Archives May 2023

अध्याय-4 वायुमंडल एवं इसका संघटन

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-4 वायुमंडल एवं इसका संघटन


वायुमंडल एवं इसका संघटन

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुनें।

(1) पृथ्वी की सतह से ऊपर की ओर जाने पर साँस लेना कठिन होता है क्योंकि-

(क) वातावरण में कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है।

(ख) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है।

(ग) वातावरण में नाइट्रोजन की मात्रा कम जाती हैं।

(घ) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम जाती है।

उत्तर- (घ) वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा कम जाती है।

(2) पहले कौन-सा भाग गर्म होता है?

(क) जल की सतह

(ग) पर्वतीय भाग

(ख) स्थल की सतह

(घ) वायुमंडल

उत्तर- (ग) पर्वतीय भाग

(3) वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा है-

(क) 25.42

(ख) 78.03

(ग) 20.99

(घ) 2

उत्तर- (ग) 20.99

(4) वायुमंडल की सबसे पहली परत है-

(क) समताप मंडल

(ख) क्षोभमंडल

(ग) वाह्यमंडल

(घ) मध्यमंडल

उत्तर- (ख) क्षोभमंडल

(5) रेडियो तरंगे किस परत से परावर्तित होकर पृथ्वी पर वापस लौटती हैं-

(क) क्षोभ मंडल

(ख) आयनमंडल

(ग) ओजोनमंडल

(घ) बर्हिमंडल

उत्तर- (ख) आयनमंडल

ii. रिक्त स्थानों को भरिए

1. समताप मंडल का आरंभ क्षोभ मंडल के बाद होता है।

2. बाह्यमंडल का फैलाव 80 से 400 किलोमीटर तक है।

3. हल्की गैसें बर्हिमंडल से अंतरिक्ष में तैरती रहती हैं।

4. वायुमंडल का विस्तार पृथ्वी की सतह से 1000 किलोमीटर की ऊँचाई तक है।

5. वायुमंडल में सबसे अधिक नाइट्रोजन गैस पाई जाती है।

6. तापमान बढ़ने से समुद्र के जल स्तर में वृद्धि हो रही है।

7. कार्बन डाइऑक्साइड गैस को ग्रीन हाउस गैस भी कहते हैं।

iii. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. वायुमंडल किसे कहते हैं? वायुमंडल के गैसों के घटक को वृत्त में दिखाइए।
उत्तर- धरातल से लेकर ऊपर कई सौ मीटर तक वायु पाई जाती है। अर्थात हमारी पृथ्वी के चरों ओर घिरी हुई वायु के आवरण को ही ‘वायुमंडल’ कहते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी हमेशा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती रहती है तो इसके साथ ही वायुमंडल भी चक्कर लगाते रहता है। एक खास ऊँचाई तक ही जहाँ हमारी नाक रहेगी वहाँ वायु भी रहेगी। वायुमंडल के गैसों के घटकों का वृत्त निम्नलिखित है-

वायुमंडल एवं इसका संघटन

पृथ्वी के वातावरण के इकाई आयतन में गैसों की मात्रा

2. ग्रीन हाउस को समझाइए।
उत्तर- ऐसा प्रक्रम जिससे ताप को ह्रासित होने से बचाया जा सके, उसे ग्रीन हाउस कहते हैं। बहुत ठण्डे देशों में प्लास्टिक या कांच के मकान बनाकर उसी में बगवानी की जाती है। ऐसे घर में ताप प्रवेश तो कर जाता है, लेकिन उससे निकल नहीं पाता। इसी तरह के मकान को ‘ग्रीन हाउस’ कहते हैं। ग्रीन हाउस के पौधों पर बाहरी आवो-हवा का असर नहीं पड़ता, जिससे वे सदा हरे-भरे रहते हैं। इसी से उसका नाम ‘ग्रीन हाउस’ रखा गया है।

वायुमंडल एवं इसका संघटन

ग्रीन हाउस

3. कार्बन डाइऑक्साइड भी जीवन के लिये जरूरी है। कैसे?
उत्तर- वैसे तो कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा एक सीमा से अधिक वृद्धि होने पर हारिकाकरक मानी जाती है, लेकिन यह जीवन के लिये जरूरी भी है क्योंकि पेड़-पौध ‘कार्बन डाइऑक्साइड’ से ही अपना भोजन बनाते हैं। सूर्य के प्रकाश में पेड़-पौध अपने हरे पत्तों द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग कर प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से अपना भोजन तैयार करते हैं। ये इस प्रक्रम में कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग तो कर ही लेते हैं, बदले में पर्याप्त ऑक्सीजन निकालते हैं जो जीव-जंतुओं के लिये प्राण वायु का काम करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि कार्बन डाइऑक्साइड भी जीवन के लिये बहुत ही जरूरी है।

4. वायुमंडल में पाई जाने वाली विभिन्न परतों के नाम लिखिए। मोटे कूट या थर्मोकोल की मदद से इन परतों को क्रमबद्ध दिखाइए।
उत्तर- वायुमंडल में नीचे से ऊपर पाई जानेवाली विभिन्न परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) क्षोभमंडल

(ख) समतापमंडल

(ग) मध्यमंडल

(घ) बाह्य मंडल/आयनमंडल 

(ड़) बर्हिमंडल।

         इस प्रकार पृथ्वी से सटे सबसे नीचे क्षोभमंडल है और सबसे ऊपर बर्हिमंडल है।
(नोट : प्रश्न के दूसरे भाग को छात्र स्वयं करें।)

5. किसी एक मंडल के न होने से क्या कठिनाइयाँ होंगी? लिखिए।
उत्तर- सभी मंडलों की अपनी-अपनी उपयोगिता है। एक मंडल के काम को कोई दूसरा मंडल नहीं कर सकता। अतः किसी एक मंडल के भी न रहने से सम्भव है जलवायु में भारी परिवर्तन हो जाय, जिससे मानव जीवन ही खतरे में पड़ जाय या इसका कोई क्रियाकलाप बाधित हो जाय। इस प्रकार यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता कि किस मंडल के नहीं रहने से क्या कठिनाई होगी। लेकिन यह निश्चित है कि कोई-न-कोई कठिनाइयाँ अवश्य ही होगी।

6. पृथ्वी पर तापमान बढ़ने से जीवन के लिये खतरा बढ़ता है। कैसे?
उत्तर- पृथ्वी पर तापमान बढ़ने से जीवन के लिये खतरा बढ़ता है, क्योंकि पृथ्वी पर तापमान के बढ़ने से पहाड़ों पर जमें बर्फ तो गलते ही हैं साथ में ध्रुवों के पास के बर्फ भी गलने लगते हैं। जिसके परिणामस्वरूप समुद्रों का जलस्तर बढ़ने लगता है जिससे समुद्रों के बीच बसे द्वीप पानी में डूब जाते हैं। वहाँ के लोगों को पलायन करना पड़ता है। गंगा नदी के डेल्टा के कुछ द्वीप पानी में विलीन हो चुके हैं। तटवर्ती निवासियों के जीवन पर खतरे की तलवार लटक रही है, कब उनका आवास समुद्र में समा जाएगा, कोई ठीक नहीं।

