Archives June 2023

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?

23. एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina) क्या है?


एलनिनो (El Nino) एवं ला निना (La Nina)

एलनिनो

          एल निनो एक स्पेनिश शब्द है जिसका अर्थ है नवजात ईसा मसीह (Child Christ)। यह नाम इसको इसलिए दिया गया है, क्योंकि इस घटना का आगमन क्रिसमस के समय होता है।

       यह एक जलवायु सम्बन्धी (Weather phenomena) प्रक्रिया है, जिसके फलस्वरूप हवा उल्टी दिशा में बहने लगती है। ऐसा प्रत्येक दो से सात वर्ष बाद होता है। इसके अन्तर्गत दक्षिण अमेरीका से एशिया की ओर प्रशान्त महासागर के ऊपर से बहने वाली हवाएं उलटकर एशिया से दक्षिण अमेरीका की ओर बहने लगती हैं।

         इस प्रकार एशिया में वर्षा पहुंचाने के बजाय ये हवाएं इस वर्षा को दक्षिण अमेरीका की ओर ले जाती हैं जिससे दक्षिण अमेरीका और उसके आस-पास के प्रशान्त महासागर में घनघोर वर्षा होने लगती है और वहां बाढ़ आ जाती है और दूसरी ओर एशिया के विभिन्न देश जैसे भारत, इण्डोनेशिया और यहां तक कि ऑस्ट्रेलिया में भी वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ जाता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि एल निनो के कारण दक्षिण एशिया का मानसून बुरी तरह प्रभावित होता है।

        एल निनो का कारण है, दक्षिण अमेरीका के पूर्वी प्रशान्त महासागर से लगे किनारों पर पानी का ठण्डे होने के स्थान पर गर्म हो जाना, जो मुख्यतः पेरू के किनारे समुद्र में होता है। यह गर्म जल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर प्रशान्त महासागर में फैल जाता है।

        इस प्रकार जल के गर्म हो जाने के कारण दक्षिण प्रशान्त महासागर के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बन जाता है। (जहां पर अन्यथा जल के ठण्डे होने के कारण अधिक दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) तथा इस कम दबाव के क्षेत्र को सन्तुलित करने के लिए इण्डोनेशिया के पास एक अधिक दबाव का क्षेत्र (जहां पर अन्यथा एक कम दबाव का क्षेत्र होना चाहिए था।) बन जाता है। इस प्रकार दबाव क्षेत्रों की अदला-बदली के कारण प्रशान्त महासागर के ऊपर बहने वाली हवाओं की दिशा उलट जाती है।

      मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार एल निनो की घटना इस दशक में पहले की तुलना में अधिक हो रही है और साथ ही इसकी तीव्रता भी पहले से अधिक है। इसका कारण वे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) को मानते हैं। विश्व भर में बढ़ते प्रदूषण, ग्रीन हाउस प्रभाव और ओजोन परत की क्षति के कारण पृथ्वी की जलवायु में भारी परिवर्तन हो रहे हैं।

     एल निनो का एक चक्र समाप्त होने पर इसमें होने वाली घटनाओं के ठीक विपरीत एक और घटना होती है जिसे ‘ला निना’ (La Nina) कहा जाता है। ‘ला निना’ के समय प्रशान्त महासागर का जल पुनः ठण्डा हो जाता है। इस प्रकार ‘ला निना’, एल निनो के जलवायु पर होने वाले प्रभावों को विपरीत दिशा में मोड़ देता है और वातावरण में पुनः स्थिरता को स्थापित करता है।


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19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान (Contribution by Arab scholars)

19. अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

(Contribution by Arab scholars)


अरब भूगोलवेत्ताओं का योगदान

           700 A. D. से 1100 A. D. तक का समय अरबी भूगोलवेत्ताओं का समय माना जाता है। इस समय जबकि यूरोपीय ईसाई राष्ट्र भूगोल को अवनति की ओर धकेल रहे थे, अरबी भूगोलवेत्ता न केवल भूगोल के चिरसम्मत शास्त्रीय कालीन ज्ञान की रक्षा कर रहे थे वरन् उसकी उत्तरोत्तर वृद्धि के लिए भी प्रयत्न कर रहे थे।

        पूर्ववर्ती अन्धकार युग में भूगोल के पथ भ्रष्ट हो जाने का सर्वप्रमुख कारण था, भूगोल पर धर्म का आरोपण। अरब भूगोलवेत्ता भी यद्यपि भूगोल को धर्म के पंजे से पूर्णतः मुक्त तो नहीं कर सके तथापि उन्होंने उसके प्रभाव को कम अवश्य किया। उन्होंने तर्क शक्ति के आधार पर धर्म को भूगोल में स्थान दिया। धर्म के प्रभाव के कारण उनके कार्य पूर्णतः तो वैज्ञानिक नहीं थे, परन्तु काफी हद तक वैज्ञानिक थे।

       अरबी भूगोलवेत्ताओं द्वारा भूगोल में यह महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए उनको प्रेरित करने वाले कारकों में अरब साम्राज्य की स्थिति व विस्तार, उसकी यूनानी सभ्यता के देशों पर विजय, यातायात मार्गों का विकास, भारत से सम्पर्क, व्यापार में उन्नति व मरुस्थलीय वातावरण प्रमुख थे। अरब भूगोलवेत्ताओं ने जो योगदान भूगोल के क्षेत्र में किए वे संक्षेप में इस प्रकार हैं :

