18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास (Development of Geographical ideas in Ancient India)

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास


प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास

             प्राचीन भारत की कई हजार वर्ष ईसा पूर्व की संस्कृति व नगरीय निर्माण कला के अवशेष देखकर आज विकसित पाश्चात्य देशों के महान विद्वान भी असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। पुरातनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान का विवरण विभिन्न स्थलों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों से प्राप्त होता है।

         प्राचीनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को संक्षेप में निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1) सौरमण्डलीय ज्ञान:-

          प्राचीन काल में ही ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी के सम्बन्धों, ऋतु परिवर्तनों, दिवस-रात्रि, उषः, मध्याह्न अपरान्ह, आदि के प्रसंग ऋग्वेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में, बहुत से मन्त्रों में आते है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष के वर्णन तथा मृगशिरा, कृत्तिका, चित्रा, रेवती आदि सत्ताईस नक्षत्रों के वेदों व ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में पढ़े जा सकते हैं। विषुव दिवस (Equatorial Day) का उल्लेख वेदों में अनेक स्थानों पर है। सौर वर्ष (Solar Year), सौर मास (Solar Month), आदि की गणनाओ, सत्ताइस नक्षत्रों की चालों और सूर्य नक्षत्रों की गणनाओं के आधार पर वैदिक ज्योतिष का प्रतिपादन किया गया।

        ईसा की पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक भारतीय विद्वानों ने खगोलीय भूगोल (Astronomical Geography) में बहुत उन्नति की। इसी काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आदि विख्यात गणितज्ञ थे। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में ‘सूर्य सिद्धान्त’ प्रमुख है।

प्राचीन भारत में भौगोलिक

आर्यभट्ट

            प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में पृथ्वी की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के मन्त्रों से अनुमान लगाया गया है कि आर्यों ने पृथ्वी के पिघले रूप की कल्पना की थी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। रामायण-महाभारत में भूचाल तथा ज्वालामुखी के प्रसंग हैं। “जब शक्तिशाली गज थक कर सिर हिलाता है, तब भूचाल आता है।’ यही कारण बताया गया है भूचाल का। महाभारत में ज्वालामुखी पर्वत के उभार की चर्चा है- “पृथ्वी अपने सातों महाद्वीपों के साथ उठ गई, जिसके साथ पर्वत, नदियां, वन, आदि भी ऊंचे उठ गए।’

        पुराणों में महाद्वीपों व पर्वतों की उत्पत्ति विषयक कल्पनाएं की हैं- ‘पृथ्वी महासागर में एक बृहत् नौका के रूप में तैरती है। ब्रह्मा ने पृथ्वी का समतलन किया व उसे सात द्वीपों में विभक्त किया।’ इससे पृथ्वी के तैरने की वर्तमान संकल्पना (सियाल के बने महाद्वीप सीमा पर तैरते हैं) के समकक्ष विचारधारा का अनुमान होता है। पृथ्वी की आयु की कल्पना भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में की गई है। ‘मनुस्मृति’ उल्लेख है कि पृथ्वी अब तक 1,96,91,03,000 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। समकालीन विद्वान भी पृथ्वी की आयु करीब दो अरब मानते हैं। रामायण में सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण की भी चर्चा है। इसके कारण राहु-केतु बताए गए हैं। सौरमण्डल के अन्य ग्रहों- मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, आदि की चर्चा भी कई स्थलों पर है।

(2) वायुमण्डलीय ज्ञान:-

          ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों को वायुमण्डल के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान था। उन्होंने वर्ष को छः ऋतुओं में विभक्त किया था। मन्त्रों में 49 से 63 प्रकार की पवनों की चर्चा है। वाल्मीकि रामायण में बादलों का वर्णन है। इसमें तीन प्रकार के बादल व सात प्रकार की पवन की चर्चा है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में,  विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समझाया गया है जो आज के वितरण के अनुकूल है। कृषि तथा वर्षा का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है- कुछ ऐसे बादल होते हैं जो क्रमशः सात दिन तक वर्षा करते हैं, 80 ऐसे हैं जिनमें कम वर्षा होती है, 60 ऐसे होते हैं जो खेतों को जोतने योग्य बनाते हैं। कौटिल्य ने वर्षा मापक यन्त्र भी तैयार किया था।

(3) जलमण्डलीय ज्ञान:-

            वैदिक मन्त्रों में महासागरों का वर्णन है। सामवेद तथा अथर्ववेद में महासागरों की संख्या 4 बताई गई है, परन्तु अन्य वेदों में इनकी संख्या 7 बताई गई है। सामवेद में महासागरों में जल के उठने का वर्णन मिलता है, जिससे ज्वार-भाटा की कल्पना की जा सकती है। रामायण में कई स्थानों पर ज्वार-भाटा का उल्लेख है, इसका कारण चन्द्रमा बताया गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूंगा, मोती की चर्चा है। महासागरों में किन स्थानों पर ये मिलते हैं, इसका भी विस्तृत वर्णन ग्रन्थ में पढ़ा जा सकता है।

(4) स्थलमण्डलीय ज्ञान (सामान्य भौगोलिक वर्णन):-

       प्राचीन काल के स्थलमण्डलीय ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) भौतिक भूगोल- भौतिक भूगोल विषयक ज्ञान में पर्वतों, नदियों व वनस्पति का वर्णन मिलता हैं:-

(क) पर्वत- पुराणों के अनुसार संसार की समस्त पर्वत श्रृंखलाएं पामीर (मेरु) के चारों ओर जाती हैं। पर्वतों को पांच प्रकारों में विभक्त किया गया है- मध्य पर्वत (मेरु), विषकम्भ पर्वत (जो मेरु के चतुर्दिक विस्तृत हैं), वर्ष पर्वत (विभिन्न देशों की कुल पर्वत (मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं) तथा मर्यादा पर्वत (सीमा पर स्थित पर्वत)।

         भारत के पर्वतों का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें महेन्द्र (पूर्वी घाट), मलय (पश्चिमी घाट का दक्षिणी भाग), सह्य (पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग), रिक्ष (मध्य विंध्य), आदि प्रमुख है।

(ख) नदियां- वेदों में नदियों के विस्तृत वर्णन हैं। वेदों व उपनिषदों में अफगानिस्तान, पंजाब व गंगा-यमुना क्षेत्र की नदियों का वर्णन है। पुराणों के अनुसार मेरु (पामीर) के दिशाओं में नदियां प्रवाहित होती हैं। दक्षिण की ओर गंगा, पश्चिम की ओर चक्षु, पूर्व की और सीता व उत्तर की ओर भद्रसोन नदी बहती है। मार्कण्डेय पुराण में भारतीय नदियों का विस्तृत वर्णन है। गंगा की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन है। अन्य नदियों में यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, कृष्णा व ताम्रपर्णी का विशेष वर्णन है।

(ग) वनस्पति- मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न प्रकार की वनस्पति का वर्णन मिलता है। तत्कालीन फसलों का भी वर्णन है। शिव पुराण में दुग्ध वृक्ष (रबर) का प्रसंग है।

(ii) मानव भूगोल विषयक ज्ञान-

          ऋग्वेद में पृथ्वी पर पांच प्रकार के लोगों के निवास का वर्णन है। इनमें असुर तथा दास भी सम्मिलित हैं। वाजसनेयि संहिता में चार वर्णों का उल्लेख है: ब्राह्मण्ड, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। रामायण में अनेक भारतीय आदिम जातियों के वर्णन है। इनमें राक्षस, वानर, निषाद, किन्नर, सावर, गन्धर्व, नाग, असुर, देव, आदि जातियां मुख्य हैं। विदेशी जातियों में शक एवं यवनों को गौर वर्ण की जातियां कहा गया है। राक्षसों का रंग काला व रूप भयानक बताया गया है।

         महाभारत में भी अनेक जातियां, उनके रूप-रंग, विवाह पारिवारिक सम्बन्धों आदि के वर्णन है। मनु के धर्म शास्त्र में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं: ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्दर्व, पैशाच व राक्षस। इनमें से छः को सामाजिक समर्थन प्राप्त था। कौटिल्य ने भी विवाह पद्धति व स्त्री-पुनर्विवाह की चर्चा की है।