7. रेडियो और दूरदर्शन की तरंगें किन माध्यमों से हम तक पहुँचती हैं? पता कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी से प्रसारित रेडियो और दूरदर्शन की तरंग बाह्य मंडल से होकर पुन: पृथ्वी पर हमारे रेडियो या दरदर्शन पर दिखाई पड़ता है। ऊँचे फ्रीक्वुऐंसी (Frequency) की तरंगों को यह मंडल आसानी से प्रसारित कर देता है। इसी सुविधा का लाभ उठाकर आज घर-घर में टेलिविजन और गाँव-गाँव तक मोबाइल फोन पहुँच गये हैं।

8. शीत प्रदेशों या ध्रुवों पर सब्जियों का उत्पादन कैसे करते है?
उत्तर- शीत प्रदेशों या ध्रुवों पर अत्यधिक ठंड पड़ती है। इस कारण-वहाँ कोई वनस्पति नहीं उग पाती। लेकिन ‘ग्रीन हाउस’ का उपयोग कर वहाँ भी सब्जियाँ उगा ली जाती है। यदि ग्रीन हाउस (मकान) बड़ा हो तो अनाज भी उपजाया जा सकता है।

9. वायमंडल की विभिन्न परतों को चार्ट पेपर पर अलग-अलग रंगों से दिखलाइए।
उत्तर- छात्र स्वयं करें।

10. ओजोन परत को खतरे से बचाना जरूरी है? क्यों और कैसे?
उत्तर- आजोन परत को खतरे से बचाना इसलिये जरूरी है क्योंकि यह परत पृथ्वी और पृथ्वीवासियों की रक्षा करता है। सूर्य से निकलने वाली किरणों में एक खतरनाक किरण ‘पराबैंगनी किरण’ है। यदि यह किरण पूरी तरह पृथ्वी पर पहुँच जाय तो शायद जीवन ही समाप्त हो जाय। लेकिन गनीमत है कि इन खतरनाक पराबैंगनी किरणों को ओजोन परत सोख लेती है और उन्हें पृथ्वी पर पहुँचने नहीं देती। लेकिन मानव की लापरवाही और स्वार्थ के चलते ओजन परत पर खतरा मंडरा रहा है। इसका कारण है कि हम धड़ल्ले से ऐसे वाहनों और उपकरणों का उपयोग करने लगे हैं, जिनसे निकली गैसें ओजोन परत को नष्ट करने पर उतारू हैं। अत: उसे बचाने के लिए हमें खनिज तेज चालित वाहनों तथा सुविधा देने वाले उपकरणों का उपयोग कम करना चाहिए।

11. पता कीजिए कि समुद्र का जलस्तर बढ़ने से कौन-कौन से शहर, द्वीप और देश पर खतरा है?
उत्तर- समुद्र का जल स्तर बढ़ने से वैसे तो विश्व के सभी तटवर्ती गाँव और शहरों पर खतरा है लेकिन अपने देश भारत में पूर्वी डेल्टा के द्वीपों, मुंबई तथा चेन्नई शहरों को विशेष खतरा है। मुंबई में थोडी वर्षा से ही सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, क्योंकि समुद्र में पानी जा नहीं पाता और जाता भी है तो बहुत धीरे-धीरे। कई देशों जैसे- श्रीलंका, मालद्वीप, मारीशस तथा मेडागस्कर पर भारी खतरा है। हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर में अवस्थित छोटे-छोटे भारतीय द्वीप तो पहले ही डूबेंगे।


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अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ


अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुनें।

(1) छोटानागपुर क्या है?

(क) एक पठार

(ख) एक मैदान

(ग) एक झील

(घ) एक पर्वत

उत्तर- (क) एक पठार

(2) भूसतह पर भूकंप के केन्द्र के ऊपर स्थित स्थान क्या कहलाता है?

(घ) भू-पटल

(क) क्रेटर

(ख) अधिकेन्द्र

(ग) लावा

उत्तर- (ख) अधिकेन्द्र

(3) भारत को कितने भूकंप तीव्रता के क्षेत्रों में बाँटा गया है?

(क) 5

(ख) 4

(ग) 3

(घ) 7

उत्तर- (ख) 4

(4) सतपुड़ा पर्वत उदाहरण है-

(क) भ्रंश घाटी का

(ख) वलित पर्वत का

(ग) ब्लॉक पर्वत का

(घ) भ्रशोत्थ पर्वत का

उत्तर- (ग) ब्लॉक पर्वत का

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

ii. सही मिलान कर लिखिए-

                            उत्तर

1. हिमालय- (ख) वलित पर्वत

2. फ्यूजियामा- (क) संचयन पर्वत

3. अरावली- (घ) अवशिष्ट पर्वत

4. दक्कन- (ग) लावा निर्मित पठार

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

iii. निम्नलिखित को स्पष्ट कीजिए:

अधिकेन्द्र, उद्गम केन्द्र, सिस्मोग्राफ तथा रिक्टर स्केल

उत्तर- अधिकेन्द्र- पृथ्वी के ऊपर उद्गम क्षेत्र के ठीक सामने का भाग ‘अधिकेन्द्र’ कहलाता है। भूकम्प का अधिक कुप्रभाव अधिकेन्द्र के पास ही होता है और उसके चारों ओर क्रमशः कम होते जाता है।

उद्गम केन्द्र- पृथ्वी के अन्दर का वह भाग, जहाँ से भूकम्प की उत्पत्ति होती है उस भाग को ‘उद्गम केन्द्र’ कहा जाता हैं। अर्थात उद्गम केन्द्र तथा अधिकेन्द्र ठीक आमने-सामने होते हैं।

सिस्मोग्राफ- भूकम्प की तीव्रता मापने वाले यंत्र को ‘सिस्मोग्राफ’ कहा जाता हैं। सिस्मोग्राफ रिक्टर पैमाने का बना होता है।

रिक्टर पैमाना- जिस पैमाने में भूकम्प की तीव्रता को मापते हैं उस पैमाने को ‘रिक्टर पैमाना’ कहते हैं। सिस्मोग्राफ का पैमाना ‘रिक्टर’ ही होता है।

अध्याय-3 आंतरिक बल एवं उससे बनने वाली भू-आकृतियाँ

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(1) भूकंप के झटके क्यों आते हैं?
उत्तर- पृथ्वी के अन्दर गतिशील प्लेटों के टकराने से भूकंप के झटके आते है।

(2) भूकम्प का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर- भूकम्प का मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। छोटे-बड़े मकान ध्वस्त हो जाते हैं। बहुत से आदमी उसके मलवे में दब जाते हैं। इस प्रकार भारी जानमाल की हानि होती है।

(3) ज्वालामुखी किसे कहते हैं?
उत्तर- कभी-कभी और कहीं-कहीं पृथ्वी के अन्दर से तरल अग्नि की ज्वाला निकलने लगती है, उसी को ज्वालामखी कहते हैं।

