6. The Concept of Regional Development (प्रादेशिक विकास की अवधारणा)

6. The Concept of Regional Development

(प्रादेशिक विकास की अवधारणा)



        Regional Development

             भूगोल की संकल्पना में प्रदेश अन्तर्निहित है। वास्तव में प्रदेश भूगोल की आत्मा है। प्रदेश का गठन, उसका संगठन, गत्यात्मकता और विकास ऐसे शब्द हैं, जिनकी उल्लेख भूगोल की प्रत्येक शाखा में किया गया है। कहीं यह उल्लेख प्रत्यक्ष होता है, तो कहीं परोक्ष।

         एक क्षेत्रीय विज्ञान के नाते तथा पृथ्वी सतह से सम्बन्धित होने के कारण भूगोल में मनुष्य एवं पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्ध का अध्ययन किया जाता है। कहीं प्रदेश विधि अथवा उपागम के रूप में स्पष्ट होता है, कहीं किसी प्रदेश का क्रमबद्ध विधि से अध्ययन होता है अथवा क्रमबद्ध अध्ययन का आधार ही प्रदेश है। अतः भूगोल एवं प्रादेशिक विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

         पर्यावरण के विभिन्न तथ्यों के विस्तृत विवरण का अध्ययन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि सभी भौतिक तथ्य धरातल पर असमान रूप में वितरित है। जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक तथ्य मानव निवास के अनुकूल हैं, उन्हीं क्षेत्रों में मानव सृजित वातावरण के तथ्य आसानी से केन्द्रित हो जाते हैं। इस तरह वहाँ मानवीय और भौतिक तथ्यों के बीच अल्पावधि में अन्तर्क्रिया सम्पन्न होती हैं। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा विकास वहाँ पहले दृष्टव्य होता है।

            इसका तात्पर्य यह नहीं है कि जिन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, वहाँ विकास प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं होगी, ऐसे क्षेत्रों में भी मानवीय कारकों की प्रधानता रहने पर विकास प्रक्रिया प्रारम्भ अवश्य होगी लेकिन संसाधन सम्पन्न क्षेत्रों की तुलना में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत देर से प्रारम्भ होगी।

         यही कारण है कि विकास में क्षेत्रीय असमानता मिलती है। भूगोल में इसलिए विकास या आर्थिक विकास को प्रादेशिक विकास कहा जाता है। भौगोलिक रूप में इसको परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि “प्रादेशिक विकास मानवीय क्षमता और प्राकृतिक तथ्यों के गत्यात्मक अन्तर्क्रियात्मक अन्तर्सम्बन्धों के परिणामस्वरूप घटित क्षेत्रीय संरचनात्मक प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित हैं।” यह प्रत्यावर्तन मात्रात्मक एवं गुणात्मक दोनों स्तरों पर घटित होता है।

           स्पष्ट है कि क्षेत्रीय पक्ष प्रादेशिक आर्थिक विकास का मौलिक पक्ष है। इसलिये यह भौगोलिक अध्ययन का विषय है। लेकिन 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक भूगोलवेत्ताओं ने इस ओर कोई रुचि नहीं ली थी। वास्तव में उस समय भूगोल का उद्देश्य विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों की विशिष्टताओं को स्पष्ट करना ही था। इसी विशिष्ट वर्णनात्मक उपागम के कारण भूगोलवेत्ताओं का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय विभिन्नता का वर्णन करना था। भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास का अध्ययन द्वितीय महायुद्ध के बाद करना प्रारम्भ किया।

       इस समय लगभग साम्राज्यवाद और औपनिवेशीकरण समाप्त हो गया था। विभिन्न स्वतंत्र देश अपने संसाधनों के आधार पर आर्थिक विकास कर रहे थे। यूरो-अमेरिकी देश अपेक्षाकृत अधिक विकसित हो रहे थे, जबकि नये स्वतंत्र देश विकास प्रक्रिया को प्रारम्भ कर रहे थे।

          ऐसे समय ही विकसित देश विश्व का ‘विकसित’, ‘विकासशील’ और ‘अविकसित’ वर्गों में विभाजन करके विभिन्न विषयों का अध्ययन करने लगे। तत्कालीन भूगोलवेत्ताओं ने भी विकसित और अवकिसित देशों के मध्य विकास प्रतिरूप में अन्तर के कारणों को जानने हेतु आर्थिक विकास का अध्ययन प्रारम्भ किया।

          डडले स्टैम्प, नार्टन गिन्सबर्ग आदि भूगोलवेत्ताओं ने सर्वप्रथम आर्थिक विकास और प्राकृतिक पर्यावरण के अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन प्रस्तुत किया। कालान्तर में नार्टन गिन्सबर्ग ने ‘भूगोल एवं आर्थिक विकास’ (Essays on Geography and Economic Development) नामक ग्रन्थ प्रकाशित किया। यह विभिन्न चरों पर आधारित विश्वस्तरीय आर्थिक विकास का प्रादेशिक वर्गीकरण था।

        इसी तरह अन्य भूगोलवेत्ताओं ने प्रारम्भिक स्तर पर आर्थिक विकास पर पर्यावरण के समग्र प्रभाव का भी वर्णन किया। आर्थिक विकास को निर्धारित करने वाले विभिन्न चरों के वितरण प्रकृति के आधार पर सामान्यीकरण एवं सिद्धान्त निरूपण केवल कुछ ही भूगोलवेत्ताओं ने किया, जिसमें गिन्सबर्ग, उलमान और हार्टशोर्न उल्लेखनीय हैं। तदुपरांत भारत के भूगोलवेत्ताओं ने आर्थिक विकास के विभिन्न आयामों का भौगोलिक वर्णन करके सामान्यीकरण और मॉडल निर्माण करना प्रारम्भ किया है।

      भारतीय भूगोलवेत्ताओं में आर० पी० मिश्रा, के० वी० सुन्दरम, वी० एल०एस० प्रकाशराव, मुनीस रजा, एल० के० सेन, डी० के० सिंह, जे०के० राउतराय, सुधीर वनमाली, पी०आर० चौहान, वी० के० श्रीवास्तव, नंदेश्वर शर्मा आदि ने भी आर्थिक विकास के विभिन्न पक्षों का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया है।

आर्थिक विकास एवं प्राकृतिक- मानवीय तथ्य

       आर्थिक विकास का अध्ययन करते समय भूगोलवेत्ताओं का उद्देश्य उन कारकों का वर्णन करना होना चाहिये, जिससे विकास में असमानता होती है। ऐसे तत्त्वों में सर्वप्रथम प्राकृतिक तत्त्वों यथा- भूमि, जलवायु, खनिज, ऊर्जा संसाधन, वनस्पति आदि में क्षेत्रीय अन्तर मिलता है। ये सभी प्राकृतिक तत्त्व किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास के लिये उत्तरदायी हैं लेकिन मात्र इन्हीं के क्षेत्रीय वर्णन से विकास की असमानता का विश्लेषण नहीं किया जा सकता।

        विश्व में क्षेत्रीय आधार पर वितरित विभिन्न संस्कृति और सभ्यताएँ तंत्र और संसाधनों के दोहन का उद्देश्य प्राकृतिक तत्त्वों की अपेक्षा अधिक सशक्त रूप से विकास की असमानता को स्पष्ट करते हैं। बल्कि भौगोलिक रूप से सच यह है कि प्राकृतिक तत्त्व तो निर्जीव रूप से स्थिर हैं। मानवीय विशेषताएँ ही इन तत्त्वों के दोहन का प्रतिरूप निर्धारित करके विकास प्रतिरूप को अस्तित्व में लाती है। इसलिये भूगोल में आर्थिक विकास के निर्धारकों में प्राकृतिक तत्त्वों से अधिक महत्त्व मानवीय तत्त्वों को दिया जाना चाहिये।