(iii) सांस्कृतिक भूगोल विषयक ज्ञान-

          प्राचीन समय से ही कृषि भारतीयों का मुख्य व्यवसाय रहा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि कृषि में किन सावधानियों की आवश्यकता होती है। ऋग्वेद में खेत जोतने का आदेश दिया गया है। पातञ्जलि के महाभाष्य में फसलें बोने की विधियों, कृषि क्षेत्रों, बीजों व अनाज भण्डारण का वर्णन है। पाणिनि प्रातञ्जलि व मनु ने भूमि का वर्गीकरण भी किया है। बाढ़ से प्रभावित भूमि द्वारा अनुपयोगी भूमि ऊसर, पशुचारण के लिए प्रयुक्त भूमि गोचर व जोतने योग्य भूमि (शील्य) कही गई। पातञ्जलि ने फसलों के प्रादेशिक वितरण का भी वर्णन किया है। सिंचाई के साधनों पर भी प्रकाश डाला गया है। कुएं व तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे।

           प्राचीन भारत में विभिन्न उद्योग धन्धे भी पर्याप्त विकसित अवस्था में थे। वर्तन, वस्त्र निर्माण, सिक्के, आभूषण आदि सम्बन्धी उद्योगों का वर्णन वेदों में है। भवन निर्माण, काष्ट शिल्प, मृतिका शिल्प, लौह शिल्प भी इस समय अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित जंगरहित लौह स्तम्भ, जो कि गुप्त काल में निर्मित बताया जाता है, भारतीय लौह-शिल्पियों की दक्षता का प्रमाण हैं।

         परिवहन मार्ग भी प्राचीन भारत में अच्छी अवस्था में थे। ब्रह्माण्ड पुराण में दस प्रकार की सड़कों का वर्णन है: दिशा मार्ग, ग्राम मार्ग, सीमा मार्ग, राज, पथ, शाखा रथ्या, रथोपरथ्या, उपरथ्या, जंघापथ, गृहान्तपथ तथा धृति मार्ग।

          विदेशी व्यापार भी प्राचीन काल से भारतीय विशेषता है। विष्णु पुराण में कम्बोज के घोड़ों तथा मत्स्य पुराण में नेपाल के कम्बलों का उल्लेख है।

        अधिवास सम्बन्धी ज्ञान भी प्राचीन भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राचीन भारतीय नगर नियोजन व भवन निर्माण कला का परिचय मिलता है। मानवीय बस्तियों का वर्गीकरण ‘मायामतम’ में किया गया है।

(iv) राजनीतिक व प्रादेशिक भूगोल विषयक ज्ञान-

           वैदिक साहित्य में भारतीय जनपद प्रदेशों के वर्णन हैं। इनमें काशी, कोशल, मगध, पांचाल, विदर्भ, सौराष्ट्र व आन्ध्र प्रमुख थे।

निष्कर्ष:          

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारतीय भौगोलिक ज्ञान उच्चकोटि का था परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भौगोलिक विचारधाराओं के विकास के इतिहास में उसे स्थान नहीं दिया गया है।

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास


19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

           वर्तमान समय में भूगोल का जो वैज्ञानिक स्वरूप उभर कर सामने आया है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी की ही देन है। यह वह युग था, जिनमें हम्बोल्ट (Humboldt), रिटर (Ritter) व रेटजेल (Ratzel) जैसे महान भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक तथ्यों को भलीभांति संगठित करके प्रस्तुत किया था। उन्होंने भूगोल को परिभाषित किया व उसकी विषय वस्तु को निर्धारित किया। यद्यपि इसके युग से पूर्व के भूगोलवेत्ताओं के अध्ययन में वैज्ञानिक छाप थी, परन्तु उनमें वैज्ञानिकता कम व दार्शनिकता अधिक थी। इसी युग में वस्तुतः वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना हुई। इसका श्रेय जर्मनी के तीन महान भूगोलवेत्ताओं (हम्बोल्ट, रिटर व रेटजेल) को है। इनके द्वारा जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किए गए, उनमें अन्वेषण की विधियों, अभिलेखों तथा वर्णनों की सूक्ष्मता देखने को मिलती है। बीसवीं सदी का भूगोल इसी सूक्ष्मता व शुद्धता के आधार पर विकसित हुआ।

         इस युग के भूगोलवेत्ताओं का भूगोल में योगदान संक्षेप में प्रस्तुत है:-

(1) हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt):-

         हम्बोल्ट बहुमुखी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक था। भूगोल में उसके योगदान का मूल्यांकन करना कोई हंसी-खेल नहीं। बनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आदि क्षेत्रों में हम्बोल्ट का योगदान रहा है। बहुत से विज्ञान इस बात के लिए उसके ऋणी हैं कि उसने उनको नए तथ्य व नई सूझें प्रदान की थीं, परन्तु भूगोल का तो वह एक जन्मदाता था।

      हम्बोल्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना कॉसमॉस (Cosmos) है। इसमें सम्पूर्ण विश्व का प्रादेशिक वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें पांच खण्ड हैं। यह ग्रन्थ लिखने में हम्बोल्ट को सत्रह वर्ष का समय लगा था। हम्बोल्ट का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ मध्य एशिया (Asia Centrale) है। यह जर्मन भाषा में 1843 में दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था।

    हम्बोल्ट ने प्रारम्भ से ही यात्राओं में रुचि प्रदर्शित की थी। उसने प्रथम यात्रा 1799 में प्रारम्भ की थी। वह जहाँ भी जाता था, कुछ यन्त्र प्रेक्षण के लिए अपने साथ-साथ रखता था।

       हम्बोल्ट ने भूगोल मे सात संकल्पनाओं का भी प्रतिपादन किया था। ये संकल्पनाएं थी-

(i) पृथ्वी तल का मानव निवास के रूप में अध्ययन,

(ii) भूगोल संसार में स्थानिक वितरणों का विज्ञान,

(iii) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है,

(iv) भूगोल सम्बन्धों का अध्ययन है,

(v) सांसारिक दृश्य घटनाओं का अध्ययन है,

(vi) प्रकृति की एकता का अध्ययन तथा

(vii) दृश्य घटनाओं की विषमांगता का अध्ययन

        हम्बोल्ट ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियाँ अपनाई जैसे- आनुभविक, तुलनात्मक, कार्टोग्राफिक, क्रमबद्ध, आदि।

(2) रिटर (Carl Ritter):-

         रिटर का जन्म 1779 में हुआ था। भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में रिटर भी एक था।

     रिटर का सर्वप्रमुख ग्रन्थ एर्डकुण्डे (Erdkunde) था। इसके अतिरिक्त ‘यूरोप का भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांख्यिकीय चित्रण’ भी रिटर का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह रिटर का प्रथम ग्रन्थ था।

       1828 में रिटर ने भौगोलिक ज्ञान के प्रचार व प्रसार के लिए एक भौगोलिक समिति की स्थापना की थी। वह जीवन पर्यन्त, 31 वर्ष तक इसका अध्यक्ष रहा था।

       रिटर की विचारधारा पर हम्बोल्ट का बहुत प्रभाव था, हम्बोल्ट से रिटर की मुलाकात 1827 में हुई। दोनों ने मिलकर भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

          रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का समर्थन करता था। वह पृथ्वी तल के वर्णन मात्र को भूगोल नहीं मानता था। उसका मत था कि इस अध्ययन में मानव की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। रिटर प्रकृति की एकता में विश्वास करता था। प्रादेशीकरण की विचारधारा का रिटर ने समर्थन किया था।

          रिटर ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियां अपनाई। इनमें अधिकांश हम्बोल्ट की विधियों के समान थीं-आनुभविक, तुलनात्मक व मानचित्रण इसके अतिरिक्त रिटर ने विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक विधि भी अपनाई।

(3) रेटजेल (Friedrich Ratzel 1844-1904):-

     उन्नीसवीं सदी के अन्तिम समय में जर्मनी के भौगोलिक क्षेत्र में रेटजेल ने शासन किया। भूगोल में मानव के स्थान को स्थायी बनाने का कार्य रेटजेल ने किया, अतः उसे मानव भूगोल का जन्मदाता (Father of Human Geography) कहा जाता है।

     एन्थ्रोपोज्योग्राफी (Anthropogeographic) रेटजेल की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह ग्रन्थ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ से ही वस्तुतः मानव भूगोल का जन्म हुआ।

रेटजेल ने स्वयं यात्राएं करके आनुभविक विधि से भौगोलिक ज्ञान का एकत्रीकरण किया था। रेटजेल ने ही लिखा है:

“I travelled, I sketched, I described. Thus, I was led to the description of nature.”