(4) ज्वालामुखी ने मानव जीवन को प्रभावित किया है, कैसे?
उत्तर- पहले तो ज्वालामुखी ने अपने लपेटे में मनुष्य को तो लिया ही, उसके खेत-खलिहान और बाग-बगीचों को जला डाला। जहाँ ज्वालामुखी मृत हो गई और निकला लावा ठंडा हो गया वहाँ मनुष्य को उपजाऊ जमीन मिल गई। इस प्रकार मानव जीवन कुप्रभावित हुआ तो लाभान्वित भी हुआ है।

(5) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणामस्वरूप निर्मित होनेवाली स्थलाकृतियाँ कौन-कौन सी हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के परिणामस्वरूप निर्मित होने वाली स्थलाकृतियाँ अनेक हैं। ज्वालामुखी पर्वत पृथ्वी की आंतरिक शक्ति का परिणाम है। पृथ्वी की आंतरिक शक्ति से ही पर्वत/पहाड़, पहाड़ियाँ और पठार बनते हैं। पठारों पर भी पहाड़ियाँ दिख जाती हैं।

(6) मोड़दार एवं संचयन पर्वतों में क्या भिन्नता है एवं क्या समानता है?
उत्तर- धरातलीय भाग पर उत्पन्न दबाव के कारण जब मोड़ पड़ता है तो वह भाग ऊपर उठ जाता है और मोड़दार पर्वत का रूप धारण कर लेता है। इसके विपरीत ज्वालामुखी से निकले मैग्मा और लावा जब काफी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं तब कालक्रम में ठंडा होकर संचयित पर्वत बन जाते हैं। दोनों पर्वत ऊंचे होते हैं। लेकिन मोडदार पर्वत काफी ऊंचे होते हैं, जिससे उनपर बर्फ जम जाती है, लेकिन संचयन पर्वत उतने ऊँचे नहीं होते जिससे उन पर बर्फ नहीं जमती। समानता यह है कि दोनों को पर्वत ही कहा जाता है।

(7) पर्वत और पठार में क्या अंतर है?
उत्तर- पर्वत और पठार में यह अंतर है कि पर्वत की ऊँचाई धीरे-धीरे बढ़ती है और ऊपर बहुत कम बराबर स्थान होता है जबकि पठार की ऊँचाई अकस्मात बढ़ती है और ऊपर काफी बराबर स्थान रहता है। अधिक ऊँचे पहाड़ों पर बर्फ जमती है, लेकिन पठारों पर खनिज मिलते हैं।

अध्याय-3 आंतरिक बल(8) पर्वत के प्रकारों का उदाहरण के साथ वर्णन कीजिए।
उत्तर- पर्वत चार प्रकार के होते हैं:-

(क) वलित पर्वत

(ख) भ्रंशोत्थ पर्वत

(ग) संचयन पर्वत और

(घ) अवशिष्ट पर्वत

(क) वलित पर्वत- धरातलीय भाग पर उत्पन्न दाब के कारण चट्टानों में बल पड़ने लगते हैं। इससे वहाँ की धरातल ऊपर उठ जाता है और वलित पर्वत बनता है। उदाहरण में एशिया का हिमालय, यूरोप का रॉकी।

(ख) भ्रंशत्य पर्वत- धरातल पर कभी-कभी समांतर भ्रंश के बाद बीच का भाग ऊपर उठ जाता है और पर्वत-सा दिखने लगता है। ऐसे ही पर्वत को भ्रंशोत्थ पर्वत कहते हैं। जैसे यूरोप का ब्लैक फॉरेस्ट और भारत का विन्ध्याचल।

(ग) संचयन पर्वत- ज्वालामुखी द्वारा निकले लावा ठंडा होकर संचित होते जाते हैं। कालक्रम में इस संचित लावा का ढेर लग जाता है और पर्वत बन जाता है। इसी को संचयन पर्वत कहते हैं। जैसे जापान का फ्यूजियामा तथा अफ्रिका का किलोमंजारो।

(घ) अवशिष्ट पर्वत- हवा, वर्षा, बर्फबारी आदि अपरदन की शक्तियों द्वारा पर्वत की चोटी कटती-छंटती तथा घिसती रहती है। इससे इसकी ऊंचाई बहुत कम हो जाती है। जैसे- अरावली, पूर्वी और पश्चिमी घाट पर्वत।

(9) पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के क्या-क्या प्रभाव नजर आते हैं?
उत्तर- पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों के निम्नलिखित प्रभाव नजर आते हैं:-

⇒ भूकम्प,

⇒ ज्वालामुखी तथा

⇒ विभिन्न प्रकार के पर्वतों का बनना।

(10) भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान कब एवं कहाँ होता है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर- भूकम्प से सर्वाधिक नुकसान तब होता है जब वहाँ के निवासी लापरवाह रहते हैं। इससे बचने के उपायों से अवगत नहीं रहते। पुनः भूकम्प का अधिक नुकसान वहाँ होता है जहाँ के मकान भूकम्परोधी नहीं बने होते।

(11) भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम कैसे बच सकते हैं?
उत्तर- भूकम्प से होनेवाली क्षति से हम तभी बच सकते हैं जब लोगों को इससे बचने के उपायों से अवगत करायें। जो भी भवन बनें उनको वैज्ञानिक ढंग से भूकम्परोधी बनाया जाय। इससे भूकम्प से होनेवाली क्षति को कम किया जा सकता है या क्षति से बचा जा सकता है।

(12) पठार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर- पठार निम्नलिखित छः प्रकार के होते हैं:-

(क) महाद्वीपीय पठार

(ख) वायूढ़ निक्षेप पठार

(ग) हिमनदीय निक्षेपण पठार

(घ) लावा निर्मित पठार

(ड़) अंतरपर्वतीय पठार और

(च) गिरिपद पठार


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11. अंकीय उच्चता मॉडल 

11. अंकीय उच्चता मॉडल 

(The Digital Elevation Model)


अंकीय उच्चता मॉडल (DEM) 

            “किसी भी धरातल के उच्चावचों की भिन्नताओं की निरन्तरता का अंकीय प्रदर्शन अंकीय उच्चता मॉडल कहलाता है।” अर्थात यह उच्चावच को दर्शाने का एक कम्प्यूटर आधारित महत्वपूर्ण मॉडल है। पृथ्वी की सतह दिखाने के अलावा यह मॉडल ग्रहों एवं उपग्रहों के लिए भी प्रयोग किया जा रहा है। सामान्यतः धरातलीय विषमताओं को समोच्च रेखाओं द्वारा मानचित्र पर प्रदर्शित किया जाता है।

मूरे (Moore) तथा अन्य के अनुसार:-

        अंकीय उच्चता मॉडल संख्याओं का क्रमिक विन्यास है जो समुद्र तल से ऊँचाई के धरातलीय वितरण को प्रदर्शित करता है।

        अंकीय उच्चता मॉडल किसी दिये गये क्षेत्र के किसी बिन्दु की ऊँचाई का चित्रण अंकीय आकार में रखता है तथा सूचनाओं को किन्हीं कंकाल (Skeleton) रेखाओं के द्वारा एकत्र करता है। कंकाल रेखायें वे रेखायें होती हैं जो किसी ऊँचे-नीचे ढाल तथा ढाल परिवर्तन बिन्दुओं को दर्शाती है।

अंकीय भूभाग मॉडल (Digital Terrian Model)