(1) प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा:-

            अरब भूगोलवेत्ताओं का कार्य अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। परिणामतः इनको अनेक भ्रामक धारणाओं से भूगोल को मुक्ति दिलानी पड़ी। साथ ही इन्होंने प्राचीन शास्त्रीय कालीन ज्ञान को भी जीवित रखा। अरस्तु, टॉलमी, स्ट्रैबो, आदि भूगोलवेत्ताओं का सतत परिश्रम से अध्ययन किया व उनके ग्रन्थों का अरबी भाषा में अनुवाद किया। अन्वेषण कार्य किए तथा मौलिक ग्रन्थों की रचना की। 776 A. D. में अरब में अब्बासी वंश का साम्राज्य था। उस समय खलीफा का प्रशासनिक कार्यालय दमिश्क (सीरिया) में था जिसे बदलकर बगदाद में ले जाया गया। यहां पर यूनानी व अरब सभ्यताओं का मेल हुआ जिससे भौगोलिक ज्ञान के प्रसार में सहायता मिली। 

अरब भूगोलवेत्ताओं का योग

टॉलमी

(2) गणित में विशेष प्रगति:-

        अरब भूगोलवेताओं ने पृथ्वी के आकार को निश्चित करने के अनेक प्रयास किए थे। मानचित्र बनाने के लिए कुछ प्रक्षेपों की गणनाएं की गई थी।

         बगदाद में गणितीय भूगोल का काफी विकास किया गया था। भू-सर्वेक्षण के लिए पृथ्वी की आकृति (Shape) और आकार (Size) निश्चित करने के लिए मानचित्रों के निर्माण और परिवहन आदि के लिए गणितीय भूगोल का प्रयोग किया जाता था। शीराज (ईरान), काहिरा (मिस्र), टॉलेडो (स्पेन) में खगोलिकी तथा गणित के उच्च अध्ययन किए गए थे।

        अल-खालिजामी, अल हबीब, इब्ने यूनुस, अब्दुल रहमान, अल अजीज, आदि भूगोलवेत्ताओं ने गणितीय भूगोल में विशेष योगदान किया। अल इदरीसी ने पृथ्वी की परिधि 22,900 मील मानी थी। उसने पृथ्वी की जलवायु प्रदर्शित करने के लिए 60 मानचित्र बनाए थे।

(3) खगोलिकी में प्रगति:-

           इस काल में खगोलिकी के क्षेत्र में भी विशेष प्रगति हुई । फलक यन्त्र की सहायता से नक्षत्रों की गति, चन्द्रग्रहण व सूर्यग्रहण की दशाओं, पृथ्वी की विषुवतरेखीय स्थितियों तथा सूर्य व चन्द्र की राशियों के सन्दर्भ में खोज कार्य किए गए। खगोलिकी में प्रगति के लिए तीन तथ्य विशेष रूप से उत्तरदायी हैं-

(i) अरब का मरुस्थलीय एवं अर्धमरुस्थलीय वातावरण जहां रात्रि में आकाश स्वच्छ रहता है, जिससे खगोलिकीय वेधों (Astronomical observations) में सहायता मिलती है।

(ii) पूर्ववर्ती कालों में खगोलिकीय यन्त्रों का आविष्कार हो चुका था। यूनान व रोम से भी इस सम्बन्ध में काफी ज्ञान प्राप्त हुआ था।

(iii) अरबी भूगोलवेत्ताओं के भारत से अच्छे सम्बन्ध थे, भारत में इस क्षेत्र में पर्याप्त विकास हो चुका था।

        इस क्षेत्र में अल-ममून, अल फर्घानी, अल वतानी व अल खालिजामी आदि भूगोलवेत्ताओं ने विशेष योगदान किया।

(4) अक्षांश व देशान्तर रेखाओं की शुद्ध गणना:-

           टॉलमी के समय की अपेक्षा इस युग में पृथ्वी के अक्षांशों व देशान्तरों की दूरियों को अरब विद्वानों ने अधिक शुद्धता के साथ निश्चित कर दिया था। पूर्ववर्ती अन्धकार युग की प्रवृत्ति के विपरीत मुसलमानों के तीर्थ स्थान मक्का की स्थिति के सन्दर्भ में पृथ्वी के निर्देशकों को शुद्धता के साथ निश्चित करने की प्रेरणा इन विद्वानों को अपने धर्म से मिली, ताकि दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करने वाले मुसलमानों की दोपहर की नमाज एक साथ हो सके। मक्के में जब दोपहर के बारह बजते थे तभी सब मुसलमान अपने स्थानीय नमाज पढ़ते थे। इसके अतिरिक्त देश में एक मस्जिद बनाई जाती थी, उनका निर्माण इस प्रकार किया जाता था कि का मूँह मक्का की ओर रहे। इस प्रकार धार्मिक रीति रिवाजों से भी देशान्तरों व दिशाओं का शुद्ध ज्ञान करने में सहायता मिली।

(5) भौगोलिक ग्रन्थों का विकास:-

          मध्य युग में वर्णनात्मक भूगोल का भी प्रचलन हो गया था। भ्रमण कार्य लोगों के लिए रुचिकर हो गया था। यह धार्मिक, व्यापारिक या ज्ञानार्जन के दृष्टिकोण से होता था। यात्रियों ने उस समय पूर्व दिशा में देखे हुए व बिना देखे स्थानों के वर्णन विभिन्न नगरों, मार्गों, बीच की दूरियों, उत्पादन, व्यापार, समाज व्यवस्था आदि के परिप्रेक्ष्य में किए।

          वर्णनात्मक भूगोल पर खलीफाओं के संरक्षण में जो ग्रन्थ लिखे गए उनमें अरब साम्राज्य, भारत, मध्य एशिया व अरब के प्रादेशिक वर्णन बहुत श्रेष्ठ थे। सर्वाधिक संख्या में ग्रन्थ अल इदरीसी ने लिखे, जो वैज्ञानिक ढंग से की गई सविस्तार प्रादेशिक व्याख्या के लिए प्रशंसनीय हैं।

