19. Classification of Aerial Photograps (वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण)

19. Classification of Aerial Photograps

(वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण)



Classification of Aerial

वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण

      वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण कई मापदण्डों के आधार पर किया गया है। इनमें प्रमुख मानदण्ड मापनी, झुकाव, क्षेत्र विस्तार, फिल्म तथा स्पेक्ट्रम क्षेत्र विस्तार इत्यादि हैं।

A. मापनी के आधार पर (On the Basis of Scale):-

      मापनी के आधार पर वायु फोटोचित्रों को निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) वृहत मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/5000 एवं 1/20000)

(ii) मध्यम मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/20000 एवं 1/50000)

(iii) लघु मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/50000 से अधिक)

     आवश्यकतानुसार मापनी को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

B. झुकाव के आधार पर (Based on Tilt):-

     जिन फोटोचित्रों को फोटो विश्लेषण तथा मानचित्रण के लिये उपयोग किया जाता है। उन्हें कैमरा अक्ष की दिशा के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

(i) ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र (Vertical Photograph):-

      वायुयान द्वारा उड़ान दिशा में कैमरे सिद्धान्त लम्बवत् रखकर लिये गये वायु फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र कहते है। यद्यपि सिद्धान्त रूप में ऐसे वायु फोटोचित्र खींचते समय कैमरे का अक्ष धरातल पर ठीक लम्बवत् होना चाहिए परन्तु व्यवहार में सदैव ऐसा कर पाना संभव नहीं होता है। अतः यदि कैमरे का अक्ष दशा से 2-3 अंश कम या अधिक हो तो भी प्राप्त फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर मान लिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातल की योजना (Plan), दृश्य ऊपर से देखे गये दृश्य के समान होता है। वायु फोटोचित्रों से मानचित्रण करने के लिए इसी प्रकार के फोटोचित्रों का उपयोग करते हैं।

(ii) तिर्यक फोटोचित्र (Oblique Photographs):-

      तिर्यक फोटोचित्र खींचने के लिए वायुयान में कैमरे के अक्ष को धरातल की दिशा की ओर नत दिशा में झुका दिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातलीय विवरणों के पार्श्व-दृश्य दिखाई देते हैं। वायु कैमरे के अक्ष झुकाव से लिये गये फोटोचित्रों को तिर्यक फोटोचित्र कहते हैं। इस प्रकार के फोटोचित्र भूमि पर बहुत बड़े क्षेत्र को तय करते हैं परन्तु विवरणों की शुद्धता एवं स्पष्टता केंद्र से दूर जाने पर कम होती जाती है।

(iii) क्षितिज अथवा धरातलीय फोटोचित्र (Horizontal for Terrestrial Photograph):-

             क्षितिज अथवा घरातलीय वायु फोटोचित्रों को लेने के लिए कैमरे के अक्ष को सीधे क्षितिज तल के समान लाया जाता है। इनके द्वारा केवल ऊँचाई दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। क्षितिज फोटोचित्र सामान्य अच्छे कैमरे से भी लिये जा सकते हैं जिनका उपयोग सहायक रूप से उर्ध्वाधर फोटोचित्रों के विश्लेषण के लिए किया जाता है। क्षेत्रीय अध्ययनों में इनका भी विशेष महत्व है। विशेष रूप से भूगर्भिक, वानिकी तथा भूआकृतिक अध्ययनों में परिच्छेदिकाओं के लिये इनकी आवश्यकता होती है।

C. कैमरा इकाई के आधार पर (On the Basis of Camera Unit):-

     दो या तीन कैमरों को एक कैमरा इकाई बनाया जाता है तथा उपरोक्त सभी प्रकार की वायु फोटोग्राफी एक साथ की जाती है। इस आधार पर वायु फोटोग्राफी के निम्न दो प्रकार हैं-

(i) अभिसारी फोटोचित्र (Convergent Photogrphy):-

     अभिसारी चित्र लेने एके लिये वायुयान में दो कैमरे प्रयोग किये जाते हैं जो एक ही क्षेत्र अथवा दृश्य के दो अलग तिर्यक फोटोचित्र एक साथ खींचते हैं। इस प्रकार एक ही समय व एक ही मिशन में अलग-अलग कैमरों के द्वारा दो फोटोचित्र लिये जाते हैं। उड़ान की दिशा में स्थित अगले कैमरे का फोटोचित्र पिछला तथा पिछले कैमरे का फोटोचित्र अगला (Forward) कहलाता है।

(ii) त्रिपदीय फोटोचित्र (Trimetrogon Photograph):-

      ट्रिमेट्रोगन का अर्थ है त्रिपदीय अर्थात् तीन रूप से कार्य होना। इसमें कैमरा इकाई में तीन कैमरे एक साथ प्रयोग किये जाते हैं। केंद्र में स्थित कैमरा धरातल के ऊर्ध्वाधर चित्रों को लेता है जबकि अलग-बगल के कैमरे क्षितिज तक के तिर्यक वायु फोटोचित्र खींचते हैं। इस प्रकार त्रिपदीय प्रणाली में दायें क्षितिज से बायें क्षितिज तक का समस्त क्षेत्र अंकित हो जाता है। यद्यपि मानचित्रण के दृष्टिकोण से तिर्यक फोटोचित्रों को अनुस्थापन (Orientation) करने में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार का उपयोग लघु मापनियों पर निर्मित टोह (Reconnaissance) लेने वाले मानचित्रों का तुरंत निर्माण करना होता है।

D. कोणीय विस्तार के आधार पर (On the Basis of Angular Coverage):-

     वायु फोटोचित्रों का अगला वर्गीकरण कोणीय विस्तार के आधार पर किया गया है। कोणीय विस्तार को एक कोण के रूप में परिभाषित किया गया है। यह लेंस के अग्र नोडल (Nodal) बिन्दु से होकर गुजरने वाले किरणों के शंकु का शीर्ष कोण है।

      निगेटिव चौखट का विकर्ण, लेंस के पृष्ठ नोड़ पर अंतरित करता है। इस प्रकार निगेटिव तल तथा लेंस के मध्य के सम्बन्ध को कोणीय विस्तार कहा जाता है। कोणीय विस्तार को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है-
(i) संकीर्ण कोण (Narrow Angle)-

        संकीर्ण कोण का विस्तार 50° से कम होता है।

(ii) सामान्य कोण (Normal Angle)-

        इसका कोणीय विस्तार 60° होता है। इनका आकार 18×18 सेमी व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी क्रमशः 31 व 30 मिमी. होती है।

(iii) वृहत कोण (Wide Angle)-

        वृहत कोण का विस्तार 90° होता है। इसका आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23 × 23 संमी. तथा फोकल दूरी 11.5 व 15 मिमी. है।

(iv) अति वृहत कोण (Super Wide or Ultra Wide Angle)-

       इसका कोणीय विस्तार 120° होता है जिसके फोटोचित्र का आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी 70 मिमी. व 88 मिमी. होती है।

