15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions (धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)

15. What is religion? Characteristics of religion and description of Indian religions

(धर्म क्या है? धर्म की विशेषताएँ तथा भारतीय धर्मों का विवरण)



  What is religion

     धर्म शब्द का अर्थ है ‘धारणा’। धारणा से तात्पर्य उन आदर्शों की अन्तरंग प्रतिष्ठापना से है जो व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठता और सद्भावना की दिशा में प्रेरित करते हैं। धर्म का दूसरा अर्थ है अभ्युदय और निश्रेयस अर्थात् उन गतिविधियों को अपनाया जाना जो कल्याण और प्रगति का शालीनता युक्त पथ प्रशस्त करती हैं।

      स्मृतिकारों ने धर्म को कर्तव्यपालन के अर्थ में लिया है। सामान्य अर्थों में धर्म अलौकिक शक्ति पर विश्वास है। प्रत्येक समाज व समुदाय में धर्म किसी न किसी रूप में अवश्य पाया जाता है। धर्म जीवन को सम्पूर्णता प्रदान करने की एक विधि है।

डॉ. राधाकृष्णन के अनुसार, जिन सिद्धान्तों के अनुसार हम अपना दैनिक जीवन व्यतीत करते हैं तथा जिनके द्वारा हमारे सामाजिक सम्बन्धों की स्थापना होती है, वही धर्म है। यह जीवन का सत्य है और हमारी कृति को निर्धारित करने वाली शक्ति है।”

जेम्स फ्रेजर के अनुसार, “धर्म से मैं मनुष्य से श्रेष्ठ उन शक्तियों की सन्तुष्टि या आराधना समझता हूं जिसके सम्बन्ध में यह विश्वास किया जाता है कि प्रकृति और मानव जीवन को मार्ग दिखलाती व नियन्त्रित रखती है।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैलिनोवस्की के अनुसार, धर्म क्रिया का एक तरीका है, साथ ही विश्वासों की एक व्यवस्था भी। धर्म समाजशास्त्रीय घटना के साथ-साथ एक व्यक्तिगत अनुभव भी है।” इस परिभाषा से स्पष्ट है कि धर्म विश्वासों की एक व्यवस्था है। यह विश्वास आत्मा, परमात्मा या अलौकिक शक्ति आदि पर हो सकता है। तथा व्यवस्था का आशय आराधना, पूजा-पाठ, प्रार्थना या भक्ति से है।

ईमाइल दुर्खीम के अनुसार, “धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं आचरणों की समग्रता है, जो इन पर विश्वास करने वालों को एक नैतिक समुदाय के रूप में संयुक्त करती है।”

जॉनसन के अनुसार, “धर्म कम या अधिक रूप में उच्च आलौकिक क्रम या प्राणियों, शक्तियों, स्थानों एवं अन्य तत्वों के सम्बन्ध में विश्वास व व्यवहारों की एक स्थिर प्रणाली है।”

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “धर्म वह है जो मानव को इस संसार एवं परलोक में आनन्द की खोज के लिए प्रेरित करता है।”

मजूमदार एवं मदान के अनुसार, “धर्म किसी आलौकिक और अतीन्द्रिय शक्ति के भय का एक मानवीय प्रत्युत्तर है। यह व्यवहार की अभिव्यक्ति अथवा परिस्थितियों से किए जाने वाले अनुकूलन का वह रूप है, जो आलौकिक शक्तियों की धारणा से प्रभावित होता है।”

धर्म की विशेषताएँ-

       धर्म की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं।:-

(1) अतिमानवीय व अलौकिक शक्ति पर प्रभाव:-

    धर्म में यह स्वीकार किया जाता है कि निश्चित रूप से कोई न कोई ऐसी अलौकिक शक्ति है जो मानव शक्ति से श्रेष्ठ व मानव से परे रहकर विश्व का संचालन करती है।

(2) पवित्रता की धारणा:-

    धर्म पवित्र वस्तुओं से सम्बन्धित विश्वासों एवं क्रियाओं की एक समन्वित व्यवस्था है अर्थात् धार्मिक विश्वासों, वस्तुओं, स्थानों, आदि में पवित्रता का भाव पाया जाता है।

(3) धार्मिक क्रियाकलाप:- 

    प्रत्येक धर्म में कुछ न कुछ क्रियाकलाप अवश्य पाए जाते हैं जिन्हें पूर्ण करके व्यक्तियों को आत्मिक सुख प्राप्त होता है।

(4) भय की धारणा:-

   धर्म में भय की धारणा होती है, इसलिए व्यक्ति धार्मिक क्रियाकलापों के माध्यम से पारलौकिक या अलौकिक शक्ति को प्रसन्न करने का प्रयास करता है तथा धार्मिक क्रियाकलापों में ऐसे कार्य करता है जिससे अलौकिक शक्ति द्वारा उसकी इच्छाएं पूर्ण हों और वह ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहता जो धर्म के विरुद्ध हो।

(5) धर्म वैयक्तिक व सामाजिक:-

    धर्म व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक अनुभवों से भी सम्बन्धित होता है।

(6) तर्क का अभाव:-

      धर्म का आधार विश्वास है, अतः इसमें तर्क का कोई स्थान नहीं होता है और न ही वैज्ञानिक आधार पर इसे सही या गलत बताया जा सकता है।

(7) सार्वभौमिकता:-

    धर्म प्राचीन समय से ही किसी न किसी रूप में रहा है। इसका रूप परिवर्तन अवश्य हो सकता है।

भारतीय धार्मिक संरचना

      भारतीयों के जीवन में धर्म का प्रमुख स्थान रहा है। वह जन्म से मृत्यु तक धार्मिक संस्कारों से आबद्ध है। हमारे अनेक धार्मिक कृत्य, रीति-रिवाज व स्तुतियाँ, आदि वैदिक काल से चले आ रहे हैं और आज भी हमारे धर्म सम्बन्धी कार्य वेदों के अनुसार होते हैं। भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता प्राचीन काल से रही है, यही कारण है कि भारत-भू पर विविध धर्मों एवं धार्मिक विचारों व सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव समय के साथ होता रहा है। इसके साथ ही बाहर से आए धर्म एवं धार्मिक विचारों का परिष्कार भी हुआ। भारत के प्रमुख धर्म निम्नलिखित हैं:

(1) हिन्दू धर्म देश का सबसे प्रमुख धर्म है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अनुसार, हिन्दू वह है जो भारत में उत्पन्न किसी धर्म को मानता है तथा जो भारत में भारतीय माता-पिता की सन्तान है। इस महासभा के अनुसार सनातनी, आर्य समाजी, जैन, सिख, बौद्ध, ब्राह्मण, आदि सभी हिन्दू कहे जा सकते हैं। यह सत्य ही कहा है कि भाषा भारतीय लोगों को भौगोलिक समुदायों में बांटती है, धर्म उन्हें समान्तर परतों में बांटता है।

         हिन्दू धर्म की तीन विशेषताएँ हैं:-

(i) एक सर्वोच्च सत्ता तथा अनेक छोटे देवताओं में प्रत्येक हिन्दू धर्मावलम्बी पूर्ण आस्था रखता है।

(ii) इसकी प्रवृत्ति सहनशीलता की है तथा कोई भी हिन्दू देवी या देवता विशेष की आराधना कर सकता है, उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।

(iii) यह कर्म, पुनर्जन्म और मृत्यु के बाद मोक्ष मिलने में विश्वास रखता है। गीता की यह सूक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनः’ (Action is the duty, Reward is not the concern)

      सभी भारतीयों में मान्यता पाती है।

    हिन्दू धर्म की अपनी एक विशेष सामाजिक व्यवस्था होती है जिसके मुख्य तत्व जाति, समुदाय, संयुक्त परिवार प्रणाली, बाल-विवाह की प्रथा, सार्वभौमिक विवाह प्रथा, आदि हैं।

भारत में धर्म के अनुसार जनसंख्या का वितरण- 2011

क्रम संख्या धार्मिक समुदाय प्रतिशत
1.

2.

3.

4.

5.

6.

7.

हिंदू

मुस्लिम

ईसाई

सिख

बौद्ध

जैन

अन्य

79.8

14.2

2.3

1.7

0.7

0.4

0.9

कुल योग 100.00

(2) मुस्लिम (Muslims) या इस्लाम धर्म का जन्म अरब देश में हुआ, किन्तु यह भारत में 12वीं शताब्दी के लगभग उत्तर-पश्चिम की ओर आने वाले आक्रमणकारियों द्वारा लाया गया। अतः इसका विस्तार उत्तर-पश्चिमी भारत तक ही सीमित रहा, किन्तु शनैः-शनैः यह गंगा की घाटी में फैल गया तथा पश्चिम बंगाल में भी इसने अपनी जड़ें जमा लीं। प्रायद्वीप भारत में यह अधिक नहीं फैल सका और इसलिए वहां 15% से अधिक मुस्लिम नहीं हैं। मुस्लिम अधिकतर पश्चिमी भागों में पाए जाते हैं।

(3) ईसाई (Cristians):–

       सीरिया के ईसाई जो ईसा शताब्दी के प्रारम्भिक काल में ट्रावनकोर-कोचीन में आ बसे थे, वह अन्य मिशनरी ईसाइयों से भिन्न हैं। रोमन, कैथोलिक, ऐंग्लिकन तथा बैपटिस्ट ईसाइयों की संख्या ही भारत में अधिक है। ईसाई धर्म का विस्तार भारत में पहाड़ी जातियों तथा हिन्दुओं की निम्न जातियों में अधिक हो पाया है। इस समय ईसाइयों का केन्द्रीकरण विशेषतः केरल, गोआ, दमन, दीव, पाण्डिचेरी, नगालैण्ड, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में ही है।