(6) भौगोलिक शिक्षा के केन्द्र:-

       अरब साम्राज्य में भौगोलिक ज्ञान को विकसित करने के लिए सात केन्द्र थे- येरूसलम, काहिरा, टॉलेडो, कुस्तुनतुनिया, दमिश्क, शीराज। हारू-अल रशीद ने बगदाद में एक संस्था की स्थापना की जिसमें भाषा विशेषज्ञों द्वारा यूनानी, रोमन व भारतीय ग्रन्थों के अनुवाद होते थे।

(7) मानचित्र कला:-

          पूर्ववर्ती अन्धकार युग में ईसाई धर्म के प्रभाव से मानचित्रों का वास्तविक परिचय ही समाप्त हो गया था। अरबी भूगोलवेत्ताओं ने उन्हें पुनर्स्थापित किया। उन्होंने टॉलमी व स्ट्रैबो,आदि भूगोलवेत्ताओं के मानचित्रों को संशोधित रूप में प्रस्तुत किया। ये मानचित्र पूर्ववर्ती मानचित्रों से अधिक शुद्ध, परन्तु वास्तविकता से दूर थे, परन्तु ये सजावटी मानचित्र उच्चकोटि के थे।

          इस काल में विभिन्न मानचित्र प्रक्षेपों का निर्माण किया गया। स्कूलों में भूगोल पढ़ाने के लिए मानचित्रावलियों का निर्माण किया गया। इदरीसी इस काल का प्रमुख मानचित्रकार था। उसने अपने मानचित्रों को सजावट तो उच्चकोटि की प्रदान की थी, परन्तु उसमें तथ्यों का अभाव था।

(8) अनुवाद कार्य:-

         इस विधा पर सर्वप्रथम अरबी भूगोलवेत्ताओं ने ही कार्य किया। इस कार्य से ही उन्होंने प्राचीन भौगोलिक ज्ञान की रक्षा की। अनुवाद कार्य का प्रमुख केन्द्र बगदाद था। सर्वप्रथम अल-बातरीक (Al-Batriq) ने ट्रॉलमी के अल्मागेस्ट का अनुवाद अरबी भाषा में किया। उसने ही गैलेव हिप्पोक्रेट्स के ग्रन्थों का भी अनुवाद किया। अरस्तु व स्ट्रैबो के ग्रंथों का अनुवाद किया गया।

(9) भौगोलिक शब्द-कोश:-

            भौगोलिक शब्द-कोश का निर्माण करके अरब भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक ज्ञान के समृद्ध होने का परिचय था। महत्वपूर्ण शब्दकोश का निर्माण इब्नयाकूत ने किया। इब्न फिदा ने सामान्य ज्ञान कोश का निर्माण किया। अलबरूनी, इब्ने-सिना, जकाउट (Jakout) व अल-बाकरी ने भी इस क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया।

निष्कर्ष: 

      इस प्रकार स्पष्ट है कि अरब भूगोलवेत्ताओं ने भूगोल के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यद्यपि उनके कार्य वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक शुद्ध नहीं थे, तथापि उनमें सत्यता का पुट था। उनके कार्य इसलिए और भी अधिक महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनका काल अन्धकार युग के तुरन्त बाद प्रारम्भ होता है। भूगोल पर अन्धकार का पर्दा उठाकर उसको सही दिशा प्रदान करना ही इन भूगोलवेत्ताओं का सबसे बड़ा कार्य है।

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास (Development of Geographical ideas in Ancient India)

18. प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास


प्राचीन भारत में भौगोलिक विचारों का विकास

             प्राचीन भारत की कई हजार वर्ष ईसा पूर्व की संस्कृति व नगरीय निर्माण कला के अवशेष देखकर आज विकसित पाश्चात्य देशों के महान विद्वान भी असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं। पुरातनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान का विवरण विभिन्न स्थलों की खुदाई से प्राप्त सामग्री तथा तत्कालीन विभिन्न ग्रन्थों से प्राप्त होता है।

         प्राचीनकालीन भारतीय भौगोलिक ज्ञान को संक्षेप में निम्नांकित शीर्षकों के अन्तर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है:-

(1) सौरमण्डलीय ज्ञान:-

          प्राचीन काल में ही ब्रह्माण्ड विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने पर्याप्त उन्नति कर ली थी। सूर्य, चन्द्र व पृथ्वी के सम्बन्धों, ऋतु परिवर्तनों, दिवस-रात्रि, उषः, मध्याह्न अपरान्ह, आदि के प्रसंग ऋग्वेद, यजुर्वेद व अथर्ववेद में, बहुत से मन्त्रों में आते है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष के वर्णन तथा मृगशिरा, कृत्तिका, चित्रा, रेवती आदि सत्ताईस नक्षत्रों के वेदों व ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में पढ़े जा सकते हैं। विषुव दिवस (Equatorial Day) का उल्लेख वेदों में अनेक स्थानों पर है। सौर वर्ष (Solar Year), सौर मास (Solar Month), आदि की गणनाओ, सत्ताइस नक्षत्रों की चालों और सूर्य नक्षत्रों की गणनाओं के आधार पर वैदिक ज्योतिष का प्रतिपादन किया गया।

        ईसा की पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक भारतीय विद्वानों ने खगोलीय भूगोल (Astronomical Geography) में बहुत उन्नति की। इसी काल में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, आदि विख्यात गणितज्ञ थे। इनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों में ‘सूर्य सिद्धान्त’ प्रमुख है।

प्राचीन भारत में भौगोलिक

आर्यभट्ट

            प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में पृथ्वी की उत्पत्ति पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋग्वेद के मन्त्रों से अनुमान लगाया गया है कि आर्यों ने पृथ्वी के पिघले रूप की कल्पना की थी, जिसे आज सभी स्वीकार करते हैं। रामायण-महाभारत में भूचाल तथा ज्वालामुखी के प्रसंग हैं। “जब शक्तिशाली गज थक कर सिर हिलाता है, तब भूचाल आता है।’ यही कारण बताया गया है भूचाल का। महाभारत में ज्वालामुखी पर्वत के उभार की चर्चा है- “पृथ्वी अपने सातों महाद्वीपों के साथ उठ गई, जिसके साथ पर्वत, नदियां, वन, आदि भी ऊंचे उठ गए।’