E. फिल्म के आधार पर (On the Basis of Film):-

        वायु फोटोग्राफी में प्रयोग की जाने वाली फिल्मों के आधार पर वायु फोटोग्राफ निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) श्याम एवं श्वेत पेंक्रोमेटिक फोटोग्राफी

(ii) श्याम एवं श्वेत अवरक्त फोटोग्राफी

(iii) रंगीन फोटोग्राफी

(iv) रंगीन अवरक्त/आभासी रंगीन फोटोग्राफी


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8. The Aerial Photography (वायु फोटोग्राफी)

8. The Aerial Photography

(वायु फोटोग्राफी)



    The Aerial Photography 

      वायु फोटोग्राफी एक ऐसा विज्ञान है जिसके अंतर्गत पृथ्वी के धरातल का अध्ययन करने के लिए वायु फोटोचित्रों को प्राप्त किया जाता है। इसके लिए कई प्लेटफार्म उपयोग किये जाते हैं। इनमें वायुयान प्लेटफार्म प्रमुख है। जैसा कि स्पष्ट है सूर्य ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। पृथ्वी सूर्य से विकिरण ऊर्जा प्राप्त करती है। विद्युत चुम्बकीय विकिरण (EMR) पृथ्वी के घरातल के साथ अन्योन्यक्रिया करता है। इस दौरान इसमें कई परिवर्तन अनुभव किये जाते हैं। विद्युत-चुम्बकीय विकिरण को संवेदक अथवा फोटो संवेदन फिल्म के द्वारा संसूचन किया जाता है। फोटो फिल्म पर यह बिम्बों को दर्शाता है। फोटोचित्र में विभिन्न बिम्बों के अलग-अलग ग्रे-टोन, वस्तुओं से परावर्तित ऊर्जा के अलग-अलग मानों की ओर इशारा करते हैं।

        वायुमण्डल में कई प्रकार की गैसें, धूल के कण, जल वाष्प कण इत्यादि विद्यमान होते हैं। इनके द्वारा सूर्य से आती हुई विकिरण ऊर्जा में कमी आ जाती है। इसी प्रकार किसी वस्तु के साथ अन्योन्यक्रिया (परावर्तन, संचारण तथा अवशोषण) के पश्चात् परावर्तित ऊर्जा में भी कमी आ जाती है। वायुमण्डलीय प्रभावों के द्वारा, फोटोग्राफिक प्रतिबिम्बों पर विपर्यास (Contrast) को कम कर दिया जाता है। यही कारण है कि वायुफोटोग्राफी की गुणवत्ता अधिकतर वायुमण्डलीय दशाओं पर निर्भर करती है। यद्यपि श्याम श्वेत फोटोग्राफी के लिए कई प्रकार के फिल्टर अथवा लेंस इत्यादि के सामूहिक उपयोग से धुंध के प्रभाव को कम किया जा सकता है। रंगीन फोटोग्राफी की दशा में यह समस्या अत्यंत जटिल है। यहाँ पर वायु फोटोग्राफी से सम्बन्धित तथ्यों का अध्ययन किया गया है।

वायु फोटोग्राफी के कारक:-

        वायु फोटोग्राफी करने के प्रमुख कारक निम्न हैं-

1. फोटोग्राफी क्षेत्र का निर्धारण

2. फोटोग्राफी का उद्देश्य

3. मापक का चयन

4. फोटोग्राफी के प्रकार

5. वायु कैमरे व लैंस का चयन

6. वायु फिल्म निगेटिव

7. उड़ान दिशा का निर्धारण

8. फोटोग्राफी का समय

9. फोटोग्राफी का मौसम

1. फोटोग्राफी किये जाने वाला क्षेत्र (Area to be Photography):-

      जिस क्षेत्र की फोटोग्राफी की जानी होती है उसका चारों दिशाओं में 1/250000 मापक बने मानचित्र की सहायता से सीमांकन किया जाता है तथा उसे रेखाओं द्वारा बन्द किया जाता है। यदि क्षेत्र अधिक बड़ा हो तो उसे छोटे-छोटे खण्डों में बांटकर इन्हें A, B, C इत्यादि नाम दिये जाते हैं। वायु फोटोग्राफी करने की दो विधियाँ हैं-

(i) पिन-पाइंट फोटोग्राफी (Pin-Point Photography)

(ii) ब्लॉक फोटोग्राफी (Block Photography)

        वायुयान से धरातल के किसी लघु क्षेत्र या वस्तु विशेष की फोटोग्राफी करना पिन-प्वाइंट फोटोग्राफी कहलाती है। पिन प्वाइंट फोटोग्राफी उर्ध्वाधर या त्रियक दोनों ही प्रकार की हो सकती है तथा एक या दो फोटो चित्र खींचे जाते हैं।

     वृहत क्षेत्रों की फोटोग्राफी के लिए सर्वप्रथम सम्पूर्ण क्षेत्र को अलग-अलग खण्डों या ब्लॉक में विभाजित किया जाता है। तत्पश्चात् प्रत्येक खण्ड को समान्तर पट्टियों (Strips) में बाँटा जाता है। प्रत्येक स्ट्रिप की सर्पित प्रतिरूप में अतिव्यापन (Overlap) फोटोग्राफी की जाती है। स्टीरियोस्कोप से देखने पर इस प्रकार के फोटोचित्रों के त्रिविम दृश्य दिखाई देते हैं।

2. फोटोग्राफी का उद्देश्य (Purpose of Photography)

      वायु फोटोग्राफी करने से पूर्व यह स्पष्ट किया जाता है कि फोटोग्राफी का उद्देश्य क्या है? इससे फोटोग्राफिक विनिर्देशन के सही डिजाइन में सहायता मिलती है।

3. मापक का चयन (Selection of Scale)

         वायु फोटोग्राफी में मापक एक प्रमुख कारक है। वायु फोटोचित्रों में प्रदर्शित किन्हीं दो बिन्दुओं के बीच की दूरी तथा उन्हीं दो बिन्दुओं की घरातल पर वास्तविक दूरी के आनुपातिक सम्बन्ध को उस फोटोचित्र का मापक कहते है। उदाहरण के लिए फोटोचित्र में किन्हीं दो बिन्दुओं अथवा दो स्थानों के मध्य की दूरी एक सेमी. तथा उन्हीं स्थानों की धरातल पर मापी गई वास्तविक दूरी एक किमी. है। इसका अर्थ यह है कि फोटोचित्र की दूरी एवं भूमि की दूरियों में 1 व 100000 का अनुपात है। यही आनुपातिक सम्बन्ध अर्थात् 1/100000 उस फोटोचित्र का मापक कहलाता है। वायु फोटोचित्र में मापक को दूसरे ढंग से भी समझाया जा सकता है।

     “कैमरा लेन्स की फोकल दूरी (F) तथा धरातल से उड़ान (वायुयान) की  (H) अनुपात को मापनी कहते हैं।”

अर्थात्

मापक =F (फोकल दूरी)/H (ऊँचाई)

