1. Ancient History (प्राचीन इतिहास)

1. Ancient History

(प्राचीन इतिहास)



1. आग का आविष्कार हुआ था

⇒ पुरापाषाण काल में

2. कृषि तथा पहिये का आविष्कार हुआ था

⇒ नवपाषाण काल में

3. नवपाषाण शब्द का सबसे पहले प्रयोग किया था

⇒ जॉन लुवाक ने

4 चाक का आविष्कार हुआ था

⇒ नवपाषाण काल में

5. सिंधु घाटी सभ्यता का काल माना जाता है

⇒ 2350 ई० पू० से 1750 ई० पू० तक

6. सिंधु घाटी सभ्यता थी

⇒ आद्य ऐतिहासिक या कास्ययुगीन

7. सिंधु सभ्यता की मुख्य विशेषता थी

⇒ नगर नियोजन

8. सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का मुख्य व्यवसाय था

⇒ व्यापार-वाणिज्य

9. सिंधु सभ्यता का प्रमुख फसल था

⇒ गेहूँ और जौ

10. सिंधु सभ्यता की लिपि थी

⇒ भाव चित्रात्मक

11 आदि मानव ने सर्वप्रथम सीखा था

⇒ आग जलाना

12 सर्वप्रथम पालतु बनाया गया जानवर था

⇒ कुत्ता

13. ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है।

⇒ हेरोडोटस को

14 हड़प्या किस नदी के तट पर स्थित है

⇒ रावी नदी

15. हड़प्पा की खुदाई किया गया था

⇒ 1921 में दयाराम सहनी द्वारा

16. हड़प्पा सभ्यता को ‘सिंधु सभ्यता’ का नाम दिया था

⇒ जॉन मार्शलने

17. हड़प्पा का दो बार सर्वेक्षण किया था

⇒ जनरल कनिंघम ने

18. हड़प्पा की सर्वप्रथम खोज की थी

⇒ चार्ल्स मैसन ने 1826में

19. सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पश्चिमी पुरास्थल था

⇒ सुतका गेंडोर (बलूचिस्तान)

20. सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक पूर्वी पुरास्थल था

⇒ आलमगीर

21. सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक उत्तरी पुरास्थल था

⇒ मांदा (अखनूर, जम्मू-कश्मीर)

22. सिंधु सभ्यता के सर्वाधिक दक्षिणी पुरास्थल था

⇒ दाइमाबाद (अहमद नगर, महाराष्ट्र)

23. सिंधु सभ्यता का कुल क्षेत्रफल है

⇒ 129960० किमी०

24. सिंधु सभ्यता के समूचे क्षेत्रफल का आकार है

⇒ त्रिभुजाकार

25. हड़प्पा को ‘मेसोपोटामिया का उपनिवेश’ कहा था

⇒ ह्वीलर

26. सिंधु सभ्यता का प्रमुख बन्दरगाह था

⇒ लोथल (गुजरात में भोगवा नदी के तट पर)

27 मोहनजोदड़ो किस नदी के तट पर स्थित है

⇒ सिन्धु नदी (पाकिस्तान के लरकाना जिले में)

28. मोहनजोदड़ो की खोज की थी

⇒ राखलदास बनर्जी ने (1922 में) 

29 मोहनजोदड़ो (आधुनिक पाकिस्तान) का अर्थ है

⇒ मृतकों का टीला

30. मोहनजोदड़ो से प्राप्त प्रमुख स्मारक है

⇒ वृहद् स्न्नानागार

31. मोहनजोदड़ो से प्राप्त बड़ी इमारत है

⇒ अन्नागार

32. हडप्पा के लोग अनभिज्ञ थे

⇒ लोहा धातु

33. प्रेसोपोटामिया (आधुनिक नाम इराक) का अर्थ है

⇒ दो नदियों के बीच की भूमि

34. सिंधु सभ्यता का स्थल कालीबंग (राजस्थान) का शाब्दिक अर्थ है

⇒ काली रंग की चूड़ी

35. सिंधु घाटी के लोगों ने पूजा की थी

⇒ मातृदेवी की

36. सिंधु घाटी के लोगों का सबसे महत्त्वपूर्ण वृक्ष था

⇒ पीपल

37. भारत का सबसे बड़ा हड़प्पाई नगर है

⇒ धौलावीर (अर्थ- सफेद कुआँ)

38. चावल का साक्ष्य मिले है

⇒ रंगपुर एवं लोथल से (गुजरात)

39. लिपिस्टिक, काजल, चार पहियों वाला गाड़ी के साक्ष्य मिले है

⇒ चन्हुदड़ो से

40. कांसे की नर्तकी, पुजारी का भवन के साक्ष्य मिला है

⇒ मोहनजोदरों से

41. हड़प्पा के लोगों का सबसे प्रिय पशु था

⇒ कुबर वाला साढ़

42. मिट्टी के हल, खिलौना के साक्ष्य मिले है

➤ बनवाली से

43. हड़प्पा वासियों का प्रमुख खेल था

➤ पाशा

44. हड़प्पावासी तौल में व्यवहार करते थे

➤ 16 या उसके आवर्तों का

45. वेदों की कुल संख्या है

➤ 4 (ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद)

46. सबसे प्राचीन वेद है

➤ ऋग्वेद

47. ऋग्वेद में मंडलों, सुक्तों एवं मंत्रों की संख्या है

➤ 10 मंडल, 1028 सूक्त एवं 10580 मंत्र

48. ऋग्वेद का नौवा मंडल समर्पित है

➤ सोम देवता को

49. गायत्री मंत्र (रचयिता विश्वामित्र) लिया गया है

➤ ऋग्वेद के तीसरा मंडल से

50. ऋग्वैदिक सभ्यता का काल माना जाता है

➤ 1500-1000 ई० पू०

51. ऋग्वेद में सबसे बाद का मंडल है

➤ दसवाँ (पुरुष सुक्त)

52. ऋऋग्वेद में सर्वाधिक पवित्र नदी माना गया है

➤ सरस्वती को

53. ऋग्वेद में सर्वाधिक उल्लेखित नदी है

➤ सिंधु

54. ऋग्वेद में वर्णित सबसे महत्त्वपूर्ण देवता है

➤ इन्द्र

55. ऋग्वेद में बाद में जोड़ा गया मंडल है

➤ पहला एवं दसवाँ

56. सबसे पुरानी भारतीय दवा आयुर्वेद का उद्गम है

➤ अथर्ववेद

57. ऋग्वेद में गंगा तथा यमुना का उल्लेख हुआ है

➤ क्रमशः एक बार तथा तीन बार

58. भारतीय संगीत का जनक है

➤ सामवेद

59. सामवेद का प्रथम लेखक माना जाता है

➤ जैमनी को

60. गद्य एवं पद्य वाला वेद है

➤ यजुर्वेद

61. तंत्र-मंत्र वाला वेद है

➤ अथर्ववेद (सबसे बड़ा वेद)

62. वेदांगों, स्मृतियों तथा पुराणों की संख्या है

➤ क्रमश: 6, 6 तथा 18

63. पुराणों के रचयिता व संग्रहकर्ता माना जाता है

➤ लोमहर्ष तथा उनका पुत्र उग्रश्रवा को

64. सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रमाणिक पुराण है

➤ मत्स्य पुराण

65. मत्स्य पुराण से जानकारी मिलती है

➤ सातवाहन वंश की

66. सामवेद तथा यर्जुवेद में मंत्रों की सख्या है

➤ क्रमश: 1549 तथा 1990

67. उपनिषदों की कुल संख्या है

➤ 108 (प्रमाणिक-13)

68. भारत का प्रसिद्ध राष्ट्रीय वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ लिया गया है

➤ मुण्डाकोपनिषद् से

69. अथर्ववेद में मंडलों, सुक्तों एवं मंत्रों की संख्या है

➤ 20 मंडल, 731 सुक्त, 5839 मंत्र

70. सबसे प्राचीन एवं प्रमाणिक स्मृति है

➤ मनुस्मृति (शुंग वंश के समय रचित)

71. उत्तर वैदिक काल माना गया है

➤ 1000-600 ई० पू० को

72. उत्तर वैदिक काल के प्रमुख देवता है

➤ प्रजापति

73. महाभारत के रचयिता है

➤ वेद व्यास (वास्तविक नाम-द्वैपायन)

74. महाभारत के अन्य नाम है

➤ जयसंहिता

75. सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ है

➤ त्रिपिटक

76. बुद्ध की पूर्व जन्म की कहानी वर्णित है

➤ जातक में

77. जैन साहित्य को कहा जाता है

➤ आगम

78. 16 महाजनपदों का वर्णन है

➤ अंगुत्तर निकाय में

79. जैन धर्म के प्रवर्तक, संस्थापक एवं प्रथम तीर्थकर थे

➤ ऋषभदेव

80. जैन धर्म के 24 वें या अंतिम तीर्थंकर थे

➤ महावीर स्वामी (23वें तीर्थंकर-पार्श्वनाथ)

81. महावीर का जन्म हुआ था

➤ 540 ई पू० वैशाली के कुण्डग्राम में

82. जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है

➤ महावीर को

83. महावीर के पिता, माता तथा पत्नी का नाम था

➤ क्रमशः सिद्धार्थ, त्रिशला और यशोदा

84. महावीर के बचपन का नाम था

➤ वर्द्धमान

85. महावीर थे

➤ क्षत्रिय वर्ण के (ज्ञातृक कुल)

86. मझवीर गृह त्याग कर संयासी हुए थे

➤ 30 वर्ष की अवस्था में

87. महावीर को 42 वर्ष की अवस्था में कैवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति हुई थी

➤ ऋजुपालिका नदी के किनारे साल वृक्ष के नीचे

88. जैनधर्म का प्रारंभिक इतिहास ज्ञात होता है

➤ कल्पसूत्र से (भद्रबाहु द्वारा रचित)

89. महावीर के जीवन कृत्यों का विवरण मिलता है

➤ भगवती सूत्र में

90. ऋषभदेव का प्रतीक चिन्ह है

➤ साढ़

91. पार्श्वनाथ के चार महाव्रतों में पाँचवां महाव्रत ‘ब्रह्मचर्य’ को जोड़ा था

➤ महावीर ने

92. महावीर की पुत्री तथा दामाद का नाम था

➤ प्रियदर्शनी तथा जमाली

93. महावीर का प्रथम अनुयायी था

➤ जमाली (दामाद)

94. मुहावीर के प्रथम भिक्षुणी (शिष्या) थी

➤ पद्मावती (चम्पा नरेश दधिवाहन की पुत्री)

95. महावीर ने सर्वप्रथम उपदेश दिया था

➤ पावापुरी में (प्राकृत भाषा में)

96. जैन धर्म के प्रचार के लिए अपनाया गया था

➤ प्राकृत भाषा

97. कल्पसूत्र लिखा गया है

➤ संस्कृत में

98. महावीर के ग्यारह शिष्य थे, जो कहलाते थे

➤ गणधर

99. जैन धर्म के दो सम्प्रदाय थे

➤ श्वेताम्बर (स्थूलभद्र) और दिगम्बर (भद्रबाहु)

100. जैन धर्म के त्रिरत्न है

➤ सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् आचरण

101. जैन धर्म का प्रतीक चिह्न था

➤ साढ़

102. महावीर का प्रतीक चिह्न था

➤ सिंह

103. महावीर की मृत्यु 72 वर्ष की अवस्था में 468 ई० पू० हुई थी

➤ पावापुरी में (राजगृह के समीप)

104. प्रथम जैन सभा (322 से 298 ई० पू०) हुई थी

➤ पाटलिपुत्र में (स्थूलभद्र की अध्यक्षता में)

105. द्वितीय जैन सभा (512 ई० में) हुई थी

➤ वल्लभी में (देवर्धिक्षमा श्रमण की अध्यक्षता में)

106. खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण कराया था

➤ चंदेल शासकों ने

107. जैन धर्म में जीवन का अंतिम लक्ष्य है

➤ निर्वाण

108. सबसे पुराना जैन कहा जाता है

➤ चौदह पूर्व को

109. महावीर स्वामी को निर्माण प्राप्त हुआ था

➤ मल्लराजा सस्तिपाल के राजप्रासाद में

110. महावीर के मृत्यु के बाद जैन संघ का अध्यक्ष बना

➤ सुधर्मन

111. बौद्ध धर्म के संस्थापक थे

➤ गौतम बुद्ध

112. गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था

➤ 563 ई०पू० (लुम्बनी नामक ग्राम, कपिलवस्तु में)

113. गौतम बुद्ध के पिता, माता, पत्नी तथा पुत्र का नाम था

➤ शुद्धोधन, महामाया, यशोधरा तथा राहुल

114. बुद्ध का लालन पालन किया था

➤ प्रजापति गौतमी (मौसी) ने

115. बुद्ध के बचपन का नाम था

➤ सिद्धार्थ

116. बुद्ध का वंश, वर्ण तथा गोत्र था

➤ शाक्य, क्षत्रिय तथा गौतम

117. 29 वर्ष की अवस्था में बुद्ध द्वारा गृहत्याग की घटना कहलाता है

➤ महाभिनिष्क्रमण (प्रतीक-घोड़ा)

118. 35 वर्ष की अवस्था में 49 वें दिन बुद्ध को बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ

➤ निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे

119. बुद्ध द्वारा ज्ञान प्राप्ति की घटना कहलाता है

➤ सम्बोधि (Great Enlightment) या निर्वाण

120. बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था

➤ सारनाथ में (पाली भाषा में)

121. बुद्ध द्वारा दिया गया प्रथम उपदेश कहलाया

➤ धर्मचक्रप्रवर्त्तन

122. बुद्ध के जन्म, ज्ञान तथा मृत्यु का प्रतीक है

➤ कमल, पीपल तथा स्तुप

123. बुद्ध के घोड़ा तथा सारथी का नाम था

➤ छंदव तथा चाण

124. बुद्ध के प्रथम गुरू थे

➤ आलारकलाम

125. बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश दिए थे

➤ श्रावस्ती (कौशल प्रदेश की राजधानी) में

126. बौद्ध धर्म के त्रिरत्न है

➤ बुद्ध, धम्य और संघ

127. 80 वर्ष की अवस्था में बुद्ध की मृत्यु हुई थी

➤ कुशीनगर (उत्तर प्रदेश, 483 ई०पू०) में

128. बुद्ध की मृत्यु की घटना कहलाया

➤ महापरिनिर्वाण

129. बौद्ध संघ में प्रवेश पाने को कहा जाता था

➤ उपसम्पदा

130. बुद्ध के अनुयायी शासक थे

➤ बिम्बिसार, प्रसेनजित, अशोक एवं उदयन 

131. पाटलिपुत्र (कुसुमपुर) नगर की स्थापना की थी

➤ उदयिन ने (गंगा एवं सोन नदी के संगम पर)

132. बौद्ध धर्म का परम लक्ष्य है

➤ निर्वाण (अर्थ- दीपक का बुझ जाना)

133. बौद्ध संघ में प्रवेश करने वाली पहली महिला थी

➤ सौतेली माँ प्रजापति गौतमी

134. ‘आजीवक सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक थे

➤ मक्खलीपुत्र गोसाल

135. महावीर एवं बुद्ध दोनों ने उपदेश दिए थे

➤ बिम्बिसार के शासनकाल में

136. आष्टागिक मार्ग का संबंध है

➤ बौद्ध धर्म से

137. प्रथम बौद्ध संगीति महाकश्यप की अध्यक्षता में हुआ था

➤ 483 ई० पू० (राजगृह में, अजातशत्रु के काल में)

138. द्वितीय बौद्ध संगीति सबाकामी की अध्यक्षता में हुआ था

➤ 383 ई० पू० (वैशाली में, कालाशोक के समय

139. तृतीय बौद्ध संगीति मोग्गालिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता में हुआ था

➤ 251 ई० पू० (पाटलिपुत्र में, अशोक के समय)

140. चतुर्थ बौद्ध संगीति वसुमित्र व अश्वघोष की अध्यक्षता में हुआ था

➤ प्रथम शताब्दी (कश्मीर में, कनिष्क के समय)

141. हर्यक वंश (544-412 ई० पू०) का प्रथम शक्तिशाली शासक था

➤ बिम्बिसार

142. हर्यक वंश का अंतिम शासक था

➤ नागदशक (उ‌दयन का पुत्र)

143. शिशुनाग वंश का संस्थापक तथा अंतिम शासक था

➤ क्रमशः शिशुनाग तथा नन्दीवर्द्धन

144. नन्द वंश का संस्थापक था

➤ महापद्मनन्द (उग्रसेन)

145. नन्द वंश का अंतिम शासक था

➤ धनानन्द (अग्रमीज)

146. भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण किया था

➤ ईरानीयों ने (दूसरा आक्रमण- सिकन्दर ने)

147. सिकन्दर (यूनानी) ने भारत विजय का अभियान प्रारंभ किया

➤ 326 ई० पू०

148. मगध की प्रारंभिक राजधानी थी

➤ गिरिवज्र (राजगृह)

149. सिकन्दर और पोरस के बीच के युद्ध को कहा जाता है

➤ हाइडेस्पीज (वितस्ता या झेलम) का युद्ध

150. सिकन्दर की मृत्यु हुई थी

➤ बेबीलोन में (323 ई० पू०)

151. ‘कश्मीर के इतिहास’ से संबंधित पुस्तक है

➤ राजतरंगनी (रचयिता-कल्हण)

152. ‘अष्टाध्यायी’ के (संस्कृत भाषा में व्याकरण की प्रथम पुस्तक) लेखक है

➤ पाणिनी

153. इस्लाम धर्म के संस्थापक थे

➤ हजरत मुहम्मद

154. हजरत मुहम्मद का जन्म हुआ था

➤ मक्का में (570 ई० को)

155. हिजरी संवत् की शुरूआत हुई थी

➤ 622 ई० में

156. हजरत मुहम्मद की मृत्यु हुई थी

➤ 8 जून 632 ई० को (मदीना में)

157. सिकन्दर (अलेक्जेन्डर) का जन्म-मृत्यु हुआ था

➤ 356-323 ई० पू० (पिता-फिलिप)

158. सिकन्दर (गुरू- अरस्तु) का सेनापति था

➤ सेल्युकस निकेटर

159. विपासा नदी के नाम से जाना जाता है

➤ व्यास नदी को

160. नंद वंश के पतन तथा मौर्य वंश के उत्थान की जानकारी मिलती है

➤ मुद्राराक्षस में (विशाखदत्त रचित)

161. भारतीय पटल पर आर्य उभरे थे

➤ 2500-1500 ई० पू०

162. आर्य लोग भारत आये थे

➤ मध्य एशिया (यूराल पर्वत) से

163. आर्य सर्वप्रथम बसे थे

➤ पंजाब एवं अफगानिस्तान में

164. आर्यों का मुख्य पेय, व्यवसाय तथा धातु था

➤ क्रमशः सोमरस, पशुपालन तथा लोहा

165. आर्यों का सर्वाधिक प्रिय देवता तथा पशु था

➤ क्रमशः इंद्र एवं घोड़ा

166. आर्यों की मूल भाषा थी

➤ संस्कृत

167. मूर्ति पूजा का प्रारंभ हुआ था

➤ उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई० पू०) में

168. इस्लाम जगत में ‘खलीफा’ पद को समाप्त करने वाला शासक था

➤ मुस्तफा कमालपाशा (1924 में)

169. मौर्य वंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म हुआ था

➤ 345 ई० पू० (मृत्यु-298 ई० पू०)

170. चन्दाप्त मौर्य ने मौर्य वंश की नींव डाली थी

➤ धनानन्द को पराजित कर (अंतिम नन्द शासक)

171. अर्थशास्त्र (राजनीति पर आधारित पुस्तक) के लेखक है

➤ चाणक्य (कौटिल्य)

172. अर्थशास्त्र (संस्कृत) की तुलना किससे की जाती है

➤ अरस्तु की ‘पॉलिटिक्स’ एवं मैकियावेली की ‘प्रिंस’

173. चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरू और महामंत्री थे

➤ चाणक्य (विष्णुगुप्त)

174. सर्वप्रथम भारत को इंडिया से संबंधित किया

➤ यूनानीयों ने

175. चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैनधर्म की शिक्षा ली थी

➤ भद्रबाहु से

176 बन्द्रगुप्त के दरबार में आने वाला प्रसिद्ध यूनानी था

➤ मेगास्थनीज (सेल्युकस निकेटर का राजदूत)

177. ‘चंद्रगुप्त’ शब्द का पहला उल्लेख मिलता है

➤ रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में

178. चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु हुई थी

➤ 298 ई० पू० श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में

179. बिन्दुसार के अन्य नाम है

➤ अमित्रघात्, अमित्रकोड्स, सिंह सेन

180. ‘इंडिका’ पुस्तक को लिखा था

➤ मेगास्थनीज ने

181. भारत में शिलालेख का प्रचलन शुरू किया था

➤ अशोक ने

182. अशोक का नाम ‘अशोक’ किस अभिलेख में मिलता है

➤ मॉस्की (आंध्र प्रदेश) एवं गुर्जरा (मध्य प्रदेश)

183. साँची का स्तुप (मध्य प्रदेश) बनवाया था

➤ अशोक ने

184. श्रीनगर की स्थापना किया था

➤ अशोक ने (वितस्ता नदी के तट पर)

185. अशोक के गुरू थे

➤ मोगलिपुत्रतिस्स

186. अशोक ने बौद्ध धर्म को दीक्षा ली थी

➤ उपगुप्त से

187. अशोक का सबसे छोटा अभिलेख है

➤ रूम्मनदेई अभिलेख

188. अशोक का सबसे बड़ा स्तंभ लेख है

➤ 7वाँ स्तम्भ लेख

189. अशोक का अन्य नाम था

➤ देवनाम प्रिय और प्रियदर्शी

190. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार (पाली भाषा में) के लिए श्रीलंका भेजा था

➤ पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को

191. अशोक के शिलालेख की खोज की थी

➤ टी फैन्थलर ने (1750 ई० में)

192. अशोक के अभिलेख को सर्वप्रथम पढ़ा था

➤ जेम्स प्रिसेंप ने (1837 ई० में)

193. पुसणों में अशोक को कहा गया है

➤ अशोकवर्द्धन

194. अशोक के कुल शिलालेखो की संख्या है

➤ 14

195. अशोक ने ‘धम्म’ स्वीकार किया था

➤ कलिंग युद्ध (261 ई०पू०) के बाद

196. मौर्य वंश का अंतिम शासक था

➤ वृहद्रथ

197. अशोक का राज्याभिषेक हुआ था

➤ 269 ई० पू० (पिता-बिन्दुसार, माता-सुभद्रांगी)

198. सर्वप्रथम सोने के सिक्के चलाने का श्रेय जाता है

➤ इण्डो-ग्रीक (यूनानी शासकों को)

199. अशोक के कलिंग युद्ध का वर्णन है

➤ 13वें अभिलेख में

200. शुंग वंश का संस्थापक तथा अंतिम शासक था

➤ क्रमशः पुष्यमित्र शुंग तथा देवभूति

201. दो अवश्वमेघ तथा एक राजसूय यज्ञ किया था

➤ गौतमी पुत्र शातकर्णी ने

202. खरोष्ठी लिपि लिखी जाती है

➤ दाईं ओर से बाई ओर

203. कण्व वंश का संस्थापक तथा अंतिम शासक था

➤ वसुदेव तथा सुशर्मा कण्व

204. सातवाहन वंश (आंध्र प्रदेश) की नींव डाली थी

➤ सिमुक ने

205. सर्वप्रथम सीसे के सिक्के का प्रचलन किया था

➤ सातवाहन शासक ने

206. कुषाण वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध शासक था

➤ कनिष्क

207. शक संवत् का प्रारंभ किया था

➤ कनिष्क ने (78 ई० में)

208. कनिष्क की प्रथम राजधानी थी

➤ पुरुषपुर या पेशावर (दूसरा-मथुरा)

