22. Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans (मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसाय)

Primary, Secondary, Tertiary and Quaternary Economic Activities of Humans

(मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियाँ)



Q. मानव के प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक एवं चतुर्थक आर्थिक गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर- मानव अपनी मूलभूत और उच्चतर आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विभिन्न प्रकार की आर्थिक क्रियाएँ करता है। इन क्रियाओं द्वारा मानव की आर्थिक प्रगति होती है। मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण का प्रभाव पड़ता है। चूंकि पृथ्वी सतह पर भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण में क्षेत्रीय विभिन्नता विद्यमान है, अतः मानव की आर्थिक क्रियाओं में भी क्षेत्रीय विभिन्नता पाई जाती है।

     उदाहरण के लिए वनों में मानव एकत्रीकरण या संग्रहण, आखेट एवं लकड़ी काटने जैसे आर्थिक क्रियाएँ सम्पन्न करता है तो घास के मैदानों में पशुचारण, उपजाऊ समतल मैदानी भागों में कृषि, खनिजों की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में खनन, जल की उपलब्धि वाले क्षेत्रों में मत्स्याखेट जैसी आर्थिक क्रियाएँ करता है। साथ ही अनुकूल अवस्थिति वाले क्षेत्रों में विनिर्माण उद्योगों, परिवहन, व्यापार एवं सेवाओं से सम्बन्धित आर्थिक गतिविधियों में भी संलग्न रहता है।

     मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं या गतिविधियों को निम्नलिखित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, यद्यपि ये चारों वर्ग एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं:

1. प्राथमिक व्यवसाय (Primary Occupation):-

       प्राथमिक व्यवसाय पूर्णतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं। प्राथमिक व्यवसायों के संचालन हेतु अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होती है। वनों से संग्रहण, आखेट, लकड़ी काटना घास के मैदानों में पशु चराना, पशुओं से दूध, मांस, खालें, आदि प्राप्त करना, समुद्रों, नदियों एवं झीलों से मछली पकड़ना, कृषि तथा खानों से खनिज निकालना, आदि प्रमुख प्राथमिक व्यवसाय हैं।

     विश्व के विकासशील देशों में कार्यशील जनसंख्या का अधिकांश भाग प्राथमिक व्यवसायों में लगा हुआ है और विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग तृतीयक एवं चतुर्थक व्यवसायों में कार्यरत है।

  भारत में 60 प्रतिशत, चीन में 50 प्रतिशत, इथोपिया में 80 प्रतिशत, नाइजीरिया में 70 प्रतिशत जनसंख्या प्राथमिक व्यवसायों में लगी हुई है जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में 8 प्रतिशत, ग्रेट ब्रिटेन में 1 प्रतिशत, जापान में 5 प्रतिशत जनसंख्या ही प्राथमिक व्यवसायों में संलग्न है।

2. द्वितीयक व्यवसाय (Secondary Occupation):-

    द्वितीयक या गौण व्यवसाय में वे सभी प्रकार के विनिर्माण उद्योग सम्मिलित किए जाते हैं जो प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य संग्रहण, लकड़ी काटना, आदि से प्राप्त उत्पादों को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त कर मशीनी प्रक्रिया द्वारा उसे तैयार माल में बदलते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा गौण व्यवसाय कच्चे माल के स्वरूप में परिवर्तन करते हैं, उसके मूल्य में वृद्धि करते हैं और उसकी उपयोगिता को बढ़ा देते हैं।

     उदाहरण के लिए कृषि से प्राप्त गन्ना गौण व्यवसाय के लिए कच्चा माल है, मशीनी प्रक्रिया द्वारा गन्ने से चीनी बनाई जाती है। इस प्रकार गन्ने का स्वरूप भी परिवर्तित हो जाता है, गन्ने से शक्कर बनने पर उसके मूल्य और उपयोगिता में वृद्धि हो जाती है।

     इसी प्रकार लौह अयस्क का खनन प्राथमिक व्यवसाय है, लेकिन लोहा-इस्पात का निर्माण गौण व्यवसाय है। विभिन्न प्रकार के उद्योग एक-दूसरे के निकट स्थापित हो जाते हैं, क्योंकि एक उद्योग का तैयार माल दूसरे उद्योग के लिए कच्चा माल हो सकता है। उदाहरण के लिए लौह इस्पात उद्योग अनेक प्रकार के इंजीनियरिंग उद्योगों को विकसित कर सकता है।

     उद्योगों का विकास कच्चे माल, शक्ति, श्रमिक, पूंजी और तैयार माल के लिए बाजार की उपलब्धि पर निर्भर है। इन कारकों के अलावा परिवहन और संचार की सुविधाएं, कच्चे माल और शक्ति का लागत मूल्य, श्रमिकों का वेतन तथा तैयार माल का लागत मूल्य भी उद्योगों की स्थापना और विकास में महत्वपूर्ण आर्थिक कारक है।

     किसी देश में गौण व्यवसायों में कितनी विविधता है तथा उन व्यवसायों में कितने लोग काम करते हैं, यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि उस देश में औद्योगिक विकास कितना हुआ है। संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, कनाडा, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में प्राथमिक व्यवसायों की तुलना में गौण व्यवसायों में अधिक लोग काम करते हैं।

     उद्योगों में कार्यरत लोगों की संख्या, उपयोग में आने वाली यान्त्रिक शक्ति तथा निर्मित उत्पादों के मूल्य के आधार पर उद्योग तीन प्रकार के होते हैं यथा- वृहत् उद्योग, लघु उद्योग और कुटीर उद्योग।

     दस्तकार स्थानीय पदार्थों का उपयोग करके दस्तकारी की वस्तुएं बनाते हैं। हथकरघा, बुनकर, टोकरी बनाने वाले, कालीन बनाने वाले, आदि गौण व्यवसायों में लगे हैं। इन गौण व्यवसायों को कुटीर उद्योग कहते हैं। कुटीर उद्योग की प्रत्येक इकाई में लोग कम संख्या में काम करते हैं और इनमें यांत्रिक शक्ति का प्रयोग नहीं होता है।

    लघु उद्योग यांत्रिक शक्ति का उपयोग करते हैं। ये उद्योग बड़े उद्योगों के लिए पुर्जे भी बनाने हैं। इलेक्ट्रोनिक वस्तुएं बनाने वाली औद्योगिक इकाइयां जैसे- रेडियो, टी. वी. सेट, प्लास्टिक की वस्तुएं, सामान्यतः लघु उद्योगों की श्रेणी में आते हैं।

Tertiary and Quaternary Economic

प्लास्टिक की वस्तुएं

     वृहत् उद्योगों में सैकड़ों लोग काम करते हैं और इनमें करोड़ों रुपए की पूंजी लगी हुई होती है। इनमें से कुछ उद्योग जैसे मोटर कार उद्योग या दुपहिया वाहन उद्योग अधिक उत्पादन के लिए एसेम्बली लाइन तकनीक का उपयोग करते हैं। एसेम्बली लाइन में अलग-अलग स्थानों पर कच्चे पदार्थ तथा विविध पुर्जों को जोड़ने का कार्य होता है।

     एसेम्बली लाइन पर जैसे-जैसे निर्माणाधीन वस्तु आगे सरकती है, प्रत्येक श्रमिक कोई निश्चित काम करता है, फिर दूसरी निर्माणाधीन वस्तु में वह वही काम करता है। इस तरह अन्त तक पहुंचते-पहुंचते वस्तु का निर्माण पूरा हो जाता है और इस प्रकार एसेम्बली लाइन में से निर्मित वस्तु बाहर निकलती है। इस विधि में प्रत्येक श्रमिक किसी एक काम में विशेष दक्ष होता है, जिसे वह बार-बार दोहराता है। निर्माण उद्योगों के परिणामस्वरूप प्राथमिक व्यवसायों जैसे- कृषि, खनन, मत्स्य ग्रहण, आदि में भी मशीनों का खूब प्रयोग होने लगा है।

3. तृतीयक व्यवसाय (Tertiary Occupation):-

      तृतीयक व्यवसायों में समाज को दी जाने वाली व्यक्तिगत तथा व्यावसायिक सेवाएं सम्मिलित हैं। इस व्यवसाय को सेवा श्रेणी भी कहा जाता है। सामान्यतः विकास की प्रक्रिया का एक निश्चित क्रम होता है। प्रारम्भ में प्राथमिक व्यवसायों की प्रधानता होती है। इसके बाद गौण व्यवसायों का महत्व बढ़ता है तथा अन्त में तृतीयक और चतुर्थक व्यवसाय महत्वपूर्ण बन जाते हैं।

    तृतीयक व्यवसायों के अन्तर्गत समाज को प्रदान की जाने वाली सेवाओं में रेल, सडक, जहाज, वायुयान, सेवाएं, डाक-तार सेवाएं, दूरदर्शन, रेडियो, फिल्म, साहित्य, कानूनी सेवाएं, जनसम्पर्क और परामर्श, विज्ञापन, वित्त, बीमा, थोक और फुटकर व्यापार, मरम्मत के कार्य जैसी सेवाएं, स्थानीय, राज्यीय, राष्ट्रीय प्रशासन, पुलिस, सेना और अन्य जन सेवाएं तथा गैर सरकारी संगठनों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं उल्लेखनीय हैं।