      सामान्यतः वायु फोटोचित्रों के अलग-अलग भागों में मापनी शुद्ध नहीं होती है। सम्पूर्ण वायु फोटोचित्र पर एक समान मापनी केवल उसी दशा में मिल सकती है जब घरातल समतल हो एवं कैमरा ठीक लम्बवत अवस्था में हो। इस तरह की आदर्श स्थिति का मिलना अति कठिन होता है। इसलिए मापनी में अंतर आना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए पहाड़ी पर घाटी की तुलना में मापक में अंतर होता है क्योंकि शिखर भाग कैमरे के अधिक समीप होता है। यदि उड़ान की ऊँचाई अधिक या कम होती है तो फोटोचित्र का मापक भी तदनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। उच्चावचन विकृति तथा उड़ान झुकाव (Tilt) के कारण भी भा की भिन्नता पाई जाती है।

वायु फोटोचित्रों पर मापनी ज्ञात करने की विधियाँ:-

     वायु फोटोचित्रों से मापनी ज्ञात करने की प्रमुख निम्न विधियाँ हैं-

(i) फोटोचित्र तथा धरातल के परस्पर सम्बन्ध स्थापन द्वारा मापनी ज्ञात करना।

(ii) मानचित्र की सहायता से मापनी ज्ञात करना।

(iii) फोटोचित्रों की सहायता से मापनी ज्ञात करना-

(a) कैमरे की फोकल दूरी एवं

(b) उड़ान ऊँचाई के आपसी सम्बन्ध द्वारा।

4. वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Aerial Photograps):-     

        वायु फोटोचित्रों का वर्गीकरण कई मापदण्डों के आधार पर किया गया है। इनमें प्रमुख मानदण्ड मापनी, झुकाव, क्षेत्र विस्तार, फिल्म तथा स्पेक्ट्रम क्षेत्र विस्तार इत्यादि हैं।

A. मापनी के आधार पर (On the Basis of Scale):-

      मापनी के आधार पर वायु फोटोचित्रों को निम्न वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-

(i) वृहत मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/5000 एवं 1/20000)

(ii) मध्यम मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/20000 एवं 1/50000)

(iii) लघु मापनी पर निर्मित फोटोचित्र (1/50000 से अधिक)

     आवश्यकतानुसार मापनी को परिवर्तित भी किया जा सकता है।

B. झुकाव के आधार पर (Based on Tilt):-

      जिन फोटोचित्रों को फोटो विश्लेषण तथा मानचित्रण के लिये उपयोग किया जाता है। उन्हें कैमरा अक्ष की दिशा के अनुसार तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।

(i) ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र (Vertical Photograph):-

        वायुयान द्वारा उड़ान दिशा में कैमरे सिद्धान्त लम्बवत् रखकर लिये गये वायु फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर फोटोचित्र कहते है। यद्यपि सिद्धान्त रूप में ऐसे वायु फोटोचित्र खींचते समय कैमरे का अक्ष धरातल पर ठीक लम्बवत् होना चाहिए परन्तु व्यवहार में सदैव ऐसा कर पाना संभव नहीं होता है। अतः यदि कैमरे का अक्ष दशा से 2-3 अंश कम या अधिक हो तो भी प्राप्त फोटोचित्रों को ऊर्ध्वाधर मान लिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातल की योजना (Plan), दृश्य ऊपर से देखे गये दृश्य के समान होता है। वायु फोटोचित्रों से मानचित्रण करने के लिए इसी प्रकार के फोटोचित्रों का उपयोग करते हैं।

(ii) तिर्यक फोटोचित्र (Oblique Photographs):-

         तिर्यक फोटोचित्र खींचने के लिए वायुयान में कैमरे के अक्ष को धरातल की दिशा की ओर नत दिशा में झुका दिया जाता है। इस प्रकार के फोटोचित्रों में धरातलीय विवरणों के पार्श्व-दृश्य दिखाई देते हैं। वायु कैमरे के अक्ष झुकाव से लिये गये फोटोचित्रों को तिर्यक फोटोचित्र कहते हैं। इस प्रकार के फोटोचित्र भूमि पर बहुत बड़े क्षेत्र को तय करते हैं परन्तु विवरणों की शुद्धता एवं स्पष्टता केंद्र से दूर जाने पर कम होती जाती है।

(iii) क्षितिज अथवा धरातलीय फोटोचित्र (Horizontal for Terrestrial Photograph):-

            क्षितिज अथवा घरातलीय वायु फोटोचित्रों को लेने के लिए कैमरे के अक्ष को सीधे क्षितिज तल के समान लाया जाता है। इनके द्वारा केवल ऊँचाई दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। क्षितिज फोटोचित्र सामान्य अच्छे कैमरे से भी लिये जा सकते हैं जिनका उपयोग सहायक रूप से उर्ध्वाधर फोटोचित्रों के विश्लेषण के लिए किया जाता है। क्षेत्रीय अध्ययनों में इनका भी विशेष महत्व है। विशेष रूप से भूगर्भिक, वानिकी तथा भूआकृतिक अध्ययनों में परिच्छेदिकाओं के लिये इनकी आवश्यकता होती है।

C. कैमरा इकाई के आधार पर (On the Basis of Camera Unit):-

     दो या तीन कैमरों को एक कैमरा इकाई बनाया जाता है तथा उपरोक्त सभी प्रकार की वायु फोटोग्राफी एक साथ की जाती है। इस आधार पर वायु फोटोग्राफी के निम्न दो प्रकार हैं-

(i) अभिसारी फोटोचित्र (Convergent Photogrphy):-

     अभिसारी चित्र लेने एके लिये वायुयान में दो कैमरे प्रयोग किये जाते हैं जो एक ही क्षेत्र अथवा दृश्य के दो अलग तिर्यक फोटोचित्र एक साथ खींचते हैं। इस प्रकार एक ही समय व एक ही मिशन में अलग-अलग कैमरों के द्वारा दो फोटोचित्र लिये जाते हैं। उड़ान की दिशा में स्थित अगले कैमरे का फोटोचित्र पिछला तथा पिछले कैमरे का फोटोचित्र अगला (Forward) कहलाता है ।

(ii) त्रिपदीय फोटोचित्र (Trimetrogon Photograph):-

        ट्रिमेट्रोगन का अर्थ है त्रिपदीय अर्थात् तीन रूप से कार्य होना। इसमें कैमरा इकाई में तीन कैमरे एक साथ प्रयोग किये जाते हैं। केंद्र में स्थित कैमरा धरातल के ऊर्ध्वाधर चित्रों को लेता है जबकि अलग-बगल के कैमरे क्षितिज तक के तिर्यक वायु फोटोचित्र खींचते हैं। इस प्रकार त्रिपदीय प्रणाली में दायें क्षितिज से बायें क्षितिज तक का समस्त क्षेत्र अंकित हो जाता है। यद्यपि मानचित्रण के दृष्टिकोण से तिर्यक फोटोचित्रों को अनुस्थापन (Orientation) करने में बहुत सहायता मिलती है। इस प्रकार का उपयोग लघु मापनियों पर निर्मित टोह (Reconnaissance) लेने वाले मानचित्रों का तुरंत निर्माण करना होता है।