       रेटजेल का दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘राजनीतिक भूगोल’ (Politische geographie) था, यह दो खण्डों में क्रमशः 1897 व 1903 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त रेटजेल ने कई अन्य पुस्तकें लिखी। भौमिकी (Geology) मानव जातिशास्त्र (Ethnography), जीव विज्ञान (Biology), भौतिक भूगोल (Physical Geography), आदि पर अनेक लेख लिखे।

         रेटजेल ने मानव व वातावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया था तथा वातावरण निश्चयवाद (Environmental determinism) का प्रतिपादन किया था।

(4) फ्रोबेल (Frobel):-

         फ्रोबेल की विचारधारा हम्बोल्ट व रिटर की विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। उसने रिटर की आलोचना की थी तथा उससे ‘तुलनात्मक’ (Comparative) शब्द का स्पष्टीकरण मांगा था, परन्तु रिटर उसे सन्तुष्ट न कर सका था। फ्रोबेल का मत था कि विभिन्न अवयवों की तुलना, जैसे एक पर्वत की दूसरे पर्वत से, एक नदी की दूसरी नदी से की जा सकती है, परन्तु किसी सम्पूर्ण प्रदेश की तुलना दूसरे सम्पूर्ण प्रदेश से करना उचित नहीं है। फ्रोबेल ने भूगोल को परिभाषित किया था :

          “Geography” he claimed, “was a natural science, concerned with the earth’s surface, studied in a systematic way, i. e. taking in form, relief, climate, vegetation, animal and man; attempting throughout to make clear the interrelation of the various factors.”

          इस प्रकार फ्रोबेल ने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को सीमित करके मात्र भौतिक भूगोल बताया।

(5) पेशेल (Oscar Peshcel):-

           पेशेल जर्मनी में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। वह भौगोलिक पत्र (Das Ausland) का सम्पादक भी था। इसमें विदेशी भूगोलवेत्ताओं के लेख प्रकाशित होते थे। पेशेल ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना की तथा तुलनात्मक भूगोल का विकास किया। पेशेल ने, जिसने भौतिक भूगोल का आधार तैयार किया था, भूगोल में मानव को अधिक महत्व नहीं दिया था।

(6) रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen) (1833-1905):-

         रिचथोफेन मूलतः भौमिकीविद (Geologist) था। वह बोन, बर्लिन व लीपजिंग विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा था। बाद में इन्हीं विश्वविद्यालयों में भूगोल का प्रोफेसर रहा। ‘बर्लिन ज्योग्राफीकल सोसाइटी’ का कई वर्षों तक वह अध्यक्ष रहा था।

19वीं शताब्दी के दौरान भूगो

रिचथोफेन

          रिचथोफेन ने चीन में प्रेक्षण किए थे। चीन पर उसकी ग्रन्थमाला पांच खण्डो में प्रकाशित हुई थी। इसमें प्रथम खण्ड पर ही उसे ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ का पदक मिला था। उसने चीन की एक एटलस भी प्रकाशित की थी।

          रिचथोफेन की मुख्य देन भौतिक भूगोल के क्षेत्र (भू-आकृति विज्ञान) में है। उसने तुलनात्मक भूगोल की स्थापना की थी।

         भूगोल को रिचथोफेन ने क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Chorological Science) बताया था। इसमें पृथ्वी तल पर पाए जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन होता है।

        रिचथोफेन ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) और सामान्य भूगोल (General Geography) में अन्तर स्पष्ट किया था। उसने बताया था कि प्रादेशिक भूगोल में किसी तथ्य विशेष के पृथ्वी पर वितरण का अध्ययन करते हैं।

14. कार्ल रिटर

14. कार्ल रिटर




कार्ल रिटर⇒

कार्ल रिटर

प्रश्न प्रारूप

Q. भूगोल के विकास में रिटर के योगदानों का मूल्यांकन कीजिए।

अथवा, “रिटर उन्नीसवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण भूगोलवेत्ता था”। विवेचना कीजिये।

परिचय

      आनुभाविक अनुसंधान में विश्वास रखने वाले, उद्देश्यवादी और सशक्त प्रकृतिवादी रिटर ने भूगोल को अपने अथक प्रयास से एक नया स्वरूप प्रदान किया है, इसलिए इन्हें आधुनिक भूगोल के भवन का आधार कहा जाता है। कार्ल रिटर एवं अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट दोनों ही समकालीन, आधुनिक वैज्ञानिक भूगोल के संस्थापक एवं भूगोल के चिरसम्मत काल के पर्याय थे।

    कार्ल रिटर भौगोलिक प्रतिरूपों में ईश्वर की झलक देखता था जबकि हम्बोल्ट धर्मनिरपेक्ष एवं तत्कालीन जर्मन आदर्शवाद का पैरोकार था। 

जीवनी- जन्म- 1789 ई० में जर्मनी के क्लेडिलन बर्ग में एक साधारण  चिकित्सक परिवार में हुआ। 

शिक्षा- प्रारंभिक शिक्षा रूसो तथा पेस्टोलॉजी के सिद्धांतों पर आधारित स्नेप पेंथल नामक स्कूल में 1785 ई० से प्रारंभ हुई। इसके बाद, 

◆ 17 वर्ष की आयु में हाले विश्वविद्यालय में प्रवेश।

◆ 19 वर्ष की आयु में फ्रैंकफर्ट नगर में प्राइवेट शिक्षक।

◆ 1814 ई० में गोटेंजन विश्वविद्यालय में शोध कार्य किया।

◆ 1819 ई० में जिम्नेशियम ऑफ फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय में इतिहास भूगोल के प्रोफेसर बने।

◆ 1820-59 ई० तक बर्लिन विश्विद्यालय में प्राध्यापक।

नोट: 1807 में रिटर की मुलाकात हम्बोल्ट से हुई तथा इसके बाद दोनों ने मिलकर भूगोल का विकास किया।

मृत्यु- 1859 ई० को बर्लिन में

भूगोल रिटर का योगदान 

         रिटर के योगदान की चर्चा निम्न शीर्षकों के अंतर्गत की जा सकती है-

(1) भौगोलिक समिति के संस्थापक के रूप में:-

            भौगोलिक ज्ञान के प्रसार तथा भौगोलिक पत्रिका के प्रकाशन हेतु 1828 में ‘बर्लिन भौगोलिक संस्था’ (Berlin Geographical Society) की स्थापना की।

 

(2) एक भौगोलिक लेखक के रूप में:-

कार्ल रिटर

(3) भौगोलिक विधितंत्र के विश्लेषक के रूप में:-

(i) आनुभविक विधि (Emperical Method)

(ii) तुलनात्मक विधि (Comperative Method)

(iii) प्रादेशिक विधि (Regional Method)

(iv) विश्लेषण तथा संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method) 

(v) मानचित्र विधि (Cartographic Method)

(vi) निगमनात्मक विधि (Deductive Method)

          इसके अलावे विभिन्न दर्शनग्राही विधि, क्षेत्र वर्णनी विधि, परिस्थितिकी विधि को भूगोल में रिटर की देन है।

नोट: भौगोलिक अध्ययन विधि के क्षेत्र में रिटर ने फॉरस्टर को महान माना।

(4) प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करने में:-

          प्रदेशों के पदानुक्रम को स्पष्ट करना रिटर का भूगोल में एक प्रमुख योगदान है। इसने भू-आकृतियों का द्वि-स्तरीय वर्गीकरण प्रस्तुत किया है:-

कार्ल रिटर

नोट: महाद्वीप को रिटर ने जर्मन भाषा में ‘आर्डटिल’ (Erdteule) कहा है।

कार्ल रिटर

चित्र: रिटर के तृतीय कोटि प्रदेश का उच्चावच

(5) भौगोलिक संकल्पनाओं के क्षेत्र में:-

कार्ल रिटर

नोट: रिटर को ‘आर्म चेयर ज्योग्रफर’ कहा जाता है।           

(6) भौगोलिक विचारधाराओं के प्रतिपादक के रूप में:-

(A) भूगोल के क्षेत्र (The Field of Geography)- रिटर के अनुसार भूगोल में तीन चीजों का होना आवश्यक है-

कार्ल रिटर

(B) नियतिवाद (Determinism)- रिटर के अनुसार भौगोलिक विविधता के द्वारा ऐतिहासिक विविधता उत्पन्न   होती है। अत: मानव स्वतंत्र नहीं है बल्कि प्रकृति के नियत्रण में उसके अधीन है। 