     उद्योगों के विकास के साथ-साथ नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार की सेवाओं की मांग में भी वृद्धि हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में नगरीय क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक संख्या में लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं।

     विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में कार्यरत जनसंख्या का अधिकांश भाग सेवाओं में लगा हुआ है। उदाहरण के लिए जापान में 70 प्रतिशत, आस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत, कनाडा में 74 प्रतिशत, जर्मनी में 64 प्रतिशत कार्यशील लोग तृतीयक व्यवसायों में संलग्न हैं जबकि भारत में 23 प्रतिशत और चीन में 28 प्रतिशत कार्यशील जनसंख्या ही तृतीयक व्यवसायों में लगी हुई है।

    विकसित देशों में प्रति व्यक्ति आय के बढ़ने से विभिन्न प्रकार की सेवाओं विशेषकर मनोरंजन, परिवहन और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। प्राथमिक एवं गौण व्यवसायों में काम करने वाले लोगों की भांति तृतीयक व्यवसायों में सेवारत लोगों के कार्य भी महत्वपूर्ण हैं। प्राथमिक और गौण व्यवसायों में लगे लोग, समाज के लिए आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन करते हैं और तृतीयक व्यवसायी समाज को विभिन्न सेवाएं प्रदान करते हैं।

4. चतुर्थक व्यवसाय (Quaternary Occupation):-

       वर्तमान समय में मानव के आर्थिक क्रियाकलाप दिनोंदिन बहुत ही विशिष्ट और जटिल होते जा रहे हैं। फलतः मानव की कानून, वित्त, शिक्षा, शोध और संचार से जुड़ी उन आर्थिक गतिविधियों को जो सूचना (information), सूचना के संग्रहण, (Acquisition), सूचना के संसाधन, (Manipulation) और सूचना के प्रसारण (Transmission) से सम्बन्धित है, को चतुर्थक व्यवसाय के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है।

    वर्तमान में विश्व के लगभग सभी देशों में और विशेषकर विकसित देशों में चतुर्थक व्यवसाय में संलग्न लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। इस व्यवसाय के लोगों में उच्च वेतनमान और पदोन्नति की चाह में गतिशीलता अधिक पाई जाती है।

    कम्प्यूटर के बढ़ते प्रयोग और सूचना प्रौद्योगिकी ने इस व्यवसाय के महत्व को बहुत बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप औद्योगिक समाज के तकनीकी तत्वों में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ गया है और वर्तमान आर्थिक क्रियाकलाप मुख्य रूप से उन अप्रत्यक्ष उत्पादों से प्रभावित हो गए हैं जिनके उत्पादन में ज्ञान, सूचना और संचार अधिक महत्वपूर्ण है।

MCQs/UGC NET/JRF Quick Revision

1. मानव की आर्थिक क्रियाओं में क्षेत्रीय विभिन्नता का सबसे उपयुक्त कारण कौन-सा है?

Which best explains regional variation in human economic activities?

(A) केवल जनसंख्या का आकार / Population size only

(B) भौतिक एवं सामाजिक पर्यावरण की क्षेत्रीय विभिन्नता / Regional variation in physical and social environment

(C) केवल राजनीतिक सीमाएँ / Political boundaries only

(D) केवल तकनीकी विकास / Technological development only

Answer: (B)

2. निम्न में से कौन-सा आर्थिक क्रियाओं के चार-स्तरीय वर्गीकरण का सही क्रम है?

Which is the correct four-fold classification of economic activities?

(A) Primary → Secondary → Tertiary → Quaternary

(B) Primary → Tertiary → Secondary → Quaternary

(C) Secondary → Primary → Quaternary → Tertiary

(D) Tertiary → Primary → Secondary → Quaternary

Answer: (A)

3. निम्नलिखित में से कौन-सी गतिविधि प्राथमिक व्यवसाय की मूल प्रकृति को सर्वाधिक स्पष्ट करती है?

Which activity best represents the basic nature of a primary occupation?

(A) Software development

(B) Banking

(C) Forest resource collection

(D) Retail trade

Answer: (C)

4. प्राथमिक व्यवसायों के संबंध में निम्न में से कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding primary occupations?

(A) वे पूर्णतः प्रकृति से स्वतंत्र होते हैं।

(B) वे मुख्यतः प्रकृति पर आश्रित होते हैं।

(C) उनमें विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता कभी नहीं होती।

(D) वे केवल विकसित देशों में पाए जाते हैं।

Answer: (B)

5. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसायों का समूह है?

Which is a group of primary occupations?

(A) Banking, insurance, trade

(B) Mining, agriculture, fishing

(C) Teaching, research, consulting

(D) Manufacturing, construction, processing

Answer: (B)

6. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय नहीं है?

Which is NOT a primary occupation?

(A) Fishing

(B) Mining

(C) Agriculture

(D) Manufacturing

Answer: (D)

7. प्राथमिक व्यवसायों के लिए अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्र की आवश्यकता होने का मुख्य कारण क्या है?

Why do primary occupations generally require relatively extensive areas?

(A) वे सीधे प्राकृतिक संसाधनों एवं भूमि पर निर्भर होते हैं।

(B) उनमें केवल urban population कार्य करती है।

(C) उनमें केवल मशीनों का प्रयोग होता है।

(D) उनका प्राकृतिक पर्यावरण से कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

8. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक व्यवसाय और उसके पर्यावरण के बीच सही संबंध दर्शाता है?

Which correctly relates a primary occupation to its environment?

(A) घासभूमि — पशुपालन

(B) खनिज क्षेत्र — मत्स्य ग्रहण

(C) नदी — खनन ही केवल

(D) वन — बैंकिंग

Answer: (A)

9. आखेट एवं संग्रहण आधारित अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता क्या है?

What is the major characteristic of hunting and gathering economy?

(A) पूर्णतः स्थायी कृषि

(B) अत्यधिक औद्योगिकीकरण

(C) स्थानीय प्राकृतिक पर्यावरण पर अत्यधिक निर्भरता

(D) बड़े पैमाने का विनिर्माण

Answer: (C)

10. निम्न में से कौन-सा आखेट एवं संग्रहण से संबंधित नहीं है?

Which is NOT associated with hunting and gathering?

(A) फल एवं जड़ें एकत्र करना

(B) पशु-पक्षियों का आखेट

(C) मछली पकड़ना

(D) बड़े पैमाने पर मशीन आधारित उद्योग

Answer: (D)

11. निम्न में से कौन-सा समूह source के अनुसार आखेट-संग्रहण से संबंधित समुदायों का उदाहरण देता है?

Which group represents communities associated with hunting and gathering according to the source?

(A) पिग्मी, सेमांग, बुशमैन

(B) मसाई, फुलानी, बद्दू

(C) गुज्जर, गद्दी, बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (A)

12. उष्ण कटिबंधीय वनों में वाणिज्यिक संग्रहण में निम्न में से किसका संग्रह किया जाता है?

Which may be collected commercially in tropical forests?

(A) लाख, गोंद एवं जड़ी-बूटियाँ

(B) केवल गेहूँ

(C) केवल कोयला

(D) केवल लौह-अयस्क

Answer: (A)

13. आखेट-संग्रहण समुदायों की प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति गहरी जानकारी का प्रमुख कारण क्या है?

Why do hunting-gathering communities possess detailed knowledge of their natural environment?

(A) उनकी आवश्यकताओं का बड़ा भाग स्थानीय पर्यावरण से पूरा होता है।

(B) वे केवल आधुनिक उद्योगों पर निर्भर होते हैं।

(C) वे स्थायी कृषि करते हैं।

(D) वे केवल आयातित वस्तुओं का उपयोग करते हैं।

Answer: (A)

14. पशुपालन के विकास के संदर्भ में निम्न में से कौन-सा क्रम source की व्याख्या से सर्वाधिक संगत है?

Which sequence is most consistent with the source’s explanation of the development of pastoralism?

(A) व्यापार के बाद संग्रहण का विकास

(B) उद्योग के बाद आखेट का विकास

(C) आखेट-संग्रहण के बाद पशुपालन का विकास

(D) कृषि के बाद ही सभी प्रकार के पशुपालन का विकास

Answer: (C)

15. निम्न में से कौन-सा पशु-पर्यावरण का सही युग्म है?

Which is the correctly matched animal-environment pair?

(A) मरुस्थल — ऊँट

(B) टुण्ड्रा — गाय-बैल

(C) सवाना — याक

(D) तिब्बत — ऊँट

Answer: (A)

16. तिब्बत एवं हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में किस पशु का पालन source में बताया गया है?

Which animal is associated with pastoralism in Tibet and Himalayan mountainous regions?

(A) Camel

(B) Yak

(C) Reindeer

(D) Alpaca

Answer: (B)

17. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन की मूल विशेषता है?

Which is a basic characteristic of nomadic pastoralism?

(A) चारे एवं पानी की खोज में स्थान परिवर्तन

(B) एक ही खेत में स्थायी फसल उत्पादन

(C) केवल urban market services

(D) पूर्णतः factory-based livestock production

Answer: (A)

18. चलवासी पशुपालक अपने स्थान परिवर्तन के दौरान मुख्यतः किन संसाधनों की खोज करते हैं?

Which resources primarily determine the movement of nomadic pastoralists?