D. कोणीय विस्तार के आधार पर (On the Basis of Angular Coverage):-

     वायु फोटोचित्रों का अगला वर्गीकरण कोणीय विस्तार के आधार पर किया गया है। कोणीय विस्तार को एक कोण के रूप में परिभाषित किया गया है। यह लेंस के अग्र नोडल (Nodal) बिन्दु से होकर गुजरने वाले किरणों के शंकु का शीर्ष कोण है।

      निगेटिव चौखट का विकर्ण, लेंस के पृष्ठ नोड़ पर अंतरित करता है। इस प्रकार निगेटिव तल तथा लेंस के मध्य के सम्बन्ध को कोणीय विस्तार कहा जाता है। कोणीय विस्तार को निम्न रूप से वर्गीकृत किया गया है-
(i) संकीर्ण कोण (Narrow Angle)-

        संकीर्ण कोण का विस्तार 50° से कम होता है।

(ii) सामान्य कोण (Normal Angle)-

        इसका कोणीय विस्तार 60° होता है। इनका आकार 18×18 सेमी व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी क्रमशः 31 व 30 मिमी. होती है।

(iii) बृहत कोण (Wide Angle)-

        वृहत कोण का विस्तार 90° होता है। इसका आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23 × 23 संमी. तथा फोकल दूरी 11.5 व 15 मिमी. है।

(iv) अति वृहत कोण (Super Wide or Ultra Wide Angle)-

       इसका कोणीय विस्तार 120° होता है जिसके फोटोचित्र का आकार क्रमशः 18×18 सेमी. व 23×23 सेमी. तथा फोकल दूरी 70 मिमी. व 88 मिमी. होती है।

E. फिल्म के आधार पर (On the Basis of Film):-

        वायु फोटोग्राफी में प्रयोग की जाने वाली फिल्मों के आधार पर वायु फोटोग्राफ निम्न प्रकार के होते हैं-

(1) श्याम एवं श्वेत पेंक्रोमेटिक फोटोग्राफी

(ii) श्याम एवं श्वेत अवरक्त फोटोग्राफी

(111) रंगीन फोटोग्राफी

(iv) रंगीन अवरक्त/आभासी रंगीन फोटोग्राफी

5. वायव कैमरे (Aerial Camera):-

     वायु फोटोग्राफी का कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है। इनमें प्रमुख मानचित्रों का निर्माण, फोटो व्याख्या, प्राकृतिक संसाधन सर्वेक्षण, भूगर्भिक एवं मृदा सर्वेक्षण, भूमि उपयोग इत्यादि हैं। इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए वायु फोटोग्राफी विश्वसनीय एवं सूक्ष्मतम प्रतिबिम्बों की पूर्ति करता है जो विकार रहित तथा क्रमिक भूभाग बिम्बों को दर्शाते हैं। वायु फोटोग्राफी के लिये जिस साज-सामान की आवश्यकता होती है उनमें कैमरा प्रमुख है।

   उत्तम वायु फोटोग्राफी करने के लिए यह अति आवश्यक है कि वायु कैमरा उच्च कोटि का होना चाहिए। फोटोग्रामिति की दृष्टि से उपयोगी, उच्च विभेदन (High Resolution के लक्षण वाले वायु फोटोचित्र प्राप्त करने के लिए ऐसे स्वचालित कैमरे प्रयोग में लाये जाते हैं जो किसी गतिमान प्लेटफार्म से तेजी के साथ एक के बाद एक करके अनेक फोटोचित्र ले सके। इनकी याँत्रिक प्रणाली सामान्य कैमरों की तुलना में भिन्न होती है। इनक ऑप्टिकल इकाइयाँ (लेंस, फिडूसियल मार्क, किनारे इत्यादि) जटिल याँत्रिक ढाँचा तैयार करती है।

6. वायु फिल्म निगेटिव (Aerial Film Negative):-

वायु फिल्म का चुनाव (Choice of Aerial Films):

      वायु फोटोग्राफी में सूक्ष्म विवरणों तथा लघु प्रकाशकरण (Exposure) के लिए महीन कणों युक्त व उच्च गति मिश्रण (Emulsion) फिल्म का प्रयोग किया जाता है जो बिम्ब गतिशीलता को दूर करता है। वायु फिल्म की विभेदन शक्ति 50 रेखायें प्रति मिलीमीटर होती है। यह सिकुड़न रहित (पोलिस्टर आधारित) होती है जिस पर वायुमण्डल या घरातलीय तत्वों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वायु फिल्म कई प्रकार की होती है जैसे पैक्रोमेटिक, इन्फ्रारेड, एरोग्राफिक सुपर XX, एरोग्राफिक ट्राई-X, एरोग्राफिक इन्फ्रारेड, इक्टराक्रोम, कोडेक ऐरोपैन, एवियोफोटो पैन, इलफोर्ड इत्यादि। वायु फिल्म निगेटिव की लम्बाई अलग-अलग 100, 200, 500 तथा 5000 फीट तक होती है। टोही सर्वेक्षणों में 5000 फीट लम्बी फिल्म का उपयोग किया जाता है।

7. उड़ान दिशा (Flight Direction):-

     वायु फोटोग्राफी एक निर्धारित क्षेत्र को तय करती है जिसे कई पट्टियों में तय किया जाता है। संचालन की सुविधानुसार यह परामर्श किया जाता है कि पट्टिकाओं अथवा स्ट्रीप की संख्या कम से कम हो। इस प्रकार उड़ान दिशा की पट्टियों को क्षेत्र की लम्बाई के अनुरूप तय किया जाता है। दिशा निर्धारण प्राकृतिक अथवा सांस्कृतिक लक्षणों के अनुरूप किया जाता है।

8. फोटोग्राफी का समय (Time of Photography):-

        वायु फोटोग्राफी खींचने का समय अति महत्वपूर्ण होता है। जैसा कि स्पष्ट है कि लम्बी एवं घनी छाँव विवरणों को ढक लेती है तथा फोटोग्राफ में अनावश्यक काले धब्बे दृष्टिगोचर होते हैं। दूसरी ओर लघु छाया, विवरणों को प्रभावशाली ढंग से निर्धारित करती है जिससे वायु फोटो चित्रों के विश्लेषण करने में सहायता मिलती है। स्वच्छ साफ व प्रकाशयुक्त फोटोचित्र विश्लेषण में विशेष महत्व रखते हैं। अनुभव के आधार पर वायु फोटोग्राफी के समय की संस्तुतियाँ निम्न प्रकार से की गई हैं-

(i) वायु फोटोग्राफी उन समयों में की जानी चाहिए जब क्षितिज से सूर्य की ऊँचाई 30° से अधिक होती है।

(ii) अर्थात् वायु फोटोग्राफी का उपयुक्त समय सुबह 9 बजे से सायं 3 बजे के मध्य होना चाहिए।

