15. Tides / ज्वार भाटा

15. Tides (ज्वार भाटा)


ज्वार भाटा (Tides)⇒

            समुद्री जल में कई प्रकार की गतियाँ पाई जाती है। जैसे- लहर, जलधारा, ज्वार-भाटा। सर्वप्रथम मर्रे महोदय ने ज्वार-भाटा को परिभाषित करते हुए कहा- “सूर्य और चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण समुद्री तल के नियमित रूप से ऊपर उठने और नीचे बैठने की क्रिया को ज्वार-भाटा कहते हैं।” मर्रे की इस परिभाषा से यह स्पष्ट नहीं होता है कि एक दिन में समुद्री तल कितनी बार ऊपर उठता है और कितनी बार नीचे गिरता है। अतः इस समस्या को मारमर महोदय ने अपनी परिभाषा में दूर करते हुए कहा “समुद्र का जल प्रतिदिन दो बार ऊपर उठता है और दो बार नीचे गिरता है तथा आकर्षण के फलस्वरूप समुद्र तल के ऊपर उठने तथा आगे बढ़ने को ज्वार तथा समुद्री तल के नीचे उतरने और पीछे की ओर हटने को भाटा कहते है।” इस प्रकार स्पष्ट है कि नियमित रूप से समुद्री जल का ऊपर उठना और नीचे बैठना ही ज्वार भाटा कहलाता है।

        ज्वार-भाटा के संबंध में मानव प्राचीन काल से ही जानने को उत्सुक रहा है। सर्वप्रथम हेरोडोटस एवं पीथियस ने ज्वार-भाटा का संबंध चंद्रमा से बताया था। उसके बाद में रोमन भूगोलवेत्ता प्लिनी ने ज्वार-भाटा का विस्तृत अध्ययन किया। 17वीं शताब्दी में न्यूटन महोदय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति का न केवल खोज किया बल्कि ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के संबंध में 1667 ई० में संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसी तरह 1755 ई० में लाप्लास ने गतिक सिद्धांत, 1833 ई० में विलियम वेवेल के प्रगामी तरंग सिद्धांत और आगे चलकर हैरिस महोदय ने 1928 ई०  दोलन सिद्धांत या स्थायी तरंग सिद्धांत प्रस्तुत किया।

ज्वार-भाटा की विशेषता

             ज्वार-भाटा सागरीय जल की लंबवत गति है। जिसकी पहचान केवल तट पर ही की जा सकती है। ज्वार-भाटा को तटीय भागों में नियमित रूप से प्रतिदिन देखा जा सकता है। समुद्र के किनारे किसी एक स्थान पर कोई व्यक्ति खड़ा है तो उसे 24 घंटे में दो बार समुद्र का जल ऊपर उठते हुए और दो बार नीचे बैठते हुए प्रतीत होता है। ज्वार-भाटा की उत्पत्ति पर पृथ्वी के घूर्णन गति और चंद्रमा के परिभ्रमण गति का प्रभाव पड़ता है। दो ज्वार या दो भाटा के बीच समय अंतराल नियत होता है। जैसे एक ज्वार अगर आज समुद्र के किनारे 10:00 बजे सुबह आई हो तो अगले दिन ज्वार ठीक 10:00 बजे नहीं आएंगे बल्कि 52 मिनट देर से आती है। दो क्रमबद्ध ज्वार के बीच 26 मिनट का अंतर होता है जबकि दो क्रमबद्ध ज्वार और भाटा के बीच 13 मिनट का अंतर होता है। इसका प्रमुख कारण पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति में क्रमश: घूर्णन एवं परिभ्रमण गति से उत्पन्न देशांतरीय विषमता है। अतः इसी विषमता के कारण किसी भी देशांतर पर 24 घंटे के बाद जो ज्वार-भाटा आता है, वह 52 मिनट की देरी से आता है और यह देर होने का क्रम 27 दिन तक चलता रहता है। पृथ्वी पर एक समय में दो विपरीत देशांतरों पर आकर्षण बल के कारण ज्वार उत्पन्न होता है और ठीक उसी समय समकोणिक देशांतर पर भाटा उत्पन्न होता है।

ज्वार उत्पादक शक्तियॉं

        ज्वार उत्पन्न करने वाले शक्तियों में सूर्य और चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का महत्वपूर्ण योगदान है। सर्वप्रथम न्यूटन महोदय ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष में स्थित सभी ग्रह, नक्षत्र एवं तारे गुरुत्वाकर्षण शक्ति के द्वारा एक-दूसरे के परिपेक्ष्य में संतुलित है तथा एक-दूसरे को आकर्षित कर रहे हैं। न्यूटन अपने गुरुत्वाकर्षण का नियम ने बताया है कि “दो पिंडों के बीच में आकर्षण शक्ति उनके द्रव्यमान के गुणनफल का समानुपाती एवं दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है।” अर्थात जो पिण्ड जितना बड़ा होगा उसका आकर्षण शक्ति भी उतना ही अधिक होगा। इसके साथ ही जो पिंड जितना नजदीक होगा उसका भी आकर्षण बल उतना अधिक होगा। अतः इसी कारण से पृथ्वी पर सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव अधिक रहता है क्योंकि चंद्रमा सूर्य की तुलना में कम द्रव्यमान भले ही रखता है लेकिन सूर्य की तुलना में पृथ्वी से काफी नजदीक है। 

        चंद्रमा पृथ्वी का एक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी के व्यास का 1/3 भाग है। यह पृथ्वी का परिक्रमा लगभग 27 दिन में कर लेता है। चंद्रमा और पृथ्वी के केंद्र के बीच की दूरी 3.84 लाख किलोमीटर है। लेकिन दोनों के सतह के बीच की दूरी 3.776 लाख किलोमीटर है। इससे स्पष्ट है कि चंद्रमा के सामने पृथ्वी की धरातलीय सतह वाले भाग के ठीक पीछे से चंद्रमा का धरातल 3.904 किलोमीटर दूर रहता है। पृथ्वी का वह भाग जो चंद्रमा के सामने पड़ता है, चंद्रमा के आकर्षण शक्ति से सर्वाधिक प्रभावित होता है। जबकि पीछे वाला भाग चंद्रमा की आकर्षण शक्ति से सबसे कम प्रभावित होता है। चंद्रमा के सामने वाला पृथ्वी का समुद्री जल चंद्रमा की ओर खींचा जाता है और ज्वार की स्थिति उत्पन्न करता है। जबकि ठीक उसके विपरीत वाले भाग में अपसारी के कारण भी ज्वार की स्थिति उत्पन्न होती है। चंद्रमा के सामने और उसके विपरीत भागों के बीच समकोण पर आकर्षण बल के कम प्रभाव के कारण जल का सतह नीचा ही रह जाता है। जिसके कारण वहाँ भाटा की स्थिति उत्पन्न होती है।

        चंद्रमा की परिक्रमण दिशा और पृथ्वी की घूर्णन दिशा एक समान है तथा चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा कर रही है। जब पृथ्वी 24 घंटे के घूर्णन गति के बाद पुनः चंद्रमा के सामने आती है तो चंद्रमा अपने परिक्रमण पथ पर 52 मिनट आगे बढ़ जाता है। फलत: पृथ्वी की नियत देशांतर को चंद्रमा के सम्मुख आने में 52 मिनट की देरी हो जाती है। इसी देर होने के कारण एक देशांतर पर ज्वार 24 घंटे के बाद 52 मिनट के देर से आती है।

ज्वार के प्रकार

        समुद्रीवेत्ताओं ने ज्वार के कई प्रकार बताया है। जैसे-

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)

(2) लघु ज्वार

(3) दैनिक ज्वार

(4) मिश्रित ज्वार

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)

(1) दीर्घ / वृहत ज्वार (Spring Tide)- यह पूर्णमासी (Full Moon) और अमावस्या (New Moon) के दिन आता है क्योंकि इन दोनों दिनों में सूर्य चंद्रमा और पृथ्वी तीनों एक सीधी रेखा में स्थित होते हैं। इस स्थिति को यूति-वियुति (Syzygy) कहा जाता है। पूर्णिमा के दिन वियुति (Opposition) कहते  हैं। जबकि अमावस्या के दिन यूति (Conjuction) की स्थिति उत्पन्न होती है।

      अमावस्या एवं पूर्णिमा के दिन सूर्य और चंद्रमा एक सीधी में होते हैं जिसके कारण समुद्री जल पर दोनों क्षेत्रों के आकर्षण बल कार्य करते हैं जिसके कारण प्रतिदिन आने वाले सामान्य ज्वार की तुलना में 20% अधिक जल ऊपर उठ जाता है। इसे ही “दीर्घ ज्वार” कहते हैं।