(A) चारा और पानी

(B) कोयला और लौह-अयस्क

(C) बाजार और बैंक

(D) कारखाने और बंदरगाह

Answer: (A)

19. निम्न में से कौन-सा चलवासी पशुपालन का क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is an area of nomadic pastoralism mentioned in the source?

(A) सहारा मरुस्थल

(B) अमेजन का शहरी क्षेत्र

(C) पश्चिमी यूरोप का औद्योगिक क्षेत्र

(D) जापान का महानगरीय क्षेत्र

Answer: (A)

20. निम्न में से कौन-सा समुदाय चलवासी पशुपालन से संबंधित है?

Which community is associated with nomadic pastoralism?

(A) मसाई

(B) डेनिश डेयरी किसान

(C) पम्पास के आधुनिक कृषक

(D) कनाडाई लकड़ी उद्योग कर्मी

Answer: (A)

21. पर्वतीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु में ऊँचाई की ओर और शीत ऋतु में घाटियों की ओर पशुपालकों का जाना कहलाता है—

Seasonal movement of pastoralists to higher elevations in summer and valleys in winter is called:

(A) Transhumance / ऋतु प्रवास

(B) Plantation

(C) Shifting cultivation

(D) Truck farming

Answer: (A)

22. निम्न में से कौन-सा ऋतु प्रवास का सही उदाहरण है?

Which is an example of transhumance?

(A) कनाडा के औद्योगिक श्रमिक

(B) सहारा के स्थायी कृषक

(C) हिमालय के गुज्जर, गद्दी एवं बकरवाल

(D) डेनमार्क के डेयरी किसान

Answer: (C)

23. निम्न में से कौन-सा कथन Transhumance को Nomadic Pastoralism से अलग करता है?

Which distinguishes transhumance from nomadic pastoralism?

(A) Transhumance में seasonal movement एक अपेक्षाकृत निश्चित ऊर्ध्वाधर/क्षेत्रीय pattern का अनुसरण करता है।

(B) Transhumance में पशुपालन नहीं होता।

(C) Nomadic pastoralism में कभी movement नहीं होता।

(D) दोनों में कोई अंतर नहीं है।

Answer: (A)

24. आधुनिक काल में कुछ क्षेत्रों में चलवासी पशुपालन के स्थान पर व्यापारिक पशुपालन आने का एक प्रमुख कारण क्या बताया गया है?

What is one reason for the replacement of nomadic pastoralism by commercial livestock farming in some regions?

(A) कृषि का पूर्ण अंत

(B) प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण अभाव

(C) पशुओं का विलुप्त होना

(D) उद्योगों एवं आधुनिक सुविधाओं का विकास 

Answer: (D)

25. व्यापारिक पशुपालन की कौन-सी विशेषता उसे चलवासी पशुपालन से अलग करती है?

Which feature distinguishes commercial livestock farming from nomadic pastoralism?

(A) पशुपालक एक स्थान पर रहकर वैज्ञानिक एवं व्यापारिक तरीके अपनाते हैं।

(B) वे लगातार नए चरागाह खोजते हैं।

(C) वे केवल प्राकृतिक घास पर निर्भर रहते हैं।

(D) वे बाजार से पूर्णतः कटे रहते हैं।

Answer: (A)

26. व्यापारिक पशुपालन में चारे की फसलों की खेती का क्या महत्व है?

What is the significance of fodder cultivation in commercial livestock farming?

(A) पशुओं के लिए नियंत्रित एवं पौष्टिक चारा उपलब्ध कराना

(B) पशुपालकों को प्रवास के लिए बाध्य करना

(C) प्राकृतिक चरागाह समाप्त करना ही इसका उद्देश्य है।

(D) केवल निर्यात फसल पैदा करना

Answer: (A)

27. निम्न में से कौन-सा व्यापारिक पशुपालन का प्रमुख क्षेत्र source में उल्लिखित है?

Which is a major region of commercial livestock farming mentioned in the source?

(A) उत्तरी अमेरिका का प्रेयरी क्षेत्र

(B) सहारा का केंद्रीय मरुस्थल ही

(C) हिमालय का प्रत्येक भाग

(D) अमेजन का प्रत्येक भाग

Answer: (A)

28. व्यापारिक पशुपालन में नस्ल सुधार एवं रोग नियंत्रण का महत्व किस बात को दर्शाता है?

What does emphasis on breeding and disease control indicate in commercial livestock farming?

(A) इसका वैज्ञानिक एवं बाजारोन्मुख स्वरूप

(B) इसका पूर्णतः निर्वाह स्वरूप

(C) इसका पर्यावरण से पूर्ण विच्छेद

(D) इसका केवल खानाबदोश स्वरूप

Answer: (A)

29. लकड़ी काटने का व्यापारिक विकास विशेष रूप से किस प्रकार के वन प्रदेश में हुआ?

Commercial logging developed particularly in which forest region?

(A) मरुस्थलीय प्रदेश

(B) शंकुधारी वन प्रदेश

(C) टुण्ड्रा का बर्फीला क्षेत्र

(D) घासभूमि

Answer: (B)

30. निम्न में से कौन-सा लकड़ी काटने वाले प्रमुख देशों का समूह है?

Which group represents major commercial logging countries mentioned in the source?

(A) अर्जेंटीना, ब्राजील, वेनेजुएला, उरुग्वे

(B) मिस्र, सऊदी अरब, लीबिया, चाड

(C) भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया

(D) स्वीडन, फिनलैंड, रूस, कनाडा 

Answer: (D)

31. लकड़ी से लुग्दी एवं कागज बनाने वाले उद्योगों का वनों से संबंध किस प्रकार का है?

What is the relationship between pulp and paper industries and forests?

(A) वन कच्चा माल प्रदान करते हैं।

(B) वन केवल बाजार प्रदान करते हैं।

(C) वन केवल श्रमिक प्रदान करते हैं।

(D) वन का कोई संबंध नहीं है।

Answer: (A)

32. मध्य अक्षांशीय तटीय प्रदेशों में व्यापारिक मत्स्य ग्रहण के विकास में कौन-सा कारक महत्वपूर्ण है?

Which factor is important for commercial fishing in middle-latitude coastal regions?

(A) शक्तिचालित नावों एवं जलपोतों का उपयोग

(B) केवल पारंपरिक भाले

(C) केवल ऊँट परिवहन

(D) केवल वर्षा जल

Answer: (A)

33. बड़े मत्स्य जहाजों में मछलियों को संसाधित एवं पैक करने की सुविधा किस प्रवृत्ति को दर्शाती है?

Processing and packing fish aboard large fishing vessels indicates:

(A) मत्स्य व्यवसाय का औद्योगिक एवं व्यापारिक स्वरूप

(B) केवल निर्वाह मत्स्य ग्रहण

(C) पशुपालन

(D) स्थानान्तरी कृषि

Answer: (A)

34. खनन को प्राथमिक व्यवसाय क्यों माना जाता है?

Why is mining classified as a primary occupation?

(A) इसमें पृथ्वी से प्राकृतिक खनिज संसाधनों का प्रत्यक्ष निष्कर्षण होता है।

(B) इसमें केवल manufactured goods बेचे जाते हैं।

(C) इसमें केवल financial services होती हैं।

(D) इसमें केवल research किया जाता है।

Answer: (A)

35. निम्न में से कौन-सा खनन के व्यापारिक दोहन को प्रभावित करने वाला कारक नहीं है?

Which is NOT a factor affecting commercial exploitation of minerals?

(A) अयस्क की मांग

(B) अयस्क की गुणवत्ता

(C) खान की गहराई एवं सुगम्यता

(D) केवल देश की भाषा

Answer: (D)

36. खनिजों के वितरण के संबंध में कौन-सा कथन सही है?

Which statement is correct regarding mineral distribution?

(A) खनिजों का वितरण असमान है और अधिकांश खनिज non-renewable हैं।

(B) सभी देश खनिजों में आत्मनिर्भर हैं।

(C) सभी खनिज renewable हैं।

(D) खनिज पूरे विश्व में समान रूप से वितरित हैं।

Answer: (A)

37. खनन प्रारम्भ होने के बाद किसी क्षेत्र में परिवहन सुविधाओं के विकास और बस्ती विस्तार का क्या संबंध हो सकता है?

What may be the relationship between mining and transport/settlement development?

(A) खनन के कारण परिवहन सुविधाएँ विकसित हो सकती हैं और लोगों का आगमन बढ़ सकता है।

(B) खनन हमेशा बस्तियों को समाप्त करता है।

(C) खनन का परिवहन से कोई संबंध नहीं है।

(D) खनन केवल समुद्र में होता है।

Answer: (A)

38. पेट्रोलियम शोधनशालाओं के संदर्भ में source में कौन-सा तर्क दिया गया है?

What reasoning is given in the source regarding petroleum refineries?

(A) अशुद्ध पेट्रोलियम का परिवहन कई petroleum products की तुलना में सस्ता हो सकता है।

(B) पेट्रोलियम का परिवहन असंभव है।

(C) सभी refineries केवल खानों के ऊपर स्थापित होती हैं।

(D) पेट्रोलियम का कोई परिवहन नहीं होता।

Answer: (A)

39. कृषि के विकास के संदर्भ में सबसे प्राचीन रूप किसे बताया गया है?

Which is described as the oldest form of agriculture?

(A) स्थानान्तरी कृषि

(B) रोपण कृषि

(C) मिश्रित कृषि

(D) ट्रक फार्मिंग

Answer: (A)

40. स्थानान्तरी कृषि की मूल प्रक्रिया में क्या शामिल है?