            उच्चावच को प्रदर्शित करने के लिए DTM शब्द का भी सामान्यतः उपयोग किया जाता है। अंकीय भूभाग मॉडल (DTM) धरातलीय लक्षणों के सतही वितरण को प्रदर्शित करता है।

      अंकीय- भूभाग मॉडल (DTM), अंकीय आकार में भू-धरातलीय मानचित्र है जो केवल अंकीय उच्चता मॉडल को ही नहीं दर्शाता बल्कि भूमि उपयोग के प्रकारों, अधिवासों, सरिता रेखाओं के प्रकारों, ढालों इत्यादि को भी मॉडल के साथ दर्शाता है।

       DEM शब्द उच्चता सम्बन्धी आँकड़ों को रखने के मॉडल के रूप में प्रयोग किया जाता है जबकि भूभाग (Terrain) शब्द अक्सर भूमि सतही ऊँचाई के अतिरिक्त स्थलरूपों के लक्षणों को भी प्रदर्शित करने के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। यद्यपि DEM शब्द ही सबसे पहले उच्चता मॉडल के लिए प्रयोग किया गया था तब से लगातार द्विविम सतह के ऊपर Z लक्षणों के परिवर्तनों के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

अंकीय उच्चता मॉडल की आवश्यकता (Need of Digital Elevation Model)

       अंकीय उच्चता मॉडल के कई उपयोग है। इनमें प्रमुख निम्न प्रकार से हैं:-

1. राष्ट्रीय आँकड़ा आधार प्रणाली में अंकीय भूपत्रक मानचित्रों के ऊँचाई सम्बन्धी आँकड़ों का संग्रह करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. यह सांख्यिकीय विश्लेषण तथा अलग-अलग भूभागों में तुलना करने में सहायक है।

3. DEM के द्वारा किसी भी क्षेत्र का ढाल मानचित्र, ढाल पहलू मानचित्र, भूआकृतिक विश्लेषण तथा अपरदन तथा बाह्य जल का अनुमान लगाया जा सकता हैं।

4. सामरिक उद्देश्यों के लिये भूआकृतियों का त्रिविम प्रदर्शन से किसी भूभाग का ज्ञान, हथियारों का संचालन तथा पाइलट परिशिक्षण जैसे कार्यों में DEM से सहायता मिलती है।

5. किसी भी भूभाग की डिजाइन तथा योजना तैयार करने के लिये DEM का उपयोग जाता है।

6.. इसके द्वारा विकट धरातल पर सड़क के डिजाइन में कटान तथा भरण (Cut and (Fill) जैसी समस्याओं का समाधान निकाला जा सकता है

7. कई इन्जिनिरिंग परियोजनाओं जैसे कि बाँध, नगर, पावर लाइन तथा तकनीकि कार्यों में DEM का उपयोग सहायक होता है।

8. इनके द्वारा किसी देश के सीमा पार की दृश्यता का भी विश्लेषण किया जा सकता है।

9. DEM के साथ कई विषयी मानचित्रों जैसे कि भूमि उपयोग, मिट्टी, शैल विन्यास, भूस्खलन इत्यादि को इसके ऊपर डालकर प्रदर्शित किया जा सकता है।

10. यह किसी भूआकृति तथा भूआकृतिक प्रक्रियाओं के निम्न अनुरूपता मॉडल के लिये आँकड़े उपलब्ध कराता है।

11. इसमें किसी भी प्रदर्शित स्तर के ऊँचाई परिवर्तित करने की सुविधा उपलब्ध होती है जिससे कई तथ्यों का अनुमान लगाया जा सकता है।

अंकीय उच्चता मॉडल के विभिन्न संरचनायें (Various Structure of DEM)

         वर्तमान समय में DEM की कई प्रकार की संरचनायें प्रयोग की जाती हैं। इनमें से कोई भी पूर्ण रूप से किसी आँकड़ा संरचना की पूर्ति नहीं करते हैं। उद्देश्यों एवं कम्प्यूटर पर उपलब्धता के आधार पर निम्न उपयुक्त मॉडल प्रयोग किये जाते हैं-

1. रेखीय मॉडल (Linear Model)

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network)

3. ग्रिड जाल (Grid Network)/वर्ग संरचना (Grid Structure)

1. रेखीय मॉडल (Linear Model):-

           रेखीय मॉडल समोच्च रेखाओं के द्वारा किसी भू-भाग की ऊँचाई को प्रदर्शित करता है तथा प्रत्येक सम्मोच्च रेखा के X एवं Y निर्देशांकों के जोड़े ऊँचाई को व्यक्त करते हैं। सम्मोच्च रेखाओं से त्रिविम्ब प्रदर्शन तैयार किया जा सकता है तथा धरातलीय विशेषताओं को तब इसके ऊपर विश्लेषण किया जा सकता है।

       इन रेखाओं के द्वारा निष्कोण (Smooth) दूरी के साथ सम्मोच्च रेखाओं की अनुपातिक दूरी को सम्मिलित जाता है जो किसी भी ढाल के निष्कोणता को दर्शाता है। सम्मोच्च रेखाओं के अनुरूप एक विशेष प्रकार का दूसरा रेखीय मॉडल भी है जो सरिताओं की व्याख्या करता है तथा जिसे जल प्रवाह मॉडल में भी प्रयोग किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी भी रेखीय अंकीय ग्राफ को तैयार करने के लिये भूपत्रक मानचित्रों से सम्मोच्च रेखाओं को डिजिटाइज किया जाता है। ये मानचित्र ही आँकड़ों के ऐसे स्रोत हैं जो वर्गाकार खानों के द्वारा ऊँचाई मॉडल का निर्माण करते हैं।

2. असतत त्रिभुजीकृत जाल (Traingulated Irregular Network-TIN):-

         असतत त्रिभुजीकृत जाल, अंकीय उच्चता मॉडल के लिये एक प्रणाली है जिसे पीउकेर तथा अन्य (1978) के द्वारा डिजाइन किया गया है। यह प्रणाली उच्चावच मैट्रिक्स के बहुलता (Redundancies) को दूर करता है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे टिन मॉडल कहते हैं।

        टिन एक विक्टर स्थानविज्ञान संरचना के समान है। इसके अन्तर्गत पोलीगन जाल की स्थान विज्ञान संरचना के अनुरूप प्रदर्शित किया जाता है। टिन मॉडल आँकड़ा आधार के प्रारम्भिक प्रविष्टियों के जाल का नोड (Note) बनाने में सहायक होते हैं। आँकड़ा आधार में स्थान विज्ञान के सम्बन्ध एक-दूसरे से बनाये जाते हैं। प्रत्येक नोड को प्रत्येक निकट के नोड से किसी निशान के द्वारा निर्मित किया जाता है।