(2) लघु ज्वार-  प्रत्येक महीने शुक्ल  एवं कृष्ण पक्ष की सप्तमी एवं अष्टमी के रात में सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक-दूसरे के समकोण की स्थिति में होते हैं जिसके कारण दोनों के आकर्षण बल का प्रभाव एक साथ नहीं पड़ पाता है जिसके कारण एक देशांतर पर आने वाला प्रतिदिन के समान ज्वार की तुलना में 20% कमी जल ऊपर उठ पाता है। इसीलिए इसे लघु ज्वार करते हैं।

(3) दैनिक ज्वार- किसी स्थान पर एक दिन में आने वाले एक ज्वार और एक भाटा को दैनिक ज्वार कहते हैं। दैनिक ज्वार ही है जो 24 घंटे के बाद अगले दिन 52 मिनट देर से आती है। मैक्सिको की खाड़ी, फिलीपींस और आलास्का के तट पर आने वाले दैनिक ज्वार को देखा जा सकता है। 

अर्द्ध दैनिक ज्वार (Semi Daily Tides)- कई स्थानों पर 24 घंटे में दो बार ज्वार और दो बार भाटा आता है। एक बार आने के बाद 12 घंटे 26 मिनट बाद आने वाली ज्वार को अर्द्ध दैनिक ज्वार कहते हैं।

(4) मिश्रित ज्वार- दैनिक ज्वार और अर्द्ध दैनिक ज्वार को मिश्चित ज्वार कहते हैं। किसी भी स्थान पर भिन्न ऊंचाई वाले ज्वार को भी मिश्रित ज्वार कहते हैं।

(5) अपभू एवं उपभू ज्वार (Apogean & Perigean Tides)- 

      जब चंद्रमा पृथ्वी से सबसे निकट (3.54 किमी०) होती है तो उसे उपभू (Perigean) और जब सबसे दूर (4.07 किमी०) में स्थित होती है तो उसे अपभू (Apogean) कहते हैं। 

        उपभू की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को उपभू ज्वार (Perigean Tides) और अपभू (Apogean Tides) की स्थिति में उत्पन्न ज्वार को अपभू कहते हैं।

(6) अयनवृतीय ज्वार & भूमध्यरेखीय ज्वार (Tropical Tides & Equatorial Tides)- ज्वार चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। एक चंद्रमास में चंद्रमा कर्क रेखा, मकर रेखा और भूमध्य रेखा के सम्मुख बारी-बारी से आती है। जब चंद्रमा कर्क एवं मकर रेखा पर होती है तो उस वक्त उत्पन्न ज्वार  को अयनवृत्तीय ज्वार (मध्य अक्षांशीय ज्वार) कहते हैं लेकिन जब चंद्रमा विषुवत रेखा पर होती है तो उस स्थिति में उत्पन्न ज्वार को विषुवतीय ज्वार (भूमध्यरेखीय ज्वार )कहते हैं।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित सिद्धांत 

       ज्वार-भाटा की उत्पत्ति से संबंधित प्रक्रिया को कई भूगोलवेताओं ने सैद्धांतिकरण करने का प्रयास किया है। उन सिद्धांतों में प्रमुख सिद्धांत है:-

(i) संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)- न्यूटन

(ii) प्रगामी तरंग सिद्धांत (Progressive Wave Theory)- विलियम वेवेल

(iii) स्थायी तरंग सिद्धांत (Stationary Wave Theory)-  हैरिस

(iv) नहर सिद्धान्त- एयरी

(v) गतिक सिद्धान्त- लाप्लास

    उपरोक्त सिद्धान्तों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत संतुलन का सिद्धांत को माना जा रहा है जिनकी व्याख्या नीचे की जा रही है।

संतुलन का सिद्धांत (Equilibrium Theory)

         संतुलन सिद्धांत के प्रस्तुतकर्ता सर आइजक न्यूटन रहे हैं। इन्होंने 1687 ई० में गुरुत्वाकर्षण के आधार पर संतुलन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। न्यूटन ने बताया कि विभिन्न आकाशीय पिंड एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। ये आकर्षण बल आकाशीय पिंडों के द्रव्यमान के गुणनफल पर और दूरी के वर्ग पर निर्भर करते हैं। इसे प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित सूत्र का प्रतिपादन किया।  

जहाँ,  F = आकर्षण बल

G = एक नियतांक

m1 = पृथ्वी का द्रव्यमान

m2 = चन्द्रमा का द्रव्यमान

r = दोनों आकाशीय पिण्डों के बीच की दूरी

        इस नियम के अनुसार न्यूटन ने बताया कि सूर्य एवं चंद्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ही समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। कालांतर में लाप्लास महोदय ने इस सिद्धांत को और विकसित करने का प्रयास किया। लाप्लास के अनुसार ज्वार चंद्रमा एवं सूर्य के आकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों के कारण उत्पन्न होती है। उन्होंने बताया कि जब कोई पिंड वृत्ताकार पथ पर गतिशील होती है तो आकर्षण शक्ति के विरुद्ध अपकेंद्रीय बल का जन्म होता है ताकि आकर्षण बल एवं अपकेंद्रीय बल के कारण संतुलन की स्थिति बना रहे।

       न्यूटन एवं लाप्लास दोनों ने बताया कि सूर्य की तुलना में चंद्रमा के आकर्षण बल का प्रभाव पृथ्वी पर अधिक पड़ता है क्योंकि सूर्य की तुलना में चन्द्रमा काफी निकट है। चंद्रमा के ठीक सामने वाला पृथ्वी का भाग केंद्र की अपेक्षा 6400 किलोमीटर चंद्रमा के निकट होता है। जबकि इसके विपरीत वाला भाग चंद्रमा से 12800 किलोमीटर अधिक को दूर होता है जिसके कारण चंद्रमा के सम्मुख वाले पृथ्वी के भाग पर अधिक आकर्षण बल कार्य करता है जबकि ठीक उसके विपरीत आकर्षण बल का प्रभाव नगण्य होता है। विपरीत भाग में आकर्षण बल को संतुलित करने हेतु अपकेंद्रीय बल लगने लगता है। इन दोनों बलों के कारण ही समुद्री जल में उछाल आती है।जिससे ज्वार उत्पन्न होता है। 

आलोचना-     

       कई समुद्रवेत्ताओं ने इस सिद्धांत को दो आधारों पर आलोचना किया है। 

(1) पृथ्वी के धरातल पर अगर केवल जल ही होता तो इस सिद्धांत के क्रियाशील होने की संभावना थी परंतु, पृथ्वी के धरातल पर जल एवं स्थल का वितरण काफी असमान है। यहाँ ज्वार चंद्रमा की आकर्षण बल के कारण एक ही देशांतर पर एक ही बार ज्वार उत्पन्न नहीं होता है। 

(2) सागर की गहराई सागर की नितलीय उच्चावच, चक्रवात और चंद्रमा की कलाएँ इत्यादि का ज्वार-भाटा की उत्पत्ति में कोई उल्लेख नहीं किया है। 

(3) इस नियम के अनुसार प्रतिदिन एक देशांतर पर निश्चित अंतराल पर दो बार ज्वार और दो बार भाटा आना चाहिए। लेकिन इंग्लिश चैनल में एक दिन में चार बार ज्वार और चार बार भाटा आती है। इसके कारणों का भी स्पष्टीकरण न्यूटन ने नहीं किया है। 

(4) चंद्रमा के आकर्षण शक्ति का प्रभाव पृथ्वी की एक ही देशांतर पर एक समान रूप से पड़नी चाहिए थी और एक देशांतर पर जल का उत्थान भी एक समान होनी चाहिए था। लेकिन सामान्य रूप से ऐसा नहीं होता। जैसे- उत्तरी अमेरिका के तट पर अवस्थित फंडी की खाड़ी में विश्व के सबसे ऊँचा ज्वार उत्पन्न होता है। यहाँ 15 से 18 मीटर तक जल में उछाल आता है जबकि ठीक उसी देशांतर पर इतनी ऊँची-ऊँची ज्वारें नहीं आती। 

निष्कर्ष:-  इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि न्यूटन के द्वारा प्रतिपादित संतुलन सिद्धांत की कई सीमाएँ हैं। इसके बावजूद ज्वार-भाटा के उत्पत्ति की व्याख्या करने वाला सबसे मान्य सिद्धांत है।


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14. Currents of The Pacific Ocean / प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