(iii) यद्यपि फोटोग्राफी का समय माँगकर्ता द्वारा निश्चित किया जाता है लेकिन वायु फोटोग्राफी सुबह 8 बजे से 10 बजे के मध्य तथा सायं को 2 बजे से 4 बजे के मध्य नहीं की जानी चाहिए।

       पर्वतीय भूभागों में धरातलीय विषमतायें होती हैं। धरातलीय उच्चावचन में अधिक अंतर होता है। इसलिए सूर्य की ऊँचाई क्षितिज से 30° के दौरान छाया लम्बी एवं घनी होती है जो कि महत्वपूर्ण धरातलीय विवरणों को छुपा देती है। यही कारण है कि पर्वतीय भूभागों के लिए उपयुक्त फोटोग्राफी का समय 11 बजे से लेकर 2 बजे के मध्य उपयुक्त समझा गया है। मैदानी समतल भूभागों में छाया बहुत महत्व नहीं रखती है, यही कारण है कि फोटोग्राफी के समय में कुछ शिथिलता बरती जाती है। जैसे कि सूर्य की ऊँचाई क्षितिज से 20° से ऊपर होने पर भी वायु फोटोग्राफी की जा सकती है।

      इसी प्रकार उष्ण भू-भागों में मुख्य कठिनाई यह है कि जैसे ही तापमान बढ़ता है वैसे-वैसे वायुमण्डल में धुंध होने लगती है। ऐसी परिस्थितियों में वायु फोटोग्राफी का समय, सूर्योदय से आधा घंटा बाद निश्चित की जाती है।

9. वायु फोटोग्राफी का मौसम (Season of Photography):-

          वायु फोटोग्राफी करने के लिए उपयुक्त मौसम के चुनाव को निम्न कारक प्रभावित करते है-

(i) प्रकाश परावर्तन में मौसमी परिवर्तन

(ii) प्राकृतिक वनस्पति के आवरण में मौसमी परिवर्तन

(iii) जलवायु कारकों में मौसमी परिवर्तन

     वायु फोटोग्राफी के उद्देश्य के आधार पर भी मौसम का चुनाव किया जाता है। उदाहरण के लिए फोटोग्राफिक मानचित्रण, भूगर्भिक या मृदा सर्वेक्षण इत्यादि के लिए धरातल जितना सम्भव हो उतना साफ होना चाहिए। वनस्पति आवरण प्रदेशों में, भूगर्भिक सर्वेक्षण उद्देश्व हेतु फोटोग्राफी उस वक्त उपयुक्त होती है जबकि वनस्पति पर पतझड़ रहता है तथा धरातल स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार बर्फ से आच्छादित उच्च आक्षांशों या अधिक ऊँचाई वाले स्थानों पर फोटोग्राफी का उपयुक्त समय तब होता है जबकि हिम पिघल जाता है तथा धरातल दिखाई देने लगता है। इसी प्रकार मिट्टी सर्वेक्षण हेतु फोटोग्राफी के लिये फसल कटन के बाद का समय उपयुक्त होता है।

       यदि वनस्पति सर्वेक्षण के उद्देश्य हेतु फोटोग्राफी करनी हो तो इसके लिये वृक्षों का घना छत्रीनुमा होना तथा पेड़ों के ताज का पूर्ण पर्णसमूह (Foliage) बहुत महत्व रखता है। भूमि उपयोग व फसल प्रतिरूपों के अध्ययन के लिए वायु फोटोग्राफी उस समय निर्धारित की जाती है जब खेतों में फसल रहती है। सभी उद्देश्यों के लिए वर्षाकाल के पश्चात् (अक्टूबर व नवम्बर) जव आसमान स्वच्छ व साफ रहता है। फोटोग्राफी की जानी उचित होती है।

प्रश्न प्रारूप

Q. वायु फोटोग्राफी पर प्रकाश डालें।

(Throw light on the Aerial Photography.)


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9. The Digital Image

(डिजिटल इमेज)



      सूचनाओं को एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाने या एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिये चित्र या तस्वीर (Picture) सबसे सरल सुविधाजनक तथा सर्वमान्य साधन है। लगभग 75% सूचनाओं को मनुष्य के द्वारा देखकर जानकारी ली जाती है। उपग्रह हमें जो आँकड़े भेजता है उन्हें हम कम्प्यूटर की सहायता से चित्र आकृति में प्रस्तुत कर सकते हैं। किसी भी सचित्र प्रदर्शन के लिये इमेज अथवा बिम्ब एक सामान्य शब्द है। विभिन्न भूभागीय विशेषताओं को विद्युत-चुम्बकीय विकिरण (EMR) की गहनाता (Intensity) के आधार पर अलग-अलग श्वेत एवं श्याम बिम्बों में प्रदर्शित किया जा सकता है जिनमें अलग-अलग चमक होती है।

       संवेदक किसी भी दृश्य के अलग-अलग तरंग-दैर्ध्य (Wave Length) बैंडों पर विभिन्न सूचनाओं को उपलब्ध कराता है जिनका उपयोग बिम्बों की रचना के लिये किया जाता है।
      जब अध्ययनकर्ता द्वारा किसी दृश्य अथवा घटना को देखकर विश्लेषण किया जाता है तो उसे अवलोकन, प्रत्यक्ष ज्ञान या समझ कहते हैं। उपग्रह से प्राप्त सूचनाओं को भी बिम्बों (Images) में परिवर्तित कर विश्लेषण किया जाता है। उपग्रह के आँकड़ों को कम्प्यूटर पर संसाधित कर बिम्ब तैयार किये जाते हैं। इस प्रक्रिया को कम्प्यूटर इमेज प्रक्रमण (Computer Image Processing), कम्प्यूटर विजन (Computer Vision), सुदूर संवेदन आँकड़ों का मशीन द्वारा प्रक्रमण (Machine Processing of Remote Sensing Data) इत्यादि कई नामों से पुकारा जाता है।

इमेज के प्रकार (Types of Image)

        स्रोत के आधार पर इमेज दो प्रकार की होती है।

1. फोटोग्राफिक फिल्म आकार (Photographic Film Form)

2. डिजिटल आकार (Digital Form)

1. फोटोग्राफिक फिल्म आकार (Photographic Film Form):-

       फोटोग्राफिक संवेदक, फोटोग्राफिक फिल्म पर इमेज को दर्शाता है। विभिन्न धरातलीय दृश्य विशेषताओं को सुदूर संवेदन तकनीक की सहायता से फोटोग्राफिक फिल्म पर धरातलीय विवरणों की चमक के आधार पर बिम्बों को प्रदर्शित किया जाता है। जैसा कि स्पष्ट है कि किसी दृश्य के जिस भाग या वस्तु से परावर्तित ऊर्जा अधिक मात्रा में संवेदक तक पहुँचेगी उस भाग का बिम्ब अधिक चमकीला या श्वेत दृष्टिगोचर होगा। चमक के आधार पर फोटोग्राफिक फिल्म पर प्रकाश की गहनता अंकित होती है जो दृश्य निर्माण एवं विश्लेषण में सहायक होते हैं।