(4) सिख (Sikhs):-

       इस धर्म का जन्म 16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म से पृथक् होकर हुआ। यह धर्म प्राचीन हिन्दू धर्म को एक शुद्ध धर्म के रूप में अपनाने का ही प्रयास था जिसने बहु-देवों, मूर्ति पूजा, जाति प्रथा, तीर्थयात्रा और पुनर्जन्म का खण्डन किया। मुसलमानों की राजनीतिक क्रूरता तथा हिन्दुओं की सामाजिक क्रूरता के फलस्वरूप ही सिक्खों ने एक शान्तिमय पथ के स्थान पर एक सैनिक धर्म का अवलम्बन किया।

      इस धर्म के दो सिद्धान्त हैं- लम्बे बाल रखना तथा धूम्रपान न करना। इनके पास सदैव कच्छा, कृपाण, कंघी, कड़ा और केश रहते हैं जिनसे इन्हें अन्य धर्मावलम्बियों के बीच सरलतापूर्वक पहचाना जा सकता है। यह प्रारम्भ में अविभाजित पंजाब में केन्द्रित थे। अब पंजाब, हरियाणा, उत्तरी गंगा नहर (राजस्थान एवं दिल्ली व चण्डीगढ़) में अधिक फैले हैं। ये बड़े हट्टे-कट्टे होते हैं और इसलिए ये भारतीय सेना में बड़ी संख्या में मिलते हैं।

(5) जैन (Jains):-

   जैन धर्म हिन्दू धर्म की ही एक शाखा मानी जाती है। यद्यपि जैन धर्मावलम्बी हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों को मानते हैं, किन्तु यह जीवों के प्रति अहिंसा पर अधिक जोर देते हैं। ये अधिकांशतः व्यापारी और धनवान होते हैं तथा भारत में दूर-दूर तक फैले हैं।

(6) बौद्ध (Buddhist):-

     बौद्ध धर्म भी हिन्दू धर्म की ही एक शाखा है। इसे गौतम बुद्ध ने छठी शताब्दी ई. पू. में चलाया था। इसका सबसे अधिक प्रचार गंगा की घाटी में ही हुआ। यह धर्म नीति पर अवलम्बित है। यद्यपि भारत में यह धर्म 10वीं शताब्दी के बाद से लोप हो गया, किन्तु आज महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम तथा सिक्किम के पहाड़ी भागों में इनके अनुयायी मिलते हैं।

(7) पारसी (Zoroastrian):–

   पारसी लोग भारत में 7वीं शताब्दी में फारस के मुस्लिम धर्म की क्रूरता से बचने के लिए आए और भारत के पश्चिमी तटीय भागों में बस गए। यह लोग सूर्य और अग्नि की पूजा करते हैं। यह अधिकांशतः व्यापारी उद्योगी हैं। इनका सबसे अधिक केन्द्रीकरण मुम्बई नगर में है।

निष्कर्ष:

   उपर्युक्त वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि भारत के निवासियों का सम्बन्ध किसी-न-किसी धर्म से है। अधिकांश धर्मों का सम्बन्ध तीर्थ स्थानों से बताया जाता है। उदाहरणार्थ, काशी धर्म और संस्कृति से सम्बन्धित है। यहाँ अनेक हिन्दू मन्दिर हैं। हिन्दुओं के लिए गंगा सबसे पवित्र नदी है जिसके तट पर मृत्यु अथवा अन्त्येष्टि क्रिया से आत्मा को शान्ति प्राप्त होना माना जाता है।

      अलीगढ़, हैदराबाद और देवबन्द के विश्वविद्यालय मुस्लिम संस्कृति के केन्द्र हैं। सिखों के पंजाब में ननकाना साहब और अमृतसर तथा बिहार में पटना साहिब, जैनियों के राजस्थान (महावीरजी, दिलवाड़ा, रणकपुर, ऋषभदेव), गुजरात (पालीताना, गिरनार) बिहार (सम्मेद शिखर) तथा पारसियों के मुम्बई नगर में सांस्कृतिक केन्द्र हैं। बौद्ध गया (बिहार), सारनाथ (उत्तर प्रदेश), सांची (मध्य प्रदेश) में बोध के विहार हैं। बद्रीनाथ, केदारनाथ, जगन्नाथपुरी, द्वारिका, रामेश्वरम्, वाराणसी, कांजीवरम् सभी हिन्दुओं के लिए पूज्य स्थान हैं।


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16. Description of sources and characteristics of Hindu religion (हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)

16. Description of sources and characteristics of Hindu religion

(हिन्दू धर्म के स्रोत तथा लक्षणों का विवरण)



    characteristics of Hindu religion   

     प्रत्येक धर्म का कोई न कोई आधार होता है। यह भी कहा जा सकता है कि धर्म के आधार व स्रोत एक नहीं बल्कि अनेकानेक हैं।

मनु के अनुसार वेद, स्मृति, आचार तथा आत्म सन्तुष्टि, आदि धर्म के चार आधार हैं।

याज्ञवल्क्य के अनुसार वेद, स्मृति, सदाचार, अपनी आत्मा अनुकूल कार्य तथा उचित संकल्प से उत्पन्न हुई इच्छा ये सब धर्म के मूल कहे गए हैं।

विशिष्ट धर्म सूत्र के अनुसार, “श्रुति स्मृति विहितो धर्मः तदालाभे शिष्टाचारः प्रमाणम्” अर्थात् वेद और स्मृतियों में जो विहित है वह धर्म है, उनके अभाव में शिष्टाचार प्रमाण हैं।”

भीष्म के अनुसार, “वेद, स्मृति और सदाचार धर्म के स्वरूप को लक्षित करने वाले लक्षण हैं।”

      सामान्यतः हिन्दू धर्म के निम्नांकित स्रोत हैं:

(1) वेद:-

     वेद हिन्दू धर्म का मूल ग्रन्थ है। इन्हें श्रुति भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में वेदों को प्राचीनतम माना जाता है। केवल हिन्दू धर्म ग्रन्थों के ही अनुसार नहीं अपितु इतिहासकारों के विचार से भी ॠग्वेद इस पृथ्वी पर उपलब्ध साहित्य में प्रथम ग्रन्थ है। मनु के अनुसार, “वेदोलिखो धर्ममूल” अर्थात् वेद धर्म के मूल हैं।

       चाणक्य ने लिखा है “न वेदो ब्राह्मो धर्मः” अर्थात् धर्म वेद से बाहर नहीं होता। महाभारत में कहा गया है “वेदोक्तः परमो धर्मः” अर्थात् वेदों में कहा गया धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है। ब्रह्मा जी ने लिखा है कि वेद ही मेरे उत्तम नेत्र हैं, वे ही मेरे परम बल हैं, वेद ही मेरे परम आश्रय तथा वेद ही मेरे सर्वोत्तम उपास्य देव हैं।” वेदों से ईश्वरीय ज्ञान का प्रतिपादन होता है। इसलिए प्रत्यक्ष एवं अनुमान से जो प्राप्त नहीं हो सकता है, वह ज्ञान वेदों से प्राप्त किया जा सकता है।

(2) स्मृति:-

    स्मृति का अर्थ है याद करना। स्मृतियों के अन्तर्गत देश एवं काल के अनुसार श्रुतियों की व्याख्या एवं सार संयोजित है। श्रुतियों पर आधारित होने के कारण स्मृतियाँ भी प्रामाणिक मानी जाती हैं। स्मृतियाँ वेदों का ही अनुसरण करती हैं। मनु और याज्ञवल्क्य ने वेदों और स्मृतियों को धर्म का मूल आधार कहा है।

(3) सदाचार:-

     धर्म सूत्रों में इसे शील, शिष्टाचार अथवा सामयाचारिक तथा स्मृतियों में इसे आचार अथवा सदाचार कहा गया है। मनु याज्ञवल्क्य, गौतम, वशिष्ट, आपस्तम्ब, आदि ने वेद और स्मृति के साथ-साथ सदाचार को भी धर्म का मूल स्रोत कहा है। मनु ने निर्देश दिया है कि “श्रुति और स्मृतियों में भली-भांति बताए गए अपने कर्मों के अनुष्ठान में धर्ममूलक सदाचार का आलस्य रहित होकर पालन करें।”

(4) अन्तःकरण:-

    धर्म का अन्तिम स्रोत व्यक्ति का अन्तःकरण कहा गया है अर्थात् धर्म का निर्णय स्वयं व्यक्ति के अन्तःकरण से होता है। व्यक्ति को अपने प्रत्येक कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। अतः धर्मशास्त्रों के निर्देश एवं अनुमोदन के बाद भी किसी कर्म के अन्तिम निर्णय का अधिकार व्यक्ति का होना ही चाहिए। जिन कार्यों को व्यक्ति का अन्तःकरण सहमति दे केवल उन्हीं को सम्पन्न करना चाहिए। इसके विपरीत जिन्हें अन्तःकरण अनुमति न दे, भले ही धर्मशास्त्र निर्देश व अनुमति दे, नहीं करना चाहिए।

धर्म के लक्षण:–

       मनु ने धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख किया है- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य, अक्रोध।

धृतिः क्षमाः दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः।

धीर्विद्याः सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

(1) धृति:-

     धृति का अर्थ है धैर्य। धैर्यवान व्यक्ति को ही धीर कहा जाता है। गीता में धृति के सात्विकी, राजसी और तामसी तीन भेद किए गए हैं। सांसारिक बन्धनों में न बंधकर मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करने को सात्विक धृति कहते हैं।

     फल की इच्छा रखते हुए धर्म, अर्थ, काम को धारण करना राजसी धृति कहलाता है। जब व्यक्ति दुर्बुद्धि होकर निन्दा, भय, चिन्ता, दुख एवं उन्मत्तता को नहीं छोड़ता तो उसे तामसी धृति कहते हैं। महाभारत में कहा गया है कि सुख या दुख प्राप्त होने पर मन में विचार न होना धृति है।