What is involved in the basic process of shifting cultivation?

(A) वनस्पति को काटना-जला कर भूमि साफ करना और कुछ वर्षों बाद दूसरी भूमि पर जाना

(B) स्थायी खेतों में लगातार एक ही भूमि पर खेती करना

(C) केवल greenhouse cultivation

(D) केवल commercial dairy farming

Answer: (A)

41. स्थानान्तरी कृषि में भूमि को कुछ वर्षों के बाद छोड़ने का प्रमुख कारण क्या है?

Why is land left fallow after a few years in shifting cultivation?

(A) समुद्री जल का बढ़ना

(B) भूमि की उर्वरता/उत्पादकता में कमी और नए क्षेत्र की आवश्यकता

(C) उद्योगों की अधिकता

(D) बाजार का पूर्ण अभाव

Answer: (B)

42. निम्न में से कौन-सा स्थानान्तरी कृषि का प्रमुख क्षेत्र source में बताया गया है?

Which is a major area of shifting cultivation mentioned in the source?

(A) उष्ण कटिबंधीय वन

(B) शीतोष्ण घासभूमि ही

(C) मरुस्थलीय क्षेत्र ही

(D) ध्रुवीय हिम क्षेत्र

Answer: (A)

43. स्थायी कृषि के विकास का एक प्रमुख सामाजिक-भौगोलिक परिणाम क्या था?

What was a major socio-geographical consequence of permanent agriculture?

(A) अतिरिक्त खाद्यान्न समाप्त हो गया।

(B) मानव पूरी तरह खानाबदोश बन गया।

(C) परिवहन समाप्त हो गया।

(D) स्थायी बस्तियों को प्रोत्साहन मिला।

Answer: (D)

44. व्यापारिक कृषि की प्रमुख विशेषता क्या है?

What is a major characteristic of commercial agriculture?

(A) बाजार/निर्यात के लिए विशेष फसलों का बड़े पैमाने पर उत्पादन

(B) केवल स्थानीय निर्वाह के लिए उत्पादन

(C) केवल जंगली पौधों का संग्रहण

(D) केवल पशुपालन

Answer: (A)

45. रोपण कृषि को कृषि का विशिष्टीकृत रूप क्यों कहा जाता है?

Why is plantation agriculture considered a specialized form of agriculture?

(A) केवल वन्य उत्पादों का संग्रहण

(B) केवल छोटे घरेलू खेतों में खाद्यान्न उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) बड़े क्षेत्र में चाय, कॉफी, रबर आदि विशेष फसलों का मुख्यतः व्यापारिक/निर्यात उद्देश्य से उत्पादन

Answer: (D)

46. निम्न में से कौन-सा रोपण कृषि का सही समूह है?

Which is the correct group of plantation crops?

(A) चाय, कॉफी, रबर

(B) गेहूँ, जौ, बाजरा

(C) चना, मसूर, मटर

(D) केवल घास और चारा

Answer: (A)

47. मिश्रित कृषि की सबसे उपयुक्त पहचान क्या है?

What best identifies mixed farming?

(A) फसल उत्पादन और पशुपालन का एक साथ होना

(B) केवल फल उत्पादन

(C) केवल पशुपालन

(D) केवल वन संग्रहण

Answer: (A)

48. ट्रक फार्मिंग मुख्यतः किससे संबंधित है?

Truck farming is mainly associated with:

(A) मरुस्थल में ऊँट पालन

(B) नगरीय क्षेत्रों के समीप साग-सब्जियों की कृषि

(C) पर्वतीय क्षेत्रों में याक पालन

(D) समुद्र में मत्स्य ग्रहण

Answer: (B)

49. उद्यान कृषि का प्रमुख स्थानिक संबंध किससे है?

What is the major locational association of horticulture mentioned in the source?

(A) केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कृषि

(B) केवल खनिज क्षेत्रों में कृषि

(C) नगरीय उपभोग केन्द्रों के समीप फल एवं फूलों की कृषि

(D) केवल समुद्र के भीतर कृषि

Answer: (C)

50. निम्न में से कौन-सा प्राथमिक आर्थिक गतिविधियों के बदलते स्वरूप को सबसे अच्छी तरह दर्शाता है?

Which best represents the changing nature of primary economic activities?

(A) प्रकृति से पूर्ण स्वतंत्रता

(B) निर्वाह से व्यापारिक एवं वैज्ञानिक उत्पादन की ओर बढ़ता विशिष्टीकरण

(C) प्राथमिक गतिविधियों का पूर्ण अंत

(D) केवल शिकार पर स्थायी निर्भरता

Answer: (B)

20. Meaning and Scope of Economic Geography (आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)

Meaning and Scope of Economic Geography

(आर्थिक भूगोल का अर्थ एवं विषय-क्षेत्र)



प्रश्न प्रारूप

Q. आर्थिक भूगोल को परिभाषित करते हुए इसके विषय-क्षेत्र एवं नूतन प्रवृतियों की विवेचना कीजिए।

Meaning and Scope of Economic

उत्तर- पृथ्वी मानव का घर है और मानव व पृथ्वी तल दोनों ही तथ्य अस्थिर एवं परिवर्तनशील हैं। पृथ्वी की भौतिक परिस्थितियों और मानव के कार्य-कलापों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन मानव भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है। आर्थिक भूगोल, मानव भूगोल की एक महत्वपूर्ण शाखा है। इस शाखा के जन्मदाता गोट्ज (1882) थे। इसके अध्ययन में हम मानव की आर्थिक क्रियाओं का ही अध्ययन करते हैं। मानव की आकांक्षाएं एवं आवश्यकताएं अत्यधिक असीमित और विविध हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मानव अनेक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा जिन वस्तुओं का उत्पादन नहीं कर सकता उनका क्रय करता है तथा अपने द्वारा उत्पादित वस्तुओं से उनका विनिमय करता है।

       प्रो. मेकफरलेन के अनुसार आर्थिक भूगोल के अध्ययन में हम मानव के आर्थिक प्रयत्नों पर भौगोलिक तथा भौतिक पर्यावरण के प्रभाव का अध्ययन करते हैं।

      प्रो. जी. चिशौल्म के अनुसार आर्थिक भूगोल में हम उन भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं जो वस्तुओं के उत्पादन, परिवहन तथा विनिमय को प्रभावित करती हैं।   

        इस अध्ययन के माध्यम से किसी प्रदेश अथवा क्षेत्र के भावी आर्थिक और व्यापारिक क्रियाओं पर पड़ने वाले भौगोलिक प्रभावों के अध्ययन का सम्मिलित प्रभाव भी जाना जाता है।

      सुप्रसिद्ध भूगोलवेत्ता हंटिंगटन जीविकोपार्जन प्रदान करने वाले सभी प्रकार के पदार्थों, साधनों, क्रियाओं, रीति-रिवाजों तथा मानव शक्तियों का अध्ययन आर्थिक भूगोल के क्षेत्र में मानते हैं।

       प्रो. शॉ के अनुसार मानव की आर्थिक क्रियाएं विश्व के उद्योगो, संसाधनों तथा औद्योगिक उत्पादन के अनुरूप होती हैं।

       इसी प्रकार डॉ. एन. जी. जे. पाउण्ड्स के अनुसार आर्थिक भूगोल भू-पृष्ठ पर मानव की उत्पादन क्रियाओं के वितरण का अध्ययन है।

      प्रो. रैयन तथा बैगस्टन के शब्दों में आर्थिक भूगोल के अध्ययन में विश्व के भिन्न-भिन्न भागों में मिलने वाले आधारभूत संसाधन एवं स्रोतों का अध्ययन किया जाता है। इन स्रोतों के शोषण पर पड़ने वाली भौतिक परिस्थितियों के प्रभाव की विवेचना की जाती है। विभिन्न प्रदेशों के आर्थिक विकास के अन्तर की व्याख्या की जाती है।

       भूगोल की अन्य शाखाओं की भांति आर्थिक भूगोल की विषय-वस्तु एवं विषय-क्षेत्र पर भूगोलवेत्ताओं के विचारों में पर्याप्त मतभेद रहा है। कुछ विद्वान मानव के भौतिक तथा सांस्कृतिक पर्यावरण के अध्ययन को अधिक महत्व देते हैं, तो कुछ मानव की आर्थिक क्रियाओं तथा जीविकोपार्जन के अनेकानेक साधनों के अध्ययन को मुख्य मानते हैं। संक्षेप में विश्व के विभिन्न भागों में मिलने वाले खनिज, कृषि, औद्योगिक साधनों का उत्पादन, उपभोग, वितरण, परिवहन तथा व्यापारिक अध्ययन आर्थिक भूगोल के अन्तर्गत किया जाता है।

         वर्तमान में मानव ने विज्ञान और तकनीक की सहायता से आशानुरूप विकास कर लिया है। मानव ने अपने आर्थिक क्षेत्र का विस्तार, समुद्र, भू-गर्भ और अन्तरिक्ष तक कर लिया है। व्यावहारिक जगत में आर्थिक भूगोल के अध्ययन का अत्यधिक महत्व है; इसके अध्ययन के माध्यम से कृषक, श्रमिक, व्यापारी, उद्योगपति तथा राजनीतिज्ञ सव ही लाभान्वित होते हैं।