       हार्टशोर्न के अनुसार क्षेत्रीय आधार पर अन्तर इन्हीं तत्त्वों के कारण उत्पन्न होता है। यही कहा जा सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की भौतिक स्थिति, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संगठन, वहाँ निवास करने वाली जनसंख्या की क्षमता को उसकी आवश्यकताओं और उद्देश्यों को पूरा करने के लिये निर्देशित करते हैं। इसलिये भूगोल में विकास का अध्ययन उत्पादन और प्राकृतिक संसाधनों के सन्दर्भ में न करके उत्पादन और जनसंख्या के सन्दर्भ में ही करना चाहिये, क्योंकि आर्थिक विकास का अन्तिम उद्देश्य भी मानव कल्याण हैं।

      विकास प्रतिरूप का भौगोलिक अध्ययन करते समय प्राकृतिक तत्त्वों के साथ-साथ मानव की भौतिक आवश्यकताओं और उनके प्रति उसके दृष्टिकोण का भी अध्ययन होना चाहिए। क्षेत्रीय आधार पर मानव समूहों की कुछ समान आवश्यकताएँ हैं, जैसे- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य आदि। इनकी पूर्ति मानव के हर कार्य का मुख्य उद्देश्य है। इसको प्राप्त करने के लिये मनुष्य संसाधनों से अन्तर्क्रिया करता है। इससे विकास घटित होता है। चूँकि मानव की इच्छाओं, आवश्यकताओं और उसकी क्षमताओं में पर्याप्त वैभिन्य है। इसलिये विकास प्रतिरूप में भी विभिन्नता का मिलना स्वाभाविक है।

       अतः अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय अथवा मानवीय समूह यहाँ तक कि नितान्त व्यक्तिगत स्तर पर विकास का अर्थ अलग-अलग होना अपरिहार्य है। मालकम आदिशेषैया ने सही कहा है कि एक पूर्ण विकसित औद्योगिक समाज में और पारम्परिक समाज में विकास का अभिप्राय अलग-अलग होना निश्चित है क्योंकि दोनों समाजों के मनुष्यों की आवश्यकताएँ, इच्छाएँ, जीवनयापन का ढंग, प्राविधिक स्तर अलग-अलग प्रकार के हैं। आवश्यकताओं एवं इच्छाओं में यह अन्तर विकास हेतु भी विभिन्न प्रकार की तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक भी क्षेत्र विशेष की भौतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर आधारित होती है।

       भौगोलिक विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक तत्त्वों के अतिरिक्त विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं। भौतिक (पदार्थगत) तत्त्वों में परिवहन, वित्त, शक्ति के साथ-साथ संसाधन (कच्चे माल) हैं, जबकि अभौतिक तत्त्वों में श्रम, विपणन, उद्यम आदि हैं। ये सभी एक-दूसरे से अन्तर्सम्बन्धित होकर ही विकास प्रतिरूप को निर्धारित करते हैं।

      यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि किन्हीं एक या दो तत्त्वों के अभाव से क्षेत्र का विकास प्रभावित नहीं होगा, क्योंकि ऐसे तत्त्वों को आयात करके या उनका विकल्प खोलकर विकास किया जा सकता है। इसीलिये हार्टशोर्न का मत है कि विकास में अन्तर का मिलना प्राकृतिक संसाधनों में अन्तर का ही परिणाम नहीं है बल्कि मानवीय या अभौतिक कारक इस अन्तर के लिये अधिक उत्तरदायी है।

      उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भूगोल में आर्थिक विकास की संकल्पना क्षेत्रीय संदर्भ लेकर ही की जा सकती है। इस तरह प्रादेशिक विकास के रूप में आर्थिक विकास का एक मात्र उद्देश्य भूगोल में प्रति व्यक्ति आय अथवा राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही नहीं है बल्कि इसमें भौतिक और अभौतिक कारकों द्वारा समन्वित रूप में मानव के सन्दर्भ में किया जाने वाला आर्थिक विकास सम्मिलित है। भूगोल का उद्देश्य इन कारकों के वितरण अन्तर, अन्तर्सम्बन्ध और पारस्परिक अन्तरक्रिया का विश्लेषण करके विकास के सम्बन्ध सामान्यीकरण करना होना चाहिये।

निष्कर्ष

      विकास की प्राचीन अवधारणा से लेकर द्वितीय महायुद्धोत्तरकालीन संकल्पना और भूगोल में विकास की संकल्पना के उपर्युक्त विश्लेषण से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलते हैं:-

(i) विकास अन्तर्विषयक, अन्तरप्रखण्डीय और बहुआयामी शब्द हैं।

(ii) मौलिक रूप में विकास का अभिप्राय आर्थिक विकास ही है। यह आर्थिक विकास भी क्षेत्रीय सन्दर्भ में सामाजिक न्याय और सहभागिता की विशेषता से युक्त है।

(iii) विकास की संकल्पना आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक सन्दर्भों में एक देश से दूसरे देश, एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र, एक समाज से दूसरे समाज अथवा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के सन्दर्भ में अलग-अलग होती हैं।

(iv) विकास के सन्दर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि किसी क्षेत्र का संसाधन आधार ही उसके विकास का एक मात्र कारण नहीं है बल्कि मानवीय तत्त्व की प्रकृति एवं प्रतिरूप अधिक उत्तरदायी हैं।

(v) क्षेत्र विशेष में विद्यमान राजनीतिक तंत्र विकास को निश्चित दिशा देकर उसे नियोजित करते हैं।

(vi) विकास का सर्वप्रमुख उद्देश्य मानव कल्याण है और यह मानव कल्याण भी सम्पूर्ण मानव समुदाय के सन्दर्भ में होना चाहिये इसलिये विकास तभी तक  उपयुक्त एवं प्रासंगिक है, जब तक कि उसमें असमानता न्यूनतम स्तर पर रहती है।

(vii) विकास की संकल्पना गत्यात्मक है। अविकसित और पिछड़े समाज या क्षेत्र के विपरीत विकसित अथवा औद्योगिक समाज के सन्दर्भ में, इसकी संकल्पना अलग-अलग है, क्योंकि दोनों की आवश्यकताओं एवं क्षमताओं में पर्याप्त अन्तर मिलता है। इसलिये सामाजिक प्रत्यावर्तन के साथ ही साथ विकास की संकल्पना भी परिवर्तित होती जाती है।

प्रश्न प्रारूप

 1. प्रादेशिक विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

 4. The problem of regional imbalances into India (भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)

4. The problem of regional imbalances into India

(भारत के विकास में क्षेत्रीय असन्तुलन की समस्या)       problem of regional

           भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन बड़े पैमाने पर पाया जाता है, हमारे देश में गरीबी एक अभिशाप है किन्तु इससे भी बुरी बात है-आय का असमान वितरण, आर्थिक विकास प्रयत्नों ने जहाँ आय की विषमता को बढ़ाया है, वहीं नियोजित विकास के द्वारा असंतुलन को कम करने के प्रयास भी किये हैं।

        योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य समाजवाद की स्थापना करना, किन्तु योजनाओं के कार्यक्रमों का आधार क्रियान्वयन की विधि व संगठन तंत्र इस प्रकार के रहे कि सामाजिक लक्ष्यों की उपलब्धि सम्भव न हो सकी, प्रमुख असफलता आय के वितरण के रूप में सामने आयी, रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा किये गये सर्वेक्षण अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में निम्नतम 20 प्रतिशत जनसंख्या की कुल आय का 9 प्रतिशत प्राप्त होता है, जबकि 5 प्रतिशत की कुल आय का 17 प्रतिशत, जनसंख्या के उच्चतम अर्द्धभाग को कुल आय का 60 प्रतिशत, जबकि निम्नतम अर्द्धभाग को कुल आय का केवल 31 प्रतिशत प्राप्त होता है।