2. डिजिटल आकार (Digital Form):-

        डिजिटल इमेज विद्युत-चुम्बकीय ऑप्टीकल संवेदक द्वारा निर्मित की जाती है। उदाहरण के लिए बहुस्पैक्ट्रल संवेदक (Multispectral Sensor) धरातलीय विकिरित ऊर्जा (Radient Energy) की मात्रा को संख्याओं में व्यक्त करता है जिन्हें डिजिटल नवम्बर (DN) कहते हैं। बड़ी डिजिटल संख्या (जैसे कि 150) अधिक मात्रा में विकिरण ऊर्जा को दर्शाती है जबकि छोटी डिजिटल संख्या (जैसे कि दस) ऊर्जा की कम मात्रा को दर्शाता है।

डिजिटल इमेज:-

         डिजिटल इमेज लघु आकार के समक्षेत्र पिक्चर तत्वों के क्रम में व्यवस्थित की जाती है। डिजिटल इमेज में प्रत्येक छोटे से छोटे तत्व (Element) को पिक्सल (Pixel) कहते हैं। पेल (Pel) इसका संक्षिप्त नाम है। प्रत्येक पिक्सल का मान संख्याओं में होता है जिन्हें डिजिटल नम्बर (DN) कहते हैं। पिक्सल धरातल की दूरियों को मीटर अथवा किलोमीटर में प्रदर्शित करते हैं। पिक्सल का आकार संवेदक के अनुसार भिन्न-भिन्न होता है जिसे विभेदक (Resolution) कहते हैं। पिक्सल का आकार तथा धरातलीय दूरी के आनुपातिक सम्बन्ध को ही विभेदन कहते हैं।

        डिजिटलों मानों को पंक्तियों (Rows) तथा कॉलम (Columns) में व्यवस्थित किया जाता है प्रत्येक पिक्चर तत्व अथवा पिक्सल की स्थिति को XY निर्देशांक के द्वारा निर्धारित किया जाता है। इस प्रकार सामान्यतः डिजिटल संख्याओं को निम्न में से किसी एक प्रारूप में संग्रह किया जाता है।

डिजिटल बिम्ब आँकड़ों का प्रारूप (Data Formats of Digital Image):-

    किसी बिम्ब में बहु स्पैक्ट्रल चैनल होते हैं जो बहु आयामी बिम्ब प्रदर्शित करते हैं। डिजिटल सुदूर संवेदन आँकड़े अक्सर निम्न प्रारूपों में से किसी एक प्रारूप में रखे जा सकते हैं। निम्न प्रारूप प्रायः अधिक प्रचलित माने जाते हैं।

The Digital Image

(i) बिप (BIP-Band Interleaved by Pixel):-

         बिप फारमेट के अन्तर्गत सभी बैंड के आँकड़ों को एक-एक पिक्सल क्रम के अनुसार लिखा जाता है।

(ii) बिल (BIL-Band Interleaved by Line):-

        बिल फारमेट में सभी बैंडों के आँकड़ों को एक-एक लाइन क्रम में लिखा जाता है। (चित्र 1)

(iii) बी. एस. क्यू. (BSQ-Band Sequential):-

          बैंड अनुक्रमत्व फारमेट में प्रत्येक बैंड के आँकड़ों को एक फाइल पर लिखा जाता है तथा क्रम से संग्रह किया जाता है। (चित्र 2)

        उपरोक्त प्रारूपों को इस प्रकार भी समझाया गया है। कल्पना कीजिए कि हमारे पास 6 पिक्सल (तीन कॉलम एवं दो पंक्तियाँ) अलग-अलग तीन बैंडों के आँकड़े निम्न प्रकार से है-

Table-1

       इस इमेज डाटा को BSQ, BIL या BIP में से किसी भी एक प्रारूप में सघन कर रखा जा सकता है।

दृश्य विश्लेषण (Visual Interpretation):-

       फोटोग्राफिक हार्ड प्रतियों के लक्ष्यों की पहचान तथा उनका वर्गीकरण करना दृश्य विश्लेषण कहलाता है जो कि इमेज विशेषताओं जैसे कि आकार, आभा, प्रतिरूप, आकृति, संगठन, स्थिति, सहसम्बन्ध, छाया तथा पहलू पर आधारित होते हैं।

डिजिटल बिम्ब का मेटाडाटा (Metadata of Digital Image):-

      मेटा डाटा का अभिप्राय है डाटा से डाटा का निर्माण करना। डिजिटल बिम्ब हमेशा मेटाडाटा रखते हैं जिन्हें शीर्ष सूचनायें भी (Header Information) कहते हैं। बिम्ब के शीर्ष पर उद्धरित सूचनायें अति महत्वपूर्ण होती हैं। इस प्रकार की सूचनायें किसी बिम्ब के पंक्तियों, कॉलम, स्पैक्ट्रल बैंड का नम्बर, संवेदक सूचनायें, प्राप्त किये गये आंकड़ों की तिथि व समय, सूर्य की ऊँचाई व कोण, पाथ व रो नम्बर, प्रक्षेप, बिम्ब का विस्तार, उत्पाद के प्रकार, विभेदन, आँकड़ा फाइल का प्रारूप, भौगोलिक निर्देशांक इत्यादि सूचनायें उपलब्ध होती हैं। कुछ बिम्बों में प्रक्रियन प्रणाली का भी उल्लेख होता है।

डिजिटल इमेज प्रक्रमण (Digital Image Processing):-

   डिजिटल इमेज प्रक्रमण, कम्प्यूटर की सहायता से किसी प्राप्त इमेज का विश्लेषण तथापरिचालन करना होता है। धरातलीय आकृतियों के उपयुक्त अन्तर विश्लेषण तथा व्याख्या के लिये डिजिटल आँकड़ों को विभिन्न एलगोरिथम पर रखा जाता है। इससे इमेज का उच्चीकरण किया जाता है। वास्तव में उपग्रह से प्राप्त इमेज आँकड़ों को समझने के लिए कम्प्यूटर मॉनीटर पर प्रदर्शित किया जाता है। कभी इन आँकड़ों को तीन स्पैक्ट्रल बैंडों के संयुक्त रूप से जैसे कि FCC (False Colour Composit) तथा कभी अलग-अलग स्पैक्ट्रल बैंड इमेज द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिये विभिन्न तकनीकियों का उपयोग किया जाता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. इमेज से क्या आशय है? डिजिटल इमेज की विवेचना करें।


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43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics (ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)

43. According to Trewartha, The Climatic Regions of India and Their Characteristics

(ट्रीवार्था के अनुसार भारत के जलवायु प्रदेश और उसकी विशेषता)