कार्ल रिटर

(C) सम्पूर्णता की संकल्पना (Concept of Wholeness)- रिटर के अनुसार केवल प्राकृतिक तथा मानवीय पक्ष से भूगोल का निर्माण नहीं होता। अत: सम्पूर्णता के लिए विभिन्न शक्तियों का संयोजन आवश्यक है।

कार्ल रिटर

(D) मानव केन्द्रित भूगोल (Anthropocentric)- केवल पृथ्वी तल का अध्ययन ही भूगोल का उद्देश्य नहीं है बल्कि मानवीय क्रियाओं का वर्णन विशेष महत्व रखता है।

कार्ल रिटर

(E) क्षेत्रीय अध्ययन (Chorological Study)- रिटर के अनुसार, जिस तरह कालक्रम इतिहास का आधार होता है, उसी तरह कोई क्षेत्र भौगोलिक अध्ययन का आधार होता है।

(F) भूगोल आनुभाविक विज्ञान है- रिटर के अनुसार भूगोल एक आनुभाविक विज्ञान है जो प्रेक्षण, परिणाम और सूचना पर आधारित है। 

(G) प्रादेशिक अध्ययन- रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन की व्याख्या के लिए ‘Landerkunde’ और ‘Augemeine Erdkunde’ नामक शब्द का प्रयोग किया।

धरातल विभाजन का आधार⇒ प्राकृतिक 

  • Landerkunde (प्राकृतिक प्रदेश)⇒ विशिष्ट अध्ययन से सम्बंधित
  • Augemeine Erdkunde (सामान्य भूगोल)⇒ प्राकृतिक +मानवीय

नोट: रिटर को प्रादेशिक भूगोल का जनक कहा जाता है।

कार्ल रिटर

(H) ईश्वरवादी विचारधारा (Teleological Approach)- रिटर का मानना था कि पृथ्वी की रचना ईश्वर ने उद्देश्यपूर्वक की है। इनके अनुसार पृथ्वी मानव की शिक्षण और पोषण भूमि है। 

(I) विविधता में एकता (Unity in Diversity)- प्रकृति में विविधता में एकता इनके प्रादेशिक भूगोल का मूल मंत्र था।

(J) मानचित्र विधि (Cartographic Process)- भौगोलिक वर्णन के लिए रिटर ने मानचित्र विधि को एक प्रमुख अस्त्र बनाया।

आलोचना

(i) रिटर अपनी प्रादेशिक अध्ययन में तुलनात्मक विधि का व्यवहार करने में असफल रहे।

(ii) रिटर भूगोल का स्पष्ट तथा युक्तिपूर्ण ढाँचा गढ़ने में लगभग असफल रहे।

(iii) बाद के वर्षों में उन पर द्वैधता का पोषक होने का भी आरोप लगा। 

निष्कर्ष 

       उपर्युक्त आलोचनाओं के बावजूद रिटर का योगदान भौगोलिक ज्ञान के प्रसारण में महत्वपूर्ण रहा है। अंततः हम कह सकते हैं कि कार्ल रिटर ही भूगोल में वस्तुत: द्वैतवाद का जनक था। उसी ने इस अवधारणा का सृजन किया कि पृथ्वी का अध्ययन मनुष्य के लिए किया जाता है। उसने यह भी कहा कि मनुष्य का अध्ययन पृथ्वी का अंग मानकर किया जाता है। इस तरह भौतिक भूगोल एवं मानव भूगोल दोनों की नींव पड़ी।

उत्तर लिखने का दूसरा तरीका

           यदि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में भूगोलवेत्ताओं ने अपने नवीन विज्ञान की अधिकांश संकल्पनाओं को विकसित किया तो उनके “विचारों, मांगों तथा इच्छाओं को तथ्यों में परिणत करने” का श्रेय बहुत कुछ अलेक्जेन्डर वॉन हम्बोल्ट तथा कार्ल रिटर को जाता है। रिटर का जन्म जर्मनी की हार्ल्स पहाड़ियों में स्थित क्वेडली बुर्ग गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा, पिता की मृत्यु व आर्थिक कठिनाई के कारण घर पर ही हुई थी। घरेलू अध्यापक गुटस मुथ्स थे। 1776 में इन्होंने हाल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया।

      1825 में फ्रिडरीश विश्वविद्यालय, बर्लिन में प्रोफेसर बने। 1828 में जब बर्लिन में भूगोल परिषद की स्थापना हुई तो वे इसके प्रथम अध्यक्ष बने और जीवन पर्यन्त इसके अध्यक्ष रहे।

रिटर की रचनायें (Works of Ritter):-

      रिटर ने भूगोल के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक ग्रन्थ लिखे, मानचित्र बनाये व शोध पत्र प्रकाशित किये। 1804 में रिटर का प्रथम ग्रन्थ- Europe: A Geographical, Historical and Statistical Painting प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का दूसरा खण्ड 1806 में प्रकाशित हुआ। 1817 में रिटर की सर्वाधिक महत्वपूर्ण रचना अर्डकुण्डे (Erdkunde) का प्रथम खण्ड (अफ्रीका महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। 1818 में अर्डकुण्डे का दूसरा खण्ड (एशिया महाद्वीप) प्रकाशित हुआ। इस प्रकार 1859 तक अर्डकुण्डे के 19 खण्डों का प्रकाशन हुआ। अन्तिम खण्ड रिटर की मृत्यु के मात्र दो दिन पूर्व प्रकाशित हुआ था। रिटर ने यूरोप की मानचित्रावली भी 1806 में प्रकाशित की थी। इसमें छः मानचित्र थे।

रिटर का विधि-तंत्र (Methodology of Ritter):-

      रिटर की अध्ययन प्रणाली भी हम्बोल्ट की अध्ययन प्रणाली के समान ही थी। उसने अपने अध्ययन के लिये निम्नलिखित विधियाँ अपनायीं-

(i) आनुभविक विधि (Empirical Method):-

      रिटर आनुभविक विधि द्वारा क्षेत्र सर्वेक्षण (Field Survey) करने में विश्वास करता था। उसका मत था कि सावधानीपूर्वक शुद्ध प्रेक्षण करना व सत्य का पता लगाना अध्ययन का उद्देश्य होना चाहिये। रिटर भूगोल को आनुभविक विज्ञान (Empirical Science) मानता था।

(ii) विश्लेषण एवं संश्लेषण विधि (Analysis and Synthesis Method):-

      भौगोलिक तथ्यों को प्रेक्षणों (Observations) द्वारा एकत्र करना व उनका संश्लेषण एवं विश्लेषण करना तथा अन्त में सामान्यीकरण करना-रिटर की इस पद्धति ने भूगोल को वैज्ञानिकता प्रदान की।

(iii) तुलनात्मक विधि (Comparative Method):-

      रिटर ने विभिन्न तथ्यों में कार्य कारण सम्बन्ध (Causal relationship) व अन्तर समझाने के लिये तुलनात्मक विधि अपनाई।

(iv) मानचित्र विधि (Cartographic Method):–

       मानचित्रण को रिटर ने भूगोल का अभिन्न अंग माना था। उसने स्वयं अपने ग्रन्थों आदि में मानचित्रों का उपयोग किया। यूरोप के मानचित्रों की एक मानचित्रावली प्रकाशित की।

रिटर की विचारधारा (Ritter’s Ideology)-

     रिटर व हम्बोल्ट समकालीन विद्वान थे। आयु में हम्बोल्ट रिटर से 10 वर्ष बड़ा था। रिटर पर हम्बोल्ट का काफी प्रभाव पड़ा था। रिटर ने स्वयं भी इस तथ्य को स्वीकार किया था। परन्तु फिर भी इन दोनों महान विद्वानों की विचारधाराओं में पर्याप्त अंतर था। रिटर की विचारधारा के मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:-

(i) रिटर के विभिन्न ग्रन्थों व लेखों को पढ़ने पर ज्ञात होता है कि रिटर की विचारधारा विकासशील थी।

(ii) रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का पोषक था। उसने मानव व वातावरण के सम्बन्धों के अध्ययन को भूगोल का अभिन्न अंग बताया था तथा स्वयं ने इन सम्बन्धों का अध्ययन करके वातावरण को अधिक शक्तिशाली बताया था।

(iii) रिटर ने होम्मेयर व गट्टेरेर की शुद्ध भूगोल (Reine/Pure Geography) की विचारधारा की न केवल आलोचना की, वरन् उसे अवैज्ञानिक बताते हुए अस्वीकार भी कर दिया था। उसके अनुसार- “Pure Geography is nothing more than a general description of terrain.”