        पुराणों में महाद्वीपों व पर्वतों की उत्पत्ति विषयक कल्पनाएं की हैं- ‘पृथ्वी महासागर में एक बृहत् नौका के रूप में तैरती है। ब्रह्मा ने पृथ्वी का समतलन किया व उसे सात द्वीपों में विभक्त किया।’ इससे पृथ्वी के तैरने की वर्तमान संकल्पना (सियाल के बने महाद्वीप सीमा पर तैरते हैं) के समकक्ष विचारधारा का अनुमान होता है। पृथ्वी की आयु की कल्पना भी प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में की गई है। ‘मनुस्मृति’ उल्लेख है कि पृथ्वी अब तक 1,96,91,03,000 वर्ष पूर्ण कर चुकी है। समकालीन विद्वान भी पृथ्वी की आयु करीब दो अरब मानते हैं। रामायण में सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण की भी चर्चा है। इसके कारण राहु-केतु बताए गए हैं। सौरमण्डल के अन्य ग्रहों- मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, आदि की चर्चा भी कई स्थलों पर है।

(2) वायुमण्डलीय ज्ञान:-

          ऋग्वेद के अध्ययन से पता चलता है कि उस समय के आर्यों को वायुमण्डल के सम्बन्ध में अच्छा ज्ञान था। उन्होंने वर्ष को छः ऋतुओं में विभक्त किया था। मन्त्रों में 49 से 63 प्रकार की पवनों की चर्चा है। वाल्मीकि रामायण में बादलों का वर्णन है। इसमें तीन प्रकार के बादल व सात प्रकार की पवन की चर्चा है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में,  विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का वितरण समझाया गया है जो आज के वितरण के अनुकूल है। कृषि तथा वर्षा का सम्बन्ध स्थापित करते हुए कौटिल्य ने लिखा है- कुछ ऐसे बादल होते हैं जो क्रमशः सात दिन तक वर्षा करते हैं, 80 ऐसे हैं जिनमें कम वर्षा होती है, 60 ऐसे होते हैं जो खेतों को जोतने योग्य बनाते हैं। कौटिल्य ने वर्षा मापक यन्त्र भी तैयार किया था।

(3) जलमण्डलीय ज्ञान:-

            वैदिक मन्त्रों में महासागरों का वर्णन है। सामवेद तथा अथर्ववेद में महासागरों की संख्या 4 बताई गई है, परन्तु अन्य वेदों में इनकी संख्या 7 बताई गई है। सामवेद में महासागरों में जल के उठने का वर्णन मिलता है, जिससे ज्वार-भाटा की कल्पना की जा सकती है। रामायण में कई स्थानों पर ज्वार-भाटा का उल्लेख है, इसका कारण चन्द्रमा बताया गया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में मूंगा, मोती की चर्चा है। महासागरों में किन स्थानों पर ये मिलते हैं, इसका भी विस्तृत वर्णन ग्रन्थ में पढ़ा जा सकता है।

(4) स्थलमण्डलीय ज्ञान (सामान्य भौगोलिक वर्णन):-

       प्राचीन काल के स्थलमण्डलीय ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

(i) भौतिक भूगोल- भौतिक भूगोल विषयक ज्ञान में पर्वतों, नदियों व वनस्पति का वर्णन मिलता हैं:-

(क) पर्वत- पुराणों के अनुसार संसार की समस्त पर्वत श्रृंखलाएं पामीर (मेरु) के चारों ओर जाती हैं। पर्वतों को पांच प्रकारों में विभक्त किया गया है- मध्य पर्वत (मेरु), विषकम्भ पर्वत (जो मेरु के चतुर्दिक विस्तृत हैं), वर्ष पर्वत (विभिन्न देशों की कुल पर्वत (मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं) तथा मर्यादा पर्वत (सीमा पर स्थित पर्वत)।

         भारत के पर्वतों का पुराणों में विस्तृत वर्णन है। इनमें महेन्द्र (पूर्वी घाट), मलय (पश्चिमी घाट का दक्षिणी भाग), सह्य (पश्चिमी घाट का उत्तरी भाग), रिक्ष (मध्य विंध्य), आदि प्रमुख है।

(ख) नदियां- वेदों में नदियों के विस्तृत वर्णन हैं। वेदों व उपनिषदों में अफगानिस्तान, पंजाब व गंगा-यमुना क्षेत्र की नदियों का वर्णन है। पुराणों के अनुसार मेरु (पामीर) के दिशाओं में नदियां प्रवाहित होती हैं। दक्षिण की ओर गंगा, पश्चिम की ओर चक्षु, पूर्व की और सीता व उत्तर की ओर भद्रसोन नदी बहती है। मार्कण्डेय पुराण में भारतीय नदियों का विस्तृत वर्णन है। गंगा की उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन है। अन्य नदियों में यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, कृष्णा व ताम्रपर्णी का विशेष वर्णन है।

(ग) वनस्पति- मार्कण्डेय पुराण में विभिन्न प्रकार की वनस्पति का वर्णन मिलता है। तत्कालीन फसलों का भी वर्णन है। शिव पुराण में दुग्ध वृक्ष (रबर) का प्रसंग है।

(ii) मानव भूगोल विषयक ज्ञान-

          ऋग्वेद में पृथ्वी पर पांच प्रकार के लोगों के निवास का वर्णन है। इनमें असुर तथा दास भी सम्मिलित हैं। वाजसनेयि संहिता में चार वर्णों का उल्लेख है: ब्राह्मण्ड, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र। रामायण में अनेक भारतीय आदिम जातियों के वर्णन है। इनमें राक्षस, वानर, निषाद, किन्नर, सावर, गन्धर्व, नाग, असुर, देव, आदि जातियां मुख्य हैं। विदेशी जातियों में शक एवं यवनों को गौर वर्ण की जातियां कहा गया है। राक्षसों का रंग काला व रूप भयानक बताया गया है।