209. कनिष्क का राजकवि तथा राजवैद्य था

➤ क्रमशः अश्वघोष तथा चरक

210. भारतीयों के लिए महान ‘सिल्क मार्ग’ को आरंभ कराया था

➤ कनिष्क ने

211. ‘भारत का आइन्स्टीन’ कहा जाता है

➤ नागार्जून (शुन्यवाद के प्रवर्त्तक) को

212. गंधार शैली तथा मथुरा शैली का विकास हुआ था

➤ कनिष्क के शासन काल में

213. कुषाण वंश का अंतिम राजा था

➤ वासुदेव

214. गुप्तवंश का संस्थापक था

➤ श्री गुप्त

215. भारतीय इतिहास में ‘स्वर्ण युग’ के नाम से जाना जाता है

➤ गुप्त काल को

216. गुप्त वंश का प्रथम महान सम्राट था

➤ चन्द्रगुप्त प्रथम

217. भारत का नेपोलियन कहा जाता है

➤ समुद्रगुप्त को (चन्द्रगुप्त प्रथम का उतराधिकारी)

218. समुद्रगुप्त का दरबारी कवि था

➤ हरिषेण

219. समुद्रगुप्त का उत्तराधिकारी हुआ

➤ चन्द्रगुप्त-॥ (विक्रमादित्य)

220 चीनी यात्री फाह्यान (399-414 ई०) भारत आया था

➤ चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में

221. चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) के दरबार में प्रसिद्ध कवि व नाटककार थे

➤ कालिदास

222. नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना की थी

➤ कुमार गुप्त ने (विक्रमादित्य का उत्तराधिकारी)

Ancient History

223. अंतिम गुप्त शासक था

➤ भानुगुप्त

224. सर्वाधिक स्वर्ण मुद्राएँ जारी किए थे

➤ गुप्त राजाओं ने

225. मंदिर निर्माण की कला का जन्म हुआ था

➤ गुप्तकाल में

226. मेहरौली (दिल्ली) में स्थित राजाचन्द्र के लौह स्तंभ को बनवाया था

➤ चन्द्रगुप्त द्वितीय ने

227. गुप्तकाल के खगोलविद् थे

➤ वाराहमिहिर

228. पुष्यभूति वंश का संस्थापक था

➤ नरवर्द्धन (महत्त्वपूर्ण शासक- हर्षवर्द्धन)

229. चीनी यात्री ह्वेंसांग  (630-644 ई०) भारत आया था

➤ हर्षवर्धन के शासनकाल में

230. हर्षवर्धन का दरबारी कवि था

➤ बाणभट्ट (हर्षचरित के लेखक)

231. हर्षवर्धन को दक्षिण भारत के शासक पुलकेशिन द्वितीय ने हराया था

➤ नर्मदा नदी किनारे (630 ई० में)

232. वर्धन वंश (पुष्यभूति) की राजधानी थी

➤ थानेश्वर

233. भूमि देने की सामंती प्रथा प्रारंभ की थी

➤ हर्ष ने

234. पल्लव वंश का संस्थापक तथा प्रथम शासक था

➤ सिंहविष्णु (राजधानी- तमिलनाड में काँचीपुरम्)

235. पल्लव वंश का अंतिम शासक था

➤ अपराजित (879-897 ई०)

236. महाबलीपुरम् के एकाश्मक रथों का निर्माण करवाया गया था

➤ पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम द्वारा

237. काँची के कैलाशनाथ मंदिर (राजसिद्धेश्वर मंदिर) का निर्माण करवाया था

➤ पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय ने

238. राष्ट्रकुट राजवंश का संस्थापक था

➤ दंतिदुर्ग (752 ई०)

239. राष्ट्रकुट वंश का अंतिम महान शासक था

➤ कृष्ण तृतीय

240. एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण करवाया था

➤ कृष्ण प्रथम (राष्ट्रकुट वंश) ने

241. राष्ट्रकुट राजवंश की राजधानी थी

➤ मान्यखेट

242. विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना की थी

➤ धर्मपाल ने (पाल वंश)

243. कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की थी

➤ तैलप-॥ ने (राजधानी- मान्यखेट)

244. वातापी के चालुक्य वंश की स्थापना की थी

➤ जयसिंह  ने (राजधानी- वातापी)

245. वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक था

➤ विष्णुवर्धन

246. हिन्दु विधि की पुस्तक मीताक्षरा’ की रचना की थी

➤ विज्ञानेश्वर (विक्रमादित्य-VI के दरबारी)

247. चोल वंश का संस्थापक था

➤ विजयालय (राजधानी- तंजौर)

248. चोल वंश का अंतिम राजा था

➤ राजेन्द्र-III

249. गंगो की प्रारंभिक राजधानी थी

➤ कोलर (बाद में- तलकाडु)

250. पाल वंश का संस्थापक था

➤ गोपाल (राजधानी- मुंगेर)

251. सेनवंश का संस्थापक था

➤ सामन्त सेन (राजधानी- लखनौती)

252. सेनवंश का अंतिम प्रसिद्ध शासक था

➤  लक्ष्मण सेन

253. ‘गीत गोविन्द’ के रचयिता ‘जयदेव’ दरबारी कवि थे

➤ लक्ष्मण सेन के

254. महमूद गजनवी ने 1025 ई० में सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था

➤ भीम प्रथम के शासन काल में (सोलंकी वंश)

255. सोलंकी वंश का संस्थापक तथा अंतिम शासक था

➤ क्रमश: मूलराज प्रथम तथा कुमार पाल

256. गहड़वाल वंश का संस्थापक था

➤ चंद्रदेव

257. दिल्ली नगर की स्थापना की थी

➤  तोमर नरेश अंगपाल ने (11वीं शताब्दी में)

258. चौहान वंश का संस्थापक था

➤ वासुदेव

259. चौहान वंश का अंतिम शासक था

➤ पृथ्वीराज ।।। (पृथ्वीराज चौहान)

260. पृथ्वीराज चौहान एवं मुहम्मद गोरी के बीच तराईन का प्रथम युद्ध हुआ था

➤ 1191 ई० में (विजयी- पृथ्वी राज चौहान)

261. पृथ्वीराज चौहान एवं मुहम्मद गोरी के बीच तराईन का दूसरा युद्ध हुआ था

➤ 1192 ई. में (विजयी- मुहम्मद गौरी)

262. ‘पृथ्वीराज रासो’ के रचयिता थे

➤ चन्दवरदाई (पृथ्वीराज चौहान का राजकवि)

263. महमुद गजनवी ने 1001 से 1027 के बीच भारत पर आक्रमण किया था

➤ 17 बार

264. चंदेल वंश का संस्थापक था

➤ नन्नुक (प्रारंभिक राजधानी- कालिंजर)

265. खजुराहों के मंदिरों (1000 वर्ष पुराना) का निर्माण करवाया था

➤ चंदेल शासकों ने

266. विजय स्तंभ का निर्माण करवाया था

➤ राणा कुम्भा ने (चित्तौड़ में)

267. भारत पर प्रथम मुस्लिम आक्रमण हुआ था

➤ अरबों द्वारा (712 ई० में)

268. होयसल वंश (यादवों की एक शाखा) की राजधानी थी

➤ द्वार समुद्र

269. सोमवार मंदिर का पुननिर्माण कराया था

➤ कुमारपाल ने

270. पुलकेशिन द्वितीय पराजित हुआ था

➤ नरसिंहवर्मन प्रथम (पल्लव शासक) द्वारा

271. पाण्ड्यों का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र था

➤ मदुरै

272. पंजाब के हिन्दू शाही राजवंश को स्थापित किया था

➤ कल्लर ने

273. चोल वंश का अंतिम शासक था

➤ राज राजा द्वितीय

274. मौर्य साम्राज्य में प्रचलित मुद्रा का नाम था

➤ पण

275. बिम्बिसार के समय में मगध की राजधानी थी

➤ राजगृह

276. अरबों ने भारत पर सफल आक्रमण किया था

➤ मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व (712 ई०) में

277. ओदन्तपुरी विश्वविद्यालय की स्थापना की थी

➤ गोपाल ने (पालवंश के संस्थापक)

278. मंदिर निर्माण कला में विमान शैली का प्रचलन हुआ था

➤ चोल शासन काल में

279. ‘योग दर्शन’ तथा ‘सांख्य दर्शन’ के प्रवर्तक थे

➤ क्रमशः पंतजलि तथा कपिल मुनि

280. ‘न्याय दर्शन’ तथा ‘पूर्व मीमांसा दर्शन’ के प्रवर्तक थे

➤ क्रमशः गौतम तथा जैमिनी

281. ‘लिंगायत दर्शन’ के प्रवर्तक थे

➤ वासवराज

282. शुन्यवाद के प्रतिपादक है

➤ नागार्जून

283. भुवनेश्वर (उड़ीसा) में लिंगराज मंदिर का निर्माण (11वीं शदी में) करवाया था

➤ राजा ययाति केसरी ने

284. पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर को बनवाया था

➤ राजा अवन्तिवर्मन ने (11वीं सदी में)

285. विख्यात तट मंदिर (मामल्लपुरम् में) को बनवाया था

➤ पल्लव शासक नरसिंह वर्मन द्वितीय ने

286. मदुरई स्थित मीनाक्षी मंदिर का निर्माण करवाया था

➤ मदुरा नरेश तिरूमल्लाई नायक ने

287. कोणार्क के सूर्य मंदिर को बनवाया था

➤ नरसिंह देव प्रथम ने (1238-64 ई० में)

288. तंजौर में वृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर का निर्माण करवाया था

➤ राज राज-। ने

289. माउंट आबू पर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर को बनवाया था

➤ भीम प्रथम के सामंत (बड़ा किसान) बिमल ने

290. अष्टछाप की स्थापना की थी

➤ आचार्य विट्ठलनाथ ने

291. भारत में चिश्ती सिलसिले की शुरूआत की थी

➤ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने

292. मोहम्मद साहब के जन्म पर मनाया जाने वाला पर्व है

➤ ईद-ए-मिलाद-उनवी

293. बेलूर और हेलबिड में मंदिर का निर्माण करवाया था

➤ होयसलों ने (12वीं शताब्दी में)

294. बीजापुर के गोलगुम्बज मकबरा है

➤ मोहम्मद आदिल शाह का

295. हैदराबाद स्थित चारमीनार का निर्माण करवाया था

➤ मुहम्मद कुली कुतुबशाह ने

296. पुष्टिमार्ग के दर्शन की स्थापना की थी

➤ बल्लभाचार्य ने

297. विशिष्ट द्वैत सिद्धांत के प्रतिपादक थे

➤ रामानुजम

298. अद्वैतवाद सिद्धांत तथा द्वैता द्वैतवाद सिद्धांत के प्रतिपादक थे

➤ क्रमशः श्री शंकराचार्य तथा निम्बकाचार्य

299. द्वैतवाद तथा शुद्धाद्वैत सिद्धांत के प्रतिपादक थे

➤ क्रमशः माधवाचार्य तथा बल्लभाचार्य


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6. Concept of Resources(संसाधनों की अवधारणा)

6. Concept of Resources

(संसाधनों की अवधारणा)



संसाधन का अर्थ

     प्रकृति के वे सभी पदार्थ या वस्तुएँ जो मानवजीवन की परिसंपत्ति (assets) बन जाएँ, संसाधन ( resources) कहलाती हैं। दूसरे शब्दों में, पर्यावरण के वे सारे पदार्थ जो मानवजीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सुख-सुविधा प्रदान करने के लिए उपयोगी हों, संसाधन हैं। ये अवयव प्रकृति में विभिन्न रूपों में पाए जाते हैं।

मानव-एक संसाधन के रूप में

      मानव शरीर स्वयं भी सबसे बड़ा संसाधन है, क्योंकि इससे जीवन के अनेक कार्य किए जाते हैं; जैसे- बोझा ढोना, कार्यालय का काम आदि। मानव स्वयं ही अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपने शरीर और अपनी विभिन्न तकनीकों का उपयोग करता है तथा प्रकृति की अन्य वस्तुओं का भी उपयोग करने के लिए अपनी कार्यात्मकता, अर्थात कार्य करने की योग्यता का विकास करता है।