      हमारे देश में जनसंख्या का वितरण बहुत असमान है, यहाँ जनसंख्या घनत्व में भी बहुत असमानता है। देश का जनघनत्व 325 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। जनघनत्व की दृष्टि से पश्चिम बंगाल प्रथम स्थान पर है, जहाँ जनघनत्व 903 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है, जबकि अरुणाचल प्रदेश में जनघनत्व 13 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसी भाँति यहाँ जनसंख्या का लिंगानुपात तथा साक्षरता में भी बहुत असमानता पायी जाती है।

       लिंगानुपात की दृष्टि से प्रथम स्थान पर केरल है, जहाँ लिंगानुपात 1058 है, जबकि राजस्थान में लिंगानुपात सबसे कम है, जो 922 है, साक्षरता की दृष्टि से केरल प्रथम स्थान पर है, जहाँ साक्षरता 90.92 प्रतिशत है, इसके विपरीत सबसे कम साक्षरता वाला राज्य बिहार है, जहाँ साक्षरता 47.0 प्रतिशत है।

        यहाँ कृषि, उद्योग, परिवहन, व्यापार आदि में भी पर्याप्त असन्तुलन पाया जाता है। देश में व्याप्त असन्तुलनों से अनेकानेक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक समस्याएँ उत्पन्न होती है, जिसे निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

सामाजिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण विभिन्न प्रकार की सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं जो अग्रलिखित हैं-

(1) आय एवं सम्पत्ति की असमानता:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से ग्राम एवं नगरों के मध्य आय तथा सम्पत्ति वितरण में असमानता बहुत है। यह असमानता राज्यों में भी बहुत है। अखिल भारत की प्रति व्यक्ति आय 29,642 (वर्तमान कीमतों पर) रुपये है, जबकि गोवा 70,112 रुपये, दिल्ली में 61,676 रुपये, महाराष्ट्र में 37,081 रुपये है।

       राष्ट्रीय औसत से अधिक आय वाले राज्य केन्द्रशासित गोआ, अरुणाचल प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हाराष्ट्र मिजोरम एवं पंजाब, चण्डीगढ़, केरल आदि राज्य है, जबकि शेष राज्यों के प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है।

(2) असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है, क्योंकि जब लोग समाजिक नहीं होते हैं अर्थात् उनमें ऊँच-नीच दिखाई देती है, तो स्वाभाविक है कि असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

      क्षेत्रीय असन्तुलनों से किसी क्षेत्र विशेष की ओर श्रमिकों का प्रवास बढ़ने लगता है, जिससे भीड़-भाड़ की समस्या, आवास व्यवस्था की समस्या, जलापूर्ति समस्या, बिजली की समस्या तथा गन्दी बस्ती समस्या उत्पन्न होती है। सभी लोगों को रोजगार न मिलने से उनमें रोष व्याप्त होता है, जिससे असामाजिक कृत्यों को बढ़ावा मिलता है।

(3) सामाजिक लागतों में वृद्धि:-

         क्षेत्रीय असन्तुलन होने से किसी क्षेत्र विशेष में औद्योगीकरण अधिक होता है, जबकि किसी में बहुत कम। ऐसी स्थिति में जहाँ औद्योगीकरण अधिक होता है, वहाँ प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है। प्रदूषण वाले क्षेत्रों में निवास करने वाले श्रमिकों में विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ होने लग जाती हैं, जिसके उपचार हेतु अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है।

आर्थिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्न प्रकार की आर्थिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं-

(1) साधनों का अपूर्ण उपयोग:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन की सबसे बड़ी समस्या यह रहती है कि इससे देश के संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता है। इसका कारण यह है कि जहाँ विकास होता है, वहाँ के संसाधनों का उपयोग हो जाता है किन्तु अनेकानेक दुर्गम क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग नहीं हो पाता है।

(2) बेरोजगारी में वृद्धि:-

       सभी क्षेत्रों में सन्तुलित विकास न होने से कुछ क्षेत्रों में तो रोजगार के अवसर अच्छे होते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में रोजगार का अभाव पाया जाता है। यदि सभी क्षेत्रों में समान रूप से विकास हो तो रोजगार के अवसर भी समान रूप से मिलेंगे, फलतः बेरोजगारी कम होगी।

(3) साधनों का अनुचित उपयोग:-

       प्राकृतिक संसाधन सीमित मात्रा में होते हैं। अतः उनका उपयोग विवेकपूर्ण ढंग से करना चाहिए तथा उनके संरक्षण पर भी ध्यान देना चाहिए। औद्योगिक विकास होने से संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग हो जाता है, जिससे संसाधनों के समाप्त होने की समस्या उत्पन्न हो रही है।

(4) जीवन स्तर में भिन्नता:-

     क्षेत्रीय असन्तुलन से कुछ क्षेत्रों के लोगों की आय अधिक होती है, जबकि अन्य बहुत कम आय वाले होते हैं। ऐसी स्थिति में उनके जीवन-स्तर में पर्याप्त भिन्नता देखने को मिलती है। क्षेत्रीय असन्तुलन होने से यह बहुत गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है।

राजनैतिक समस्याएँ:

        क्षेत्रीय असन्तुलन से निम्नांकित राजनैतिक समस्याएँ उत्पन होती हैं-

(1) राजनीतिक अस्थिरता:-

       क्षेत्रीय असन्तुलन से राजनीति में भी स्थिरता नहीं है। जहाँ राजनीतिक अस्थिरता है, वहाँ असन्तुलन है, इस प्रकार दोनों का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। 

(2) क्षेत्रवाद की समस्या:-

      जब किसी क्षेत्र का विकास अधिक तथा किसी का कम होता है तो विभिन्न प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें क्षेत्रवाद की समस्या भी बहुत बड़ी है। ऐसे में क्षेत्रीय भावना जागृत होती है, जो किसी-न-किसी रूप में हानिकारक है।

(3) सुरक्षात्मक समस्या:-

      क्षेत्रीय असन्तुलन से सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जो क्षेत्र अधिक विकसित हो जाते हैं, उन पर अन्य पिछड़े क्षेत्रों के गरीब व बेरोजगार हमला बोल देते हैं, वहाँ से धन प्राप्त करते हैं। इससे वहाँ का जन-जीवन असुरक्षित हो जाता है।

4. Major Agriculture Systems in The World (विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)

4. Major Agriculture Systems in The World

(विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियाँ)



        Major Agriculture  

         मिट्टी को जोतने-गोड़ने तथा फसल उगाने एवं पशुपालन की कार्यप्रणाली, कला एवं विज्ञान को कृषि कहते हैं। कृषि मनुष्य का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसाय है, क्योंकि इससे समस्त संसार के भोजन, वस्त्र तथा आवास की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। विद्वानों का विचार है कि कृषि का आरम्भ दक्षिण-पश्चिमी एशिया में लगभग 4000 ईसा पूर्व हुआ।

          कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य कृषि कार्य पाषाण युग से ही करता आया है।

         कृषि ने मनुष्य को स्थायी आवास की सुविधा दी। कृषि का मशीनीकरण हो जाने से उत्पादन में वृद्धि हुई और कृषि उत्पादों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार शुरू हो गया। आज संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया तथा रूस बड़ी मात्रा में कृषि उत्पादों का निर्यात करते हैं जबकि ग्रेट ब्रिटेन, नीदरलैण्ड, डेनमार्क तथा जापान इन वस्तुओं का आयात करते हैं।