         टिन मॉडल घरातल को त्रिभुजाकार समतल तत्वों में विभाजित करता है। भूभाग धरातल किसी जोड़ (नोड) द्वारा प्रतिदर्श होता है। ये धरातलीय बिन्दु भूभाग की विशेषताओं को स्थिति को दर्शाते हैं। त्रिभुजाकार आवृत्ति के तीन नोड सन्दर्भ बिन्दु होते है। इन बिन्दुओं को अन्तर्वेशन (Interpolation) विधि द्वारा बदला नहीं जा सकता है। धरातलीय प्रतिदर्श (Sampling) के अनतर्गत विशेष बिन्दुओं एवं रेखाओं को सम्मिलित किया जाता है जो कोई चोटी, गहरा भाग, ढाल रेखा जैसे कि जल विभाजक या सरिता रेखा तथा ढाल परिवर्तन रेखा को दर्शाया जाता है। ये कंकाल (Skeleton) रेखायें टिन संरचना पर किसी चाप की भाँति प्रतीत होती हैं। प्रतिचयन घनत्व भूभाग की जटिलता पर निर्भर करती है। नोड जाल के घनत्व की वृद्धि से धरातल की सही तस्वीर प्रस्तुत की जा सकती है परन्तु इसमें आँकड़ की अधिकता तथा परिकलन समय अधिक लगता है।

टिन संरचना के लाभ (Advantages of the Tin Structure)

1. टिन आँकड़ा संरचना एक संरचना है।

2. स्थानीय भूभाग की दशाओं के आवश्यकतानुसार त्रिभुजों की आकृति एवं आकार भिन्न-भिन्न होते हैं।

3. त्रिभुज के किनारों पर ढाल परिवर्तनशीलता की समाविष्टि करने में यह मॉडल सक्षम होता है।

4. टिन संरचना से कई भूभाग विशेषताओं जैसे कि ढाल, ढाल पहलू, इत्यादि का परिकलन किया जा सकता है।

टिन संरचना (TIN Structure ):-

            सबसे महत्वपूर्ण कार्य संरचना की रूप-रेखा का है। प्रश्न यह है कि किस प्रकार सम्मोच्च रेखाओं के जाल को अंकों में परिवर्तित कर आँकड़ा आधार पर रखा जाता है। यहाँ पर आँकड़ा को आँकड़ा आधार पर रखने की विधियों को प्रदर्शित किया जा रहा है। टिन को आँकड़ों आधार (Data Base) में संग्रह करने के कई तरीके हैं। गुडचाइल्ड तथा केम्प (Goodchild and Kemp, 1990) ने दो संरचनाओं को प्रस्तावित किया है जो मुख्यतः त्रिभुजों तथा नोड़ों पर आधारित है । त्रिभुज संरचना ढाल विश्लेषण के लिये दण्ड विधि है जबकि नोड संरचना सम्मोच्च रेखाओं को निर्मित करने तथा आड़ा-तिरछा करने में सरल होती है।

अंकीय उच्चता मॉडल 

अलकनंदा क्षेत्र

त्रिभुजीकरण (Traingulation):-

        टिन के निर्माण के लिये त्रिभुजाकार विधि का भी उपयोग जाता है। ग्राफ संरचना के साथ चापों एवं शीर्ष बिन्दुओं (Vertices) के उपयोग से क्षेत्र त्रिभुजों में उपविभाजित हो जाता है जिससे

(a) प्रत्येक मापन बिन्दु पर एक नोड निर्मित होता है तथा

(b) प्रत्येक त्रिभुज के अन्तर्गत तीन नोड होते हैं।

          यह विधि आन्तरिक कोण को अधिकतम बनाती है तथा त्रिभुज की लम्बी भुजा को कम से कम करती है। इसी तरीके से भिन्नतायें प्राप्त की जाती है। इस विधि में सबसे पहले थिसेन (Thiessen) पोलीगॉन की रचना की जाती है। कृत्रिम त्रिभुजीकरण, अन्तरर्वेशन रेखाओं (Interpolation Lines) जैसे कि सम्मोच्य रेखायें त्रिभुज के किनारों पर एक दूसरे से आर-पार होती हैं। यह डेलाउनाइ (Delaunay) त्रिभुजीकरण पर आधारित है।

3. वर्ग संरचना (Grid Structure):-

          वर्ग आधारित विधियाँ भी समान फैले त्रिभुजों या वर्गों के लिये प्रयोग हो सकते हैं। क्षेत्रीय तत्व तीन या चार पड़ोसी वर्ग बिन्दुओं से घिरा हुआ सेल (Cell) होता है। रास्टर आधारित जी.आई.एस. के अन्तर्गत वर्ग ग्रिड जाल का प्रयोग किया जाता है।

          ग्रिड घनत्व या सेल का आकार क्षेत्रीय विषमताओं से आवश्यक रूप से समायोजित होता है। जहाँ पर भूभाग अत्यधिक कटाफटा है वहाँ पर ग्रिड घनत्व अधिक होता है। इस प्रकार के विषय क्षेत्रों में यह अतिरिक्त पुनरावृत्ति को बढ़ाता है। एक बात विशेषकर दिमाग में यह रखनी चाहिए कि जब सेल का सापेक्षिक आकार बड़ा होता है तो भूभाग तीव्र ढाल वाला होता है। इसके लिये अधिक आँकड़ों की आवश्यकता की पूर्ति होती है।

             इस विधि का लाभ यह हैं कि इसमें आँकड़ों का संग्रह अतिसरल होता है। दूसरा इसके द्वारा DEM से कई परिकलन का निर्माण किया जा सकता है।

निष्कर्ष:

       उपरोक्त तीनों विधियों में सबसे सरल एवं प्रचलित टिन संरचना प्रमुख है। टिन संरचना पर आधारित यहाँ पर हिमालय भूभाग (अलकनंदा क्षेत्र) का एक उच्चता मॉडल तैयार किया गया है। इसमें धरातलीय विषमताओं को उजागर किया गया है। इस प्रकार के धरातलीय मॉडल किसी भूभाग के मॉडलिंग करने में सहायक होते हैं।

प्रश्न प्रारूप

Q. अंकीय उच्चता मॉडल पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the digital elevation model.)



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15. डिजिटल मानचित्रकला

15. डिजिटल मानचित्रकला

(Digital Cartography)



डिजिटल मानचित्रकला ⇒

          “कम्प्यूटर पर मानचित्र निर्माण या कम्प्यूटर की सहायता से मानचित्रों के निर्माण डिजिटल मानचित्रकला कहलाती है।”

          पहले तकनीकी रूप से सदृश्य मानचित्रण तकनीकि की मांग अधिक थी लेकिन यह पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं थी। वर्तमान समय में डिजिटल मानचित्रकला के प्रकाश में आने से ऐसा नहीं है। कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रण कार्यों से जुड़ा हुआ है वह थोड़े से प्रशिक्षण के पश्चात् कम्प्यूटर पर मानचित्रों का निर्माण कर सकता है तथा मानचित्रों की रूप रेखा, सांकेतिक चिह्नों, रंगों इत्यादि को सुगमता से परिवर्तित कर सकता है। इसलिए यह अति आवश्यक है कि कोई भी व्यक्ति जो मानचित्रों को संचालित करता है। उसको मानचित्रकला (Catrography) का आधारभूत ज्ञान होना अति आवश्यक है।

