्रायद्वीपीय भारत पर कई छोटी-2 पर्वतीय श्रृंखलाएँ मिलती है। इन श्रृंखलाओं ने प्रायद्वीपीय भारत को कई छोटे-2 पठारों में विभक्त कर दिया है। इसलिए इसे “पठारों का पठार” भी कहा जाता है। प्रायद्वीपीय पठार प्राचीनतम गोंडवाना भूखण्ड का एक भाग है। इसके गर्भ में आज भी पेन्जिया के समकालीन चट्टानें पायी जाती हैं।

        प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच और भूदृश्य का अध्ययन नीचे के दो शीर्षकों में किया जा रहा है। 

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

(2) प्रायद्वीपीय भारत के पठार

(1) प्रायद्वीपीय भारत के पर्वत

         प्रायद्वीपीय भारत में छोटी-बड़ी कई पर्वतीय श्रंखलाएँ मिलती है। जैसे-

(i) पश्चिमी घाट-

       यह प्रायद्वीपीय भारत के पश्चिमी किनारे पर अवस्थित है। यह अरब सागर के समानान्तर लेकिन तट से दूर स्थित है। लेकिन कर्नाटक में यह श्रृंखला समुद्र के नजदीक आ जाती है। इसका विस्तार उत्तर में ताप्ती नदी के मुहाना से दक्षिण में कन्याकुमारी तक हुआ है। इसकी कुल लम्बाई 1600 किमी० है। इसकी औसत ऊँचाई 915 मी० है। पश्चिमी घाट को कई छोटे-2 भागों में विभक्त कर उसके भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

       ताप्ती नदी से लेकर 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट को सह्याद्री पर्वत कहते है जिसकी सबसे ऊँची चोटी कालसुबाई (1646 मी०) है। 

    16º उतरी अक्षांश के दक्षिण वाले भाग की सबसे ऊँची चोटी कुद्रेमुख (1892 मी०) है। पश्चिमी घाट के तीसरी शाखा का प्रारंभ नीलगिरि से होता है क्योंकि यहाँ पश्चिमी एवं पूर्वी घाट आपस में आकर मिल जाती है।

     ताप्ती से 16º उत्तरी अक्षांश के बीच स्थित पश्चिमी घाट पर्वत के ऊपर बैसाल्ट चट्टान या लावा उदगार का प्रमाण मिलता है। इसमें थालघाट और भोरघाट दो प्रसिद्ध दर्रे है। गोदावरी और कृष्णा नदी का क्षेत्र में उद्‌गम स्थल पाया जाता है। इस क्षेत्र में स्थित पहाड़ का एक भाग धँसकर भ्रंशोत्थ/ब्लाँक पर्वत का निर्माण करता हैं।

      16º उत्तरी अक्षांश से नीलगिरि पहाड़ी तक अवस्थित पश्चिमी घाट की ऊँचाई बहुत अधिक है। लेकिन इसका पश्चिमी ढाल अधिक तीव्र है जबकि पूर्वी ढाल मंद है।

       पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट के मिलने से एक गाँठ का निर्माण होता है जिसे नीलगिरी कहते हैं। नीलगिरि की सबसे ऊँची चोटी दोदाबेटा (2636 मी०) है। इसी पहाड़ी पर ऊपर बहुत ही प्रसिद्ध पर्यटक स्थल ऊँटी (उटकमण्डलम्) है।

       नीलगिरि के दक्षिण में क्रमश: अन्नामल्लई, कार्डमम, नागर कोयल और स्वामी विवेकानन्द रॉक अवस्थित है। इसे सम्मिलित रूप से दक्षिण की पहाड़ी के रूप में सम्बोधित करते हैं। अन्नामलाई की सबसे ऊँची चोटी अन्नाईमुडी (2695 मी०) है। अन्नामलाई के उत्तर-पूर्व में पालिनी पर्वत श्रृंखला है जिस पर कोडाईकनाल नामक पर्वतीय नगर अवस्थित है।