कृषि पद्धतियाँ (Agricultural Systems):-

          भूतल पर विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की भौतिक, आर्थिक तथा सामाजिक परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जिस कारण अलग-अलग भागों में अलग-अलग कृषि पद्धतियाँ अपनाई जाती हैं। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित है:

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि

(Subsistence Agriculture)

2. आधुनिक कृषि

(Modern Agriculture)

3. विस्तृत कृषि

(Extensive Agriculture)

4. वाणिज्य कृषि

(Commercial Farming)

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन

(Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock)

6. डेरी फार्मिंग

(Dairy Farming)

7. ट्रक कृषि

(Truck Farming)

8. उद्यान कृषि

(Horticulture)

1. जीविकोपार्जी अथवा जीविका कृषि (Subsistence Agriculture):-

         इस कृषि में कृषक अपनी तथा अपने परिवार के सदस्यों की उदरपूर्ति के लिए फसलें उगाता है। कृषक अपने उपभोग के लिए वे सभी फसलें पैदा करता है जिनकी उसे आवश्यकता होती है। अतः इस कृषि में फसलों का विशिष्टीकरण नहीं होता। इनमें धान, गेहूँ, दलहन तथा तिलहन  सभी का समावेश होता है। विश्व में जीविकोपार्जी कृषि के दो रूप पाए जाते हैं:

(क) आदिम जीविकोपार्जी कृषि जो स्थानान्तरी कृषि के समरूप है।

(ख) गहन जीविकोपार्जी कृषि जो पूर्वी तथा मानसून एशिया में प्रचलित है।

      चावल सबसे महत्वपूर्ण फसल है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में गेहूँ, जौ, मक्का, ज्वार, बाजरा, सोयाबीन, दालें तथा तिलहन बोये जाते हैं। यह कृषि भारत, चीन, उत्तरी कोरिया तथा म्यांमार में की जाती है। इस कृषि के महत्वपूर्ण लक्षण निम्नलिखित हैं :

(i) जोत बहुत छोटे आकार की होती हैं।

(ii) कृषि भूमि पर जनसंख्या के अधिक दबाव के कारण भूमि का गहनतम उपयोग होता है।

(iii) कृषि की गहनता इतनी है कि वर्ष में दो, तीन तथा कहीं-कहीं चार फसलें भी ली जाती हैं।

(iv) मशीनीकरण के अभाव तथा अधिक जनसंख्या के कारण मानवीय श्रम का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है।

(v) कृषि के उपकरण बड़े साधारण तथा परम्परागत होते हैं, परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जापान, चीन तथा उत्तरी कोरिया में मशीनों का प्रयोग भी होने लगा है।

(vi) अधिक जनसंख्या के कारण मुख्यतः खाद्य फसलें ही उगाई जाती हैं और चारे की फसलों तथा पशुओं को विशेष स्थान नहीं मिलता।

(vii) गहन कृषि के कारण मिट्टी की उर्वरता का ह्रास हो जाता है। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति बनाए रखने के लिए हरी खाद, गोबर, कम्पोस्ट तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाता है। जापान में प्रति हेक्टेअर रासायनिक उर्वरकों की खपत सर्वाधिक है।

2. आधुनिक कृषि (Modern Agriculture):-

        इस कृषि में आधुनिक ढंग से फसलें उगाई जाती हैं। कृषि के विभिन्न कार्यों के लिए भिन्न-भिन्न मशीनों का प्रयोग किया जाता है। अधिक उपज लेने के लिए उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाइयाँ तथा सिंचाई की उत्तम सुविधा का प्रयोग किया जाता है। विस्तृत कृषि, वाणिज्य कृषि, मिश्रित कृषि, डेयरी फार्मिंग उद्यान कृषि,आदि आधुनिक ढंग से की जाती है। 

3. विस्तृत कृषि (Extensive Agriculture):-

      विस्तृत कृषि एक मशीनीकृत कृषि है जिसमें खेतों का आकार बड़ा, मानवीय श्रम कम, प्रति हेक्टेअर उपज कम और प्रति व्यक्ति तथा कुल उपज अधिक होती है। यह कृषि मुख्यतः शीतोष्ण कटिबन्धीय कम जनसंख्या वाले प्रदेशों में की जाती है। इन प्रदेशों में पहले चलवासी चरवाहे पशुचारण का कार्य करते थे और बाद में यहाँ स्थायी कृषि होने लगी। इन प्रदेशों में वार्षिक वर्षा 30 से 60 सेमी होती है। जिस वर्ष वर्षा कम होती है उस वर्ष फसल को हानि पहुँचती है। यह कृषि उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में शुरू हुई।

        इस कृषि का विकास कृषि-यन्त्रों तथा महाद्वीपीय रेलमार्गों के विकसित हो जाने से हुआ है। विस्तृत कृषि मुख्यतः रूस तथा यूक्रेन के स्टेपीज (Steppes), कनाडा तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रेयरीज (Prairies), अर्जेण्टीना के पम्पास (Pampas of Argentina) तथा आस्ट्रेलिया के डाउन्स (Downs of Australia) में की जाती है।

       विस्तृत कृषि के मुख्य लक्षण निम्नलिखित है:

(i) खेत बहुत ही बड़े आकार के होते हैं। इनका क्षेत्रफल प्रायः 240 से 1600 हेक्टेअर तक होता है।

(ii) बस्तियाँ बहुत छोटी तथा एक-दूसरे से दूर स्थित होती हैं। 

(iii) खेत तैयार करने से फसल काटने तक का सारा काम मशीनों द्वारा किया जाता है। ट्रैक्टर, ड्रिल, कम्बाइन, हार्वेस्टर, थ्रेशर और विनोअर मुख्य कृषि यंत्र हैं।

(iv) मुख्य फसल गेहूँ हैं। अन्य फसलें हैं- जौ, जई, राई, फ्लैक्स तथा तिलहन।

(v) खाद्यान्नों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनाए जाते हैं जिन्हें साइलो या एलीवेटर्स कहते हैं। 

(vi) यान्त्रिक कृषि होने के कारण श्रमिकों की संख्या कम होती है।

(vii) प्रति हेक्टेअर उपज कम तथा प्रति-व्यक्ति उपज अधिक होती है।

      जनसंख्या में निरन्तर वृद्धि के कारण विस्तृत कृषि का क्षेत्र घटता जा रहा है। पूर्वी संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्यूनस आयर्स, आस्ट्रेलिया के तटीय भागों तथा यूक्रेन जैसे घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों से लोग विस्तृत कृषि के क्षेत्रों में आकर बसने लगे हैं जिससे कृषि का क्षेत्र कम होता जा रहा है। इस प्रकार 19वीं शताब्दी में शुरू हुई यह कृषि अब बहुत ही सीमित क्षेत्रों में की जाती है।

4. वाणिज्य कृषि (Commercial Farming):-

      इस कृषि में फसलों को बेचने के लिए पैदा किया जाता है। अतः उत्पादन में फसल विशिष्टीकरण इसकी मुख्य विशेषता है। विश्व में यह दो रूपों में पाई जाती है-

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि तथा

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि।

(i) मध्य अक्षांशों में वाणिज्य अन्न कृषि:-

        मध्य अक्षांशों में गेहूँ के उत्पादन में विशिष्टीकरण इस कृषि का मुख्य उदाहरण है। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी क्षेत्र, यूक्रेन क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, अर्जेण्टीना, आस्ट्रेलिया के दक्षिणी भागों तथा भारत के पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस प्रकार की कृषि की जाती है।