14. Currents of The Pacific Ocean

(प्रशांत महासागर की जलधाराएँ)

Currents of The Pacific Ocean



Currents of The Pacific Ocean

प्रशांत महासागर की जलधाराएँ⇒

         प्रशांत महासागर की धाराएँ अटलांटिक महासागर के धाराओं के समान बहती है। केवल थोड़ा बहुत परिवर्तन महासागर के विस्तार और स्वरूप के कारण आ जाता है। प्रशांत महासागर में निम्नलिखित धाराएँ चलती है-

(A) उत्तरी प्रशांत महासागर की जलधाराएँ

(i) उत्तरी भूमध्य रेखीय धारा-

      इसका प्रारंभ उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के मिलन स्थल पर पश्चिमी भाग से होती है। यहां से प्रारंभ होकर यह धारा संपूर्ण प्रशांत महासागर की 7500 मील की यात्रा करके फिलीपाइन द्वीप समूह के तट पर आकर टकराती है और उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यह एक गर्म जलधारा है। यह पूर्व से पश्चिम दिशा में बहती है। यह संसार की सबसे लंबी जलधारा है।

(ii) क्यूरोशियो या जापान धारा-

     उतरी विषुवतीय प्रशांत जलधारा की ही अग्रभाग है जो दक्षिण से उत्तर की ओर चलती है। यह फिलीपींस से 35°N अक्षांश के बीच जापान के पूर्वी तट के सहारे चलती है। 40°अक्षांश के पास यह सीधे पूरब की ओर मुड़ जाती है और उत्तरी प्रशांत प्रवाह को जन्म देती है। लेकिन इसके पहले क्यूशू द्वीप से टकराकर इसकी दो शाखा हो जाती है। एक शाखा जापान सागर में “शुसीमा धारा” कहलाती है।

(iii) क्यूराइल या ओयाशिवो ठंडी जलधारा- 

     यह एक ठंडी जलधारा है। उत्तरी आर्कटिक महासागर से चला हुआ जल बेरिंग जलडमरूमध्य से होकर दक्षिण की ओर प्रवाहित होता है जिसे ओयाशिवो जलधारा कहते हैं। होकैडो द्वीप के पास यह क्यूरोशियो जलधारा से मिल जाती है। इसे कमचटका धारा भी कहते हैं।

(iv) उत्तरी प्रशांत महासागरीय ड्रिफ्ट-

     उत्तरी अटलांटिक ड्रिफ्ट के समान ही प्रशांत महासागर में क्यूरोशियो धारा से टकराकर जब पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़ जाती है। तब इसकी गति मंद होती है। इसकी एक शाखा बेरिंग समुद्र में घुसकर अल्युशियन द्वीपों के उत्तरी भाग में घड़ी की सुई के विपरीत दिशा में घूमती है। यह एक ठंडी धारा के रूप में क्यूराइल से जाकर मिल जाती है। इसे अल्युशियन जलधारा भी कहते हैं। दूसरी शाखा अलास्का की खाड़ी में प्रवेश करके अलास्का धारा के नाम से जानी जाती है। यह गर्म जलधारा के रूप में बहती है जिसके कारण कनाडा के तटीय क्षेत्र में हिम को जमने नहीं देता है।

(v) कैलिफोर्निया जलधारा- यह एक उपसतही ठंडी जलधारा है जो उत्तर से दक्षिण की ओर कैलिफोर्निया की खाड़ी के तट के सहारे चलती है और उत्तरी विषुवतीय जलधारा से जाकर मिल जाती है।

(B) दक्षिणी प्रशांत महासागर की जलधारा

(i) दक्षिण विषुवतीय जलधारा- 

     दक्षिण पश्चिम वाणिज्य पवन के कारण पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली जलधारा है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य प्रशांत महासागर में यह धारा अनेक द्वीपों की स्थिति के कारण विभाजित हो जाती है।

(ii) पूर्वी आस्ट्रेलियन धारा-

      जब दक्षिणी विषुवतीय प्रशांत जलधारा न्यूगिनी तट से टकराती है तो इसका अधिकांश जल दक्षिण की ओर मुड़कर आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट के सहारे बहने लगती है। इसे ही पूर्वी ऑस्ट्रेलियन जलधारा कहते हैं। न्यूजीलैंड के निकट इसकी दो शाखाएं क्रमशः पश्चिम तथा पूरब से बहकर बहती है और पुनः मिल जाती है। 40°S अक्षांश के निकट यह पूर्व की ओर प्रवाहित होने लगती है और दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट तक चलती चली जाती है।

(iii) अंटार्कटिक प्रवाह- 

     यह धारा अंटार्कटिका के चारों ओर चक्कर लगाती है। इसकी दिशा पश्चिम से पूरब की ओर है। यह एक ठंडी जलधारा है जो पछुआ पवनों के प्रवाह में रहती है। इसे पछुआ पवन प्रवाह जलधारा भी कहते हैं। अवरोध के अभाव में स्वतंत्र रूप से बहती है।

(iv) पेरू या हंबोल्ट की ठंडी जलधारा- 

      पेरू के तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। यह अंटार्कटिका ड्रिफ्ट की एक शाखा है। इसकी खोज 1522 ई० में हुआ। 1802 में इसका नाम हंबोल्ट ने अपने नाम पर रखा। तट से इसका विस्तार 900 किलोमीटर दूर तक मिलता है। इसके कारण गैलपोगस द्वीप पर पेंग्विन पक्षी मिलते हैं।

(v) एलनीनो जलधारा- 

     यह एक गर्म जलधारा है। यह फरवरी-मार्च में चलती है। 3°S से 33°S के बीच उत्पन्न होती है। एक मान्यता के अनुसार एलनीनो की उत्पत्ति जाड़े की ऋतु में धाराओं के दक्षिणी गोलार्ध में खिसकने के फलस्वरुप होती है। इसका तापमान सामान्य जल से 3℃ से 6℃ अधिक होता है।

(vi) विपरीत विषुवतीय जलधारा- 

       विषुवत रेखा के सहारे पश्चिम से पूरब की ओर चलती है। यह एक गर्म जलधारा है। इसकी उत्पत्ति प्रशांत महासागर के पश्चिम में जल संचय से होता है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

       प्रशान्त महासागर की जलधाराएं उत्तरी प्रशान्त महासागर में, उत्तरी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर महासागर के आर-पार बहती है। यह धारा जैसे जैसे पश्चिम की ओर बढ़ती है, इसके आयतन में वृद्धि होती जाती है। मध्य अमरीका के पश्चिमी तट से शुरू होकर यह पश्चिमी प्रशान्त महासागर में फिलिपीन द्वीपसमूह तक पहुंचती है। वहां से यह उत्तर की ओर मुड़ती है और क्यूरोसिबो धारा के नाम से फिलीपीन द्वीप समूह, ताईवान तथा जापान के तटों के साथ लगी हुई उत्तर की ओर बहती है। यह गर्म जल की धारा है। इसकी एक शाखा सुशिमा धारा के नाम से जापान सागर में प्रवेश करती है।

          जापान के दक्षिण-पूर्वी तट के समीप क्यूरोसियो धारा प्रचलित पछुआ पवन की चपेट में आ जाती है और महासागर के आर-पार पश्चिम से पूर्व दिशा में उत्तरी प्रशान्त धारा के नाम से बहती है। उत्तरी अमेरीका के पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह दो शाखाओं में बंट जाती है। उत्तरी शाखा ब्रिटिश कोलंबिया तथा अलास्का के तटों पर घड़ी की सुइयों के विपरीत दिशा में अलास्का धारा के नाम से बहती है। इस क्षेत्र के समुद्री जल की अपेक्षा इस धारा का जल अधिक गर्म होता है। उत्तरी प्रशान्त धारा की दूसरी शाखा कैलिफोर्निया के तट पर दक्षिण की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे कैलिफोर्निया धारा कहते हैं। यह धारा निचले अक्षांशों में आकर उत्तरी विषुवतीय धारा से मिल जाती है। यह उत्तरी विषुवतीय धारा, व्यापारिक पवन के प्रभाव से महासागर के आर-पार, 14,500 किमी की दूरी तय करती है। इस प्रकार इन धाराओं का एक चक्र पूरा होता है।

        प्रशान्त के उत्तरी भाग में ओयासिवो धारा कमचटका प्रायद्वीप के तट के समीप उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। यह एक दण्डी जलधारा है। उत्तरी प्रशान्त की दूसरी ठण्डी जलधारा ओखोटस्क धारा है। जो सखालीन के समीप बहती है और होकडो के निकट ओयासिवो धारा से मिल जाती है। ओयासिवो धारा अन्त में क्यूरोसियो धारा से मिलकर उसके गर्म जल के नीचे डूब जाती है।