         विभिन्न देशों को अपनी आर्थिक क्षमता बढ़ाने तथा विकास की भावी योजनाओं के निर्माण में आर्थिक भूगोल के अध्ययन को आधार बनाना पड़ता है। किसी प्रदेश के आर्थिक साधनों का उच्चतम सीमा तक विकास कर वहां की बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए जीविकोपार्जन के साधन सुलभ किए जा सकते हैं। किसी देश की अर्थव्यवस्था को सन्तुलित तथा मानव शक्ति को उत्पादन क्रिया से सम्बद्ध करने में आर्थिक भूगोल का योगदान बड़ा महत्वपूर्ण होता है।

        मानव की आधुनिक अनुसन्धान एवं अन्वेषण की प्रवृत्ति ने मानव के आर्थिक क्रिया-कलापों को और अधिक विस्तृत बना दिया है।

        इस विषय की मुख्य संकल्पनाएँ निम्नलिखित हैं-

(1) आर्थिक भू-दृश्य:-

     इसमें किसी प्रदेश के आर्थिक व्यक्तित्व को अभिव्यक्त किया जाता है। मानव द्वारा प्राकृतिक साधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया जाता है।

(2) गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य:-

     इस संकल्पना में सदैव परिवर्तन एवं विकास के तत्व को महत्व दिया गया है। जहां आर्थिक भू-दृश्य भूतकाल के आर्थिक कार्यों का परिणाम है, वहां गत्यात्मक आर्थिक भू-दृश्य पुरोगामी और भावी विकास की सम्भावनाओं को व्यक्त करता है।

(3) वर्तमान आर्थिक भू-दृश्य:-

     ये संसाधन, संरचना, आर्थिक विकास एवं आर्थिक प्रक्रिया द्वारा उपलब्धि के परिचायक हैं। वहां की आर्थिक स्थिति को विकासावस्था स्तर भी प्रकट करते हैं। युवावस्था में संसाधनों के शोषण के अवसर उपलब्ध रहते हैं; चरमोत्कर्ष की परिपक्व अवस्था में संसाधनो के उच्चतम उपभोग एवं वृद्धावस्था में विकास की अवरुद्ध एवं धीमी प्रगति के आसार दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

(4) आर्थिक क्रिया-कलापों की स्थिति में सिद्धान्तों और नियमों के आधार पर स्थिति-स्थापना तथा वितरण की व्याख्या की जाती है। इसमे विषय-वस्तु उपागम तथा प्रादेशिक उपागम को आधार बना कर अध्ययन किया जाता है।

(5) क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नता के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं जैविक भिन्नता के अन्तर के परिणामस्वरूप उपलब्धि के स्तर में भी भिन्नता मिलती है।

(6) क्षेत्रीय क्रियात्मक अन्योन्यक्रिया में विभिन्न प्रदेशो में विचित्र-सा पारस्परिक क्रियात्मक अन्तर सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है। यह सम्बन्ध लम्बवत् और क्षैतिज दोनों प्रकार का होता है।

(7) भू-दृश्यों का क्षेत्रीय कार्यात्मक सगठन संकेन्द्रीय और समान दोनों प्रकार का होता है। इसमें पारस्परिक सम्बन्ध कहीं स्पष्ट तो कहीं अस्पष्ट होता है। अस्पष्ट सम्बन्धों को परिवहन और संचारवाहन से सम्बद्ध किया जाता है।

(8) क्षेत्रीय आर्थिक विकास संकल्पना में विकास की तुलना, अन्य प्रदेशों से सांस्कृतिक तथा तकनीकी प्रगति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार पर की जाती है। प्रगति के लिए क्षेत्र विशेष के आर्थिक संसाधनों के विकास पर अधिकाधिक बल दिया जाता है।

आर्थिक भूगोल के अध्ययन उपागम एवं विधियाँ

(APPROACHES AND METHODS OF ECONOMIC GEOGRAPHY)

     आर्थिक भूगोल के सन्तुलित अध्ययन के लिए कई उपागमों व अध्ययन विधियों का प्रयोग किया जाता है, जो कि एक-दूसरे की पूरक हैं। निम्नांकित चार उपागम अध्ययन दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

(1) वस्तुगत उपागम (Commodity Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत विभिन्न वस्तुओं, जैसे- गेहूं, चावल, गन्ना, लोहा, पेट्रोलियम आदि के उत्पादन एवं वितरण का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है। किन्तु कुछ विद्वान इस उपागम में वस्तुओं के उत्पादन एवं वितरण का विश्लेषण न करके व्यवसाय का वितरण और विश्लेषण करते हैं। जैसे- कृषि व्यवसाय, वस्तु संग्रह एवं आखेट व्यवसाय, खनन व्यवसाय, उद्योग आदि। इस कारण इस उपागम को ‘व्यवसाय उपागम’ (Occupational Approach) भी कहा जाता है।

(2) प्रादेशिक उपागम (Regional Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत सर्वप्रथम विश्व को कुछ बृहत् प्राकृतिक प्रदेशों में विभक्त कर लिया जाता है और प्रत्येक प्रदेश के प्राकृतिक वातावरण तथा विभिन्न वस्तुओं के वितरण प्रतिरूप का अध्ययन एवं विश्लेषण किया जाता है।

(3) सैद्धान्तिक उपागम (Theoretical Approach):-

      इस उपागम के अन्तर्गत किसी भी वस्तु या प्रदेश की विशेषताओं एवं वितरण प्रतिरूप का अध्ययन पूर्व निर्धारित सिद्धान्तों के सन्दर्भ में किया जाता है। इस अध्ययन विधि से मुख्यतः सिद्धांतों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण माना जाता है, न कि वितरण प्रतिरूप का विश्लेषण करना।

(4) क्रमबद्ध उपागम (Systematic Approach):-

     इस उपागम के अन्तर्गत वस्तुओं के वितरण की सामान्य विशेषताओं का क्रमबद्ध विश्लेषण किया जाता है। यह क्रमबद्ध अध्ययन तीन चरणों में सम्पन्न किया जाता है:-

(1) प्रथम चरण में किसी भी वस्तु की स्थिति तथा वितरण के प्रतिरूप का अध्ययन किया जाता है।

(ii) द्वितीय चरण में उस वस्तु विशेष की विशेषताओं का अध्ययन किया जाता है।

(iii) तृतीय चरण में उस वस्तु का अन्य प्राकृतिक एवं मानवीय तत्वों से सम्बन्ध का विश्लेषण किया जाता है। ये अन्तर्सम्बन्ध ‘कार्यकरण सम्बन्ध’ (Cause and Effect Relationship), ‘क्रियात्मक सम्बन्ध’ (Functional Relationship) तथा ‘क्षेत्रीय सम्बन्ध’ (Areal Relationship) के रूप व्यक्त किए जाते हैं।

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world (विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)

19. The Chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताएँ तथा वितरण)



प्रश्न प्ररूप

Q. Discuss the chief characteristics and distribution of Plantation agriculture in the world.

(विश्व में बागानी या रोपण कृषि की मुख्य विशेषताओं तथा वितरण का वर्णन करें।)

उत्तर- बगानी या बगाती या रोपण कृषि, कृषि का एक विशिष्टीकृत रूप है जो मुख्य रूप से उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ही की जाती है। इस प्रकार की कृषि में कोई एक ही फसल उत्पन्न की जाती है। यह फसल भी मुख्य रूप से बाजारों में बिक्री के लिए की जाती है। इन फसलों में रबड़, चाय, कहवा, गन्ना, केला, नारियल आदि प्रमुख हैं। इस प्रकार की कृषि को एक फसली (One-crop Mono-Culture) की खेती कहते हैं। कुछ विद्वान गन्ने को भी बगानी फसल मानते हैं किन्तु वास्तव में गन्ना बगानी फसल नहीं है।

बगानी कृषि के क्षेत्र-

(i) पश्चिमी द्वीप समूह में क्यूबा, जमाइका, पोर्टिरिको, आदि

(ii) मध्य अमेरिका में होण्डुरस, ग्वाटेमाला त्तथा कोस्टारिका

(iii) पश्चिमी अफ्रिका के गिनीतट, घाना आदि।

(iv) दक्षिण अफ्रिका में नेटाल आदि

(व) दक्षिणी एशिया में द० भारत, श्रीलंका, मलेशिया, इन्डोनेशिया आदि।

(vi) आस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड क्षेत्र।

       इस प्रकार की रोपण (Plantation) कृषि में मुख्य रूप से यूरोपीय लोगों की पूँजी तथा प्रबंध क्षमता लगी हुई है। इस प्रकार की कृषि में मूल निवासी लोग श्रमिकों का काम करते हैं। इस प्रकार की कृषि प्रणाली में फसलों के उत्पादन में बहुत से प्रक्रम (Processes) ऐसे होते हैं जिनके लिए बड़ी सावधानी की आवश्यकता होती है। इस कृषि की विधियाँ बहुत ही दक्षतापूर्ण और वैज्ञानिक होती हैं। इसकी फसलों के लिए वैज्ञानिक प्रणाली तथा सावधानी बरती जाती है। इसके पौधे काफी नाजुक होते हैं।