(2) क्षमा:-

   महर्षि वाल्मीकि के अनुसार व्यक्ति का सच्चा आभूषण क्षमा है। क्षमा ही दान, सत्य, यज्ञ, यश तथा धर्म है। महाभारत में कहा गया है कि क्षमा धर्म है, यश है, वेद है, शास्त्र है, ब्रह्म है, सत्य है, भूत है, भविष्य है, तप है तथा शौच है।

(3) दम:-

    दम से तात्पर्य है बाह्य इन्द्रियों का संयम जिसके लिए अन्तःकरण को संयमित करना पड़ता है। गीता में कहा गया है कि जो व्यक्ति मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों का संयम करता है, वह श्रेष्ठ है।

(4) अस्तेय:-

    अस्तेय का अर्थ स्तेय अथवा चोरी के त्याग से होता है। इसके अन्तर्गत वे सभी वस्तुएं आती हैं जो शास्त्रों के द्वारा ग्रहणीय कही गई हैं। इसी प्रकार अस्तेय के अन्तर्गत मन, वचन और कर्म तीनों से किए जाने वाले स्तेय का त्याग सम्मिलित होता है।

(5) शौच:-

    शौच से तात्पर्य पवित्रता है। शौच बाह्य एवं आन्तरिक दो प्रकार की होती है। शरीर के विभिन्न अंगों को मिट्टी एवं जल आदि के द्वारा शुद्ध करना बाह्य शौच कहलाता है जबकि मैत्री, करुणा, सहानुभूति, तप, सत्य, आदि वृत्तियों द्वारा मन को निर्मल रखना आन्तरिक शौच कहलाता है।

(6) इन्द्रिय निग्रह:-

    इन्द्रिय निग्रह से तात्पर्य इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाना है। गीता में कहा गया है कि बुद्धिमान पुरुष के मन को भी ये इन्द्रियाँ बलात विषयों की ओर खींच लेती हैं। इसलिए बुद्धि को स्थिर रखने के लिए इन्द्रियों को वश में रखना आवश्यक है।

(7) धी:-

   धी का अर्थ विवेक बुद्धि है। विवेक बुद्धि व्यक्ति को वस्तुओं एवं विषयों के गुण-दोषों का ज्ञान कराती है ताकि वह गुणों का ग्रहण तथा दोषों का परित्याग कर सके। महाभारत में कहा गया है कि बुद्धि ही धन की प्राप्ति कराती है, बुद्धि से मनुष्य को कल्याण प्राप्त होता है।

(8) विद्या:-

    भर्तृहरि के अनुसार विद्या मनुष्य का सबसे बड़ा सौन्दर्य है, उसका छिपा हुआ गुप्त धन है। विद्या भोग देने वाली है, यश और सुख प्रदान करने वाली है। विद्या गुरुओं का भी गुरु है। परदेश में विद्या ही बन्धुजन है, विद्या ही परम देवता है। विद्या ही राजाओं में सम्मान्य है, वही धन है। इसलिए विद्या रहित पुरुष पशु है।

(9) सत्य:-

    सत्य की महिमा का वर्णन प्रत्येक जगह मिलता है। महाभारत में कहा गया है कि “सत्य ही धर्म, तप और योग है। सत्य ही सनातन ब्रह्म है, सत्य को ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्य पर ही टिका हुआ है।” ऋग्वेद में कामना की गई है कि “सत्य वाणी के सहारे आकाश टिका है, सम्पूर्ण संसार के प्राणी उसी पर आश्रित हैं, उसी से सूर्य का उदय होता है, उसी से जल निरन्तर बहता है वही सत्य हमारी रक्षा करता है।”

(10) अक्रोध:-

     अक्रोध का अर्थ है कारण होते हुए भी क्रोध न करना। गीता में कहा गया है कि “क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है, अविवेक से स्मरण शक्ति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्ति का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से व्यक्ति अपने श्रेय साधन से गिर जाता है।” अतः व्यक्ति को अक्रोधी ही बनना चाहिए।


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14.. Explain habitat as a cultural expression/ सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।

14. Explain habitat as a cultural expression.

(सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के रूप में निवास स्थान को समझाइए।)

अथवा

विश्व के विभिन्न भागों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियाँ



         मानव जीवन विभिन्न परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होता है। विभिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली परिस्थितियाँ भिन्नता वाली होती हैं। अतः वहाँ का मानव-जीवन अन्य क्षेत्रों से भिन्न होता है। मानव निवास की दृष्टि से निम्नांकित क्षेत्र हैं:-

(i) विषुवतरेखीय क्षेत्र

(ii) उष्ण मरुस्थलीय क्षेत्र

(iii) घास के मैदान

(iv) टुण्ड्रा प्रदेश

       इन प्रदेशों में निवास करने वाली प्रतिनिधि प्रजातियों का विवरण नीचे दिया जा रहा है:

(1) पिग्मी:-

     पिग्मी मध्य अफ्रीका के कांगो बेसिन में जायरे व कांगो गणराज्यों एवं गैबन व कैमरून में पाए जाते हैं। इनकी मुख्य बस्तियाँ छोटे-छोटे समूहों में घने वनों के आसपास पाई जाती हैं। पिग्मी काले, नाटे कद के नीग्रिटो प्रजाति के लोग हैं। इनका कद 1 से 1.5 मीटर तक होता है। इसीलिए इन्हें बौने कहा जाता है। इनकी शारीरिक रचना में छोटा कद, भार कम, रंग काला अथवा चाकलेटी, पैर लम्बे, बाल छोटे और छल्लेदार गुच्छों वाले, होठ लटकते हुए मोटे, नथुने चौड़े, नाक चपटी और ठोढ़ी पतली होती है।

     पिग्मी स्थायी घर बनाकर नहीं रहते हैं। अधिकांश पिग्मी जंगली जीवों से सुरक्षा की दृष्टि से अपनी झोपड़ियाँ वृक्षों पर ही बनाते हैं। ये झोपड़ियाँ पेड़ की टहनियों, पत्तों एवं घास-फूस से बनाई जाती हैं। उन पर चढ़ने के लिए बांस की सीढियाँ काम में लाई जाती हैं।

     उष्ण एवं आर्द्र जलवायु के कारण इन लोगों को वस्त्रों की आवश्यकता बहुत कम पड़ती है। अतः ये बहुत कम वस्त्रों का प्रयोग करते हैं।

    पिग्मी को वनों में फूल, मांस के लिए पशु एवं पक्षी अधिक मात्रा में मिल जाते हैं। अतः शिकार और फल एकत्रित कर इनका भी भोजन पिग्मी जाति के लोग करते हैं। ये लोग कन्द, मूल, फल, केला, कसाबा, रतालू, मक्का आदि खाते हैं। पिग्मी लोगों का मुख्य व्यवसाय पशुओं का शिकार, वन से वस्तुएं एकत्रित करना और मछली मारना है। आखेट करने में ये लोग बड़े चतुर होते हैं। हाथी जैसे भीमकाय पशु का शिकार भी सरलता से कर लेते हैं।

(2) बोरो:-

     पश्चिमी अमेजन बेसिन में निवास करने वाली जाति बोरो है। ब्राजील, पीरू तथा कोलम्बिया के समीपवर्ती क्षेत्र में जहाँ अमेजन की सहायक-जापुरा, पुतुगामा, ईसा के बेसिन हैं, वहाँ बोरो आदिम जाति कृषक के रूप में जीवन-यापन करती है। ये लोग शारीरिक गठन में अमेरिकी इण्डियन जैसे हैं। इनकी त्वचा का रंग भूरा, सीधे काले बाल, तथा मध्यम कद होता है। इनका भोजन कुसावा की रोटियाँ तथा पका मांस मुख्य होता है। जापुरा नदी तट के निवासी प्रातः स्नान कर ठण्डी कसावा की रोटी तथा जंगली फलों का भोजन करते हैं। इनके अतिरिक्त ग्रब, मछली तथा मधु का भी प्रयोग करते हैं।

     नृत्य के समय स्त्रियाँ अपने सम्पूर्ण शरीर में चित्रकारी करती हैं और बीजों का हार बनाकर पहनती हैं। पुरुष नृत्य के समय पक्षियों के पंखों का मुकुट पहनते हैं।

    बोरो जाति के लोग वनों को जलाकर साफ की हुई भूमि पर बड़े और ऊँचे मकान बनाते हैं। कई परिवारों का संयुक्त मकान होता है। यहाँ के निवासी कृषि करते हैं। ये कृषि के अतिरिक्त आखेट भी करते हैं। ये प्रतिदिन नदियों और जलाशयों में मछली और केकड़ों को जाल में फंसाकर पकड़ते हैं। शिकार के लिए एक विशेष प्रकार का यंत्र प्रयोग करते हैं जिसे ब्लो-पाइप कहते हैं।

     बोरो का परिवार सारा गाँव ही होता है, परन्तु पूरे गाँव में भी छोटे-छोटे कई परिवार होते हैं। दो परिवारों के मध्य लड़के-लड़कियों का विवाह होने से इनके रीति-रिवाज तथा भाषा में समानता पाई जाती है।

(3) सेमांग:-

       सेमांग जनजाति मलेशिया में मलाया प्रायद्वीप के उत्तरी भाग तथा थाईलैण्ड के दक्षिणी भाग के पहाड़ी भागों में फैली हुई है। इनके प्रमुख क्षेत्र उत्तरी पैराक, केदा, केलनतान, पैहांग में पाए जाते हैं। उनकी शारीरिक रचना नीग्रिटो जैसी हैं। इनका रंग चाकलेटी या गहरा भूरा, नाक चपटी व खुली हुई, होठ मोटे, आंखें बड़ी और स्थिर दृष्टि वाली, ठोड़ी अन्दर को घंसी हुई होती है एवं कद नाटा होता है।