        दक्षिणी प्रशान्त महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और पूर्वी आस्ट्रेलियाई धारा के नाम से दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। आगे चलकर तस्मानिया के समीप यह दक्षिणी प्रशान्त धारा में मिल जाती है जो पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। दक्षिणी अमरीका के दक्षिण-पश्चिमी तट पर पहुंचकर यह उत्तर की ओर मुड़ जाती है। यहाँ इसे पेरू धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है जो अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा में विलीन होकर एक चक्र पूरा करती है। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराओं के बीच एक जलधारा पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है, जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं। उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धाराएं महासागर के पश्चिमी भाग में विशाल जलराशि एकत्र करती रहती हैं। जिससे महासागरीय जलस्तर असन्तुलित होता रहता है। इस असन्तुलन को दूर करने का कार्य विरुद्ध विषुवतीय धारा करती हैं।



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13. Atlantic Oceanic Currents

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(अटलांटिक महासागर की जलधारा) 

Atlantic Oceanic Currents


Atlantic Oceanic Currents

अटलांटिक महासागर की जलधारा⇒

         अटलांटिक महासागर पश्चिम में उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका और पूर्व में यूरोप तथा फिर का कीमत 8.24 करोड़ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवस्थित है। उत्तर में यह डेविस की खाड़ी, डेनमार्क जलडमरूमध्य तथा नार्वेजियन सागर द्वारा आर्कटिक सागर से जुड़ा हुआ है। अफ्रीका के दक्षिण में यह हिंद महासागर से मिला हुआ है। इसका आकार अंग्रेजी के S- अक्षर के समान है।अटलांटिक महासागर में मंद व तीव्र तथा उष्ण एवं शीतल सभी प्रकार के धाराएं प्रवाहित होती है। अटलांटिक महासागर की प्रमुख धाराएं निम्नलिखित है –

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा

1.उतरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. कैरेबियन जलधारा

3. यूकाटन जलधारा

4. मैक्सिको जलधारा

5. गल्फ स्ट्रीम

6. उतरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह

7. पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा

8. नार्वेजियन जलधारा

9. इरमिंजर जलधारा

10. लैबराडोर जलधारा

11. केनारी जलधारा

(B) दक्षिणी अटलांटिक की जलधारा

1. दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा

2. ब्राजीलियन गर्म जलधारा

3. फॉकलैण्ड जलधारा

4. अंटार्कटिका पछुआ प्रवाह (विश्व मे)

5. वेंगुएला जलधारा

(A) उत्तरी अटलांटिक की जलधारा 

(1) उत्तरी अटलांटिक विषुवतीय गर्म जलधारा- इसका विस्तार 0° से 10°N अक्षांश तक होता है। व्यापारिक हवा के कारण इस धारा की प्रवाह दिशा पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह अफ्रीका के तट को छोड़ने के बाद अपने गुणों को प्राप्त करती है। यह एक गर्म जलधारा है। मध्य अटलांटिक कटक को पार कर उत्तर पश्चिम की ओर मुड़कर दो शाखाओं में बँट जाती है। वेस्टइंडीज के पूर्व में “एंटीलीज जलधारा” और पश्चिम में “कैरेबियन जलधारा” कहलाता है। कैरेबियन जलधारा ही मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है। 

(2) फ्लोरिडा जलधारा- यह कैरेबियन जलधारा का अग्रभाग है जो यूकाटन चैनल से होती हुई मैं मैक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है। मैक्सिको की खाड़ी अर्द्धचंद्राकार रूप में है। वुस्ट महोदय के अनुसार यह गर्म जलधारा औसतन 26 मिलियन घन मीटर/सेकंड वार्षिक जलराशि फ्लोरिडा जल डमरूमध्य से होकर अटलांटिक महासागर में लाती है। इस जलधारा का विस्तार 30°N अक्षांश तक रहता है। भूमध्यरेखा से मैक्सिको की खाड़ी तक इस धारा का तापक्रम 75° F तथा सतह की लवणता 36% रहती है। 30°N अक्षांश से आगे एंटीलिस जलधारा से मिल जाती है।

(3) गल्फ स्ट्रीम धारा- यह एक गर्म जलधारा है। इसकी खोज 1513 ई० में पास दि लियोन ने की थी। फ्लोरिडा की धारा का जहाँ अंत होता है वहाँ से यह धारा प्रारम्भ होती है। मैक्सिको की खाड़ी में जन्म लेने के कारण इसका नाम गल्फ स्ट्रीम पड़ा है। यह सेंटलॉरेन्स नदी के मुहाने तक निर्विध्न रूप से चलती है। 40°N अक्षांश के पास तक यह उत्तरी-पूर्वी दिशा में बहती है और इसके बाद एकदम पूर्व की ओर मुड़ जाती है।

                  न्यूफाउंडलैंड तट के पास यह उत्तर की ओर से आने वाले लैब्रोडोर ठंडी जलधारा से मिलकर घना कोहरा उत्पन्न करती है। 45° W देशांतर के बाद गल्फस्ट्रीम कई शाखाओं में बँट जाती है। बिस्के की खाड़ी में बहने वाली धारा रेनेल धारा कहलाती है। यह इंग्लिश चैनल में भी प्रवेश करती है। एक शाखा नार्वे के तट से होकर बहती है जो नॉर्वेजियन जलधारा कहलाता है। आईसलैंड के दक्षिणी किनारे पर चलने वाली शाखा इरमिंजर जलधारा कहलाती है।                              

                 न्यूफाउंडलैंड के बाद गल्फस्ट्रीम धारा की दिशा व प्रवाह गति पर पछुआ पवनों का विशेष प्रभाव पड़ता है। पुनः 40° N अक्षांश पर इसकी दिशा पृथ्वी के विक्षेपक बल के कारण बदलती, 45°W अक्षांश के बाद गल्फस्ट्रीम ही उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह जलधारा कहलाती है।

(4) लैब्रोडोर धारा- उत्तरी अटलांटिक महासागर में लैब्रोडोर तट के सहारे उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूरब की ओर चलने वाली जलधारा लैब्रोडोर जलधारा कहलाती है। यह एक ठंडी जलधारा है। यह उत्तरी ध्रुव महासागर का ठंडा जल खींचकर ले आती है। सेंट लारेंस नदी के मुहाने पर न्यूफाउलैंड द्वीप के समीप यह गल्फस्ट्रीम से मिल जाती है जिससे घना कोहरा बनता है।

(5) केनारी जलधारा- अफ्रीका के उत्तर-पश्चिम तट के सहारे के केनारी द्वीपों के पास से बहने वाली जलधारा केनारी जलधारा कहलाती है। यह धारा ठंडी है और उतर से दक्षिण दिशा में बहती है। वाणिज्य पवन इसे विशेष गति प्रदान करते हैं। यह धारा आगे चलकर उतरी विषुवतीय जलधारा में मिल जाती है। यह एक उपसतही जलधारा है।

(6) पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा- ग्रीनलैंड के पूर्व से भी एक ठंडी जलधारा दक्षिण की ओर चलती है जिसे पूर्वी ग्रीनलैंड जलधारा कहते हैं। यह उतरी अटलांटिक प्रवाह में मिल जाती है।

                      उत्तरी अटलांटिक महासागर के मध्य में जलधाराओं का एक वृत्त बन जाता है जिसकी प्रवाह दिशा घड़ी की सूईयों की गति की तरह होती है। इसके बीच का भाग स्थिर रहता है, जिसमें सारगैसो नामक समुद्री घास उग जाती है। जिसके कारण इसे सारगैसो सागर करते हैं। इसका विस्तार 20° से 35°N के बीच है। लेक के अनुसार दूसरे महासागरों में इस प्रकार की विशेषता नहीं पाई जाती है। मगर मारशक के अनुसार विश्व के महासागरों में ऐसे सागरों की संख्या 6 तक हो सकती है। इसके संबंध में अभी ज्ञान अधूरा है। अतः उनकी उचित खोज आवश्यक है।Atlantic Oceanic Currents

(B) दक्षिणी अटलांटिक की धाराएँ :-

(1) दक्षिणी अटलांटिक विषुवतीय जलधारा- इस धारा का प्रवाह क्षेत्र 0° से 20°S अक्षांश के मध्य पश्चिमी अफ्रीकी तट से प्रारंभ होकर दक्षिणी अमेरिका के पूर्वी तट पर जाकर सैनरॉक नामक टापू से टकराकर दो भागों में बँट जाती है। इसकी एक शाखा उतरी विषुवतीय धारा से तथा दूसरी शाखा ब्राजील तट के पास से दक्षिण की ओर गुजरती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाती है। 

(2) विपरीत विषुवतीय जलधारा- इस धारा की दिशा उत्तरी तथा दक्षिणी विषुवतीय धारा के प्रतिकूल दिशा में होती है। यह पश्चिम से पूरब की ओर प्रवाहित होती है। यह एक गर्म एवं कम शक्तिशाली जलधारा है। यही धारा पुरब में गिनी खाड़ी में पहुंचकर गिनी गर्म धारा के रूप में प्रवाहित होती है। 

(3) ब्राजील गर्म जलधारा- दक्षिण विषुवतीय धारा दक्षिण अमेरिकी के पूर्वी तट पर सैन रॉक अंतरीप से टकराकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। एक शाखा तट के सहारे उत्तर की ओर चलती है जबकि दूसरी शाखा दक्षिण की ओर चलती है जो ब्राजील गर्म जलधारा कहलाता है। इसकी जल 40°S अक्षांश के निकट पहुंचकर फॉकलैंड की धारा से मिल जाती है।

(4) फाकलैंड की ठंडी जलधारा- दक्षिणी अटलांटिक में फाकलैंड द्वीप के पास अर्जेंटीना तट के सहारे दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है। अंटार्कटिका ड्रिफ्ट का एक अंग होने के कारण यह एक ठंडी धारा है।

(5) दक्षिणी अटलांटिक ड्रिफ्ट या पछुआ प्रवाह – जब 40° अक्षांश के पास ब्राजील व फाकलैंड पछुआ पवनों के प्रभाव में आती है तो समुद्री धारा का प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर होने लगता है। इसे पश्चिम वायु प्रवाह (West Wind Drift) भी कहते हैं। यह एक ठंडी जलधारा है। अंटार्कटिका महाद्वीप के तट के सहारे चलती है। यह 40° से 60°S अक्षांशों के मध्य बहती है।

(6) बेंगुएला जलधारा- पश्चिमी वायु प्रवाह का कुछ जल पृथ्वी की दैनिक गति के कारण थोड़ा-सा उत्तर की ओर मुड़ जाता है। यह धारा दक्षिण अफ्रीका के पश्चिमी तट से टकराकर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। यह एक ठंडी जलधारा है जो कालाहारी मरुस्थल के तट पर चलती है। उत्तर में यह दक्षिणी विषुवतीय जलधारा से मिल जाती है और अंततः चक्र को पूरा करता है।

                 अत: उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि उत्तरी एवं दक्षिणी अटलांटिक महासागर में अलग-अलग विशेषताओं से युक्त कई जलधाराएं मिलती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                       अटलाण्टिक महासागर की धाराएँ प्रचलित व्यापारिक पवन, विषुवत् रेखा के उत्तर और दक्षिण में महासागर के धरातलीय जल को प्रेरित करते हैं। इससे यहां का जल दो धाराओं के रूप में पश्चिम की ओर बहता है। इन्हें उत्तरी और दक्षिणी विषुवतीय धारा कहते हैं। इस प्रकार से असन्तुलित हुए जलस्तर पर सन्तुलन वापस लाने के उद्देश्य से एक वापसी धारा जिसे विरुद्ध विषुवतीय धारा कहते हैं, उपरोक्त दोनों विषुवतीय धाराओं के बीच पश्चिम से पूर्व की और बहती है। पश्चिमी अफ्रीका के तट के समीप इसे गिनी धारा कहते हैं।

               ब्राजील के साओ राक अन्तरीप के समीप दक्षिणी विषुवतीय धारा दो शाखाओं में बंट जाती है। इसकी उत्तरी शाखा उत्तरी विषुवतीय धारा में मिल जाती है। इस सम्मिलित धारा का कुछ अंश कैरिबियन सागर तथा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करता है, जबकि शेष भाग वेस्टइंडीज द्वीप समूह के पूर्वी किनारे पर अंटाईल्स धारा के नाम से बहता हुआ गुजरता है।

                जो शाखा मेक्सिको की खाड़ी में प्रवेश करती है, उसमें व्यापारिक पवन द्वारा प्रेरित तथा मिसिसिपी नदी द्वारा प्रदत्त अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। इसके परिणामस्वरूप खाड़ी का जलस्तर अटलाण्टिक महासागर के जलस्तर की अपेक्षा कुछ ऊंचा हो जाता है। अतः खाड़ी से जल की धारा फ्लोरिडा के मुहाने से होकर बाहर खुले महासागर में निकलती है, जहां अंटाईल्स की धारा इससे मिल जाती है। फ्लोरिडा अन्तरीप से यह सम्मिलित धारा संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर बहने लगती है। इसे हटेरस अन्तरीप तक फ्लोरिडा धारा कहते हैं। हटेरस अन्तरीप से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप स्थित ग्रैंड बैंक तक इस धारा को गल्फस्ट्रीम कहते हैं। गहरे जल में यह गल्फस्ट्रीम सुस्पष्ट रहती है।

          ग्रैंड बैंक से गल्फस्ट्रीम, पछुआ पवन के प्रभाव में आकर, पूर्व की ओर मुड़ जाती है और अटलाण्टिक के आर-पार उत्तरी अटलाण्टिक धारा के नाम से पूर्व की ओर बहती है। महासागर के पूर्वी भाग में पहुंचकर यह धारा दो मुख्य शाखाओं में बंट जाती है। मुख्य धारा ब्रिटिश द्वीप समूह पहुंचकर वहां के नार्वे के तट पर बहने लगती है, जिसे नार्वे धारा कहते हैं। वहां से यह आर्कटिक महासागर में प्रवेश कर जाती है। दक्षिणी शाखा स्पेन तथा एजोर्स के मध्य दक्षिण की ओर बहती है। यहाँ इसे कनारी धारा कहते हैं। यह एक ठण्डी जलधारा है। अन्त में यह उत्तरी विषुवतीय धारा में विलीन होकर उत्तरी अटलाण्टिक में धाराओं के चक्र (Gyre) को पूरा करती है। बीच के शान्त क्षेत्र को सारगेसो सागर कहते हैं जो सारगेसम नामक समुद्री शैवाल से भरा हुआ है।
                दो ठण्डी जलधाराएं आर्कटिक महासागर से अटलाण्टिक महासागर में बहती हैं। ये हैं- पूर्वी ग्रीनलैण्ड धारा तथा लेब्राडोर धारा।       

           लेब्राडोर धारा कनाडा के पूर्वी तट पर दक्षिण की ओर  बहती हुई गर्म गल्फस्ट्रीम से मिलती है। भिन्न तापमान वाली इन दो धाराओं के संगम से न्यू फाउंडलैण्ड के समीप विश्व विख्यात कोहरे का निर्माण होता है। यहां संसार का सबसे महत्वपूर्ण मत्स्य-आखेट क्षेत्र है।

                  दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर में दक्षिणी विषुवतीय धारा की एक शाखा साओ राक अन्तरीप से दक्षिण की ओर दक्षिणी अमेरीका के पूर्वी तट से लगी हुई बहती है। इसे ब्राजील धारा कहते हैं। लगभग 35° अक्षांश पर ब्राजील धारा पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं और पछुआ पवन से प्रेरित दक्षिणी अटलाण्टिक धारा से मिलकर पश्चिम से पूर्व की ओर बहने लगती है।

                   गुड होप अन्तरीप के निकट, दक्षिणी अटलाण्टिक धारा की एक शाखा दक्षिणी अफ्रीका के पश्चिमी तट पर उत्तर की ओर बहती है। यह ठण्डी जलधारा है और इसे बेंगुएला धारा कहते हैं। यह अन्त में दक्षिणी विषुवतीय धारा से मिलकर दक्षिणी अटलाण्टिक महासागर की धाराओं का चक्र पूरा करती है। एक ठण्डी जलधारा दक्षिणी अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी तट पर दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है, जिसे फाकलैण्ड धारा कहते हैं।


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12. Indian Ocean Currents / हिन्द महासागर की जलधारा

12. Indian Ocean Currents

(हिन्द महासागर की जलधारा)