         महाभारत में भी अनेक जातियां, उनके रूप-रंग, विवाह पारिवारिक सम्बन्धों आदि के वर्णन है। मनु के धर्म शास्त्र में आठ प्रकार के विवाह बताए गए हैं: ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्रजापत्य, असुर, गन्दर्व, पैशाच व राक्षस। इनमें से छः को सामाजिक समर्थन प्राप्त था। कौटिल्य ने भी विवाह पद्धति व स्त्री-पुनर्विवाह की चर्चा की है।

(iii) सांस्कृतिक भूगोल विषयक ज्ञान-

          प्राचीन समय से ही कृषि भारतीयों का मुख्य व्यवसाय रहा है। अथर्ववेद में वर्णन है कि कृषि में किन सावधानियों की आवश्यकता होती है। ऋग्वेद में खेत जोतने का आदेश दिया गया है। पातञ्जलि के महाभाष्य में फसलें बोने की विधियों, कृषि क्षेत्रों, बीजों व अनाज भण्डारण का वर्णन है। पाणिनि प्रातञ्जलि व मनु ने भूमि का वर्गीकरण भी किया है। बाढ़ से प्रभावित भूमि द्वारा अनुपयोगी भूमि ऊसर, पशुचारण के लिए प्रयुक्त भूमि गोचर व जोतने योग्य भूमि (शील्य) कही गई। पातञ्जलि ने फसलों के प्रादेशिक वितरण का भी वर्णन किया है। सिंचाई के साधनों पर भी प्रकाश डाला गया है। कुएं व तालाब सिंचाई के प्रमुख साधन थे।

           प्राचीन भारत में विभिन्न उद्योग धन्धे भी पर्याप्त विकसित अवस्था में थे। वर्तन, वस्त्र निर्माण, सिक्के, आभूषण आदि सम्बन्धी उद्योगों का वर्णन वेदों में है। भवन निर्माण, काष्ट शिल्प, मृतिका शिल्प, लौह शिल्प भी इस समय अपनी उन्नति की चरम सीमा पर थे। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप स्थापित जंगरहित लौह स्तम्भ, जो कि गुप्त काल में निर्मित बताया जाता है, भारतीय लौह-शिल्पियों की दक्षता का प्रमाण हैं।

         परिवहन मार्ग भी प्राचीन भारत में अच्छी अवस्था में थे। ब्रह्माण्ड पुराण में दस प्रकार की सड़कों का वर्णन है: दिशा मार्ग, ग्राम मार्ग, सीमा मार्ग, राज, पथ, शाखा रथ्या, रथोपरथ्या, उपरथ्या, जंघापथ, गृहान्तपथ तथा धृति मार्ग।

          विदेशी व्यापार भी प्राचीन काल से भारतीय विशेषता है। विष्णु पुराण में कम्बोज के घोड़ों तथा मत्स्य पुराण में नेपाल के कम्बलों का उल्लेख है।

        अधिवास सम्बन्धी ज्ञान भी प्राचीन भारतीय साहित्य से प्राप्त होता है। मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की खुदाई से प्राचीन भारतीय नगर नियोजन व भवन निर्माण कला का परिचय मिलता है। मानवीय बस्तियों का वर्गीकरण ‘मायामतम’ में किया गया है।

(iv) राजनीतिक व प्रादेशिक भूगोल विषयक ज्ञान-

           वैदिक साहित्य में भारतीय जनपद प्रदेशों के वर्णन हैं। इनमें काशी, कोशल, मगध, पांचाल, विदर्भ, सौराष्ट्र व आन्ध्र प्रमुख थे।

निष्कर्ष:          

         उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि प्राचीन काल में भारतीय भौगोलिक ज्ञान उच्चकोटि का था परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि भौगोलिक विचारधाराओं के विकास के इतिहास में उसे स्थान नहीं दिया गया है।

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

17. 19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास


19वीं शताब्दी के दौरान भूगोल का विकास

           वर्तमान समय में भूगोल का जो वैज्ञानिक स्वरूप उभर कर सामने आया है, वह वस्तुतः उन्नीसवीं शताब्दी की ही देन है। यह वह युग था, जिनमें हम्बोल्ट (Humboldt), रिटर (Ritter) व रेटजेल (Ratzel) जैसे महान भूगोलवेत्ताओं ने भौगोलिक तथ्यों को भलीभांति संगठित करके प्रस्तुत किया था। उन्होंने भूगोल को परिभाषित किया व उसकी विषय वस्तु को निर्धारित किया। यद्यपि इसके युग से पूर्व के भूगोलवेत्ताओं के अध्ययन में वैज्ञानिक छाप थी, परन्तु उनमें वैज्ञानिकता कम व दार्शनिकता अधिक थी। इसी युग में वस्तुतः वैज्ञानिक भूगोल की स्थापना हुई। इसका श्रेय जर्मनी के तीन महान भूगोलवेत्ताओं (हम्बोल्ट, रिटर व रेटजेल) को है। इनके द्वारा जो भी ग्रन्थ प्रकाशित किए गए, उनमें अन्वेषण की विधियों, अभिलेखों तथा वर्णनों की सूक्ष्मता देखने को मिलती है। बीसवीं सदी का भूगोल इसी सूक्ष्मता व शुद्धता के आधार पर विकसित हुआ।