(iv) रिटर ने प्रादेशिक अध्ययन पद्धति को अपनाया था तथा प्रादेशिक व्यक्तित्व में सम्पूर्ण की कल्पना की थी। रिटर का सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रन्थ अर्डकुण्डे (Erdkunde) इसी विचारधारा पर आधारित था। उसने अर्डकुण्डे के प्रथम खण्ड में ही अफ्रीका महाद्वीप को विभिन्न प्रदेशों में बांट कर प्रत्येक का सम्पूर्ण वर्णन किया है।

(v) रिटर की विचारधारा ईश्वरवादी (Teleological) विचारधारा थी । उसका मत था कि ईश्वर ने पृथ्वी पर प्रत्येक वस्तु किसी न किसी उद्देश्य से बनाई है।

(vi) रिटर के अनुसार उसका उद्देश्य- ‘समस्त थल’ (Whole Land) का सजीव चित्रण प्रस्तुत करना है, जिसमें उसके प्राकृतिक और कृषि के (Cultivated) उत्पादनों को, उसके प्राकृतिक और मानवीय लक्षणों (Features) को तथा इन सबको एक सम्बद्धपूर्ण (Coherent whole) के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जाना है कि मानव और प्रकृति (Nature) के विषय में सबसे अधिक महत्वपूर्ण अनुमान स्वयं प्रत्यक्ष हो जायें, विशेषकर जब उनकी साथ-साथ तुलना की जाय।

(vii) रिटर के अनुसार भूगोल का उद्देश्य पृथ्वी तल का वर्णन करना मात्र नहीं वरन् उसकी घटनाओं का सकारण (Causal) वर्णन करना है।

10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद / Behavioral Revolution

10. आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद




आचारपरक क्रांति या व्यवहारिकतावाद

          द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अन्तरविषयक अध्ययन का दौर प्रारंभ हुआ। अन्तरविषयक अध्ययन के परिणाम स्वरूप भूगोल में कई क्रांतियों का आगमन हुआ जिनमें मात्रात्मक क्रांति और आचारपरक या व्यावहारात्मक क्रांति प्रमुख था। आचारपरक क्रांति का अभ्युदय मात्रात्मक क्रांति के विरोध में हुआ क्योंकि मात्रात्मक क्रांति ने मानव को पूर्णतः मशीनीकृत बना दिया था। मात्रात्मक क्रांति ने मानवीय चेतना, बौद्धिकता, व्यवहार, सौंदर्य, श्रृंगार रस इत्यादि को कोई महत्व नहीं दिया था।

     अर्थात मात्रात्मक क्रांति ने भूगोल को एक निर्जीव विषय बना दिया था। इस तरह भूगोल में मनोविज्ञान तथ्यों का अध्ययन प्रारंभ किया गया ताकि भूगोल को मानवीय चेतनाओं से मुक्त विषय बनाया जाय।

       भूगोल में मनोविज्ञान के तथ्यों का अध्ययन भौगोलिक संदर्भ में करना ही आचारपरक क्रांति कहलाती है। इस क्रांति का स्रोत विषय मनोविज्ञान और लक्ष्य क्षेत्र मानव भूगोल था। अमेरिकी भूगोलवेता ओलसन ने कहा है कि “आचारपरक क्रांति मानव भूगोल या सामाजिक भूगोल की पूँजी है।” व्यवहारात्मक क्रांति प्रारंभ करने का श्रेय अमेरिका के गेस्टोल्ट समप्रदाय को जाता है। लेकिन भूगोल में आचारपरक क्रांति को मान्यता दिलाने का कार्य डब्लू. किर्क महोदय ने किया।

       आचारपरक क्रांति में इस तथ्य का अध्ययन किया जाता है कि मानव के व्यवहार पर पर्यावरण का प्रभाव और पर्यावरण पर मानव का प्रभाव कैसे पड़ता है? आचारपरक भूगोलवेताओं का कहना है कि वास्तविक पर्यावरण और आचारपरक पर्यावरण दोनों अलग-अलग चीजें हैं। जैसे वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया जाता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधरों के द्वारा किया जा सकता है।

     वास्तविक पर्यावरण के अन्तर्गत जैविक घटक, अजैविक घटक और उन दोनों के बीच चलने वाला ऊर्जा का प्रवाह का अध्ययन करते हैं जबकि आचारपरक क्रांति में एक व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करते हैं। आचारपरक क्रांति एक ऐसी क्रांति है जो मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र और मानवशास्त्र के गर्भ से उत्पन्न हुआ है। भूगोल में आचारपरक क्रांति के विकास के चरण को चार भागों में बाँटते है:-

(1) प्रथम चरण (1955-60) ⇒ प्रथम चरण में डब्लू. किर्क, जे.के. राइट,  गिलबर्ट व्हाइट और हैगर स्टैंड का मुख्य योगदान है। हैगर स्टैंड ने अपने नव उत्पाद सिद्धांत के माध्यम से कृषि स्थानीयकरण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जिसमें यह बताया कि कृषि के स्थानीयकरण पर मानव व्यवहार का प्रभाव पड़ता है। फेटर और हॉटली महोदय ने अमेरिका के म्यामी बिच पर साफ्टी (आईसक्रीम ) उद्योग विकसित होने के पीछे मानव के व्यवहार को ही उत्तरदायी माना है।

(2) दूसरा चरण (1960-65) ⇒ दूसरा चरण में किट्स, वोल्पर्ट, डेविडहफ और लोवेंथल जैसे भूगोलवेताओं का योगदान है। इस चरण में प्रथम चरण की तुलना में और अधिक मनोविज्ञान के तथ्यों का प्रयोग भूगोल में किया गया है। ओल्पर्ट महोदय ने बताया कि मानवीय जनसंख्या के स्थानान्तरण पर आचारपरक क्रांति का प्रभाव पड़‌ता है। जैसे उन्होंने कहा बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश से मजदूरों का प्लायन पंजाब की ओर होना व्यावहारात्मक क्रान्ति का परिणाम है।

(3) तीसरा चरण (1965-71)⇒ तीसरा चरण में एलेन व्रेड, मरफी और पीटर गोल्ट, बोल्डिंग जैसे भूगोलवेताओं का योगदान प्रमुख है।

         बोल्डिंग महोदय ने आचारपरक क्रांति को एक मॉडल से समझाने का प्रयास किया है। 

आचारपरक क्रांति

   एलेन प्रेड महोदय ने व्यावहारात्मक क्रांति समझाने के लिए निम्नलिखित मैट्रिक्स चर का विकास किया।

आचारपरक क्रांति

(4) चौथा चरण (1971ई० के बाद से)⇒ चौथा चरण में डाउन्स और सोनेन फील्ड जैसे भूगोलवेताओं का विशेष योगदान है। सोनेन फील्ड ने व्यावहारात्मक क्रान्ति को समझाने के लिए एक संकेन्द्रीय मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

              पर्यावरण और व्यावहार को समझने के लिए डाउन्स महोदय ने भी एक मॉडल का प्रयोग किया है।

आचारपरक क्रांति

          उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि भूगोल में व्यवहारात्मक क्रांति का विकास कई चरणों में हुआ है और मनोविज्ञान के तथ्यों के आधार पर उद्योगों के स्थानीयकरण, कृषि स्थानीकरण, जनसँख्या स्थानान्तरण के संबंध में कई सिद्धांत प्रस्तुत किए गए है। 

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

           भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय ने अपनी पुस्तक “Explanation in Geography” में इसका आलोचना करते हुए कहा कि मानव का व्यवहार एक जटिल तंत्र है। इसे इतनी सफलता पूर्वक समझा नहीं जा सकता।

(ii) मानव का आचरण यदि सूचनाओं से नियंत्रित होता है तो यह संभव है कि गलत सूचना देकर मानव के व्यवहार को प्रभावित किया जाय इसके चलते गुलत परिणाम भी आ सकते हैं।

(iii) इसी संदर्भ में स्किनर महोदय ने कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से प्रदूषित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चिन्तन विकसित हो सकता है।

निष्कर्ष

      उपरोक्त सीमाओं के बावजूद व्यावहारात्मक क्रान्ति की शुरुआत भूगोल में एक नयी पहल थी जिसके चलते भूगोल के विषयस्तु और विधितंत्र में स्पष्ट परिवर्तन हुए।



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति उत्तर लिखने का दूसरा तरीका



व्यवहारात्मक क्रांति याआचारपरक क्रांति (Behavioral Revolution)