Indian Ocean Currents


Indian Ocean Currents

हिन्द महासागर की जलधारा⇒

                 हिन्द महासागर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी महासागर है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जो आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़ा हुआ है। पूरब में प्रशांत महासागर और पश्चिम में अटलांटिक महासागर से जुड़ा हुआ है। हिंद महासागर के पूर्व में आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और मलाया प्रायद्वीप है। उत्तरी भाग में एशिया, पश्चिम में अफ्रीका और दक्षिण में अंटार्कटिका महाद्वीप स्थित है। विषुवत रेखा इस महासागर को दो भागों में बांटती है-

(i) उत्तरी हिंद महासागर और

(ii) दक्षिणी हिंद महासागर।

            दक्षिणी हिंद महासागर एक पूर्ण महासागर है। इसमें समुद्री जल धाराएं सामान्य नियमों के अनुरूप प्रवाहित होती है जबकि उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपना मार्ग परिवर्तित करती है। उत्तरी हिंद महासागर की जलधाराएं मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होती है-

(i) मानसूनी जलवायु

(ii) तटीय आकृति तथा

(iii) उत्तर में महाद्वीपीय स्थिति के कारण उत्पन्न तापीय प्रभाव।

                        हिंद महासागर के जलधाराओं का अध्ययन मुख्यतः दो भागों में बांटकर करते हैं-

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा 

(B) उत्तर हिंद महासागर की जलधारा 

(A) दक्षिणी हिंद महासागर की जलधारा- 

                  दक्षिण हिन्द महासागर में पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण विषुवतीय क्षेत्रों में हिंद महासागरीय गर्म विषुवतीय जलधारा उत्पन्न होती है। यह जलधारा पूरब से पश्चिम दिशा की ओर चलते हुए पूर्वी अफ्रीकी तट से टकराती है। लेकिन मेडागास्कर द्वीप के कारण दो भागों में बँट जाती है। 

         प्रथम शाखा मोजांबिक और मेडागास्कर के बीच से गुजरती है जिसे मोजांबिक जलधारा कहते हैं। दूसरी शाखा मेडागास्कर के पूर्वी तट से गुजरती है जिसे मलागासी जलधारा कहते हैं। ये दोनों जलधारायें दक्षिण की ओर अग्रसारित होकर आपस में मिल जाती है और अगुलहास जलधारा को जन्म देती है। यह जलधारा दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी तट पर चलती है। यह जल आगे अग्रसारित होकर विश्व स्तरीय जलधारा पछुआ वायु प्रवाह (West Wind Drift) अंटार्कटिक प्रवाह से मिल जाती है।

          अंटार्कटिका प्रवाह पश्चिम से पूरब चलने की प्रवृति रखती है। इसकी उत्पत्ति अंटार्कटिका के हिमानी पिघलने से होती है। इसलिए इसकी प्रकृति ठंडी होती है। अंटार्कटिका प्रवाह का अधिकांश जल प्रशांत महासागर में प्रविष्ट कर जाता है लेकिन थोड़ा बहुत जल ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी भाग से टकराकर दक्षिण से उत्तर की ओर चलने लगती है। यह एक ठंडी जलधारा है जिसे पश्चिमी आस्ट्रेलियन ठंडी जलधारा के नाम से जानते हैं और ये जलधारा अंततः विषुवतीय गर्म जलधारा से मिल जाती है इस तरह ये एक चक्र को पूरा करती है। इसे आगे के मानचित्र में भी देखा जा सकता है।

Indian Ocean Currents
(B) उत्तरी हिंद महासागर की जलधारा –
                       उत्तरी हिंद महासागर एक अपूर्ण महासागर है। इसका नितल काफी छिछला है। हिंद महासागर में भारतीय प्रायद्वीप काफी अंदर तक घुसा हुआ है। आर्कटिक महासागर से नहीं जुड़े रहने के कारण इसमें ठंडी जलधाराएं नहीं पाई जाती है। यह एकमात्र ऐसा महासागर है जिसमें जलधाराएं ऋतु के अनुरूप अपने दिशा में परिवर्तन लाती है।
             उतरी हिंद महासागर में समुद्री जल जुलाई माह में घड़ी की सुई की दिशा में चलती है। जबकि जनवरी महीने में उत्तरी पूर्वी मानसून या वाणिज्यिक हवा के प्रभाव में आकर घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में प्रवाहित होने लगती है। जुलाई के महीने में चलने वाली धारा को दक्षिण-पश्चिम मानसून प्रवाह और जनवरी के महीने में चलने वाली जलधारा को उत्तरी-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं।

         विषुवतीय क्षेत्रों में पूर्वी अफ्रीका के तट पर विशाल जलराशि के जमाव के कारण विषुवतीय प्रति जलधारा का भी निर्माण होता है।

★ दक्षिण पश्चिम मानसून प्रवाह उत्तरी पूर्वी मानसून प्रवाह की तुलना में ठंडी होती है।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका 

                  हिन्द महासागर की धाराओं का प्रवाह क्रम प्रशान्त एवं अटलाण्टिक महासागर की धाराओं के प्रवाह-क्रम से भिन्नता लिए हुए है। हिन्द महासागर की धाराओं पर स्थलखण्डों एवं मानसूनी पवनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ता है। हिन्द महासागर उत्तर में भारतीय उपमहाद्वीप, पश्चिम में अफ्रीका तथा दक्षिण में आस्ट्रेलिया महाद्वीप से घिरा हुआ है फलतः इस महासागर में धाराओं का स्थायी क्रम अस्तित्व में नहीं रह पाता है। उत्तरी हिन्द महासागर में उत्तर पूर्वी तथा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं के कारण वर्ष में दो बार धाराएं अपनी दिशा में परिवर्तन कर लेती हैं। स्पष्ट है कि हिन्द महासागर में स्थायी और सामयिक दोनों ही प्रकार की धाराएं प्रवाहित होती हैं।

(A) सामयिक धाराएं

                        विषुवत् रेखा के उत्तर में हिन्द महासागर की समस्त धाराएं मानसून के प्रभाव से अपनी दिशा एवं क्रम में वर्ष में दो बार परिवर्तन कर लेती हैं। मानसूनी पवनों से प्रवाहित होने के कारण इन्हें मानसून प्रवाह भी कहते हैं।

(1) उत्तर-पूर्वी मानसून धारा- शरदकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) उत्तर-पूर्वी मानसूनी हवाएं स्थल से जल की ओर चलती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर में अण्डमान तथा सोमाली के बीच पश्चिम दिशा में प्रवाहित होने वाली उत्तर-पूर्वी मानसून धारा का जन्म होता है। यह धारा 5° उत्तरी अक्षांश से होकर प्रवाहित होती है। यह एशिया महाद्वीप के दक्षिणी तटों के सहारे बहते हुए अफ्रीका के तट पर पहुंचती है। फिर अफ्रीका के शृंग से टकराकर दक्षिण की ओर मुड़ जाती है। विषुवत् रेखा के उत्तर में यह पूर्व की ओर मुड़कर पूर्वी द्वीप समूह तक जाती है। इस सम्पूर्ण चक्र को उत्तर-पूर्वी मानसून प्रवाह कहते हैं। यह एक मन्द समुद्री धारा है।

(2) भारतीय प्रतिधारा- यह उपर्युक्त 2° से 8° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य शीतकाल में जंजीबार से सुमात्रा के बीच पूर्व की ओर बहने वाली धारा है।

(3) दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा- ग्रीष्मकाल में (उत्तरी गोलार्द्ध में) मानसूनी हवाओं की दिशाएं उलट कर दक्षिण-पश्चिमी हो जाती हैं। जिस कारण उत्तरी हिन्द महासागर का धारा क्रम भी उलट जाता है। उत्तर-पूर्वी मानसून धारा उलट जाती है और उसकी जगह पर दक्षिण-पश्चिमी मानसून धारा का जन्म होता है, जो मोजाम्बिक के पास से प्रारम्भ होकर अफ्रीका के पूर्वी तट के सहारे बहती हुई अरब सागर में प्रवेश करती है और दक्षिणी एशिया के तटवर्ती भागों का अनुसरण करती हुई सुमात्रा के पश्चिमी तट तक पहुंचती है। अन्त में यह भूमध्य रेखीय धारा से मिल जाती है।

(B) स्थायी धाराएं

               हिन्द महासागर के दक्षिणी भाग में स्थायी धाराओं का क्रम पाया जाता है जो निम्नलिखित हैं :

(1) दक्षिणी विषुवत्रेखीय धारा- यह धारा दक्षिणी हिन्द महासागर में 10° से 15° दक्षिणी अक्षांश के बीच आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के बीच दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक पवनों के प्रभाव से पश्चिम की ओर बहती है। 10° अक्षांशों के निकट यह मालागासी द्वीप के उत्तर में दो शाखाओं में विभाजित होकर दक्षिण की ओर बहती है।

