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अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज


अध्याय-2 चट्टान एवं खनिज

अभ्यास के प्रश्नोत्तर

i. सही विकल्प को चुने।

1. इनमें रूपांतरित चट्टान कौन है?

(क) बेसाल्ट

(ख) चूना पत्थर

(ग) संगमरमर

(घ) ग्रेनाइट

उत्तर- (ग) संगमरमर

2. बेसाल्ट किस प्रकार की चट्टान है?

(क) अवसादी

(ख) आग्नेय

(ग) कायांतरित 

(घ) परतदार

उत्तर- (ख) आग्नेय

3. चट्टानों के रूपान्तरण में किसका योगदान होता है?

(क) तापमान

(ख) दबाव

(ग) रासायनिक द्रव्य

(घ) उपर्युक्त सभी 

उत्तर- (घ) उपर्युक्त सभी

ii. खाली जगहों को भरिए:

(क) जो चट्टान ज्वालामुखी से निकले लावा के ठंडा होने से बनती हैं वे आग्नेय चट्टानें कहलाती हैं।

(ख) जिन चट्टानों में परत पायी जाती है उन्हें परतदार चट्टानें कहते है।

(ग) ज्वालामुखी से निकला गर्म पदार्थ लावा कहलाता है।

(घ) अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण चट्टानों के लक्षण बदल जाते हैं।

iii. सही मिलान कर लिखिए।

                     उत्तर

1. सेंधा नमक– अवसादी चट्टान

2. ग्रेनाइट– आग्नेय चट्टान

3. संगमरमर– रूपान्तरित चट्टान

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए?

(क) अपने घर में खनिज से बनी हुई चीजों की सूची बनाइए।
उत्तर- तराजू के पलड़े, आभूषण, सायकिल, हल का फाल, खुरपी, हसिया, पहँसुल, लालटेन।

(ख) छत की ढलाई में कौन-सा पत्थर इस्तेमाल होता है?
उत्तर- छत की ढलाई में पहाड़ों से काटकर निकाले गए पत्थरों को टुकड़े बना कर जिसे गिट्टी कहा जाता है, इस्तेमाल होता है। इन पत्थरों का रंग भूरा-स्लेटी होती है। ये आग्नेय चट्टान के उदाहरण कहे जा सकते हैं।

(ग) उन खेलों की सूची बनाइए, जिनमें पत्थरों का इस्तेमाल होता हो।
उत्तर- पत्थरों से खेलने जाने वाले कोई अधिक खेल नहीं है। हाँ, ग्रामीण क्षेत्र के बीच पत्थर के टुकड़ों से एकट-दोकट तथा सरगोटिया खेलते हैं।

(घ) पत्थरों का उपयोग कहाँ-कहाँ होता है? सूची बनाइए।
उत्तर- पत्थरों का उपयोग पहले घर, महल, कोठी और किला बनाने में होता था। वाराणसी के प्राय: सभी प्राचीन भवन पत्थर के ही बने हैं। आज भी झारखंड में पत्थरों का उपयोग घर तथा चहार-दीवारी बनाने में होता है ‘वैसे आम तौर पर सड़क बनाने, मकानों की छत बनाने तथा फर्श को पक्का करने के लिए विभिन्न आकारों के पत्थरों का उपयोग होता है।

(ड़) पता करके लिखिए कि निम्न भवन किन-किन पत्थरों से बना है- 

⇒ रोहतास गढ़ का किला- बलुआ पत्थर

⇒ लाल किला (दिल्ली)- लाल बलुआ पत्थर

⇒ पत्थर की मस्जिद (पटना)- बलुआ पत्थर

⇒ विष्णुपद मन्दिर (गया)- काला बलुआ पत्थर

⇒ आगरा का किला- लाल बलुआ पत्थर

⇒ कुतुबमीनार (दिल्ली)- बलुआ पत्थर

⇒ विशला बुद्ध मूर्ति (गया)- काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

काला बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

लाल बलुआ पत्थर

चट्टान एवं खनिज

बलुआ पत्थर से निर्मित मूर्ति

(च) चट्टानों के प्रकार और उनकी बनावट के बारे में लिखिए।
उत्तर- चट्टानें मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं-

1. आग्नेय चट्टान

2. अवसादी चट्टान तथा

3. रूपांतरित चट्टान।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।

अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

रूपांतरित चट्टान- कभी-कभी आग्नेय या परतदार चट्टानों में ताप और दाब की वृद्धि होती है तो इनके रूप और गुण दोनों में बदलाव आ जाता है। रूप में अंतर के कारण ही इन्हें रूपांतरित चट्टान कहते हैं। चूना-पत्थर अपना रूप बदलकर संगमरमर में बदल जाता है। इसी प्रकार ग्रेनाइट रूपांतरित होकर नाइस बन जाता है।

(छ) चट्टान किसे कहते है? उदहारण के साथ स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – पृथ्वी की पर्पटी बनाने वाले खनिज पदार्थ के किसी भी प्राकृतिक पिंड को चट्टान या शैल करते हैं। शैल विभिन्न रंग, आकार एवं गठन की हो सकती है।

जैसे- आग्नेय चट्टान- ग्रेनाइट और बेसाल्ट।

अवसादी चट्टान- चूना-पत्थर, बलुआ पत्थर।

रूपांतरित चट्टान- संगमरमर, नाइस।

(ज) चट्टानों का रूपांतरण कैसे होता है? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- किसी निश्चित दशाओं में एक प्रकार की शैल चक्रीय तरीके से एक-दूसरे में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार एक शैल से दूसरे शैल में परिवर्तित होने की इस प्रक्रिया को शैल चक्र कहा जाता है।

              द्रवित मैग्मा ठंडा होकर ठोस आग्नेय शैल बन जाता हैं। ये आग्नेय चट्टान/शैल छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित होकर अवसादी चट्टान/शैल का निर्माण करते हैं। अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण ये आग्नेय एवं अवसादी शैल पुनः कायांतरित चट्टान/शैल में बदल जाते हैं। पुनः अत्यधिक ताप एवं दाब के कारण कायांतरित शैल पिघलकर द्रवित मैग्मा बन जाता है। यह द्रवित मैग्मा पुनः ठंडा होकर आग्नेय चट्टान/शैल में परिवर्तित हो जाता है।