      इस कृषि में अधिकांश कार्य मशीनों से किया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में गेहूँ के कृषि क्षेत्रों में कृषक बाहर से आते जाते हैं। इनके लिए साइडवाक कृषक तथा सूटकेस कृषक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। भारत में वाणिज्य कृषि बड़े पैमाने पर तो नहीं, परन्तु किसी हद तक की जाती है। यहाँ पर मशीनीकरण भी सीमित ही हुआ है।

(ii) उष्ण कटिबन्ध में रोपण कृषि:-

       रोपण कृषि का विकास उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में उपनिवेश काल में यूरोपीय देशों द्वारा किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय देशों को वे कृषि उपजें उपलब्ध कराना था जो केवल उष्ण कटिबन्धीय जलवायु में ही होती हैं। अतः यह एक व्यापारिक कृषि बन गई जिसमें फसलों का विक्रय किया जाता है। भारत में असम व दार्जिलिंग तथा श्रीलंका के चाय बागान, मलेशिया के रवर बागान, ब्राजील के कॉफी बागान इस कृषि के मुख्य उदाहरण हैं।

       प्रारम्भ में पूँजी निवेश उपनिवेशी देशों द्वारा किया गया था। बागानों का प्रबन्ध भी उपनिवेशी देशों के हाथों में ही था, परन्तु बड़े पैमाने पर श्रम स्थानीय मजदूरों या बाहर से लाए गए भाड़े या बन्धुआ मजदूरों द्वारा उपलब्ध कराया गया। इस कृषि में उत्पाद को भी बागान पर ही संसाधित किया जाता है। क्योंकि रोपण कृषि की उपजें मुख्यतः निर्यात के लिए ही होती हैं इसलिए इस कृषि के विकास के लिए सस्ते परिवहन का होना अति आवश्यक है। यही कारण है कि विश्व की अधिकांश रोपण कृषि तटीय भागों में विकसित हुई है या वह सस्ते परिवहन द्वारा तट से जुड़ी हुई है।

      रोपण कृषि के बागान प्रायः बड़े आकार के होते हैं और कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों में पनपते हैं। सामान्यतः इनका आकार 4 से 40 हेक्टेअर तक होता है, परन्तु कहीं-कहीं ये बागान बहुत बड़े होते हैं। उदाहरणतः लाइबेरिया में हरबल नामक स्थान पर फायस्टोन कम्पनी का रबर का बागान 54.4 हजार हेक्टेअर भूमि पर फैला हुआ है।

      उपनिवेशवाद की समाप्ति पर उपनिवेश स्वतन्त्र हो गए और रोपण कृषि की विशेषताओं में परिवर्तन आ गया। उदाहरणतः बागानों का स्वामित्व तथा प्रबन्ध उपनिवेशी देशों से हटकर स्थानीय अधिकारियों के हाथों में आ गया। अब ये बागान अपनी उपजों को निर्यात करने के साथ-साथ स्थानीय बाजारों में भी बेचते हैं।

5. मिश्रित कृषि अथवा व्यापारिक फसल एवं पशुपालन (Mixed Farming or Commercial Crops and Livestock):-

        इस कृषि में फसलें उगाने तथा पशुओं को पालने का कार्य एक साथ किया जाता है। यह मिश्रित बुआई से भिन्न है। मिश्रित बुआई में एक ही खेत में एक ही समय पर कई फसलें बोई जाती हैं जबकि मिश्रित कृषि में फसलें उगाने के साथ-साथ पशुपालन का कार्य भी किया जाता है। मिश्रित कृषि यूरोप में आयरलैण्ड से रूस तक, उत्तरी अमेरिका के पूर्वी भाग, अर्जेण्टीना के पम्पास, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका और न्यूजीलैण्ड में की जाती है।

      संयुक्त राज्य अमेरिका का मिश्रित कृषि क्षेत्र मक्के की पेटी है। मक्का खिलाकर पशुओं को मोटा किया जाता है। इसके अतिरिक्त जई, गेहूँ तथा घास भी पैदा की जाती है। अब यहाँ पर सोयाबीन की फसल भी पैदा की जाने लगी है। यह एक प्रोटीनयुक्त फसल है जिसका विस्तार दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। यह कृषि अधिकतर बड़े-बड़े नगरों के आस-पास की जाती है जिससे इसकी उपजों की बिक्री में कोई कठिनाई नहीं होती। उत्तम कृषि विधियाँ, उत्तम परिवहन, शहरी बाजार की निकटता तथा विश्वसनीय वर्षा से इस कृषि को बड़ी सहायता मिलती है।

6. डेरी फार्मिंग (Dairy Farming):-

      डेरी फार्मिंग कृषि का वह विशिष्ट ढंग है जिसमें दूध देने वाले पशुओं के प्रजनन, पशुचारण और नस्ल सुधारने की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है। दुधारू पशुओं, विशेषतया गायों को पाला जाता है। दूध तथा दुग्ध पदार्थ, जैसे- मक्खन, पनीर, क्रीम, संघनित दूध और पाउडर दूध इस कृषि के मुख्य उत्पाद हैं।

डेरी फार्मिंग के क्षेत्र:-

     डेरी फार्मिंग यूरोप (ब्रिटेन, आयरलैण्ड, डेनमार्क, नीदरलैण्ड्स, बेल्जियम, नार्वे, स्वीडन, स्विटजरलैण्ड, फ्रांस, यूक्रेन, लाटविया, लिथुआनिया तथा एस्टोनिया), उत्तरी अमेरिका की विशाल झीलों का क्षेत्र, दक्षिण-पूर्वी आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड में विकसित है।

     भारत में डेरी कृषि का विकास सहकारी समितियों द्वारा किया जाता है। | गुजरात की अमूल डेयरी इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। अधिकांश राज्यों में डेयरी विकास बोर्ड बनाए गए हैं। झांसी में चारा शोध संस्थान तथा करनाल में डेरी शोध संस्थान का भी गठन किया गया है। भारत में अधिकांश दूध गायों से नहीं बल्कि भैंसों से प्राप्त किया जाता है।

डेरी फार्मिंग की विशेषताएँ

(i) दुधारू पशुओं को पालना डेरी फार्मिंग की सबसे बड़ी विशेषता है। पशुओं के स्वास्थ्य और उनकी नस्ल पर विशेष ध्यान दिया जाता है। होलिस्टीन, रेनडेन, जर्सी, गोर्नसे तथा आयर शायर जैसी उच्चकोटि की नस्लों वाली गायें पाली जाती हैं।

(ii) पशुओं की देखभाल वैज्ञानिक तरीकों से की जाती है।

(iii) दूध दोहने और उसे संसाधित करने की क्रियाओं को मशीनों द्वारा किया जाता है।

(iv) डेरी फार्मिंग घने औद्योगिक नगरों की मांग पर आश्रित है इसलिए अधिकांश डेरी फार्मिंग शहरी क्षेत्रों के निकट ही पनपा है।

(v) दूध और दुग्ध पदार्थों को मांग के क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए तीव्र यातायात का प्रयोग किया जाता है।

(vi) नियोजित आवास, मशीन, चारे की मिलों, प्रशीतन तथा संचयन के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है।

7. ट्रक कृषि (Truck Farming):-

     यह एक विशेष प्रकार की कृषि है जिसमें साग-सब्जियों की कृषि की जाती है। इन वस्तुओं को प्रतिदिन ट्रकों में भरकर निकटवर्ती नगरीय बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बाजार से कृषि क्षेत्र की दूरी इस बात पर निर्भर करती है कि ट्रक द्वारा रात-भर चलने में कितनी दूरी तय होती है। इसीलिए इस कृषि का नाम ट्रक कृषि रखा गया है।