(2) मोजाम्बिक धारा- उपर्युक्त धारा के मालागासी के उत्तर में दो भाग हो जाते हैं जिसका पश्चिमी भाग मोजाम्बिक धारा कहलाती है। यह शाखा अफ्रीका महाद्वीप और मालागासी द्वीप के बीच भाग से दक्षिण की ओर बहती है।

(3) अगुलहास की धारा-  मेडागास्कर द्वीप के दक्षिण में दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की दो विभाजित शाखाएं पुनः मिलकर एक हो जाती हैं और दक्षिण की और दक्षिण-पूर्व अफ्रीका के तट के सहारे अगुलहास की धारा के नाम से बहते हुए अन्ततः अण्टार्कटिक प्रवाह से मिल जाती हैं।

(4) मालागासी धारा- यह धारा उपर्युक्त वर्णित दक्षिणी विषुवतरेखीय धारा की (जब वह पूर्वी अफ्रीका तट पर दक्षिण की ओर बहती है और मेडागास्कर के उत्तर से दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।) पूर्वी शाखा को ही, जो मेडागास्कर के पूर्व से होकर दक्षिण दिशा में बहती है, मेडागास्कर या मालागासी धारा कहते हैं।

(5) अण्टार्कटिक प्रवाह-  हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम भाग में अगुलहास धारा जब पछुआ हवाओं के प्रभाव में आती है तो पूर्व की ओर मुड़कर निर्वाध रूप से बड़ी तीव्र गति से पूर्व की ओर बहती है। यह बड़ी ठण्डी धारा होती है।

हिन्द महासागर की धाराओं एवं पवनों में सम्बन्ध तथा ऋत्विक भिन्नता-

              हिन्द महासागर की धाराओं का अध्ययन करने के पश्चात् हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यहां उत्तरी हिन्द महासागर में प्रवाहित होने वाली धाराएं अस्थायी तथा शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन मानसूनी पवनों की दिशा के अनुरूप होती हैं। जबकि दक्षिणी हिन्द महासागर में चलने वाली धाराएं स्थायी तो है, परन्तु उनकी गति व दिशा पर भी (प्रत्येक महासागर की धाराओं की तरह) पवनी का प्रभाव दिखाई पड़ता है। पवनों व धाराओं का जितना स्पष्ट सम्बन्ध हिन्द महासागर में दिखाई पड़ता है, उतना किसी भी महासागर में प्रतीत नहीं होता है।

            उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में हिन्द महासागर तथा बंगाल की खाड़ी की मौसमी पवनों तथा धाराओं का अध्ययन किया गया। 1857 से 1952 ई. तक हिन्द महासागर की मौसमी पवनों के 6 माह एक दिशा में तथा 6 माह दूसरी दिशा में प्रवाहित होने के कारणों का पता लगाने के लिए इस क्षेत्र में 16 बार समुद्री खोज की गई।

               1968 में हेले ने स्पष्ट किया था कि मानसून पवनें दक्षिणी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों की पेटी से उत्पन्न होती हैं तथा  पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न विक्षेपक बल के कारण ये पवनें पश्चिमी भारत के वर्षा क्रम के अन्तर्गत आ जाती है।

             पीसारोटी ने अन्तर्राष्ट्रीय भारतीय समुद्री खोज के समय सिद्ध किया कि जितने जल की मात्रा भूमध्य रेखा को पार करके अरब सागर में पहुंचती है, उससे भी तिगुनी वाष्पभरी पवनें जुलाई के महीने में भारत के पश्चिमी तट को पार करके प्रायद्वीपीय भारत में पहुंचती है।

            लाइट हिल ने 1969 में यह स्पष्ट किया कि हिन्द महासागर में सोमालीलैण्ड के निकट सोमाली धारा केवल स्थानीय क्षेत्र के मानसून पवनों के प्रवाह एवं आयतन को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि सम्पूर्ण क्षेत्र की पवनों एवं समुद्र की गति को प्रभावित करती है। इन्होंने भूमध्यरेखीय भागों में स्थित होने के कारण हिन्द महासागर में पवनों की गति का प्रभाव वहां की लहरों पर आंका है।


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11. Ocean current / समुद्री  जलधारा

 11. Ocean current / समुद्री  जलधारा 


Ocean current / समुद्री  जलधारा ⇒

Ocean current                                         

                    मोंकहाउस ने समुद्री जलधारा को परिभाषित करते हुए कहा है कि “समुद्री नितल के ऊपर स्थित विशाल जलराशि की एक निश्चित दिशा में प्रवाहित होने वाली सामान्य गति को महासागरीय जलधारा करते हैं।” जलधाराओं के अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि जलधाराएं नदी के समान होती है। इनके किनारों पर जल लगभग स्थिर होते हैं जबकि मध्यवर्ती भाग में गति अधिक होती है। जलधाराएं न केवल समुद्री सतह के ऊपर चलती है बल्कि गहराई में भी चलती है। जलधाराएं एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जलधाराओं में जल की गति 2 से 10 किलोमीटर प्रति घंटा तक होती है। समुद्री जलधाराएं भौतिक विशेषता गति एवं स्थिति के आधार पर कई प्रकार की होती है। जैसे :- भौतिक विशेषता के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है-

(i) ठंडी जलधारा 

(ii) गर्म जलधारा 

               विषुवतीय क्षेत्र से चलने वाले जलधाराएं गर्म प्रकार की होती है जबकि ध्रुवीय क्षेत्रों से उत्पन्न होने वाली जलधाराएं ठंडी होती है। जैसे – तीनों महासागरों में चलने वाले विषुवतीय जलधारा गर्म जलधारा का उदाहरण है। जबकि हम्बोल्ट (पेरू) जलधारा, अंटार्कटिका, पछुआ प्रवाह ठंडी जलधारा का उदाहरण है। 

            स्थिति के आधार पर जलधाराएं दो प्रकार की होती है। 

(i) सतही जलधारा

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा

(i) सतही जलधारा (Surface Current)- ध्रुवों और भूमध्यरेखीय भागों के बीच तापक्रम में अधिक अंतर पाया जाता है। समुद्री जल गर्म होकर हल्की होती है और ठंडी होकर भारी होती है। इसलिए विषुवतीय क्षेत्र से ध्रुवों की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं समुद्र सतह के ऊपर से प्रवाहित होती है। ऐसी जलधारा को सतही जलधारा कहते हैं।

(ii) अधोवाहिनी जलधारा / उप सतही जलधारा- ध्रुवों से विषुवतीय क्षेत्र की ओर प्रवाहित होने वाली जलधाराएं ठंडी एवं भारी होती है। इसलिए वे समुद्री नितल के ऊपर से प्रवाहित होने लगती है और धीरे-धीरे गर्म होकर ऊपर उठने की प्रवृत्ति रखती है। ऐसी जलधाराओं को ही अधोवाहिनी जलधारा या उपसतही जलधारा कहते हैं। 

         गति के आधार पर समुद्री जल धाराएं तीन प्रकार की होती है –

(i) प्रवाह (Drift)- जब सागरीय जल मंद गति से प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है तो उसे प्रवाह कहते हैं। प्रवाह में समुद्री जल केवल ऊपरी सतह पर प्रगतिशील रहता है। प्रवाह की उत्पत्ति में प्रचलित हवाओं का विशिष्ट योगदान है। प्रवाह की कोई निश्चित गति सीमा निर्धारित नहीं है।

(ii) धारा (Current)- धारा की औसत गति 30 से 40 किलोमीटर प्रतिदिन होता है। इसमें समुद्री नितल के ऊपर स्थित संपूर्ण समुद्री जलराशि प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। धारा की गति प्रवाह की तुलना में अधिक होती है।

(iii) स्ट्रीम (Stream)-  स्ट्रीम विशाल मात्रा में समुद्री जलराशि किसी एक निश्चित दिशा में तीव्र गति से प्रभावित होने की प्रवृत्ति रखती है। स्ट्रीम की गति धारा से भी अधिक होती है।

समुद्री जलधारा की उत्पत्ति के कारक

                समुद्री जलधाराओं में क्षैतिज गति पाई जाती है। इसकी उत्पत्ति के कारकों को मोटे तौर पर 4 वर्गों में बांटा जा सकता है – 

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक (पृथ्वी की आकृति एवं गुरुत्वाकर्षण बल, पृथ्वी की घूर्णन गति)