         इस युग के भूगोलवेत्ताओं का भूगोल में योगदान संक्षेप में प्रस्तुत है:-

(1) हम्बोल्ट (Alexander Von Humboldt):-

         हम्बोल्ट बहुमुखी प्रतिभाशाली वैज्ञानिक था। भूगोल में उसके योगदान का मूल्यांकन करना कोई हंसी-खेल नहीं। बनस्पति विज्ञान, भू-विज्ञान, भौतिकी, रसायन विज्ञान, शरीर रचना विज्ञान, शरीर क्रिया विज्ञान, इतिहास, भूगोल, आदि क्षेत्रों में हम्बोल्ट का योगदान रहा है। बहुत से विज्ञान इस बात के लिए उसके ऋणी हैं कि उसने उनको नए तथ्य व नई सूझें प्रदान की थीं, परन्तु भूगोल का तो वह एक जन्मदाता था।

      हम्बोल्ट की सबसे प्रसिद्ध रचना कॉसमॉस (Cosmos) है। इसमें सम्पूर्ण विश्व का प्रादेशिक वर्णन विस्तार से किया गया है। इसमें पांच खण्ड हैं। यह ग्रन्थ लिखने में हम्बोल्ट को सत्रह वर्ष का समय लगा था। हम्बोल्ट का दूसरा प्रसिद्ध ग्रन्थ मध्य एशिया (Asia Centrale) है। यह जर्मन भाषा में 1843 में दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था।

    हम्बोल्ट ने प्रारम्भ से ही यात्राओं में रुचि प्रदर्शित की थी। उसने प्रथम यात्रा 1799 में प्रारम्भ की थी। वह जहाँ भी जाता था, कुछ यन्त्र प्रेक्षण के लिए अपने साथ-साथ रखता था।

       हम्बोल्ट ने भूगोल मे सात संकल्पनाओं का भी प्रतिपादन किया था। ये संकल्पनाएं थी-

(i) पृथ्वी तल का मानव निवास के रूप में अध्ययन,

(ii) भूगोल संसार में स्थानिक वितरणों का विज्ञान,

(iii) सामान्य भूगोल ही भौतिक भूगोल है,

(iv) भूगोल सम्बन्धों का अध्ययन है,

(v) सांसारिक दृश्य घटनाओं का अध्ययन है,

(vi) प्रकृति की एकता का अध्ययन तथा

(vii) दृश्य घटनाओं की विषमांगता का अध्ययन

        हम्बोल्ट ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियाँ अपनाई जैसे- आनुभविक, तुलनात्मक, कार्टोग्राफिक, क्रमबद्ध, आदि।

(2) रिटर (Carl Ritter):-

         रिटर का जन्म 1779 में हुआ था। भूगोल को वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने वाले आधार स्तम्भों में रिटर भी एक था।

     रिटर का सर्वप्रमुख ग्रन्थ एर्डकुण्डे (Erdkunde) था। इसके अतिरिक्त ‘यूरोप का भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांख्यिकीय चित्रण’ भी रिटर का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। यह रिटर का प्रथम ग्रन्थ था।

       1828 में रिटर ने भौगोलिक ज्ञान के प्रचार व प्रसार के लिए एक भौगोलिक समिति की स्थापना की थी। वह जीवन पर्यन्त, 31 वर्ष तक इसका अध्यक्ष रहा था।

       रिटर की विचारधारा पर हम्बोल्ट का बहुत प्रभाव था, हम्बोल्ट से रिटर की मुलाकात 1827 में हुई। दोनों ने मिलकर भूगोल के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान किया।

          रिटर वातावरण निश्चयवाद (Environmental Determinism) का समर्थन करता था। वह पृथ्वी तल के वर्णन मात्र को भूगोल नहीं मानता था। उसका मत था कि इस अध्ययन में मानव की मुख्य भूमिका होनी चाहिए। रिटर प्रकृति की एकता में विश्वास करता था। प्रादेशीकरण की विचारधारा का रिटर ने समर्थन किया था।

          रिटर ने भूगोल के अध्ययन के लिए कई विधियां अपनाई। इनमें अधिकांश हम्बोल्ट की विधियों के समान थीं-आनुभविक, तुलनात्मक व मानचित्रण इसके अतिरिक्त रिटर ने विश्लेषणात्मक व संश्लेषणात्मक विधि भी अपनाई।

(3) रेटजेल (Friedrich Ratzel 1844-1904):-

     उन्नीसवीं सदी के अन्तिम समय में जर्मनी के भौगोलिक क्षेत्र में रेटजेल ने शासन किया। भूगोल में मानव के स्थान को स्थायी बनाने का कार्य रेटजेल ने किया, अतः उसे मानव भूगोल का जन्मदाता (Father of Human Geography) कहा जाता है।

     एन्थ्रोपोज्योग्राफी (Anthropogeographic) रेटजेल की सबसे महत्वपूर्ण रचना है। यह ग्रन्थ 1882 में प्रकाशित हुआ था। इस ग्रन्थ से ही वस्तुतः मानव भूगोल का जन्म हुआ।

रेटजेल ने स्वयं यात्राएं करके आनुभविक विधि से भौगोलिक ज्ञान का एकत्रीकरण किया था। रेटजेल ने ही लिखा है:

“I travelled, I sketched, I described. Thus, I was led to the description of nature.”

       रेटजेल का दूसरा प्रमुख ग्रन्थ ‘राजनीतिक भूगोल’ (Politische geographie) था, यह दो खण्डों में क्रमशः 1897 व 1903 में प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त रेटजेल ने कई अन्य पुस्तकें लिखी। भौमिकी (Geology) मानव जातिशास्त्र (Ethnography), जीव विज्ञान (Biology), भौतिक भूगोल (Physical Geography), आदि पर अनेक लेख लिखे।

         रेटजेल ने मानव व वातावरण के सम्बन्धों का अध्ययन किया था तथा वातावरण निश्चयवाद (Environmental determinism) का प्रतिपादन किया था।

(4) फ्रोबेल (Frobel):-

         फ्रोबेल की विचारधारा हम्बोल्ट व रिटर की विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। उसने रिटर की आलोचना की थी तथा उससे ‘तुलनात्मक’ (Comparative) शब्द का स्पष्टीकरण मांगा था, परन्तु रिटर उसे सन्तुष्ट न कर सका था। फ्रोबेल का मत था कि विभिन्न अवयवों की तुलना, जैसे एक पर्वत की दूसरे पर्वत से, एक नदी की दूसरी नदी से की जा सकती है, परन्तु किसी सम्पूर्ण प्रदेश की तुलना दूसरे सम्पूर्ण प्रदेश से करना उचित नहीं है। फ्रोबेल ने भूगोल को परिभाषित किया था :

          “Geography” he claimed, “was a natural science, concerned with the earth’s surface, studied in a systematic way, i. e. taking in form, relief, climate, vegetation, animal and man; attempting throughout to make clear the interrelation of the various factors.”