     यह जनजाति अपना भरण-पोषण वन-वस्तु संग्रह एवं शिकार द्वारा करती है। विषुवतरेखीय एवं आर्द्र मानसूनी वनों से ये कन्द मूल, फल जड़ें, मोटे तने जैसे कन्द एकत्रित करते हैं। जंगली रतालू एवं ड्यूरिन पेड़ के मोटे फल का यहाँ के भोजन में विशेष महत्व है।

       ये लोग अपना निवास स्थान पहाड़ी ढालों पर सुरक्षित स्थलों के निकट बनाते हैं। इनकी झोपड़ियाँ चट्टानी भाग की छाया में प्रायः खजूर, रटन, ताड़ एवं अन्य लम्बी पत्ती वाली टहनियों से बनाई जाती है। झोपड़ियों का निर्माण स्त्रियाँ करती हैं, किन्तु पुरुष भी सहायता करते हैं।

सेमांग के एक या एक से अधिक घरों के समूह में एक ही कबीले के या बड़े परिवार के लोग रहते हैं। यही इनका समाज भी है। इनका मुख्य उद्यम कन्द मूल, फल, आदि एकत्रित करना तथा आखेट करना है। वन्य पदार्थों को एकत्रित करने का कार्य प्रायः स्त्रियाँ करती हैं।

(4) सकाई:-

     मलेशिया में मुख्य मलाया प्रायद्वीप के मध्यवर्ती पहाड़ी ढालों पर दूर-दूर तक फैली हुई जनजाति है। इनकी शारीरिक रचना अधिक आकर्षक एवं बदन गठीला होता है। इनका रंग हल्का भूरा अथवा साफ होता है। ये लोग पहाड़ी ढालों से नीचे नदी घाटियों एवं संकरी मैदानी पट्टी में रहते हैं। इनका आवास झोपड़ियाँ होती हैं जो टहनियों, छाल व पत्तों से ढकी जाती हैं।

     ये अपना भरण-पोषण मुख्यतः शिकार, वन्य-वस्तु संग्रह एवं मछलियाँ पकड़कर करते हैं। रबर के बगीचों में भी कार्य करके मजदूरी प्राप्त करते हैं। इनकी सामाजिक व्यवस्था एवं रीति-रिवाज सेमांग से मिलती जुलती है।

(5) पापुआन:-

      प्रशान्त महासागर में न्यूगिनी द्वीप के निवासी पापुआन कहलाते हैं। ये कद में मोटे नाटे होते हैं तथा चमड़ी का रंग हल्का होता है। ये लोग वृक्षों की जड़ों, छाल, कन्दमूल, फल, आदि से भोजन प्राप्त करते हैं। शिकार से प्राप्त मांस अन्य जीव भी भोजन के मुख्य पदार्थ हैं। इनके गाँव पहाड़ियों की चोटियों पर होते हैं। प्रत्येक गाँव पुराने ढंग पर किलाबन्दी किए रहता है। इनके घर का आकार गोल होता है।

       ये लोग सांपों तथा शत्रुओं से रक्षा हेतु कभी-कभी ऊँचे पेड़ों पर भी अपना मकान बना लेते हैं। इनकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। कृषि में गन्ना तथा पपीता मुख्य उत्पादन है। ये लोग पशुपालन भी करते हैं। पालतू पशुओं में सुअर का प्रमुख स्थान है।

    पापुआन की लड़ाई का आधार रोटी है। ये बड़े खूंखार होते है। लड़ना-झगड़ना तथा हत्या करना बड़ी सामान्य बात है। ये लोग अन्धविश्वासी होते हैं।

(6) बद्दू:-

     बद्दुओं का निवास क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी एशिया में पश्चिमवर्ती अरब प्रायद्वीप तथा अफ्रीका में सहारा के उष्ण मरुस्थल हैं। ये अपने को सेमेटिक जाति की एक शाखा के वंशज मानते हैं। केवल स्थायी विकास क्षेत्रों को छोड़कर बद्दू लोगों का कोई स्थायी निवास नहीं होता है। ये अपने कबीलों, ऊंटों, घोड़ों, कुत्तों, भेड़-बकरियों, आदि के साथ चारे-पानी और मरुद्यानों की खोज में भ्रमण करते रहते हैं। इनका मुख्य भोजन खजूर है। इसके अलावा गेहूँ, जौ, मक्का, आदि भी खाते हैं।

        ये लोग अपने शरीर को सूती वस्त्रों से ढंके रहते हैं। इनके कपड़े ढीले-ढाले होते हैं। इनका मुख्य व्यवसाय भेड़, बकरी, ऊंट और घोड़े पालना है। ये मरुद्यानों के लोगों को खजूर, ऊन, पशु, मांस और दूध बेचकर बदले में गेहूँ, जौ, कपड़े तथा तम्बाकू, आदि ले लेते हैं।

(7) बुशमैन:-

       कालाहारी मरुस्थल में निवास करने वाले बुशमैन हैं। ये लोग ठिगने कद के होते हैं। ये चपटी मुखाकृति, भारी पलकों और तिरछी आंखों वाले होते हैं। इनका रंग भूरा और पीलापन लिए होता है। इनका आवास कच्ची झोपड़ी गुफाओं तथा कन्दराओं में होता है, ये लोग प्रायः अर्द्ध नग्नावस्था में रहते हैं। बुशमैन मांसाहारी होते हैं। शिकार करना और मांस प्राप्त करना इनका मुख्य व्यवसाय है। शिकार के लिए स्थान-स्थान पर घूमना व शिकार के पीछे मीलों दूर तक भगाकर मारना इनके लिए अनिवार्य हो जाता है।

(8) खिरगीज:-

      ये लोग मध्य एशिया में किरगिजस्तान में पामीर उच्च भूमि तथा ध्यानशान पर्वतमाला के क्षेत्र में निवास करते हैं। इनका शरीर खूब गठा हुआ सुडौल तथा मजबूत होता है। यह तुर्कों के सम्मिश्रण से उत्पन्न हुई जाति है। खिरगीज घुमक्कड़ जाति के लोग होते हैं। अतः इनका कोई स्थायी घर नहीं होता है। भ्रमणकारी होने के कारण तम्बू ही इनका घर होता है। इन्हें पशुओं की खाल तथा ऊन के नमदों से बनाया जाता है। इनका भोजन पशुओं से ही प्राप्त होता है। पशुओं का मांस, रक्त, दूध, दूध पदार्थ इनके भोजन के अंग हैं। बकरे का मांस इनका प्रिय भोजन है।

     खिरगीज अर्थव्यवस्था में गाय, घोड़ों, भेड़ और बकरियों का विशेष महत्व है। ये जूते, टोपियाँ, टोकरियाँ, मशकें, कोट, पायजामे, आदि बनाते हैं। ये लोग मौसमी पशुचारण करते हैं।

(9) एस्किमो:-

     एस्किमो का निवास ध्रुवीय क्षेत्रों में टुण्ड्रा प्रदेश में स्थित है। एस्किमो मंझोले कद के होते हैं। इनका रंग भूरा व पीलापन लिए होता है, चेहरा गोल और चौड़ा तथा शरीर, बेडौल, आंखें काली और छोटी, नाक चपटी, मांसल शरीर, जबड़े भारी तथा दांत विशेष मजबूत होते हैं। ये लोग मांसाहारी होते हैं। इनका मुख्य भोजन सील, बालरस और ह्वेल, मछलियाँ, कैरीबो, बारहसिंगे, ध्रुवीय भालू, आदि का मांस है।

     इनका मुख्य व्यवसाय आखेट है। ये लोग श्वेत भालू, रेण्डियर, कैरीबो, आर्कटिक लोमड़ी, खरगोश, समूरदार जानवर, ह्वेल, सील, बालरस, आदि का शिकार करते हैं।

        इनका निवास गृह इग्लू (Igloo) कहलाता है। ये तीन या चार मीटर के घेरे में बनाए जाते हैं। इनके वस्त्र जानवरों की खाल से निर्मित होते हैं। स्त्रियाँ एवं पुरुष एक समान वस्त्र पहनते हैं। स्लेज, कयाक, उमियाक तथा हारपून इनके दैनिक उपकरण हैं।

 



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13. Describe the internal and external characteristics of species classification (प्रजातियों के वर्गीकरण के आन्तरिक एवं बाह्य लक्षणों का वर्णन कीजिए।)

13. Describe the internal and external characteristics of species classification

(प्रजातियों के वर्गीकरण के आन्तरिक एवं बाह्य लक्षणों का वर्णन कीजिए।)



characteristics of species

(B) बाह्य लक्षण

अनिश्चित लक्षण-

       इन पर वातावरण का प्रभाव निश्चित लक्षणों की अपेक्षा अधिक पड़ता है। इनकी नाप किसी यंत्र से सम्भव नहीं है। ये लक्षण निम्न हैं:

1. त्वचा का रंग (Skin Colour):-

     त्वचा के रंग की दृष्टि से विश्व के मानवों में बड़ी विभिन्नता पाई जाती है। मनुष्य की त्वचा मैलेनिया (Melania), कैरोटीन (Carotene) अथवा हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) की मात्रा कम या अधिक होने के कारण चमड़ी का रंग काला, पीला या लाल हो सकता है। जब त्वचा में सबसे अधिक मैलेनिया पाया जाता है तो मनुष्य का रंग काला या गहरा भूरा हो जाता है। कैरीटोन की अधिकता से यह रंग पीला और हीमोग्लोबिन की अधिकता से श्वेत या गोरा होता है।