(झ) अवसादी चट्टान तथा आग्नेय चट्टानों में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर- अवसादी चट्टान- अवसादी चट्टानें अवसादों के एकत्र होने से बनती हैं। ये दो प्रकार की होती हैं। एक पानी के अन्दर तथा दूसरी पानी के बाहर जमीन पर। पानी के अन्दर जमने वाली चट्टानों की परतें अधिक होती हैं क्योंकि ये परत-दर-परत जमी होती हैं। काफी दबाव के कारण ये कड़ी हो जाती हैं और चूना-पत्थर का रूप धारण करती हैं। पानी से बाहर की अवसादी चट्टानें परत-दर-परत ही होती हैं और अपने ही दबाव से दबकर अवसादी चट्टान बन जाती हैं। उदाहरण है बलुआ पत्थर, बलुआ पत्थर कई रंग के होते हैं- लाल, भूरा, काला।

आग्नेय चट्टान- पृथ्वी के अन्दर पिघला पदार्थ धरातल पर आने के क्रम में कभी पहले ही जम जाता है और कभी धरातल के ऊपर पहुँचकर जमता है। ऐसी चट्टानों में परतें नहीं होतीं। इनमें रवा पाये जाते हैं। जो चट्टानें पृथ्वी के अन्दर जमती हैं इनके रवे बड़े होते हैं जबकि पृथ्वी के ऊपर जमने वाली चट्टानों के रवे छोटे या महीन होते हैं। ग्रेनाइट और बेसाल्ट आदि आग्नेय चट्टान के ही उदाहरण हैं।


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अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

बिहार बोर्ड वर्ग-7 वाँ भूगोल प्रश्नोत्तर 

अध्याय-1 पृथ्वी के अन्दर ताँक-झाँक

i. सही विकल्प को चुनें।

1. निफे में होता है-

(क) सिलिका

(ख) मैग्नेशियम

(ग) लोहा

(घ) सोना

उत्तर- (ग) लोहा

2. भू-पर्पटी में ऊपरी हिस्सा कहलाता है-

(क) सियाल

(ख) सीमा

(ग) परत

(घ) मेंटल

उत्तर- (क) सियाल

3. क्रोड है।

(क) पृथ्वी की ऊपरी परत

(ख) पृथ्वी की निचली परत

(ग) खनिज तेल

(घ) ठोस पदार्थ

उत्तर- (ख) पृथ्वी की निचली परत

ii. खाली जगहों को भरिए।

1. भू-पर्पटी को सियाल/भू-पटल भी कहा जाता है।

2. पृथ्वी के अन्दर प्रति 32 मीटर की गहारई पर तापमान 1°C  बढ़ जाता है।

3. पृथ्वी के बीच की परत को सीमा/मेंटल कहा जाता है।

iii. मिलान कीजिए:

                          उत्तर-

1. भू-पर्पटी– खनिज पदार्थ

2. सीमा– सिलिका और मैग्नेशियम

3. सियाल– सिलिका और एल्यूमिनियम

4. निफे– पदार्थ की गाढ़ी अवस्था

iv. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

1. पृथ्वी की तीनों परतों के नाम लिखिए।
उत्तर- पृथ्वी की तीनों परतों के नाम निम्नलिखित हैं:

(क) भूपर्पटी (Sial)

(ख) मेंटल (Sima) तथा

(ग) क्रोड (Nife)

2. पृथ्वी की कौन-सी परत पिघली अवस्था में रहती है? और क्यों?

उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत अर्थात क्रोड पिघली अवस्था में रहती है। इसकी पिघली अवस्था में रहने का कारण है कि यहाँ अत्यधिक ताप तथा भारी दाब रहता है। अत्यधिक ताप तथा भारी दाब के कारण इस भाग में पाई जाने वाली वस्तुएँ (निकेल तथा लोहा) पिघल जाती हैं और तरल अवस्था में बहती रहती है।

3. पृथ्वी की सबसे निचली परत में कौन-से तत्व अधिकता में पाये जाते हैं?

उत्तर- पृथ्वी की सबसे निचली परत में निकेल (Ni) तथा लोहा (Fe) तत्व अधिकता में पाये जाते हैं। लेकिन ये तत्व वहाँ ठोस अवस्था में नहीं, बल्कि तरल अवस्था में बहते रहते हैं। यह अवस्था पृथ्वी के अन्दर का ताप तथा भारी दाब के कारण हैं।

4. पाठ के आधार पर बताइए कि पृथ्वी को रत्नगर्भा क्यों कहा जाता है?

उत्तर- पृथ्वी को रत्नगर्भा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके अन्दर सोना से लेकर कोयला तथा हीरा तक बहुमूल्य खनिज पाये जाते हैं। पृथ्वी के गर्भ में खनिज तेल (किरासन, पेट्रोल, रसोई गैस), चाँदी, ताँबा, जस्ता लोहा आदि जितने बहुमूल्य खनिज हैं सब पृथ्वी के अन्दर से ही निकलते हैं। यहाँ तक कि हमारे पीने का पानी भी पृथ्वी में से या पर से ही मिलता है। इसी कारण से पृथ्वी को रत्नगर्भा कहा जाता है।

5. पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी क्यों महसूस होती है?

उत्तर- पृथ्वी की गहराई में जाने पर गर्मी इसलिये महसूस होती है क्योंकि वहाँ अत्यधिक दाब रहता है। जैसे-जैसे पृथ्वी की गहराई में जाते हैं, वैसे-वैसे दाब बढ़ता जाता है। इसी दाब के कारण ताप बढ़ता जाता है और हमें गर्मी महसूस होती है।



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13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

13. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS)


भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्य (Objectives of GIS)

              भौगोलिक सूचना प्रणाली के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित प्रकार हैं-

1. योजना तथा निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना।

2. आंकड़ों के वितरण तथा संचालन के लिए सफल साधनों की पूर्ति करना।

 3. आँकड़ा भण्डार से अनावश्यक आंकड़ों को हटाना तथा पुनरावृत्ति को करना।

4. विभिन्न स्रोतों से एकत्रित सूचनाओं को संगठित करने की क्षमता रखना।

5. अति जटिल विश्लेषण करना।

6. भौगोलिक आँकड़ों के जटिल विश्लेषणों से नई-नई सूचनाओं करना।

              जब किसी भी योजना में भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाता है तो यह हमें निम्नलिखित जातीय प्रश्नों का उत्तर देता है।

बसाव स्थिति (Location):-

          कोई भी स्थान या वस्तु कहाँ स्थित है इसका जी.आई.एस. के विश्लेषण से आसानी से प्राप्त हो जाता है। चूंकि जी.आई.एस. में उपयोग किये गये आँकड़े भौगोलिक रूप से संदर्भित होते है इसलिए किसी भी लक्ष्य की उपयुक्त बसाव स्थिति का ज्ञान इसके द्वारा किया जा सकता है। यदि कहीं पर भी यह जानना चाहे कि यहाँ क्या है तो इसका भी उत्तर शीघ्र एवं सरलता से जी.आई.एस. से प्राप्त हो जाता है।