          इस प्रकार फ्रोबेल ने भूगोल के अध्ययन क्षेत्र को सीमित करके मात्र भौतिक भूगोल बताया।

(5) पेशेल (Oscar Peshcel):-

           पेशेल जर्मनी में भूगोल का प्रथम प्रोफेसर था। वह भौगोलिक पत्र (Das Ausland) का सम्पादक भी था। इसमें विदेशी भूगोलवेत्ताओं के लेख प्रकाशित होते थे। पेशेल ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना की तथा तुलनात्मक भूगोल का विकास किया। पेशेल ने, जिसने भौतिक भूगोल का आधार तैयार किया था, भूगोल में मानव को अधिक महत्व नहीं दिया था।

(6) रिचथोफेन (Ferdinand von Richthofen) (1833-1905):-

         रिचथोफेन मूलतः भौमिकीविद (Geologist) था। वह बोन, बर्लिन व लीपजिंग विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक रहा था। बाद में इन्हीं विश्वविद्यालयों में भूगोल का प्रोफेसर रहा। ‘बर्लिन ज्योग्राफीकल सोसाइटी’ का कई वर्षों तक वह अध्यक्ष रहा था।

19वीं शताब्दी के दौरान भूगो

रिचथोफेन

          रिचथोफेन ने चीन में प्रेक्षण किए थे। चीन पर उसकी ग्रन्थमाला पांच खण्डो में प्रकाशित हुई थी। इसमें प्रथम खण्ड पर ही उसे ‘रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी’ का पदक मिला था। उसने चीन की एक एटलस भी प्रकाशित की थी।

          रिचथोफेन की मुख्य देन भौतिक भूगोल के क्षेत्र (भू-आकृति विज्ञान) में है। उसने तुलनात्मक भूगोल की स्थापना की थी।

         भूगोल को रिचथोफेन ने क्षेत्रवर्णी विज्ञान (Chorological Science) बताया था। इसमें पृथ्वी तल पर पाए जाने वाली भिन्नताओं का अध्ययन होता है।

        रिचथोफेन ने प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) और सामान्य भूगोल (General Geography) में अन्तर स्पष्ट किया था। उसने बताया था कि प्रादेशिक भूगोल में किसी तथ्य विशेष के पृथ्वी पर वितरण का अध्ययन करते हैं।

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

24. पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत



पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत

         बाल्टर पेंक प्रमुख भू-आकृतिक जर्मन वैज्ञानिक थे। उन्होंने डेविस के अपरदन चक्र सिद्धांत के आलोचना के क्रम में अपरदन चक्र का वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत किया जो पेंक का अपरदन चक्र सिद्धांत के रूप में जाना जाता है। यह डेविस के सिद्धांत की तुलना में अधिक वैज्ञानिकता पर आधारित है। इसमें भू-आकृतिक प्रक्रम की वैज्ञानिक संकल्पना का उपयोग किया गया है।

      पेंक ने डेविस की तरह ही आर्द्र प्रदेशो में प्रवाहित जल या नदियों को अपरदन का प्रमुख कारक मानते हुए अपरदन चक्र का सिद्धांत दिया। इसके अनुसार किसी भी प्रदेश में उत्थान की प्रकिया प्रारम्भ होने के साथ ही अपरदन के कारक सक्रिय हो जाते है। अपरदन का कार्य तब तक घटित होता रहता है, जब तक आधार तल की प्राप्ति न हो जाए।

     आर्द्र प्रदेशो में मुख्य नदी के साथ ही जब सहायक नदियाँ भी आधार तल को प्राप्त कर लेती है तब एक अपरदन चक्र पूर्ण होता है और अंतिम रूप से लगभग समतलप्राय मैदान (इनड्रम्प) का विकास होता है। यहाँ जल विभाजक के अवशेष इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

       पेंक ने उत्थान व अपरदन की सम्मिलित अवधि को अपेक्षाकृत अधिक लम्बे समय तक घटित होने वाली क्रिया माना जबकि केवल अपरदन के समय को अपेक्षाकृत छोटा माना। पेंक ने निम्न सूत्र का प्रतिपादन किया-

स्थलरुप- उत्थान की प्रावस्था, दर और निम्नीकरण का प्रतिफल होता है।

      इस सूत्र के अनुसार अपरदन की प्रक्रिया विभिन्न प्रावस्था में घटित होती है और प्रत्येक प्रावस्था में उत्थान और अपरदन का विशिष्ट दर होता है। इसी अनुरूप ऊंचाई एवं उच्चावच विषमता में कमी आती है अर्थात निम्नीकरण होता है।

      पेंक ने अपरदन चक्र की पाँच प्रावस्था को बताया। प्रथम तीन प्रावस्था में उत्थान एवं अपरदन दोनों साथ-साथ घटित होते है। अंतिम दो प्रावस्था में केवल अपरदन की क्रिया घटित होती है।

(i) प्रथम प्रावस्था में प्रदेश की ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में वृद्धि हुई है। उंचाई में वृद्धि का कारण उत्थान की दर का अपरदन के दर की तुलना में अधिक होना है, जबकि उच्चावच में वृद्धि का कारण नदियों द्वारा तलीय कटाव की अधिकता है।