     रोपण (Plantation) कृषि में उन फसलों का उत्पादन होता है जिसके पदार्थों के माँग पिछले दो शताब्दियों में नगरीय संस्कृति के विकास के साथ-साथ बढ़ती गई है। आज की वर्तमान आधुनिक दुनिया में पेय पदार्थों का महत्व बहुत बढ़ गया है। इनमें चाय, कॉफी, कोको काफी लोकप्रिय हो गए हैं। विश्व के उन्नत देशों में इन पदार्थों की काफी माँग है।

रोपण कृषि की विशेषताएँ-

     रोपण कृषि की कुछ मूलभूत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-

(i) यह एक फसली (Mono culture) कृषि है। इसमें एक ही फसल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

(ii) इसमें अधिक पूँजी, उच्च प्रबंध और वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग किया जाता है।

(iii) इसकी फसलें केवल बिक्री द्वारा मुद्रा प्राप्त करने के लिए उत्पन्न की जाती है।

(iv) अधिकतर उत्पादन व्यापार के लिए होता है। स्थानीय क्षेत्रों में इसका उपभोग बहुत ही, कम होता है।

(v) इसके अन्तर्गत खेत (Holdings) बहुत विस्तृत तथा खेती बड़े पैमाने पर की जाती है।

(vi) इसमें मानव श्रम की अधिक आवश्यकता पड़ती है।

(vii) इस कृषि पर बाजार-माँग की घट-बढ़ का और मूल्य में उतार-चढ़ाव का गहरा प्रभाव पड़ता है।

(viii) इस प्रकार की कृषि के लिए भारी पूँजी की आवश्यकता होती है क्योंकि रख-रखावों,, प्रक्रिया तथा यातायात में काफी खर्च पड़ता है।

(ix) इस कृषि की फसलों में बीमारी लगने का काफी भय रहता है। अतः फसल के खराब होने से बहुत हानि होती है।

(x) इस कृषि का बाजार सम्पूर्ण विश्व के नगरों में फैला हुआ है। अतः ग्रह फसल नगरीय सभ्यता तथा संस्कृति का द्योतक है।

(xi) यह एक महत्त्वपूर्ण मुद्रादायिणी फसल है।

     इस प्रकार की फसलों का उत्पादन प्रायः विकासशील या अविकसित क्षेत्रों में होता है। जैसे दक्षिणी अमेरिका, मध्य अफ्रिका, तथा दक्षिणी एशिया के अधिकतर देश या तो विकासशील हैं या अविकसित हैं, परन्तु इसका बाजार अधिकतर विकसित देशों के महानगरों में से है।

      इसका मुख्य खरीददार U.S.A., कनाडा तथा यूरोपीय महादेश के देश हैं। आस्ट्रेलिया भी इसका अच्छा बाजार है। इस प्रकार इसका उत्पादन उष्ण कटिबंधीय देशों में तथा इनकी बिक्री समशीतोष्ण तथा शीत प्रदेशों में है। उदाहरणस्वरूप विश्व में चाय का सबसे बड़ा निर्यातक भारत, श्रीलंका है। कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ब्राजील है। परन्तु सबसे बड़ा आयातक U.S.A. तथा यूरोप के देश हैं।

विश्व में बगानी कृषि की फसलें तथा उनके क्षेत्र-

(1) रबड़- मौनसून एशिया में मलेशिया, इन्डोनेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, हिन्दचीन के देश- सिंगापुर, फिलीपीन, अफ्रिका- गिनी तट के देश घाना, नाइजीरिया, आइवरी कोस्ट आदि तया दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील। 

(2) चाय- मौनसून एशिया में चीन, भारत, श्रीलंका, जापान, बंगलादेश, इन्डोनेशिया, मलेशिया आदि पश्चिमी एशिया में ईरान, दक्षिणी रूस आदि, अफ्रिका में केन्या, जायरे, जाम्बिया, तंजानियाँ आदि दक्षिणी अमेरिका में अर्जेन्टिना तथा ब्राजील।

(3) नारियल- दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देश- इन देशों के समुद्र तटीय प्रदेश, भूमध्यरेखीय अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के तटीय प्रदेश।

(4) कहवा- दक्षिणी अमेरिका में ब्राजील, कोलम्बिया, इक्वेडोर, वेनेज्वेला तथा पेरू, अफ्रिका में गिनी तट के देश-आइवरी कोस्ट, घाना, अंगोला, उगाण्डा, एथियोपिया, जैसे आदि तथा मौनसून एशिया में भारत, हिन्दचीन आदि।

(5) केला- मौनसून एशिया में भारत, फिलीपिन, हिन्देशिया, मलेशिया, सिंगापुर और अफ्रिका तथा दक्षिणी अमेरिका के भूमध्यरेखीय प्रदेश शामिल है।

(6) मसालें- मौनसून एशिया में भारत, श्रीलंका, मलेशिया तथा तंजानियाँ आदि। तंजानियाँ में जंजीवार द्वीप लौंग के उत्पादन के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

(7) कोको- इसका सबसे बड़ा उत्पादक अफ्रिका महादेश है। इसमें अपर वोल्टा, घाना, नाइजीरिया आदि हैं। कोको का कुछ उत्पादन दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील में भी होता है।

9. Rostow’s Economic Development Model (रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)

9. Rostow’s Economic Development Model

(रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)



    Rostow

       रोस्तोव मूलतः एक इतिहासकार थे जिन्होंने ऐतिहासिक अर्थशास्त्रों के रूप में आर्थिक-सामाजिक विकास से संबंधित एक बहुस्तरीय मॉडल प्रस्तुत किया। यह मॉडल 1971 ई० में रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह मॉडल 5 चरणों में विभक्त है-

   रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत आर्थिक विकास के इस मॉडल के अनुसार सभी देश एक साथ और एक समान आर्थिक विकास नहीं कर पाते हैं अर्थात् यह मॉडल स्थान और समय के संदर्भ में विभिन्न देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास की व्याख्या करता है। इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे- भारत (1947) और द० कोरिया (1948) क्षेत्रों लगभग एक ही समय आजाद हुए। लेकिन विकास के दृष्टिकोण से द० कोरिया की अर्थव्यवस्था विकसित देशों के समतुल्य पहुँच गई। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विकासशील अवस्था से गुजर रहा है।

      रोस्तोव ने सामाजिक आर्थिक विकास की व्याख्या करने हेतु 5 स्तरीय विकास का मॉडल निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है।

आर्थिक विकास की अवस्था सामाजिक-आर्थिक स्थिति
(1) प्रथम अवस्था जीवन निर्वाह की अवस्था / अर्थव्यवस्था
(2) द्वितीय अवस्था विकास के पूर्व की अवस्था
(3) तृतीय अवस्था तीव्र विकास की अवस्था
(4) चतुर्थ अवस्था आर्थिक प्रौढ़ावस्था
(5) पंचम अवस्था उपभोक्ता वस्तुओं की तीव्र उपयोग की अवस्था

    रोस्तोव ने बताया कि कोई भी देश उपरोक्त 5 अवस्थाओं से गुजरकर ही विकास के चरम अवस्था को प्राप्त करते हैं।

    रोस्टोव ने प्रत्येक अवस्था की विशेषता निम्न प्रकार से बताया

(1) प्रथम अवस्था की विशेषता 

       यह परम्परागत समाज की विशेषता है। इस अवस्था से गुजरने वाले समाज अनुत्पादक कार्यों पर धन अधिक खर्च करहे हैं। अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह की होती है। कुल GDP का 1/3 भाग खाद्य पदार्थों पर खर्च किया जाता है। साक्षरता, स्वास्थ्य और नियोजित कार्यों का अभाव होता है। लोगों को राज्य के द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम की जानकारी कम होती है। देश की सरकारें सुरक्षा और धार्मिक कार्यों पर अधिक खर्च करते हैं। राज्य में निराशा का वातावरण होता है। अनेक प्रकार के सामाजिक-धार्मिक तनाव व्याप्त होते है। भारत के पड़ोसी देश म्यानमार, अफगानिस्तान, मध्य अफ्रीकी देश और उप सहारा के देश की आर्थिक व्यवस्था इसी अवस्था से गुजर रही है।

(2) दूसरी की अवस्था की विशेषता

       रोस्तोव ने बताया कि जिस देश की अर्थव्यवस्था दूसरे चरण गुजर रही होती है। वैसे देशों में एक ऐसे अभिजात वर्ग का उदय होता है जो नवोत्पाद या नयी तकनीक को प्राश्रय देता है। इस अवस्था से गुजरने वाले देश की सरकार अधिकत्तर धन परिवहन, संचार और संरचनात्मक सुविधाओं पर खर्च करते हैं। एक देश के अन्दर विकास दृष्टिकोण से अन्तः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दिखायी देती है अर्थात् कुछ क्षेत्र विकसित हो जाते है और कुछ क्षेत्र पिछड़े ही रह जाते है। भारत, चीन, मैक्सिको ब्राजील द० अफ्रीका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

(3) तीसरा अवस्था की विशेषता

      तीसरा अवस्था से गुजरने वाले देशों में विकास का कार्य खण्डीय होता है। रोस्तोव ने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए बताया है कि आर्थिक विकास के तीसरे चरण में पहले वस्त्र उद्योग, उसके बाद रेलवे परिवहन अंतत: दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है। ये ऐसे उद्योग है जिनके विकास के लिए न विशिष्ट तकनीक की आवश्यकता है और न ही विशेष निवेश की। लेकिन इन तीनों के विकास से समाज का विकास त्वरित गति से होता है। रोस्तोव ने बताया कि तीसरे अवस्था को जलविभाजक से तुलना की जा सकती है। इस अवस्था से कोई भी देश 20-30 वर्षों तक गुजरता है। तीसरे अवस्था से गुजरने के बाद राज्य के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का कायाकल्प हो जाता है।