     ज्यों-ज्यों विषुवत् रेखा से उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, जलवायु में परिवर्तन के कारण, मनुष्यों की त्वचा का रंग काले से श्वेत होता जाता है।

त्वचा के रंग के आधार पर प्रजाति एवं उनके निवास क्षेत्र

त्वचा का रंग प्रजाति निवास क्षेत्र
1. श्वेत-गौर वर्ण कॉकेशियन यूरोप, रूस, पश्चिमी यूरोप, अफ्रीका
2. पीत त्वचा मंगोलियन एशिया, उत्तरी अमरीका, द. अफ्रीका (मंगोल, चीनी
3. श्याम त्वचा, काला वर्ण नीग्रोइड्स विषुवत् रेखीय अफ्रीका, नीग्रो, नीग्रोइड, नेग्रिटी, पेपुआं आस्ट्रेलियाई- द्रविड़ मध्य अफ्रीका, पूर्वी द्वीप समूह, पोलीनेशिया

       त्वचा के रंग के आधार पर विश्व की प्रजातियों को तीन मोटे भागों में बाँटा गया है- श्वेत प्रजाति (White Race), पीत प्रजाति (Yellow Race) एवं श्याम प्रजाति (Black Race), किन्तु इन तीनों रंगों में कई विभिन्नताएँ मिलती हैं। उदाहरणार्थ, स्केण्डेनेवियन एवं उत्तरी यूरोप के निवासियों में बहुत हल्के रंग से लेकर भूमध्यसागर के निकट के निवासियों का रंग जैतूनी एवं काला मिश्रित श्वेत रंग देखने को मिलता है। इसके विपरीत, पीली त्वचा वाले एशियाई लोगों में बहुत हल्के भूरे रंग से लेकर पीला रंग तक पाया जाता है।

     सहारा मरुभूमि के दक्षिण में अफ्रीकी लोग पूर्णतः काले रंग के होते हैं, किन्तु उनमें भी काले भूरे रंग में कालिख जैसे रंग का आधिक्य होता है। काले रंग में यह विभिन्नता मैलेनेशियनों, नीग्रो, पैपुआं, नीग्रोइड्स तथा पूर्व द्रविड़ लोगों में पाई जाती है।

2. बालों की बनावट (Texture of Hair):-

        सिर के बालों की बनावट को प्रजातियों के वर्गीकरण में दो कारणों से महत्वपूर्ण माना गया है-

(i) बालों की बनावट पर वातावरण तथा आयु, लिंग, जलवायु अथवा भोजन का कम प्रभाव पड़ता है।

(ii) यह वंशानुक्रम द्वारा निर्धारित होती है अतः इसकी नाप सम्भव है।

     कुछ मानव प्रजातियाँ ऐसी हैं जिनके मध्य सिर में बाल बड़े व्यापक रूप से उगते हैं जबकि अन्य कुछ में शरीर पर अधिक बाल प्रकट होते हैं। एक मान्यता-सी रही है कि जितने शरीर पर कम बाल होते हैं, सिर के बाल उतने ही लम्बे होते हैं। सम्भवतः इसी कारण स्त्रियों के सिर के बाल काफी लम्बे होते हैं। बालों को बनावट की दृष्टि से पाँच भागों में विभक्त किया गया है। इनका आधार बालों का आकार (उनका सीधा खड़ा रहना या ऊन जैसा खुरदुरा होना), वालों का रंग बालों की ऊर्ध्वकाट (cross-section) तथा बालों की लम्बाई (लम्बी या छोटी) होती है।

(i) सीधे बाल (Straight hair), जो सीधे, मोटे, कड़े और लम्बे होते हैं। ऐसे बाल एशियाई पीत त्वचा वर्ग वाले (चीनी, मंगोलियाई), अमेजन बेसिन के अमेरिकी भारतीय समूह, पूर्वी द्वीपसमूह के निवासियों के पाए जाते हैं।

(ii) चिकने तरंगमय और घुंघराले बाल (Smooth and Wavy hair) (जो मुलायम और पतले होते हैं) यूरोप, पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका, भारत, आस्ट्रेलिया तथा उन प्रदेशों में जहां ऐसे लोग फैले हुए हैं, के होते हैं।

(iii) ऊन जैसे काने वाल (Woolly and Curly hair) जो उलझे और घने होते हैं। नीग्रो, नीरोटॉस पैपुआं, मैलेनेशियन लोगों के होते हैं।

3. शरीर का कद (Stature):-

     मानव के कद का आकार भी प्रजातियों के वर्गीकरण में उपयोग में लाया जाता है, जैसा कि तापीनार्ड नामक मानवशास्त्री ने किया था। आधुनिक मानव की औसत शारीरिक ऊँचाई 163 सेमी. होती है।

(i) बहुत छोटा नाटा कद (Very Short), 148 सेमी से 158 सेमी तक अफ्रीका के पिग्मी और अण्डमानवासी ओसीनियाई, पूर्वी अफ्रीकी समुदायों पूर्वी एशियाई (चीनी) जापानी), बेड़ा, सकाई, लैप्स, पेरू निवासी और दक्षिण भारतीयों का होता है,

(ii) मध्यम कद (Medium), 159 सेमी. से 168 सेमी. तक, मलेशिया, पूर्वी सुमात्रा न्यूगिनी के निवासी रूसी, खिरगीज लोगों का,

(iii) लम्बा कद (Tall). 169 सेमी. से 171 सेमी. तक मैलेनेशियन, हॉटेण्टॉट्स आस्ट्रेलियाई प्रविड़ और भूमध्यसागरीय लोगों में तथा

(iv) बहुत लम्बा कद (Very Tall), 172 सेमी. से ऊपर पूर्वी सूडान, नीग्रोइड, अफगान, अल्पाइन, रूस, पैटागोनिया, स्कॉटलैण्ड तथा इंग्लैण्ड और आस्ट्रेलिया के निवासियों में पाया जाता है।

4. मुखाकृति (Shape of the Face):-

      साधारणतया मुख सिर की बनावट से समानता लिए मानव-मुख तथा निचला जबड़ा आवश्यक विभिन्नताएँ प्रदर्शित करते हैं। यह विषमता मुख की चौड़ाई और लम्बाई, गालों की हड्डियों के आकार और मुख के अग्रिम भाग के निकास, आदि पर आधारित है।

       लम्बे सिर वालों के चेहरे लम्बे तथा चौड़े और गोल सिर वालों के चेहरे चौड़े अथवा गोल होते हैं।

      मुख की चौड़ाई स्पष्टतः गालों की हड़ियों के विपरीत अंशों के मध्य अधिकतम दूरी होती है जबकि उसकी लम्बाई ऊपरी जबड़े पर इसकी केन्द्र-रेखा में निचले अंश तक माफी जाती है। ये नाप एक-दूसरे के सम्बन्धों की दृष्टि से व्यक्त किए जाते हैं तथा इन्हें मुख सम्बन्धी चिह्न कहा जाता है। मुख सम्बन्धी चिह्न के अनुरूप लोगों को इस प्रकार वर्गीकृत किया गया। है-

(i) चौड़े मुख वाले 85 से नीचे,

(ii) मध्यम मुख वाले 85 से 98 तक, और

(iii) लम्बे मुख वाले लगभग 981

जबड़ों का फैलाव (Prognathism)-

        जब मुख का निचला अंश (जबड़ा) विशेष रूप से उभरा होता है तो इसे निम्न आकृति के रूप में व्यवहृत किया जाता है। यह अधिकांशतः नीग्रो लोगों में देखा जाता है। मंगोलियन प्रजाति के लोग कम आगे उभरे हुए (दबे हुए) जबड़े वाले होते हैं। इसके विपरीत, जब मुख का निकास विल्कुल ही नहीं अथवा बहुत कम होता है तो उसे Orthognathous कहते है। यह स्वरूप विशेषतः आधुनिक युग के व्यक्तियों में हमें दृष्टिगत होता है।
5. आंखों का रंग और बनावट (Eye-colour and Folds):-

       सभी प्रजातियों में आंखों का रंग काला होता है, किन्तु फिर भी आंखों की पुतली में रंग की दृष्टि से कुछ अन्तर पाया जाता है, जैसे कॉकेशियन प्रजाति (यूरोपीय और अमेरिकी लोगों) की आंखों का रंग नीला, हरा या भूरा होता है, किन्तु भारतीयों की आंखे सामान्यतः काली होती है।

       आंख की बनावट में भी अन्तर पाया जाता है। कुछ आंखें बादाम की तरह तिरछी होती हैं और उनकी फटान (Opening) बिल्कुल क्षैतिजावस्था में होती है। ऐसी आंखें यूरोप, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण-पश्चिमी एशिया एवं भारत के लोगों में पाई जाती हैं। जबकि चीनी, जापानी, मंगोल, आदि लोगों की आंखों की फटान तिरछी होती है तथा मोड़ ऊपरी भाग में खाल का पड़ा होता है जो आंख के आन्तरिक कोण को छिपा लेता है तथा जो गालों तक फैला होता है। इस प्रकार की आंख को मंगोलीय प्रकार की अधखुली आंख (Monogolian type  eye-slitedned) कहते हैं।