            द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भूगोल के विधितंत्र में कई क्रांतियों का आगमन हुआ। उनमें से एक व्यवहारात्मक क्रांति था। इस क्रांति का आगमन मात्रात्मक क्रांति के विरुद्ध माना जाता है क्योंकि मात्रात्मक क्रांति के अन्तर्गत मानवीय मूल्यों का अध्ययन संभव नहीं था।

           प्रिस्टन विश्वविद्यालय (USA) में मानविकी विषयों के विद्वानों के सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया था कि अन्तरविषाक अध्ययन पर विशेष जोर दिया जाय। इसी चिन्तन का परिणाम था कि कई भूगोलवेताओं ने दूसरे विषय के तथ्यों को भूगोल में आयात किया। मानव भूगोल में मनोविज्ञान के जो तथ्य आयात किये गये उससे मानवीय भूगोल के चिन्तन में त्वरित परिवर्तन हुआ। उसी त्वरित परिवर्तन को आचारपरक क्रांति / व्यवहारात्मक क्रांति से संबोधित किया गया।

           भूगोल में आचारपरक क्रांति का शुरुआत करने का श्रेय डब्लू. किर्क महोदय को जाता है। इनके कार्यों के बाद USA के गेस्टॉल्ड सम्प्रदाय ने भूगोल में आचारपरक क्रांति को विकास करने में विशेष भूमिका निभायी।

          आचारपरक क्रांति इस तथ्य का अध्ययन करता है कि मानव के द्वारा विकसित सामाजिक आर्थिक भूदृश्य पर मानव के आचारपरक वातावरण का प्रभाव पड़ता है। ओल्सन महोदय ने कहा है कि आचारपरक क्रांति सामाजिक आर्थिक भूगोल की कूंजी है।

आचारपरक क्रांति का विश्लेषण

       आचारपक क्रांति के समर्थक भूगोलवेताओं ने कहा है कि पर्यावरण को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

(1) वास्तविक पर्यावरण – प्रत्यक्ष साधन

(2) आचारपरक पर्यावरण – अप्रत्यक्ष साधन

             वास्तविक पर्यावरण का अध्ययन प्रत्यक्ष साधनों या तकनीक के द्वारा किया जा सकता है। जबकि आचारपरक पर्यावरण का अध्ययन अप्रत्यक्ष साधनों के द्वारा किया का जा सकता है। आचारपरक क्रांति वास्तविक पर्यावरण की तुलना में एक व्यक्ति के आचारपरक पर्यावरण के अध्ययन पर विशेष जोर देता है। भूगोल में आचारपरक क्रांति का विकास निम्नलिखित चार चरणों में हुआ है।

चरण  काल (ई० में) प्रमुख भूगोलवेता
प्रथम चरण 1955-60 जे.के.राइट, डब्लू. किर्क, हैगरस्टैंड, गिल्वर्ट व्हाइट
दूसरा चरण  1960-65 वालपर्ट, कीट्स,डेविड हफ
तीसरा चरण 1965-71 एलेन प्रेड, मर्फी, पीटर गॉल्ड, बोल्डिंग,
चौथा चरण 1971 से आगे डाउन्स, सोनेनफील्ड

आचारपरक भूगोल के मॉडल

                आचारपरक भूगोलवेताओं में अलग-अलग मॉडल से समझने का प्रयास किया है। जैसे-

(1) बोल्डिंग महोदय ने मानव और पर्यावरण के बीच मिलने वाला संबंध को निम्नलिखित मॉडल से प्रस्तुत किया है। जैसे- 

चित्र: बोल्डिंग के अनुसार मानव-वातावरण संबंध का एक पम्परागत मॉडल (1956)

(2) एलेनप्रेड ने व्यवहारात्मक क्रांति को समझाने के लिए मैट्रिक्स मॉडल का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि मानव के व्यवहार पर सूचनाओं का प्रभाव पड़ता है। जैसे- इसे नीचे के मॉडल से समझा जा सकता है।

चित्र : एलेन प्रेड  का आचारपरक मैट्रिक्स (1969)

(3) डाउन्स महोदय ने पर्यावरण बोध और मानव के व्यवहार को निम्नलिखित मॉडल से समझाने का प्रयत्न किया है।

चित्र: पर्यावरण बोध तथा व्यवहार (1970)     

(4) सोनेनफील्ड ने आचारपरक क्रांति को समझने के लिए निम्नलिखित मॉडल को प्रस्तुत किया है-

चित्र: सोनेनफील्ड का सकेंद्रीय मॉडल (1972)

आचारपरक क्रान्ति का भूगोल पर प्रभाव

          भूगोल में आचारपरक क्रांति के आगमन ने भूगोल को कई तरह से प्रभावित किया है।

(i) इस क्रांति से मानव पर्यावरण और भौतिक पर्यावरण को समझने में मदद मिलती हैं।

(ii) प्रादेशिक प्रारूप और मानवीय गतिशीलता को समझने में मदद करती है। जैसे 1980 ई0 तक बिहार के अधिकांश लोग कलकत्ता की ओर स्थानान्तरण करते थे। लेकिन ज्यों ही यहाँ के लोगों को पंजाब और सूरत के संबंध में अधिक सूचनाएँ प्राप्त हुई त्यों ही स्थानान्तरण इन क्षेत्रों की ओर होने लगा।

(iii) स्थानीयकाण से संबंधित मानवीय निर्णय को भी आचारपरक क्रांति प्रभावित करता है। जैसे- फेटर और स्मिथ महोदय ने बताया है कि अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में स्थित नियामी बिच पर आइसक्रीम उद्योग का विकास मानव के व्यवहार के कारण हुआ है न कि भौतिक पर्यावरण के करण।

(iv) हैगरस्टैंड ने नवोत्पाद विसरण का सिद्धांत आचारपरक सिद्धांत से ही समझाते का प्रयास किया है।

आलोचना

(i) डेविड हार्वे महोदय के इसका आलोचना करते हुए कहा है कि मानव का व्यवहार एक जटिलतंत्र है। इसे सफलता पूर्वक नहीं समझा जा सकता है।

(ii) मानव का आचारण प्राप्त सूचनाओं से नियंत्रित होता है। अगर ऐसा मान लिया जाय तो किसी को गलत सूचना देकर उससे गलत कार्य भी करवाया जा सकता है।

(iii) स्किनर महोदय ने इसका आलोचना करते हुए कहा कि व्यवहारात्मक क्रांति के अध्ययन से सामाजिक आर्थिक चिन्तन प्रदूषित हो सकता है। ऐसे आचारपरक क्रांति का अध्ययन सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

        उपरोक तथ्यों से स्पष्ट है कि आचारपरक क्रांति की कई सीमाएँ हैं। इन सीमाओं के बावजूद आचारपरक क्रांति ने भूगोलवेताओं को सोचने/चिन्तन के लिए एक नवीन विचार प्रस्तुत किया है।

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल (World: Cultural Region/Realm)

16. विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

(World: Cultural Region/Realm)



विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल⇒

प्रश्न प्रारूप 

Q.1. विश्व के वृहत सांस्कृतिक परिमंडल

Q.2. संसार के सांस्कृतिक प्रदेश

Q.3. सांस्कृतिक प्रदेश से आप क्या समझतें है? विश्व को सांस्कृतिक प्रदेशों में वर्गीकृत करने वाले आधार को स्पष्ट करें तथा सर्वमान्य वर्गीकरण की योजना प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक के विशेषता लिखें।

(नोट : संस्कृति– रीति-रीवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, रहन-सहन, संगीत कला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, रंगमंच के समुच्च को संस्कृति कहते हैं।)

विश्व के सांस्कृतिक प्रद

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश / परिमण्डल

            मानव भूगोल में संस्कृति का अध्ययन एक अनिवार्य घटक है क्योंकि संस्कृति की उत्पत्ति, विकास और निर्धारण में पर्यावरण की भूमिका महत्वपूर्ण है। अलग-2 पर्यावरण में अलग-2 संस्कृतियों का विकास हुआ है। संस्कृति के आधार पर भौगोलिक प्रदेशों का निर्धारण करना सांस्कृतिक प्रदेश कहलाता है। ब्लाश महोदय ने कहा कि “सांस्कृतिक प्रदेश वह भौगोलिक क्षेत्र है जिसकी सांस्कृतिक दृश्यावली आस-पास के क्षेत्रों से भिन्न होती है।