       जलवायु प्रदेश का तात्पर्य उस भौगोलिक भूखण्ड से है जहाँ जलवायु के तत्वों के बीच समानता पायी जाती है। विश्व व्यापी जलवायु कर्गीकरण में भारत को मानसूनी जलवायु वर्गीकरण में रखा गया है। लेकिन आन्तरिक विविधता के कारण कई छोटे-2 जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया गया है। ट्रीवार्था ने कोपेन जलवायु वर्गीकरण को आधार मानते हुए भारत के जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया।

     वस्तुत: कोपेन विश्व के संदर्भ में जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया था और अपने अनुभव के आधार पर भारतीय जलवायु प्रदेशों का निर्धारण किया। जबकि ट्रीवार्था का कार्य पूर्णतः भारतीय उपमहाद्वीप पर आधारित था। उन्होंने अधिक से अधिक जलवायु केन्द्रों पर जाकर आँकड़ों का संग्रहण किया और उसके बाद जलवायु प्रदेश को निर्धारित किये।

       पुन: ट्रीवार्था ने कोपेन के ही समान वनस्पति, तापमान, वर्षा और ऊँचाई को आधार मानते हुए भारत को 7 प्रमुख जलवायु प्रदेशों में वर्गीकृत किया। जैसे-

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am)

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw)

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW)

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh)

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS)

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa)

(7) पर्वतीय जलवायु (H)

According to Trewartha

       ट्रीवार्था और कोपेन के जलवायु प्रदेशों का तुलनात्मक अध्ययन नीचे के तालिका में किया जा रहा है:-

कोपेन का जलवायु प्रदेश ट्रीवार्था का जलवायु प्रदेश
1. Amw Am
2. AS BS
3. Aw Aw
4. BShw BSh
5. BWhw BWh
6. Cwg Cwa
7. Dfc H
8. ET –
9. EF –

(1) उष्ण वर्षा वन की जलवायु प्रदेश (Am):-

       ऐसे जलवायु प्रदेश जहाँ का तापमान 18°C से अधिक होती है वहाँ इस प्रकार की जलवायु की दशाएँ देखने को मिलती है। यहाँ ऐसे क्षेत्र आते है जहाँ की औसत वार्षिक तापमान 27°C से अधिक एवं औसत वार्षिक वर्षा 250 सेंमी० या इससे अधिक हो। भारत के पश्चिम तटीय क्षेत्रों, दक्षिणी असम, पश्चिम बंगाल तथा त्रिपुरा में इस तरह की जलवायु देखने को मिलती है।

(2) उष्ण सवाना प्रदेश की जलवायु (Aw):-

         यहाँ का भी तापमान 18°C से अधिक ही होती है। औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C के आसपास रहता है तथा औसत वार्षिक वर्षा 100 सेंमी० रहता है। यहाँ वर्षा मुख्य रूप से ग्रीष्म ऋतु में होती है।इस प्रकार की जलवायु मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय भारत में देखने को मिलती है।

(3) उष्ण अर्द्ध मरूस्थतीय स्टेपी जलवायु प्रदेश (BSW):-

        इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में वर्षा बहुत कम होती है लेकिन अधिक गर्मी के कारण वाष्पीकरण अधिक तेजी से होती है। यह ऐसे जलवायु प्रदेश होते है जहाँ औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सेंटीमीटर तक होती है और औसत वार्षिक तापमान लगभग 27°C तक रहती है। भारत के राजस्थान और गुजरात में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(4) उष्ण मरुस्थलीय प्रदेश की जलवायु (Bwh):-     

          यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण मरुस्थलीय प्रकार की जलवायु है। इस प्रकार की जलवायु में वर्षा काफी कम होती है लेकिन वाष्पीकरण बहुत तेजी से होता है। यहाँ तापमान 40°C से भी अधिक पहुँच जाता है और वर्षा 50 सेंटीमीटर से भी कम होती है।भारत के थार मरुस्थल में इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।

(5) उष्ण उपोष्ण जलवायु प्रदेश (BS):-

            यह उष्ण तथा अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय सवाना तुल्य जलवायु का भाग है। इसमें औसत वार्षिक तापमान 27°C तक तथा औसत वार्षिक वर्षा लगभग 100 सेंटीमीटर तक होती है। भारत के प्रायद्वीपीय पश्चिम तटीय भाग में जहां वृष्टि छाया प्रदेश है यहां इस प्रकार की जलवायु देखने को मिलती है।          

(6) आर्द्र उपोष्ण जलवायु प्रदेश (Cwa):-

               इस प्रकार की जलवायु में हवाएँ शुष्क और मौसम ठंडा होता है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 18°C से कम रहता है।इस प्रकार के जलवायु प्रदेशों में केवल ग्रीष्म ऋतु में ही वर्षा होती है। लेकिन शीत ऋतु जो वर्षा होती है वह पश्चिमी भाग में शीतोष्ण कटिबंधीय चक्रवाती हवाओं से होती है। यह जलवायु भारत के गंगा-यमुना के मैदान में पायी जाती है।    

(7) पर्वतीय जलवायु (H):-

                यह जलवायु भारत के हिलालय पर्वतीय क्षेत्रों में देखने को मिलती है। यहाँ शीत ऋतु में हिमपात अर्थात् बर्फबारी होती है और ग्रीष्म काल में मानसूनी हवाओं से वर्षा होती है।

9. Rostow’s Economic Development Model (रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)

9. Rostow’s Economic Development Model

(रोस्तोव के आर्थिक विकास मॉडल)



    Rostow

       रोस्तोव मूलतः एक इतिहासकार थे जिन्होंने ऐतिहासिक अर्थशास्त्रों के रूप में आर्थिक-सामाजिक विकास से संबंधित एक बहुस्तरीय मॉडल प्रस्तुत किया। यह मॉडल 1971 ई० में रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत किया गया। यह मॉडल 5 चरणों में विभक्त है-

   रोस्तोव के द्वारा प्रस्तुत आर्थिक विकास के इस मॉडल के अनुसार सभी देश एक साथ और एक समान आर्थिक विकास नहीं कर पाते हैं अर्थात् यह मॉडल स्थान और समय के संदर्भ में विभिन्न देशों के सामाजिक-आर्थिक विकास की व्याख्या करता है। इसे एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है। जैसे- भारत (1947) और द० कोरिया (1948) क्षेत्रों लगभग एक ही समय आजाद हुए। लेकिन विकास के दृष्टिकोण से द० कोरिया की अर्थव्यवस्था विकसित देशों के समतुल्य पहुँच गई। लेकिन भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी विकासशील अवस्था से गुजर रहा है।

      रोस्तोव ने सामाजिक आर्थिक विकास की व्याख्या करने हेतु 5 स्तरीय विकास का मॉडल निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया है।

आर्थिक विकास की अवस्था सामाजिक-आर्थिक स्थिति
(1) प्रथम अवस्था जीवन निर्वाह की अवस्था / अर्थव्यवस्था
(2) द्वितीय अवस्था विकास के पूर्व की अवस्था
(3) तृतीय अवस्था तीव्र विकास की अवस्था
(4) चतुर्थ अवस्था आर्थिक प्रौढ़ावस्था
(5) पंचम अवस्था उपभोक्ता वस्तुओं की तीव्र उपयोग की अवस्था