6. होठों के आकार (Lip Forms):-

        होठों की बनावट में भी भिन्नता पाई जाती है, अतः प्रजातीय निर्धारण में इसका भी सहयोग लिया जाता है। होंठ में जातीय भिन्नताएँ झिल्ली के स्वरूप और उसकी मोटाई से स्पष्ट होती हैं। नीग्रॉइडों में तथा पश्चिमी अफ्रीकी लोगों में झिल्ली का अंश बहुत मोटा होता है। यह फूला हुआ तथा बाहर को उल्टा हुआ होता है। जिससे होंठ का किनारा बहुत ही स्पष्ट दिखाई देता है। अन्य लोगों में होंठ बहुत ही छोटे होते हैं। इनमें बहुत कम स्थूलता या फैलाव पाया जाता है अथवा बाहर को उलटे हुए या होंठ सन्धि की विभिन्नता बिल्कुल ही नहीं मिलती अर्थात् होंठ पतले और अन्दर की ओर झुके होते हैं।

characteristics of species 

B. आन्तरिक लक्षण 

1. सिर की बनावट अथवा कपाल सूचकांक (Cranial Shape or Cephalic Index):-

       निश्चित शारीरिक लक्षणों में सिर की बनावट को महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि इस पर वातावरण का प्रभाव बहुत कम पड़ता है, किन्तु अब इस लक्षण का महत्व कुछ कम हो गया है, क्योंकि एक ही प्रजाति के लोगों के सिर की बनावट में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है, जैसे- श्वेत प्रजाति में ही लम्बे, चौड़े और मध्यम सिर पाए जाने लगे हैं।

     सिर की बनावट ज्ञात करने के लिए उसकी लम्बाई-चौड़ाई ज्ञात कर उनका पारस्परिक सम्बन्ध बताया जाता है। सिर की लम्बाई नाक के ऊपर आंखों की भीड़ों से लेकर पीछे गुद्दी में इसी सीध तक नापी जाती है तथा चौड़ाई दोनों कानों के कुछ ऊपर से ज्ञात की जाती है। सिर की चौड़ाई को 100 से गुणा कर सिर की लम्बाई का भाग देकर कपाल या शीर्ष सूचकांक (Cephalic Index) प्राप्त किया जाता है। यह सूचकांक सदैव इकाई (Units) में प्रदर्शित किया जाता है।

CI = Length of the Head x 100/Breadth of the Head

       सिर के आकार को देखने से स्पष्ट होता है कि कुछ सिर लम्बे दिखाई देते है तो कुछ छोटे, सामान्यतः लम्बे सिर संकरे और छोटे सिर चौड़े होते है। कपाल सूचकांक के आधार पर मानव सिर को तीन श्रेणियों में रखा जाता है-

(i) जब सूचकांक 75 से कम होता है तो उसे लम्बा सिर, जब वह 75 से 80 के बीच होता है तो उसे मंझला या मध्यम सिर और जब सूचकांक 80 से अधिक होता है तो सिर को छोटा या चौड़ा कहा जाता है।

(a) लम्बे सिर वाले (Dolico-cephalic) मैलेनेशियन, नीग्रो, एस्कीमो, नीग्रोइड, बण्टू, अमेरिकी इण्डियन, उत्तरी और दक्षिणी यूरोप के निवासी, पुरा-द्रविड़, द्रविड़ लोग;

(b) मध्यम सिर वाले (Mesocephalic) बुशमैन, हॉटण्टास, भूमध्यसागरीय, नॉर्डिक एन. उत्तरी एरिड और

(c) छोटे सिर वाले (Brachy-cephalic) आल्पस कारपेबियन, तुर्क, लुंगुस, मंगोल आदि होते हैं।

2. नासा सूचकांक (Shape of the Nose or Vasal Index):-

       नासा सूचकांक के आधार पर भी प्रजातियों का निर्धारण किया जाता है। नाक की लम्बाई-चौड़ाई के प्रतिशत अनुपात को नासा सूचकांक कहते हैं। यह ज्ञात करने के लिए नाक की चौड़ाई को 100 से गुणा कर नाक की लम्बाई का भाग दिया जाता है।

N.I. = Breadth of the Nose x 100/Length of the Nose

       इस सूचकांक के आधार पर मनुष्य की नाक पतली, चौड़ी, मंझली हो सकती है।

      यदि सूचकांक 70 से कम है तो पतली नाक, 70 से 85 तक मध्यम नाक और उससे अधिक होने पर चौड़ी नाक होती है।

डॉ. हैडन ने नासा सूचकांक के अनुसार-

(i) संकरी/पतली नासिका (Leptrorrhine) उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में निवास करने वाले लोगों में,

(ii) मध्यम नासिका (Mesorrhine) पोलीनेशियायी, साइबेरिया के निवासी कुछ अमेरीकी, भारतीय और पीत वर्ण की प्रजातियों में तथा

(iii) चपटी नासिका (Platyrrhine) अर्द्ध शुष्क मरुभूमियों, प्रशान्त महासागर एवं आस्ट्रेलिया के निवासियों में मिलती है।


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12. What is species? Classify it. (प्रजाति क्या है? इसका वर्गीकरण कीजिए।)

12. What is species? Classify it.

(प्रजाति क्या है? इसका वर्गीकरण कीजिए।)



     What is species 

     प्रजाति शब्द अंग्रेजी के Race का हिन्दी रूपान्तर है जिसका प्रयोग सर्वप्रथम फ्रॉकस ने 1570 ई. में किया था। Race शब्द इटली के रज्जा से बना है जिसका अर्थ परिवार, वंशानुक्रम अथवा नस्ल है अर्थात् यह एक नस्ल या जन्मजात सम्बन्धों का मानव वर्ग है।

हैडन (Haddon) के अनुसार, “प्रजाति (Race) शब्द का अर्थ ऐसे मानव वर्ग विशेष से है, जिसकी सामान्य विशेषताएं आपस में समरूपी हों।” यह एक जैविक नस्ल है जिसके प्राकृतिक लक्षणों का योग दूसरी प्रजाति के प्राकृतिक लक्षणों के योग से भिन्न होता है।

प्रो. ब्लाश ने प्रजाति की व्याख्या इस प्रकार की है.” मानव प्रजाति का वर्गीकरण मानव शरीर की आकृति एवं शारीरिक लक्षणों के आधार पर किया जाता है।”

     अतः यह कहा जा सकता है “प्रजाति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जिनमें एक से शारीरिक लक्षणों का संयोग निश्चित रूप से पाया जाता है और जिसे आनुवंशिक शारीरिक लक्षणों के आधार पर पहचाना जा सकता है।”

क्रोबर के अनुसार, “प्रजाति एक मान्य जैविक संकल्पना है। यह एक समूह है जो आनुवंशिकता द्वारा जुड़ा हुआ है तथा एक नस्ल या आनुवंशिक विभेद या उपजाति द्वारा सन्तान को प्राप्त होता है। यह एक मान्य सामाजिक, सांस्कृतिक संकल्पना नहीं है।”

     इन्होंने कहा “हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि मनुष्य की प्रजातियां बनने में कम से कम लाखों वर्ष अवश्य लगे होंगे। किन कारकों ने उनमें अन्तर उत्पन्न किया, पृथ्वी के किस भाग पर प्रत्येक प्रजाति ने अपनी विशेषताओं को ग्रहण किया, वे आगे कैसे विभक्त हुईं, उनको जोड़ने वाले कौन से तत्व थे और विभिन्न प्रजातियां पुनः कैसे मिश्रित हुई- इन सब विषयों के उत्तर अभी तक अपूर्ण हैं।”

प्रजातियों के वर्गीकरण के अभिलक्षण

      मानवशास्त्रियों ने प्रजातियों का वर्गीकरण मानव की शारीरिक बनावट के विशिष्ट लक्षणों (जैसे त्वचा का रंग, खोपड़ी की लम्बाई, जबड़ों का उभार, शरीर का कद, चेहरे की आकृति, आंखों की बनावट आदि) के आधार पर किया है। किसी ने एक आधार पर अधिक जोर दिया है तो किसी ने अन्य आधार पर।

डॉ. क्रोबर का कथन है कि “मानव प्रजातियों का वर्गीकरण करते समय शारीरिक बनावट के केवल एक या दो लक्षणों को ही प्रजातियों के वर्गीकरण का आधार नहीं मानना चाहिए। प्राकृतिक आधार तथा सच्चा वर्गीकरण वही हो सकता है जिसमें अधिक से अधिक लक्षणों को आधार बनाया जाता है, जो अधिक महत्वपूर्ण हैं उन पर कम महत्वपूर्ण लक्षणों की अपेक्षा, अधिक ध्यान दिया जाता है।” यह इसलिए आवश्यक है कि कोई एक लक्षण प्रायः कई विभिन्न प्रजातियों में मिल जाता है। जैसे एक ही त्वचा के रंग में अनेक वर्ण मिल जाते हैं।

       जिन शारीरिक लक्षणों के आधार पर प्रजातियों का निर्धारण किया जाता है उन्हें दो श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं।

1. बाह्य, ऊपरी या अनिश्चित शारीरिक लक्षण, और

2. आन्तरिक कंकाल, संरचनात्मक अथवा निश्चित लक्षण।

        बाह्य लक्षण वे होते हैं जो बिना किसी यंत्र की सहायता से लक्षित होते हैं। इनमें त्वचा का रंग, बालों की बनावट, शारीरिक कद, मुखाकृति, नेत्रों का रंग और आकृति, होंठ का आकार आदि आते हैं।

      आन्तरिक लक्षण वे होते हैं, जो ऊपर से दिखाई नहीं देते, किन्तु जिन्हें यंत्रों- मानव मापक यंत्र (Anthropometer), वर्नियर कैलीपर और कम्पास से नापा जा सकता है। इनके अन्तर्गत जो लक्षण सम्मिलित किए जाते हैं उनमें कपाल धारिता, नासिका सूची, रक्त समूह और शरीर की हड्डियों के ढाँचे हैं।

प्रजातियों का वर्गीकरण (CLASSIFICATION OF RACES)

     मानवशास्त्रियों ने प्रजातियों का वर्गीकरण मानव की शारीरिक बनावट के विशिष्ट लक्षणों (जैसे-त्वचा का रंग, खोपड़ी की लम्बाई, जबड़ों का उभार, शरीर का कद, बाल, चेहरे की आकृति, आंखों की बनावट, आदि) के आधार पर किया है।