          पिछले एक या दो दशक में विद्युत तकनीकि के विकास ने वैज्ञानिक क्रियाकलापों तक की मनुष्य के प्रतिदिन के कार्यों को भी प्रभावित किया है। भूमि सर्वेक्षण जैसे व्यवसाय में तो मानचित्रकला का कोई विकल्प नहीं है। सुदूर संवेदन तथा वायुयान निर्मित संवेदकों से उपलब्ध आँकड़े डिजिटल आकार में होते हैं। तीव्रगति वाले विद्युत कम्प्यूटरों का विकास, इनकी पर्याप्त संग्रहण क्षमता, आसानी से इनका देश में उपलब्ध होना, ऑन लाइन पर अतिरिक्त सुविधायें प्राप्त होना तथा कीमत में निरन्तर ह्रास होना इत्यादि कई ऐसे कारक है जिसे कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रणाली का प्रयोग निरन्तर बढ़ा है।

            जैसा कि स्पष्ट है कि कम्प्यूटर पर कोई मानचित्र या प्रतिबिम्ब उसी रूप में संग्रह नहीं किया जा सकता है। प्रत्येक आकृति को अंकों में कम्प्यूटर पर संग्रहीत किया जाता है तथा इच्छानुसार इनके द्वारा प्रतिबिम्ब या दृश्य तैयार किये जा सकते हैं। किसी मानचित्र को अंकों में संग्रह करने को भौगोलिक आँकड़े कहा जाता है। भौगोलिक आँकड़े दो प्रकार के होते धरातलीय तथा अधरातलीय। प्रायः धरातलीय आँकड़ों को बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

            अधरातलीय आँकड़े किसी बिन्दु, रेखा अथवा क्षेत्र विशेष की सूचनाओं को दर्शाते हैं। ये धरातलीय आँकड़े की विशेषताओं को बताते हैं जैसे कि किसी शहर का नाम, नदी या सड़क का नाम या किसी क्षेत्र विशेष का नाम इत्यादि। इस प्रकार धरातलीय तथा अधरातलीय आँकड़ों या सूचनाओं को कम्प्यूटर पर संग्रह किया जाता है। धरातलीय आँकड़ों को कम्प्यूटर पर प्रदर्शित करने के लिए निम्नलिखित दो कर्टोग्राफिक मॉडलों का उपयोग किया जाता है।

कार्टोग्राफिक मॉडल (Cartographic Models)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल (The Cartographic Map Model)

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल (The Geo Relational Model)

(1.) कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल:-

            कार्टोग्राफिक मानचित्र मॉडल में कम्प्यूटर का स्क्रीन आकार लघु वर्गाकार आकृतियों में विभाजित होता है जिसका प्रत्येक ग्रिड सेल एरी (Array) या पिक्सल (Pixal) कहलाता है। एरी अथवा पिक्सल जितना क्षेत्रफल तय करता है वह उस मानचित्र का विभेदन (Resolution) कहलाता है। प्रत्येक ग्रिडसेल पंक्ति व कॉलम द्वारा सन्दर्भित होता है जो संख्याओं में ऑकत होता है। प्रत्येक ग्रिडसेल का अपना काम होता है जिसे आँकड़ा कहते हैं। आँकड़ों का यह रूप रास्टर संरचना (Raster Structure) कहलाता है। रास्टर संरचना में बिन्दु आकृति को एक ग्रिडरौल से, रेखीय आकृति को आस-पास के ग्रिड सेलों के अंकीय मान के क्रम द्वारा तथा क्षेत्र आकृति को आस-पास के समान या मान वाले ग्रिड सेलों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। 

डिजिटल मानचित्रकला

डिजिटल मानचित्रकला

 

               रास्टर प्रणाली में आँकड़ों की संग्रह क्षमता बहुत कम होती है। यही कारण है कि इस संरचना के अन्तर्गत कई प्रक्रियायें एक साथ सम्भव नहीं हो सकती है।

(2.) भू-सम्बन्धीय मॉडल:-

             भू-सम्बन्धी मॉडल आँकड़ों के संग्रहण तथा सूचनाओं के एकीकरण की ऐसी पद्धति है जो विभिन्न (बिन्दु, रेखीय तथा क्षेत्रीय) आकृतियों को अधरातलीय सूचनाओं से जोड़ता है। उदाहरण के लिए नगर, गाँव अथवा घर की बिन्दु आकृति को उसके नाम तथा जनसंख्या के साथ दर्शाया जा सकता है। इसी प्रकार रेखीय आकृतियों में किसी सड़क को उसके नाम से तथा नदी को उसके नाम के साथ जल निस्तारण क्षमता द्वारा दर्शाया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्रीय आकृतियाँ को उनके नाम एवं विशेषताओं के आधार पर दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए भूमि उपयोग, शैल इकाईयाँ, मिट्टी के प्रकार तथा सिंचित असिंचित भूमि इत्यादि। भू-सम्बन्धीय आँकड़ों के लिए विक्टर आँकड़ा संरचना पद्धति सबसे प्रमुख है।

          विक्टर प्रणाली को सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किसी वस्तु अथवा आकृति की सापेक्षिक दूरी तथा विस्तार मापक के अनुसार दुरुस्त तरीके से दर्शाया जाता है। प्रत्येक भौगोलिक आकृति को X एवं Y निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

             किसी बिन्दु आकृति को एकल XY निर्देशांक के जोड़े द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जबकि रेखीय आकृतियों को दो या दो से अधिक XY निर्देशांकों के समूहों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। क्षेत्रीय आकृतियों को प्रदर्शित करने के लिए विक्टर संरचना में कई प्रणालियाँ प्रयोग की जाती हैं। इनमें सबसे अधिक प्रयोग किया जाने वाला तरीका स्थान (Spagetti Representation) है जिसमें प्रत्येक क्षेत्रीय आकृतियों की सीमाओं को XY निर्देशांकों के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक केवल एक ही विक्टर रेखा प्रदर्शित की जाती है। क्षेत्रीय आकृति को किसी सांकेतिक चिह्न अथवा नाम से प्रदर्शित किया जाता है।

डिजिटल मानचित्रकला के तत्व (Elements of Digital Cartography):-

            सदृश्य मानचित्रकला के (Analog Cartography) प्रमुख तत्व निम्न हैं-

1. मानचित्र का मापक एवं प्रमाणिकता (Scale of Map of Accuracy)

2. मानचित्र की विषय सामग्री (Content of Map)

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)

4. मानचित्र की रूपरेखा (Map Layout)

5. मानचित्र सांकेतिक चिह्न (Map Symbols)

6. रंगों एवं प्रतिरूपों का प्रयोग (Use of Colours and Pattem)

7. टाइप की गई सामग्री (Typography- Lattering)

8. मानचित्रों का सामान्यीकरण (Generalization of Map)

9. मानचित्रों का संकलन (Compilation of Map)

             अब डिजिटल मानचित्रकला में निम्न तत्वों को भी सम्मिलित किया जाने लगा है-

1. आँकड़ा मॉडल (Data Model)

2. आकृतिक विशेषतायें (Features Attributes)

3. आँकड़ा सेट अनुक्रम (Data Set Lineage)

4. दृश्यिकरण (Visulization)

           मानचित्र कला के इस अनुभाग में धरातलीय सूचनाओं को कम्प्यूटर पर डिजिटल प्रारूप में प्रदर्शित करने के तरीकों तथा मानचित्रों डिजाइन पर अधिक बल दिया जाता है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं-

1. सबसे पहला उद्देश्य यह समझना है कि डिजिटल धरातलीय आँकड़ों को किस प्रकार डिजाइन किया जाता है।

2. दूसरा यह समझना है कि विभिन्न तत्वों से मानचित्रों का निर्माण कैसे किया जाय जैसा कि ये क्रम से लगे होते हैं।

3. तीसरा यह जानकारी रखना है कि मानचित्र पर प्राथमिकता के आधार पर किन तत्वों को स्थान दिया जाना चाहिए। 4. चौथा आकृतियों को शुद्धता से प्रदर्शित करने के लिए किन उपयुक्त चिह्नों का प्रयोग करना चाहिए।

मानचित्र एवं डिजिटल धरातलीय आँकड़ा आधार (Mapand Digital Spatial Data Base)

             जहाँ तक मानचित्र का सम्बन्ध है, मानचित्र धरातलीय सूचनाओं का एक दस्तावेज है। मानचित्रों को अंकीय आकार (Digital Form) में लाने के लिए इन्हें सबसे पहले डिजिटाइज करना पड़ता है तथा सूचना तत्वों के आधार पर अलग-अलग खण्डों में विभाजित किया जाता है।

Preparation of Data Design

           इस प्रक्रिया में कुछ कार्टोग्राफिक सूचनाओं को जिन्हें मनुष्य अपने दिमाग से समझता है उन्हें छोड़ दिया जाता है लेकिन कुछ आवश्यक सूचनाओं का शक्तिशाली आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है।

        धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की सबसे सरल विधि उपलब्ध मानचित्रों को डिजीटाईज करना है। इसके अलावा फोटोग्रामेटी, सुदूर संवेदन तथा धरातलीय अवलोकन विधि जिनके आधार पर आँकड़ा आधार तैयार किया जाता है। डिजिटल आँकड़े सापेक्ष रूप से बिना मापक के होते हैं। प्रायः इन्हें 1:1 मापक पर रखा जाता है।

धरातलीय सूचनाओं का अंकीय आंकड़ा आधार (Digital Data Base):-

            जैसा कि पूर्व में स्पष्ट किया जा चुका है कि जी.आई.एस. में आँकड़ों को तीन रूपों में दर्शाया जाता है। ये तीन रूप बिन्दु रेखा तथा क्षेत्र आकृतियाँ हैं। प्रत्येक आकृति XY को निर्देशांक की सहायता से डिजिटाइज किया जाता है।

भू-धरातलीय आँकड़ा आधार का डिजाइन (Geo-Spatial Data Base Design):-

           एक बार यदि हम आँकड़ा आधार, प्रक्षेप, विषय सामग्री तथा शुद्ध स्तर का उद्देश्य समझ जाते हैं तब निम्न दो कार्यों को सम्पन्न करने के लिए धरातलीय आँकड़ों का डिजाइन तैयार किया जाता है।

(a) जी.आई.एस. विश्लेषण के लिए भू-धरातलीय आँकड़ों को प्राकृतिक संरचना के अनुसार तैयार किया जा सकता है। (b) मानचित्रों के निर्माण तथा प्रदर्शन के लिए आँकड़ों का उपयोग अति सरल करना होता है।

डिजिटल धरातलीय आँकड़ों के निर्माण के लिए आंकड़ा मॉडलिंग (Data Modelling for Creating Digital Spatial Data):-

        डिजिटल धरातलीय आँकड़ों का ऐसा आँकड़ा मॉडल तैयार किया जाता है जो उच्च स्तर के मानचित्रों का उत्पादन कर सके तथा प्रत्येक के उपयोगकर्ता के लिए उपयोगी बन सके। जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि आँकड़ा मॉडलिंग का अर्थ आँकड़ों के संरचना की रूपरेखा तैयार करना है जिसे इन्हें सुगमता से प्रयोग किया जाए। धरातलीय आँकड़ों के निर्माण की यह एक महत्त्वपूर्ण अवस्था है।

आँकड़ों के मॉडलिंग डिजाइन को निम्न तीन रूपों में तैयार किया जा सकता है-

1. संकल्पनात्मक डिजाइन

2. तार्किक डिजाइन

3. भौतिक डिजाइन

1. संकल्पनात्मक डिजाइन (Conceptual Design):-

       मॉडलिंग ऐसा होना चाहिए जो धरातलीय आँकड़ों को अत्यधिक सिद्ध-परस्त बना सकें तथा जो अनुप्रयोग की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकें। आँकड़ों को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है कि उनसे सरलतापूर्वक मानचित्रों का निर्माण किया जा सके।

          मानचित्रकला के आँकडे स्थान विज्ञान की दृष्टि से ढांचागत नहीं होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिस रूप में हमें मानचित्र और उसमें निहित सूचनाएँ प्राप्त होती है उसी रूप में इन्हें जी.आई.एस. में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। इन्हें कम्प्यूटर वातावरण में ढालने की आवश्यकता होती है। यदि मानचित्र के प्रतिरूप को डिजिटाईज किया जाए तो इसके लिए कई प्रयास करने पड़ते हैं तब यह जी.आई.एस. के अनुरूप कार्य कर सकता है। जी.आई.एस. निर्माण हेतु आँकड़ों का डिजिटाइजेशन करने के पश्चात इनसे मानचित्र तैयार करना अति सरल हो जाता है।

        इस प्रकार स्थान विज्ञान ढाँचे के लिए संकल्पनात्मक आँकड़ा मॉडल तैयार करना आवश्यक होता है। प्रत्येक आकृति को बिन्दु (Point), रेखा (Line) या घिरे हुए क्षेत्र (Polygon) के रूप में डिजिटाईज किया जाता है।

2. तार्किक डिजाइन (Logical Design):-

         आँकड़ों का मॉडलिंग  तर्पूकर्ण तरीके से तैयार किया जाता है। इसको इतना सरल बनाया जाता है कि कोई भी मानचित्रकार या उपयोगकर्ता उसे भली-भाँति समझ सके तथा उसका उपयोग कर सके। डिजिटल आँकड़े में जी.आई.एस. में धरातलीय विश्लेषण के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इनकी संरचना इस प्रकार तैयार की जाती है कि प्रत्येक आकृति की पहचान की जा सके। इसकी बसाव-स्थिति इस प्रकार हो कि डिजिटल आँकड़ों में उसे पृथक किया जा सके। आँकड़ों को तार्किक क्रम में संगठित किया जाता है। इसी प्रकार आँकड़ों का ढाँचा सरल एवं समझ के योग्य बनाया जाता है।

          बिन्दु, रेखा तथा आकृतियों के ज्यामितीय लक्ष्यों को निर्देशांक या निर्देशांकों (X,Y) के सेट द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यदि प्रत्येक ज्यामितीय वस्तु को किसी कोड से सम्बन्धि किया जाय तब वह उस आकृति के सम्बन्ध में जानकारी देता है जो एक ज्यामितीय आकृति है। उदाहरण के लिए कोई झील या कृषि भूमि या वन क्षेत्र किसी भी आकृति को वर्गीकृत कर कोडिंग किया जाता है।