दशा (Condition):-

         दशा से अभिप्राय यह है कि कोई वस्तु कहीं पर किन कारणों से तथा किन दशाओं में स्थित है। यहाँ पर कार्य एवं कारण का सम्बन्ध स्पष्ट होता है। किसी भी लक्ष्य या वस्तु के बसाव की स्थिति की पहचान जी.आई.एस. प्रक्रिया से की जा सकती है।

प्रवृत्ति (Trend):-

           प्रवृत्ति का अर्थ है चरों का परिवर्तन। कोई भी मानचित्र तत्व घटते हुए क्रम में है या बढ़ते हुए क्रम में, इसको पुष्टि जी.आई.एस. आसानी से देता है। यहाँ तक कि क्या परिवर्तन हो रहा है इसका भी उत्तर प्राप्त हो जाता है। कोई भी चर निम्न रूपों में परिवर्तन को प्रदर्शित करते हैं-

(i) आकार में वृद्धि (Increase Size)

(ii) आकार में कमी तथा स्थान में परिवर्तन (Decreased size and changged position)

(iii) आकृति परिवर्तन (Change Shape)

प्रतिरूप (Pattern):-

           जी.आई.एस. के कार्यों में धरातलीय प्रतिरूप तथा अंतरसम्बन्ध महत्वपूर्ण विशेषतायें हैं। सभी मानचित्र आकृतियों में विभिन्न प्रकार के धरातलीय सम्बन्ध होते हैं। इनमें से कुछ सम्बन्धों को आँखों से आसनी से देखा जा सकता है जबकि अन्य को जानने के लिए जी.आई.एस. की आवश्यकता होती है। यहाँ समझने के लिए तीन प्रकार के सम्बन्धों को समझाया गया है-

(i) क्या किसी X आकृति में कोई प्रतिरूप है? आकृति X कुछ भी हो सकती है जैसे कि भूमि उपयोग, वनस्पति प्रकार, आवासीय विस्तार आदि। किसी साधारण मानचित्र में इनका प्रतिरूप देखा जा सकता है।

(ii) क्या X एवं Y में कोई सम्बन्ध है? हमारी आँखों यह बताने में सक्षम होती हैं कि X व Y में निकट का सम्बन्ध है या Y, X के अति निकट है। यह भी हो सकता है कि एक X से दूसरे X में Y की स्थिति में परिवर्तन एक प्रतिरूप में होता है। इन धरातलीय सम्बन्धों को समझने के लिए कार्य करने वाले व्यक्ति के कार्यात्मक साहचर्य (Functional Association) को जानना अति आवश्यक है। उदाहरण के लिए यदि X व Y हमेशा साथ है तो इसका अर्थ है कि इनकी निकटता का कोई महत्वपूर्ण कारण है। इस प्रकार की जानकारियों का ज्ञान जी.आई.एस. में ढूँढा जा सकता है।

(iii) क्या अन्य धरातलीय अथवा कार्यात्मक प्रतिरूप भी अस्तित्व में है? माना कोई Z प्रकार की आकृति सीमाओं की ओर स्थित है तथा पश्चिम से पूर्व की ओर आकार में बहती है। इसका बसाव प्रतिरूप टेढ़ा-मेढ़ा है। इसका कोई कार्यात्मक कारण होता है। जी.आई.एस. इसका उत्तर ढूंढ़ने में सहायता करता है।

मॉडलिंग (Modeling):-

         ‘मॉडल’ संसार तथा इसकी प्रक्रियाओं का प्रदर्शित रुपान्तरण है। मॉडल किसी सामान्य कथन बनाने के लिए आँकड़ों या विश्लेषण का सारांश प्रस्तुत करता है। ये मॉडल ऑकड़ों के कालोहाल को कम करने तथा सामान्यीकरण को बनाने में सहायता करते हैं। आज उच्च क्षमता वाले कम्प्यूटर विश्लेषण को आगे बढ़ाते हैं। इस प्रकार के नवीन विश्लेषण को मॉडलिंग कहते हैं।

          यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जी.आई.एस. में ऐसा क्या है जिससे यह तकनीक अत्यधिक प्रचलित हो रही है। इसका उत्तर सक्षिप्त में इस प्रकार दिया जा सकता है।

जी.आई.एस. के विशिष्ट तथ्य

                        ⇓⇓⇓⇓

⇒ सूचनाओं की पुनर्प्राप्ति (Retrevel of Information)

⇒ टोपोलोजिकल मॉडल (Topological Model)

⇒ नेटवर्क (Network)

⇒ अंशछादन(Overlay)

⇒ आँकड़ों का निर्गमन (Data Output)  

जी.आई.एस. कैसे कार्य करता है?

(How does GIS work?)

               यहाँ पर संक्षेप में उन बिन्दुओं को उद्धरित किया गया है जिनके अंतर्गत जी.आई.एस. कार्य करता है:-

1. विभिन्न स्रोतों से सूचनाओं को सम्बद्ध करना। 

2. आँकड़ों का अभिग्रहण (Capture) करना

3. ऑकड़ों को एकीकृत (Integration) करना

4. प्रक्षेपण तथा पंजीकरण (Projection and Registration) करना

5. आँकड़ों को ढाँचा (Data Structure) तैयार करना।

आँकड़ों का विश्लेषण (Data Analysis)

            इसके अंतर्गत मुख्यतः निम्न प्रकार से आँकड़ों का विश्लेषण किया जाता है:-

1. साधारण जाँच (Simple Query)

2. विशेष जाँच (Spacial Query)

3. एक परतीय संचालन (Single Layer Operation)

4. जोनिंग करना (Zoning)

         यहाँ जाँच शब्द से अभिप्राय है पूछताछ करना। इस प्रणाली में हम पूछताछ के माध्यम से सूचनाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। विशेष पूछताछ निम्न प्रकार से की जाती है-

1. बहुपरतीय संचालन (Multi Layer Operation)

2. विशेष मॉडलिंग (Spacial Modeling)

3. धरातलीय विश्लेषण (Surfacial Analysis)

4. जाल विश्लेषण (Network Analysis)

5. बिन्दु प्रतिरूप विश्लेषण (Point Partem Analysis)

6. ग्रिड विश्लेषण (Grid Analysis)

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्व (Elements or Components of GIS):-

             जी.आई.एस. के प्रमुख तत्वों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:-

1. हार्डवेयर (Hardware)

2. सॉफ्टवेयर (Software)

3. आँकड़े (Data)

4. लाइफवेयर (Lifewate)

5. साँचागत संगठन (Infrastructural Organisation)

भौगोलिक सूचना प्रणाली

भौगोलिक सूचना प्रणाली के तत्त्व

प्रश्न प्रारूप

Q. भौगोलिक सूचना प्रणाली के उद्देश्यों, स्वरूपों एवं तत्वों की विवेचना करें।

(Discuss the Objective, Nature and Elements of GIS.)