(ii) दूसरी प्रावस्था में भी अपरदन की तुलना में उत्थान की दर अधिक होने के कारण ऊंचाई में वृद्धि होती है, लेकिन उच्चावच स्थिर रहता है।

(iii) तीसरी प्रावस्था में उत्थान और अपरदन दोनों के दर समान होते है, अतः ऊंचाई में वृद्धि रुक जाती है जबकि घाटी की उपरी एवं निचले भाग में अपरदन की दर सामान्य होने के कारण उच्चावच स्थिर रहता है।

(iv) चौथी प्रावस्था में उत्थान का प्रभाव समाप्त हो जाने और नदियों द्वारा तलीय कटान के साथ क्षैतिज कटान के प्रभाव से ऊंचाई में कमी आने लगती है, लेकिन घाटी के उपरी और निचले भाग में अपरदन की दर समाप्त होने के कारण उच्चावच स्थिर बना रहता है।

(v) पांचवी अवस्था में क्षैतिज अपरदन की अधिकता, निक्षेपण का प्रभाव तथा तलीय कटान भी लगभग समाप्त हो जाने के कारण ऊंचाई एवं उच्चावच दोनों में कमी आने लगती है। अंततः इन्ड्रम्प जैसी समप्राय मैदान का निर्माण होता है। इसके साथ ही अपरदन का एक चक्र पूर्ण हो जाता है।

पेंक का अपरदन चक्र

           पेंक ने अपरदन चक्र की संकल्पना में ढालों के विकास को पर्याप्त महत्व दिया और ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत का प्रतिपादन किया।

पेंक का ढाल प्रतिस्थापन सिद्धांत-

       इसके अनुसार अपरदन चक्र की प्रक्रिया में एक ढाल का दूसरे ढाल में प्रतिस्थापन होता रहता है। सर्वप्रथम उत्तल ढाल का निर्माण होता है जिसका प्रतिस्थापन समढाल में और पुनः समढाल का प्रतिस्थापन अवतल ढाल में हो जाता है।
      जब कई अवतल ढाल परस्पर मिलते है तब इंड्रम्प का विकास होता है। इन ढालो के मध्य में भी जल विभाजक इन्सेलबर्ग के रूप में रह जाते है।

निष्कर्ष:

      इस प्रकार स्पष्ट है की पेंक का अपरदन चक्र मॉडल डेविस के अपरदन चक्र मॉडल की तुलना में अधिक वैज्ञानिक अवधारणा पर आधारित है। प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत ने भी पेंक के मॉडल को ही वैज्ञानिक माना। इसी कारण पेंक के मॉडल को अधिक मान्यता प्राप्त है।

नोट:

वाल्टर पेंक  के अनुसार:

        अपरदन चक्र में पाँच चरण होते हैं-

1. प्राइमारम्प (Primarampf)

2. आफस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग  (Aufteingende entwickelung)

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग (Gleichforminge entwickelung )

4. आबस्टीजेंडे इंट्वीकलुंग (Absteigende entwickelung)

5. इंड्रम्प (Endrufmpf)

1. प्राइमारम्प:-

⇒ पेंक के अनुसार प्रारंभ में एक विशेषताहीन सतह होती है जिसे पेंक ने “प्राइमारम्प” या “प्राथमिक पेडप्लेन” कहा।

⇒ यह भू-आकृति विकास का एक पूर्व चरण है।

⇒ इस चरण में भू-आकृतियों के विकास के बिना एक परिदृश्य मौजूद होता है।

⇒ इस अवस्था में कोई पहाड़ नहीं।

⇒ भू-आकृतियों का ऊपरी वक्र और निचला वक्र समान होता है।

2. आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

⇒ भू-आकृतियाँ विकसित होने लगती हैं।

⇒ पहाड़ अचानक उठने लगते  हैं।

⇒ घाटियाँ गहरी होने लगती है और संकरी घाटियाँ का निर्माण करती हैं।

⇒ उच्चावच बढ़ने लगती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल का विकास होता हैं।

⇒ ऊपरी वक्र और निचले वक्र के बीच की ढाल बढ़ती जाती है।

⇒ इस चरण में अंतर्जात बल से कम बहिर्जात बल लगते है।

3. ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग :-

        इस चरण में तीन भाग होते हैं।

⇒ पहले चरण में उत्थान अपरदन से ज्यादा होता है।

⇒ सबसे ऊंची चोटी ऊपरी वक्र में बनती हैं।

⇒ दूसरा चरण  में उत्थान और अपरदन लगभग बराबर होते है।

⇒ अंतिम चरण में उत्थान की प्रक्रिया कम हो जाती है। धीरे-धीरे घाटी चौड़ा होने लगता है और पर्वत की ऊँचाई भी कम होने लगते हैं।

4. आबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग :-

⇒ शिखर या ऊपरी वक्र तेजी से मिटता है।

⇒ नदी श्रेणीबद्ध (ग्रेडेड) हो जाती है और उत्तल तथा मुक्त ढाल रेक्टिलिनियर ढलानों में परिवर्तित हो जाते है।

⇒ इस चरण में शंक्वाकार आकार का इंसेलबर्ग बनता है।

5. इंड्रम्प:-

⇒ भू-आकृति का विकास रुक जाता है।

⇒ पेडिप्लेन अंत में बनता है।

⇒ भू-आकृतियों के ऊपरी भागों में कुछ अपरदन होता है और अपरदित पदार्थ भू-आकृतियों के निचले भाग में जमा हो जाता है।

नोट: 

⇒ आफस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- बढ़ती दर से विकास।
⇒ ग्लीचफोर्मिंगे इंट्वीकलुंग का अर्थ है- समान दर से विकास।
⇒ अबस्टीजेंड इंट्वीकलुंग का अर्थ है- घटती दर से विकास।


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