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक (वायुदाब, वायु की दिशा, वाष्पीकरण, वर्षण)

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े हुए कारक (लवणता, घनत्व, तापमान)

(4) धाराओं की दिशा को प्रभावित करने वाला कारक (समुद्री नितल की उच्चावच, तटीय आकृति, मौसम परिवर्तन, पृथ्वी का भ्रमण/कोरियोलिस बल)

(1) पृथ्वी की विशेषता से जुड़े हुए कारक- पृथ्वी की आकृति, गुरुत्वाकर्षण बल एवं घूर्णन गति का प्रभाव जलधाराओं की उत्पत्ति पर पड़ता है। विषुवत रेखा पर गुरुत्वाकर्षण बल न्यूनतम एवं अपकेंद्रीय बल अधिकतम होता है। जबकि ध्रूवों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिकतम तथा अपकेंद्रीय बल न्यूनतम होता है। इसके कारण विषुवतीय प्रदेश का सागरीय जल ध्रूवों की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखता है।

                      अर्थात पृथ्वी अपने दोनों ध्रुवों पर नारंगी की तरह धँसी हुई है। जबकि विषुवतीय भाग में ऊपर उठी हुई है। पुनः ध्रुवीय भागों में गुरुत्वकर्षण शक्ति अधिक होने के कारण जल का ऊपरी स्तर नीचे की ओर दवा हुआ रहता है। जबकि विषुवतीय क्षेत्र में गुरुत्वाकर्षण क्षमता कम होने के कारण जल का स्तर ऊपर उठा रहता है। फलतः उच्च  जल स्तर से निम्न जल स्तर की ओर जल में प्रवाह की प्रवृति होती है।

                    इसी तरह पृथ्वी की घूर्णन गति के कारण ही जलधाराएँ उत्पन्न होती है। पृथ्वी पश्चिम से पूरब की ओर घूम रही है। चूंकि समुद्र की सतह ठोस है। जबकि समुद्री पानी द्रव है। इसीलिए जब पृथ्वी पश्चिम से पूरब घूमती है तो समुद्री जल में पूरब से पश्चिम की ओर क्षैतिज गति उत्पन्न होती है। इसका सर्वोत्तम उदाहरण सभी विषुवतीय गर्म जलधाराएँ हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का पर प्रभाव समुद्री सतह पर जलधारा सर्वाधिक विषुवतीय क्षेत्र में ही पड़ता है।

(2) वायुमंडलीय कारक / बाह्य सागरीय कारक- वायुमंडलीय कारकों के अंतर्गत को शामिल किया जाता है-

(i) वायुदाब

(ii) वायु की दिशा 

(iii) वाष्पीकरण

(iv) वर्षण 

वायुदाब- सामान्यत: निम्न वायुदाब प्रदेश के जल उच्च वायुदाब प्रदेश की तरफ गतिशील हो जाते हैं क्योंकि दोनों के जलसतह में अंतर होता है। जैसे – केनारी जलधारा, कैलिफ़ोर्निया जलधारा ये सभी उपध्रुवीय निम्न वायुदाब क्षेत्र से उपोष्ण उच्च वायुदाब क्षेत्र की ओर चलती है।

वायुदिशा/प्रचलित पवनें एवं घर्षण बल- समुद्री जलधाराओं के निर्धारण में वायुदिशा का अभूतपूर्व प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः इतना प्रभाव किसी भी अन्य कारक का नहीं है। वायुदिशा के अनुरूप समुद्री जलधाराएं हजारों किलोमीटर तक प्रवाहित होती है। विश्व के प्रमुख प्रचलित वायु के समानांतर ही कई जलधाराएं चला करती है।

जैसे – 

◆ उत्तरी-पूर्वी वाणिज्य हवा- उत्तरी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ दक्षिणी-पूर्वी वाणिज्य हवा- दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा 

◆ उत्तरी गोलार्ध की पछुआ वायु- उत्तरी अटलांटिक पछुआ प्रवाह और उत्तरी प्रशांत प्रवाह 

◆ दक्षिणी गोलार्ध की पछुआ वायु- पश्चिमी वायु प्रवाह

वाष्पीकरण- अधिक वाष्पीकरण के कारण जल की मात्रा कम हो जाती है। साथी जल की लवणता एवं घनत्व में वृद्धि होती है। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह होता है कि अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों में जल का तल नीचा हो जाता है।  फलस्वरुप कम वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों से अधिक वाष्पीकरण वाले क्षेत्रों की ओर समुद्री जल जलधाराओं के रूप में प्रवाहित होती है। 

वर्षण- जिन क्षेत्रों में वर्षण क्रिया से अतिरिक्त जल की आपूर्ति होती है। उन क्षेत्रों से जल कम वर्षण वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। जैसे – विषुवतीय क्षेत्र में वर्षण की क्रिया से अधिक जलापूर्ति होने के कारण जलधाराएँ उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के कम वर्षा वाले क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है।

(3) समुद्री जल की विशेषता से जुड़े कारक / अंतः समुद्री कारक- सागरीय जल के तापमान, लवणता, घनत्व आदि में स्थानीय परिवर्तन होते हैं जिसके कारण जल धाराओं की उत्पत्ति होती है। तापमान के कारण लवणता प्रभावित होती है और लवणता के कारण जल का घनत्व प्रभावित होता है। अतः ये तीनों कारक आपस में जुड़े हुए हैं। सामान्यतः निम्न घनत्व के जल अधिक घनत्व जल की तरफ गतिशील होते हैं। जैसे- निम्न घनत्व वाले अटलांटिक महासागर का जल अधिक घनत्व वाले भूमध्यसागर की ओर प्रवाहित होने की प्रवृत्ति रखती है। सामान्यत: समुद्री जलधारा की उत्पत्ति में घनत्व का सबसे कम प्रभाव है।

समुद्र जल का तापमान- समुद्र की सतह के तापीय विषमता ही जल धाराओं को उत्पन्न करती है। जैसे निम्न अक्षांश क्षेत्र के जल उच्च अक्षांश क्षेत्र की तुलना में गर्म होती है। इसका परिणाम यह है कि सभी समुद्रों में जलधारा की सामान्य प्रवाह निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ होती है। गर्म जल सापेक्षिक रूप से उठे हुए होते हैं। इसी तरह ध्रुवोय क्षेत्रों में हिमानी के कारण और सूर्य के तापीय प्रभाव कम होने के कारण जल का तापमान कम हो जाता है। ऐसे जल उच्च अक्षांश से निम्न अक्षांश की ओर प्रवाहित होती है।

(4) समुद्री जल धाराओं के दिशाओं को प्रभावित करने वाले कारक

उच्चावच एवं तट की आकृति- समुद्री नितल का उच्चावच और तटीय आकृति समुद्री जलधाराओं की दिशा निर्धारण में मदद करते हैं। इसलिए इसे संशोधनात्मक कारक कहा जाता है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण उत्तरी अटलांटिक महासागर में विषुवतीय गर्म जलधारा का मध्य अटलांटिक कटक के पास उत्पन्न प्रतिरोध के कारण उत्तर की तरफ मुड़ जाना है। इसी तरह सभी विषुवतीय जलधाराएं महाद्वीपों के पूर्वी तट से टकरा कर निम्न अक्षांश से उच्च अक्षांश की तरफ चलने की प्रवृत्ति रखते हैं। इसी तरह छोटे द्वीपों के कारण जलधाराएं कई भागों में विभक्त होकर प्रवाहित होती है।

                                          पृथ्वी की घूर्णन गति से उत्पन्न कोरियोलिस बल या विक्षेप बल (Deflective Force) के कारण जलधाराएं उत्तरी गोलार्ध में दायीं ओर एवं दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर मुड़ जाती है। पृथ्वी के पश्चिम से पूरब दिशा में घूर्णन के कारण धाराओं का मार्ग गोलाकार हो जाता है।  

मौसम परिवर्तन का प्रभाव:- जब सूर्य उत्तरायण होता है तो समुद्री धाराओं  का प्रवाह क्षेत्र थोड़ा सा उत्तर की ओर खिसक जाता है एवं दक्षिणायन होता है तो धारा क्षेत्र थोड़ा दक्षिण की ओर खिसक जाता है। मानसूनी पवनों की दिशा में परिवर्तन के कारण उत्तरी हिंद महासागर में धाराओं की दिशा में भी परिवर्तन हो जाता है।

                 इस प्रकार स्पष्ट है कि समुद्री जल धाराओं की उत्पत्ति में कई कारकों का प्रभाव होता है।


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