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12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

12. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम

(The Concept and Approaches of GIS)


जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम⇒

      जी.आई.एस. की प्रमुख संकल्पनायें इस प्रकार हैं:-

सी.पी.लो. एवं बलबर्ट के. (2005) ने जी.आई.एस. के निम्नलिखित संकल्पनायें एवं तकनीकी प्रस्तुत की हैं-

(i) आँकड़ों को उपार्जित एवं मॉडलिंग करना (Data Acquisition and Modeling)

(ii) भू-सन्दर्भित करना (Georeferencing)

(iii) आँकड़ा स्तर (Data Standard)

(iv) आँकड़ों का प्रक्रियन एवं विश्लेषण करना ( Data Processing / Analysis)

(v) कम्प्यूटर हार्डवेयर एवं सॉफ्टवेयर (Computer Hardware and Software)

(vi) व्यवहारिक उपयोग (Application)

(vii) जी.आई.एस. प्रणाली का विकास (G.I.S. System Development)

(viii) समस्या एवं समाधान (Problem and Solution)

             इसी प्रकार कई अन्य लेखकों ने जी.आई.एस. की संकल्पनायें निम्नलिखित रूप से दी है-

(i) आँकड़ा प्राप्त करना एवं उनको प्रस्तुत करना (Data Capture and Presentation

(ii) आँकड़ा प्रबन्धन जिसके अन्तर्गत संग्रहण एवं रख-रखाव सम्मिलित है। (Data Management)

(iii) आँकड़ों का विश्लेषण एवं परिचालन करना ( Data Analysis and Manipulation)

(iv) आँकड़ों का प्रस्तुतीकरण (Data Presentation)

(v) मॉडलिंग करना (Modeling)

            कुछ अन्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

1. स्थान एवं घटना विशेष की संकल्पना:-

           जैसा कि पूर्व में समझाया गया है कि जी.आई.एस. भौगोलिक सूचनाओं को कम्प्यूटर पर एकीकृत करता है। प्रश्न उठता है कि ये भौगोलिक घटनायें कहाँ घटित हुई हैं? इनका धरातलीय प्रतिरूप किस प्रकार प्रतीत होता है? स्थान विशेष की संकल्पना इससे सम्बन्धित है। भूगोल एक वितरण का विज्ञान है। सूचनाओं व घटनाओं का घरातलीय वितरण प्रतिरूप प्रदर्शन करने में जी.आई.एस. सबसे अधिक उपयोगी तकनीक है। किसी वस्तु अथवा घटना का धरातलीय वितरण मानचित्र के द्वारा, जी.आई.एस. के अंतर्गत सरलतापूर्वक किया जा सकता है।

2. मानचित्र बाहुलता (Map Quantities)

3. घनत्व विश्लेषण (Density Analysis)

4. सूचना से सूचना संकल्पना (Concept of Data in Data)

5. सहसम्बन्ध की संकल्पना (Concept of Relationship)

6. परिवर्तनशीलता की संकल्पना (Concept of Change)

7. प्रतिरूपों की संकल्पना (Concept of Pattern)

8. प्रवृत्तियों की संकल्पना (Concept of Trend)

जी.आई.एस. के भौगोलिक उपागम

(Geographical Approach of GIS)

            भूगोल एक सांसारिक विज्ञान है तथा जी.आई.एस. एक सांसारिक विज्ञान के विश्लेषण की आधुनिकतम तकनीकी है। भूगोल एवं जी.आई.एस. दोनों ही पृथ्वी के धरातल की सूचनाओं के सम्बन्ध में उपयुक्त समझ उत्पन्न करते हैं। भौगोलिक ज्ञान का उपयोग मानव क्रियाकलापों को संचालित करने में सहायक होते हैं। यहीं से भौगोलिक उपागम का आरम्भ होता है। यहाँ भौगोलिक उपागम का आशय किसी भी समस्या के समाधान के लिए एक नये तरीके की सोच विकसित करना है जो भौगोलिक सूचनाओं को एकीकृत एवं संगठित करती है जिससे पृथ्वी जैसे ग्रह के बारे में अधिकतम जानकारी प्राप्त की जा सके।

            भौगोलिक उपागम भौगोलिक ज्ञान को जागृत (Create) कर हमारी जिज्ञासा को बढ़ाता है। पृथ्वी का मापन (Measurement of Earth), आँकड़ों या सूचनाओं का व्यवस्थीकरण एवं विश्लेषण, विभिन्न प्रक्रियाओं का मॉडलिंग, अवयवों (Elements) में आपसी सम्बन्ध इत्यादि भौगोलिक ज्ञान के प्रमुख बिन्दु हैं जिनका अध्ययन भौगोलिक विश्लेषण के अंतर्गत कया जाता है। इतना ही नहीं भौगोलिक उपागम की विधियों हमें यह भी अनुमति प्रदान करती है कि किस प्रकार सांसारिक घटनाओं का डिजाइन योजनाबद्ध किया जा सकता है। भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं-

भौगोलिक उपागम के प्रमुख चरण

(Steps of Geographical Approach)

1. Step 1- प्रश्न करना (Ask)

2. Step 2- उपार्जन करना (Acquire)

3. Step 3- परीक्षण करना (Examine)

4. Step 4- विश्लेषण करना (Analysis)

5. Step 5- कार्यान्वयन (Action)

Step 1 प्रश्न करना (Ask):-

              किसी भी भौगोलिक समस्या को उजागर करने से पूर्व प्रश्न उठता है कि जिस समस्या के समाधान या विश्लेषण किया जाना है या किया जा रहा है वह समस्या क्या है तथा वह भौगोलिक दृष्टि से कहाँ स्थित है? इस प्रकार के प्रश्न करने से सम्भवतः उसके उत्तर प्राप्त करने में सहायता मिल सके। यह भौगोलिक उपागम का प्रमुख कदम है। समस्या के बसाव स्थिति के अनुरूप विश्लेषण विधियों की रूपरेखा तैयार की जाती है।

Step 2-उपार्जन करना (Acquire):-

               समस्या या घटना के स्पष्टीकरण के पश्चात उसे सम्बन्धित उपयुक्त सूचनाओं की सूची निर्धारित की जाती है जिनकी विश्लेषणकर्ता को नितान्त आवश्यकता होती है। यह भी निश्चित किया जाता है कि अमुक सूचना प्राप्त की जा सकती है या जी.आई.एस. के अंतर्गत तैयार की जा सकती है। वास्तव में आंकड़ों के प्रकार एवं उनका भौगोलिक महत्त्व किसी समस्या के मूल में पहुँचने की कला व विधियों को भी स्पष्ट करने में सहायता करते हैं। यदि अध्ययन की विश्लेषण विधियाँ उच्च स्तर की हों तो वे समस्या के निदान में प्रयोग किये जाने वाले आंकड़ों की प्राप्ति में भी सहायक होते है।

             उत्कृष्ट अध्ययन विधियों के उपयोग के लिए आवश्यक है कि नये प्रकार के आकड़ों को उत्पन्न किया जाय। नये प्रकार की सूचनाओं को सूचीबद्ध करने के लिए भौगोलिक धरातलीय (Spatial) तथा अधरातलीय (Aspatial or Attribute) सूचनाओं की आवश्यकता होती है। इन सूचनाओं एवं आँकड़ों को तालिकाओं, नये प्रकार के मानचित्रों की परतों इत्यादि तरीकों से जीआईएस द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

Step3-परीक्षण करना (Examine):-

              आँकड़ों की प्राप्ति के पश्चात् अगला कदम है कि सूचनाओं या आँकड़े की उत्तमता को परखना। यह प्रयास किया जाता है कि प्राप्त किये गये आँकड़े हमारे अध्ययन के लिए अनुकूल है या नहीं। यदि उपयुक्त है तो उन्हें किस रूप में उपयोग किया जा सकता है।

           परीक्षण के अंतर्गत प्रत्यक्ष निरीक्षण, अन्वेषण (संगठित करने के तरीके), एक आँकड़ा सेट से दूसरे आँकड़ा सेट से सम्बन्ध, आँकड़ों को व्यवस्थित करने के विज्ञान के नियम (Topology) तथा आँकड़ों के प्राप्ति का स्रोत (Meta Data) इत्यादि को सम्मिलित किया जाता है।

            कहने का अर्थ यह है कि सभी प्रकार के आँकड़ों की पुष्टि होने के पश्चात् उन्हें अध्ययन के अनुरूप व्यवस्थित किया जाता है।

Step 4- विश्लेषण करना (Analysis):-

              जीआईएस का अगला कदम, आँकड़ों अथवा सूचनाओं का परीक्षण या विश्लेषण की विधियों के आधार पर प्रक्रियन (Process) तथा व्याख्या (Analysis) करना होता है। परिणामों के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है तथा परिणामों को देखकर यह तय किया जाता है कि सूचनायें जिनका प्रयोग किया गया है उपयोगी या वैधानिक है या नहीं। विभिन्न अवयवों (Parameters) के विश्लेषण करने में उपयोग की गई विधियाँ कितनी कारगर सिद्ध हुई हैं?

            इस प्रकार जी.आई.एस. मॉडलिंग की जाती है जिसके माध्यम से परिणामों के परिवर्तन सरल, शुद्ध एवं आसान बनाया जाता है, जो नये परिणाम प्रस्तुत करने में सहायक होते है कि रास्टर एवं विक्टर ऑकड़ा मॉडल इसी कदम के प्रतिफल हैं।

Step 5 कार्यान्वयन (Action):-

             भौगोलिक उपागम के विश्लेषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा परिणामों का प्रस्तुतीकरण एवं कार्यान्वयन करना होता है। किसी भी समस्या के परिणामों की रिपोर्ट, मानचित्रों, तालिकाओं, चारों या इन्टरनेट या वेब अथवा अन्य मुद्रित माध्यमों से प्रयोगकर्ताओं के मध्य आदान-प्रदान की जा सकती हैं। किसी भी विश्लेषण के परिणामों की प्रस्तुतीकरण के उपयुक्त साधनों की नितान्त आवश्यकता होती है। यह देखा आता है कि कौन विधि परिणामों को उपयोगकर्ता तक पहुँचाने में अति सहयोगी हो सकती है। इसके लिए सभी तरह के Audio Visual विद्युतीकरण यंत्रों से समस्या के परिणामों को आंशिक एवं पूर्ण रूप से प्रस्तुत कर उस पर कार्यान्वयन किया जाता है। कार्यान्वयन करना तथा उपयोगकर्ता द्वारा परिणामों को उपयोग में लाना ही भौगोलिक उपागम की महत्वपूर्ण कड़ी है। परिणामों के द्वारा समस्या के निदान करना ही किसी योजना की सफलता मानी जाती है।

जी. आई. एस. की संकल्पना

            उपरोक्त परिभाषायें भौगोलिक सूचना प्रणाली के विषय वस्तु तथा क्रियाकलापों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हैं। कभी-कभी इसे धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System) भी कहते हैं जो किसी भी स्थान विशेष पर स्थित आँकड़ों का संचालन करती है। इसी प्रकार का शब्द ‘अधरातलीय आँकड़ा’ (Aspatial Data) है। इसकी भी समान्तर रूप से लाक्षणिक आँकड़ों (Attribute Data) के लिए प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए वर्षा, तापमान, मिट्टी के रासायनिक गुण, जनसंख्या आँकड़ा इत्यादि। यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि धरातलीय आँकड़ों के संचालन के लिए कई प्रकार के तकनीक शब्द प्रयोग किये जाते हैं जिनमें कुछ इस प्रकार हैं-

(a) भू-सूचना प्रणाली (Geo-Information System-GIS)

(b) धरातलीय सूचना प्रणाली (Spatial Information System-SIS)

(c) भूमि सूचना प्रणाली (Land Information System-LIS)

(d) बहु-उद्देशीय भू-आधारित प्रणाली (Multi-Purpose Cadastre-MPC)

       अंत में निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि “भौगोलिक सूचना प्रणाली एक कम्प्यूटर सहायता प्राप्त तंत्र है जो भौगोलिक संसार के विभिन्न पहलुओं से संबंधित आँकड़ों को एकत्र, संग्रह, विश्लेषण, परिचालन, प्रस्तुतीकरण तथा पुनर्प्रसारण करता है। यह किसी निर्णय पर पहुँचने का शक्तिशाली साधन या प्रणाली है।”

प्रश्न प्रारूप

Q. जी. आई. एस. की संकल्पनाओं एवं उपागम की विवेचना को

(Discuss the Concept and approaches of GIS.)