           संस्कृति मानव की जीवनशैली को कहते हैं। मानव के जीवनशैली में रीति-रिवाज, परम्परा, सभ्यता, धर्म, विश्वास, पोशाक, खान-पान, संगीतकला, वास्तुकला, चित्रकला, साहित्य, नृत्यकला, इत्यादि को शामिल करते हैं। मानव के जीवन शैली में शामिल उपरोक्त तत्वों के समुच्च को संस्कृति कहते हैं। अलग-2 भौतिक पर्यावरण में अलग-2 प्रकार के सांस्कृतिक प्रदेश का विकास हुआ है। इन्हीं विविधताओं को ध्यान में रखकर कई इतिहासकार, मानवशास्त्री एवं भूगोलवेता विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है।

        भूगोल में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक प्रदेश का वर्गीकरण ब्रोक एवं बेल महोदय के द्वारा प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम “A Geography of Mankind” है। इस पुस्तक में ब्रोक ने 8 संस्कृति के तत्वों को आधार मानकर सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण करने का प्रयास किया है। जैसे- (1) धर्म (2) भाषा (3) लोककार्य (4) प्रजातीय संरचना (5) आर्थिक क्रिया (6) खान-पान (7) लोक संगीत और (8) सामाजिक विश्वास एवं मान्यताएँ।

          ब्रोक के अनुसार सभी चरों/घटकों के आधार पर स्वतंत्र रूप से अनेक सांस्कृतिक प्रदेश विकसित किये जा सकते हैं। लेकिन, सभी को मिलाकर के सांस्कृतिक प्रदेश का निर्धारण किया जा सकता है। ब्रोक महोदय ने संश्लिष्ट विधि (सभी को मिलाकर) का प्रयोग करते हुए विश्व को चार प्रमुख और दो लघु सांस्कृतिक प्रदेश में वर्गीकृत किया है:-

विश्व के वृहत / प्रमुख सांस्कृतिक प्रदेश

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

(3) इंडिक सांस्कृतिक प्रदेश

(4) पूर्वी एशियाई या बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश

विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश

(i) मिजो अफ्रिकन एवं जनजातीय सांस्कृतिक पदेश

(ii) दक्षिण-पूर्वी एशियाई संक्रमण सांस्कृतिक प्रदेश

             इन सांस्कृतिक प्रदेश के नामाकरण से स्पष्ट होता है कि सांस्कृतिक प्रदेश के निर्धारण में धर्म की भूमिका सर्वाधिक है। धर्म के आधार पर ही ईसाई प्रधान और इस्लामिक प्रधान संस्कृति का नामाकरण किया गया है। जबकि अन्य सांस्कृतिक प्रदेश का नामकरण स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया गया है।

विश्व के सांस्कृतिक प्रदेशों की विशेषता

(1) ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश

             ईसाई प्रधान संस्कृति का विकास विश्व के वृहत भौगोलिक क्षेत्रों में हुआ है। ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का विकास उत्तरी अमेरिका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और साइबेरियाई क्षेत्रों में हुआ है। इन सभी क्षेत्रों में ईसाई धर्म का बोलवाला है। लेकिन इनमें भी कई आन्तरिक विविधताएँ पायी जाती हैं। इन विविधताओं को आधार मानते हुए पुन: इसे 7 उप सांस्कृतिक प्रदेश में बाँटते हैं।

जैसे:-

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश 

(iii) दक्षिणी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

(vi) अस्ट्रेलिया-न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश 

(vii) अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

(i) पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

         पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग निवास करते हैं जो प्रत्येक धार्मिक मान्यता को वैज्ञानिक तर्क और महत्त्व के दृष्टिकोण से देखते हैं। ये लोग अंधविश्वासी नहीं होते हैं। यूरोप में पुनर्जागरण का श्रेय इन्हीं को जाता है। विश्व में पहली बार औद्योगिक क्रांति का जन्म इसी प्रदेश में हुआ। जीवन शैली पर नगरीकरण एवं वाणिज्यिककरण का व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। इनके प्रभाव के कारण ही सामाजिक एवं धार्मिक मूल्यों क पतन हुआ है। परिवार एवं विवाह जैसी संस्थाएँ कमजोड़ हुई है। व्यक्तिवाद का विकास अधिक हुआ है। मानव के जीवन पर धर्म का प्रभाव कम और आर्थिक कार्यों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। अपने साहस एवं तर्क के आधार पर विश्व के कई क्षेत्रों में स्थानान्तरित होकर बड़े-2 उपनिवेशों की स्थापना किया है। 

(ii) पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

          पूर्वी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश में वर्तमान CIS (Common-wealth of Indipendent state) में शामिल प्रदेशों को रखा जाता है। इस सांस्कृतिक प्रदेश को समय के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं-

(a) अक्टूबर क्रांति के पूर्व का सांस्कृतिक भूदृश्य- उस वक्त यहाँ कैथोलिक धार्मिक मान्यताओं का प्रभाव था। अधिकतर बस्तियाँ चर्च के इर्द-गिर्द बसी थी। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था था। भूमिपतियों के द्वारा कृषकों का शोषण किया जाता था।

(b) अक्टूबर क्रांति के बाद पूर्वी यूरोप की सांस्कृतिक भूदृश्य- अक्टूबर क्रांति के बाद इस क्षेत्र में गत्यात्मक परिवर्तन देखा गया। अक्टूबर क्रांति के पूर्व सोवियत संघ का उदय हुआ जिसके कारण इन क्षेत्र में साम्यवादी दर्शन का विकास हुआ जिसमें धर्म को ‘विष’ से तुलना किया गया। आर्थिक एकीकरण को बढ़ाना दिया गया। 65 वर्षों तक साम्यवाद का दर्शन यहाँ कायम रहा।

(c) ग्लास्नोस्ट पेरिस्तोत्रिक के बाद का पूर्वी यूरोप- इन दोनों संकल्पना के जन्मदाता गोर्बाचेव है जिसका तात्पर्य खुलापन एवं उदारीकरण है। इसके कारण वहाँ से साम्यवादी दर्शन का प्रभाव समाप्त हो गया। चुले एवं उदार अर्थव्यवस्था के आगमन से नवीन सांस्कृतिक भूदृश्य का विकास हो रहा है। यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में यह सांस्कृतिक प्रदेश पश्चमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश का हिस्सा बन जायेगा ।

(iii) दक्षिण यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश

        यहाँ के जीवन शैली पर कैथोलिक धर्म और बेटिकन सिटी का प्रभाव अधिक रहा है। इटली, स्पेन, पुर्तगाल, यूनान इसके प्रतिनिधि राष्ट्र है। यहाँ लैटिन भाषा बोली जाती है। अर्थव्यवस्था में कृषि एवं पशुपालन का योगदान अधिक है। यहाँ कभी अंधविश्वास का इतना अधिक बोलवाला था कि चर्चों से स्वर्ग के टिकट दिये जाते थे। इस प्रदेश के लोगों ने दक्षिण अमेरिका में जाकर अपने उपनिवेश का स्थापना किया। 

(iv) आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश

       आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश की तुलना पश्चिमी यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से की जा सकती है, क्योंकि यहाँ के लोग भी प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग है। यहाँ काकेसाइड प्रजाति के लोग बसे हैं। भाषा एवं संस्कृति के अन्य घटक पश्चिम यूरोप से आंग्ल अमेरिका में आयात किये गये हैं। लेकिन आंग्ल अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश यूरोपीय सांस्कृतिक प्रदेश से इस माइने में भिन्न है कि पश्चिम यूरोप में उद्योग एवं खनन जैसे आर्थिक गतिविधियों का वर्चस्व है जबकि आंग्ल अमेरिका में उद्योग, खनन एवं कृषि कार्यों का महत्त्व अधिक है।

(v) लैटिन अमेरिकी सांस्कृतिक प्रदेश 

            ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश में यह विकासशील सांस्कृतिक प्रदेश का उदाहरण है। यहाँ नीग्रोइड प्रजाति के लोग निवास करते हैं। गरीबी एवं पिछड़ेपन की समस्या अधिक है। यहाँ कैथोलिक धर्म और लैटिन का आयात दक्षिण यूरोप से किया गया है। पुर्तगाल, स्पेन के लोग सोना ही खोज में अपने क्रोस (#) लेकर पहुँच गये। समाज में आज भी जनाजातिय संस्कृति का बोलबाला है।