         नीलगिरि और अन्नामलाई के बीच में पाल नायक दर्रा स्थित है जो किसी प्राचीन नदी के अपरदन द्वारा निर्मित है। इसी तरह अन्नामलई और कार्डमम पहाड़ी के बीच में शेनकोटा दर्रा अवस्थित है। शेनकोट दर्रा के दक्षिण में पहाड़ियों की ऊँचाई बहुत कम हो जाती है और अन्ततः हिन्द महासागर में प्रक्षेपित हो जाती है। इसका अन्तिम बिन्दु स्वामी विवेकानन्द रॉक कहलाता है।

(ii) पूर्वीघाट

        पूर्वी घाट प्रायद्वीपीय भारत के पूर्वी तट के समानान्तर उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर फैला है। यह तट से 200-400 किमी० अन्दर अवस्थित है। इस पर्वत का निर्माण कुडप्पा संरचना से हुआ है। इसमें डोलोमाइट, खोंडोलाइट, चर्कोनाइट जैसे खनिजों से निर्मित चट्टान पाए जाते हैं।

       यह एक विखण्डित श्रृंखला है क्योंकि इसे महानदी, गोदावरी, कृष्णा जैसी नदियों ने जगह-2 पर काट डाला है। पूर्वी घाट की औसत ऊँचाई 900 मी० मानी जाती है। पूर्वी घाट को मूलतः तीन भागों में बाँटकर भूदृश्य का अध्ययन करते हैं। जैसे:-

(a) धुर उत्तरी भाग-

      यह महानदी के उत्तर में अवस्थित है। उड़ीसा के मयूरभंज में इसका विस्तार सर्वाधिक हुआ है। उत्तर से दक्षिण की ओर जाने पर इस भाग में कई पर्वतीय चोटी मिलती है। जैसे- मलयगिरि (1187 मी०), मेघासनी (1165 मी०), गन्धमार्तन (1160 मी०) इत्यादि। उड़ीसा में अवस्थित सम्मिलित पर्वतीय श्रृंखला को ‘मलयास्क’ के नाम से जानते हैं।

      उड़ीसा और आन्ध्रप्रदेश में पूर्वी समुद्रतट के समानांतर पूर्वी घाट उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम की ओर मुड़ जाती है। इन क्षेत्र में पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी महेन्द्रगिरि (1501 मी०) अवस्थित है। गोदावरी नदी पूर्वी घाट को काटकर गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है।

(b) मध्यवर्ती श्रृंखला- 

       कृष्णा नदी से लेकर पेलार नदी के बीच स्थित पूर्वीघाट श्रृंखला को मध्यवर्ती श्रृंखला कहते हैं। इनमें नालामाला, पालकोंडा, वेलीकोंडा श्रृंखला प्रमुख हैं। पालकोंडा और वेलीकोंडा पहाड़ी के मध्य भाग से पनेरू नदी प्रवाहित होती है।

(c) तमिलनाडु श्रृंखला-

        पूर्वीघाट को तमिलनाडु में जावदी, गिंजी, शिवराय पहाड़ी के नाम से जानते हैं। ये सभी श्रृंखलाएँ एक-दूसरे से पृथक-2 हैं।

      पूर्वी घाट और पश्चिमी घाट बीच-2 में आपस में जुड़े हुए हैं। जैसे- मुम्बई और हैदराबाद के बीच हरिचन्द्र पर्वत और बालाघाट पर्वत स्थित है और बंगलोर के पास बाबाबुदन तथा श्रीसैलम पहाड़ी से जुड़ी हैं।

अरावली पर्वत

       अरावली पर्वत राजस्थान में द०-प० से उ०-पू० दिशा में अवस्थित है। इसका विस्तार गुजरात के सीमा से लेकर दिल्ली तक हुआ है। दिल्ली में अरावली पर्वत को ‘दिल्ली कटक’ के नाम से जानते हैं। हिमालय और अरावली पर्वत के बीच में एक गैप है जिसे अम्बाला गैप कहते हैं। अरावली न सिर्फ भारत की बल्कि विश्व की सबसे पुरानी पर्वत है। यह कभी विश्व का सबसे लम्बा वलित पर्वत हुआ करता था लेकिन अब अवशिष्ट पहाड़ी के रूप में बदल चुका है। इसकी सबसे ऊँची चोटी गुरुशिखर (1722 मी०) है जो राजस्थान के सिरोही जिला में माउण्ट आबू के पास स्थित है।