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7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

7. भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

( Indian remote sensing satellite-IRS)


भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह

                   भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला का प्रथम उपग्रह IRS-1A को मार्च 1988 में सोवियत वोस्टक रॉकेट (Soviet Vostak Rocket) की सहायता से अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया। इसी श्रृंखला का द्वितीय उपग्रह IRS-1B को अगस्त, 1991 को प्रक्षेपित किया गया जो अभी भी निरन्तर कार्य कर रहा है। इस पर 72.5 मीटर विभेदन के LISS-1 तथा 36.25 मीटर के LISS-2A व LISS-2B संवेदक के दो कैमरे लगे हुये हैं। ये कैमरे चार स्पैक्ट्रम बैंड 0.45 से 0.86 माइक्रोमीटर पर कार्य करते हैं। इसी प्रकार तृतीय उपग्रह IRS-1C को 28 दिसम्बर, 1995 में रूसी रॉकेट द्वारा मोलिया से प्रक्षेपित किया गया। इस पर निम्नलिखित तीन कैमरे लगे हुये थे-

(i) पेंक्रोमेटिक कैमरा (Panchromatic Camera-PAN):-

             यह एक उच्च विभेदक (5.8 मीटर) पेंक्रोमेटिक बैंड पर कार्य करता है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 70 किमी० होती है। इसमें स्टीरियोस्कोपित विम्ब देखने की क्षमता है। 

(i) LISS-3 (A Linear Imaging Self Scanning Sensor):-

           यह चार स्पेक्ट्रल बैंड पर कार्य करता है। इनमें तीन दृश्य अवरक्त स्पैक्ट्रल (VNIR) बैंड तथा एक लघु तरंग अवरक्त (SWIR) प्रभाग है। इसका भूमि विभेदन VNIR बैंड पर 23.5 मीटर तथा SWIR बैंड पर 70.5 मीटर है जिनकी स्वाथ चौड़ाई क्रमशः 41 किमी० तथा 148 किमी० है।

(iii) WIFS (A Wide Field Sensor-WIFS):-

          यह एक निम्न विभेदक (188.3 मीटर) कैमरा है जिसकी स्वाथ चौड़ाई 810 किमी० है। उपग्रह में एक टेपरिकार्डर भी है जो आंकड़ों को अंकित करता है।

              चतुर्थ उपग्रह IRS-1D को 29 सितंबर 1997 को प्रक्षेपित किया गया जो IRS-1C के ही समान है। IRS-P2, तथा IRS-P1, को भारत में निर्मित PSLV (Polar Satellite Launch Vehicle) द्वारा क्रमश: 15 अक्टूबर, 1994 व 21 मार्च, 1996 को प्रक्षेपित किया गया। IRS-1A व 1B की ही भांति IRS-P2, में भी LISS-2 कैमरा लगा है जबकि IRS-P1 में WIFS कैमरा लगा हुआ है।

            IRS-P4, को PSLV-C2 द्वारा 26 मई, 1999 को सफलतापूर्वक अन्तरिक्ष में छोड़ा गया। यह अपने तरह का एक नया प्रयोग था। इस पर समुद्रीय रंगीन मोनीटर (Ocean Colour Monitor) तथा बहु आवृत्ति स्कैनिंग लघुतरंग रेडियोमीटर (Multi Frequency Scanniring Microwave Radiometer) लगे हुये हैं।

          उपग्रह नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में स्थित है। इसके अतिरिक्त लखनऊ तथा माउरीटियस उपस्टेशन भी निरन्तर आई. आर. एस. उपग्रह का प्रबोधन (Monitor) करते हैं। राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (NRSA) का आंकड़ों को प्राप्त करने वाला स्टेशन हैदराबाद के पास सादनगर में स्थित है। यहां पर उपग्रह से आंकड़ों को प्राप्त कर इन्हें प्रयोग के योग्य बनाया जाता है। तत्पश्चात् हैदराबाद में NRSA द्वारा आंकड़ों को वितरित करने की सुविधा है।

           भारतीय सुदूर संवेदन प्रणाली का सबसे मुख्य आधार राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रबन्धन प्रणाली (National Natural Resources Management System-NNRMS) है जो भारत के प्राकृतिक संसाधनों के आंकड़ों का प्रभावशाली ढंग से प्रबन्धन करती है। आई. आर. एस. के आंकड़ों को कई उपयोगों में लाया जाता है जैसे कि कृषि फसलों का उत्पादन अनुमान, सूखाग्रस्त क्षेत्रों का प्रबन्धन, बाढ़ क्षेत्रों का मानचित्रण, भूमि उपयोग मानचित्रण बेकार भूमि का प्रबन्धन, जल संसाधनों का प्रबन्धन, समुद्रीय संसाधनों का सर्वेक्षण, नगरीय योजनायें, खनिज संभावनायें, वन सर्वेक्षण इत्यादि।

              आई. आर. एस. आंकड़ों का अनोखा उपयोग IMSD (Intergrated Mission for Sustainable Development) है। वास्तव में IMSD के अन्तर्गत 174 जिलों को सम्मिलित किया गया है। इसका प्रमुख उद्देश्य उपग्रहीय तथा सामाजिक व आर्थिक धरातलीय आँकड़ों की सहायता से सतत विकास (Sustainable Development) करना है। IRS श्रृंखला के सामान्य लक्षणों तथा उनके संवेदकों की विशेषताओं को इस प्रकार नीचे देखा जा सकता है-

आई. आर. एस. श्रृंखला की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1A/1B IRS-P2
ऊँचाई (Altitude) 904 किमी० 817 किमी०
कक्षीय काल (Orbital Period) 103.2 मिनट 101.35 मिनट
सम-सामयिक विभेदन   (Temporal Resolution)  22 दिन 24 दिन

भूमध्य रेखा पार करने का समय (Equatorial Crossing Time)

10 बजे सुबह 10 बजे सुबह
संवेदक (Sensors) LISS-1 व LISS-2 LISS-2
आई. आर. एस. 1C की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-1C
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.69०
दूरी (Ditance between Adjacent Traces) 117.5 किमी०
पुनरावृत्ति (Repitative for LISS-3) 24 दिन
पुनरावृत्ति (Repitative for WIFS) 5 दिन
दृश्यालोकन (Revisit of Pan) 5 दिन
नादिर बिन्दु पर कवरेज (Coverage) 398 किमी०
स्टीरियोग्राफिक क्षमता (Stereo Coverage Capacity) 5 दिन
आई. आर. एस. P3 की कक्षीय विशेषतायें
लक्षण (Features) IRS-P3
कक्षीय प्रकार (Orbital Types) ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक 
कक्षीय प्रकार (Orbital Period) 101.35 मिनट
भूमध्य रेखा पार करने का समय 10.30 बजे सुबह
ऊँचाई (Altitude) 817 किमी०
झुकाव (Inclination) 98.73०
संवेदक (Sensors) WIFS, MOS, X-Ray

          भारत ने प्रथम प्रयास 1975 से लेकर 2014 तक 73 भारतीय उपग्रहों को अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। भारत के सभी उपग्रहों का उत्तरदायित्व भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन के अधीन है।

     भारतीय राष्ट्रीय उपग्रह प्रणाली (INSAT) को भू-तुल्यकालिक कक्षों में स्थापित किया गया है। यह प्रणाली एशिया-प्रशान्त क्षेत्र की सबसे बृहत घरेलू संचार उपग्रह प्रणाली (Domestic Communication Satellite System) है। इसे वर्ष 1983 में INSAT-B के प्रक्षेण के साथ ही स्थापित किया गया था। भारत के इतिहास में संचार सेक्टर के क्षेत्र में एक क्रांति है जो निरन्तर चल रही है। समय-समय पर इसमें कई परिवर्तन होते चले गये हैं। INSAT अन्तरिक्ष प्रणाली के अन्तर्गत 24 उपग्रह प्रक्षेपित है उनमें से 10 सफलतापूर्वक अब भी कार्यरत हैं।

भारत के प्रक्षेपणयान (India Launch Vehicles)

            भारत के प्रमुख प्रक्षेपणयान निम्नलिखित हैं-

उपग्रह प्रक्षेपणयान (Satellite Launch Vehicle – SLV-3):-

          इस क्षेत्र में भारत की क्षमता का पहला प्रदर्शन SLV-3 का निर्माण था। 1980 में SLV-3 ने अपनी सफलतम उड़ान भरी जिसने 40 किग्रा० के रोहणी उपग्रह को ध्रुवीय कक्ष के नजदीक पहुंचाया। SLV-3 की लम्बाई 22.7 मीटर है जिसकी क्षमता 17 टन वजन उठाने की है। SLV-3 के दो अन्य प्रक्षेपण मई, 1981 व अप्रैल, 1983 में सम्पन्न किये गये।

आवर्धक उपग्रह प्रक्षेपणयान (The Augmented Satellite Launch Vehicle-ASLV):-

         ASLV की प्रथम सफलता 20 मई, 1992 को प्राप्त हुई जब रोहणी उपग्रह (SROSS-C) को पृथ्वी के नजदीक कक्ष में स्थापित किया गया। ASLV के द्वारा दूसरा प्रक्षेपण 4 मई, 1994 को सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ जब SROSS-C2, उपग्रह को छोड़ा गया था। ASLV पांच अवस्थाओं वाला यान है जो 150 किलो० पेलोड (Payload) की क्षमता रखता है।

ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान (Polar Satellite Launch Vehicle-PSLV):-

              ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपणयान के विकास में यह भारत की तीसरी सफलता थी। 21 मार्च, 1996 में PSLV की सफलता से भारत ने यह सिद्ध कर दिया कि यह आई. आर. एस. उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की क्षमता रखता है। PSLV-D, द्वारा सुदूर संवेदक उपग्रह IRS-P, को 817 किमी० दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में स्थापित किया गया। PSLV-D3 को द्वितीय विकास उड़ान 15 अक्टूबर, 1994 को हुई जब IRS-P2, उपग्रह को सफलतापूर्वक कक्ष में स्थापित किया गया।

              PSLV, 283 टन भार वाला 44 मीटर लम्बा यान है। यह 1000 से 1200 किग्रा भार वाले सुदूर संवेदन उपग्रह को 900 किमी० की दूरी पर ध्रुवीय सूर्य तुल्यकालिक कक्ष में पहुंचाने की क्षमता रखता है। यह यान चार अवस्थाओं का है। इसकी पहली अवस्था 2.8 मीटर व्यास की 129 टन भारी है। इस पर एक ठोस मोदक मोटर (Solid Propellant Motor) है जिसके चारों ओर 6 मोटर जड़ी हुई हैं। 2.8 मीटर व्यास वाली दूसरी अवस्था है जो तरल इन्जन तकनीक पर आधारित है। यह 37.5 टन (Liquid Propellant) का उपयोग करता है।

             तीसरी अवस्था में 7.2 टन ठोस मोदक मोटर है तथा चौथी अवस्था में पुनः तरल मोदक की है जिसमें 2 टन मोदक है। इस पर एक संकीर्ण लूप निर्देशन प्रणाली है।

भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपणयान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle- GSLV):-

           भारत ने भृतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपणयान का भी निर्माण किया है जिसकी प्रक्षेपण क्षमता 2500 किग्रा० के संचार उपग्रहों को भू-स्थैतिक कक्ष में स्थापित की है। GSLV का निर्माण PSLV को परिवर्तित करके तैयार किया गया है जिस पर 6 ठोस मोदक स्ट्रैप मोटर तथा 4 तरल मोदक स्ट्रेप मोटर लगी है। इसमें PSLV की दो अन्य अवस्थाओं को बदलकर एक क्रायोजिनिक अवस्था की गई है।

भारतीय अन्तरिक्ष केन्द्र तथा इकाईयाँ (Indian Space Centers and Units):-

           भारत में अन्तरिक्ष विज्ञान के विकास एवं अनुसंधान के लिये देश के विभिन्न भागों में अन्तरिक्ष केन्द्रों की स्थापना की गई है जिनमें प्रमुख निम्न हैं-

1. विक्रम साराभाई अन्तरिक्ष केन्द्र (VSSC):-

             यह केन्द्र तिरुअनन्तपुरम में स्थित है। प्रक्षेपणयान के विकास तथा रॉकेट अनुसंधान में इस केन्द्र की अग्रणी भूमिका है। केन्द्र इसरो के प्रक्षेपणयान विकास प्रोजेक्ट की योजनायें तैयार कर उन्हें क्रियान्वित करता है।

2. इसरो उपग्रह केन्द्र (ISAC):-

              यह केन्द्र बंगलौर में स्थित है। यहां पर वैज्ञानिक तकनीक तथा उपयोग मिशन (Application Mission) के लिये उपग्रह प्रणाली का डिजाइन, निर्माण, परीक्षण तथा प्रबन्धन किया जाता है।