    रोस्तोव ने बताया कि कोई भी देश उपरोक्त 5 अवस्थाओं से गुजरकर ही विकास के चरम अवस्था को प्राप्त करते हैं।

    रोस्टोव ने प्रत्येक अवस्था की विशेषता निम्न प्रकार से बताया

(1) प्रथम अवस्था की विशेषता 

       यह परम्परागत समाज की विशेषता है। इस अवस्था से गुजरने वाले समाज अनुत्पादक कार्यों पर धन अधिक खर्च करहे हैं। अर्थव्यवस्था जीवन निर्वाह की होती है। कुल GDP का 1/3 भाग खाद्य पदार्थों पर खर्च किया जाता है। साक्षरता, स्वास्थ्य और नियोजित कार्यों का अभाव होता है। लोगों को राज्य के द्वारा चलाया जा रहा कार्यक्रम की जानकारी कम होती है। देश की सरकारें सुरक्षा और धार्मिक कार्यों पर अधिक खर्च करते हैं। राज्य में निराशा का वातावरण होता है। अनेक प्रकार के सामाजिक-धार्मिक तनाव व्याप्त होते है। भारत के पड़ोसी देश म्यानमार, अफगानिस्तान, मध्य अफ्रीकी देश और उप सहारा के देश की आर्थिक व्यवस्था इसी अवस्था से गुजर रही है।

(2) दूसरी की अवस्था की विशेषता

       रोस्तोव ने बताया कि जिस देश की अर्थव्यवस्था दूसरे चरण गुजर रही होती है। वैसे देशों में एक ऐसे अभिजात वर्ग का उदय होता है जो नवोत्पाद या नयी तकनीक को प्राश्रय देता है। इस अवस्था से गुजरने वाले देश की सरकार अधिकत्तर धन परिवहन, संचार और संरचनात्मक सुविधाओं पर खर्च करते हैं। एक देश के अन्दर विकास दृष्टिकोण से अन्तः और अन्तर प्रादेशिक विषमता दिखायी देती है अर्थात् कुछ क्षेत्र विकसित हो जाते है और कुछ क्षेत्र पिछड़े ही रह जाते है। भारत, चीन, मैक्सिको ब्राजील द० अफ्रीका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

(3) तीसरा अवस्था की विशेषता

      तीसरा अवस्था से गुजरने वाले देशों में विकास का कार्य खण्डीय होता है। रोस्तोव ने पश्चिमी देशों का उदाहरण देते हुए बताया है कि आर्थिक विकास के तीसरे चरण में पहले वस्त्र उद्योग, उसके बाद रेलवे परिवहन अंतत: दुग्ध उद्योग का विकास हुआ है। ये ऐसे उद्योग है जिनके विकास के लिए न विशिष्ट तकनीक की आवश्यकता है और न ही विशेष निवेश की। लेकिन इन तीनों के विकास से समाज का विकास त्वरित गति से होता है। रोस्तोव ने बताया कि तीसरे अवस्था को जलविभाजक से तुलना की जा सकती है। इस अवस्था से कोई भी देश 20-30 वर्षों तक गुजरता है। तीसरे अवस्था से गुजरने के बाद राज्य के आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों का कायाकल्प हो जाता है।

       मलेशिया ने 2020 का नारा दिया। भारत ने “विजन 2020” का नारा दे रहा है ताकि एक नियत समय के बाद में देश विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायें। मध्य अमेरिकी देश, इजराइल, द. कोरिया जैसे देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं।

(4) चौथा अवस्था

     चौथा अवस्था को प्रौढ़ावस्था से सम्बोधित किया गया है। इस अवस्था से गुजरने वाले देशों की अर्थव्यवस्था पूर्णरूपेण विकसित होती है। देश में अकाल, भूखमरी इत्यादि की समस्या समाप्त हो जाती है। प्रति व्यक्ति आय अति उच्च होता है। आधुनिक तकनीक का बोलबाला होता है। प्रशिक्षित वर्ग का एक विशिष्ट श्रमिक समूह उभरकर सामने आता है। उत्पादन के कार्यों में निवेश अधिक से अधिक किया जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं पर अधिक-से-अधिक खर्च किया जाता है। द० एवं पूर्वी यूरोप के अधिकतर देश इसी अवस्था से गुजर रहे हैं। 

(5) पाँचवाँ अवस्था की विशेषता

    पाँचवाँ अवस्था से गुजरने वाले देशों में उपभोक्ता वस्तुओं की माँग अधिक होती है। लोग नवीन उत्पाद को खरीदने के लिए बेचैन रहते है। प्रति व्यक्ति आप अधिक होती है। समाज का मशीनीकरण और वैज्ञानिकरण हो जाता है। सामूहिक भावना कमजोर पड़ने लगती है। व्यक्तिवादिता का विकास अधिक हो जाता है। विश्व के आज नगरीय समाज, जापान, अमेरिका सिंगापुर, फ्रांस, इंगलैण्ड, जर्मनी जैसे देशों की अर्थव्यवस्था इसी चरण से गुजर रही है।

    रोस्तोव ने बताया है कि सभी देशों की अर्थव्यवस्था इन 5 अवस्थाओं से होकर गुजरती है। इन्होंने USA के संदर्भ में उदाहरण देते हुए बताया है कि 1800 ई० के पहले प्रथम अवस्था से 1800- 50 ई० के बीच द्वितीय अवल्या से, 1850-75 to 1बीच तृतीय अवस्थत से, 1875 – 1925 के बीच चतुर्थ अवस्था से और 1925 के बाद पाँचवाँ अवस्था ये गुजर रही है।

आलोचना

      रोस्तोव के इस मॉडल की कई आधारों पर आलोचना भी की गई। जैसे:-

(1) अरब देशों पर यह मॉडल बिल्कुल लागू नहीं होती क्योंकि वहाँ प्रति व्यक्ति आय अधिक है लेकिन सरकार अधिकतर खर्च सुरक्षा और धार्मिक कार्य पर करती है।

(2) इस मॉडल में कहा गया है कि एक दीर्घ अवधि के बाद ही तीव्र विकास की अवस्था प्रारंभ होती है जो गलत है क्योंकि कई ऐसे देश हैं जो आधुनिक तकनीक एवं प्रशासनिक प्रतिबद्धता के आधार पर विकास के कार्यों को तीव्र कर चुके है।

निष्कर्ष

       उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि इस मॉडल की अपवादवश कुछ सीमाएँ अवश्य है, इसके बावजूद यह मॉडल अधिकांश देशों के संदर्भ में उपयोगिता रखता है।

प्रश्न प्रारूप

Q. रोस्तोव के आर्थिक विकास अवस्था मॉडल का सामालोचनात्मक परीक्षण कीजिए तथा अपने उत्तर के पुष्टि में उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करें। (UPSC, 2003)

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