प्रदेश- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी यूरोप (ब्रिटेन, डेनमार्क, बेल्जियम, नीदरलैण्ड्स, जर्मनी और फ्रांस), संयुक्त राज्य अमेरिका (उत्तर-पूर्वी भाग, केलीफोर्निया, फ्लोरिडा प्रायद्वीप तथा पूर्वी तटीय भाग) एवं कनाडा के पूर्वी भाग में की जाती है। इन प्रदेशों के शहरी तथा औद्योगिक क्षेत्रों में ताजी सब्जियों की भारी मांग रहती है और ये वस्तुएँ इन प्रदेशों को ट्रक कृषि से ट्रकों द्वारा प्राप्त होती हैं। अतः इस कृषि का नगरीकरण से गहरा सम्बन्ध है।

      भारत में वातावरण अनुकूल तथा वर्धनकाल लम्बा होने के कारण लगभग सभी भागों में सब्जियाँ उगाई जाती हैं। यहां पर अधिकांश जनसंख्या शाकाहारी है और मांस का मूल्य अधिक होने के कारण सब्जियों की मांग अधिक रहती है। इसलिए इस कृषि पर अधिक बल दिया जाता है।

विशेषताएँ- ट्रक कृषि एवं उद्यान कृषि की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

(i) ट्रक एवं उद्यान कृषि के खेत छोटे होते हैं।

(ii) परिवहन की सुविधा अच्छी रहती है।

(iii) गहन कृषि की जाती है।

(iv) सिंचाई की अच्छी व्यवस्था होती है।

(v) खादों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

(vi) अधिकांश कार्य हाथों से किया जाता है।

(vii) पेड़ों तथा पौधों को बीमारियों से बचाने के लिए दवाइयों का प्रयोग बड़ी मात्रा में किया जाता है।

8. उद्यान कृषि (Horticulture):-

        यह लगभग ट्रक कृषि जैसी ही है, अन्तर केवल इतना है कि इसमें साग-सब्जी के स्थान पर फलों तथा फूलों की कृषि की जाती है। फलों और फूलों की मांग नगरों में बहुत होती है।

फल-

       नगरीय क्षेत्रों में फलों की मांग बहुत होती है जिससे कृषक को पर्याप्त आय हो जाती है। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के फल उगाए जाते हैं। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में केला, आम, जामुन, नारियल, काजू, आदि। शीतोष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में सेब, आडू, अखरोट, नाशपाती एवं रसबेरी, आदि तथा भूमध्यसागरीय देशों में खट्टे फल, जैसे- सन्तरा, मौसमी, नीबू, आदि मुख्य फल हैं।

फूल-

      फलों की भांति फूलों की भी नगरीय क्षेत्रों में काफी मांग रहती है और फूलों की बिक्री से कृषक को काफी धन प्राप्त होता है। फूलों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी होता है। जार्जिया तथा आर्मीनिया में पैदा किए गए गुलाब के फूल मास्को तथा रूस के अन्य नगरों में भेजे जाते हैं।

        शीत ऋतु में इथोपिया प्याज के फूलों का निर्यात यूरोपीय देशों को करता है। नीदरलैण्ड्स में ट्यूलिप की कृषि विशेष रूप से की जाती है। यहाँ से इनका निर्यात वायुयानों द्वारा यूरोप तथा अमेरिका के बड़े-बड़े नगरों को किया जाता है। भारत में गुलाब तथा गेंदे के फूल अधिक पैदा किए जाते हैं।

       अजमेर के निकट पुष्कर घाटी गुलाब की कृषि के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। दिल्ली के आस-पास के क्षेत्रों में भी फूलों की खेती की जाती है। कश्मीर घाटी में विभिन्न प्रकार के फूल उगाए जाते हैं। यहाँ कटेवा भूमि पर केसर की खेती होती है। कन्नौज, जौनपुर तथा लखनऊ में फूलों पर आधारित सुगन्धित तेल बनाए जाते हैं।

प्रश्न प्रारूप

विश्व में प्रचलित प्रमुख कृषि पद्धतियों (Agriculture Systems) का वर्णन करें।

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)

22. Multiple Nuclei Theory (बहुनाभिक सिद्धांत)



Multiple Nuclei       

       यद्यपि संकेन्द्रित क्षेत्र और खण्ड क्षेत्र सिद्धान्त को अपनी आकर्षक सरलता का लाभ मिला, किन्तु अधिकांश नगरों की संरचना में इतनी अधिक जटिलता एवं विविधता पाई जाती है कि उसका सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता है। 1945 में सी. डी. हैरिस और ई. एल. उल्मान ने नगरीय संरचना के विविध प्रारूपों पर लागू होने वाले बहुनाभिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

         इस सिद्धान्त के अनुसार नगर का भूमि उपयोग प्रतिरूप एक ही केन्द्र या नाभि के चारों ओर विकसित न होकर प्रायः कई अलग-अलग केन्द्रों के चारों ओर विकसित होता है। इस प्रकार के विकास से नगर की संरचना कोशिकीय (Cellular) हो जाती है। इस कोशिकीय संरचना का निर्धारण नगर के अवस्थान (Site) सम्बन्धी विलक्षण कारकों और ऐतिहासिक कारकों द्वारा होता है। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार भिन्न-भिन्न केन्द्र या नाभिक कुछ नगरों में उत्पत्ति के समय ही अस्तित्व में आ जाते हैं जबकि कुछ नगरों में इनका विकास नगर की वृद्धि के साथ-साथ होता रहता है। नगरों में भिन्न-भिन्न केन्द्रों या नाभि तथा उन पर निर्भर भूमि उपयोग कटिबन्धों का बनना निम्नलिखित चार कारकों के संयोजन का परिणाम होता है:

(i) कुछ मानवीय क्रियाकलापों को विशिष्ट सुविधाओं की आवश्यकता होती है, जैसे- खुदरा व्यापार का क्षेत्र नगर में परिवहन की दृष्टि से सर्वाधिक गम्य स्थान के पास, बन्दरगाह अनुकूल सागरीय तट पर तथा विनिर्माण उद्योग विस्तृत भू-भाग और जल, स्थल तथा रेल मार्गों से संयोजित होने जैसी सुविधाओं पर ही विकसित होते हैं।

(ii) कुछ क्रियाएँ साथ-साथ पाई जाती हैं, क्योंकि उन्हें सम्बद्धता से लाभ प्राप्त होता है। जैसे, वित्तीय संस्थान एवं कार्यालयों के क्षेत्र यातायात एवं संचार सुविधाओं की उपलब्धता पर निर्भर होते हैं।

(iii) कुछ भिन्न प्रकृति की क्रियाएं एक-दूसरे के लिए हानिकारक होती हैं। इस दृष्टि से औद्योगिक क्षेत्र एवं उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का विरोधाभास सर्वविदित है। खुदरा व्यापार क्षेत्र में पैदल चलने वालों, दो पहिया वाहनों और कारों का भारी जमाव पाया जाता है, जो कि थोक व्यापार क्षेत्र के लिए आवश्यक रेल मार्ग सुविधाओं, विस्तृत स्थान एवं भारी सामान को लादने एवं उतारने जैसी क्रियाओं के प्रतिकूल है।