(vi) आस्ट्रेलियाई – न्यूजीलैण्ड सांस्कृतिक प्रदेश

         इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास अब यूरोपीय लोगों के द्वारा किया गया है जो औपनिवेशिक देशों के आजाद होने के बाद बेघर हो गये थे। यहाँ प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग रहते हैं। यहाँ की भाषा अंग्रेजी और प्रजाति काकेसाइड है। आर्थिक दृष्टिकोण से पश्चिम यूरोप और आंग्ल अमेरिका के सदृश्य है। ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि एवं उद्योग पर आधारित है। जबकि न्यूजीलैण्ड की अर्थव्यवस्था वाणिज्यिक पशुपालन पर आधारित है। 

(vii) अफ्रीकी सांस्कृतिक प्रदेश

           अफ्रीका महाद्वीप में ईसाई संस्कृति यो क्षेत्रों में देखी जाती है- (a) दक्षिण अफ्रीका के केप प्रान्त और (b) पूर्वी अफ्रीका के उच्च भूमि पर। इन दोनों क्षेत्रों में पश्चिमी यूरोप के काकेसाइड प्रजाति के प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग आकर बसे हैं। केपप्रान्त के लोगों ने कृषि उद्योग और व्यापार का विकास किया है जबकि पूर्वी अफ्रीका में बगानी कृषि एवं खनन कार्यों के आधार पर निर्माण किया है सांस्कृतिक भूदृश्य का निर्माण किया है।

        अतः उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि ईसाई संस्कृति का व्यापक क्षेत्र में विकास हुआ है। कई लघु सांस्कृतिक प्रदेश मिलकर एक एकीकृत ईसाई सांस्कृतिक प्रदेश का निर्माण करते हैं।

(2) इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश

         इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मरुस्थलीय एवं अर्द्ध मरुस्थलीय क्षेत्रों में हुआ है। इसका विस्तार दक्षिण में सहारा मरुस्थल, उत्तर में मध्य एशिया, पूर्व में ब्लूचिस्तान से लेकर पश्चिम में तुर्की तक हुआ है। इसी प्रदेश में मक्का एवं मदीना अवस्थित है जहाँ इस्लाम धर्म का उदय हुआ। इस संस्कृति पर पर्यावरण का प्रभाव अध्याधिक पड़ा है। पर्यावरण के ही कारण यहाँ भूगोल, गणित, खगोल विज्ञान, मानचित्रकला इत्यादि का विकास हुआ है। जल की कमी के कारण जल का मितव्ययी उपयोग, खाद्य पदार्थो की कमी के कारण खान-पान में माँस का प्रयोग एवं लम्बे समय तक उपवास रखने की परंपरा प्रारंभ हुई है। मक्का की ओर मुँह करके नवाज पढ़ते हैं। धूल से बचने हेतु बुर्का और साफा का प्रयोग करते हैं। परम्परागत रूप से यह घुमक्कड़ जनजातियों का क्षेत्र है। वनस्पति का अभाव होता है। बाहर का जीवन अल्याधिक कठोर एवं प्रतिस्पर्द्धा से युक्त होते है। इसलिए महिलाओं को चार दीवारी में रखा जाता है। यह सांस्कृतिक प्रदेश के धर्म शिया और सुन्नी में विभक्त हैं। सुन्नी परम्परावादी होते हैं जबकि शिया आधुनिक एवं तर्क में विश्वास करते हैं। इनके जीवन शैली पर कुरान का प्रभाव अधिक देखा जाता है। हाल के वर्षो में इन क्षेत्रों में पेट्रोलियम खनिज मिलने के कारण श्रमिक, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। पेट्रो-डॉलर जैजी संकल्पना का विकास हुआ है। OPEC जैसे संगठन तेल के मूल्यों पर नियंत्रण स्थापित कर विश्व के सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहे हैं।

(3) इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश

        इण्डिक सांस्कृतिक प्रदेश का विकास मुख्यत दक्षिण एशिया में हुआ है। यहाँ हिन्दू धर्मावलम्बी है के अलावे अनेक धर्म के लोग निवास करते हैं। विश्व में सर्वाधिकक हिन्दू, मुसलमान, सिख और जैन समुदाय के लोग यहाँ रहते हैं। यह अभूतपूर्व सहिष्णुता का प्रदेश है। यहाँ धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है, इसलिए इस प्रदेश को धान प्रधान संस्कृति (Paddy Cultures) कहते हैं। यहाँ की सम्पूर्ण जीवनशैली मानासून के इर्द-गिर्द घूमती है। इसलिए इसे मानसूनी सांस्कृतिक प्रदेश भी कहते हैं। यहाँ ग्रामीण जीवनशैली, बैलगाड़ी, परम्परागत हल, धान की कृषि, मानसूनी जलवायु इत्यादि मिलकर इंण्डिक संस्कृति को जन्म देते हैं। इस प्रदेश में कई क्षेत्रीय भाषाएँ जैसे, बंगाली, तमिल, तेलगू, कन्नड इत्यादि बोली जाती है। यहाँ कई प्रकार के लिखित प्रजातियों का विकास हुआ है। इसलिए इस प्रदेश को “मेल्टिंग पॉट ऑफ रेस” (Melting Pot of Race) का क्षेत्र भी कहते हैं। यहाँ के लोग धोती, कुर्ता, गमछा, साड़ी, लहंगा आदि जैसे वस्त्र धारण करते हैं। लोक संस्कृति में प्राकृतिक तत्व की प्रचुरता अधिक मिलती हैं।

        इस तरह इ‌ण्डिक संस्कृति पूरे विश्व में अलग पहचान रखती है।

(4) बौद्ध या पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश⇒

      इस सांस्कृतिक प्रदेश का विकास जापान, चीन, ताइवान, मंगोलिया वियतनाम जैसे देशों में हुआ है। इस प्रदेश को पुनः दो भागों में बाँटते हैं:- (i) चीनी सांस्कृतिक प्रदेश (ii) जापानी सांस्कृतिक प्रदेश

          चीनी सांस्कृतिक प्रदेश में साम्यवाद प्रभाव से धार्मिक प्रभाव कम हुआ है, लेकिन सर्वत्र सांस्कृतिक एकरूपता में वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में खुलेपन एवं उदारीकरण के कारण चीन में भी श्रम, तकनीक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का आगमन हुआ है। इससे जबड़दस्त औद्योगिकीकरण, नगरीकरण इत्यादि को बढ़ावा मिला है। 

      बौद्ध संस्कृति में जापान का सांस्कृतिक प्रदेश औद्योगिकीकरण, नगरीकरण, वाणिज्यिकरण और प्रजातांत्रिक मूल्यों पर आधारित है। जापान एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास प्राकृतिक संसाधन नगण्य है फिर भी विश्व का विकसित राष्ट्र है। यहाँ की लोक संस्कृति मे राष्ट्रीयता का प्रभाव अधिक देखा जाता है।

अप्रत्यक्ष रूप से चीनी और जापानी सांस्कृतिक प्रदेश पर मानसूनी संस्कृति या इण्डिक इस्लामिक सांस्कृतिक प्रदेश का प्रभाव देखा जा सकता है क्योंकि यहाँ भारत से ही बौद्ध धर्म आयात होकर आया है और द्वितीय इण्डिक संस्कृति के सामन ही मानसूनी जलवायु का प्रभाव है।

        विश्व के लघु सांस्कृतिक प्रदेश 

(i) दक्षिणी-पूर्वी एशियाई सांस्कृतिक प्रदेश

      इस संस्कृति का विकास इण्डोनेशिया, वियतनाम, थाइलैण्ड, म्यांमार, लाओसा, कंबोडिया जैसे देशों में हुआ है। यह प्रदेश प्रजातीय दृष्टिषेण से बौद्ध सांस्कृतिक प्रदेश नहीं हैं जबकि संस्कृति है दृष्टिकोण से इण्डिक संस्कृति से नजदीक है।

(ii) मिजो अफ्रीकन सांस्कृतिक प्रदेश

        इस संस्कृति का विकास मध्य अफ्रीका एवं विश्व के अनेक जनजातीय प्रदेशों में हुआ है। यहाँ के लोग प्रकृतिवादी, टोटेमवादी, अंधविश्वासी ज्यादा होते हैं। प्राथमिक-आर्थिक क्रिया कलाप में दक्ष होते हैं। प्राय: घुमक्कड जीवन शैली को जीते हैं। गरीबी, बेरोजगारी जैसे समस्याओं का बोलावाला है। 

निष्कर्ष: इस तरह उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विश्व के सांस्कृतिक प्रदेश विशिष्ट भौगोलिक पर्यावरण के कारण ही अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं।


error: