10. OCEAN WAVE / समुद्री तरंग

10. OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

OCEAN WAVE


OCEAN WAVE (समुद्री तरंग)

          समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पायी जाती है। जैसे- ज्वार-भाटा, जलधारा, तरंग इत्यादि। रिचर्ड महोदय ने समुद्री तरंग को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री लहर महासागर की तरल सतह का एक विक्षोभ गति है।” इसे दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि समुद्री जल का ऊपरी भाग किसी एक निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द दोलन करने वाली गति को तरंग कहते हैं। समुद्री लहरें व्यापक एवं सर्वत्र पायी जाने वाली गति है। लहरों की उत्पत्ति में वायु, ज्वार-भाटा तथा भूकंप का योगदान होता है। इन तीनों में सर्वाधिक योगदान वायु की होती है। वायु जब सागरीय जल के साथ घर्षण करते हुए आगे बढ़ती है तो सागरीय जल के ऊपरी भाग में एक दोलन गति उत्पन्न होती है। इस गति में जल का स्थानांतरण नहीं होता है बल्कि जल एक निश्चित बिंदु के आगे या पीछे ऊपर या नीचे दोलन करती है।

OCEAN WAVE

 

लहर की संरचना

          तरंग में जल के लगातार उठाव और गिराव का क्रम जारी रहता है। इसके उठाव वाले भाग को शिखर या शीर्ष कहते हैं। जबकि गिराव वाले भाग को गर्त कहते हैं। दो क्रमबद्ध शीर्ष या दो क्रमबद्व गर्त के बीच की दूरी को तरंग की लंबाई कहते हैं।

           गर्त बिंदु से शीर्ष बिंदु के बीच की लम्बवत ऊंचाई को तरंग की ऊंचाई कहते हैं। दो शीर्ष बिंदुओं को एक निश्चित बिंदु से गुजरने में जो समय लगता है उसे तरंग की अवधि कहते हैं। तरंग की वेग और उसकी अवधि वायु की गति पर निर्भर करती है। जैसे- खुले समुद्रों में निर्विध्न रुप से हवाएं चलती है वहां अधिक लंबी एक ऊंची लहरें उत्पन्न होती है। पवन का प्रभाव सागर के भीतर 100 वर्ग मीटर की गहराई तक पड़ता है।
         सागरीय तरंगे तट की ओर अग्रसर होती है। जैसे-जैसे लहरें तट के निकट आते जाती है वैसे-वैसे सागरों की गहराई में भी कमी आते जाती है। इसी कारण से छिछले समुद्र में तरंग का निचला भाग समुद्र नितल से रगड़ खाकर आगे बढ़ने लगता है। रगड़ के कारण तरंग के प्रवाह में रुकावट आती है जिसके कारण लहरों की ऊंचाई अधिक हो जाती है लेकिन तरंग की लंबाई कम हो जाती है। तरंग की शीर्ष की ऊंचाई अधिक हो जाने से वह टूटकर आगे गिरता है। तरंग की टूटी हुई जल की भाग को सर्फ या ब्रेकर या स्वाश कहा जाता है। इसमें जल पीछे की ओर गिरते हुए प्रतीत होता है। 
 चित्र  : समुद्र में उत्पन्न तरंग एवं सर्फ
 
         समुद्री तरंगों में उत्पन्न तरंग दो कारकों पर निर्भर करते हैं-
(i) जल की गहराई पर
(ii) तरंग की ऊंचाई पर
      टुक्कर नामक समुद्रीवेता ने तरंग की लंबाई ज्ञात करने के लिए एक सूत्र का प्रयोग किया। जैसे-
तरंग की लंबाई = तरंग के दो शीर्षों की लम्बाई ÷ उनकी अवधि
        इस सूत्र के आधार पर टुक्कर ने बताया कि यदि तरंग की लंबाई अधिक है और जल की गहराई कम है तो उसकी गति पर नियंत्रण जल की गहराई का होता है। यदि लहर की लंबाई कम है तो गति पर लहर की लंबाई का नियंत्रण होता है। खुले समुद्रों में लहरों की गति एवं आकार पर जल की गहराई और वायु के वेग पर निर्भर करती है। लेकिन तटवर्ती क्षेत्रों में तटीय आकृति का भी लहरों पर प्रभाव पड़ने लगता है।
तरंग की प्रकार
 
      दोलन के आधार पर सागरीय तरंग दो प्रकार के होते हैं:-
1. अनुप्रस्थ
2. अनुधैर्य
        अनुप्रस्थ तरंग की तुलना प्रकाश तरंग से और अनुदैर्ध्य तरंग की तुलना ध्वनि गति से की जा सकती है। अनुप्रस्थ तरंग में जल किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द लंबवत रूप से ऊपर उठने एवं नीचे बैठने की प्रवृत्ति रखता है जबकि अनुदैर्ध्य तरंग में क्षैतिज रूप से जल दोलन करने की प्रवृत्ति रखता है। ब्यूफोर्ट महोदय ने कुछ विशिष्ट लहरों का विवरण प्रस्तुत किया है। जैसे- 
(1) स्वेल- स्वेल तरंग में तरंग का शीर्ष गोलाकार तथा गर्त ज्यावक्रीय होती है। इसमें जल की सतह हल्के उभार वाली होती है। 
(2) फेनिल तरंग (Surf)- ऐसे तरंगें छिछले सागरों में उत्पन्न होते है। छिछले सागर में तरंग की शीर्ष टूटकर सर्प का निर्माण होता है। 
(3) स्थानांतरण तरंग- स्थानांतरण तरंग में जल की वास्तविक गति और तरंग की गति एक ही दिशा में होती है। स्थानांतरण तरंग में जल की ऊपरी सतह से लेकर सागर की तली तक का समस्त जल एक ही दिशा में गतिशील होता है।
(4) दोलन करने वाली लहरें- जब किसी निश्चित बिंदु के इर्द-गिर्द तरंगों के शीर्ष एवं गर्त का निर्माण होता है तो उसे दोलन करने वाली लहरें कहते हैं।
(5) हानिकारक तरंग- इसे ब्यूफोर्ट महोदय ने पुनः दो भागों में बाँटा है:-
(i) सूनामी- सुनामी समुद्री क्षेत्रों में आने वाले भूकंप एवं ज्वालामुखी उद्गारों के कारण उत्पन्न होते हैं। सुनामी एक जापानी शब्द है जिसका तात्पर्य भूकंप से उत्पन्न समुद्री लहर है। सुनामी लहर के उत्पन्न में वायु का कोई योगदान नहीं होता। सुनामी सामान्य लहरों की तुलना में बड़ी एवं विनाशकारी होती है। भूकम्प आने के 12 मिनट बाद सुनामी लहरें आती है। समुद्र में जितने भूकंप के झटके आते हैं समुद्र में उतने ही सुनामी लहरें आती है। प्रशांत महासागर सुनामी तरंगों के लिए प्रसिद्ध है। फिलीपींस, जापान, हवाई द्वीप सुनामी तरंगों से अत्याधिक प्रभावित होते हैं। खुले समुद्रों में सुनामी तरंगे अधिक हानिकारक नहीं होती है। लेकिन तटीय क्षेत्रों में इनकी भयंकर परिणाम होते हैं। 1883 ई० में इंडोनेशिया के क्राकाडोवा द्वीप पर भयंकर ज्वालामुखी उद्गार से 360 मीटर ऊँची तरंगे उत्पन्न हुई थी जिसमें 36000 लोग मारे गए थे। 26 दिसंबर 2004 को सुमात्रा के दक्षिणी भाग में आए भूकंप के कारण उत्पन्न सुनामी लहरों के कारण लाखों लोग मारे गए।
(ii) तूफानी तरंग- जब हरिकेन जैसे चक्रवात उत्पन्न होते हैं तो तटीय भागों में ऊंची-ऊंची लहरें उठती है। इससे प्रायः तटीय भागों में जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।
समुद्री तरंग का महत्व
(1) समुद्री तरंगों के द्वारा तट का कटाव होता है। कटे-फटे तट जलयानों एवं बंदरगाहों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
(2) लहरों के द्वारा होने वाले कटाव के कारण कृषि योग्य भूमि इत्यादि विलीन हो जाते हैं।
(3) लहरों के कारण वायु और जल में मिश्रण का कार्य होता है जिससे समुद्री जीव ऑक्सीजन ग्रहण कर जीवित रहते हैं। 
(4) लहरों के कारण संचार व्यवस्था प्रभावित होती है।
(5) लहरों के कारण समुद्री तट पर कई प्रकार के निक्षेप एकत्रित हो जाते हैं।
(6) लहरी तरंग ऊर्जा के उत्पादन में सहायक होता है।
निष्कर्ष:- इस उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लहर मानव जीवन को कई प्रकार से प्रभावित करते हैं।

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9. Oceanic Deposits / महासागरीय निक्षेप

Oceanic Deposits

(महासागरीय निक्षेप)  



Oceanic DepositsOceanic Deposits (महासागरीय निक्षेप)  

         समुद्र के तली पर मिलने वाले अनेक असंगठित पदार्थों के निक्षेप को समुद्री निक्षेप कहते है। इन निक्षेपों में अकार्बनिक एवं कार्बनिक दोनों प्रकार के पदार्थ शामिल होते है। समुद्री निक्षेप के विषय में अनेक अध्ययन समुद्रीवेताओं के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। समुद्री निक्षेप के सम्बन्ध में सर्वप्रथम जानकारी यूनानी भूगोलवेत्ता हेरोडोटस ने दिया था। उसके बाद 1773 ई० में कैप्टन किप्स, 1872 ई० में मर्रे और रेनार्ड ने समुद्री निक्षेप का मानचित्र प्रस्तुत किया। उसके बाद गरहार्ड स्कॉट महोदय ने विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।

        इन विद्वानों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि समुद्री निक्षेप के कई स्रोत है। जैसे स्थलीय भाग, ज्वालामुखी उदगार से प्राप्त मलबा, वायुमंडल, ब्रह्मांड एवं समुद्र से मिलने वाले अनेक जीव जंतु। इन स्रोतों से प्राप्त होने वाले पदार्थों का निक्षेपण लाखों वर्षों से हो रहा है। इसकी मोटाई एक समान नहीं है। लेकिन कहीं-कहीं पर मोटाई 500 मीटर से अधिक पाई गई है। समुद्री निक्षेपों का वितरण कणों के आकार-प्रकार, समुद्री लवणता एवं समुद्री जल की गतियों पर निर्भर करता है। समुद्री निक्षेप के जमाव का दर बहुत ही मन्द है। इन निक्षेपों में स्थलीय निक्षेप की भाँति स्तर नहीं पाए जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि समुद्र तल से ज्यों-ज्यों गहराई में जाते हैं, त्यों-त्यों समुद्री निक्षेप की गहनता में वृद्धि होती जाती है। इसी तरह तटीय क्षेत्र से गहन सागर क्षेत्रों की ओर जाने पर इनके वितरण प्रारूप में परिवर्तन होता जाता है।

समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

      समुद्री निक्षेपों का कई आधार पर एवं कई विद्वानों के द्वारा वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। जैसे:-

(1) मरे के अनुसार-  मरे महोदय ने स्थिति के आधार पर समुद्री निक्षेप को दो भागों में बांटा है- 

(i) भूमिज निक्षेप

(ii) पेलाजिक निक्षेप

      मरे के अनुसार 100 फैदम या 200 मी० की गहराई तक भूमिज निक्षेप और उसके आगे पेलाजिक निक्षेप पाई जाती है।

(2) जेनकिंस के अनुसार- जेनकिंस ने समुद्र की गहराई को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है:-

(i) तटीय निक्षेप- तटीय निक्षेप उच्च ज्वार और निम्न ज्वार के बीच में तटीय भागों में पाई जाती है। यह सामान्यतः 100 फैदम की गहराई तक पाए जाते हैं। इसमें मूलतः कंकड़, बालू, बजरी जैसे पदार्थों का निक्षेपण पाया जाता है।

(ii) छिछला सागर निक्षेप- यह 100 से 200 फैदम में समुद्री गहराई के बीच मिलते हैं।

(iii) गहन सागरीय निक्षेप- इसे जेनकिंस महोदय ने पेलाजिक निक्षेप से भी संबोधित किया है।

(3) जॉनसन के अनुसार- जॉनसन ने समुद्री निक्षेपों के प्रकृति को आधार मानते हुए समुद्री निक्षेप को तीन भागों में बांटा है :-

(i) छिछला सागरीय समुद्री निक्षेप- कुल समुद्री भूपटल के क्षेत्र का 9.1% भाग पर फैला है। 

(ii) भूमिज निक्षेप- इसका विस्तार 15.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(iii) पेलाजिक निक्षेप- इसका विस्तार 75.5% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

(4) स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप का वर्गीकरण

         यह किसी एक समुद्रीवेता के द्वारा  प्रस्तुत नहीं किया गया है। समुद्री निक्षेप का सबसे उपयुक्त एवं वैज्ञानिक विश्लेषण स्रोत के आधार पर ही किया जा सकता है। स्रोत के आधार पर किए गए वर्गीकरण से उसकी उत्पत्ति एवं प्रत्येक की विशेषता का भी विश्लेषण स्पष्ट हो जाता है। अतः स्रोत के आधार पर समुद्री निक्षेप को 6 भागों में बांटते हैं:-

(i) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)

(ii) ज्वालामुखी निक्षेप (Volcanic Deposits)

(iii) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits)

(iv) ब्रह्माण्डीय निक्षेप 

(v) जैविक निक्षेप (Organic Deposits)

(vi) लाल चिका 

(1) भूमिज निक्षेप (Terrigenous Deposits)- 

       समुद्र के तली पर निक्षेपित अधिकतर पदार्थ स्थलीय भागों से ही प्राप्त होते हैं। स्थलीय भागों के चट्टानें सतत ऋतुक्षरित होते रहती है। ऋतुक्षरण से प्राप्त मलबा को अपरदन के दूत समुद्र के नितल तक पहुंचाते रहते हैं। इनमें सबसे प्रमुख योगदान नदियों का है। भूमिज निक्षेप को उत्पत्ति, कणों की आकृति और रासायनिक संगठन के आधार पर कई भागों में बांटते हैं :-

(A) गोलाश्म और बजरी (Bolder and Gravel)

(B) रेत या बालू (Sand)

(C) गाद (Silt)

(D) मृतिका (Clay)

(E) पंक (Mud)

           गोलाश्म के टुकड़ों का व्यास न्यूनतम 256 mm होता है जबकि बजरी का व्यास 2 से 256 mm तक होता है। ये दोनों समुद्री तरंगों के द्वारा तटीय क्षेत्रों में सतत किए जा रहे अपरदन से प्राप्त होते हैं। इनका निक्षेपण प्राय: तटीय क्षेत्रों में देखने को मिलता है। 

          रेत या बालू के कणों का व्यास 1/8 से 2mm तक होता है। बालू की प्राप्ति स्थानीय चट्टानों के ऋतुक्षण एवं अपरदन से होता है। रेत के कण भी कई प्रकार के होते हैं। जैसे :- बहुत मोटी रेत, मोटी रेत, मध्यम बालू/ रेत, बारिक रेत और बहुत बारीक रेत।

           गाद, मृतिका और पंक के कणों के व्यास 1/8192mm से 1/8mm तक होता है। गाद पंक के चट्टानी कणों को जोड़ने का कार्य करता है। छिछली एवं शांत सागरों में मृतिका एवं पंक बारीक कण के रूप में पानी पर लटके रहते हैं।

        सबसे सूक्ष्म भूमिज निक्षेप में पंक या कीचड़ को शामिल किया जाता है। कीचड़ प्रायः 1000 फैदम गहराई के बाद ही पाये जाते हैं। मर्रे महोदय ने बताया कि ये कई रंग के होते है। रंग के आधार पर उन्होनें पंक या कीचड़ को तीन भागों में बांटा है- 

(i) नीला पंक (Blue Mud)

(ii) लाल पंक (Red Mud)

(iii) हरा पंक (Green Mud)

        नीला पंक उन चट्टानों के अवशेषों से बनती है जिसमें आयरन सल्फाइड एवं अन्य जैविक तत्व मौजूद रहते है। नीली पंक सभी महासागरों में मिलती है। इसका विस्तार लगभग 232 लाख वर्ग किमी में है।

         लाल पंक का निर्माण लौह ऑक्साइड वाले चट्टानों के ऋतुक्षरण से हुआ है। इसका सर्वाधिक विस्तार पीला सागर और अटलांटिक महासागर के ब्राजील के तट पर देखा जा सकता है।

       हरा पंक का निर्माण नीला पंक के रासायनिक परिवर्तन से होता है। इसमें हरा रंग Gluconites नामक खनिज के कारण होता है। हरा पंक उतरी अमेरिका के प्रशांत एवं अटलांटिक तट पर, ऑस्ट्रेलिया और जापान के तट पर तथा दक्षिण अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के तट पर पाये जाते हैं।

(2) ज्वालामुखी निक्षेप 

           ज्वालामुखी उदगार के कारण बड़े पैमाने पर मलबा का जमाव स्थलीय एवं सागरीय भूपटल पर होता रहता है। स्थलीय भाग पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले मलबा, लावा धीरे-धीरे ठंडा होने की प्रवृति रखते है। जबकि सागरीय भूपटल पर होने वाला ज्वालामुखी उदगार से निकले लावा तेजी से ठंडा होता है। अतः इसके आधार पर ज्वालामुखी निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) समुद्री ज्वालामुखी निक्षेप

(ii) स्थलीय ज्वालामुखी निक्षेप

         स्थलीय ज्वालामुखी पदार्थ अपरदन के दूतों के द्वारा समुद्री भूपटल पर लाये जाते हैं जो भूमिज के निक्षेप के साथ मिश्रित हो जाते है जिसके कारण इन्हें अलग से पहचान करना संभव नहीं हो पाता है। जबकि समुद्री ज्वालामुखी से प्राप्त पदार्थ अपने मौलिक अवस्था में लंबे समय तक बने रहते हैं। अपरदन एवं ऋतुक्षरण के अभाव में इनका मौलिक गुण यथावत रहता है। 10 लाख वर्ग किमी० समुद्री भूपटल पर इनका निक्षेपण हुआ है। इसका प्रमाण महासागरीय कटक और ज्वालामुखी द्वीपों के सहारे मिलता है।

(3) अजैविक निक्षेप (Inorganic Deposits) 

      अजैविक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत वायुमण्डल है। जब जलवायु परिवर्तन होता है तो वैसी स्थिति में वायुमण्डल के ठोस कण सतह पर गिरने लगते है और रासायनिक प्रतिक्रिया कर ग्लूकोनाइट जैसे खनिज का निर्माण करते हैं। इसी तरह यदि वायुमण्डल से CO2 हटा दिया जाय तो डोलोमाइट, सिलिका और लौहे के कण सतह पर गिरकर विशिष्ट अजैविक समुद्री निक्षेप का निर्माण करते हैं। इनका निक्षेपण लगभग सभी सागरों में हुआ है। 

(4)  ब्रह्माण्डीय निक्षेप

          ब्रह्माण्डीय पिंडों से हमारी समुद्री सतह पर निक्षेपित होने वाली पदार्थों को ब्रह्माण्डीय निक्षेप कहते है। स्पष्ट है कि इसका स्रोत हमारी पृथ्वी या वायुमण्डल नहीं है बल्कि हमारे सौरमण्डल या अन्य खगोलीय पिंड इसके स्रोत है। इस प्रकार के निक्षेप सबसे अधिक प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर में हुआ है। प्रशांत महासागर के 0.25% क्षेत्रफल पर इसका विस्तार हुआ है। ब्रह्माण्डीय निक्षेप का रंग काला होता है तथा इसमें लोहे का अंश अधिक होता है।

(5) जैविक निक्षेप 

            समुद्री जल में अनेक प्रकार के जीव जंतु पाए जाते हैं। जब ये सागरीय जीव मरते हैं तो उन जीवों के हड्डियां, मांस एवं उनके शरीर में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों इत्यादि का जमाव समुद्री नीतल पर होता रहता है। जैविक समुद्री निक्षेप गर्म सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं। गुणों के आधार पर जैविक निक्षेप को दो भागों में बांटते हैं –

(i) नेरेटिक जमाव/ तट तलवासी निक्षेप

(ii) पेलाजिक जमाव/अगाध सागरस्थ निक्षेप

           समुद्र में पाए जाने वाले जीव-जंतुओं की हड्डियों, मछलियों, प्रवाल, शीप, स्पंज इत्यादि के स्थिर पंजर वाले अवशेषों को नेरेटिक जमाव कहते हैं। नेरिटिक जमाव समुद्री तली में किसी विशिष्ट स्थान पर नहीं पाए जाते। लेकिन इन पर लगातार समुद्री लहरों एवं जल धाराओं के प्रहार के कारण महीन कण के रूप में टूटते रहते हैं। 

           पेलाजिक जमाव कीचड़ के समान होता है जिसे ऊज (Ooze) भी कहा जाता है। सूखने पर यह पाउडर के समान हो जाता है। इसका निर्माण विशिष्ट प्रकार के शैवाल, प्रोटोजोआ, डायटम जैसे जीवों के द्वारा होता है। ये प्रायः सागरीय क्षेत्रों में मिलते हैं। रसायनिक विशेषता के आधार पर इसे दो भागों में बांटते हैं –

(A) चुना प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) टेरोपॉड

(ii) ग्लोबीजेरिना

(B) सिलिका प्रधान पेलाजिक- दो प्रकार के

(i) रेडियोलेरियन पेलाजिक

(ii) डायटम पेलाजिक

       टेरोपॉड का विस्तार 0.4%, ग्लोबीजेरिना का विस्तार 29.2%, रेडियोलेरीयन का विस्तार 3.4% और डायटम का विस्तार 6.4% समुद्री भूपटल पर हुआ है।

      टेरोपॉड चूनायुक्त पदार्थ है। इसका स्रोत चूना प्रधान वाले जीवों का शरीर होता है। इस निक्षेप का नाम भी टेरोपॉड नामक जीव के आधार पर किया गया है। यह प्रायः उष्ण एवं छिछले सागरों में पाया जाता है। यह 1600-3000 मीटर की गहराई में मिलते हैं। इसका सर्वाधिक विस्तार अटलांटिक महासागर में हुआ है।

        ग्लोबीजेरिना का रंग सफेद होता है। इसका प्रमुख स्रोत फेरामिनीफेरा नामक समुद्री जीव है। 3000 से 4000 मीटर की गहराई पर मिलते हैं। ठंडे सागरीय जल में कम और गर्म सागरीय जल में अधिक मिलते हैं।

          डायटम सिलिका प्रधान जैविक निक्षेप है। इसका रंग स्लेटी होता है। 1200 से 4000 मीटर की गहराई पर अधिक मिलते हैं। इसका प्रमुख स्रोत डायटम नामक जीव है। उच्च अक्षांशीय भागों के ठंडे सागरीय क्षेत्रों में अधिक पाई जाती है। अंटार्कटिका के इर्द-गिर्द इसका निक्षेप सर्वाधिक हुआ है। 

       रेडियोलेरियन नामक समुद्री निक्षेप का मुख्य स्रोत रेडियोलेरियन नामक जीव है। जो उष्ण जल में मिलने वाला जीव है। 4000-10000 मीटर की गहराई तक इसका निक्षेपण हुआ है। प्रशांत महासागर में इसका विस्तार सबसे अधिक है।

(6) लाल चीका 

        यह मुख्यतः एलुमिनियम और ऑक्सीकृत लोहा के हाइड्रेट सिलिकेट से निर्मित होता है। प्राथमिक मान्यता यह रही है कि इसका निर्माण विभिन्न प्रकार के समुद्री निक्षेपों से प्राप्त होने वाले खनिजों के टूटने से बनता है। लेकिन नवीन मान्यता वाईविल थॉमसन ने विकसित करते हुए कहा है कि यह भी एक प्रकार का जैविक निक्षेप ही है जिसका निर्माण चूना प्रधान वाले जीवों के विघटन से होता है। लाल चिका चूना प्रधान वाले जीवों में मिलने वाला ऐसा खनिज है जिसका विलियन संभव नहीं हो सका है। लाल चिका का निक्षेपण तीनों महासागरों में हुआ है। 

          इस तरह ऊपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि स्रोत के आधार पर किया गया वर्गीकरण को सबसे अधिक मान्यता प्राप्त है। समुद्री निक्षेपों के वितरण को नीचे के मानचित्र में देखा जा सकता है।



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8. OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY

सागरीय  लवणता

OCEAN SALINITY




OCEAN SALINITY / सागरीय  लवणता 

         समुद्री जल में लवण की घुली हुई मात्रा को समुद्री लवणता कहते है। प्रारंभ में जब पृथ्वी का निर्माण हुआ तो उसका उपरी भाग ठंडा होकर भूपटल का निर्माण किया। भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व कम था उससे महाद्वीपीय भूपटल का निर्माण हुआ और भूपटल का वह भाग जिसका घनत्व अधिक था उससे महासागरीय भूपटल का निर्माण हुआ। 

     कालान्तर में स्थ्लमंडल से अपरदन के दूतों के द्वारा लवणों को सागर तक पहुँचाने का कार्य अनवरत जारी है। समुद्री जल में मुख्यतः 47 प्रकार के लवण पाए जाते है जिसमें NaCl की मात्रा सर्वाधिक (77.08%) है। इसके अतिरिक्त MgCl (10.09%), MgSo4 (4.9%) कैल्सियम सल्फेट (3.6%) भी प्रमुख लवण पाए जाते है। शेष अन्य प्रकार के लवण पाए जाते है।

लवणता का मापन:

        लवणता का मापन प्रति हजार ग्राम जल में उपस्थित लवण की मात्रा के अनुपात से ज्ञात करते है। इसे प्रति हजार (gm ‰) के द्वारा निरुपित करते है। डिटमर महोदय के अनुसार सागरीय जल में औसत लवणता 35 ‰ पायी जाती है। समुद्री जल में लवणता सर्वत्र एक सामान नहीं पाई जाती है। लवणता को प्रभावित करने वाले कई कारक है-

लवणता को प्रभावित करने वाले  कारक:

1. वर्षा एवं वाष्पीकरण-

      वर्षा एवं लवणता  के बीच व्यत्क्रमानुपाती संबंध होता है। अर्थात जिन स्थानों पर वर्षा ज्यादा होती है वहाँ लवणता कम होती है जहाँ पर वर्षा कम होती है वहाँ पर लवणता अधिक होती है।इसी तरह लवणता एवं वाष्पीकरण के बीच समानुपाती का संबंध होता है। जिन क्षेत्रों में वाष्पीकरण अधिक होता है उन क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है और जहाँ वाष्पीकरण कम होता है वहाँ लवणता भी कम पायी जाती है। इन संबंधों को नीचे के ग्राफ में देखा जा सकता है-

चित्र : लवणता एवं वर्षा में व्युत्क्रमानुपाती संबंध
चित्र: लवणता एवं वाष्पीकरण में समानुपाती का सम्बंध

          विषुवतीय क्षेत्र को छोड़कर अन्य उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण का प्रभाव कम होता है और वर्षा कम होती है। यही कारण है की विश्व के अधिक लवणता वाले क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्र में स्थित नहीं है बल्कि 30° से 35° अक्षांश के बीच उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र में स्थित है। जैसे- तुर्की का वानगोलु झील (330 ‰), मृत सागर (340 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰)।

            विषुवतीय क्षेत्रों में वाष्पीकरण की तुलना में वर्षा अधिक होती है। इसीलिए वहाँ लवणता कम पाए जाते है।

2. समुद्री जलधाराएँ-

       विश्व के सभी महासागरों में समुद्री जलधाराएँ चला करती है। उत्तरी गोलार्द्ध  में जलधाराएँ Clock Wise  और दक्षिणी गोलार्द्ध में Anticlock Wise चला करती है। इसका तात्पर्य हुआ कि निम्न अक्षांश से जलधाराएँ उच्च अक्षांश की ओर जाती है और कुछ जलधाराएँ उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर आती है। तापमान के विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार के होती है-

(i) ठंडी जलधारा

(ii) गर्म जलधारा।

     गर्म जलधारा में वाष्पीकरण अधिक होता है जिससे लवणता बढ़ने की प्रवृति रखती है। इसके विपरीत ठंडी जलधाराओं में वाष्पीकरण कम होता है। इसीलिए लवणता भी कम होती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह के कारण ही उत्तरी सागर में लवणता बढ़ जाती जाती है। इसी तरह उत्तरी प्रशांत गर्म जल जलधारा के कारण अलास्का की खाड़ी में लवणता बढ़ जाती है।

 3. बर्फ का पिघलना-

       यह ज्ञात है कि ध्रुवीय क्षेत्र बर्फ से ढके हुए हैं। सूर्याताप प्राप्त करके जब बर्फ पिघलती हैं तो समुद्र में जलापूर्ति बढ़ जाती है। जिसके परिणामस्वरूप लवणता में भी कमी आ जाती है। यही कारण है कि आर्कटिक सागर और अंटार्कटिका के तटीय क्षेत्रों में लवणता कम पाई जाती है।

4. नदियों के द्वारा स्वच्छ जल की  आपूर्ति-

          नदी जल स्वच्छ जल के उदाहरण है। विश्व के कई बड़ी बड़ी नदियां अपना जल सतत समुद्र में उधेड़ रही है। काला सागर और कैस्पियन सागर दोनों एक ही अक्षांश पर है लेकिन काला सागर में डेन्यूब नदी और वोल्गा नदी के गिरने के कारण काला सागर की लवणता कम और कैस्पियन सागर की लवणता अधिक है।

5. तटीय आकृति-

       जिन क्षेत्रों में समुद्र का किनारा सीधा और सपाट है वहाँ पर जल का मिश्रण आसानी से हो जाता है। जबकि अधिक कटे-फटे तटीय क्षेत्रों में जल का मिश्रण आसानी से नहीं हो पाता है जिसके कारण ऐसे क्षेत्रों में लवणता अधिक पाई जाती है।

6. ज्वालामुखी उदगार की क्रिया-

        प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर और भूमध्यसागर में कई जीवित ज्वालामुखी पाये जाते हैं। इन ज्वालामुखी उदगारों के कारण जल वाष्पीकृत होते है और लवणता को बढ़ा देते हैं। ज्वालामुखी उदगार के ही कारण अटलांटिक कटक के सहारे लवणता अधिक पायी जाती है।

7. वायुदाब-

       अधिक वायुदाब के कारण जल के सतह नीचे की ओर धँस जाता है जबकि निम्न वायुदाब क्षेत्रों में जल का सतह सामान्य जल स्तर से ऊपर उठा होता है। इस परिघटना के कारण समुद्री जलधाराएँ  उच्च जल स्तर वाले क्षेत्र से निम्न जलस्तर वाले क्षेत्र की ओर चलने लगते है जिसके कारण समुद्री लवणताएँ प्रभावित होती है।

       इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री लवणता को कई कारक प्रभावित करते हैं।

लवणता का वितरण

         विश्व के सभी महासागर आपस में जुड़े हुए हैं। इसीलिए बड़े महासागर और छोटे महासागरों के लवणता में कोई विशेष अंतर नहीं पायी जाती है। लेकिन धरातल  पर कुछ ही जलाशय हैं जो समुद्र से जुड़े हुए नहीं हैं। ऐसे ही बंद सागरों की लवणता खुली सागरों की तुलना में अधिक है। सामान्य तौर पर समुद्री लवणता का अध्ययन दो शीर्षकों में बाँटकर किया जा सकता है-

(A) क्षैतिज लवणता

(B) लम्बवत लवणता

(A) क्षैतिज लवणता

      इसके अंतर्गत महासागरीय लवणता का वितरण का अध्ययन अक्षांशीय आधार पर किया जाता है। सामान्यतः पृथ्वी को दो भागों में बाँटा जाता है- उत्तरी गोलार्द्ध एवं  दक्षिणी गोलार्द्ध। 

     उत्तरी गोलार्द्ध में महासागर का विस्तार कम और महाद्वीपों का विस्तार अधिक हुआ है। जबकि दक्षिणी  गोलार्द्ध में सागर का विस्तार अधिक और स्थल का विस्तार कम हुआ है। यही कारण है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी  गोलार्द्ध के पानी में लवणता कम पायी जाती है। दोनों गोलार्द्धों में समुद्री लवणता के अक्षांशीय वितरण को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है-

अक्षांशीय क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में लवणता दक्षिणी गोलार्द्ध में लवणता प्रमुख कारण
0°–10° (भूमध्यरेखीय क्षेत्र) कम (≈ 34‰) कम (≈ 34‰) अधिक वर्षा, नदियों का मीठा जल
10°–20° मध्यम मध्यम वर्षा में कमी, वाष्पीकरण बढ़ता
20°–30° (उपोष्ण कटिबंध) अधिकतम (≈ 36–37‰) अधिकतम (≈ 36‰) तीव्र वाष्पीकरण, कम वर्षा
30°–40° घटती हुई घटती हुई पश्चिमी पवनों से वर्षा
40°–60° कम कम कम तापमान, हिम पिघलना
60°–90° (ध्रुवीय क्षेत्र) बहुत कम (≈ 30–32‰) बहुत कम (≈ 30–32‰) हिम गलन, न्यून वाष्पीकरण
   उपरोक्त तालिका के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में दक्षिणी गोलार्द्ध की लवणता कम होती है। लेकिन समुद्री लवणता के वितरण को आधार बनाकर विश्व के महासागरीय क्षेत्र को सामान्य रूप से चार भागों में वर्गीकृत कर अध्ययन करते है।

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र

(1) अत्यधिक लवणता वाले क्षेत्र-

     इसके अंतर्गत वैसे सागरों एवं झीलों को शामिल किया जाता है जिनकी औसत लवणता 40 ०/०० से अधिक है। इसके अंतर्गत उष्ण एवं उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के बन्द सागर एवं झील आते है। ये वे क्षेत्र है जहाँ वाष्पीकरण अधिक एवं जलापूर्ति या वर्षा कम होती है। यह सामान्यतः 30° से 35° अक्षांश के बीच के क्षेत्र है। इन्ही क्षेत्रों में मरुस्थलीय एवं अर्द्धमरुस्थलीय जलवायु पायी जाती है। विश्व में सर्वाधिक लवणता रखने वाला मृत सागर (340‰), वानगोलू/वुलर झील (330 ‰), ग्रेट बेसिन (220 ‰), ऑस्ट्रेलिया के आयर झील आते है। इसके अलावे लाल सागर, पार्सियन की खाड़ी, कैस्पियन सागर, भूमध्य सागर के अफ्रीकी तट और जिब्राल्टर के मुहाना पर भी समुद्री लवणता 40 ‰ से अधिक पायी जाती है।

(2) अधिक लवणता वाले क्षेत्र-

      इसके अंतर्गत 30 से 40 ‰ लवणता रखने वाले जलाशयों को शामिल करते है। भौगोलिक वितरण की दृष्टि से विषुवतीय क्षेत्र 5º से 5º को छोड़कर 5º से 30º अक्षांश वाले क्षेत्र को और 45° से 50° अक्षांश के मध्य दोनों गोलार्द्धों में लवणता अधिक पायी जाती है। 40° से 50° अक्षांश के बीच गर्म समुद्री जलधारा के कारण लवणता अधिक पायी जाती है। जबकि 5° से 30° अक्षांश के बीच वर्षा एवं वाष्पीकरण में विभिन्नता के कारण लवणता अधिक पायी जाती है।

(3) निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

      इसके अंतर्गत 20 से 30 ‰ लवणता वाले क्षेत्र को शामिल करते है। इसके अंतर्गत मुख्यतः तीन क्षेत्र आते है-

(क) विषुवतीय क्षेत्र के महासागरों में 5°N से 5°S के बीच। यहाँ पर लवणता कम होने का प्रमुख कारण वर्षा अधिक और वाष्पीकरण का कम होना है।

(ख) 35° से 45°अक्षांश के बीच

(ग) 55° अक्षांश से ध्रुव (90° अक्षांश) तक

      विषुवतीय क्षेत्रों में निम्न लवणता का एक प्रमुख कारण बड़ी-बड़ी नदियों का समुद्र में गिरना भी है। जैसे- जायरे एवं अमेजन नदी अपना मुहाना विषुवतीय क्षेत्रों में ही बनाती है। यही कारण है कि इनके मुहाने पर औसत लवणता 10 ‰ तक पहुँच जाती है।

      उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में न्यून लवणता का प्रमुख कारण सूर्य के तापीय प्रभाव का कम होना है। सूर्य के कम तापीय प्रभाव के कारण वाष्पीकरण की क्रिया भी कम होती है। इसके अलावे उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों में ध्रुवीय हिम शीलाखण्ड और सेंटलॉरेन्स, राईन, एनेसी, ओब, लीना, जैसे नदियों के द्वारा बड़े पैमाने पर जलापूर्ति की जाती है।

(4) अति निम्न लवणता वाले क्षेत्र- 

       इसके अंतर्गत 20‰ से कम लवणता वाले क्षेत्रों को शामिल करते है। इसके अंतर्गत उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों के बन्द सागर और झील को शामिल करते है। उच्च अक्षांशीय क्षेत्र में शामिल होने के कारण यहाँ वाष्पीकरण कम होता है और हिमानियों के द्वारा स्वच्छ जल की आपूर्ति अधिक होती है।

      विश्व में सबसे कम लवणता बाल्टिक सागर के गल्फ ऑफ बोथनियाँ में गोटलैंड द्वीप (6 से 8 ‰) के पास पायी जाती है। इसके अलावे हड्सन की खाड़ी, कारा सागर, उजला सागर और बाल्टिक सागर की भी औसत लवणता बहुत कम पायी जाती है।

(B) लम्बवत लवणता का वितरण 

           महासागरों में लम्बवत दृष्टिकोण से भी लवणीय विषमता दिखाई पड़ती है। जैसे-

(i) विषुवतीय क्षेत्रों में सतह के ऊपर वर्षा अधिक होने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण का घनत्व अधिक होने के कारण नीचे की ओर बैठने की प्रवृति होती है। इसी कारण से ऊपर से नीचे की ओर जाने पर विषुवतीय क्षेत्रों में लवणता अधिक मिलती है।

(ii) मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों में 200 फैदम की गहराई तक लवणता में वृद्धि होती है। लेकिन उसके बाद लवणता में कमी आती है क्योंकि उपसतही जलधारा के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्रों के नीचले भागों में जलापूर्ति बढ़ जाती है।

(iii) ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपरी भागों में हिमशीलाखण्डों के पिघलने के कारण लवणता कम पायी जाती है। जबकि लवण के बैठने के कारण निचले भागों में लवणता अधिक पायी जाती है। सम्पूर्ण लम्बवत सागरीय लवणता के वितरण को नीचे के Flow Chart में देखा जा सकता है-

निष्कर्ष:

     इस प्रकार उपर्युक्त तथ्यों  से स्पष्ट है कि सागरीय लवणता में क्षैतिज एवं लम्बवत रूप से काफी विषमताएँ पायी जाती है। सागरीय लवणता में विषमता उतपन्न करने वाले कई कारक है। लेकिन इसके अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वर्षा और वाष्पीकरण लवणता को प्रभावित करने वाले दो सबसे प्रमुख कारक हैं।

नोट:

👉 वानगोलू झील (Lake Van) तुर्की के पूर्वी अनातोलिया क्षेत्र में स्थित एक अंत:स्थलीय खारी क्षारीय झील है। यह तुर्की की सबसे बड़ी झील है और समुद्र से कोई निकास नहीं रखती।

👉 मृत सागर

  • यह मध्य पूर्व (Middle East) में स्थित है।

  • इज़राइल और जॉर्डन की सीमा के बीच फैली हुई है।

  • यह पृथ्वी का सबसे निचला स्थल है (समुद्र तल से लगभग 430 मीटर नीचे)।

  • अत्यधिक लवणता के कारण इसमें जीव लगभग नहीं पाए जाते इसीलिए इसे मृत सागर कहा जाता है।

👉 ग्रेट बेसिन झील 

  • ग्रेट बेसिन झील उत्तरी अमेरिका के ग्रेट बेसिन क्षेत्र में स्थित है।
  • यह झील मुख्यतः Utah राज्य में पाई जाती है।
  • इसे सामान्यतः Great Salt Lake के नाम से जाना जाता है।
  • यह एक आंतरिक अपवाह (Inland Drainage) क्षेत्र की झील है, अर्थात इसका जल समुद्र तक नहीं पहुँचता।
  • अधिक वाष्पीकरण के कारण इसका जल अत्यधिक लवणीय (खारा) है।


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7. Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमान

7. Temperature of Oceanic Water

(सागरीय जल का तापमान)



Temperature of Oceanic Water / सागरीय जल का तापमान⇒Temperature of Oceanic Water

                 समुद्री जल ऊर्जा के अनेक स्रोतों से गर्म होने की प्रवृत्ति रखती है जिसे सागरीय तापमान कहते हैं। सागरीय जल को ऊष्मा कई स्रोतों से प्राप्त होती है। जैसे – सौर विकरण, रेडियो सक्रिय पदार्थों के विखंडन, ज्वालामुखी, सागरीय जल के दबाव एवं सागरीय जल के विभिन्न स्तरों के मध्य होने वाला घर्षण इत्यादि से। ऊर्जा के इन स्रोतों में से सबसे प्रमुख स्रोत सौर ऊर्जा है। सौर ऊर्जा स्थल और जल दोनों एक साथ प्राप्त करते हैं। लेकिन दोनों में तापमान ग्रहण करने की दर में अंतर होता है क्योंकि स्थल जल्दी गर्म होता है और जल्द ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है इसके विपरीत सागर जल देर से गर्म और देर से ठंडा होने की प्रवृत्ति रखता है। यही कारण है कि स्थल के औसत तापमान 15॰C की तुलना में सागरीय जल का औसत तापमान 17॰C होता है। समुद्री जल एवं स्थल के वार्षिक तापांतर में भी विभिन्नता पाई जाती है। जैसे- स्थल का वार्षिक तापांतर 145.5॰C है जबकि सागरीय जल का वार्षिक तापांतर 80॰C है। क्योंकि समुद्री जल में लगातार मिश्रण होता रहता है। जबकि स्थलीय भाग में इस तरह का कोई मिश्रण नहीं होता है। सागरीय जल सूर्य विकिरण के अवशोषण, पृथ्वी के नितल द्वारा, संवहन, गतिज ऊर्जा, जलवाष्प का संघनन जैसे प्रक्रियाओं से गर्म होता है। उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि सागरीय जल कई स्रोतों से एवं कई प्रक्रियाओं से गर्म होने की प्रवृत्ति रखते हैं। इन प्रक्रियाओं को कई कारक प्रभावित करते हैं। जिसके कारण सागरीय जल के वितरण में विविधता पाई जाती है।