(iv) कुछ क्रियाएँ सर्वाधिक वांछनीय स्थलों को ऊँचा किराया या मूल्य देने में असमर्थ होती हैं। यह कारक इन क्रियाओं के अन्यत्र संयोजन का कार्य करता है। जैसे, थोक व्यापार एवं भण्डारण जैसी क्रियाओं के लिए अधिक कमरों या बहुत अधिक स्थान की आवश्यकता होती है, जो कि केन्द्र के निकट सम्भव नहीं है। इसी प्रकार निम्न आय वर्ग के आवास ऊंचे भूमि मूल्यों के कारण उच्च आय वर्ग के आवासीय क्षेत्र में स्थापित नहीं होते हैं।

        नाभिकों या केन्द्रों की संख्या विभिन्न नगरों में भिन्न-भिन्न होती है। इनकी संख्या ऐतिहासिक विकास तथा अवस्थिति शक्तियों का परिणाम होती है। नगर जितना बड़ा होता है, उसमें उतने ही अधिक एवं विशिष्ट केन्द्र मिलते हैं। हैरिस एवं उल्मान के अनुसार नगरों में केन्द्रों के चारों ओर विकसित होने वाले क्षेत्र निम्नलिखित हैं:

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र (Central Business District)

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र (Wholesale and Light Manufacturing)

3. भारी उद्योग क्षेत्र (Heavy Manufacturing)

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर (Suburb and Satellite)

5. लघु नाभि केन्द्र (Minor Nuclei)

6. आवासीय क्षेत्र (Residential)

7. भारी व्यापारिक पेटी (Heavy Business District)

8. रिहाइशी उपनगर (Residential Suburb)

9. औद्योगिक उपनगर (Industrial Suburb)

1. केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र अन्तरानगरीय यातायात सुविधाओं के केन्द्र में स्थित होता है। यह नगर के विभिन्न भागों से यातायात द्वारा जुड़ा होता है और नगर के सभी भागों से गम्य होता है। यहाँ भूमि का मूल्य सर्वाधिक होता है। डिपार्टमेण्टल स्टोर, वेरायटी स्टोर, रेडीमेड वस्त्र स्टोर, सर्वाधिक खुदरा व्यापार एवं सर्वाधिक ग्राहक संख्या इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं।

      छोटे नगरों में वित्तीय संस्थान और कार्यालय भवन भी खुदरा व्यापार की दुकानों के साथ मिले जुले रूप में मिलते हैं जबकि बड़े नगरों में इनका क्षेत्र खुदरा क्षेत्र के पास, किन्तु अलग स्थित होता है। अधिकांश बड़े नगरों की विषम वृद्धि के कारण केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र अब सामान्यतः नगरों के क्षेत्रीय केन्द्र में स्थित न होकर वास्तव में किसी एक किनारे के पास मिलता है।

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण औद्योगिक क्षेत्र:-

      थोक व्यापार क्षेत्र प्रायः केन्द्रीय व्यापार क्षेत्र के निकट (किन्तु उसके चारों ओर नहीं) यातायात मार्गों के सहारे सहारे स्थित होता है। यद्यपि इसको कुछ आधार स्वयं नगर से प्राप्त होता है, किन्तु यह प्रमुख रूप से पड़ोसी क्षेत्रों को सेवाएँ प्रदान करता है। अनेक प्रकार के हल्के विनिर्माण उद्योगों के विशिष्ट भवनों की आवश्यकता नहीं होती है। इन उद्योगों को तो अच्छे रेल एवं सड़क यातायात सम्पर्क, बड़े भवनों की उपलब्धि तथा स्वयं नगर के बाजार एवं श्रम से निकटता जैसी सुविधाएँ इन्हें आकर्षित करती हैं।

3. भारी उद्योग क्षेत्र:-

       यह क्षेत्र नगर के वर्तमान या पूर्ववर्ती बाह्य किनारों के निकट स्थित होता है। भारी उद्योगों को भूमि के बड़े भाग तथा अच्छी रेल, सड़क एवं जल यातायात सुविधाओं की आवश्यकता होती है। जो कि उन्हें नगर के केन्द्रीय भाग की अपेक्षा सीमावर्ती भाग में आसानी से उपलब्ध होती है। इसके अतिरिक्त भारी मशीनों से उत्पन्न ध्वनि प्रदूषण, उद्योगों द्वारा छोड़े जाने वाले हानिकारक अपशिष्टों और जान-माल के अन्य खतरों की वजह से भारी उद्योगों को नगर केन्द्र से दूर स्थित होने के लिए बाध्य करते हैं। यही कारण है कि नगरों की बाहरी सीमा पर भारी उद्योगों का स्थानीयकरण मिलता है।

4. उपनगर एवं अनुषंगी नगर:-

       उपनगर चाहे वह आवासीय हो या औद्योगिक, अधिकांश बड़े नगरों की प्रमुख विशेषता है। उपनगर एवं अनुषंगी नगर भी नगरों के विकास में केन्द्रों या नाभि के रूप में कार्य करते हैं। मोटर यातायात तथा उपनगरीय रेल सेवाओं के विकास ने उपनगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित किया है। अनुषंगी नगर केन्द्रीय नगर से कई किमी दूर तथा सामान्य रूप से दैनिक अभिगमन की मात्रा भी कम होने के कारण उपनगर से भिन्न होते हैं। अनुषंगी नगरों की आर्थिक क्रियाएं उनकी केन्द्रीय नगर से निकटता प्रदर्शित करती है।

5. लघु नाभि केन्द्र:-

         नगर के विभिन्न भागों में छोटे-छोटे केन्द्र पाए जाते हैं जैसे, सांस्कृतिक केन्द्र, बाह्यवर्ती व्यापार केन्द्र तथा छोटे औद्योगिक केन्द्र, आदि। एक विश्वविद्यालय भी किसी नगर में स्वतन्त्र रूप से नाभि या केन्द्र के रूप में कार्य कर सकता है। पार्क एवं अन्य मनोरंजन के क्षेत्र भी, जो कि बेकार पड़ी हुई भूमि को अधिग्रहीत किए हुए होते हैं, कभी-कभी उच्च श्रेणी के आवासीय क्षेत्र के केंद्र के रूप में विकसित हो जाते हैं। बाह्यवर्ती व्यापारिक क्षेत्र भी कालान्तर में प्रमुख केन्द्र बन जाते हैं, किन्तु छोटी संस्थाओं और हल्के विनिर्माण उद्योगों की व्यक्तिगत इकाइयों जैसे, बेकरी में ऐसी क्षमता नहीं होती है।

6. आवासीय क्षेत्र:-

        सामान्यतः उच्च श्रेणी के आवास अच्छा जल प्रवाह रखने वाले ऊंचे स्थलों पर तथा शोर, धुआं, दुर्गन्ध, रेलमार्ग, आदि से दूर स्थापित होते हैं। निम्न श्रेणी के आवास प्रायः कारखानों तथा रेलमार्गों के निकट स्थापित होते हैं। नगर के अधिक पुराने आवासीय क्षेत्रों जहाँ कि अधिकांश भवनों का ढाँचा जर्जर अवस्था में होता है, में भी निम्न वर्ग के लोगों के आवास होते हैं। यह वर्ग नगर के अन्य भागों में अधिक किराया देने में असमर्थ होता है। उच्च और निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बीच में मध्यम श्रेणी के लोगों का रिहायशी क्षेत्र बन जाता है।

निष्कर्ष:

        यद्यपि वर्तमान समय में कोई भी एक सिद्धान्त नगरों पर पूर्णतया लागू नहीं होता है, किन्तु अधिकांश नगरों में तीनों ही प्रकार के यथा, संकेन्द्रित वलय, खण्ड क्षेत्र और बहुनाभिक क्षेत्र का कोई न कोई रूप अवश्य देखने को मिलता है।

     वस्तुतः एक नगर के विकास के विभिन्न कालों में कार्यरत विभिन्न शक्तियों के कारण ही एक नगर में उपरोक्त वर्णित तीनों सिद्धान्तों का सामंजस्य देखने को मिलता है।