हैडन का वर्गीकरण (Haddon’s Classification):-

         हैडन ने 1924 में बालों, कद, त्वचा, रंग तथा खोपड़ी के आधार पर मानव प्रजातियों को वर्गीकृत किया है। उन्होंने बालों के आधार पर निम्नलिखित तीन प्रकार बताए-

(1) ऊनी या लच्छेदार बाल,

(2) लहरदार बाल,

(3) सीधे बाल।

       ऊनी बाल वाली प्रजातियों के बाल ऊन की भांति लच्छेदार होते हैं। बाल की ऊर्ध्वाधर काट 40 से 50 तक होती है। त्वचा का रंग काला, कद नाटा तथा सिर लम्बा होता है। ऐसे लक्षणों वाली प्रजातियां नीग्रीटो तथा नीग्रो हैं, जो दक्षिणी एवं मध्य अफ्रीकी देशों तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया में निवास करती हैं। लहरदार बाल वाली प्रजातियों के बालों की ऊर्ध्वाधर काट 60 से 70 तक होती है। त्वचा के रंग के आधार पर इन्हें दो उपवर्गों में बांटा जाता है-

(i) इसमें आस्ट्रेलायड प्रजाति को सम्मिलित किया जाता है, जिनका रंग काला, बालों की काट 60 तक, कद मध्यम तथा सिर लम्बा होता है। बाल लगभग लहरदार होते हैं। दक्षिण भारत, आस्ट्रेलिया, ब्राजील, दक्षिण-पूर्वी एशिया के द्वीपों के आदिवासी इसी प्रजाति के हैं।

(ii) इस वर्ग में भूरे, कत्थई तथा श्वेत वर्ण की काकेशियन प्रजातियाँ जैसे- भूमध्यसागरीय, नार्डिक एवं अल्पाइन सम्मिलित की जाती हैं। भूमध्यसागरीय गहरे भूरे रंग की, नार्डिक कत्थई तथा अल्पाइन श्वेत रंग की होती हैं। भूमध्यसागरीय तथा नार्डिक मध्यम सिर वाली तथा अल्पाइन चौड़े सिर की होती हैं। दक्षिण-पूर्वी यूरोप, उत्तर भारत, ईरान, अरब, अफगानिस्तान, उत्तरी अफ्रीका और आरमीनिया की प्रजातियाँ इस वर्ग के अन्तर्गत आती हैं। नार्डिक प्रजाति उत्तर-पश्चिमी यूरोप में मिलती हैं। ऐनू, अफगान, अमेरिंड, पेरियन, सेमाइट, आदि प्रजातियाँ इसी का प्रतिनिधित्व करती हैं।

      हेडन ने अपने वर्गीकरण में विश्व की प्रजातियों को निम्नलिखित छः वर्गों में रखा है। उसका यह वर्गीकरण 1924 से ही निरन्तर विशेष मान्य रहा है। उसके अनुसार ये प्रजातियाँ निम्न हैं:

(1) भूमध्यसागरीय-

      ये लम्बे सिर, भूरी से श्वेत त्वचा, पतली नाक और लहरदार बाल वाले होते हैं। इनका कोई विशेष निवास-स्थान नहीं होता, वरन् ये उष्ण कटिबन्धीय प्रदेशों से शीतोष्ण प्रदेशों तक में मिलते हैं।

(2) एल्पाइन-

      ये शीतोष्ण कटिबन्ध में रहने वाले हैं जो सिर चौड़े तथा सीधे या घुंघराले बाल और भूरी या श्वेत चमड़ी वाले होते हैं।

(3) नीग्रिटो-

      ये अधिक लम्बे सिर, चौड़ी नाक, गहरा काला रंग और घुंघराले बाल वाले होते हैं। ये उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में निवास करते हैं।

(4) मंगोल-

      ये पीले रंग, सिर पर कम बाल, छोटे से मध्यम कद तथा छोटी आंखों वाले होते हैं, जो पूर्वी एशिया में रहते हैं।

(5) पुरा द्राविड़ियन-

      लम्बे सिर और काली त्वचा वाले लोग होते है।

(6) काकेशियन-

      जिन्हें भूमध्यसागरीय, नॉर्डिक व एल्पाइन तीन श्रेणियों में बाँटा गया है। यह लम्बे कद, गौरे वर्ण, लहरदार बाल एवं नीली व हरी आंख की पुतली वाले होते हैं।

टेलर का वर्गीकरण (Taylor’s Classification)-

      टेलर ने 1919 ई. में जलवायु चक्र जातियों के विकास का प्रवास सिद्धान्त के आधार पर मानव प्रजातियों का वर्गीकरण करते हुए स्पष्ट किया कि प्रारम्भ की पाँच मानव प्रजातियों (नीग्रो, नीग्रिटो, आस्ट्रेलाइड, भूमध्यसागरीय एवं एल्पाइन मंगोलियन) की उत्पत्ति मध्य एशिया में महाहिम युग के पूर्व हुई थी और वहीं से ये जातियाँ अन्य महाद्वीप में फैली। टेलर ने बालों की बनावट तथा शीर्ष सूचकांक के आधार पर 7 मानव प्रजातियाँ बताई-

(1) नीग्रिटो,

(2) नीग्रो,

(3) भूमध्य सागरीय,

(4) आस्ट्रेलाइड,

(5) नॉर्डिक,

(6) एल्पाइन,

(7) मंगोलाइड।

(1) नीग्रिटो (Negrito):–

       इस प्रजाति का रंग लाल चाकलेटी से लेकर काला कत्थई तक होता है। इनका डील-डौल नाटा (5 फुट से कम) होंठ काफी मोटे, नाक चौड़ी और चपटी होती है। इनके बाल चपटे, फीते के समान और घने होते हैं। वे आपस में लिपटकर गांठ का निर्माण करते हैं। इनमें जबड़े और दांत आगे निकले होते हैं। इस समय कुछ ही हजार नीग्रिटो जीवित हैं। उनमें अन्य जातियों के रक्त का मिश्रण हो गया है। नीग्रिटो प्रजाति के लोग इस समय श्रीलंका, मलेशिया, फिलीपीन, इण्डोनेशिया, लूजोन और न्यूगिनी के पहाड़ी बन प्रदेशों में रहते हैं। इनमें बड़े समूह युगाण्डा, कांगो बेसिन, कैमरून, श्रीलंका, अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह, मलाया, फिलीपाइन, आदि में पाए जाते हैं।

(2) नीग्रो (Negro):-

      इस प्रजाति का सिर अत्यन्त लम्बा होता है। इनकी त्वचा का रंग प्रायः काला एवं चाकलेटी होता है। इनके बाल लम्बे ऊन जैसे होते हैं। सिर का सूचकांक 70 से 72 तक होता है। इनकी औसत ऊँचाई 130 सेण्टीमीटर होती है। नीग्रो प्रजाति दो स्थानों पर मिलती है- पुरानी दुनिया के दोनों किनारों पर।

     इनमें पहली पश्चिमी अफ्रीका में सुडान और गिनी तट पर और दूसरी पापुआ या न्यूगिनी में मिलती है। पूर्व ऐतिहासिक युग में नीग्रो दक्षिण यूरोप और एशिया में भी रहते थे। भारत में कोल, श्रीलंका में बेद्दा इनके प्रतीक हैं।

(3) भूमध्यसागरीय काकेसाइड्स (Mediterranean Caucasoids):-

     इस प्रजाति का सिर लम्बा, नाक अण्डाकार, बाल घुंघराले और जबड़े निकले होते हैं। आइबेरियन प्रजाति सुडौल शरीर वाली और जैतून एवं तांबे के रंग की होती है। सेमाइट प्रजाति लम्बी और सुन्दर होती है और उनकी नाक सुदृढ़ होती है। यह प्रजाति सभी बसे हुए महाद्वीपों के बाहरी किनारों पर मिलती है। इसमें यूरोप के पुर्तगीज, अफ्रीका के मिसी और आस्ट्रेलिया के माइक्रोनेसियन सम्मिलित हैं। उत्तरी अमेरीका के इरोक्वाइस और दक्षिणी अमेरीका के तूपी भी इसी श्रेणी में आते हैं।

(4) आस्ट्रेलायड (Australoid):-

      इस प्रजाति का सिर लम्बा और उभरा हुआ होता है। बाल पूर्णतः घुंघराले और त्वचा का रंग गहरे काले से लेकर कत्थई तथा हल्का पीला होता है। जबड़े कुछ निकले हुए और नाक साधारण रूप से चौड़ी होती है। यह प्रजाति आस्ट्रेलिया और दक्षिणी भारत के वनों में मिलती है। ब्राजील के डौंस और कूटो तथा पूर्वी और मध्य अफ्रीका की बन्टू जाति इसी की प्रतीक हैं।

(5) नॉर्डिक (Nordic):-

       यह प्रजाति मध्यम लम्बाई और चौड़े सिर, लहरदार बाल, चपटा चेहरा और गरुड़वत् नाक वाली होती है। अधिकांश नॉर्डिक लोगों की चमड़ी हल्के भूरे रंग से गुलाबी रंग की होती है। उत्तरी यूरोपियनों की चमड़ी गोरी से गुलाबी होती है। यह प्रजाति भूमध्यसागरीय किनारों, न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया, उत्तरी अमेरीका, आदि देशों में प्रवासित हो गई है।