3. अन्तरिक्ष उपयोग केन्द्र (SAC):-

          इसरो के अहमदाबाद केन्द्र पर अनुसंधान एक विकास कार्य किये जाते हैं। इनमें मुख्यतः अन्तरिक्ष तकनीक के व्यावहारिक उपयोग के लिए सोच, विचार (Conceiving), संगठन तथा निर्माण प्रणाली तैयार करना है। क्रियाकलापों का मुख्य विषय क्षेत्र उपग्रहीय संचार प्रणाली, सुदूर संवेदन, मौसम विज्ञान, ज्योडेसी इत्यादि हैं।

4. सहार केन्द्र (SHAR):-

             यह आन्ध्र प्रदेश के श्री हरिकोटा में इसरो का प्रमुख प्रक्षेपण केन्द्र है। यहां पर उपग्रह प्रक्षेपण के अतिरिक्त ठोस मोदक रॉकेट मोटर का  वृहद पैमाने पर प्रक्रीयन तथा भूमि परीक्षण भी किया जाता है।

भारतीय सुदूर संवेदन उपग

अंतरिक्ष केंद्र और भारत में इकाइयाँ

5. तरल मोदक प्रणाली केन्द्र (Liquid Propulsion System Center-LPS):-

           इस प्रकार की सुविधा तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर तथा महेन्द्रगिरी (तमिलनाडु) केन्द्रों में उपलब्ध है जहां पर इसरो प्रक्षेपणयान व उपग्रह प्रोग्राम के लिये तरल मोदक प्रणाली का खाका, निर्माण तथा परीक्षण किया जाता है।

6. विकास एवं शैक्षिक संचार इकाई (Development and Educational Communication Unit-DECU):-                       

              अहमदाबाद केन्द्र आन्तरिक उपयोग प्रोग्रामों के संकल्पन (Conception), परिभाषा, योजना तथा सामाजिक आर्थिक मूल्यांकन के लिये प्रमुख हैं।

7. इसरो टेलीमेटरी, ट्रेकिंग व कमान्ड नेटवर्क (ISTRAC):-

              इसका केन्द्रीय कार्यालय तथा स्पेसक्राफ्ट नियंत्रण केन्द्र बंगलौर में है। इसके भूमि नेटवर्क केन्द्र श्रीहरिकोटा, तिरुअनन्तपुरम्, बंगलौर, लखनऊ, पोर्टब्लेयर तथा माउरीटियस में है।

8. प्रधान नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility- MCF):-

           कर्नाटक में स्थित हसन केन्द्र प्रक्षेपण के बाद की क्रियाओं के लिये उत्तरदायी है। विशेषकर इन्सेट उपग्रह के कक्षीय मैनुअवर (Manoeuvers) स्टेशन का रख-रखाव तथा कक्षीय संचालन इत्यादि क्रियायें हैं।

9. इसरो जड़त्व प्रणाली इकाई (ISRO Inertial Systems Unit):-

             तिरुअनन्तपुरम केन्द्र उपग्रह तथा प्रक्षेपणयान के लिये जड़त्व प्रणाली का बाहरी खाका तथा निर्माण करता है।

10. भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (Physical Research Laboratory-PRL):-

                यह प्रयोगशाला अन्तरिक्ष विभाग के अधीन अहमाबाद में स्थित है जो अन्तरिक्ष अनुसंधान एवं अन्य विज्ञानों के अनुसंधान का अग्रणी राष्ट्रीय केन्द्र है।

11. राष्ट्रीय सुदूर संवेदन संस्था (National Remote Sensing Agency-NRSA):-

                 यह केन्द्र भी अन्तरिक्ष विभाग के अधीन हैदराबाद में स्थित है। यहां पर सुदूर संवेदन उपग्रह के आंकड़ों को प्रक्रियन के पश्चात प्रयोगकर्ता तक उपलब्ध कराता है। इसके द्वारा वायु सुदूर संवेदन का संचालन भी किया जाता है।

12. राष्ट्रीय मेसोस्फीयर-स्ट्रेटोस्फीयर-ट्रोपोस्फीयर रडार सुविधा (National Mesophere Stratosphere Toposphere Radar Facilitiy):-

               इस केन्द्र पर वायुमण्डलीय विज्ञान अनुसंधान किया जाता है। अन्तरिक्ष विभाग के अधीन यह केन्द्र तिरुपति में स्थित है।

13. भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (Indian Institute of Remote Sensing- IIRS):-

               भारती सुदूर संवेदन संस्थान एक प्रमुख शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान है जो कि भारत सरकार के अन्तरिक्ष विभाग में राष्ट्रीय सुदूर संवेदन एजेन्सी के अन्तर्गत आता है। इसकी स्थापना सुदूर संवेदन के क्षेत्र में दक्ष व्यवसायियों को विकसित करने के लिये की गई है। संस्थान का प्रमुख कार्य क्षेत्र के प्रयोगकर्ता समुदाय में तकनीक हस्तान्तरण द्वारा अपनी क्षमताओं का निर्माण करना है। यह संस्थान सुदूर संवेदन के विभिन्न उपयोगों के क्षेत्रों में डिप्लोमा एवं स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्रदान करता है। यह संस्थान देहरादून में स्थित है।

         इस संस्थान का प्रमुख मिशन सुदूर संवेदन तथा ज्योइनफारमेटिक्स के क्षेत्र में शिक्षा एवं परिशिक्षण के द्वारा व्यावसायिक श्रेष्ठता को जारी रखना तथा प्रोत्साहन करना है। इसका दूसरा उद्देश्य भूविज्ञान, मानचित्रण, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, पर्यावरण प्रबन्धन इत्यादि विषयों में धरातलीय अनुभवों तथा प्रयोगकर्ता के संवाद को एकीकृत करना है। इसका तीसरा महत्वपूर्ण कार्य प्राकृतिक संसाधनों के विकास तथा प्रबन्धन के लिये सामाजिक-आर्थिक सोच-विचार का ध्यान रखते हुये अन्तर विषयी अन्तरापृष्ट की स्थापना करना है।

          उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिये संस्थान में तकनीक तथा उपयोग के लिये कई विभाग हैं जो फोटोग्रामेंट्री सुदूर संवेदन, ज्योइन्फोरमेटिक्स तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनों के प्रबन्धन को संचालित करते हैं। इनमें प्रमुख विभाग हैं-

(i) फोटोग्राफी एवं सुदूर संवेदन,

(ii) भू-विज्ञान,

(iii) कृषि एवं मृदा

(iv) जल संसाधन

(v) समुद्र विज्ञान

(vi) वन एवं पारिस्थितिकी

(vii) मानव अधिवास विश्लेषण तथा

(viii) ज्योइन्फोर्मेटिक।

प्रश्न प्रारूप

Q. भारतीय सुदूर संवेदक उपग्रह पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Indian remote sensing satellite-IRS.)



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