         अरावली की लम्बाई 800 किमी० और औरत ऊँचाई 700-900 मी० मानी जाती है। अरावली में कई दर्रे भी मिलते हैं जिसमें पिपलीघाट, देवारी, बेसूर दर्रा सबसे प्रमुख हैं। इसके गर्भ में कई खनिज पाये जाते हैं। इसलिए इसे राजस्थान के ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के कारण कई स्थानों पर यह विखण्डित हो चुकी है। लेकिन दक्षिण-पश्चिम अरावली पर्वतीय भाग की ऊँचाई आज भी पर्याप्त है।

सतपुड़ा पर्वत

      सतपुड़ा एक ब्लॉक पर्वत है जो नर्मदा और ताप्ती भ्रंश घाटी के बीच अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 900-1100 मी० है। सतपुड़ा श्रृंखला के पूरब में महादेव, मैकाल, रामगढ़ और गढ़‌जात की पहाड़ी अवस्थित है। सतपुड़ा की सबसे ऊँची चोटी धूपगढ़ (1350 मी०) है। जबकि मैकाल की सबसे ऊँची चोटी अमरकंटक (1127 मी०) है। मैकाल पर ही पंचमढ़ी नामक पर्वतीय पर्यटक नगर अवस्थित है। सतपुड़ा पर्वत के समान्तर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिला में अजन्ता की पहाड़ी और नागपुर में गाविलगढ़ की पहाड़ी स्थित है।

विन्ध्यन पर्वत

        विन्ध्यन पर्वत प्रायद्वीपीय भारत के उत्तरी सीमा का निर्माण करती है। यह नर्मदा नदी के उत्तर में स्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-700 मी० है। इस पर्वत का उत्तरी ढाल भ्रंशन  क्रिया से बना है जिसके कारण उत्तरी भाग का ढाल तीव्र है जबकि दक्षिणी भाग का ढाल मंद है। इसका विस्तार गुजरात की सीमा से लेकर बिहार के गंगा नदी तक हुआ है। पश्चिम से पूरब की ओर जाने पर इसे क्रमश: विन्ध्यन पर्वत, भारनेर पर्वत, कैमूर की पहाड़ी, बराबर की पहाड़ी और खड़‌गपुर की पहाड़ी के नाम जानते हैं।

राजमहल की पहाड़ी

      राजमहल की पहाड़ी बिहार और झारखण्ड की सीमा पर भागलपुर के पास अवस्थित है। इसकी औसत ऊँचाई 500-7oo मी० है। यह उत्तर से दक्षिण दिशा में फैला हुआ है। राजमहल पहाड़ी के कारण गंगा नदी को भागलपुर के पास उत्तरायण होना पड़ता है। राजमहल की पहाड़ी पर जूरासिक काल में हुए लावा का प्रमाण मिलता है।

गारो, खांसी और जयंतिया की पहाड़ी

      ये मेघालय राज्य में पश्चिम से पूरब की ओर क्रमशः फैला हुआ है। गारो एक अलग पहाड़ी के रूप में अवस्थित है जबकि खाँसी और जयन्तिया आपस में जुड़े हुए हैं। जयन्तिया पहाड़ी से एक भाग पृथक होकर काफी पूरब की ओर चला गया है जिसे मिकिर की पहाड़ी कहते हैं जो असम में अवस्थित है। गारो, खाँसी जयन्तियाँ की सबसे ऊँची चोटी नॉरकेक है जो गारो पहाड़ी पर स्थित है। लेकिन औसत ऊँचाई के दृष्टिकोण से जयन्तिया की पहाड़ी सबसे ऊँची है। जबकि गारो पहाड़ी सबसे नीची है।

प्रश्न प्रारूप

1. प्रायद्वीपीय भारत के उच्चावच या भूदृश्य की विशेषता का चर्चा करें।

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