      नगर की प्रारम्भिक वृद्धि केन्द्रीय क्षेत्र और नाभि केन्द्रों के चारों ओर होती है। कालान्तर में होने वाली वृद्धि परिवहन मार्गों के सहारे होती है। यह वृद्धि खण्ड प्रारूप को जन्म देती है। अन्त में भूमि मूल्यों के अनुसार भूमि का उपयोग जो नगर के केन्द्र से दूरी के अनुसार निर्धारित होता है, नगरीय भूमि उपयोग को संकेन्द्रित प्रारूप प्रदान करता है।

प्रश्न प्रारूप

1. नगरीय आकारिकी के सम्बन्ध में प्रतिपादित बहुनाभिक सिद्धांत (Multiple Nuclei Theory) का वर्णन कीजिए।

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)

21. Sector Theory (खंड सिद्धांत)



      Sector Theory

        1939 में अमेरिकी नगरीय अर्थशास्त्री होमर हॉयट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कुल 142 नगरों के भूमि उपयोग आंकड़ों के आधार पर नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के सम्बन्ध में खण्ड सिद्धान्त प्रस्तुत किया। हॉयट ने बर्गेस के संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त में रही कुछ कमियों को दूर करते हुए अपने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इस सिद्धान्त के अनुसार नगरीय भूमि उपयोग का प्रारूप परिवहन मार्गों के विन्यास के अनुरूप विकसित होता है।

       नगर के केन्द्र से विभिन्न दिशाओं में जाने वाले परिवहन मार्गों के सहारे भूमि उपयोग और किराया-मूल्यों का प्रारूप खण्डीय रूप (Sectoral Pattern) में विकसित होता है। विकसित हुआ यह खण्ड प्रारूप पुनः नगरीय भूमि उपयोग प्रारूप को प्रभावित करता है।

       हॉयट के अनुसार नगर के एक खण्ड में विद्यमान सर्वाधिक किराया वाले आवासीय क्षेत्र का विस्तार उसी खण्ड में बाह्य भाग की ओर होता है। इसी प्रकार निम्न किराया वाले आवासीय क्षेत्रों का विकास बाह्य भाग की ओर होता है, लेकिन विभिन्न दिशाओं में हो सकता है।

       हॉयट के अनुसार भूमि उपयोग की दृष्टि से नगर कई खण्डों में बंटा होता है, जो कि नगर के केन्द्र से बाहर की ओर फैले रहते हैं। नगर केन्द्र के निकट जिस प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, बाहर की ओर भी उसी दिशा में उसी प्रकार का भूमि उपयोग मिलता है, जैसे नगर के पूर्वी भाग में उच्च आवासीय क्षेत्र नगर के पूर्वी भाग की बाह्य सीमा की ओर ही बढ़ेगा।

       हॉयट के अनुसार नगर में पांच प्रकार के खण्ड पाए जाते हैं:-

1. केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र,

2. थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र,

3. निम्न श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

4. मध्यम श्रेणी आवासीय क्षेत्र,

5. उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र।

       केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र की स्थिति संकेन्द्रित क्षेत्र सिद्धान्त की भांति ही नगर के केन्द्र में होती है। थोक व्यापार एवं हल्का विनिर्माण क्षेत्र केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र से प्रारम्भ होकर दो विभिन्न खण्डों में परिधि की सीमा तक फैला हुआ होता है। निम्न श्रेणी के आवासीय क्षेत्र भी विनिर्माण उद्योग खण्ड के सन्निकट दोनों ओर फैले त्रिज्या खण्डों में एवं केन्द्रीय व्यापारिक क्षेत्र के एक ओर सीमा पर पाए जाते हैं।

      मध्यम वर्ग के आवासीय क्षेत्र उच्च श्रेणी के आवासीय खण्ड के सहारे दोनों तरफ तथा निम्न श्रेणी आवासीय खण्ड के बाहर की ओर पाए जाते हैं। उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र एक या एक से अधिक खण्डों की बाहर की सीमा पर बसा मिलता है। आर्थिक स्तर के अनुसार विभिन्न वर्गों के आवासीय क्षेत्र स्थिर न होकर परिवर्तनशील होते हैं, किन्तु सामान्यतः उसी खण्ड की बाह्य सीमाओं की ओर बढ़ते हैं।

      हॉयट के अनुसार श्रेणी के आवासीय क्षेत्रों के बढ़ने की प्रवृत्ति निम्नलिखित भागों में पाई जाती है:

(i) अपने उत्पत्ति बिन्दु से प्रमुख मार्गों के सहारे या भवनों की अन्य विद्यमान नाभि या व्यापारिक केन्द्रों की ओर,

(ii) बाढ़ से सुरक्षित ऊंचे धरातल या झील, खाड़ी, नदी और महासागरीय सीमान्त की ओर,

(iii) नगर के उस क्षेत्र की ओर जो खुला हुआ हो,

(iv) सामुदायिक नेताओं और विशिष्ट व्यक्तियों के घरों की ओर,

(v) तीव्रतम यातायात मार्गों के सहारे।

      हॉयट के अनुसार सुसज्जित उच्च आवासीय फ्लेट वाले क्षेत्र, पुराने आवासीय क्षेत्र के व्यापारिक केन्द्र के निकट भी स्थापित होने की प्रवृत्ति रखते हैं। साथ ही जायदाद एवं भूमि सम्पदा व्यवसायी भी उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्रों की वृद्धि की दिशा को मोड़ सकते हैं।

        उच्च किराया आवासीय क्षेत्र हॉयट के सिद्धान्त का आधार है जिसे हॉयट ने 30 अमेरिकी नगरों के उच्च आवासीय क्षेत्रों के आरेखों द्वारा पुष्ट किया है। उच्च किराया आवासीय क्षेत्र नगरीय भूमि उपयोग संरचना के आकार निर्धारण में मुख्य भूमिका निभाता है। हॉयट ने अपने सिद्धान्त में संकेन्द्रित सिद्धान्त के प्रति उठाई गई आपत्तियों जैसे, उद्योगों की स्थिति एवं यातायात मार्गों पर पूरा ध्यान दिया है साथ ही नगर के भावी विकास एवं विस्तार का भी ध्यान रखा है।

        डब्ल्यू. फायरे ने बोस्टन के भूमि उपयोग का अध्ययन करके खण्ड सिद्धान्त में विद्यमान कमियों को उजागर किया है। इनका कहना है कि धरातलीय दशाएँ और जलीय भाग खण्ड प्रतिरूप को विकृत कर सकते हैं तथा भूमि उपयोग को निर्धारित करते समय सिद्धान्त में सामाजिक एवं सांस्कृतिक कारकों के योगदान को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।

        फायरे ने बोस्टन के बेकोनहिल उच्च श्रेणी आवासीय क्षेत्र का उदाहरण देकर बताया है कि इसके विकास का कारण इसकी अवस्थिति नहीं है, अपितु सामाजिक कारण है। नगरों की सम्पूर्ण संरचना के स्थान पर हॉयट ने अपने सिद्धान्त को मात्र आवासीय वृद्धि जैसे विशिष्ट सन्दर्भ में ही लागू किया है। स्वयं हॉयट ने अपने सिद्धान्त का पुनर्मूल्यांकन आधुनिक यातायात के साधनों एवं अन्य परिवर्तनों के सन्दर्भ में 1964 में किया।

प्रश्न प्रारूप

नगरों की आन्तरिक संरचना एवं विकास के संबंध में प्रतिपादित खंड सिद्धांत (Sector Theory) का समालोचनात्मक वर्णन कीजिए।

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