        मानवीय क्रियाकलाप सर्वाधिक महत्त्व के हैं। मानव न रहे तो सारे पदार्थ या धन यों ही पड़े रह जाएँगे। अपने अनुपम साहस, अपितु दुःसाहस, पराक्रम, शौर्य, संघर्षशीलता, ज्ञान, विलक्षण प्रतिभा, जिज्ञासा और सूझ-बूझ, अन्वेषण करने की तीव्र उत्कंठा इत्यादि गुणों के कारण मनुष्य सभी प्रकार के संसाधनों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यह स्वयं संसाधन होते हुए भी संसाधनों का उपभोक्ता भी है।

मानव-सभी प्रकार के संसाधनों के निर्माता के रूप में

        संसाधन के रूप में किसी पदार्थ का अस्तित्व उसकी उपयोगिता या उपयोगी कार्य/संक्रिया (function/operation) पर निर्भर करता है। कोई पदार्थ जब तक जीवन के लिए उपयोगी सिद्ध नहीं होता तब तक वह संसाधन नहीं कहलाता।

       छोटानागपुर पठार के खनिज भंडार का युगों तक कोई महत्त्व न था, अतः वे खनिज पदार्थ संसाधन न बन पाए। किंतु, जब खनिजों का महत्त्व समझा जाने लगा और लोगों ने अपनी कुशलता का प्रदर्शन कर उनका निष्कासन आरंभ किया तथा उपयोग करने लगा तब वे खनिज संसाधन बन गए। इन खनिजों ने छोटानागपुर क्षेत्र को आर्थिक विकास का सुअवसर प्रदान किया।

Concept of Resources

       इसी तरह, पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग में जोग जलप्रपात (Jog Falls) युगों तक जल की धारा बहाता रहा, किंतु जब शक्ति के विकास में उसका उपयोग जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाने लगा तब वह संसाधन के रूप में उभर आया।

        नदियाँ तभी संसाधन बन पाती हैं जब मानव उनका उपयोग सिंचाई में, जलविद्युत उत्पादन में, मत्स्योद्यम में, जल यातायात में और ऐसी ही अनेक आर्थिक क्रियाओं में करने लगता है। भूगोलवेत्ता जिम्मरमैन ने ठीक ही कहा था कि- “संसाधन हुआ नहीं करते, बना करते हैं।”

संसाधनों का महत्त्व

         विश्व में अनेक पदार्थ बिखरे पड़े हैं। मानव पहले उनका पता लगाता है, फिर वह अपनी बुद्धि, प्रतिभा, क्षमता, तकनीकी ज्ञान और कुशलता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, अपने आर्थिक विकास के लिए, उनके उपयोग की योजना बनाता है और उनका उपयोग करता है।

         उपयोग में लाकर ही वह उन्हें संसाधन बना पाता है। मनुष्य के आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की उपलब्धि अत्यावश्यक है। संसाधनों का महत्त्व इसी तथ्य से स्पष्ट होता है कि इनकी खोज और प्राप्ति के लिए ही मनुष्य कठिन से कठिन परिश्रम करता है। दुर्गम मार्गों पर चलकर दुःसाहसिक यात्राएँ करता है। विश्व के प्रायः सभी युद्ध इन्हीं संसाधनों को पाने या छीनने के लिए हुए हैं।

संसाधनों की परिभाषा

        संसाधन को कई रूपों में पारिभाषित किया जा सकता है। मनुष्य अपने जीवन को सुखद-समृद्ध बनाने तथा अपने आर्थिक विकास के लिए जिन वस्तुओं का उपयोग करता है, उनका निर्माण कुछ मूलभूत पदार्थों से होता है। इन मूलभूत पदार्थों को संसाधन कहते हैं।

        हमारे वातावरण में विद्यमान वे सभी पदार्थ जो हमें उपलब्ध हो तथा हमारे जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, वे केवल उसी स्थिति में संसाधन कहे जा सकते हैं जब हमें उन तक पहुँचने की तकनीक ज्ञात हो साथ ही, उनके परिष्करण और परिवर्द्धन के विभिन्न स्तरों पर होनेवाले खर्चे के लिए हमारे पास पर्याप्त धन हो, श्रमशक्ति हो तथा उनके उपयोग करने पर भी हमारी संस्कृति और परंपरा अक्षुण्ण रह सके।

        वस्तुतः, व्यापक रूप से मनुष्य की इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति करनेवाले सभी पदार्थ संसाधन कहे जा सकते हैं। मनुष्य अपनी व्यापक समझ और सूझ-बूझ से अपने तथा विश्व के वातावरण को बिना प्रभावित किए जिन प्रकृतिप्रदत्त वस्तुओं का उपयोग और उपभोग करता है तथा प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखता है उन्हें ही मूलरूप से संसाधन कहा जाता है।

         कोई गायक, चित्रकार या साहित्यकार अपने क्रियाकलाप से धन कमाता है तो ये कार्य भी संसाधन कहलाते हैं।

संसाधनों का वर्गीकरण

         संसाधनों का वर्गीकरण विभिन्न दृष्टिकोणों से किया जाता है। कुछ वर्गीकरण निम्नलिखित हैं:-

(क) उपलब्धता के आधार पर प्रकृतिप्रदत्त और मानवकृत,

(ख) स्रोत या उत्पत्ति के आधार पर जैविक और अजैविक,

(ग) पुनः प्राप्ति के आधार पर नवीकरणीय और अनवीकरणीय,

(घ) स्वामित्व के आधार पर निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय,

(ङ) विकास के स्तर के आधार पर- संभाव्य, ज्ञात, भंडारित और संचित,

(क) प्रकृतिप्रदत्त और मानवकृत संसाधन:-

       प्रकृति में उपस्थित पदार्थों के साथ ही जलवायु, उच्चावच जैसी भौगोलिक परिस्थितियाँ जो मनुष्य के क्रियाकलापों पर व्यापक प्रभाव डालती है, उन्हें प्रकृतिप्रदत्त या प्राकृतिक संसाधन कहा जाता है। परंतु, केवल उसी स्थिति में जब उन्हें प्राप्त करने और परिष्कृत एवं परिवर्द्धित करने की व्यापक तकनीक उपलब्ध हो तथा उन्हें उपयोगी बनाने हेतु की जानेवाली विभिन्न प्रक्रियाओं के अंतर्गत होनेवाले खर्च को वहन करने के लिए समुचित धन जुटाने की क्षमता हो।

       इसी प्रकार, भवन, सड़कें, रेल लाइनें, विभिन्न प्रकार के निर्मित सामान तथा शिक्षण-प्रशिक्षण, खोज और विकास की विभिन्न संस्थाएँ मानवकृत संसाधन कहलाते हैं।

        व्यावहारिक रूप में प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग मानवीय क्रियाकलापों के प्रथम चरण में किया जाता है, जिसके उपरांत द्वितीयक, तृतीयक और चतुर्थ कोटि के क्रियाकलापों में मुख्यतः मानवकृत संसाधनों का उपयोग किया जाता है।

(ख) जैविक और अजैविक संसाधन:-

        जीवमंडल में विद्यमान और उससे प्राप्त होनेवाले विभिन्न प्रकार के जीव जैसे पक्षी, मछलियाँ, पेड़-पौधे और स्वयं मानव भी जैविक संसाधन कहे जाते हैं। जीव जगत के जीवित सदस्यों में संतानोत्पत्ति की क्षमता होती है। अनुकूल प्राकृतिक परिस्थतियों में ये नई संतानों को उत्पन्न करते रहते हैं। अतः, सभी जैविक संसाधन नवीकरणीय संसाधन होते हैं।

      इसी प्रकार, वातावरण में उपस्थित सभी प्रकार के निर्जीव पदार्थ; जैसे- खनिज, चट्टानें, मिट्टी, नदियाँ, पर्वत इत्यादि अजैविक संसाधन कहे जाते हैं।

(ग) नवीकरणीय और अनवीकरणीय संसाधन:-

           वातावरण में उपलब्ध सूर्य का प्रकाश, हवा, तालाब, झीलें, नदियाँ और समुद्र, मछलियाँ, पेड़-पौधे, उनपर बसेरा लगाए हुए पक्षी एवं वन्य जीव सभी नवीकरणीय संसाधन कहलाते हैं, क्योंकि या तो वे प्राकृतिक रूप से स्वतः उपलब्ध होते हैं या विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक, भौतिक, रासायनिक या जैविक प्रक्रियाओं द्वारा उत्पन्न होते रहते हैं। इनमें से वन और वन्य जीव-जंतु, तालाबों और समुद्रों में एकत्रित जल हमेशा उपलब्ध होते हैं। अतः, इन्हें सतत उपलब्ध संसाधन कहते हैं।

        सूर्य का प्रकाश वर्ष के कुछ दिनों में प्रचुर मात्रा में मिलता है जबकि वर्षाकाल या अन्य कारणों से कुछ दिनों तक या तो कम उपलब्ध होता है अथवा उसकी तीव्रता कम रहती है। इसी प्रकार, नदियों में बहता जल वर्षाऋतु में बाहर निकलकर बाढ़ के रूप में अभिशाप बन जाता है और संसाधन के रूप में नहीं रह पाता है। हवा भी समान गति से उपलब्ध नहीं रहती और आँधी-तूफान में यह लाभप्रद होने के स्थान पर हानिकारक हो जाती है। इन प्रकार के संसाधनों को प्रवहनीय संसाधन कहते हैं।

         कोयला और पेट्रोलियम लाखों वर्षों की जटिल जैव-रासायनिक तथा अन्य भौतिक-रासायनिक प्रक्रियाओं के फलस्वरूप बने है और पृथ्वी के अंदर उनका भंडार जहाँ-तहाँ जमा हो गया है।

         धात्विक खनिजों के साथ भी यही स्थिति है। इनका संचित भंडार सीमित है तथा इन्हें अल्पकाल में कृत्रिम रूप से पुनः बनाना प्रायः असंभव है, अर्थात एक बार इनके समाप्त हो जाने के बाद पुनः इन्हें प्राप्त करना संभव नहीं। ऐसे संसाधनों को अनवीकरणीय संसाधन कहा जाता है।

          कुछ धातुओं को बार-बार पिघलाकर शोधित करके प्रयोग किया जा सकता है, अर्थात इनका चक्रीकरण हो सकता है जबकि कोयले और तेल को जला देने पर प्राप्त राख से कोयला एवं तेल नहीं बन सकता। इनका उपयोग केवल पुनः एक ही बार हो सकता है। इन्हें अचक्रीय संसाधन कहते हैं।

(घ) निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संसाधन:-

       स्वामित्व के आधार पर संसाधन निजी, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय होते हैं। इनका विवरण निम्नलिखित है-

(i) निजी संसाधन-

        उपयोग की अनेक वस्तुएँ; जैसे- कृषि भूमि, उद्यान, मकान, कार, मोटर साइकिल, मोबाइल फोन इत्यादि निजी संसाधन हैं। इनका स्वामी अपनी इच्छानुसार इनका किसी प्रकार से किसी भी समय उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होता है।

(ii) सामुदायिक संसाधन-

       सामुदायिक संसाधन वे संसाधन हैं जिनका उपयोग समुदाय, गाँव और नगर के सभी लोगों के लिए सुलभ हो। गाँवों में चरागाह, खेल के मैदान, तालाब, श्मशान भूमि, साप्ताहिक बाजारों की भूमि, पंचायत भवन, विद्यालय, पर्यटन स्थल इत्यादि सामुदायिक संसाधन हैं।

(iii) राष्ट्रीय संसाधन-

        वैधानिक रूप से किसी राज्य या देश की सीमा के अंदर सभी प्रकार के संसाधनों पर उस राज्य या देश का स्वामित्व होता है। कृषि भूमि को निजी माना जा सकता है, क्योंकि सरकार के द्वारा इसपर खेती करने अथवा निजी उपयोग के लिए किसानों और उपभोक्ताओं को अधिकृत किया गया है जिसके बदले उनसे लगान अथवा अन्य कर लिए जाते हैं।