       मलेशिया ने 2020 का नारा दिया। भारत ने “विजन 2020” का नारा दे रहा है ताकि एक नियत समय के बाद में देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायें। मध्य अमेरिकी देश, इजराइल, द. कोरिया जैसे देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(4) चौथा अवस्था

     चौथा अवस्था को प्रौढ़ावस्था से सम्बोधित किया गया है। इस अवस्था से गुजरने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पूर्णरूपेण विकसित होती है। देश में अकाल, भूखमरी इत्यादि की समस्या समाप्त हो जाती है। प्रति व्यक्ति आय अति उच्च होता है। आधुनिक तकनीक का बोलबाला होता है। प्रशिक्षित वर्ग का एक विशिष्ट श्रमिक समूह उभरकर सामने आता है। उत्पादन के कार्यों में निवेश अधिक से अधिक किया जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं पर अधिक-से-अधिक खर्च किया जाता है। द० एवं पूर्वी यूरोप के अधिकतर देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। 

(5) पाँचवाँ अवस्था की विशेषता

    पाँचवाँ अवस्था से गुजरने वाले देशों में उपभोक्ता वस्तुओं की माँग अधिक होती है। लोग नवीन उत्पाद को खरीदने के लिए बेचैन रहते है। प्रति व्यक्ति आप अधिक होती है। समाज का मशीनीकरण और वैज्ञानिकरण हो जाता है। सामूहिक भावना कमजोर पड़ने लगती है। व्यक्तिवादिता का विकास अधिक हो जाता है। विश्व के आज नगरीय समाज, जापान, अमेरिका सिंगापुर, फ्रांस, इंगलैण्ड, जर्मनी जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

    रोस्तोव ने बताया है कि सभी देशों की अर्थव्यवस्था इन 5 अवस्थाओं से होकर गुजरती है। इन्होंने USA के संदर्भ में उदाहरण देते हुए बताया है कि 1800 ई० के पहले प्रथम अवस्था से 1800- 50 ई० के बीच द्वितीय अवल्या से, 1850-75 to 1बीच तृतीय अवस्थत से, 1875 – 1925 के बीच चतुर्थ अवस्था से और 1925 के बाद पाँचवाँ अवस्था ये गुजर रही है।

आलोचना

      रोस्तोव के इस मॉडल की कई आधारों पर आलोचना भी की गई। जैसे:-

(1) अरब देशों पर यह मॉडल बिल्कुल लागू नहीं होती क्योंकि वहाँ प्रति व्यक्ति आय अधिक है लेकिन सरकार अधिकतर खर्च सुरक्षा और धार्मिक कार्य पर करती है।

(2) इस मॉडल में कहा गया है कि एक दीर्घ अवधि के बाद ही तीव्र विकास की अवस्था प्रारंभ होती है जो गलत है क्योंकि कई ऐसे देश हैं जो आधुनिक तकनीक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर विकास के कार्यों को तीव्र कर चुके है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस मॉडल की अपवादवश कुछ सीमाएँ अवश्य है, इसके बावजूद यह मॉडल अधिकांश देशों के संदर्भ में उपयोगिता रखता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. रोस्तोव के आर्थिक विकास अवस्था मॉडल का सामालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा अपने उत्तर के पुष्टि में उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करें। (UPSC, 2003)

8. The Distribution & Production of Copper in World (विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)

8. The Distribution & Production of Copper in World

(विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन)



    Production of Copper

       ताँबा एक ऐसी धातु है जिसका प्रयोग अति प्राचीन काल से मानव समाज करता आ रहा है। ईसा से हजारों वर्ष पूर्व मानव समाज को ताँबे का ज्ञान प्राप्त हो गया था जिसके आधार पर उस युग को ताँब युग के नाम से जाना जाता है। आज से 6000 वर्ष पूर्व ताँबे का प्रयोग बर्तन और हथियार बनाने के लिए मिस्र तथा मेसेपोटामिया में होने लगा था।

      आधुनिक युग में ताँबे का विभिन्न कार्यों में प्रयोग होता है। इसका सबसे गुणकारी प्रयोग बिजली के उपकरणों में होता है क्योंकि वह सबसे अच्छा जंग रहित विद्युत उपचालक धातु है। इसके अतिरिक्त मोटरगाड़ी, रेल इन्जन, वायुयान आदि में प्रयोग होता है। इसका प्रयोग अन्य धातुओं के साथ मिश्रण करके भी किया जाता है। औसतन 40 प्रतिशत ताँबा बिजली के सामान, 45 प्रतिशत मशीन और 4.5 प्रतिशत अन्य धातुओं के साथ मिश्रण कर प्रयोग किया जाता है।

         प्रधानतः शुद्ध रूप, ताँबा ऑक्साइड, सल्फाइड कार्बोनेट, क्लोराइड आदि रूपों में पाया जाता है। अब शुद्ध रूप में बहुत कम ताँबा प्राप्त होता है। अतः अनेक खनिजों और चट्टानों के साथ मिश्रित रूप में पाया जाता है। ताँबे के साथ सीसा, जस्ता, टिन, सोना, चाँदी और निकेल भी पाये जाते हैं।

विश्व वितरण एवं उत्पादन

        ताँबे के उत्पादन में बहुत अधिक क्षेत्रीय उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन विश्व स्तर पर इसका उत्पादन निरन्तर बढ़ता रहा है। 1957 में विश्व का उत्पादन मात्र 3412 हजार मीट्रिक टन था जो बढ़कर 1964-65 में 5400 और 1978 में 7890 मीट्रिक टन हो गया। 1986-87 में विश्व का उत्पादन बढ़कर 9223 हजार मीट्रिक टन था, जो 1990 में घटकर 8969 हजार मीट्रिक टन रह गया, परन्तु 2006 में पुनः उत्पादन बढ़कर 15100 हजार मीट्रिक टन हो गया।

         ताँबा के संचित भण्डार के दृष्टिकोण से चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, जाम्बिया, जायरे, पेरू, पूर्व सोवियत संघ और कनाडा अग्रणी देश हैं। उत्पादन में चिली, संयुक्त राज्य अमेरिका, इण्डोनेशिया, पेरू, आस्ट्रेलिया, रूस, चीन, कनाडा, पोलैण्ड और जाम्बिया अग्रणी देश हैं, जो विश्व का 83 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करते हैं।

अमेरिकी देश:

        तांबे के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका हमेशा प्रथम स्थान पर रहा है। 1948 में यहाँ विश्व का 37 प्रतिशत ताँबा उत्पादन हुआ था लेकिन अन्य देशों में उत्पादन वृद्धि के कारण 1977 में उसकी विश्व में सापेक्षिक स्थिति घट कर 17 प्रतिशत पर पहुँच गयी। 2006 में यहाँ विश्व का 8.1 प्रतिशत उत्पादन हुआ था। यहाँ का प्रथम उत्पादन मिशिगन के केवीन अन्तरीप में शुरू हुआ। यद्यपि वहाँ का ताँबा निम्न कोटि का है।

        यहाँ का दूसरा महत्त्वपूर्ण उत्पादक क्षेत्र मोण्टाना राज्य का बुट्टा क्षेत्र है, जो न केवल संयुक्त राज्य अमेरिका अपितु विश्व में अग्रणी उत्पादक है। यहाँ ताँबे के साथ सोना, सीसा, मँगनीज और जस्ता भी निकाला जाता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को सबसे अधिक ताँबा सम्पन्न क्षेत्र कहा जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में एरिजोना राज्य का मोरेन्सी और सान मैनुअल क्षेत्र, नेवेदा राज्य का एली एवं एरेग्टन क्षेत्र तथा ऊटा का विघन क्षेत्र प्रमुख हैं।

कनाडा:-

     विश्व का लगभग 4.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। 2006 में यहाँ 607 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित हुआ था। इसका अधिकांश उत्पादन चार क्षेत्रों से प्राप्त होता है, यथा- आन्टोरिया राज्य का साइबरी क्षेत्र जो देश के कुल उत्पादन का पचास प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ देश का बीस प्रतिशत ताँबे के भण्डार है। इस क्षेत्र से ताँबे के साथ निकेल भी उत्खनित होता है।

       दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र नोरन्दा रोना क्षेत्र है जो देश का बीस प्रतिशत से अधिक तांबा उत्पादित करता है। यहाँ ताँबा और सोना साथ-साथ प्राप्त किये जाते हैं। तीसरा क्षेत्र मैनीटोवा, सस्कैचवान है। फ्लिन-फ्लोन क्षेत्र तथा बैरोबर के उत्तर में स्थित ब्रिटेनिया में भी अच्छे किस्म का ताँबा उत्पादित होता है। यह विश्व का आठवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है।

मैक्सिको:-

      मैक्सिको विश्व का सोलहवाँ बड़ा ताँबा उत्पादक देश है। 2006 में इसका योगदान लगभग 1.0 प्रतिशत था।