3. भौतिक डिजाइन (Physical Design):-

         आँकड़ा संरचना का भौतिक डिजाइन कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर पर निर्भर करता है।

      कुछ कम्प्यूटर प्रणाली में आकृतियाँ प्रायः स्थानविज्ञान से जुड़ी हुई होती है। उदाहरण के लिए रंग, दबाव, स्टाइल तथा विभिन्न तल इत्यादि या आँकड़े अलग-अलग फाइलों में पृथक-पृथक किये जाते हैं जैसे कि एक सड़क के लिए, एक जंगल के लिए इत्यादि।

       आँकड़ों का दूसरा भौतिक डिजाइन आँकड़ा आधार की कड़ियाँ या कोड से सम्बंधित होते हैं। भौतिक आँकड़ा संरचना मॉडल का आधारभूत सिद्धान्त वही है जो कि डिजाइन के अन्तर्गत था। इसमें डिजिटाइजेशन इस प्रकार किया जाता है कि एक आकृति को दूसरे आकृति से पृथक किया जा सके तथा सरलतापूर्वक स्वतः ही तार्किक डिजाइन में परिवर्तित हो सकें।

प्रश्न प्रारूप

Q. डिजिटल मानचित्रकला पर निबंध लिखें।

(Write on essay on digital Cartography.)



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16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

16. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर

(Difference between Raster and Vector Model)


रास्टर एवं विक्टर मॉडल में अंतर ⇒

            भौगोलिक सूचनाओं के प्रतिरूपण (Modeling) में धरातलीय आँकड़ा संरचना के लिए रास्टर तथा विक्टर विधियाँ स्पष्ट रूप से अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं। कुछ वर्ष पूर्व तक यह माना जाता था कि रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा सूचनायें एक-दूसरे के विरोधी हैं। ऐसा इसलिये समझा गया क्योंकि रास्टर विधि में संग्रहण तथा प्रतिविम्ब प्रक्रिया के लिये अत्यधिक कम्प्यूटर स्पेस तथा स्मृति की आवश्यकता होती थी जबकि विक्टर विधि में कम स्थान की आवश्यकता होती थी।

         रास्टर विधि में कई धरातलीय विश्लेषण अति सरल होते हैं। आँकड़ों के परिचालन में इसमें कई प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होती हैं जैसे कि पोलीगन प्रतिच्छेदन या धरातलीय सामान्यीकरण से उत्पन्न समस्या इत्यादि। रास्टर विधि द्वारा निर्मित मानचित्र अच्छे व साफ नहीं होते हैं।

           इसके विपरीत विक्टर विधि में आँकड़ा आधार बहुत उत्तम तरीके से प्रबन्धित होता है। इसके द्वारा निर्मित मानचित्र अत्यधिक परिष्कृत होते हैं। इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसमें धरातलीय विश्लेषण नितान्त कठिन होते हैं।

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल में अंतर

रास्टर आँकड़ा मॉडल

1. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक सरल (Simple) डाटा मॉडल है।

2. रास्टर मॉडल मुख्य रूप से बसाव स्थिति (Location) को केन्द्रित करता है। 

3. रास्टर आधारित जी.आई.एस. में उपग्रही सूचनाओं को सरलतापूर्वक कम्प्यूटर पर डाला जा सकता है।

4. रास्टर मॉडल धरातलीय शुद्धता को कम करता है। इसका अर्थ है कि रास्टर मॉडल अत्यन्त सामान्यीकरण दृश्य को प्रस्तुत करता।

5. रास्टर मॉडल आकृतियों एवं धरातल के मध्य Gradual Transition दर्शाता है। उदाहरण के लिये उच्चावन्वन के साथ मिट्टियों का वर्गीकरण।

6. रास्टर मॉडल बसाव स्थिति को कार्टेशन निर्देशांक प्रणाली में प्रदर्शित करता है।

7. रास्टर मॉडल में आँकड़ों को पंक्ति एवं कालम में संग्रह किया जाता है। लेकिन टोपोलोजीकल प्रक्रिया नहीं अपनायी जाती है।

8. इसमें प्रत्येक तत्व एक लक्ष्य (Object) के रूप में प्रदर्शित करता है।

9. रास्टर मॉडल में क्षेत्र या दूरियों की माप करना सरल होता है परन्तु किसी चर की माप करना अत्यन्त कठिन होता है।

10. रास्टर आँकड़ा मॉडल किसी प्रश्न का उत्तर आसानी से देता है जैसे कि भौगोलिक आकृति की बसाव स्थिति क्या है?

11. रास्टर मॉडल अत्यन्त जगह घेरता है, इसलिए आँकड़ों को सघन करके प्रयोग किया जाता है।

12. रास्टर आँकड़ा मॉडल एक विक्टर की तुलना में तीव्र है।

13. रास्टर मॉडल का उपयोग धरातलीय विश्लेषण में बहुतायत में किया जाता है।

रास्टर एवं विक्टर मॉडल

रास्टर एवं विक्टर आँकड़ा मॉडल

विक्टर आँकड़ा मॉडल

1. विक्टर मॉडल अत्यधिक जटिल आँकड़ा संरचनायुक्त मॉडल है।

2. विक्टर मॉडल भौगोलिक आकृतियों (Features) को केन्द्रित करता है?

3. विक्टर मॉडल में उपग्रह से उपलब्ध आँकड़ों को सरलता से कम्प्यूटर पर नहीं डाला जा सकता है।

4. विक्टर मॉडल किसी वस्तु या लक्ष्य की आकृति को अति शुद्धता से प्रदर्शित करता है।

5. विक्टर मॉडल में किसी वस्तु आकृति की सीमाओं को अति शुद्धता के साथ दर्शाया जाता है।

6. विक्टर मॉडल में बसाव स्थितियों को ‘x’ एवं ‘y’ निर्देशांकों प्रणाली की सहायता से दर्शाया जाता है।

7. इसमें टोपोलाजीकल प्रक्रिया अपनाई जाती है।

8. वास्तविक सांसारिक घटनाओं को जिनकी एक विशिष्ट बसाव स्थिति होती है को स्थैतिक बिन्दु, रेखा, सीमाओं एवं घिरे हुये क्षेत्र का शुद्ध अवलोकन करता है। अधिकतर लक्ष्यों के लिए विक्टर मॉडल अत्यधिक उपयुक्त है।

9. किसी भी क्षेत्र की दूरी एवं क्षेत्रफल ज्ञात करना आसान होता है।

10. विक्टर मॉडल में किसी भौगोलिक आकृति के बारे में क्या करना है। इस प्रकार के प्रश्नों का स्वयं हल निकाल लेता है।

11. विक्टर मॉडल में धरातलीय आँकड़ों के संग्रह के लिये अत्यन्त कम स्थान होता है।

12. विक्टर मॉडल तीव्रता के साथ शुद्धता को भी दर्शाता है।

13. विक्टर मॉडल का उपयोग अति उच्च श्रेणी के कार्टोग्राफी प्रदर्शन के लिए किया है जिसमें शुद्धता एवं स्पष्टता महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रश्न प्रारूप 

Q. रास्टर एवं विक्टर मॉडल में क्या अंतर है?

(What is difference between Raster and Vector model.)



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