सागरीय जल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक
            समुद्री जल के तापमान को कई कारक प्रभावित करते हैं। जैसे:- 
(1) अक्षांशीय स्थिति
(2) समुद्री जलधारा
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
(4) लवणता
(5) तट रेखा की बनावट
(6) मेघावरण
(7) हेमशीलाखंड
(8) समुद्री जल का घनत्व
 
(1) अक्षांशीय स्थिति
             विषुवत रेखा (0॰ अक्षांश रेखा) या निम्न अक्षांशीय क्षेत्र सालों भर सूर्य की लंबवत किरण प्राप्त करते हैं। जिसके कारण इस क्षेत्र के समुद्री भाग में तापमान अधिक होता है। जबकि ध्रुवीय प्रदेश में सूर्य की किरणें सालोंभर तिरछी पड़ती है। इसलिए यहां का तापमान काफी कम होता है। विषुवतीय प्रदेश का औसत समुद्री तापमान 25॰-26॰C के मध्य होता है जबकि आर्कटिक सागर का औसत तापमान शून्य से -1॰C से 1.9॰C होता है।
 
(2) समुद्री जल धारा
             यह ज्ञात है कि समुद्री जलधाराएं दो प्रकार की होती है -(i) गर्म जलधारा (ii) ठंडी जलधारा  गर्म जलधाराएं निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर चला करती है जबकि ठंडी जलधाराएं उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर चला करती है। जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में स्थानांतरण की प्रक्रिया पाई जाती है। उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह एक गर्म जलधारा है जिसके कारण उच्च अक्षांश के क्षेत्रों में स्थित बंदरगाहें खुली रहती है। जैसे नार्वे का हेमरफिस्ट और रूस का मरमंस्क बंदरगाह। दोनों लगभग एक ही अक्षांश पर स्थित है लेकिन समुद्री गर्म जलधारा के कारण हेमरफिस्ट का बंदरगाह सालोंभर खुला रहता है जबकि मरमंस्क बंदरगाह सालों भर लगभग बंद रहता है।
          अलनीनो और लानीनो ऐसी दो जलधाराएं हैं जिसके कारण समुद्री जल के तापमान में विविधता उत्पन्न होती है। अलनीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में 1-6॰C तक बढ़ोतरी होती है। जबकि लानीनो के कारण समुद्री जल के तापमान में गिरावट आती है।
 
(3) प्रचलित वायु और वायुदाब
               समुद्री जल के तापमान का निर्धारक प्रचलित वायु और वायुदाब को भी माना जाता है। जैसे- उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र का जलस्तर नीचे जबकि निम्न वायुदाब वाले क्षेत्रों में समुद्र जल का स्तर ऊपर होता है जिसके कारण जल का प्रवाह उच्च जल स्तर से निम्न जलस्तर क्षेत्र की ओर होने लगता है। अगर जल का प्रवाह विषुवतीय निम्न वायुदाब से उपोष्ण उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का हस्तांतरण निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की ओर होता है। इसके विपरीत जब जल का प्रवाह उप ध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर हो रहा हो तो तापमान का स्थानांतरण उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर होता है।
           प्रचलित वायु मुख्यत: तीन है- (i) वाणिज्य हवा (ii)  पछुआ हवा और (iii) ध्रुवीय हवा। ये हवाएं समुद्री सतह पर हजारों किलोमीटर तक सतत चलने की प्रवृत्ति रखती है। वाणिज्यिक हवा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र से विषुवतीय क्षेत्र की ओर ध्रुवीय हवा ध्रुवीय उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय भार की ओर, जबकि पछुआ हवा उपोष्ण उच्चभार से निम्न उपध्रुवीय वायुदाब क्षेत्र की ओर चला करती है। ये हवाएं समुद्र से तापमान को ग्रहण भी करती है और समुद्री जल के तापमान को बढ़ाती है। यह वायु की प्रकृति पर निर्भर करती है। जैसे ध्रुवीय वायु ठंडी होने के कारण मध्य अक्षांशीय क्षेत्र के जलीय तापमान को घटा देती है। इसके विपरीत पछुआ हवा गर्म होने के कारण उच्च अक्षांश क्षेत्र के समुद्री तापमान को बढ़ा देती है।
 
(4) लवणता
              समुद्री लवणता के कारण जल का प्रवाह कम लवणता वाले क्षेत्र से अधिक लवणता वाले क्षेत्र की ओर होता है। जैसे- अटलांटिक महासागर की तुलना में भूमध्य सागर का लवणता अधिक है जिसके कारण अटलांटिक महासागर का जल भूमध्यसागर में प्रविष्ट करता रहता है जिसके फलस्वरूप भूमध्यसागर के औसत तापमान में 1-2॰C तापमान की कमी हो जाती है।
 
(5) तट रेखा की बनावट
            अगर कोई खुला समुद्र हो तो उसका तापमान कम होता है जबकि बंद सागरों का तापमान अधिक होता है। जैसे विश्व के तीनों बड़े महासागरों में सबसे कम औसत समुद्री तापमान प्रशांत महासागर का और सबसे ज्यादा औसत समुद्र तापमान हिंद महासागर का है। हिंद महासागर में भी लाल सागर और परसियन  की खाड़ी का तापमान अरब सागर की तुलना में अधिक है क्योंकि वे दोनों सागर स्थलीय भाग से घिरे हैं जिसके कारण समुद्री जल का मिश्रण नहीं हो पाता है।
 
(6) मेघावरण
            विषुवतीय क्षेत्र और शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवात क्षेत्र में मेघावरण अधिक पाई जाती है। जिसके कारण सूर्य की रोशनी समुद्री सतह पर सतह नहीं पड़ पाती है जबकि उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में आसमान सालोंभर साफ रहती है जिसके कारण समुद्री सतह सालोंभर सूर्यातप प्राप्त करती है। फलत: समुद्री जल के तापमान में विभिन्नताएँ उत्पन्न होती है।
 
(7) हिमशीलखण्ड
                 ध्रुवीय क्षेत्रों में गर्म समुद्री जलधारा के कारण एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण सदियों से जमीन पिघल रहे हैं जिसके कारण यहां एक ओर समुद्री जल स्तर वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर समुद्री जल की औसत तापमान में कमी आ रही है।
 
(8) समुद्री जल का घनत्व
                समुद्री जल का घनत्व मूलतः लवणता से ही संबंधित है फिर भी अलग-अलग गहराई पर अलग-अलग समुद्री लवणता के कारण समुद्री जल में उदग्र रूप से कई स्तर पाए जाते हैं। जैसे – समुद्री जल के सबसे ऊपरी भाग में जब लवणता अधिक होती है तो उसका घनत्व भी अधिक हो जाता है जिसके कारण सौर विकरण के अवशोषण की क्षमता भी अधिक हो जाती है जबकि 100 फैदम गहराई के बाद लवणता में कमी के कारण दूसरी परत का निर्माण होता है फलत: ऊपरी परत की तुलना में निचली परत के तापमान में लगभग 1॰C कमी आ जाती है। अतः समुद्री जल के विभिन्न स्तर भी समुद्री तापमान को प्रभावित करने में सक्षम है।
 