         प्राचीनकाल में राजाओं को राज्य की संपत्ति का स्वामी माना जाता था। वर्तमान काल में यह अधिकार सरकार के पास है, इसीलिए आवश्यकता पड़ने पर सरकार द्वारा सड़क या रेल लाइन बिछाने, नहरों और कारखानों के निर्माण इत्यादि कार्य के लिए किसी भी भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाता है। इसके बदले सरकार कुछ मुआवजा राशि भी देती है तथा विस्थापितों के पुनर्वास का प्रबंध किया जाता है, क्योंकि नागरिकों को यह सुविधा प्रदान करना सरकार का प्रमुख उत्तरदायित्व भी है। सागरतटों के पास 12 समुद्री मील, अर्थात 19.2 किलोमीटर तक के महासागरीय क्षेत्र में पाए जानेवाले संसाधन भी देश की संपत्ति हैं।

(iv) अंतरराष्ट्रीय संसाधन-

       पृथ्वी के अधिकांश भाग में सागर और महासागर हैं। यथार्थ में मात्र 29 प्रतिशत भूतल ही विभिन्न राष्ट्रों की राष्ट्रीय संपत्ति है और शेष 71 प्रतिशत भाग किसी की अपनी संपत्ति नहीं है। ज्ञातव्य है कि जलीय जीवों के साथ ही विभिन्न संसाधनों का विपुल भंडार इन समुद्रों में विद्यमान है। इनके उपयोग के लिए कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ हैं। अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, सागरतट से 200 किलोमीटर तक के महासागरीय क्षेत्र को किसी देश का अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र माना जाता है जहाँ से मछलियाँ पकड़ने तथा भूतल से धातुएँ एवं अन्य वस्तुएँ प्राप्त करने का उसे अधिकार है, परंतु अन्य देशों के जहाजों के परिवहन अथवा अन्य उपयोगों की भी स्वतंत्रता रहती है।

(ङ) संभाव्य, ज्ञात, भंडारित और संचित संसाधन-

       विकास के स्तर के आधार पर संसाधनों की निम्नलिखित चार श्रेणियाँ होती हैं-

(i) संभाव्य संसाधन-

       ऐसे सभी संसाधन जिनका उपयोग किया जा सके, भले ही उचित तकनीक, अर्थाभाव या अन्य किसी कारण से उनका उपयोग नहीं होता हो, संभाव्य संसाधन कहे जाते हैं। उदाहरणस्वरूप, भारत में पेट्रोलियम मिलने की संभावना पूर्वी और पश्चिमी तटों के साथ ही असम, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान इत्यादि अनेक स्थानों पर है, परंतु केवल असम तथा पश्चिमी घाट के पास से लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम निकाला जा सका है।

        इसी प्रकार, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, सागरीय ज्वार ऊर्जा इत्यादि के लिए भारत में अपार संभावना है, परंतु कुछ ही स्थानों पर इनका उपयोग हो पाता है सस्ती, सुगम तकनीक के विकास से इनके उपयोग की बड़ी संभावना है अन्वेषण या सर्वे (survey) विभाग द्वारा इनकी खोज की जाती है।

(ii) ज्ञात संसाधन-

        जिन संसाधनों को ढूंढकर उनका उपयोग किया जाता हो उन्हें ज्ञात संसाधन कहते हैं, जैसे असम, बॉम्बे हाई. गुजरात के तेल कूपों से पेट्रोलियम निकाला जा रहा है। ज्ञात संसाधन वे संसाधन है जिनकी तकनीक विकसित हो चुकी हो तथा सार्थक उपयोग ज्ञात हो।

(iii) भंडारित संसाधन-

      विकसित देशों ने ऐसी तकनीकों की खोज की है जिनसे पृथ्वी के अंदर उपस्थित खनिजों की पहचान संभव हो सकी है। विकसित देश कई किलोमीटर गहराई तक भूतल को भेदकर खनिज निकालते हैं जबकि भारत जैसे विकासशील देश एक किलोमीटर से अधिक गहराई तक नहीं खोद पाते। अविकसित देशों में तो इतना भी उपयोग नहीं हो पाता।

      अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका की नदियों की विपुल जल राशि व्यर्थ बहकर समुद्र में गिरती है, परंतु अपार संभावनाओं के बाद भी तकनीक और धन के अभाव में जलविद्युत का उत्पादन नहीं हो पाता। यह संसाधन भंडारित नहीं हो पाता है। वस्तुतः इसके विकास से ही अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन संभव है।

(iv) संचित संसाधन-

       कुछ संसाधन जिनके उपयोग करने की तकनीक ज्ञात हो, परंतु और सस्ती तकनीक के अभाव अथवा अन्य कारणों से उनका उपयोग वर्तमान में न होता हो तथा भविष्य में उपयोग करना संभव हो, उन्हें संचित संसाधन कहते हैं। अमेरिका के तटीय प्रदेशों में पेट्रोलियम का प्रचुर भंडार है, परंतु वह खाड़ी या अन्य देशों के पेट्रोलियम का उपयोग करता है। इन भंडारों के समाप्त होने पर ही अपने संचित भंडारों का उपयोग करेगा।

        इसी प्रकार, हाइड्रोजन गैस सर्वोत्तम ईंधन है और इसे पानी से प्राप्त किया जा सकता है। पानी नदी, तालाब और समुद्रों में आसानी से बड़ी मात्रा में उपलब्ध भी है। फिर भी, इसका उपयोग सीमित मात्रा में ही होता है, क्योंकि इसे पानी से अलग करना कुछ कठिन है। परंतु, पेट्रोलियम के सीमित भंडार के समाप्त होने पर एकमात्र हाइड्रोजन ईंधन ही ऊर्जा का प्रमुख साधन होगा। अभी इसे भंडारित संसाधन भी कहा जा सकता है और संचित भी।

         प्रायः, संचित भंडार के कुछ भाग को ज्ञात तकनीक द्वारा उपयोग में लाया जाता है और शेष भाग को भावी पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा जाता है। सिंचाई के लिए नदियों से नहरें निकाली जाती है, परंतु बरसात के दिनों में इनका उपयोग नहीं होता। खेतो में वर्षा जल प्राप्त होता रहता है। इस समय नहरों में जमा जल संचित भंडार है जिसका उपयोग वर्षा के बाद सिंचाई के लिए किया जाता है।

30. Interpretation of Topographical Maps (स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)

Interpretation of Topographical Maps

(स्थलाकृतिक मानचित्र का प्रदर्शन)



स्थलाकृतिक मानचित्र का अर्थ:-

         स्थलाकृतिक मानचित्र पृथ्वी की सतह पर दिखाई देने वाली विशेषताओं के विस्तृत चित्रमय एवं सटीक प्रतिनिधित्व को संदर्भित करता है। ये समतल तथा भूगणितीय सर्वेक्षणों पर आधारित ऐसे बहु-उद्देशीय मानचित्र होते हैं जिन्हें वृहत् मापक या मापनी (Large Scale) पर बनाया जाता है। इन्हें सामान्य उपयोग वाले मानचित्र भी कहा जाता है।

    इन मानचित्रों पर प्राकृतिक व सांस्कृतिक विवरण या लक्षणों जैसे- उच्चावच, धरातल, जल-प्रवाह, जलाशय, वनस्पति, गाँव, नगर, सड़कें, नहरें, रेल लाइनें पूजा स्थल आदि को देखा जा सकता है। मानचित्रों पर इन सभी विवरणों को रूढ़ चिह्नों एवं प्रतीकों द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैं।

   अर्थात् स्थलाकृतिक मानचित्र ऐसे मानचित्र है जो भौगोलिक विशेषताओं के स्थानों का प्रतिनिधित्व करते है। ये भौगोलिक विशेषताएँ पहाड़, घाटियाँ, मैदानी सतह, जल निकाय और बहुत कुछ हो सकती हैं। अतः स्थलाकृतिक मानचित्र बड़े और मध्यम पैमाने के मानचित्रों को संदर्भित करते हैं जिनमें विभिन्न प्रकार की जानकारी शामिल होती है।

       स्थलाकृतिक मानचित्र के सभी घटक समान महत्व रखते हैं। किसी विशेष सतह के व्यापक विश्लेषण के कारण ये मानचित्र भू-विज्ञान के क्षेत्र का एक अनिवार्य हिस्सा या भाग हैं। ये मानचित्र सभी देशों की राष्ट्रीय मानचित्र संगठनों द्वारा तैयार एवं प्रकाशित किए जाते हैं।

        उदाहरण के लिए भारतीय सर्वेक्षण विभाग, भारत में, पूरे देश के लिए स्थलाकृतिक मानचित्र तैयार करता है। भारत में स्थलाकृतिक मानचित्र दो श्रृंखलाओं में तैयार किए जाते हैं- भारत एवं पडोसी देशों की श्रृंखला एवं विश्व के अंतर्राष्ट्रीय मानचित्रों की श्रृंखला।

स्थलाकृतिक मानचित्र को परिभाषित करते हुए फिलिस डिन्क महोदय ने लिखा है- “स्थलाकृतिक मानचित्र दीर्घमापक मानचित्र हैं किन्तु इनका आकार भू-मानचित्रों से छोटा होता है। चूंकि इनका आकार बड़ा होता है अतः ये प्राकृतिक एवं मानव द्वारा निर्मित विभिन्न लक्षणों, जैसे- पर्वतों, नदियों, जंगलों, नगरों, गाँवों, सड़कों, रेलों व नहरों आदि को प्रदर्शित करते हैं। ये मानचित्र यात्री व मोटर चालकों, युद्ध भूमि में सैनिकों तथा किसी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्ययन में भूगोलवेत्ताओं के लिए गाइड का कार्य करते हैं।

जोन बाइगोट के अनुसार, “स्थलाकृतिक मानचित्र सूक्ष्म सर्वेक्षण पर आधारित वृहद् मापक मानचित्र होते है जिनमें प्राकृतिक एवं मानव निर्मित विभिन्न लक्षणों को विस्तार से प्रदर्शित किया जाता है।”

इरविन रेज के अनुसार, “वृहद् एवं मध्यवर्ती मापनी पर बने सामान्य मानचित्र जिनमें उच्चावच सहित सभी महत्त्वपूर्ण लक्षणों को प्रदर्शित किया जाता है, स्थलाकृतिक मानचित्र कहलाते हैं।”

 भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक

         भारतीय सर्वेक्षण विभाग (देहरादून) द्वारा प्रकाशित मानचित्र एवं धरातल पत्रक के निम्न प्रकार हैं-

(1) भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला (India and adjacent Countries)

       इस श्रृंखला के मानचित्रों का मापक भी 1:1,000,000 है। इस मापक पर ही भारत और उसके समीपवर्ती देशों के मानचित्र बनाए जाते है। इसमें प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तर है। अतः 4° उत्तरी अक्षांश से 40° उत्तरी अक्षांश तक तथा 44° पूर्वी देशान्तर से 104° पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित क्षेत्र को शामिल किया गया है।

       इसमें सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप जैसे- अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश एवं म्यामार और मध्य पूर्व के देश थाईलैण्ड, वियतनाम, कम्बोडिया, तिब्बत, कैस्पियन सागर का दक्षिणी भाग, तुर्कमिनिस्तान, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, किर्गिजस्तान देश शामिल हैं। इस सम्पूर्ण क्षेत्र को 4×4 के कुल 106 भागों में विभाजित किया गया है। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र को संख्या में 1 से 106 तक क्रमशः दिया गया है।

       भारतीय क्षेत्र 40 से 92 के बीच क्रम संख्या में पाए जाते हैं। ये संख्याएँ सूचक संख्याएँ (Index Number) कहलाती है। उदाहरण के लिए, 47 व 43 सूचकांक मुम्बई व श्री नगर के पत्रकों के नाम से जाना जाता है। यह श्रृंखला वर्तमान में प्रकाशित नही होती है, परन्तु यह भारत में छपने वाली अन्य सभी श्रृंखलाओं का आधार है। इस श्रृंखला का प्रत्येक मानचित्र 4 डिग्री शीट या एक मिलियन शीट कहलाता है।