चिली:-

      चिली तीव्र उत्पादन के कारण यह विश्व का प्रथम बड़ा ताँबा उत्पादक देश बन गया है। 2006 में यहाँ विश्व का 35.5 प्रतिशत ताँबा उत्पादित हुआ था। यहाँ की ताँबा की खानें चिक्वकामाटा एवं तेनियेन्स, एल सल्वाडोर एवं अफ्रीकाना से देश का नब्बे प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। चिक्वकामाटा की खान विश्व की बृहत्तम खानों में से एक है। यहाँ एक अरब मीट्रिक टन से अधिक ताँबा भण्डार है।

      मध्य चिली में स्थित एलतेनियेन्स की खान विश्व की सबसे गहरी खान है। चिली के अन्य उत्पादक क्षेत्रों में पोमेटिलोज का हनाम क्षेत्र भी विशेष उल्लेखनीय है। यहाँ का अधिकांश ताँबा निर्यात किया जाता है, जिससे देश को प्राप्त होने वाली आधी विदेशी मुद्रा ताँबे से प्राप्त होती है।

पेरु:-

       यह विश्व का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रति वर्ष 1050 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है, जो विश्व का 7.0 प्रतिशत है। यहाँ का प्रमुख ताँबा उत्पादन क्षेत्र सेहों पास्को रहा है जहाँ का भण्डार अब समाप्त होने लगा है। दूसरा प्रमुख क्षेत्र टोक्वे माला के समीप स्थित है, जो एण्डीज पर्वत पर लगभग 3000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अनुमानतः यहाँ पैंतालीस करोड़ मीट्रिक टन ताँबा का भण्डार है।

यूरोप के देश:-

      यूरोप के देशों में विश्व का लगभग दस प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ के प्रमुख उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ, पोलैण्ड, जर्मनी और बेल्जिम आणी हैं जो यूरोप का लगभग 60 प्रतिशत और विश्व का 10 प्रतिशत शुद्ध ताँबा उत्पादित करते हैं

पूर्व सोवियत संघ:-

       विश्व के ताँबा उत्पादकों में पूर्व सोवियत संघ का दूसरा स्थान रहा है। यहाँ प्रतिवर्ष विश्व का 15 प्रतिशत से अधिक ताँबा उत्पादित होता रहा है। सोवियत संघ का ताँबा उत्पादन बहुत तेजी से बढ़ा है क्योंकि 1948 में यहाँ का उत्पादन विश्व का मात्र 5.3 प्रतिशत था। यहाँ विश्व का केवल 2.4 प्रतिशत संचित भण्डार है जिसका तीन चौथाई कजाकिस्तान में बालकश झील के पास स्थित है।

       पूर्व सोवियत संघ का संचित भण्डार धातु सम्पन्नता के दृष्टिकोण से उतना अच्छा नहीं है। यह क्षेत्र देश के उत्पादन का आधा से अधिक ताँबा उत्पादित करता है। यहाँ की दो खाने झेज्कागान एवं केनराड विशेष उल्लेखनीय है। सोवियत रूस के अन्य उत्पादकों में दक्षिणी-पश्चिमी यूराल क्षेत्र, उत्तरी साइबेरिया का नोरिल्स्क क्षेत्र तथा आर्मेनिया में कदझरान है, जहाँ से देश का क्रमश: 15, 25 और 15 प्रतिशत ताँबा प्राप्त किया जाता है।

       सोवियत संघ के विघटन के बाद कजाकिस्तान अब विश्व का 3.0 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करने लगा हैं। उज्बेकिस्तान का आल्मोलिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण उत्पादक बनता जा रहा है। रूस में अधिकांश ताँबा खानों के पास ताँबा साफ करने का कारखाने स्थापित किये गये हैं। अभी हाल में पूर्वी साइबेरिया के उडेनाक निक्षेपण का पता चला है। देश के विघटन से इसकी स्थिति बदल गयी है। रूस का ताँबा उत्पादन देश के विघटन के बाद घटकर 640 हजार मीटरी टन रह गया है।

अफ्रीका के प्रमुख उत्पादक देश:-

     ताँबा उत्पादन में अफ्रीका महाद्वीप में जिम्बावे, जायरे और दक्षिणी अफ्रीका संघ का योगदान मात्र 4 प्रतिशत के लगभग है, जबकि इनका संचित भण्डार ग्यारह प्रतिशत से अधिक है।

जाम्बिया:-

      विश्व का 9वाँ बड़ा उत्पादक है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 503 हजार मीटरी टन ताँबा उत्पादित किया जाता है जो विश्व उत्पादन का लगभग 3.3 प्रतिशत है। यहाँ के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मुफिल आरा अग्रणी है, जहाँ से देश का आधा से अधिक ताँबा प्राप्त किया जाता है। यहाँ ताँबे की धातु सम्पन्नता दो से पाँच प्रतिशत होती है।

        यहाँ के अन्य उत्पादकों में चिबुलुमा एवं रोकाना क्षेत्र विशेष उल्लेखनीय हैं। यहाँ की सबसे बड़ी खान रोना एण्टीलोप में है जहाँ ताँबा गलाने का विशाल कारखाना है। यहाँ का अधिकांश ताँबा जापान, भारत, चीन आदि देशों को निर्यात किया जाता है।

जायरे:-

      अफ्रीका का दूसरा और विश्व का सत्रहवीं उत्पादक देश है जहाँ प्रतिवर्ष 131 हजार मीट्रिक टन ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का विशाल ताँबा भण्डार कटांगा प्रदेश में है, जो विश्व प्रसिद्ध है। बेल्जियन इसी ताँबे के मोह में भौतिक विपत्तियों को झेलते रहते हैं।

        यहाँ 400 किमी० लम्बा और 80 किमी० चौड़ा भू-क्षेत्र है जिसमें ताँबा भण्डार सुरक्षित है, जो कटांग से जाम्बिया तक फैला है। यहाँ उत्खनन कार्य बहुत कठिन है क्योंकि परिवहन से लेकर जलवायविक कठिनाइयों तक ही बड़ी बाधाएँ हैं। यहाँ का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जाता है।

दक्षिणी अफ्रीका संघ:-

      अफ्रीका का तीसरा बड़ा उत्पादक देश है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग 90 हजार मीट्रिक टन से अधिक ताँबा उत्पादित होता है। यहाँ का अधिकांश तथा केपप्रान्त कान कोडिया एवं ओकोप क्षेत्र तथा केपप्रान्त के मेसिना क्षेत्र से प्राप्त किया जाता है। इस देश का अधिकांश उत्पादन निर्यात किया जा रहा है। बोत्सवाना, मारुतानिया, मोरक्को व जिम्बाबे, अफ्रीका के अन्य प्रमुख तांबा उत्पादक देश है।

एशिया के तांबा उत्पादक देश:-

         एशिया में विश्व का एक-चौथाई ताँबा उत्पाद होता है। यहाँ के प्रमुख तांबा उत्पादकों में चीन (4.3 प्रतिशत), इण्डोनेशिया (5.4 प्रतिशत), ईरान, जापान, दक्षिणी कोरिया और भारत विश्व के प्रमुख देश बने हुए हैं।

      जापान, दक्षिणी कोरिया और चीन अपनी पूरी आवश्यकता घरेलू उत्पादन से पूरा करते हैं, जबकि भारत ताँबे को आयात करना पड़ता है। भारत विश्व उत्पादकता का मुश्किल से 1 प्रतिशत ताँबा उत्पादित करता है। भारत में तांबे का उत्पादन झारखण्ड के सिंहभूमि एवं हजारीबाग क्षेत्रों में होता है। इ

         सके अतिरिक्त राजस्थान में खेतरी कर्नाटक में चित्तलदुर्ग एवं हासन, आंध्र प्रदेश में नेलोर, कुर्नूल, अनन्तपुर एवं गुन्दूर मध्य प्रदेश में जबलपुर, बालाघाट, होशंगाबाद, सागर एवं बस्तर और उत्तराचल में गढ़वाल, देहरादून एवं अल्मोड़ा जनपदों में ताँबा भण्डार मिला है। भारत का उत्पादन अपनी आवश्यकता से बहुत कम है, जिसके कारण विदेशों से आयात करना पड़ता है। फिलीपीन्स भी एक प्रमुख उत्पादक देश है जिसका अधिकांश उत्पादन अमेरिका एवं जापान को निर्यात किया जाता है। 

       ताँबा उत्पादन में आस्ट्रेलिया तेजी से आगे बढ़ रहा है। यहाँ क्वीन्सलैण्ड, न्यूसाउथवेल्स और पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ताँबे का भण्डार मिला है। आस्ट्रेलिया एक महत्त्वपूर्ण निर्यातक बनता जा रहा है। 2006 में इसका उत्पादन 875 मीटरी टन था, जो विश्व उत्पादन का 5.8 प्रतिशत है।

विश्व व्यापार

       ताँबे का विश्व व्यापार बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि सभी देशों को इसकी आवश्यकता है। विकसित देशों में तो इसकी सबसे अधिक खपत है। विश्व के निर्यातकों में चिली, जिम्मबावे, कनाडा, जाम्बिया, जायरे, मैक्सिको विशेष उल्लेखनीय हैं। आयतकों में ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, फ्रान्स, रूस, भारत, आदि का नाम अग्रणी है।

प्रश्न प्रारूप

1. विश्व में ताँबा के वितरण एवं उत्पादन पर प्रकाश डालें।

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