(6) एल्पाइन (Alpine):-

      यह प्रजाति चौड़े सिर वाली होती है, चेहरे का ढाँचा सीधा होता है, नाक साफ तौर से संकीर्ण और बाल सीधे होते हैं और रंग भूरे से गोरा तक होता है। एल्पाइन जाति की पश्चिमी शाखा जिसमें स्लेव, आरमेनियन, अफगान, आदि सम्मिलित हैं, रंग में भूरे होते हैं, परन्तु पूर्वी शाखा के लोग अर्थात् फिन, मैगीआर्स, मंचूज और सीवक्स कुछ पीलापन लिए होते हैं।

(7) मंगोलियन (Mongolions):-

     उत्तर एल्पाइन या मंगोलियन गोल सिर के होते हैं। इनके बाल सीधे और चपटे, चेहरा और जबड़ा नतोदर होता है। नाक पतली और संकरी, रंग हल्का पीला-सा खुमानी रंग का होता है। यह प्रजाति मुख्यतः मध्य एशिया, पूर्वी एशिया में पाई जाती है।

     उपर्युक्त दिए गए वर्णन से स्पष्ट होता है कि यद्यपि मानवशास्त्रियों में प्रजातियों के वर्गीकरण में काफी मतभेद रहा है, किन्तु मोटे तौर पर संसार की प्रजातियों को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

1. श्वेत प्रजाति या कॉकेशायड्स,

2. पीली प्रजातियाँ या मंगोलॉयड्स,

3. काली प्रजातियाँ या नीग्रोयड्स।

      इन मुख्य प्रजातियों के अनेक भेद पाए जाते हैं। संसार के विभिन्न भागों में अनेक प्रजातियाँ मिलती हैं जिनका विवरण निम्न प्रकार से दिखाया जा सकता है:-

1. काकेशायड्स (Caucasiods):-

     इस प्रकार की प्रजाति को बहुधा श्वेत प्रजाति कहा जाता है, परन्तु वास्तव में इनका रंग पूर्णतया श्वेत नहीं होता अपितु कुछ हल्का लाल होता है। आंख का रंग गहरे हल्के नीले रंग से लेकर भूरे रंग तक पाया जाता है। बालों का रंग मटियाले रंग से लेकर काले रंग का होता है। बाल सीधे लहरदार होते हैं, शरीर पर बाल अधिक होते हैं। होंठ पतले, ठोड़ी सुन्दर होती है। कपाल सूचकांक 80 से अधिक तथा खोपड़ी का घनत्व 1800cc के लगभग होता है। हॉवेल इलियट स्मिथ के अनुसार इस प्रजाति के तीन वर्ग हैं-

(अ) नोर्डिक-

      इस प्रजाति को शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ प्रजाति माना गया है। आंखों का रंग भूग और नीला होता है। सिर माध्यमिक रूप से ऊंचा, ललाट सीधा, नाक छोटी, चेहरा छोटा और अधर पतले होते हैं। बालों का रंग पीला अथवा भूरा, सीधे और लहरदार होते हैं। इस प्रजाति के लोग स्वीडन, नार्वे, ब्रिटेन तथा संयुक्त राज्य अमेरीका में पाए जाते हैं।

(ब) अल्पाइन-

     सिर की बनावट चौड़ी होती है। सिर ऊँचा, ललाट सीधा, भौहें छोटी तथा कम, कपाल सूचकांक मध्यम, नासा सूचकांक मध्यम, होंठ पतले, त्वचा का रंग हल्का श्वेत तथा लाल, बाल सीधे तथा गहरे भूरे रंग के होते हैं। औसत कद 165 सेमी तथा शरीर पर अधिक बाल होते हैं। यह प्रजाति मध्य यूरोप के देशों में पाई जाती है।

(स) भूमध्यसागरीय-

      इस प्रजाति का कपाल सूचकांक 75 से कम होता है। सिर, लम्बा नीचा या मध्यम, ललाट सीधा, भौंह छोटी, नासा सूचकांक मध्यम, होंठ सामान्य मोटे, आंखों का रंग हल्का तथा गहरा भूरा पाया जाता है। बाल लहरदार या घुंघराले, रंग काला या गहरा भूरा होता है। त्वचा का रंग जैतून के रंग का खाकी भूरा होता है। औसत कद 160 सेमी. होता है। शरीर पर बाल अधिक पाए जाते हैं। यह लोग भारत, स्पेन, पुर्तगाल, दक्षिणी इटली, उत्तरी अफ्रीका, मिस्र आदि देशों में अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

2. मंगोलायड्स:-

         इस प्रजाति की उत्पत्ति मध्य एशिया से मानी जाती है। इस जाति के अधिकांश लोग एशिया में ही पाए जाते हैं। इस प्रजाति के मुख्य लक्षण अधखुली आंखें, भारी पलक, रंग पीला, आंखें गहरी भूरी, चेहरा चौड़ा, माथा चौड़ा, कद छोटा होता है। चीन, मंगोलिया, मंचूरिया, कोरिया, मध्य एशिया आदि भागों में पाई जाने वाली प्रजातियाँ इसी प्रकार की हैं।

3. मैलेनेशियन:-

         इस प्रजाति की आंखें तथा त्वचा काली, बाल घुंघराले, भौंहें उभरी हुई, नाक चौड़ी, कद मध्यम और सिर गोलाई लिए होता है। यह प्रजाति दक्षिणी प्रशान्त द्वीपों में पाई जाती है। न्यूगिनी, फिजी आदि द्वीप में आज भी इस प्रजाति के लोग निवास करते हैं।

4. अफ्रीकी नीग्रोइड:-

        इस प्रजाति का स्थान तथा उत्पत्ति का समय आज तक अन्धकारमय है, परन्तु अनुमान है कि इस प्रजाति की उत्पत्ति अफ्रीका तथा ओसीनिया के बीच हुई होगी। यह प्रजाति अफ्रीका में विशेषकर सूडान से दक्षिणी अफ्रीका तक फैली हुई है। इनके बाल काले, ऊनी प्रकार के, नाक चौड़ी, बाल घने, खोपड़ी लम्बी, सिर ऊँचा, ललाट सीधा, होंठ मोटे तथा बाहर निकले हुए होते हैं। औसत कद 170 सेमी. तथा पैर असाधारण होते हैं।

5. माइक्रोनेशियन-पोलीनेशियन:-

         इस प्रजाति के लोग चौड़े सिर वाले होते हैं, किन्तु मध्यम तथा लम्बे सिर वाले व्यक्ति भी काफी संख्या में पाए जाते हैं। इनका सिर ऊँचा, ललाट झुका हुआ, नाक मध्यम या ऊँची उठी हुई, होंठ मोटे, त्वचा का रंग पीला या भूरा, आंखें भूरी, सिर के बाल लहरदार या घुंघराले तथा रंग काला होता है। औसत कद 160 सेमी. होता है तथा शरीर पर बाल कम होते हैं। इनका निवास मैलेनेशियन द्वीप का उत्तरी भाग है।

6. कांगो या मध्य अफ्रीकी पिग्मी:-

      इस प्रजाति का औसत कद 150 सेमी. से कम होता है, यह लोग अफ्रीकी नीग्रोयड और मैलेनेशियन की तुलना में कम काले होते हैं। इनका रंग काला, बाल घने एवं घुमावदार होते हैं।

7. सुदूर-पूर्वी पिग्मी:-

      इस प्रजाति के होंठ मोटे, सिर के बाल ऊनी, शरीर पर बाल कम, त्वचा का रंग भूरा तथा गहरा काला, औसत कद 150 सेमी. होता है। निवास स्थल मिण्डानाओं, लूजन तथा फिलीपीन द्वीप है।

8. आस्ट्रेलॉयड:-

        इस प्रजाति का निवासस्थल ऑस्ट्रेलिया है। सिर लम्बा, ललाट नीचा तथा ढला हुआ होता है। भौंहें बड़ी, नाक चौड़ी, होंठ मोटे, त्वचा का रंग गहरा भूरा, बालों का रंग भूरा होता है। औसत कद 165 सेमी. होता है। यह प्रजाति प्रायः अलग रही है, इसलिए इसके कुछ लक्षण विलक्षणता लिए हुए होते हैं।

9. बुशमैन-होटेनटोट:-

        दक्षिण-पश्चिमी अफ्रीका के कालाहारी मरुस्थल में यह दो प्रकार की प्रजातियाँ पाई जाती है। मस्तक ऊँचा, गाल ढले हुए, चेहरा छोटा तिकोना, नाक चौड़ी उभरी हुई तथा होंठ बाहर की ओर निकले हुए, रंग काला, सिर के बाल घुमावदार होते हैं।

10. एनू (Ainu):-

      यह प्रजाति जापान द्वीपसमूह की आदिम प्रजातियों का प्रतिनिधित्व करती है। इसकी खोपड़ी लम्बी से लेकर मध्यम, ललाट झुका हुआ, भौंहें लम्बी तथा चेहरा मध्यम आकार का होता है। नाक चौड़ी और उभरी हुई, होंठ मोटे, त्वचा का रंग श्वेत अथवा गहरा भूरा, बालों का रंग हल्का भूरा अथवा काला होता है। आंखें काली और कद का औसत 155 सेमी. होता है।

11. वेडॉयड:-

      यह प्रजाति कॉकेशायड प्रजाति की ही शाखा मानी जाती है। एनू, आस्ट्रेलॉयड एवं द्रविडियन प्रजातियों से कई शारीरिक लक्षणों में समानता पाई जाती है। इनका सिर लम्बा एवं संकरा, भौंहे लम्बी होती हैं। चेहरा लम्बा, नाक चौड़ी, होंठ पतले, त्वचा, बाल एवं आँख का रंग क्रमशः गहरा भूरा, काला तथा गहरा भूरा अथवा काला होता है। औसत कद 150 सेमी. होता है।

      विद्वानों की मान्यता है कि मानव समूहों का प्रजातियों में वर्गीकरण करना सर्वथा मनमाना है। इस विभाजन का वास्तविक रूप से कोई महत्व नहीं है।


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