Interpretation of Topo

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला (International Series):-

      भारतीय सर्वेक्षण विभाग, अन्तर्राष्ट्रीय समिति 1909 के समझौते के अनुसार अब अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला का प्रकाशन करता है। इस श्रृंखला के मानचित्र 1:1,000,000 मापक पर बनाए जाते हैं। 60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों के मध्य स्थित क्षेत्रों के प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 6° देशान्तर है। इस क्षेत्र हेतु 1800 शीटे तैयार की गयी है।

         60° अक्षांश-88° अक्षांश के मध्य स्थित क्षेत्र की 4° अक्षांश तथा 12° देशान्तर विस्तार की 420 सीटे हैं। इसके अतिरिक्त दो अर्धव्यास वाले 2 मानचित्र ध्रुवीय क्षेत्रों के हैं। सम्पूर्ण विश्व के लिए 2222 शीट इस श्रृंखला में हैं। इस श्रृंखला की प्रत्येक शीट एक मिलियन शीट कहलाती है।

स्थलाकृतिक शीट के प्रकार

       भारतीय सर्वेक्षण विभाग के स्थलाकृतिक अंशचित्रों का अंकन ‘भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला’ (India and Adjacent Countries Series) पर आधारित है।

स्थलाकृतिक 

         मानचित्र के पैमाने के आधार पर स्थलाकृतिक शीटों को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है।

1. 4×4 डिग्री या मिलियन शीट 

          इस श्रृंखला के सभी मानचित्र 1:1,000,000 मापनी (1 इंच=16 मील) पर तैयार किए गए हैं। इनमें से प्रत्येक मानचित्र 4° अक्षांश व 4° देशांतर (4° x 4°) के बीच स्थित क्षेत्र को प्रदर्शित करता है।

        पहचान के लिए प्रत्येक 1 मिलियन मानचित्र पर उसकी सूचक संख्या (Index Number) जैसे- 51, 52, 53, 54 आदि लिखी होती है। प्रत्येक मिलियन मानचित्र को 16 चौथाई इंच (1″ = 4 मील) अंशचित्रों में, प्रत्येक चौथाई इंच अंशचित्रों को 4 आधा इंच (1″ = 2 मील) अंशचित्रों में तथा प्रत्येक आधा इंच अंशचित्रों को 4 एक इंच (1″ = 1 मील) अंशचित्रों में विभाजित किया गया है।

चित्र: मिलियन शीट या चार डिग्री शीट

नोट: कभी-कभी किसी शीट का नामकरण उस शीट में अंकित प्रमुख नगर के नाम पर किया जाता है। जैसे 43, 47, 53, 57, 72 सूचकांक वाली शीटों को क्रमशः श्रीनगर शीट, बम्बई शीट, दिल्ली शीट, मद्रास शीट एवं पटना के नाम से भी जाना जाता है।

⇒ समोच्च अंतराल 500 मीटर है।

⇒ चूंकि, इन मानचित्रों में विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है, इसलिए टोपो शीट के रूप में इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया है।

2. एक डिग्री शीट (Degree Sheet):

        किसी 1 इंच = 16 मील मापनी वाले मानचित्र को 1 इंच = 4 मील मापनी वाले 16 अंशचित्रों में विभाजित करने पर, प्रत्येक अंश चित्र 1° अक्षांश x 1° देशांतर क्षेत्र को प्रदर्शित करता है। अतः इन अंशचित्रों को चौथाई इंच शीट कहा जाता है। डिग्री शीटों को सूचित करने के लिए A से P तक के 16 अक्षरों का प्रयोग किया जाता है। इसका R.F. 1:250000 होता है।

एक डिग्री शीट

चित्र: एक डिग्री शीट

     किसी डिग्री शीट का नामकरण करने के लिए उस शीट के अंग्रेजी अक्षर को संबंधित 1 मिलियन मानचित्र की सूचक संख्या के बाद लिख दिया जाता है। जैसे- 53A, 53B, 53C 53P.

⇒ समोच्च अंतराल 250 मीटर है।

3. आधा डिग्री शीट (Half Degree Sheet):-

      इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को चार आधा डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 2 मील होती है। अतः इसे आधा इंच शीट भी कहा जाता है। इसका R.F. 1:100000 होता है। इसका विस्तार 30° अक्षांश x 30° देशांतर होता है।

      प्रत्येक आधा इंच शीट की सूचक संख्या में उसकी दिशा के साथ-साथ संबंधित 1 मिलियन की सूचक संख्या व डिग्री शीट का अंग्रेजी अक्षर लिखा जाता है। जैसे : 53 A/NE, 53 A/SE, 53 A/SW, 53 A/NW। अत: यदि किसी शीट की सूचक संख्या 53 A/NE है, तो इसका अर्थ है कि वह शीट 53 सूचक संख्या वाले 1 मिलियन के A अक्षर वाले डिग्री शीट का NE भाग सूचित करता है।

⇒ इसका समोच्च अंतराल 100 मीटर है।

चित्र: आधा डिग्री शीट

4. चौथाई डिग्री शीट (Quarter Degree Sheet):-

    इसके अंतर्गत किसी डिग्री शीट को 16 चौथाई डिग्री शीटों में विभाजित किया जाता है। इस शीट की मापनी 1 इंच = 1 मील होती है। अतः इसे एक इंच शीट भी कहा जाता है। इसका विस्तार चौथाई डिग्री (15′ अक्षांश x 15′ देशांतर) होता है। इसका R.F. 1 : 50,000 होता है।

       इस प्रकार किसी 1 मिलियन मानचित्र में 256 डिग्री शीट में 16 तथा आधा डिग्री शीट में 4 एक इंच शीटें होती हैं। किसी एक इंच शीट की सूचक संख्या को उस शीट की संबंधित डिग्री शीट में क्रमांक संख्या के अनुसार निश्चित किया जाता है। जैसे – 53 A/1, 53 A/2, ……..453A/16।

⇒ इसका समोच्च अंतराल 50 मीटर है।

चित्र: चौथाई डिग्री शीट

            इस प्रकार  तीनों एक साथ देखा जा सकता है-

5. नई श्रृंखला टोपो शीट्स:-

            टोपो शीट की यह श्रृंखला चौथाई डिग्री टोपो शीट के भीतर 1/8° अक्षांश (7.5 मिनट) और 1/8° देशांतर (7.5 मिनट) तक फैले क्षेत्र को कवर करती है। जब चौथाई डिग्री शीट को 4 बराबर भागों में विभाजित किया जाता है, तो हमें बहुत सारी जानकारी के साथ बहुत बड़े पैमाने की टोपो शीट मिलती हैं। इन्हें 53A 1/NE, 53A 1/NW, 53A 1/SE, और 53A 1/SW क्रमांकित किया गया है। इसका स्केल 1:25000 है।

⇒ उद्देश्य और क्षेत्र के आधार पर इसका समोच्च अंतराल 5-20 मीटर के बीच होता है। उदाहरण के लिए, पहाड़ी क्षेत्र की ऊँचाई अधिक है और समोच्च अंतराल थोड़ा बड़ा होना चाहिए। जबकि मैदानी क्षेत्रों में समोच्च अंतराल छोटा होना चाहिए।


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5. The Concept of Sustainable Development (शाश्वत विकास की अवधारणा) 

5. The Concept of Sustainable Development

(शाश्वत विकास की अवधारणा)



        Sustainable Development

          विश्व में प्रादेशिक विकास की अवधारणा को समय-समय पर राजनीतिक विचारकों ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। वर्तमान समय में प्रादेशिक विकास का जो स्वरूप उभड़ा है, वह विश्वव्यापी राजनीति से ओतप्रोत है। औपनिवेशिक राष्ट्रों का शोषण, अविकसित देशों के संसाधनों का दोहन, विनिर्माण प्रक्रिया एवं सम्पत्ति का शक्तिशाली राष्ट्रों में समूह प्रादेशिक विकास की आड़ में तथा विकास मॉडलों के अविवेकपूर्ण अध्यारोपण से प्रादेशिक विकास के परिणाम प्रभावित हुए हैं। पाकिस्तान आज भी आर्थिक विकास हेतु पराश्रित है । बंगलादेश भी स्वतंत्र होकर उसी दुश्चक्र का अंग बन गया है।

        नेपाल भारत की विरासत एक होते हुए भी नेपाल को अपने प्रच्छन्न व्यक्तित्व के प्रति आगाह करते हुए भारतीय उपमहाद्वीप के प्रादेशिक विकास को बाधित करने से 20वीं शताब्दी के अंत में सर्वत्र प्रादेशिक विकास एक खोखला नारा बनकर रह गया है। यही हाल ब्राजील, अर्जेण्टाइना, कैरेबियन राष्ट्र तथा अफ्रीकी देशों का है।

         विकास का अंतिम उत्पाद विनाश के रूप में प्रकट हो रहा है। इससे संसाधन विदोहन है। जन संसाधन का दुरुपयोग हुआ है। पर्यावरण की गुणवत्ता का ह्रास हुआ है तथा हुआ विकास के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई हैं। इस परिप्रेक्ष्य में शाश्वत विकास या अक्षुण्ण विकास की प्रक्रिया का उल्लेख आवश्यक प्रतीत होता है।

       शाश्वत विकास की संकल्पना भौगोलिक संकल्पना है, जिसमें मानवीय और पारिस्थितिकीय तत्त्वों के अन्तर्क्रियात्मक सम्बन्धों को इस प्रकार व्यवस्थित एवं नियोजित करने पर बल दिया जाता है, जिससे आर्थिक विकास प्रतिरूप वर्तमान की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए आगामी पीढ़ियों की आवयकताओं को पूर्ण कर सके।

       पहले यह स्पष्ट किया जा चुका है कि विकास या भौगोलिक सन्दर्भ में प्रादेशिक विकास मानव और उसकी विभिन्न विशेषताओं तथा प्राकृतिक पर्यावरण के तथ्यों के पारस्परिक कार्यात्मक सम्बन्धों का परिणाम है। विकास की प्रक्रिया में कुछ क्षेत्रों में मानवीय क्षमता के अत्यधिक निवेश से पर्यावरण के तथ्यों का अधिकाधिक शोषण हुआ। मनुष्य ने वहाँ कम समय में चरण विकास के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया। वहाँ पुनः विकास के लिए संसाधनों की कमी सामने आने लगी है। दूसरी ओर विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों के अत्यधिक ह्रास से पारिस्थितिकीय संतुलन भी बिगड़ने लगा, जिससे मनुष्य के लिये खतरा उत्पन्न हो गया। इसी तरह दूसरे बहुत से क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों के अवैज्ञानिक शोषण से भी पारिस्थितिकीय सन्तुलन प्रभावित होने लगा।

        इस विषम परिस्थिति से निजात पाने के लिये ही वर्तमान समय में शाश्वत विकास की संकल्पना का जन्म हुआ है। यह एक विश्वव्यापी नारे के रूप में प्रचलित होती जा रही है जिसमें पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाये रखना और जैवीय विविधता की सुरक्षा पर विशेष बल दिया जा रहा है। सातवें दशक के अंत में और 1992 में हुए पृथ्वी सम्मेलन में इस संकल्पना को व्यापक आधार मिला है।

        पारिस्थितिकीय शाश्वत विकास (Ecologically Sustainable Development) का सामान्य हिन्दी अनुवाद पारिस्थितिकीय दृष्टिकोण से उपयुक्त दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहने वाला विकास है। अर्थात् इसमें विकास निर्वाह योग्य माना गया है, जो वर्तमान पीढ़ियों की आववश्यकता को पूर्ण करते हुए भविष्य के लिये भी बना रहे। इसके अन्तर्गत सम्मिलित पारिस्थितिकी है, जो जैव समुदाय और उनके पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन है। यह ग्रीक शब्द ‘Oikos’ से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘Living Place’ होता है।