सागरीय तापमान का वितरण
                समुद्री जल के तापमान का वितरण को दो भागों में बाँटकर अध्ययन किया जाता है:-
(i)  क्षैतिज वितरण 
(ii) लम्बवत वितरण
 
(i) क्षैतिज वितरण
               तीनों प्रमुख महासागरों के क्षैतिज तापमान को नीचे के तालिका में देखा जा सकता है:-
Temperature of Oceanic Water
(ii) लम्बवत वितरण
              समुद्री जल के तापमान का लंबवत वितरण का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया है। इसके बावजूद समुद्री वैज्ञानिकों के द्वारा निम्नलिखित लम्बवत तापीय वितरण को मान्यता प्राप्त है:-
Temperature of Oceanic Water
निष्कर्ष

          इस तरह उपर के तथ्यों से स्पष्ट है कि समुद्री जल के क्षैतिज एवं उदग्र तापमान में काफी विषमता पाई जाती है।


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6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच

6. BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN

(प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच)


BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN / प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच ⇒      BOTTOM RELIEF OF PACIFIC OCEAN                     

        प्रशांत महासागर तथा उसके तटवर्ती सागर सम्मिलित रूप से विश्व के एक तिहाई भाग पर फैले हुए हैं। प्रशांत महासागर एक विशाल त्रिभुज के आकार का है जिसका विस्तार उत्तर में बेरिंग जलडमरूमध्य तथा दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप के मध्य है। इसके पश्चिम में एशिया तथा आस्ट्रेलिया और पूर्व में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप है। प्रशांत महासागर उत्तर से दक्षिण 14000 किलोमीटर लंबा और भूमध्यरेखा पर इसकी चौड़ाई 16000 किलोमीटर से कुछ अधिक है। प्रशांत महासागर की औसत गहराई 4572 मीटर है। प्रशांत महासागर में छोटे-बड़े मिलाकर लगभग 20,000 द्वीप पाए जाते हैं। यदि पश्चिमी तट द्वीपों की भरमार से आवृत है तो पूर्वी तट पर इनकी संख्या विरल है।

          सामान्य तौर पर प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत करते हैं।

(1) महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf)
               
         प्रशांत महासागर के मग्नतट उसके तटवर्ती क्षेत्रों की संरचना और बनावट पर निर्भर करते हैं। प्रशांत महासागर के पूर्वी तट पर मग्नतटों की चौड़ाई बहुत कम है। उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तटों के समानांतर क्रमशः रॉकी और एंडीज पर्वत मालाओं की उपस्थिति के कारण मग्नतट प्रायः अत्याधिक सँकरे हो गए हैं। उनकी औसत चौड़ाई 80 किलोमीटर है परंतु प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में पर्वतों अथवा पठारों की समानांतर श्रृंखला के अभाव में मग्नतट अधिक विस्तृत है।
        ऑस्ट्रेलिया, पूर्वी-द्वीप समूह तथा एशिया महाद्वीप से सटे मग्नतट का अपेक्षाकृत अधिक चौड़े हैं। इनकी औसत चौराहे 160 से 1600 किलोमीटर तक पाई जाती है। इन मग्नतटों की औसत गहराई 1000 मीटर से अधिक नहीं है। इन मग्नतटों पर प्रशांत महासागर के अनेक द्वीप (क्यूराइल, जापान द्वीप, फिलीपाइन्स, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड आदि)  तथा कई आंतरिक एवं सीमांत सागर (बेरिंगसागर, ओखोटस्क, जापान सागर, पीत सागर, चीन सागर सागर, जावा सागर, कोरल सागर आदि) स्थित है।
(2) महासागरीय कटक / श्रेणी (Ocean Ridges)
           
       प्रशांत महासागर में अटलांटिक महासागर तथा हिंद महासागर के समान मध्यवर्ती कटक नहीं है। कुछ बिखरे कटक अवश्य मिलते हैं। जैसे- पूर्वी प्रशांत कटक (अलबट्रास पठार) लॉर्डहोवे कटक, टुआमामार्ट कटक, कोकरा कटक, हवायन कटक, होंशू कटक इत्यादि इसमें प्रसिद्ध है। पूर्वी प्रशांत कटक जिसे अलबट्रास पठार के नाम से जानते हैं 1600 किलोमीटर की चौड़ाई में विस्तृत है।
         23°- 35° दक्षिणी अक्षांश के बीच इसकी दो शाखाएँ हो जाती है। पूर्वी शाखा चिली तट की ओर चली जाती है तथा पश्चिमी शाखा इस्टर्न आईलैंड राइज के नाम से दक्षिण की ओर चली जाती है। दूसरा प्रमुख कटक न्यूजीलैंड रिज है। ऑस्ट्रेलिया के ग्रेट बैरियर रीफ के पश्चिम में क्वींसलैंड पठार प्रमुख कटक है। मध्य प्रशांत महासागर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कटक हवायन उभार है जो 960 किलोमीटर चौड़ा और 2640 किलोमीटर लंबा है।
 
(3) महासागरीय बेसिन/ मैदान/ द्रोणी (Oceans Besins)
                    
         प्रशांत महासागर के नितल का अधिकांश भाग गहरे अंत: समुद्री मैदानों से बना है। अन्य महासागरों की तुलना में इसमें अपेक्षाकृत अधिक गहरे अंत: समुद्री मैदान मिलते हैं। तट से मैदानों के में उतरते ही अचानक गहराई में वृद्धि हो जाती है। प्रशांत महासागर में कैलीफोर्निया के तट पर उत्तरी-पूर्वी बेसिन, जापान के तट पर उत्तरी-पश्चिमी बेसिन, पेरू एवं चिली के तट पर दक्षिणी-पूर्वी प्रशांत बेसिन और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट पर दक्षिणी-पश्चिमी प्रशांत बेसिन, न्यूजीलैंड एवं पूर्वी आस्ट्रेलिया के बीच तस्मानियाँ बेसिन, फिजी द्वीप के दक्षिण में फिजी बेसिन स्थित है।
(4) महासागरीय गर्त /खाई (Ocean Deeps)
       
        प्रशांत महासागर में अभी तक 32 गर्तों की खोज की गई है। प्रशांत महासागर के अधिकांश गर्त पश्चिमी प्रशांत में मिलते हैं। ये गर्त या तो द्वीपीय चापों या पर्वतीय श्रृंखलाओं के समांतर पाए जाते हैं। प्रशांत महासागर में ही विश्व का सबसे गहरा गर्त मेरियाना ट्रेंच (11.02 Km) है जो फिलीपींस दीप के पूर्वी भाग में स्थित है।
         विश्व का दूसरा सबसे गहरा गर्त टोंगा गर्त (5022 मैदम) दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित है। इसके अतिरिक्त प्रशांत महासागर में क्यूराइल, फिलीपाइन, करमाडेक, पेरू-चिल्ली, अल्यूशियन, मध्य अमेरिका, रिक्यू, नीरो, मरे, ब्रूक, बेली, प्लानेट इत्यादि प्रमुख गर्त हैं।
निष्कर्ष

      उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रशांत महासागर के तलीय उच्चावच में भी अनेक विविधतापूर्ण विशेषताएँ मौजूद है। प्रशांत महासागरीय भूपटल भी महाद्वीपीय भूपटल के समान काफी जटिल संरचना वाले भूपटल है।


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