        अर्थात् विभिन्न जैव समुदाय और पर्यावरण के बीच कैसा सन्तुलन विकसित हो, जिससे दोनों का अस्तित्व अनवरत रूप से बना रहे। यह संकल्पना भूगोल विज्ञान के अभिन्न अंग के रूप में परम्परागत रूप से रही है, क्योंकि पहले से ही भूगोल मानव और प्रकृति के परिवर्तनशील अन्तर्सम्बन्धों का अध्ययन करता रहा है। इसलिये विकास हेतु विभिन्न पर्यावरणीय तथ्यों का मानव द्वारा इस प्रकार उपयोग किया जाय कि पारिस्थितिकीय सन्तुलन भी बना रहे और मानव अपना विकास भी करता रहे।

       दूसरा शब्द ‘शाश्वतता’ (Sustainability) है, जिसका अर्थ अनवरत रूप से दीर्घकाल तक बना रहना है अर्थात् ऐसा आर्थिक विकास जो दीर्घकाल तक जारी रहे इसे अक्षय विकास भी कह सकते हैं या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह सामाजिक-आर्थिक प्रत्यावर्तन की ऐसी प्रक्रिया है, जिसके परिणाम समान रूप से वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिये उपलब्ध होते रहें, अर्थात् यह उत्पादन के कारकों और उपभोग के तत्त्वों के बीच संतुलन के स्तर की ओर इंगित करती है।

          सन्तुलन का स्तर इस प्रकार का होना चाहिये कि जिसमें विकास प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले सभी चर एक साथ बिना एक-दूसरे से आगे निकले हुए एक-दूसरे के पूरक के रूप में योगदान देते रहें, जब तक क्रमिक रूप में ये चर एक-दूसरे के साथ विकासात्मक रूप से योगदान देते रहेंगे तब तक किसी भी चर का कोई ऋणात्मक प्रभाव नहीं दिखाई देगा।

       इसके विपरीत विभिन्न चरों की पारस्परिक विकासात्मक प्रवृत्ति में यदि कोई एक चर आगे निकल जायेगा अथवा अत्यधिक ह्रास होगा तो सम्पूर्ण सन्तुलन सम बिगड़ जायेगा, जिसका परिणाम भौतिक पर्यावरण पर दृष्टिगोचर होगा। इससे विकास प्रतिरूप भी दीर्घकाल तक नहीं बना रह पायेगा। अर्थात् ‘शाश्वतता’ के अन्तर्गत दो संकल्पनाएँ अन्तर्निहित हैं-

1. मूलभूत आवश्यकता की संकल्पना:-

           इसके अन्तर्गत माना जाता है कि मनुष्य की न्यूनतम मौलिक आवश्यकता को पूर्ण करना ही विकास हैं। वर्तमान समाज की आवश्यकताओं को पूर्ण करते हुए भावी पीढ़ियों के लिये भी संसाधनों को सुरक्षित छोड़ देना ही शाश्वत विकास है।

         यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विभिन्न क्षेत्रों के मानव समाज में कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ समान रूप से हैं, यथा- भोजन, वस्त्र, आवास, स्वास्थ्य सुविधा आदि लेकिन कई समाजों के उपभोग की परिवर्तनशील प्रवृत्ति और उसको पूरा करने के लिये संसाधनों का अंधाधुंध शोषण जारी रहने पर संसाधनों में ह्रास होगा और उनके दीर्घकालीन तक चलते रहने की संभावना भी समाप्त होगी। इसलिये उपभोग के तत्त्वों के प्रयोग पर नियंत्रण अथवा उनका परिमार्जन इस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि विकास को प्रभावित करने वाला चर समाप्त न हो या उसका कोई दुष्प्रभाव न पड़े।

          पश्चिमी देशों की उपभोक्ता संस्कृति इसका उदाहरण है। जहाँ उपभोग हेतु कई जैव प्रजातियों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है। इससे विश्व में जैव सन्तुलन को खतरा उत्पन्न हो गया है। या यों कह सकते हैं कि विकसित औद्योगिक देशों द्वारा ही उत्सर्जित अपशिष्टों से ओजोन परत को हानि हो रही है। इसलिये शाश्वत के अन्तर्गत मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते हुए उपभोग स्तर को भी नियोजित करना सम्मिलित है। 

2. प्राविधिक स्तर:-

       इसके अन्तर्गत विभिन्न उत्पादनों हेतु प्रयुक्त तकनीकी स्तर हैं। बहुत से देशों में तकनीकी स्तर अत्यन्त उच्च स्तरीय हैं, जिससे वे कम लागत पर विभिन्न साधनों का शोषण करके अपने उपभोग स्तर में वृद्धि करते हैं और इतना ही नहीं वे इसका विपणन भी करते हैं, जबकि अन्य देश अपनी देशी व परम्परागत तकनीक के प्रयोग से धीरे-धीरे यही कार्य करते हैं। भौगोलिक रूप में उत्पादन कार्यों के लिये इस प्रकार की तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए, जिससे विकास के अन्य चरों को हानि न पहुँचे।

        तीसरे शब्द का अर्थ है, जैसा पहले विश्लेषित किया जा चुका है कि विकास एक समन्वित प्रक्रिया है, जिससे मानव जीवन के अस्तित्व का एक निश्चित स्तर प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् इसमें मानव और प्रकृति के मध्य उत्पादक, व्यवधान रहित और शोषण मुक्त चरों का समन्वित प्रतिरूप सम्मिलित है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि शाश्वत विकास के अन्तर्गत पारिस्थितिकीय तंत्र के विभिन्न चरों का संरक्षण, अभिरक्षण, सुरक्षा एवं अक्षुण्ण रूप से निर्वहन सम्मिलित है।

         इस तरह अक्षुण्ण अर्थात् शाश्वत विकास अर्थव्यव्सथा के विभिन्न प्रतिरूपों (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) में समन्वय पर बल देते हुए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र से बाँधे रखने पर बल देता है। इस तंत्र को संरक्षित एवं पोषित करने की आवश्यकता है, ताकि विकास प्रक्रिया शाश्वत रूप से जारी रहे। भूगोल में शाश्वत विकास की संकल्पना वर्तमान समय में दो कारणों से आयी है-

1. मानव और पर्यारण तंत्र के असंगत सम्बन्ध ने पारिस्थितिकीय सन्तुलन को झकझोर दिया है। वर्तमान मानव समाज के सम्मुख भोजन, जल, शुद्ध वायु और समुचित जगह आदि अनेक समस्याएँ स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के तीव्र शोषण से अस्तित्व में आयी हैं। वनों और मिट्टियों का उत्पादक कार्यों में इतनी तीव्र गति से प्रयोग से हो रहा है, जिससे वे तेजी से घटते जा रहे हैं। परिणाम यह है कि मनुष्य के लिये वे अनुपयोगी होते जा रहे हैं। क्योंकि प्रकृति द्वारा वे शीघ्रता से निर्मित नहीं किये जा सकते हैं। पशुचारण और अत्यधिक शस्योत्पादन से अर्थव्यवस्था का स्रोत नष्ट होता जा रहा है। ऊर्जा साधनों का औद्योगीकरण के कारण तेजी से ह्रास हो रहा है।

        आर्थिक विकास के लिये आवश्यक ये तत्त्व प्रकृति द्वारा लाखों करोड़ों वर्षों में निर्मित किये गये हैं। इनको शीघ्रता से पुनर्नवीकृत नहीं किया जा सकता है। परमाणु ऊर्जा से निःसृत रेडियोधर्मिता से जल व वायु प्रदूषित होकर मानव के लिये हानिकारक सिद्ध हो रहे हैं। अनियंत्रित कृषि और तीव्र औद्योगीकरण से धरातल, जल और वायु भी प्रदूषित हो रहे हैं। महासागर जो भावी जनसंख्या के लिये भोजन के स्रोत हैं। एक तरह से कूड़े कचरे के गड्ढे में परिवर्तित हो रहे हैं। जनसंख्या वृद्धि और पर्यावरण के उपयोग की कोई सीमा नहीं है।

         यह अनुमान किया जा सकता है कि सन् 2050 तक विश्व की 75 प्रतिशत आबादी नगरों में निश्वस करने लगेगी। इससे वर्तमान न समस्याएँ घनीभूत होंगी तथा मलिन बस्तियों का फैलाव होगा। ये सभी तथ्य मानव पर्यावरण के असंगत सम्बन्ध के परिणाम हैं। वर्तमान विकास की संकल्पना इसलिए प्राकृतिक और मानवीय चरों के पारस्परिक विकासात्मक अन्तर्सम्बन्ध को नियोजित करने को प्रेरित करती है।

2. दूसरे कारण में विकास का मात्र उद्देश्य धन का एकत्रीकरण है क्योंकि धन या पूँजी ही मानव के तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है लेकिन वास्तव में विकास के स्थायित्व के लिये अत्यधिक धन या पूँजी प्राप्त करना ही ध्येय नहीं होना चाहिये, क्योंकि जॉन पुश्किन के अनुसार छलपूँजी (illth) जो धनसंचय का परिणाम है- एक ऋणात्मक धन है। यह एक ऐसी पूँजी है जो मानव के लिये पृथ्वी की उपयोगिता समाप्त कर देती है इसलिये प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि अथवा येनकेन राष्ट्रीय आय में वृद्धि ही विकास का लक्ष्य नहीं होना चाहिये।

         इसलिए अधिक धन संचय, अधिक उत्पादन और अधिक उप का दुष्चक्र भौतिक विकास का आधार है। इस विकास की कोई अन्तिम सीमा नहीं इसकी न्यूनतम सीमा तो मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने तक मानी जा सकती लेकिन ऊपरी सीमा अदृश्य है। इसी अदृश्य सीमा को प्राप्त करने के लिये पश्चिमी समाज संसाधनों का अंधाधुंध शोषण करके पर्यावरण सन्तुलन को विकृत कर रहा है। इसके प्रतिकार के लिए ही शाश्वत विकास की संकल्पना का अस्तित्व संभव हुआ है।

प्रश्न प्रारूप 

1. शाश्वत विकास की अवधारणा पर प्रकाश डालें।

5.The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation (जल संसाधन के महत्त्व, वितरण, उपयोगिता एवं संरक्षण)

5. The Importance of Water Resources, Sources, Uses and Conservation

(जल संसाधन के महत्त्व, स्रोत, उपयोगिता एवं संरक्षण)



Importance of Water

जल संसाधन के महत्त्व

          प्राकृतिक संसाधनों में जल एक ऐसा आधारभूत संसाधन है, जिसके बिना पृथ्वी तल पर जीवन की कल्पना ही असंभव है। मनुष्य, पेड़-पौधे और जीव-जन्तु सभी के लिए जल जीवन का आधार है। पृथ्वी तल पर जल की उपस्थिति के बाद ही जीवन की कल्पना की गई है। जल की उपलब्धता और उसके उपयोग की सुविधा मानव के सांस्कृतिक विकास में सहायक तत्व रहे हैं।

       जल की अधिकता या न्यूनता की तुलना में उसकी सामान्यता और सहज उपलब्धता अधिक आकर्षक रहे हैं। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में जहाँ सहजता के साथ जल उपलब्ध था और प्राकृतिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, आदि मानव बसने हेतु आकर्षित हुआ, जिससे कुछ घाटियाँ सांस्कृतिक क्रोड़ बन गई। यहाँ सिंचाई, पेय, आखेट और परिवहन के लिए जल संसाधन का प्रथम उपयोग हुआ।

      स्पष्ट है कि जल संसाधन के कारण कृषि, व्यापार और बड़े अधिवासों का विकास सबसे पहले नदी घाटियों में प्रारंभ हुआ। जल संसाधन की सुलभता के कारण समुद्र तटीय क्षेत्र भी आकर्षक रहे। नौका परिवहन का विकास वृहद् व्यापारिक शृंखला का कारण बना। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक जल परिवहन सबसे सस्ता साधन है। समुद्री मार्गों की सुलभता अनेक यूरोपीय देशों की महानता का कारण बताया जाता है।

     नीदरलैण्ड, पुर्तगाल, ब्रिटेन जैसे छोटे देशों के नाविक जल यातायात के माध्यम से विश्व के बड़े और शक्तिशाली देशों पर कब्जा जमाने में सफल हो गये, जबकि स्थल मार्ग से चलने के कारण सिकन्दर अपनी विशाल सेना के बावजूद ऐसी विजय पाने में असफल रहा। आज जल यातायात की सुविधा वाले देश विश्व व्यापार में अग्रणी बन गये हैं, क्योंकि जिस मात्रा में आज का जलयान माल की ढुलाई करता है वैसा किसी अन्य साधन से संभव नहीं है।

            जल संसाधन का उपयोग मत्स्य उत्पादन के दृष्टिकोण से भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जल स्रोतों का उपयोग सिंचाई एवं विद्युत उत्पादन के लिए करके मानव समुदाय ने क्रान्तिकारी कृषि और औद्योगिक विकास किया है। इन सभी लाभों की गिनती में जलीय वनस्पतियों द्वारा अपार ऑक्सीजन गैस का उत्पादन शायद सबसे महत्वपूर्ण है। पारिस्थितिकी के निर्माण में जल की भूमिका का अनुमान मात्र इस बात से लगाया जा सकता है कि मध्य एशिया में जलाभाव के कारण अदिमानव को बाध्य होकर प्रव्रजित होना पड़ा जो मानव प्रजातियों के उद्भव का कारण बना। आज भी जलाभाव के कारण पृथ्वी का आधे से अधिक भाग मानव के लिए अनाकर्षक है।

        आधुनिक मानव समाज अपने अनेक क्रियाकलापों के लिए जल संसाधन का उपयोग पहले से कहीं अधिक करने लगा है और कुछ देशों में तो जल प्रबंधन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है, और कुछ क्षेत्रों में जल दोहन को लेकर तनाव पैदा हो गया है।

           आधुनिक समाज में तकनीकी विकास के कारण जल संसाधन का प्रचुर उपयोग सिंचाई, जल-विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, जल यातायात आदि के लिए किया जा रहा है। जिन क्षेत्रों में वर्षा जल की कमी है, वहाँ धरातलीय और भूमिगत जल के उपयोग से कृषि का अभूतपूर्व विकास किया गया है। पंजाब एवं हरियाणा अपने सिंचित क्षेत्रों के कारण सबसे सम्पन्न राज्य बन गये हैं, जबकि पड़ोसी राजस्थान जलाभाव के कारण अब भी विपन्न बना हुआ है।

       इसी प्रकार दक्षिणी साइबेरिया में सिंचित क्षमता के विकास के कारण उस क्षेत्र का काया पलट हो गया है। अनेक नगरीय और औद्योगिक केन्द्र जल संसाधन की कमी के कारण समस्याग्रस्त हो गये हैं। स्पष्ट है कि जल संसाधन का समुचित उपयोग मानव समाज की प्रगति का महत्त्वपूर्ण कारक रहा है।

          इस प्रकार कहा जा सकता है कि जल संसाधन मानव जीवन के लिए एक आधारभूत संसाधन है। जहाँ इसकी कमी है वहाँ मानव जीवन संकटमय बनता जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में पेय जल के संकट को हल करने के लिए समुद्र के खारे जल को साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है।

जल संसाधन के स्रोत एवं उपयोग (The Sources and Uses of  Water Resources)

       एक आंकलन के अनुसार पृथ्वी के समस्त जल भण्डार का 97.2 प्रतिशत समुद्रों, 2.15 प्रतिशत हिम सरिताओं, 0.62 प्रतिशत भूमिगत भण्डारों, 0.02 प्रतिशत धरातलीय स्रोतों और अवशेष नमी और आर्द्रता के रूप में पाया जाता है। प्राकृतिक संसाधन के रूप में धरातलीय जल भण्डार, भूमिगत जल भंडार और सागरीय जल का अधिक महत्व है। आर्थिक और मानवीय महत्त्व के दृष्टिकोण से धरातलीय और भूमिगत जल सर्वोपरि है।

         धरातलीय जल और भूमिगत जल वर्षा पर आधारित होता है। जिन क्षेत्रों में वर्षा कम होती है वहाँ इसका कुप्रभाव देखा जाता है जिसके कारण जल प्रबंधन की नितान्त आवश्यकता पड़ती है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जल निरर्थक प्रवाहित होता है। जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्रों में है लेकिन उसका जल खारा होने के कारण मानव के कुछ ही कामों के लिए प्रयुक्त हो पाता है। फिर भी इस भंडार से बनने वाली वाष्प और बादल धरातलीय जल को जन्म देते हैं, जो वर्षा तथा हिमपात के रूप में उसकी प्राप्ति होती है।

        पृथ्वी का लगभग दो तिहाई क्षेत्र समुद्री जल से घिरा है जबकि विश्व के विशाल मरूस्थल जल के अभाव में प्रायः मानव विहीन है। सउदी अरब, कुवैत, ईरान, इराक, जैसे देश हिमशिलाओं को पिघला कर पेय जल प्राप्त कर रहे हैं। इस प्रकार जल संसाधन का क्षेत्रीय स्वरूप बिल्कुल असमान है। विषुवत रेखीय क्षेत्रों में जल की प्रचुरता है तो मरुस्थलीय प्रदेशों में जलाभाव है। वर्षा जल का ठहराव भी जल संसाधन की उपलब्धता का एक प्रमुख पक्ष है। तीव्र ढाल वाले धरातल पर वर्षा होते ही जल बहकर अन्यत्र चला जाता है।

           वर्षा जल का ह्यास, वाष्पीकरण और जल के भूमिगत होने के कारण जल संसाधन की क्षेत्रीय विभिन्नता स्वाभाविक है। विश्व के लगभग एक चौथाई क्षेत्रफल पर न्यूनतम वर्षा होती है जिसका वार्षिक औसत 20 से.मी. से कम है, जैसे- उष्ण मरुस्थलों में पृथ्वी के धरातल के लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र पर 25-50 से.मी. वर्षा होती है जिसे अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश कहते है।

      इस प्रकार पृथ्वी के धरातल के आधे से अधिक क्षेत्रफल पर औसत वर्षा होती है (50- 150से.मी.) जबकि शेष 15 प्रतिशत क्षेत्रफल अधिक वर्षा प्राप्त करता है। उपरोक्त सर्वेक्षण से स्पष्ट है कि पृथ्वी का अधिकांश धरातल वर्षा की कमी अथवा अधिकता के कारण जल संसाधन के दृष्टिकोण से असंतुलित है।

          जल संसाधन का उपयोग जल संसाधन का उपयोग मानव समाज विविध कार्यों क लिए करता है। धरातलीय जल नदियों, झीलों और तालाबों में संचित होता है जो प्रधानत: सिंचाई जल विद्युत उत्पादन, मत्स्य पालन, परिवहन, उद्योग, पेय और मनोरंजन के लिए, उपयोग किया जाता हैं। मानव के सांस्कृतिक विकास को धरातलीय जल ने सबसे अधिक प्रभावित किया है। आज भी इसकी महत्ता बनी हुई है।

         भूमिगत जल का उपयोग मुख्यत: पेय, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों के लिए किया जाता है। सागरीय जल का उपयोग प्रधानतः परिवहन, मत्स्य पालन और नमक प्राप्ति के लिये किया जाता है। नये खोजों से समुद्री जल के विविध उपयोग बढ़ने की संभावना है।

         वैज्ञानिकों का अनुमान है कि समुद्र से भविष्य में मैगनीज, कोबाल्ट, ताँबा, ब्रोमाइड, मैगनीशियम, आयोडीन आदि की प्राप्ति की जा सकती है। इसमें सन्देह नहीं कि नयी तकनीकों के विकास के बल पर मानव सामुद्रिक जल का और अधिक उपयोग कर सकता है।

जल संसाधन के संरक्षण (The Conservation of  Water Resources)

जल अत्याधिक उपयोगी संसाधन है। इसके विविध उपयोग हैं, परन्तु यह सर्वत्र सुलभ या प्रचुर नहीं है। फलतः जल संसाधन संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है। जिस तरह इसके विभिन्न उपयोग हैं उसी तरह इसका संरक्षण भी विविध रूपों में किया जाना चाहिए।

(i) धरातलीय जल मानव जीवन के लिए अधिक महत्वपूर्ण है, जो वर्षा द्वारा प्राप्त होता है। अतः वर्षा जल को उचित रूप में संग्रह करना और इस जल का अधिकतम उपयोग संरक्षण का मूल मंत्र है। उपयोग में आने वाला जल सदैव समुद्र की ओर जाने को उन्मुख रहता है, अतएव जल के अपवाह को नियमित करना, उसको संचय करना, सतह का निश्चित भंडार बनाना, नदियों पर बाँध बनाकर प्रवाह को नियमित करना, बाढ़ रोकना आदि कार्यों से इसकी उपयोगिता में वृद्धि होती है।

(ii) जल का सदुपयोग भी जल संरक्षण का प्रमुख पक्ष है। अतः घरेलू औद्योगिक तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जल का सदुपयोग करके, दुरुपयोग को कम किया जा सकता है।

(iii) भूमिगत जल जो कि प्रधानतः संरक्षित जल है, का अत्यधिक शोषण भूमिगत जल के स्तर को नीचा कर देता है। भूमिगत जल की मात्रा क्षेत्र विशेष में सीमित होती है, इसलिये अत्यधिक दोहन से यह भी समाप्त हो सकता है।

         अतः कुओं तथा नलरूपों में जितनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी मात्रा भूमिगत जल की बाहर निकलती है, उतनी आपूर्ति भी होती रहनी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भूमिगत जल के अत्यधिक शोषण को रोकने की व्यवस्था की जाये तथा जमीन के अंदर अत्यधिक जल प्रवेश हेतु वन तथा मिट्टी से संबंधित तत्त्वों की सुरक्षा की जाये। इसके अतिरिक्त भूगर्भ जलाशयों के निर्माण की नव तकनीक का विकास करके प्रेरित अन्तः स्रवण द्वारा भूमि जल संचय को बढ़ाया जा सकता है।

(iv) जल को शुद्ध रखना भी जल संरक्षण की प्राथमिक आवश्यकता है। दीर्घकाल से सीवर, उद्योगों, गैस प्लांटों, शोधन शालाओं तथा खानों आदि के विषैले रसायन, हानिकारक पदार्थ और गन्दा जल नदियों और झीलों में गिराये जाने से स्वच्छ जल की प्राप्ति कठिन हो गयी है तथा प्रदूषित जल से मानव एवं पौधों सहित समस्त जन्तु समुदाय को अकथनीय और असाध्य क्षति का सामना करना पड़ता है।

      अतएव सभी प्रकार की औद्योगिक इकाइयों को इस बात के लिए मजबूर किया जाना चाहिए कि वे कारखानों एवं खदानों से निकलने वाले अपशिष्टों एवं मल-जल को बिना शोधित किए नदियों, झीलों या तालाबों में विसर्जित न करें।

      नगरपालिकाओं द्वारा सीवर शोधन संयन्त्रों की व्यवथा की जाये तथा इस प्रकार की तकनीक का विकास किया जाये कि उत्पादकता को प्रभावित किए बिना जल के उपयोग को कम किया जा सके। इससे गन्दे पानी के बहाव की समस्या अवश्य कम होगी। जिससे प्रदूषित जल का प्रयोग कम मात्रा में संभव हो सकेगा।

(v) भू-तापीय जल (एक प्रकार का भूमिगत जल जो काफी गहराई में होता है) का भी प्रयोग किया जाये।

(vi) जिन क्षेत्रों में मीठे जल का अभाव है, वहाँ समुद्री जल के निर्लवणीयकरण की तकनीक विकसित करके मीठे जल की कमी दूर की जा सकती है। कुवैत ने इस दिशा में एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है।

(vii) जल संरक्षण के लिये जनजागरुकता सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है। समाज को सचेत करने के लिये जनजागरण अभियान चलाना सामयिक आवश्यकता है। इससे जहाँ एक ओर जल के संतुलित उपयोग की आदत विकसित होगी, वहीं दूसरी ओर जल के दुरुपयोग की आदत में सुधार होगा।

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